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अध्याय 34. प्रार्थना का महत्व और अभ्यास

आजकल तुम लोग प्रार्थना कैसे करते हो? यह धार्मिक प्रार्थनाओं पर एक सुधार कैसे है? प्रार्थना के महत्व के बारे में दरअसल तुम लोग क्या समझते हो? क्या तुम लोगों ने इन प्रश्नों की जाँच की है? प्रत्येक व्यक्ति जो प्रार्थना नहीं करता है, परमेश्वर से दूर है, प्रत्येक व्यक्ति जो प्रार्थना नहीं करता है, वह अपनी इच्छा पर चलता है; प्रार्थना की अनुपस्थिति में परमेश्वर से दूरी और परमेश्वर के साथ विश्वासघात अंतर्निहित है। प्रार्थना के साथ तुम लोगों का वास्तविक अनुभव क्या है? अभी, परमेश्वर का कार्य पहले ही समाप्ति के निकट पहुँच रहा है और परमेश्वर और मनुष्य के बीच का सम्बन्ध मनुष्य की प्रार्थना के द्वारा देखा जा सकता है। तुम कैसा व्यवहार करते हो, जब तुम्हारे अधीनस्थ लोग उन परिणामों के लिए तुम्हारी चापलूसी और प्रशंसा करते हैं, जो परिणाम तुम अपने कार्य में लाते हो? तुम कैसी प्रतिक्रिया करते हो, जब लोग तुम्हें सुझाव देते हैं? क्या तुम लोग परमेश्वर की उपस्थिति में प्रार्थना करते हो? तुम लोग तभी प्रार्थना करते हो जब तुम्हारे पास मसले या कठिनाइयाँ होती हैं, परन्तु क्या तुम लोग उस समय प्रार्थना करते हो जब तुम्हारी परिस्थितियाँ अच्छी होती हैं, या जब तुम महसूस करते हो कि तुम्हारी सभा सफल हुई? तो तुम लोगों में से अधिकतर प्रार्थना नहीं करते हैं! यदि तुमने कोई सफल सभा की, तो तुम्हें प्रार्थना करनी चाहिए; तुम्हें स्तुति की एक प्रार्थना करनी चाहिए। यदि कोई तुम्हारी प्रशंसा करता है, तो तुम अहंकारी हो जाते हो, तुम महसूस करते हो कि तुम्हारे पास सत्य है, तुम ग़लत परिस्थिति में गिर जाते हो, और तुम्हारा हृदय प्रसन्न होता है. तुम्हारे पास स्तुति की एक प्रार्थना नहीं होती है, धन्यवाद की प्रार्थना तो बिल्कुल भी नहीं होती है। तुम्हारे इस परिस्थिति में गिरने का परिणाम यह होता है कि तुम्हारी अगली सभा नीरस होगी, तुम्हारे पास कहने के लिए शब्द नहीं होंगे, और पवित्र आत्मा कार्य नहीं करेगा। लोग अपनी ही परिस्थिति को नहीं समझ सकते, वे थोड़ा सा कार्य करते हैं, और फिर अपने उस कार्य के फल का आनन्द लेते हैं। एक नकारात्मक परिस्थिति में, यह बताना कठिन है कि ठीक होने के लिए उन्हें कितने दिनों की आवश्यकता होगी। इस प्रकार की परिस्थिति सब से खतरनाक है। तुम सब लोग प्रार्थना करते हो जब तुम्हारा कोई मसला होता है या जब तुम्हें चीज़ें स्पष्ट रूप से नहीं दिखाई देती हैं; तुम लोग उस समय प्रार्थना करते हो जब तुम्हें किसी के बारे में सन्देह और असमंजस होते हैं या तुम्हारा भ्रष्ट स्वभाव उजागर हो जाता है। तुम लोग मात्र उस समय प्रार्थना करते हो जब तुम लोग किसी चीज़ की ज़रूरत में होते हो। तुम लोगों को उस समय भी अवश्य प्रार्थना करनी चाहिए, जब तुम लोग अपने कार्य में कुछ सफलता प्राप्त करते हो। जब तुम अपने कार्य में कुछ परिणाम प्राप्त करते हो, तुम उत्तेजित हो जाते हो, और एक बार जब तुम उत्तेजित हो जाते हो, तो तुम प्रार्थना नहीं करते हो; तुम सर्वदा प्रसन्न होते हो और भीतर ही भीतर सर्वदा फँसे रहते हो। तुम लोगों में से कुछ लोग इस समय अनुशासन प्राप्त करते हैं: जब तुम खरीदारी के लिए बाहर जाते हो, और तुम किसी समस्या में फँस जाते हो और तुम्हारे साथ कुछ ग़लत हो जाता है; दुकानदार तुम्हें बहुत से कठोर वचन कहता है और तुम असहज और दबाव महसूस करते हो, और तुम अभी भी नहीं जानते कि तुमने किस तरह से परमेश्वर के विरुद्ध पाप किया है। वस्तुतः, तुम्हें अनुशासित करने के लिए परमेश्वर कई बार बाहरी वातावरण का उपयोग करता है; उदाहरण के लिए, वह इस प्रकार की बातों का उपयोग करता है जैसे कि कोई अविश्वासी तुम्हें कोस रहा है, या तुम्हें बेचैन करने के लिए तुम्हारा पैसा चोरी हो गया है। अन्त में, प्रार्थना करने के लिए तुम परमेश्वर की उपस्थिति में आओगे, और जब तुम्हारे प्रार्थना करते समय कुछ शब्द बाहर आएँगे। तुम पहचान जाओगे कि तुम्हारी परिस्थिति सही नहीं थी, उदाहरण के लिए, तुम स्वयं से सन्तुष्ट और प्रसन्न थे..., फिर तुम अपनी आत्म-सन्तुष्टि से घृणा महसूस करोगे। तुम्हारी प्रार्थना में वचनों के साथ-साथ तुम्हारे अन्दर की ग़लत परिस्थिति भी बदल जाएगी। जैसे ही तुम प्रार्थना करोगे, पवित्र आत्मा तुम पर कार्य करेगा; वह तुम्हें एक प्रकार की अनुभूति प्रदान करेगा और तुम्हें उस गलत परिस्थति से बाहर ले आएगा। प्रार्थना खोजने के बारे में ही नहीं है। यह ऐसा नहीं है कि जब तुम्हें परमेश्वर की आवश्यकता हो, तो तुम प्रार्थना करो, और जब तुम्हें परमेश्वर की आवश्यकता न हो तो प्रार्थना न करो। क्या तुम लोगों ने देखा है कि यदि तुम लोग बिना प्रार्थना किए एक लम्बा समय निकाल देते हो, तो यद्यपि तुम लोगों के पास ऊर्जा होती है और तुम लोग नकारात्मक भी नहीं होते हो, या तुम लोग को लगता है कि भीतर से तुम लोगों की एक विशेष रूप से सामान्य स्थिति है, तो तुम लोगों को महसूस होगा मानो कि तुम लोग स्वयं ही कार्य कर रहे हो और तुम लोग जो कुछ करते हो उसके कोई परिणाम नहीं हैं?

