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19. परमेश्वर सदा अपरिवर्तनीय हैं, फिर प्रभु यीशु अपने नाम को सर्वशक्तिमान परमेश्वर में क्यों बदलेंगे?

परमेश्वर के वचन से जवाब:

हर बार जब परमेश्वर पृथ्वी पर आएगा, तो वह अपना नाम, अपना लिंग, अपनी छवि, और अपना कार्य बदल देगा; वह अपने कार्य को दोहराता नहीं है, और वह हमेशा नया रहता है और कभी पुराना नहीं पड़ता है। जब वह पहले आया, उसे यीशु कहा गया था; जब वह इस बार फिर से आता है तो क्या उसे अभी भी यीशु कहा जा सकता है? जब वह पहले आया, तो वह पुरुष था; क्या इस बार फिर से पुरुष हो सकता है? जब वह अनुग्रह के युग के दौरान आया तो उसका कार्य, सलीब पर ठोंका जाना था; जब वह फिर से आएगा तो क्या तब भी वह मानव जाति को पाप से छुटकारा दिलाएगा? क्या उसे तब भी सलीब पर ठोंका जाएगा? क्या वह उसके कार्य की पुनरावृत्ति नहीं होगी? क्या तुम्हें नहीं पता था कि परमेश्वर हमेशा नया रहता है और कभी भी पुराना नहीं पड़ता है? ऐसे लोग हैं जो कहते हैं कि परमेश्वर अपरिवर्तशील है। यह सही है, किन्तु यह परमेश्वर के स्वभाव और सार की अपरिवर्तनशीलता का संकेत करता है। उसके नाम और कार्य में परिवर्तन से यह साबित नहीं होता है कि उसका सार बदल गया है; दूसरे शब्दों में, परमेश्वर हमेशा परमेश्वर रहेगा, और यह कभी नहीं बदलेगा। यदि तुम कहते हो कि परमेश्वर का कार्य हमेशा वैसा ही बना रहता है, तो क्या वह अपनी छः-हजार वर्षीय प्रबंधन योजना को पूरा करने में सक्षम होगा? तुम केवल यह जानते हो कि परमेश्वर हमेशा ही अपरिवर्तनीय है, किन्तु क्या तुम जानते हो कि परमेश्वर हमेशा नया रहता है और कभी पुराना नहीं पड़ता है? यदि परमेश्वर का कार्य कभी नहीं बदला था, तो क्या वह मानवजाति को आज के दिन तक ला सकता था? यदि परमेश्वर अपरिवर्तशील है, तो ऐसा क्यों है कि उसने पहले ही दो युगों का कार्य कर लिया है? उसका कार्य हमेशा आगे की ओर प्रगति कर रहा है, और इसलिए उसका स्वभाव धीरे-धीरे मनुष्य के लिए प्रकट होता है, और जो प्रकट होता है वह उसका अंतर्निहित स्वभाव है। आरंभ में,परमेश्वर का स्वभाव मनुष्यों से छिपा हुआ था, उसने कभी भी खुल कर मनुष्य को अपना स्वभाव प्रकट नहीं किया था, और मनुष्य को उसका कोई ज्ञान नहीं था, इसलिए उसने धीरे-धीरे मनुष्य के लिए अपना स्वभाव प्रकट करने हेतु अपने कार्य का उपयोग किया, किन्तु इसका यह अर्थ नहीं है कि प्रत्येक युग में उसका स्वभाव बदल जाता है। ऐसा मामला नहीं है कि परमेश्वर का स्वभाव लगातार बदल रहा है क्योंकि उसकी इच्छा हमेशा बदल रही है। बल्कि, क्योंकि उसके कार्य के युग भिन्न-भिन्न हैं, उसका अंतर्निहित स्वभाव धीरे-धीरे अपनी समग्रता से मनुष्य के लिए प्रकट होता है, ताकि मनुष्य उसे जानने में सक्षम हो जाए। किन्तु यह किसी भी भाँति इस बात का साक्ष्य नहीं है कि परमेश्वर का मूलतः कोई विशेष स्वभाव नहीं है और युगों के गुजरने के साथ उसका स्वभाव धीरे-धीरे बदल गया है—इस प्रकार की समझ गलत है। युगों के गुजरने के अनुसार परमेश्वर मनुष्य को अपना अंतर्निहित, विशेष स्वभाव—वह जो है—प्रकट करता है। एक ही युग का कार्य परमेश्वर के समग्र स्वभाव को व्यक्त नहीं कर सकता है। और इसलिए, "परमेश्वर हमेशा नया रहता है और कभी पुराना नहीं पड़ता है" वचन उसके कार्य के संदर्भ में हैं, और "परमेश्वर अपरिवर्तशील है" वचन उस संदर्भ में हैं जो परमेश्वर का अंतर्निहित स्वरूप है। इसके बावज़ूद, तुम एक बिंदु में छह-हज़ार-वर्ष के कार्य को परिभाषित नहीं कर सकते हो, या इसे केवल अपरिवर्ती वचनों से चित्रित नहीं कर सकते हो। मनुष्य की मूर्खता ऐसी ही है। परमेश्वर इतना सरल नहीं है जितना मनुष्य कल्पना करता है, और उसका कार्य एक युग में नहीं रुक सकता है। उदाहरण के लिए, यहोवा हमेशा परमेश्वर के नाम का नहीं हो सकता है; परमेश्वर यीशु के नाम के तहत भी अपना कार्य कर सकता है, जो कि इस बात का प्रतीक है कि कैसे परमेश्वर का कार्य हमेशा आगे की ओर आगे बढ़ रहा है।

