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अध्याय 21. केवल सत्य का अनुसरण ही परमेश्वर में सच्चा विश्वास है

यदि तुम्हें किसी एक चीज़ का कोई अनुभव नहीं है, तो तुम निश्चित रूप से यह न जानोगे कि इसका प्रबंधन कैसे करना है और तुम इसका प्रबंधन बुरी तरह से ही करोगे। अगर तुम इसका प्रबंधन कर भी देते हो, और तुम सोचते हो: "मैंने यह सब काफी समझा दिया है और इसके बारे में बहुत कुछ कह दिया है। उन्होंने भी इसे बहुत सुन लिया है। इस समस्या के बारे में मैंने जो भी सहभागिता की है वह मूल रूप से सच है, है ना?", तो वास्तव में, यह सब सिर्फ सिद्धांत है, और तुम इस समस्या का हल करने के लिए सिद्धांत का उपयोग कर रहे हो। ऐसा क्यों कहें कि यह सिद्धांत है? तुम्हारा कहा गया हर शब्द सही है, लेकिन तुम जो कहते हो वह समस्या पर निर्देशित नहीं होता है और वह इस समस्या की जड़ तक नहीं पहुँचता है—यह समस्या कहाँ है, इस समस्या में क्या मुश्किल है, क्यों ये लोग ऐसी चीजें कर सकते हैं या उनके भीतर क्या परिस्थितियाँ उत्पन्न हुई हैं। अगर तुम इन चीजों को खोदकर निकाल नहीं सकते, तो तुम समस्या का समाधान नहीं कर सकते हो; तुम्हें समस्या के स्रोत को खोद निकालना चाहिए। यह वैसा ही है जैसे लोगों को कभी-कभी पेट में दर्द होता है। पेट-दर्द के कई प्रकार होते हैं: कुछ लोग जाड़े की वजह से पेट-दर्द से पीड़ित होते हैं, कुछ इसलिए क्योंकि उन्होंने कुछ ठंडा खा लिया है, कुछ इस वजह से कि उनमें कोई सूजन है, और कुछ मरोड़ की वजह से। यदि तुम स्पष्ट रूप से एक को दूसरे से अलग पहचानने में सक्षम नहीं हो, तो बात नहीं बनेगी। यदि तुम उन सभी को दर्द-निवारक औषधि लेने देते हो, तो उनमें से कुछ का दर्द थोड़ी देर के लिए रुक सकता है, पर कुछ के लिए दर्द-निवारक दवाइयाँ मूल रूप से बिल्कुल ही काम नहीं करेंगी। तो, इस तरह, लोगों की अगुआई करना एक ऐसे डॉक्टर की तरह है जो रोगी का इलाज कर रहा है। तुम्हें अच्छी तरह समझना चाहिए कि बीमारी की जड़ कहाँ है। यदि तुम उनकी समस्या की जड़ या उनकी स्थिति को समझ नहीं सकते, या यह पता नहीं लगा सकते कि उनसे कहाँ भूल हुई है या उनकी समस्या क्या है, या वे जब बातें करते हैं तो वे किन चीज़ों को उजागर करते हैं, तो तुम समस्या का हल नहीं कर पाओगे। तुम सोचते हो कि तुम जो कुछ भी कहते हो वह सब सत्य है, जब कि वास्तव में यह सब सिर्फ सिद्धांत है, और यह केवल ऊपरी-ऊपरी है। उदाहरण के लिए, कुछ लोग अपने कर्तव्यों में कुछ भूल करते हैं, इसलिए तुम उन्हें उपदेश देते हो: "अपने कर्तव्य करते वक्त, हमें निष्ठावान होना चाहिए, और हमें परमेश्वर की खातिर जिम्मेदारी लेनी चाहिए। अपने कर्तव्य को पूरा करना एक दायित्व है जिसे हमें निभाना चाहिए, और हमें ढील नहीं करनी चाहिए।" तुम हमेशा इस बारे में उपदेश देते हो। वास्तव में, वे ये सब समझते हैं, और उन्हें पता है कि उन्हें अपने कर्तव्य में ढील नहीं करनी चाहिए, और उन्हें यह मालूम है कि अपने कर्तव्य को कैसे ठीक तरह से किया जाए। लेकिन वे फिर भी इसे अच्छी तरह से