मैंने पहले कहा है कि: "लोग अपने ही कामों में व्यस्त हैं और अपनी ही बातें करते हैं।" आजकल, लोग जब कार्य करते हैं, तो वे प्रार्थना नहीं करते हैं; उनके हृदयों में परमेश्वर बिल्कुल भी नहीं है, और वे सोचते हैं कि: "मैं इसे बस कार्य-प्रबन्धन के अनुसार ही करूँगा और किसी भी प्रकार से मैं कुछ भी ग़लत नहीं करूँगा या किसी भी चीज़ को अस्तव्यस्त नहीं करूँगा..." तुमने प्रार्थना नहीं की और इसके अतिरिक्त तुमने धन्यवाद भी नहीं दिया। यह परिस्थिति खौफ़नाक है! प्रायः, तुम जानते हो कि यह परिस्थिति सही नहीं है, परन्तु यदि तुम्हारे पास सही तरीका नहीं है, तो तुम बदल नहीं सकते हो। भले ही तुम सत्य को समझ भी जाओ, तब भी तुम इसका अभ्यास नहीं कर पाओगे; भले ही तुम अपने भीतर की अनुपयुक्त परिस्थिति (घमण्डी, भ्रष्ट और विद्रोही होने) को जान भी जाओ, तब भी तुम इसे समायोजित करने या दबाने में समर्थ नहीं होगे। लोग अपने कार्य करने में व्यस्त हैं और वे पवित्र आत्मा के कार्य या संचालन पर ध्यान नहीं देते हैं। वे मात्र अपने ही मसलों की परवाह करते हैं, और जिसके परिणामस्वरूप, पवित्र आत्मा उन्हें त्याग देता है। एक बार जब पवित्र आत्मा उन्हें त्याग देता है, तो वे अन्धकार और शुष्क महसूस करेंगे; वे रत्ती भर भी पोषण या आनन्द प्राप्त नहीं करेंगे। अनेक लोग आधे साल में मात्र एक बार प्रार्थना करते हैं। वे अपने मसलों का ध्यान रखते और अपना कार्य करते हैं, परन्तु वे नीरस महसूस करते हैं, कई बार वे विचार करते हैं कि: "मैं क्या कर रहा हूँ, और यह कब समाप्त होगा?" यहाँ तक कि इस प्रकार के विचार भी उत्पन्न होंगे। एक लम्बे समय तक प्रार्थना न करना बहुत ख़तरनाक होता है! प्रार्थना बहुत ही ज़रूरी है। बिना प्रार्थना के कलीसिया का जीवन सभाओं को नीरस और शुष्क बना देता है। इसलिए, जब तुम लोग एकत्रित होते हो, तो तुम लोगों को अवश्य प्रार्थना और स्तुति करनी चाहिए, और पवित्र आत्मा विशेष रूप से अच्छी तरह से कार्य करेगा। जो ताक़त पवित्र आत्मा लोगों को प्रदान करता है, वह अनन्त है; लोग इसे बिना ख़त्म किए हर समय उपयोग कर सकते हैं—यह सदैव उपलब्ध है। अपने ऊपर भरोसा करते हुए, हो सकता है लोगों के पास बकबक करने का गुण हो, परन्तु यदि इसमें पवित्र आत्मा कार्य नहीं करता है, तो वे क्या निष्पादित करने में समर्थ हैं? प्रायः, लोग एक या दो वाक्यांशों के साथ तीन से पाँच बार प्रार्थना करते हैं, "हे परमेश्वर, मैं तेरा धन्यवाद करता हूँ, मैं तेरी स्तुति करता हूँ," और फिर उनके पास कहने के लिए कुछ नहीं होता है, वे अपने मुँह नहीं खोल सकते हैं। यह किस स्तर का विश्वास है; यह बहुत ही खतरनाक है! है न? लोग परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, परन्तु उनके पास उसकी स्तुति करने या धन्यवाद देने के लिए शब्द नहीं होते हैं, और परमेश्वर को महिमा देने के लिए उनके पास शब्द नहीं होते हैं," और वे यहाँ तक कि "परमेश्वर से निवेदन करें" शब्दों को कहने का भी साहस नहीं करते हैं, और उन्हें कहने में वे बहुत लज्जित होते हैं। वे बहुत ही अधम हैं! इस तथ्य के बावज़ूद कि तुम कहते हो कि तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो और परमेश्वर को अपने हृदय में स्वीकार करते हो, यदि तुम परमेश्वर की उपस्थिति में नहीं आते हो, और तुम्हारा हृदय परमेश्वर से दूर है, तो पवित्र आत्मा कार्य नहीं करेगा। विशेष रूप से तुम आगुआ लोग, हर सुबह जब तुम जागते हो, तुम्हें प्रार्थना अवश्य करनी चाहिए। तुम्हारे प्रार्थना करने के पश्चात् तुम्हारा दिन विशेष रूप से अच्छा और समृद्ध होगा और तुम पवित्र आत्मा को हर समय तुम्हें सुरक्षित करते हुए अपने पक्ष में महसूस करोगे। यदि तुम एक दिन के लिए प्रार्थना नहीं करते हो, या यदि तुम बिना प्रार्थना किए तीन से पाँच दिन तक निकाल देते हो, तो तुम विशेष रूप से अकेला और उदास महसूस करोगे। तुम्हें अपने प्रियजनों की याद आएगी और उनके लिए तुम्हारी तड़प अत्यधिक प्रगाढ़ हो जाएगी।

अब मैंने पाया है कि सभी लोगों को समस्या होती है: जब उनका कोई मसला होता है, वे परमेश्वर की उपस्थिति में आते हैं, परन्तु प्रार्थना, प्रार्थना है और मसले, मसले हैं, और लोग सोचते हैं कि जब वे प्रार्थना करते हैं उन्हें मसलों के बारे में बात नहीं करनी चाहिए। तुम लोग कभी-कभार ही वास्तविक प्रार्थना करते हो, और तुम लोगों में से कुछ तो यह भी नहीं जानते हैं कि प्रार्थना कैसे करें; वस्तुतः, प्रार्थना उस बारे में बोलना है जो तुम्हारे हृदय में है, बिलकुल, एक साधारण बातचीत की तरह। हालाँकि कुछ लोग जब प्रार्थना करते हैं, तो वे ग़लत दृष्टिकोण अपना लेते हैं, और इस बात की परवाह किए बिना कि यह परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप है या नहीं, वे परमेश्वर से वह प्रदान करने की माँग करते हैं जिसकी वे प्रार्थना करते हैं। परिणामस्वरूप, जितनी अधिक वे प्रार्थना करते हैं, यह उतनी ही नीरस हो जाती है। प्रार्थना करते समयन, तुम्हारा हृदय जो कुछ भी माँगता, इच्छा करता है और विनती करता है, या जब तुम उन कुछ मसलों को सँभालना चाहते हो, जो तुम्हारी समझ में पूरी तरह से नहीं आते हैं तब तुम परमेश्वर से बुद्धि, शक्ति, या प्रबुद्धता माँगते हो, तो जिस तरह से तुम बोलते हो, तुम्हें उसमें तर्कसंगत अवश्य होना चाहिए। यदि तुम अतर्कसंगत हो, और तुम घुटनों के बल बैठते हो और कहते हो: "परमेश्वर मुझे सामर्थ्य प्रदान कर, और मुझे मेरा स्वभाव देखने दे, मैं तुझे ऐसा करने के लिए निवेदन करता हूँ। या मैं मुझे यह या वह देने के लिए तुझसे निवेदन करता हूँ, मैं मुझे ऐसा या वैसा बना देने के लिए तुझसे निवेदन करता हूँ, यह "निवेदन करता हूँ" शब्द में जबरदस्ती का एक तत्व होता है, और यह परमेश्वर से कुछ करवाने के लिए उस पर दबाव डालने के समान है। इसके अलावा, तुम अपने मसलों को पूर्वनिर्धारित कर लेते हो। भले ही तुम इस तरह से प्रार्थना करते हो, किन्तु पवित्र आत्मा इसे ऐसे देखता है: जब तुमने इसे स्वयं ही पहले