परमेश्वर हमेशा परमेश्वर रहेगा, और कभी भी शैतान नहीं बनेगा; शैतान हमेशा शैतान रहेगा,और कभी भी परमेश्वर नहीं बनेगा। परमेश्वर की बुद्धि, परमेश्वर की चमत्कारिकता, परमेश्वर की धार्मिकता, और परमेश्वर का प्रताप कभी नहीं बदलेंगे। उसका सार और उसका स्वरूप कभी नहीं बदलेगा। उसका कार्य, हालाँकि, हमेशा आगे प्रगति कर रहा है और हमेशा गहरा होता जा रहा है, क्योंकि वह हमेशा नया रहता है और कभी पुराना नहीं पड़ता है। हर युग में परमेश्वर एक नया नाम अपनाता है, हर युग में वह नया कार्य करता है, और हर युग में वह अपने प्राणियों को अपनी नई इच्छा और नए स्वभाव को देखने की अनुमति देता है। यदि लोग नए युग में परमेश्वर के नए स्वभाव की अभिव्यक्ति को नहीं देखते हो, तो क्या वे उसे हमेशा के लिए सलीब पर नहीं ठोंक देंगे? और ऐसा करके, क्या वे परमेश्वर को परिभाषित नहीं करेंगे?

"वचन देह में प्रकट होता है" से "परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)" से

कुछ कहते हैं कि परमेश्वर का नाम बदलता नहीं है, तो फिर क्यों यहोवा का नाम यीशु हो गया? मसीह के आने की भविष्यवाणी की गई थी, तो फिर क्यों यीशु नाम का एक व्यक्ति आया? परमेश्वर का नाम क्यों बदला गया? क्या इस तरह का कार्य काफी समय पहले नहीं किया गया था? क्या परमेश्वर आज के दिन कोई नया कार्य नहीं कर सकता है? कल का कार्य बदला जा सकता है, और यीशु का कार्य यहोवा के कार्य के बाद नहीं आ सकता है। क्या यीशु के कार्य के बाद कोई अन्य कार्य नहीं हो सकता है? यदि यहोवा का नाम बदल कर यीशु हो सकता है, तो क्या यीशु का नाम भी नहीं बदला जा सकता है? यह असामान्य नहीं है, और लोग ऐसा[क] केवल अपनी नासमझी के कारण सोचते हैं। परमेश्वर हमेशा परमेश्वर ही रहेगा। उसके कार्य और नाम में परिवर्तन की परवाह किए बिना, उसका स्वभाव और विवेक हमेशा अपरिवर्तित रहता है, वह कभी भी नहीं बदलेगा। यदि तुम मानते हो कि परमेश्वर केवल यीशु के नाम से ही पुकारा जा सकता है, तो तुम्हें बहुत कम ज्ञान है। क्या तुम यह दृढ़तापूर्वक कहने का साहस करते हो कि परमेश्वर का नाम यीशु हमेशा के लिए है, और परमेश्वर हमेशा और निरंतर यीशु के ही नाम से जाना जाएगा, और कि यह कभी नहीं बदलेगा? क्या तुम यह निश्चितता से दृढ़तापूर्वक कहने का साहस कर सकते हो कि यह यीशु का नाम ही है जिसने व्यवस्था के युग का समापन किया और अंतिम युग का भी समापन करता है? कौन कह सकता है कि यीशु का अनुग्रह युग का समापन कर सकता है?

"वचन देह में प्रकट होता है" से "वह मनुष्य किस प्रकार परमेश्वर के प्रकटनों को प्राप्त कर सकता है जिसने उसे अपनी ही धारणाओं में परिभाषित किया है?" से

फुटनोटः

क. मूलपाठ में "जो है" पढ़ा जाता है।

पिछला:कुछ लोगों ने कहा है, "यदि हम प्रभु यीशु के मार्ग पर चलेंगे और उनकी अपेक्षाओं के अनुसार अपना आचरण रखेंगे, यदि हम विनम्र और धैर्यवान होंगे, अपने शत्रुओं से प्रेम करेंगे, सलीब को धारण करेंगे, अपने शरीर को वश में रखेंगे, प्रचारकार्य और प्रभु के लिए काम करेंगे और उनकी गवाही देंगे, यदि हम इन चीज़ों में मेहनत करेंगे, तो हम पवित्र हो जाएंगे।" ऐसा कहना क्यों गलत है?

अगला:हमारे पाप क्षमा कर दिये गये हैं और प्रभु में विश्वास के जरिये हमें न्यायसंगत माना गया है, और साथ ही, हमने बहुत-सी चीज़ों का त्याग किया है, स्वयं को खपाया है, और प्रभु के लिए अनथक मेहनत की है। मुझे यकीन है कि इस प्रकार का विश्वास हमें स्वर्ग के राज्य में आरोहित होने देगा। आप ऐसा क्यों कहते हैं कि यह हमें स्वर्गिक राज्य में प्रवेश नहीं दिलायेगा?

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