नहीं करते हैं, इसलिए तुम्हें स्पष्ट रूप से समझ लेना चाहिए कि यहाँ हालात क्या हैं। यह संभव है कि उनमें क्षमता की कमी है, इसलिए वे चीजों को बुरी तरह से करते हैं, या वे बेवकूफ हैं और सुधार के लिए सक्षम नहीं हैं, कि चाहे तुम उन्हें कैसे भी सिखाओ, वे अभी भी इसे अच्छी तरह नहीं कर सकते, और यह एक तरह की स्थिति है। एक और तरह की स्थिति यह हो सकती है कि शायद वे अपने परिवार से आसक्त हों। एक और स्थिति यह है कि शायद वे अपनी नौकरी या अपने विवाह के मुद्दों के साथ उलझे हुए हों। एक और सम्भावना यह है कि उन्हें अपने भविष्य के बारे में चिंताएँ हों: "अगर मुझे घर इसलिए भेज दिया जाता है कि मैं अपना कर्तव्य ठीक से करने में विफल होता हूँ, तो मैं क्या करूँगा?" कई तरह की स्थितियाँ होती हैं, इसलिए तुम्हारा उन कुछ शब्दों को कहना किसी काम का नहीं होता। "हमें लापरवाह नहीं होना चाहिए, हमें परमेश्वर के प्रति एकनिष्ठ होना चाहिए। हमारे अंदरूनी इरादे सही होने चाहिए, हमें अपने कर्तव्य को करते समय शर्तें नहीं रखनी चाहिए और हमें परमेश्वर की आज्ञा का पालन करना चाहिए चाहे वह हमारे साथ जैसा भी व्यवहार करे।" इस तरह उपदेश देने का कोई फायदा नहीं है। तुम परमेश्वर पर विश्वास करने के दृष्टिकोण का भी उपदेश देते हो, यह कहते हुए कि, "हम अपने कर्तव्यों का पालन क्यों करते हैं"? यह और भी कम उपयोग का है। तुम इन शब्दों को अलग-अलग स्थितियों में अंधाधुंध रूप से लागू नहीं कर सकते। जहाँ तक तुम में से उन लोगों का प्रश्न है जिनके पास अब कुछ शाब्दिक ज्ञान है और जो कुछ सिद्धांतों को समझते हैं, जब तुम अपने दैनिक जीवन के दौरान कुछ समस्याओं के संपर्क में आते हो, तो तुम सोचते हो, "यह बात किस समस्या से जुड़ी हुई है? कर्तव्यों का पालन करने और सुसमाचार फैलाने के साथ अभी इतने सारे मुद्दे हैं, इसलिए मैं अपने कर्तव्य को करने के बारे में सहभागिता करूँगा।" और, थोड़े गहरे जाते हुए, "मैं परमेश्वर पर विश्वास करने के दृष्टिकोण के बारे में सहभागिता करूँगा।" जब तुम यह उपदेश दे चुके होते हो, तो दूसरे अभी भी भविष्य में वे ही गलतियाँ करते हैं। दरअसल, यह मूल रूप से किसी फायदे का नहीं रहा है, क्योंकि तुमने समस्याओं की जड़ को समझे बिना ही सहभागिता की है। उदाहरण के लिए, कुछ ऐसे लोग हैं जो पूरी तरह से सुर के प्रति बहरे हैं, जो बहुत ख़राब गाते हैं। दूसरे लोग उनसे पूछते हैं: "यह किस तरह की समस्या है?" वे कहते हैं, "यह क्षमता की कमी है!" वे ऐसा कहते हैं। यह क्षमता की कमी कैसे है? बात यह है कि गाने का वंशाणु ही उनके अन्दर नहीं है। तुम यह नहीं कह सकते कि यह क्षमता की कमी के तहत है, है ना? उनका सुर के प्रति बहरे होना पैदायशी है और यह कभी भी नहीं बदल सकता है। वे इसे "क्षमता की कमी" के रूप में निश्चित कर लेते हैं, लेकिन क्या यह एक भूल नहीं है? किसी चीज़ को उस जगह पर बैठाना जहाँ वह बैठती ही नहीं, गलत है। तुम लोगों में से वे जिन्हें अब कुछ सिद्धांत और शाब्दिक ज्ञान से लैस किया गया है, तुम अभी भी यह नहीं जानते हो