से निर्धारित कर लिया है, और तुम इसे उसी तरह से करना चाहते हो, तो इस प्रकार की प्रार्थना का परिणाम क्या होगा? तुम्हें अपनी प्रार्थनाओं में खोजना और समर्पण करना चाहिए; उदाहरण के लिए, यदि तुम पर कोई समस्या आयी, जो तुम नहीं जानते कि इसे कैसे सँभालें, तब तुम कहते हो: "हे परमेश्वर! मेरे सामने यह समस्या आ गई है और मैं नहीं जानता इसे कैसे सँभालूँ। इस मसले में मैं तुझे सन्तुष्ट करने का इच्छुक हूँ, मैं तुझे खोजने का इच्छुक हूँ, मैं तेरी इच्छा पूर्ण हो जाने की अभिलाषा करता हूँ, मैं तेरे इरादों, न कि मेरे अपने इरादों, के अनुसार करने की अभिलाषा रखता हूँ। तू जानता है कि मनुष्य के इरादे तेरी इच्छाओं के उल्लंघन में होते हैं; वे तेरा विरोध करते और सत्य के अनुरूप नहीं होते हैं। मैं मात्र तेरे इरादों के अनुसार करने की अभिलाषा करता हूँ। मैं तुझे इस मसले में मुझे प्रबुद्ध करने और मेरा मार्गदर्शन करने की प्रार्थना करता हूँ, ताकि मैं तुझे क्रोधित न करूँ।..." प्रार्थना में इस स्वर से बोलना उपयुक्त है। यदि तुम मात्र यह कहते हो: "हे परमेश्वर, मैं तुझे मेरी सहायता और मेरा मार्गदर्शन करने के लिए कहता हूँ; मेरे लिए अनुकूल वातावरण और अनुकूल लोग तैयार कर, ताकि मैं अपने कार्य में अच्छी तरह से कर सकूँ," तो जब इस प्रकार कि प्रार्थना समाप्त हो जाती है, तुम तब भी नहीं जानते हो कि परमेश्वर की इच्छा क्या है, क्योंकि तुम परमेश्वर से तुम्हारे इरादों के अनुसार कार्य करवाने का प्रयास कर रहे हो।

अब तुम लोगों को यह समझने की आवश्यकता है कि जो बातें तुम अपनी प्रार्थनाओं में कहते हो वे तर्कसंगत हैं या नहीं। इस बात की परवाह किए बिना कि चाहे तुम मूर्ख हो या तुम जानबूझकर इस तरह से प्रार्थना कर रहे हो, यदि तुम्हारी प्रार्थनाएँ तर्कसंगत नहीं हैं, तो पवित्र आत्मा तुम में कार्य नहीं करेगा। इसलिए, जब तुम प्रार्थना करते हो, तो जो शब्द तुम बोलते हो, वे तर्कसंगत अवश्य होने चाहिए, और तुम्हारा स्वर अवश्य उपयुक्त होना चाहिए: "हे परमेश्वर! तू मेरी कमज़ोरी को जानता है और तू मेरे विद्रोहीपन को जानता है। मैं मुझे मात्र सामर्थ्य प्रदान करने के लिए तुझसे कहता हूँ, जिससे मैं इस वातावरण की परीक्षाओं का सामना कर सकूँ। हालाँकि, यह तेरी इच्छा के अनुसार ही हो। मैं मात्र यही माँग रहा हूँ और मैं नहीं जानता हूँ कि तेरी इच्छा क्या है, परन्तु मैं तेरी इच्छा पूर्ण होने की अभिलाषा करता हूँ; इस बात की परवाह किए बिना कि चाहे तू मुझे सेवा में उपयोग करे या तू मुझसे एक विषमता के समान सेवा करवाए, मैं दोनों में से किसी के लिए भी तैयार हूँ। हालाँकि, इस मसले में तुझे सन्तुष्ट करने के लिए मैं तुझसे सामर्थ्य और बुद्धि माँगता हूँ। मैं मात्र तेरी व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करने का इच्छूक हूँ।..." तुम्हारे इस तरह से प्रार्थना करने के पश्चात्, तुम विशेष तरह से स्थिर महसूस करोगे। यदि तुम माँगने और माँगने में ही लगे रहते हो, तो जब तुम्हारा माँगना समाप्त हो जाएगा, तो यह खोखले शब्दों के गुच्छे से अधिक कुछ नहीं होगा, क्योंकि तुमने अपने इरादों को पहले से ही पूर्वनिर्धारित कर लिया था। जब तुम प्रार्थना करने के लिए घुटने के बल बैठते हो, तो तुम्हें ऐसा कुछ कहना चाहिए: "हे परमेश्वर! तू मेरी कमज़ोरियों को जानता है और तू मेरी परिस्थितियों को जानता है। मैं इस मसले में मुझे प्रबुद्ध करने, और मुझे तेरी इच्छा जानने देने के लिए तुझसे कहता हूँ। मैं मात्र तेरी समस्त व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करने की अभिलाषा करता हूँ और मेरा हृदय तेरे प्रति समर्पण करने की अभिलाषा करता है... ।" यदि तुम इस तरह से प्रार्थना करते हो, तब पवित्र आत्मा तुम्हें प्रेरित करेगा और यदि तुम्हारी प्रार्थना की दिशा सही नहीं है, तो यह नीरस और शुष्क हो जाएगी, और पवित्र आत्मा तुम्हें प्रेरित नहीं करेगा; तुम मात्र बड़बड़ा रहे हो, चुचाप प्रार्थना कर रहे हो, या अपनी आँखें बन्द करके इच्छानुसार कुछ शब्द कह रहे हो, जो मात्र औपचारिकता है। यदि तुम औपचारिक हो, तो क्या पवित्र आत्मा कार्य करेगा? जो लोग परमेश्वर की उपस्थिति में आते हैं उन्हें अवश्य उचित रीति से व्यवहार करना चाहिए और धर्मनिष्ठता दिखानी चाहिए। व्यवस्था के युग में याजकों के बलिदानों को देखो, वे सभी घुटनों के बल झुका करते थे। प्रार्थना उस प्रकार की सरल बात नहीं है। लोग परमेश्वर के समक्ष आते हैं, फिर भी वे अवज्ञाकारी और अमर्यादित होते हैं, और वे अपने पलंग पर लेट कर अपनी आँखें बन्द करना चाहते हैं। यह अस्वीकार्य है! मैं ये बातें लोगों को कुछ विशेष नियमों का पालन करना आवश्यक बनाने के लिए नहीं कहता हूँ; कम से कम, उनके हृदय तो परमेश्वर की ओर मुड़ने चाहिए और उनमें परमेश्वर की उपस्थिति में धर्मनिष्ठता का एक दृष्टिकोण अवश्य होना चाहिए।

तुम लोगों की प्रार्थनाओं में प्रायः तर्क का अभाव होता है; उन सब का इस प्रकार का स्वर होता है: "हे परमेश्वर! चूँकि तूने मुझे एक अगुवा बनाया है, अतः जो कुछ मैं करता हूँ, उसे तुझे उपयुक्त बनाना होगा, ताकि तेरा कार्य बाधित न हो और परमेश्वर के परिवार को हानि न उठानी पड़े। तू मुझ से कार्यों को इस तरह अवश्य करवा।..." क्या यह आवश्यक है? यह प्रार्थना तर्कसंगत नहीं है! जब तुम परमेश्वर की उपस्थिति में आते हो और इस तरह अनुचित ढंग से प्रार्थना करते हो, तो क्या परमेश्वर तुम लोग में कार्य कर सकता है? यदि तुम सब मसीह की उपस्थति में आए और मुझसे बिना किसी कारण के बात की, तो क्या मैं सुनूँगा? तुम्हें बाहर फेंक दिया जाएगा! क्या पवित्रात्मा की उपस्थिति में होना और मसीह की उपस्थिति होना समान नहीं है? जब तुम प्रार्थना करने के लिए परमेश्वर की उपस्थिति में आते हो, तो तुम्हें इस बारे में अवश्य सोचना चाहिए कि तर्कसंगत तरह से किस प्रकार बोला जाए और इस बारे में विचार करना चाहिए है कि अपनी भीतरी स्थिति को धर्मनिष्ठता में बदलने में समर्थ होने के लिए क्या कहा जाए। स्वयं