कि आखिर इन शब्दों का प्रयोग किस स्थान पर किया जा सकता है। जब समस्याओं का समाधान करने के लिए सत्य का उपयोग करने का समय आता है, तो तुम उनमें से किसी को भी हल करने में असमर्थ रह जाते हो। तुम हैरान होते हो: "मेरे पास बहुत सच्चाई है, तो मैं इन समस्याओं को हल कैसे नहीं कर सकता हूँ? जैसे ही कोई समस्या मेरे सामने आती है, मैं क्यों संदेहग्रस्त महसूस करता हूँ?" यह साबित करता है कि तुम अभी भी सच्चाई को नहीं समझते हो और तुम सच्चाई को जान नहीं पाए हो। कुछ लोग कहते हैं: "मेरे पास उच्च स्तर का ज्ञान है। मैं कई सालों तक महाविद्यालय में था, इसलिए दर्शन, राजनीति और कानून के बारे में मैं बहुत कुछ समझता हूँ, जब भाषा की बात आती है तो मेरा दिमाग तेज चलता है। मैंने परमेश्वर के वचनों को काफी पढ़ा है और मुझे बहुत कुछ याद हो गया है। लेकिन जब मैं समस्याओं को सुलझाने का काम पूरा करता हूँ, तो वे क्यों कहते हैं कि मैंने उनको सुलझाने के लिए सिद्धांत का इस्तेमाल किया, और सच्चाई का नहीं?" यहाँ समस्या क्या है? तुम सच्चाई को नहीं समझते हो; तुम नहीं जानते हो कि "सच्चाई" का मतलब क्या होता है।

परमेश्वर पर विश्वास के बारे में, सभी लोग सिद्धांतों की बात कर सकते हैं कि "परमेश्वर पर विश्वास करने के बारे में हमारे विचारों को शुद्ध होना चाहिए," "हमें परमेश्वर की आज्ञा को मानना चाहिए," "हमें परमेश्वर से प्रेम करना चाहिए," "हमें निष्ठापूर्वक अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए," "हमें परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह नहीं करना चाहिए" और "हमें अपने आप को समझना चाहिए"। हालांकि इन चीज़ों के बारे में उन्होंने अक्सर बात की है, लेकिन वे उन्हें समझते नहीं हैं। इन सच्चाइयों के पीछे रहे असली अर्थ की वास्तविक समझ उन्हें अभी भी नहीं है। तुम शब्दों को केवल सतह पर समझते हो, लेकिन शब्दों के आध्यात्मिक अर्थ या आंतरिक तत्व को नहीं। इसलिए, तुम लोगों के दिल में कोई सच्चाई नहीं है। तुम्हारे पास थोड़ी समझ हो सकती है, लेकिन यह अति सहज है। उन लोगों के लिए जिन्होंने एक लंबे समय से परमेश्वर पर विश्वास किया है और जिनके कुछ अनुभव हैं, वे कुछ सतही चीजों के बारे में अपने दिल में कुछ समझते तो हैं, फिर भी वे अपनी समझ को अभिव्यक्त या लागू नहीं कर पाते। जो कलीसिया के लिए नए हैं, वे कुछ सिद्धांतों के बारे में केवल बात कर सकते हैं और लोगों को पाने के लिए सुसमाचार का प्रचार कर सकते हैं, लेकिन वे सच्चाई को बिल्कुल नहीं समझते हैं। तुम लोगों में से जो शिक्षित और सभ्य हैं, वे भी सत्य को नहीं समझते हैं। सिद्धांतों या शाब्दिक अर्थों की अपनी समझ को सच्चाई की समझ न मान बैठो। कलीसिया के कुछ अनुभवी अग्रजों को, जो अच्छी क्षमता वाले हैं और जो सार को अपेक्षाकृत अच्छी तरह जानते हैं, उनमें सच्चाई का थोड़ा अनुभव हो सकता है, लेकिन फिर भी वे यह नहीं कह सकते कि वे इसे समझते हैं। जब तुम समझदारी पर बात करते हो, तो उन दस वाक्यों में से जो तुम बोलते हो, संभवतः केवल दो में