को दीन करो, और तब एक प्रार्थना करो और तुम्हें अभिषिक्त किया जाएगा। प्रायः लोग जब प्रार्थना करते हैं, तो वे घुटने के बल बैठेंगे और अपनी आँखों को बन्द करेंगे और वे कुछ नहीं कहेंगे; वे मात्र यह कहेंगे, "हे परमेश्वर, हे परमेश्वर!" वे मात्र ये दो शब्द कहते हैं, वे कुछ और कहे बिना कुछ समय तक यही कहते रहेंगे। ऐसा क्यों है? तुम्हारी स्थिति अच्छी नहीं है! क्या तुम लोगों के ऐसे समय रहे हैं? जहाँ तक तुम लोगों की वर्तमान स्थिति का संबंध है, तुम लोग जानते हो कि तुम लोग क्या करने में समर्थ हो और तुम लोग किस स्तर तक इसे कर सकते हो, और तुम लोग जानते हो तुम लोग कौन हो। हालाँकि, प्रायः तुम्हारी स्थिति असामान्य होती है। कभी-कभी, तुम्हारी स्थिति समायोजित की जाती है, परन्तु तुम नहीं जानते यह कैसे समायोजित की गई थी, और कई बार तुम लोग यह सोचते हुए बिना शब्दों के प्रार्थना करते हो कि ऐसा इसलिए है क्योंकि तुम लोग शिक्षित नहीं हो। क्या प्रार्थना करने के लिए तुम्हें शिक्षित होने की आवश्यकता है? प्रार्थना कोई निबन्ध लिखना नहीं है, यह एक सामान्य व्यक्ति के तर्क के अनुसार साधारण रूप से बात करना है। यीशु की प्रार्थना को देखो (यीशु की प्रार्थना का उल्लेख करना लोगों से उसके समान कोण और स्थिति में रखवाने के लिए नहीं है), उसने गतसमनी की वाटिका में प्रार्थना की: "यदि हो सके तो..." अर्थात्, "यदि हो सके तो।" यह परामर्श के द्वारा होता है न कि ऐसा कहने के द्वारा कि "मैं तुझसे निवेदन करता हूँ।" वह अपनी प्रार्थना में एक समर्पित हृदय रख रहा था, और अपनी विनीत अवस्था में, उसने प्रार्थना की: "यदि हो सके तो यह कटोरा मुझ से टल जाए: तौभी जैसा मैं चाहता हूँ वैसा नहीं, परन्तु जैसा तू चाहता है वैसा ही हो।" उसने तब भी दूसरी बार इसी प्रकार प्रार्थना की और तीसरी बार उसने प्रार्थना की: "तेरी इच्छा पूरी हो।" उसने यह कहकर परमपिता परमेश्वर की इच्छा को समझ लिया: "तेरी इच्छा पूरी हो।" वह रत्ती भर भी स्वयं को चुने बिना पूरी तरह से समर्पण करने में समर्थ था। उसने कहा, "यदि हो सके तो यह कटोरा मुझ से टल जाए।" इसका क्या अर्थ है? यह मरते दम तक और अत्यधिक पीड़ा से क्रूस पर खून बहाने के विचार की वजह से है। इसमें मृत्यु शामिल थी और यह इस आधार पर कहा गया था कि वह अभी भी परमपिता परमेश्वर की इच्छा को पूरी तरह से नहीं समझा था। वह अत्यधिक विनम्र था कि क्रूस पर चढ़ाए जाने की पीड़ा के बावजूद भी वह इस तरह से प्रार्थना करने में समर्थ था। उसकी प्रार्थना सामान्य थी, उसने कोई सौदेबाजी करने के लिए प्रार्थना नहीं की और न ही इसे हटा देने के लिए कहने के लिए प्रार्थना की, बल्कि यह ऐसी परिस्थिति में परमेश्वर के इरादों को जानने के लिए थी जिसे वह नहीं समझता था। पहली बार जब उसने प्रार्थना की तो उसकी समझ में नहीं आया था और उसने कहा: "यदि हो सके तो...परन्तु जैसा तू चाहता है।" उसने विनम्रता की स्थिति में परमेश्वर से प्रार्थना की। दूसरी बार, उसने उसी तरह से प्रार्थना की। कुल मिलाकर, उसने तीन बार प्रार्थना की (निस्सन्देह ये तीन प्रार्थनाएँ मात्र तीन दिनों में नहीं की गई), और अपनी अन्तिम प्रार्थना में, वह परमेश्वर की मंशाओं को पूरी तरह से समझ गया। उसके पश्चात्, उसने कुछ नहीं माँगा। अपनी पहली दो प्रार्थनाओं में, उसने खोज की और खोजने में, वह विनम्रता की अवस्था में था। हालाँकि, लोग इस प्रकार से प्रार्थना नहीं करते हैं। वे हमेशा कहते हैं, "हे परमेश्वर मैं तुझे यह या वह करने के लिए निवेदन करता हूँ, और मैं तुझसे इस या उस में मेरी अगुआई करने के लिए निवेदन करता हूँ, और मेरे लिए परिस्थितियाँ तैयार करने के लिए तुझसे निवेदन करता हूँ।..." सम्भवतः, वह तुम्हारे लिए सुविधाजनक परिस्थितियाँ तैयार नहीं करेगा और तुम्हें कठिनाइयाँ झेलने देगा। यदि लोगों ने सदैव यह कहा, "हे परमेश्वर, मैं तुझे मेरे लिए तैयारियाँ करने और मुझे सामर्थ्य देने के लिए निवेदन करता हूँ," तो यह प्रार्थना बहुत अतर्कसंगत है! जब तुम प्रार्थना करते हो, तो तुम्हारे पास तर्क अवश्य होना चाहिए, और तुम्हें अवश्य विनम्रता के अधीन प्रार्थना करनी चाहिए। निर्णय मत करो। तुम्हारे प्रार्थना करने से पहले, तुम निर्णय कर रहे हो: मुझे अवश्य परमेश्वर से माँगना और परमेश्वर को बताना चाहिए कि क्या करना है। इस प्रकार की प्रार्थना बहुत अतर्कसंगत है। प्रायः, पवित्रात्मा लोगों की प्रार्थनाओं को बिल्कुल नहीं सुनता है, इसलिए उनकी प्रार्थनाएँ नीरस हैं।

यद्यपि लोग एक अमूर्त क्षेत्र में प्रार्थना करने के लिए घुटने टेकते हैं, वे बोलते और प्रार्थना करते हैं, तुम्हें अवश्य समझना चाहिए कि लोगों की प्रार्थनाएँ भी पवित्र आत्मा के कार्य करने का एक साधन हैं। जब लोग सही अवस्था में प्रार्थना करते और खोजते हैं, तो पवित्र आत्मा भी उसके साथ-साथ कार्य करेगा। ये दो पहलू हैं जिनके द्वारा परमेश्वर और लोग एक दूसरे के साथ सफलतापूर्वक समन्वय कर सकते हैं, या दूसरे शब्दों में, यह परमेश्वर है जो लोगों को मसलों को सँभालने में सहायता कर रहा है। यह परमेश्वर की उपस्थिति में मनुष्य का एक प्रकार का सहयोग है; यह परमेश्वर का लोगों को पूर्ण बनाने का एक तरीका भी है। यह इससे भी अधिक लोगों का जीवन में सामान्य प्रवेश का एक मार्ग है—यह एक रस्म नहीं है। प्रार्थना किसी की सामर्थ को भड़काने या कुछ नारे लगाने के बारे में नहीं है; यह ऐसा नहीं है। यदि यह ऐसा होता, तो मात्र लापरवाही से कुछ नारे लगाना ही पर्याप्त होता, किसी भी चीज़ को माँगने की आवश्यकता नहीं होती, आराधना की आवश्यकता नहीं होती और धर्मनिष्ठता की आवश्यकता नहीं होती। प्रार्थना का महत्व बहुत गहरा है! यदि तुम प्रायः प्रार्थना करते हो और यदि तुम्हें पता है कि प्रार्थना कैसे करनी है, निरन्तर विनम्रता और तर्कसंगत तरीके से प्रार्थना कर रहे हो, तो तुम भीतर से प्रायः विशेष रूप से सामान्य अनुभव करोगे। यदि तुम प्रायः कुछ एक नारों के साथ प्रार्थना करते हो और ज़िम्मेदारी नहीं रखते