ही वास्तविक समझदारी होती है। बाकी जो कुछ तुम बोलते हो वह सैद्धांतिक है, लेकिन तुम्हें लगता है कि जैसे तुम अब इसे कर सकते हो—तुम लगातार एक दिन या कई दिनों तक प्रचार कर सकते हो चाहे तुम कहीं भी जाओ, हमेशा तुम्हारे पास रुके बिना कहने के लिए कुछ होता है। जब तुम इसे कर चुकते हो, तो तुम उन बातों को एक पुस्तक के रूप में व्यवस्थित कर, उसकी कई प्रतियाँ बनाकर उन्हें वितरित करना चाहते हो, एक "ख्यातिप्राप्त व्यक्ति की जीवनी" बनाने के लिए, जो एक बार जारी होने पर, लोगों को इन शब्दों को खाने और पीने का मौका देगी और इससे सभी को लाभ होगा। लोग सच्चाई को बिल्कुल नहीं समझ सकते, अधिक से अधिक वे शाब्दिक अर्थ को ही समझते हैं। जब वे खुद को एक निश्चित सीमा तक लैस कर लेते हैं, चूँकि वे चतुर होते हैं और उनकी याददाश्त अच्छी होती है, चूँकि वे अक्सर हर जगह जाते और परमेश्वर के कार्य, देहधारण के महत्व, देहधारण के रहस्य, और परमेश्वर के कार्य के तरीकों और चरणों आदि के बारे में बोलते रहते हैं, उन्हें लगता है कि सत्य स्वयं उनके कब्जे में हैं, और वे इसके धनी हैं। यह बहुत निरर्थक है! यह साबित करता है कि उनमें से कोई भी सत्य को नहीं समझता है। अब लोग कुछ सिद्धांतों को समझते हैं, पर वे खुद को नहीं समझते हैं, और उन्हें बोध तो और भी कम है। कुछ सिद्धांतों को समझकर उन्हें लगता है कि सत्य उनके कब्जे में हैं, कि वे इतने नगण्य नहीं हैं, और वे ऊँचे खड़े रहते हैं, यह सोचते हुए: "मैंने परमेश्वर के वचन को कई बार पढ़ा है। कुछ वचन मुझे सटीक याद हैं और मैंने उन्हें दिल पर लिख दिया है। जहाँ भी मैं जाता हूँ, यदि मैं बोलना शुरू करूँ तो मैं कई दिनों तक बोल सकता हूँ, और मैं व्यवस्थित और परिपूर्ण ढंग से परमेश्वर के वचनों के किसी भी अंश के बारे में बात कर सकता हूँ।" वास्तव में, तुम कुछ भी नहीं समझते हो। ऐसा क्यों कहा जा रहा है कि तुम नहीं समझते हो? एक पहलू यह है कि तुम लोग समस्याओं को हल नहीं कर सकते हो, तुम उनकी जड़ नहीं पा सकते हो, न ही तुम उनको भेदकर उनके सार-तत्व को देख सकते हो। एक और पहलू तो यह है कि समस्या या मुद्दा चाहे जो भी हो, इस बारे में तुम लोगों का ज्ञान केवल अध-पका और संदिग्ध है, और तुम इसे सत्य से जोड़ नहीं पाते हो।

जहाँ तक परमेश्वर में किसी के विश्वास के दर्शन का प्रश्न है—लोग परमेश्वर पर कैसे विश्वास करते हैं, "विश्वास" किसे कहा जा सकता है, एक विश्वासी किस प्रकार का व्यक्ति है, किस प्रकार के व्यक्ति के दिल में परमेश्वर है, "परमेश्वर में विश्वास" शब्दों की व्याख्या कैसे करें, इस सच्चाई को कैसे समझें, किस प्रकार का रवैया यह दिखाता है कि परमेश्वर में विश्वास के बारे में किसी का दर्शन सही है, किस तरह का रवैया दिखाता है कि परमेश्वर में विश्वास के बारे में उसका दर्शन गलत है, और लोगों को परमेश्वर में कैसे विश्वास करना चाहिए—क्या तुम लोगों ने कभी इन बातों पर विचार किया है? तुम सभी लोग सच्चाई के "दिग्गज" नज़र आते हो। क्या तुमने कभी सोचा है कि विश्वास किन चीज़ों से बनता है? तुम्हारे दैनिक जीवन में कौन-सी चीजें अविश्वास को दिखाती हैं, जिन विश्वासियों में सच्चा विश्वास होता है, वे क्या प्रदर्शित करते हैं, जो विश्वास नहीं करते हैं उनमें क्या देखने को मिलता है, और अपने दैनिक जीवन में जिन चीजों के साथ तुम लोग संपर्क में आते हो, उनमें से कौन-सी चीज़ें परमेश्वर में विश्वास करने के साथ सरोकार रखती हैं और कौन-सी चीज़ों का परमेश्वर में विश्वास करने के साथ कोई सम्बन्ध नहीं है—क्या तुम लोग इन चीजों के बारे में स्पष्ट रूप से बात कर सकते हो? क्या तुम वास्तव में परमेश्वर में विश्वास के अर्थ को समझते हो? क्या तुम समझते हो कि किस तरह के व्यक्ति का विश्वास वास्तविक है, या किस प्रकार का व्यक्ति एक सच्चा विश्वासी है? क्या तुम लोग सृजित प्राणियों द्वारा परमेश्वर में विश्वास करने के अर्थ को समझते हो? इसमें परमेश्वर में विश्वास करने पर विचार शामिल हैं। कुछ लोग कहते हैं: "परमेश्वर में विश्वास करना एक अच्छी बात है और यही सही तरीका है। परमेश्वर में विश्वास करना किसी भी व्यवसाय या पेशे से बेहतर है। मनुष्य के जीवन में परमेश्वर में विश्वास करना सबसे बड़ी बात है। परमेश्वर पर विश्वास करते हुए परमेश्वर के लिए अपना कर्तव्य पूरा करना एक व्यावहारिक अभिव्यक्ति है। परमेश्वर में विश्वास करना बचाए जाने की खातिर है और यह उसकी इच्छा को पूर्ण करना है।" तुम सभी ने पहले ये बातें कही हैं, क्या नहीं कही हैं? क्या तुम लोग वास्तव में इन शब्दों को समझते हो? नहीं, तुम ने वास्तव में उन्हें नहीं समझा है। परमेश्वर में एक सच्चा विश्वास करने का अर्थ बचाए जाने के लिए उस पर भरोसा करना नहीं है और इसका अर्थ एक अच्छा व्यक्ति होने के बारे में तो उससे भी कम है। परमेश्वर में विश्वास करना केवल मानवीय सदृश्यता रखने के बारे में भी नहीं है। दरअसल, लोगों को परमेश्वर में अपने विश्वास करने को सिर्फ इस विश्वास के रूप में नहीं देखना ​​चाहिए कि एक परमेश्वर है, और उसके बाद कुछ और नहीं; ऐसा नहीं है कि तुम को केवल यह विश्वास करना चाहिए कि परमेश्वर सच्चाई, मार्ग, जीवन है, और फिर कुछ भी नहीं। न ही ऐसा है कि तुम परमेश्वर को केवल स्वीकार करो, उससे भी कम बस यह विश्वास कर लो कि परमेश्वर सभी चीजों पर शासन करता है, कि परमेश्वर सर्वशक्तिमान है, कि परमेश्वर ने दुनिया में सभी चीजें बनाई हैं, कि परमेश्वर अद्वितीय है और परमेश्वर ही सर्वोच्च है। यह केवल इतना नहीं है कि तुम इस पर विश्वास करो; बल्कि यह ऐसा है कि तुम्हें—तुम्हारे सम्पूर्ण अस्तित्व और तुम्हारे पूरे दिल के साथ—परमेश्वर का अनुसरण करना चाहिए, ताकि परमेश्वर तुम्हें काम पर रख सके, परमेश्वर तुम्हें अपनी सेवा में इस्तेमाल कर सके, और यह कि तुम्हें परमेश्वर की खातिर कुछ भी करना चाहिए। ऐसा नहीं है कि केवल परमेश्वर द्वारा पूर्वनिर्धारित और चुने गए लोगों को ही उस में विश्वास करना चाहिए। असल में, सभी मानव जाति को परमेश्वर की उपासना करनी चाहिए, उसकी ओर ध्यान देना चाहिए और उसका अनुसरण करना चाहिए, क्योंकि मानव जाति