हो, या विचार नहीं करते हो कि तुम अपनी प्रार्थना में तर्कसंगत या अतर्कसंगत तरीके से किस प्रकार बोल रहे हो, और किस प्रकार से बोलना वास्तविक प्रार्थना नहीं है, और यदि तुम इन मामलों के बारे में कभी भी गम्भीर नहीं रहे हो, तो तुम्हारी प्रार्थनाएँ सफल नहीं होंगी और तुम्हारे भीतर की स्थिति सदेव असामान्य रहेगी; तुम इस बातों के सबकों की गहराई में कभी भी प्रवेश नहीं करोगे कि सामान्य तर्क क्या होते हैं, सच्चा आत्मसमर्पण क्या होता है, सच्ची आराधना क्या होती है, और कहाँ खड़े रहना है। ये सभी गूढ़ मसले हैं। क्योंकि अधिक्तर लोगों का मेरे साथ बहुत कम सम्पर्क होता है, वे मात्र पवित्र आत्मा की उपस्थिति में आ सकते और प्रार्थना कर सकते हैं। जब तुम प्रार्थना करते हो, इसमें इस बात का समावेश होता है कि क्या तुम्हारे वचन तर्कसंगत हैं, क्या तुम्हारे वचन वास्तविक आराधना के बारे में हैं, क्या जो चीज़ें तुम माँगते हो उनके लिए परमेश्वर तुम्हारी प्रशंसा करता है, क्या तुम्हारे वचन लेन-देन के बारे में हैं, क्या तुम्हारे वचनों में मानवीय अशुद्धियाँ हैं, क्या तुम्हारे वचन, कार्य और दृढ़-निश्चय सत्य के अनुसार हैं; क्या तुममें परमेश्वर के प्रति श्रृद्धा, आदर और समर्पण है, और क्या तुम सब वास्तव में परमेश्वर से परमेश्वर की तरह व्यवहार करते हो। जब तुम सब मसीह की उपस्थिति में नहीं होते हो तो जिन वचनों के साथ तुम प्रार्थना करते हो उनमें तुम्हें गम्भीर और ईमानदार अवश्य होना चाहिए है। केवल इसी तरह से तुम मसीह की उपस्थिति में सामान्य हो सकते हो। यदि तुम पवित्रात्मा की उपस्थिति में गम्भीर नहीं हो, तो जब तुम सब मनुष्य (मसीह) की उपस्थिति में आओगे, तो तुम सदैव द्वन्द्व में होगे, या तुम्हारे वचन तर्क के साथ नहीं होंगे, या तुम अपने वचनों में ईमानदार नहीं होगे, या तुम सदैव अपने वचनों और कार्यों के साथ बाधा पहुँचाओगे। मसले के समाप्त होने के पश्चात, तुम सदैव स्वयं को धिक्कारते रहोगे। तुम सदैव स्वयं को क्यों धिक्कारते रहते हो? क्योंकि परमेश्वर की तुम्हारी आराधना में और परमेश्वर से तुम सब कैसा व्यवहार करते हो उसमें समान्यतः तुम्हें सत्य की कोई समझ नहीं है। इसलिए, जब तुम सब पर मसले आते हैं, तो तुम उलझन में पड़ जाते हो और नहीं जानते कि अभ्यास कैसे करना है, और तुम सदैव ग़लत चीज़ें ही करोगे। वे लोग जो परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, वे परमेश्वर की उपस्थिति में कैसे आते हैं? प्रार्थना के द्वारा। जब तुम प्रार्थना करते हो, तो जाँच करो कि तर्क के साथ कैसे बोलना है, लोगों के लिए सही स्थान में कैसे बोलना है, विनम्रता की अवस्था में कैसे बोलना है, और किस प्रकार से बोलना तुम्हारे हृदय को असहज करता है (उन प्रार्थनाओं को छोड़कर, जो ईमानदारी से नहीं बोली जाती हैं)। यह और उत्तम होगा यदि तुमने कुछ समय के लिए अभ्यास करो और तब परमेश्वर की उपस्थिति में आओ। साधारणतः, पवित्र आत्मा की उपस्थिति में तुम्हारी प्रार्थनाएँ तर्कसंगत नहीं होती हैं, और तुम इस पर कभी भी ध्यान केन्द्रित नहीं करते हो। तुम मानते हो कि परमेश्वर तुम्हें नहीं देखता है, इसलिए जो कुछ तुम चाहो वह कह सकते हो, और यदि तुम कुछ ग़लत कहते हो, तो यह कोई बड़ी बात नहीं है। सारा दिन तुम लापरवाह और नासमझ रहते हो, और परिणामस्वरूप, जब तुम मसीह की उपस्थिति में आते हो, तो तुम कुछ ग़लत कहने और कुछ ग़लत करने से डरते हो; भले ही तुम कुछ गलत करने से डरते हो, किन्तु तुम गलतियाँ करने के लिए बाध्य हो; भले ही तुम कृतज्ञ होने से भयभीत हो, किन्तु तुम्हारा कृतज्ञ होना निश्चित है, और तुम अपनी कृतज्ञता की क्षतिपूर्ति नहीं कर पाओगे। क्योंकि तुम मसीह से प्रायः सम्पर्क नहीं कर सकते या मसीह को तुमसे आमने-सामने बात करते हुए नहीं सुन सकते हो। तुम प्रार्थना करने, खोजने और समर्पित होने के लिए प्रायः केवल पवित्र आत्मा की उपस्थिति में आ सकते हो, क्योंकि भले ही मैंने तुम से आमने-सामने बात की होती, फिर भी इस मार्ग पर चलने के लिए तुम्हें स्वयं पर निर्भर होना होता। अब से, जब तुम लोग प्रार्थना करते हो, तो जो तुम लोग कहते हो, उस पर तुम लोगों को और ध्यान देना होगा। जब तुम प्रार्थना, चिन्तन, और महसूस करते हो, और पवित्र आत्मा तुम्हें प्रबुद्ध करता है, तो तुम लोग इस पहलू में प्रगति करोगे। पवित्र आत्मा का प्रबुद्ध करने वाला अहसास विशेष रूप से गूढ़ होता है। यदि तुम में ये गूढ़ अहसास और गूढ़ पहचान है, यदि बाद में तुम कुछ कार्य करते हो, या कुछ बातों का ध्यान रखते हो, जब तुम्हारा सम्पर्क मसीह के साथ होता है, तब तुम यह पहचान पाओगे, कि किन वचनों में तर्क है, किन वचनों में तर्क नहीं हैं, और किन चीज़ों में तर्क है और किन चीज़ों में तर्क नहीं है। यह प्रार्थना के उद्देश्य को पूरा करता है।

तुम प्रार्थना को जिस तरह से लेते हो उसमें तुम्हें गम्भीर होने की आवश्यकता है। यदि तुम इस विश्वास के साथ पलंग पर लेट कर प्रार्थना करते हो, कि परमेश्वर तुम्हें सुन सकता है, तो तुम धर्मनिष्ठा नहीं दिखा रहे हो! बाइबल में अनेक लोगों ने प्रार्थना की और किसी बात पर विचार-विमर्श करने के पश्चात एकदम से निष्कर्ष पर नहीं पहुँच गए। सब कुछ अंततः पवित्र आत्मा के द्वारा प्रार्थना के माध्यम से निर्धारित किया गया था। यरीहो पर प्रार्थना के माध्यम से आक्रमण किया गया था; नीनवे के लोगों ने पश्चाताप किया और प्रार्थना के माध्यम से परमेश्वर से उन्हें भी क्षमा करने के लिए निवेदन किया। प्रार्थना कोई संस्कार नहीं है, इसका और बहुत अधिक महत्व है। लोगों की प्रार्थनाओं से हम क्या देख सकते हैं? लोग सीधे परमेश्वर की सेवा कर रहे हैं। यदि तुम इसे एक संस्कार के रूप में देखते हो, तब तुम निश्चित रूप से अच्छी तरह से परमेश्वर की सेवा नहीं करोगे। यह कहा जा सकता है कि यदि तुम्हारी प्रार्थनाएँ ईमानदार या निष्कपट नहीं हैं, तो परमेश्वर तुम्हारी गिनती नहीं करेगा, वह तुम्हें अनदेखा कर देगा। यदि तुम अनदेखे कर दिए जाते हो, तो क्या तुम्हारे पास तुममें कार्य करता हुआ पवित्र आत्मा होगा? इसलिए, अपना कार्य करने में तुम ऊर्जा को खो देते हो। अब से, प्रार्थना के बिना तुम कार्य नहीं कर सकते हो। यह प्रार्थना ही है जो कार्य लाती है, और प्रार्थना ही है जो सेवा लाती है। तुम एक अगुआ और ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर की सेवा करता है, परन्तु तुमने स्वयं को कभी भी प्रार्थना के प्रति समर्पित नहीं किया और तुम अपनी प्रार्थनाओं में कभी गम्भीर नहीं रहे। इस तरीके से सेवा करते हुए तुम असफल हो जाओगे। प्रार्थना न करने के लिए मनुष्य के पास क्या योग्यताएँ हैं? क्योंकि परमेश्वर देह बना था। यह कोई कारण नहीं है। कभी-कभी मैं भी प्रार्थना करता हूँ। जब यीशु देह में था, और जब उस पर संकटपूर्ण मसले आते थे, तो वह प्रार्थना करता था। उसने एक पर्वत पर, एक नाव में, और एक उद्यान में प्रार्थना की, और प्रार्थना करने के लिए उसने अपने शिष्यों की अगुवाई की। यदि तुम प्रायः परमेश्वर की उपस्थिति में आते हो और प्रायः प्रार्थना करते हो, तो यह प्रमाणित करता है कि तुम परमेश्वर को गम्भीरता से लेते हो। यदि तुम प्रायः अपने-आप कार्य करते हो और प्रायः प्रार्थना नहीं करते हो, तुम यह अक्सर उसकी पीठ पीछे ऐसा-वैसा करते हो, तो तुम परमेश्वर की सेवा नहीं कर रहे हो, बल्कि तुम बस अपना कारोबार कर रहे हो। क्या तुम अपना स्वयं का कारोबार करने में निंदित नहीं होते हो? बाहर से देखने पर, ऐसा प्रतीत नहीं होता है कि तुमने कुछ परेशान करने वाला कार्य किया है, और ऐसा प्रतीत होता है कि तुमने परमेश्वर की ईशनिन्दा नहीं की है, परन्तु तुम अपना स्वयं का ही कार्य कर रहे हो। क्या तुम बाधा नहीं डाल रहे हो? भले ही ऐसा लगता है कि तुम बाहर से बाधा नहीं डाल रहे हो, किन्तु तुम स्वभाव में परमेश्वर का विरोध कर रहे हो।

सभी लोगों ने इसका अनुभव किया है; उन चीज़ों को सहना विशेष रूप से कठिन होता है जो उन पर इस तरीके से आती हैं जैसा वे नहीं चाहते हैं; जब वे बेचैन होते हैं, वे किसी से बात करेंगे और कुछ समय पश्चात वे बेचैन महसूस नहीं करेंगे। बेचैनी से बच जाना उनकी परिस्थिति का हल नहीं करता है। कभी-कभी जब कार्य में उन पर कठिनाइयाँ आती हैं, तो वे दबाव महसूस करते हैं और जब उन पर काट-छाँट और निपटारा पड़ता है, वे विशेष रूप से दबाव महसूस करते हैं।... इन बेचैनियों के दौरान प्रार्थना करने के लिए वे कितनी बार परमेश्वर की उपस्थिति में आए? हर बार उन्होंने स्वयं ही समायोजित किया है और नासमझ तरीके से पलट गए हैं। इसलिए, लोग परमेश्वर पर विश्वास तो करते हैं, परन्तु परमेश्वर उनके हृदयों में नहीं है। वे बिना मूल्य के आँख मूँद कर कार्य कर रहे हैं, एक भिखारी की तरह जो कूड़ेदान में से थोड़ा सा यह और थोड़ा सा वह उठा लेता है; और अपना थैला भर लेता है; किन्तु यह मूल्यहीन होता है और पूरी तरह से आँखे मूँद कर किया जाता है। लोग बार-बार सही मार्ग से भटक जाते हैं, वे समय-समय पर इससे दूर चले जाते हैं। इससे हम लोगों की प्रकृति को देख सकते हैं। लोगों की प्रकृति विश्वासघात करना है। जब वे कुछ समय तक कार्य करते हैं तो उसके बाद उनके पास कोई परमेश्वर नहीं होता है। यहाँ तक कि वे सोचते हैं कि: "मैं परमेश्वर पर विश्वास करता हूँ; मेरे पास परमेश्वर कैसे नहीं है? क्या मैं परमेश्वर के लिए कार्य नहीं कर रहा हूँ?" तुम्हारे हृदय में परमेश्वर नहीं है, तुम स्वयं को परमेश्वर से दूर रखते हो और जो कुछ भी तुम करते हो उसमें तुम परमेश्वर के साथ विश्वासघात करते हो। प्रार्थना एक अत्यन्त गहन बात है; यदि तुम बिना प्रार्थना किए भी सेवा के लिए जाते हो, तो तुम व्यर्थ में सेवा कर रहे हो। तुम्हारी स्थिति और अधिक असामान्य बन जाएगी और तुम्हें कम परिणाम प्राप्त होंगे। प्रार्थना इस बारे में नहीं है कि प्रार्थना करते समय तुम्हारे वचन कितने अच्छे हैं, तुम्हें केवल अपने हृदय के वचनों को बोलने की और अपनी कठिनाइयों के अनुसार ईमानदारी से बोलने की आवश्यकता है। सृष्टि का एक हिस्सा होने के दृष्टिकोण से और आत्मसमर्पण के दृष्टिकोण से बोलो: "हे परमेश्वर, तू जानता है कि मेरा हृदय बहुत निष्ठुर है। हे परमेश्वर, इस मामले में मेरी अगुवाई कर; तू जानता है मुझमें कमज़ोरियाँ हैं, मेरे भीतर बहुत कमी है और मैं तेरे उपयोग किए के लिए अनुपयुक्त हूँ। मैं विद्रोही हूँ और जब मैं कार्य करता हूँ तो मैं तेरे कार्य में बाधा डालता हूँ; मेरे कार्य-कलाप तेरी इच्छा के अनुरूप नहीं हैं। मैं तेरा अपना कार्य करने के लिए तुझसे प्रार्थना करता हूँ और हम मात्र सहयोग करेंगे।..." यदि तुम इन वचनों को नहीं कह सकते हो, तो तुम समाप्त हो गए हो। कुछ लोग सोचते हैं कि: "जब मैं प्रार्थना करता हूँ, तो मुझे अवश्य जानना चाहिए कि क्या प्रार्थना तर्कसंगत है या नहीं; प्रार्थना करना असम्भव है।" यह एक समस्या नहीं है। कुछ समय के लिए अभ्यास करो और यह तुम्हें आ जाएगी। प्रार्थना करो और तुम जान जाओगे कि क्या कुछ शब्द ऐसे है जो उपयुक्त नहीं हैं। जब लोग प्रार्थना करते हैं, तो परमेश्वर का साथ उनका अधिक सीधा सम्बन्ध होता है। प्रार्थना के दौरान लोगों और परमेश्वर के मध्य सम्बन्ध सबसे अधिक अंतरंग बन जाता है। जब तुम कुछ कर रहे होते हो तो क्या तुम प्रायः उसी समय घुटने टेक कर प्रार्थना करते हो? परमेश्वर के साथ लोगों का सम्बन्ध तब सबसे करीबी होता है जब वे घुटने टेक कर प्रार्थना करते हैं। जब तुम परमेश्वर के वचनों को पढ़ रहे होते हो, तो यदि तुम प्रार्थना करते हो और तब पुनः पढ़ते हो, तो तुम अलग से महसूस करोगे। यदि तुम कुछ समय तक प्रार्थना नहीं करते हो, तो जब तुम उन्हें पढ़ोगे तो तुम परमेश्वर के वचनों को नहीं समझोगे। जब तुम उन्हें पढ़ना समाप्त कर दोगे, तो तुम उनके अर्थ को नहीं जानोगे।