परमेश्वर द्वारा ही बनायी गई थी। यह अब सार के मुद्दे को छूता है। यदि तुम हमेशा परमेश्वर में विश्वास करने के अपने उद्देश्यों के बारे में बात करते हो, यह कहते हुए, "क्या हम अनन्त जीवन प्राप्त करने के लिए परमेश्वर में विश्वास नहीं करते हैं? क्या हम बचाए जाने की खातिर परमेश्वर में विश्वास नहीं करते?", जैसे कि मानो परमेश्वर में तुम्हारा विश्वास करना किसी सतही मामले की तरह हो, केवल कुछ हासिल करने के लिए हो, तो परमेश्वर में विश्वास करने का तुम्हारा दृष्टिकोण यह नहीं होना चाहिए। हर एक-एक सत्य के संबंध में, लोगों को खोज करनी चाहिए, उन्हें समझना और पता लगाना चाहिए कि उस सत्य का आंतरिक अर्थ क्या है, कैसे सच्चाई के उस पहलू का अभ्यास करना है, और कैसे इसमें प्रवेश किया जा सकता है—ये वो चीज़ें हैं जो कि लोगों के पास होनी चाहिए। सच्चाई के सभी पहलुओं में, जो अब तुम्हारे पास होनी चाहिए, तुम लोग केवल सतही सिद्धांत, बाह्य स्वरूप को समझते हो, और तुम सच्चाई के सार को नहीं समझते, क्योंकि तुम ने इसका अनुभव नहीं किया है। उदाहरण के लिए: अपने कर्तव्यों को पूरा करने के पहलू में बहुत सच्चाई निहित है, मनुष्य के परमेश्वर को प्रेम करने, और खुद को जानने, के पहलू में भी बहुत सच्चाई निहित है, लोगों को बहुत कुछ सच्चाई को समझना चाहिए। देहधारण के महत्व और रहस्य में भी बहुत सच्चाई निहित है जिसे समझा जाना चाहिए। कुछ ऐसे मुद्दों में बहुत सच्चाई है जैसे कि लोगों को परमेश्वर की उपासना कैसे करनी चाहिए, उन्हें कैसे पेश आना चाहिए, उन्हें किस तरह परमेश्वर की आज्ञा का पालन करना चाहिए, परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप होने के लिए उन्हें क्या करना चाहिए और उन्हें कैसे परमेश्वर की सेवा करनी चाहिए। सच्चाई के इन सभी पहलुओं से संबंधित प्रश्नों को समझने के लिए तुम लोग क्या चिंतन या कोशिश करते हो? हर पहलू के भीतर एक सच्चाई है जो कि विशेष रूप से गहरी है, और लोगों को उन सच्चाइयों का अनुभव करने की आवश्यकता होती है। यदि तुम उन्हें अनुभव नहीं करते हो और केवल शब्दों की सतह पर बात करते हो, उन्हें कभी भी नहीं समझते हो या गहराई से उनका अनुभव नहीं करते हो, तो तुम हमेशा शब्दों की सतह पर ही जीवित रहोगे, और परिवर्तन में असमर्थ रहोगे।

जब सामान्य लोग तुम लोगों के बारे में, जो कि नेता हो, टिप्पणी करते हैं तो तुम लोग कहते हो: "ओह, मेरे बारे में टिप्पणी करने के लिए तुम लोगों की क्या योग्यता है? तुम कितने धर्मोपदेश दे सकते हो? तुम कितना बोल सकते हो? तुम कितने लोगों की अगुआई कर सकते हो? तुम क्या कर सकते हो?" ऐसा लगता है जैसे कि तुम सब तो योग्य हो। यदि तुम इस तरह से चलते रहे, तो तुम परेशानी में पड़ जाओगे; तुम थोड़े समय के लिए सेवा तो कर सकते हो लेकिन फिर तुम गलत चलोगे। जहाँ तक ​​तुम सभी का प्रश्न है, यदि किसी क्षेत्र या जिले की कलीसियाएँ तुम लोगों को सौंप दी जाएँ, और छह महीनों तक कोई भी तुम्हारा निरीक्षण न करे, तो तुम लोग भटकना शुरू कर दोगे। अगर कोई तुम्हारी एक वर्ष के लिए देख-रेख न करे, तो तुम उन्हें दूर ले जाओगे और संभवतः उन्हें गुमराह कर दोगे। दो साल गुजरने पर, अब भी अगर कोई तुम्हारी निगरानी न करे, तो तुम उन लोगों को अपने सामने ले आओगे। ऐसा क्यों है? क्या तुम लोगों ने पहले कभी इस प्रश्न पर विचार किया है? मुझे बताओ, क्या तुम लोग इस तरह के हो सकते हो? तुम लोगों का ज्ञान केवल कुछ समय के लिए लोगों को पोषित कर सकता है जैसे-जैसे समय बीतता है, यदि तुम वही एक बात कहते रहे, तो कुछ लोग इसे जान लेंगे; वे कहेंगे कि तुम अत्यधिक सतही हो, तुममें गहराई की कमी है। तुम्हारे पास सिद्धांतों की बात कहकर लोगों को धोखा देने की कोशिश करने के अलावा कोई विकल्प नहीं होगा। अगर तुम इसे हमेशा इस तरह से जारी रखोगे, तो तुम्हारे नीचे के लोग तुम्हारे तरीकों, कदमों, और परमेश्वर में विश्वास करने और अनुभव करने के तुम्हारे प्रतिमान का अनुसरण करेंगे, और वे उन शब्दों और सिद्धांतों को व्यवहार में रखेंगे, और अंततः, तुम जिस तरह की बातें करते हो, वे तुम्हारा एक उदाहरण के रूप में इस्तेमाल करेंगे। तुम सिद्धांतों की बात करने के लिए लोगों की अगुआई करते हो, और तुम्हारे नीचे के लोग तुम से सिद्धांतों को सीखेंगे, और जैसे-जैसे बात आगे बढ़ेगी, तुम एक गलत रास्ता अपना चुके होगे। तुम्हारे नीचे के सभी लोग तुम्हारा अनुसरण करते हैं, इसलिए तुम महसूस करते हो: "मैं अब शक्तिशाली हूँ; इतने सारे लोग मेरी बात सुनते हैं, और दुनिया मेरे इशारे पर चलती है।" मनुष्य के अंदर का यह विश्वासघात अचेतन रूप से तुम्हारे द्वारा परमेश्वर को एक नाम मात्र में बदल देता है, और तब तुम स्वयं कोई एक पंथ, कोई संप्रदाय बना लेते हो। पंथ और संप्रदाय कैसे उत्पन्न होते हैं? वे इसी तरह से बनते हैं। "हर पंथ और संप्रदाय के नेताओं को देखो। वे सभी अभिमानी और आत्म-तुष्ट हैं, और वे बाइबल की व्याख्या संदर्भ के बाहर और उनकी अपनी कल्पना के अनुसार करते हैं। वे सभी अपना काम करने के लिए प्रतिभा और पांडित्य पर भरोसा करते हैं। यदि वे कुछ भी उपदेश करने में असमर्थ होते, तो क्या वे लोग उनका अनुसरण करते? कुछ भी हो, उनके पास कुछ विद्या तो है ही, और वे सिद्धांत के बारे में थोड़ा-बहुत बोल सकते हैं, या वे जानते हैं कि दूसरों को कैसे जीता जाए, और कुछ चालाकियों का उपयोग कैसे करें, जिनके माध्यम से वे लोगों को अपने सामने ले आए हैं और उन्हें धोखा दे चुके हैं। नाम मात्र के लिए, वे लोग परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, लेकिन वास्तव में वे अपने नेताओं का अनुसरण करते हैं। अगर वे उन लोगों का सामना करते हैं जो सच्चे तरीके से प्रचार करते हैं, तो उनमें से कुछ कहेंगे, 'हमें परमेश्वर में अपने विश्वास के बारे में उससे परामर्श करना है।' देखिये, परमेश्वर में विश्वास करने के लिए कैसे उन्हें किसी की सहमति की आवश्यकता है; क्या यह एक समस्या नहीं है? तो फिर, वे सब नेता क्या बन गए हैं? क्या वे फरीसी, झूठे चरवाहे, मसीह-शत्रु, और लोगों के सही मार्ग को स्वीकार करने में अवरोध नहीं बन चुके हैं?"