परमेश्वर की उपस्थिति में प्रार्थना करना और खोजना परमेश्वर को ऐसा या वैसा करवाने के लिए विवश करना नहीं है। एक तर्कसंगत प्रार्थना क्या है? एक अतर्कसंगत प्रार्थना क्या है? कुछ समय का अनुभव प्राप्त करने के पश्चात तुम जान जाओगे। उदाहरण के लिए, तुम्हारे इस बार प्रार्थना करने के पश्चात्, तुम महसूस करते हो कि पवित्र आत्मा इसे उस तरीके से नहीं करती है और आपकी उस रीति से अगुवाई नहीं करती है। अगली बार जब तुम प्रार्थना करते हो, क्या तुम उस प्रकार से प्रार्थना नहीं करोगे, उस प्रकार से परमेश्वर को विवश नहीं करोगे जैसे तुमने पिछली बार किया था, और तुम अपनी इच्छा के अनुसार परमेश्वर से चीज़ें नहीं माँगोगे। दुबारा जब तुम प्रार्थना करोगे, तो तुम कहोगे: "हे परमेश्वर! सब कुछ तेरी इच्छा के अनुसार किया जाता है।" जब तक तुम इस पद्धति पर ध्यान केन्द्रित करते हुए और कुछ समय इधर-उधर टटोलोगे, तब तुम जानोगे कि "अतर्कसंगत" क्या है। एक प्रकार की ऐसी परिस्थिति भी है जहाँ लोग अपनी आत्मा में महसूस करते हैं कि जब वे अपनी मंशाओं के अनुसार प्रार्थना करते हैं, तो वे नीरस, मूक, बेढंगे बन जाते हैं और बिना वचनों के बोलते हैं। जितना अधिक वे बोलते हैं, यह उतना ही बेढंगा बन जाता है। यह प्रमाणित करता है कि जब तुम इस प्रकार से प्रार्थना करते हो, तो यह पूरी तरह से देह का अनुसरण करना है, और पवित्र आत्मा तुम्हें उस तरीके से कार्य या तुम्हारी अगुवाई नहीं करता है। यह इधर-उधर टटोलते रहने का मामला और अनुभव का मामला है। भले ही मैं तुमसे अभी बात करना समाप्त कर देता, तो जब तक तुम यह अनुभव करते, तो हो सकता है कि तुम्हारी कुछ विशेष परिस्थितियाँ होती। प्रार्थना मुख्यतः ईमानदारी से बोलने के बारे में है: "हे परमेश्वर! तू मेरी भ्रष्टता को जानता है, और आज मैंने एक और अतर्कसंगत बात की है। मेरे भीतर एक मंशा थी, परन्तु मैं धोखेबाज़ हूँ। उस समय मैंने यह तेरी इच्छा के अनुसार या सत्य के अनुसार नहीं किया, परन्तु बल्कि मैंने ऐसा मेरी अपनी मंशा के अनुसार किया और मैंने अपना बचाव किया था। अब मैं अपनी भ्रष्टता को पहचानता हूँ और तुझसे मुझे अधिक प्रबुद्ध करने और मुझे सत्य को समझने और इसे अभ्यास में लाने की अनुमति देने की प्रार्थना करता हूँ ताकि मैं इन बातों को उतार फेंकूँ।" इस तरह से बोलो; अंगीकार करो और वास्तविक मसलों के बारे में सच्चाई से बोलो: "हे परमेश्वर! मैं अपनी भ्रष्टता को उतार फेंकने का इच्छुक हूँ, मैं अपना स्वभाव बदलने और सत्य को अभ्यास में लाने का इच्छुक हूँ।" प्रायः लोग सच्चाई के साथ प्रार्थना नहीं करते हैं, वे मात्र सोचते और चिंतन करते हैं, उनमें मात्र मानसिक जागरुकता और पश्चाताप होता है। हालाँकि, वे सत्य को पूरी तरह से नहीं समझते हैं, जो अवश्य प्रार्थना के द्वारा किया जाना चाहिए। प्रार्थना करने के पश्चात, तुम्हारी समझ का स्तर उससे अधिक गहरा हो जाएगा जब तुम मात्र चिंतन करते हो। पवित्र आत्मा तुम्हें प्रेरित करने के लिए कार्य करता है, और जिन परिस्थिति, भावनाओं और प्रेरणाओं को वह आपको देता है वे आपको इस मसले की गहरी समझ प्राप्त करने देती हैं, और पछतावे का तुम्हारा स्तर विशेष रूप से गहरा हो जाएगा। तुम इस मसले पर गहनता से पश्चाताप करोगे और इसलिए इसे पूरी तरह से समझ जाओगे। यदि तुम बस लापरवाही से स्वयं का परीक्षण करते हो, और उसके पश्चात्, तुम्हारे पास अभ्यास करने के लिए उपयुक्त मार्ग नहीं होता है, और तुम सत्य में कोई प्रगति नहीं करते हो, तो तुम परिवर्तित नहीं हो पाओगे। उदाहरण के लिए, कभी-कभी जब लोग कोई संकल्प निर्धारित करते हैं, तो वे सोचते हैं कि: "मुझे अवश्य परमेश्वर के लिए लगन से स्वयं को व्यय करना और लगन से परमेश्वर के प्रेम का बदला चुकाना चाहिए।" जब तुम्हारे व्यय को प्रेरित करने वाली तुम्हारी यह मंशा होगी, तो ज़रूरी नहीं कि तुम्हारा उत्साह बहुत अधिक होगा, और ज़रूरी नहीं कि तुम्हारा हृदय इस पहलू में पूरी तरह से लगा होगा। हालाँकि यदि प्रार्थना करते समय तुम प्रेरित हो जाते हो, और तब तुम एक संकल्प निर्धारित करते हो कि: "मैं कठिनाइयों को भुगतने का इच्छुक हूँ, मैं तुझसे परीक्षणों को प्राप्त करने का इच्छुक हूँ, मैं पूरी तरह से तेरे प्रति समर्पण करने का इच्छुक हूँ। चाहे इसमें कितनी कठिनाइयाँ होंगी, मैं तेरे प्रेम का बदला चुकने का इच्छुक हूँ। मैं तेरे महान प्रेम और इस महान उत्कर्ष का आनन्द उठाता हूँ, मैं हृदय की गहराई से तेरा आभारी हूँ और तुझे महिमा देता हूँ।" इस प्रकार की प्रार्थना के साथ, तुम्हें सामर्थ्य के साथ सम्पन्न किया जाएगा; यह प्रार्थना के द्वारा प्राप्त किया गया परिणाम है। प्रार्थना करने के पश्चात, पवित्र आत्मा लोगों को प्रबुद्ध और रोशन करेगा और लोगों की अगुवाई करेगा, और सत्य का अभ्यास करने के लिए लोगों को विश्वास और साहस प्रदान करेगा। कुछ लोग परमेश्वर के वचन को प्रतिदिन पढ़ते हैं और ये परिणाम नहीं लाते हैं। उनके परमेश्वर के वचनों को पढ़ने, संगति और सम्वाद करने के पश्चात, उनके हृदय उज्ज्वल हों जाएँगे और उनके पास एक मार्ग होगा। यदि पवित्र आत्मा तुम्हें भी यही प्रेरणा, जिम्मेदारी और मार्गदर्शन प्रदान करता है, तो यह बहुत ही भिन्न होगा। परमेश्वर के वचनों को पढ़ने मात्र के पश्चात यदि तुम थोड़ा सा ही प्रेरित होते हो, और तुम उस समय आँसू बहाते हो, तो वह प्रेरणा पल भर कार्य करने के पश्चात ही फीकी पड़ जाएगी। यदि तुम्हारी आँसुओं से भरी प्रार्थना है, एक गम्भीर या एक निष्कपट प्रार्थना है, तो प्रार्थना के समाप्त होने के तीन दिन के पश्चात् भी तुम्हारी ऊर्जा कम नहीं होगी। क्या प्रत्येक को इस प्रकार का अनुभव नहीं होता है? यह प्रार्थना के द्वारा प्राप्त किया गया परिणाम है। प्रार्थना का उद्देश्य यह है कि लोग परमेश्वर की उपस्थिति में आ सकें और उन वस्तुओं को प्राप्त कर सकें जो परमेश्वर उन्हें देना चाहता है। यदि तुम प्रायः प्रार्थना करते हो और प्रायः परमेश्वर की उपस्थिति में आते हो, तब तुम परमेश्वर के साथ एक निरन्तर सम्बन्ध रखोगे, और तुम सदैव परमेश्वर के द्वारा प्रेरित किए जाओगे, सदैव उसके प्रावधान प्राप्त करोगे; और इस प्रकार तुम रूपान्तरित कर दिए जाओगे, तुम्हारी परिस्थितियाँ निरन्तर