इस तरह के लोग पौलुस के प्रकार के ही हैं। ऐसा क्यों कहा जाए? पौलुस द्वारा लिखे गए पत्र लगभग दो हजार साल पुराने हैं और वे संपूर्ण अनुग्रह के युग में व्याप्त रहे। सब लोगों ने इन्हें खाया और पिया और उसके शब्दों को मानक के रूप में लिया, जैसे कि पीड़ा, स्वयं के शरीर का अनुशासन करना, और धार्मिकता का अंतिम मुकुट प्राप्त करना। लोग उसके शब्दों और उसके सिद्धांतों के अनुसार परमेश्वर में विश्वास करते थे। लोगों को अनुग्रह के युग के दौरान परमेश्वर की इच्छा के बारे में कितनी जानकारी थी? आखिरकार, जो लोग उस समय यीशु का अनुसरण करते थे, वे अल्पसंख्यक होते थे, और जो लोग उसे जानते थे वे तो और भी कम थे—यहाँ तक कि उसके शिष्यों में से भी कई उसे वास्तव में नहीं जानते थे। कोई यह नहीं कह सकता कि वह थोड़ा-सा प्रकाश जो मनुष्य बाइबल के पन्नों में देखता है, वह परमेश्वर की इच्छा का प्रतिनिधि है। उससे भी बहुत कम यह कहा जा सकता है कि थोड़ा-सा प्रबोधन पाना परमेश्वर को समझना है। लोग अभिमानी और दम्भी हैं और वे परमेश्वर को अपने दिल में नहीं रखते हैं। थोड़ा-सा सिद्धांत समझने के साथ ही, वे स्वयं के लिए कई संप्रदायों की स्थापना कर उनकी रचना कर देते हैं। सौभाग्य से, यह अनुग्रह का युग था और परमेश्वर मनुष्य के साथ सख्त नहीं था; यीशु के नाम पर रहे सभी पंथों और संप्रदायों पर पवित्र आत्मा ने कार्य किया था, और सब कुछ पवित्र आत्मा के द्वारा किया गया था, उन अवसरों के अलावा जहाँ बुरी आत्माओं का काम किया गया था, इस तरह अधिकांश लोग फिर भी परमेश्वर की कृपा का आनंद लेते थे।

इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुमने पहले किसी और का अनुसरण किया था या तुमने परमेश्वर की इच्छा पूरी नहीं की थी, तुम को इस चरण में परमेश्वर के सामने आना ही होगा। इस स्तर पर, यदि कार्य के इस चरण का अनुभव करने के आधार पर तुम किसी और का अनुसरण करते रहोगे, तो तुम्हें अक्षम्य माना जाएगा, और तुम्हारा अंत पौलुस की तरह ही होगा। शुरू से, मैंने उदाहरण के लिए पौलुस और पतरस का उपयोग किया था, क्यों? ये दो पृथक पथ हैं। यदि कोई परमेश्वर पर अपने विश्वास में पतरस की राह पर नहीं चलता है, तो वह पौलुस के मार्ग पर चलता है। केवल ये ही दो रास्ते हैं। इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम एक छोटे अनुयायी हो या एक नेता हो, यह सब एक समान है। यदि तुम पतरस के रास्ते पर नहीं आ जाते हो, तो तुम पौलुस के मार्ग पर चल रहे हो। यह अपरिहार्य है, और चलने का कोई तीसरा रास्ता नहीं है। अगर लोग परमेश्वर की इच्छा को नहीं समझते, परमेश्वर को नहीं जानते हैं, सच्चाई को समझने का प्रयास नहीं करते और परमेश्वर के प्रति पूर्ण रूप से आज्ञाकारी नहीं हैं, तो अंत में उन्हें पौलुस के समान ही समाप्त होना होगा। अगर तुम परमेश्वर को जानने की कोशिश नहीं करते, परमेश्वर की इच्छा को समझने की कोशिश नहीं करते, बल्कि तुम केवल बोलने की और अपने आप को सिद्धांतों से लैस करने की कोशिश करते हो, तो तुम बस परमेश्वर की अवहेलना कर सकते हो और उसे धोखा दे सकते हो, क्योंकि मनुष्य की प्रकृति ही परमेश्वर की अवहेलना करना है। वे चीजें जो सच्चाई के अनुरूप नहीं होती, वे निश्चित रूप से मनुष्य की इच्छा से पैदा होती हैं। कोई यह नहीं कह सकता कि वे चीज़ें सच्चाई के अनुरूप नहीं होने के बावजूद, अभी बहुत बुरी नहीं हैं। कुछ कहते हैं: "हालाँकि इन चीज़ों को सच्चाई के अनुरूप नहीं किया जाता है, मुझे फिर भी यह नहीं लगता कि वे परमेश्वर की अवहेलना करती हैं।" यदि तुम ऐसा कुछ भी करते हो जो सत्य के अनुसार नहीं, तो यह निश्चित रूप से परमेश्वर की अवहेलना करता है। यदि यह सत्य के अनुसार नहीं किया जाता है, तो यह सिद्धांतों और मनुष्य की इच्छा के अनुसार किया जाता है। यह शैतान से या मनुष्य की इच्छा से पैदा हुआ होगा। यह परमेश्वर की अवज्ञा है। जो लोग सच्चाई की खोज नहीं करते हैं, भले ही वे परमेश्वर पर विश्वास करते हों, वे परमेश्वर की आज्ञा का पालन करने में असमर्थ हैं और वे केवल उसकी अवहेलना करने में ही सक्षम हैं।

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