सुधरेंगी और बदतर नहीं होंगी। विशेष रूप से जब भाई और बहनें प्रार्थना में एक साथ इकट्ठे होते हैं। जब प्रार्थना समाप्त हो जाती है, तब वहाँ एक असाधारण रूप से बड़ी मात्रा में ऊर्जा होती है, हर एक का चेहरा पसीने से भर जाता है, और वे अनुभव करते हैं कि वे बहुत सी चीज़ें प्राप्त करते हैं। वास्तव में तो, कुछ दिन एक साथ रहने के पश्चात् उन्होंने अधिक संवाद नहीं किया, यह प्रार्थना ही थी जिसने उनकी ऊर्जा को उत्तेजित किया और वे अभिलाषा करते हैं कि वे तत्काल अपने परिवारों और संसार को त्याग सकते, वे अभिलाषा करते हैं कि वे सब कुछ त्याग कर सकते हैं, परमेश्वर को छोड़कर सब कुछ। तुम देखते हो कि उनकी ऊर्जा कितनी अधिक है। पवित्र आत्मा लोगों को यह सामर्थ्य देने के लिए कार्य करता है और लोग कभी भी इसका पूरा आनन्द नहीं उठाएँगे! यदि तुम इस सामर्थ्य पर भरोसा नहीं करते हो, अपने हृदय को निष्ठुर बना लेते हो और अपनी गरदन अकड़ा लेते हो; या यदि तुम अपनी इच्छाशक्ति और महत्वाकांक्षाओं पर भरोसा करते हो, तो तुम कहाँ जा सकते हो? तुम ज्यादा दूर नहीं जा पाओगे और लड़खड़ा कर गिरने पड़ोगे, और जब तुम जाओगे तो तुम्हारे पास वह सामर्थ्य नहीं होगी। लोगों को अवश्य आरम्भ से लेकर अन्त तक परमेश्वर के साथ सम्पर्क बनाए रखना चाहिए, परन्तु जैसे-जैसे वे आगे बढ़ते हैं, वे परमेश्वर से पीछा छुड़ा लेते हैं। परमेश्वर, परमेश्वर है। लोग, लोग हैं, और वे अपने अलग-अलग रास्तों पर चलते हैं। परमेश्वर अपना वचन बोलता है और लोग अपने मार्गों पर चलते हैं। जब लोगों के पास सामर्थ्य नहीं होती है, तो कुछ सामर्थ्य उधार लेने के लिए वे परमेश्वर के पास आ कर कुछ वचन कह सकते हैं। उनके थोड़ी सामर्थ्य उधार लेने के पश्चात, वे भाग जाते हैं। कुछ समय तक भागने के पश्चात्, उनकी सामर्थ्य समाप्त हो जाती है और वे परमेश्वर के पास वापिस लौटते हैं और उससे थोड़ी और सामर्थ्य माँगते हैं। लोग इसी प्रकार के हैं और वे बहुत अधिक समय तक स्थिर नहीं रह सकते हैं। जब लोग परमेश्वर को छोड़ देते हैं, तो उनके पास कोई मार्ग नहीं होता है।

मैंने समझा है कि लोगों में आत्म-निग्रह करने की योग्यता विशेष रूप से कम हो रही है। ऐसा क्यों होता है? लोग कभी भी प्रार्थना नहीं करते हैं, और जब वे प्रार्थना नहीं करते हैं, तो वे स्वच्छंद हो जाते हैं; एक बार जब वे स्वच्छंद बन जाते हैं, तो उनमें धर्मनिष्ठा या विनम्रता नहीं रहती है; वे बस मानवता, सत्यनिष्ठा और अपने भ्रष्ट स्वभाव को जानने पर ध्यान देते हैं, और बस इतना ही। लोग इस बात को अनदेखा करते हैं कि पवित्र आत्मा वास्तव में कैसे कार्य करता और लोगों को प्रेरित करता है और अपने प्रतिदिन के जीवन में उन्हें किस प्रकार परमेश्वर की इच्छा खोजनी चाहिए। परमेश्वर में लोगों का विश्वास बस एक विश्वास है, और इसमें कुछ भी आध्यात्मिक नहीं है। ये दो भिन्न-भिन्न चीज़ें हैं। यह मात्र भौतिकता का संसार है, और यह आध्यात्मिक चीज़ों से इनकार करता है। इसीलिए, जब लोग चल रहे होते हैं, तो वे भटकते और गिरते हैं। प्रार्थना के बिना, सत्य का उनका अभ्यास एक विशेष दायरे के भीतर एक ही सिद्धान्त के मुताबिक चलता है; वे केवल नियमों का अभ्यास करते हैं। भले ही तुम ऊपर से आई व्यवस्थाओं को पूरा करके परमेश्वर को अपमानित नहीं करते हो, फिर भी तुम केवल नियमों के मुताबिक चल रहे होते हो। आजकल लोगों की आध्यत्मिक भावनाएँ सुन्न और धीमी हैं। परमेश्वर के साथ लोगों के सम्बन्ध में अनेक गूढ़ चीज़ें हैं, जैसे की आध्यात्मिक रूप से प्रेरित या प्रबुद्ध महसूस करना; परन्तु लोग इसे महसूस नहीं करते, वे अत्यधिक सुन्न हैं। यह गाने के समान है, जब लोग प्रायः नहीं गाते हैं, तो वे राग के बारे में अनिश्चित होते हैं। लोग परमेश्वर का वचन नहीं पढ़ते हैं और वे आध्यात्मिक चीज़ों से संबद्ध नहीं होते हैं। उन्हें अपनी स्वयं की स्थिति के बारे में समझ ही नहीं होती है। प्रार्थना किए बिना और कलीसिया के जीवन के बिना, आध्यात्मिक जीवन की हालत को समझना असम्भव है। क्या तुम ऐसा महसूस करते हो? परमेश्वर पर विश्वास करने के लिए, इस तरह से प्रार्थना करना अनिवार्य है। बिना प्रार्थना किए, तुम परमेश्वर पर विश्वास की सदृशता प्राप्त नहीं कर सकते हो। अब हम कहते हैं कि विनियमों की कोई आवश्यकता नहीं है, मनुष्य किसी भी समय और किसी भी स्थान पर प्रार्थना कर सकता है। इसलिए, कई लोग कभी-कभार ही प्रार्थना करते हैं; वे सुबह उठते हैं और प्रार्थना नहीं करते हैं। वे अपने बालों में कंघी करते हैं, अपना मुँह धोते हैं और तब वे पढ़ते और गाते हैं। रात को वे लेट जाते और बिना प्रार्थना किए ही सो जाते हैं। क्या तुम लोग ऐसा अनुभव करते हो? यदि तुम लोग प्रार्थना किए बिना परमेश्वर का वचन मात्र पढ़ते हो, तब तुम लोग एक अविश्वासी के समान होगे, जो परमेश्वर का वचन पढ़ता है और इसे नहीं समझता है। प्रार्थना के बिना, तुम लोगों का हृदय पूरी तरह से समर्पित नहीं हो सकता है और तुम लोग अपनी आत्माओं में गूढ़ अनुभूति प्राप्त नहीं कर सकते हो या तुम लोग आत्मा में प्रेरित नहीं हो सकते हो। तुम लोग सुन्न और धीमे हो जाओगे, और अपने स्वभाव के रूपान्तरण के बारे में बस कुछ बाहरी बातें ही कहोगे। ऐसा प्रतीत होगा कि तुम लोग परमेश्वर पर विश्वास करते हो, परन्तु वास्तव में, तुम लोगों की भावनाओं की गहराई पर्याप्त व्यापक नहीं है। ऐसा प्रतीत होता है तुम लोग परमेश्वर पर विश्वास नहीं करते हो और तुम लोग कितना भी प्रयास क्यों न करो, तुम प्रार्थना नहीं कर सकते हो। यह पहले से ही बहुत ख़तरनाक है। तुम लोग परमेश्वर से बहुत दूर हो, ऐसा प्रतीत होता है कि तुम लोगों के हृदय में परमेश्वर है ही नहीं। प्रार्थना के लिए आत्मा के पास लौटना व्यस्त कार्य को बाहर से अवरुद्ध नहीं करता है; यह न केवल अवरोध का कारण नहीं बनता है, बल्कि यह कार्य के लिए लाभदायक भी है।

पिछला:अध्याय 21. केवल सत्य का अनुसरण ही परमेश्वर में सच्चा विश्वास है

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