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स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IV

परमेश्वर की पवित्रता (I)

आज हमारे पास परमेश्वर के अधिकार की अतिरिक्त संगति है, और हम फिलहाल अभी परमेश्वर की धार्मिकता के बारे में बात नहीं करेंगे। आज हम बिल्कुल ही एक नए विषय के बारे में बात करेंगे—परमेश्वर की पवित्रता। परमेश्वर की पवित्रता परमेश्वर के अद्वितीय सार का एक और पहलू है, अतः यहाँ इस विषय पर संगति करने की अत्यधिक आवश्यकता है। परमेश्वर के सार का यह पहलू जिस पर मैं संगति करूंगा, साथ ही वे दो पहलू जिन पर हम ने परमेश्वर के धर्मी स्वभाव एवं परमेश्वर के अधिकार से पहले संगति की थी—क्या वे सब अद्वितीय हैं? (हाँ।) परमेश्वर की पवित्रता भी अद्वितीय है, अतः इस अद्वितीयता का आधार, एवं इस अद्वितीयता का मूल आज की हमारी बातचीत का मुख्य विषय होगा। समझ गए? मेरे पीछे पीछे दोहराओ: परमेश्वर का अद्वितीय सार—परमेश्वर की पवित्रता। (परमेश्वर का अद्वितीय सार—परमेश्वर की पवित्रता।) इस वाक्यांश को दोहराने के बाद तुम सब अपने हृदय में कैसा महसूस करते हो? कदाचित् तुम सब में से कुछ लोगों को ग़लतफहमियां हैं, और पूछ रहे हो, "परमेश्वर की पवित्रता की बातचीत क्यों करें?" चिंता मत करो, मैं इसके माध्यम से तुम सब से धीरे-धीरे बात करूंगा। जैसे ही तुम सब इसे सुनते हो तुम सब जान जाओगे कि इस विषय पर संगति करना मेरे लिए इतना आवश्यक क्यों है।

आओ सबसे पहले हम "पवित्र" शब्द को परिभाषित करें। अपनी अनुभूति का उपयोग करते हुए और उस समस्त ज्ञान से जिसे तुम सबने सीखा है, तुम सब क्या समझते हो, "पवित्र" की परिभाषा क्या होनी चाहिए? ("पवित्र" का अर्थ है कोई दाग नहीं है, जिसमें मनुष्य की कोई भ्रष्टता या त्रुटि न हो। हर एक चीज़ जिसे वह प्रतिबिम्बित करता है—चाहे विचार में, बोली में या कार्य में, हर एक चीज़ जिसे वह करता है—वह पूरी तरह से सकारात्मक है।) बहुत अच्छा। ("पवित्र" ईश्वरीय है, विशुद्ध है, मनुष्यों के द्वारा अनुल्लंघनीय है। यह अद्वितीय है, यह परमेश्वर का चारित्रिक प्रतीक है।) ("पवित्र" बेदाग है और यह ईश्वरीयता का एक पहलू है, एवं अनुल्लंघनीय स्वभाव है।) यह तुम्हारी परिभाषा है, है ना। हर एक व्यक्ति के हृदय में, इस "पवित्र" शब्द का एक दायरा है, और एक परिभाषा एवं एक अनुवाद है। कम से कम, जब तुम सब "पवित्र" शब्द को देखते हो तो तुम सब का दिमाग खाली तो नहीं होता है। तुम सबके पास इस शब्द के लिए एक निश्चित परिभाषित दायरा है, और इस परिभाषा के विषय में कुछ लोगों का अनुवाद परमेश्वर के स्वभाव के सार को परिभाषित करने के लिए इस शब्द के उपयोग के करीब आ जाता है। यह बहुत अच्छा है। अधिकांश लोग विश्वास करते हैं कि "पवित्र" शब्द एक सकारात्मक शब्द है, और इसकी पुष्टि की जा सकती है। परन्तु परमेश्वर की पवित्रता जिस पर आज मैं संगति करना चाहता हूँ उसे केवल परिभाषित ही नहीं किया जाएगा और उसे केवल समझाया ही नहीं जाएगा। इसके स्थान पर, सत्यापन के लिए मैं कुछ तथ्यों का उपयोग करूंगा ताकि तूझे यह देखने की अनुमति मिले कि मैं क्यों कहता हूँ कि परमेश्वर पवित्र है, और मैं परमेश्वर के सार को दर्शाने के लिए "पवित्र" शब्द का उपयोग क्यों करता हूँ। उस समय तक जब हमारी संगति पूरी हो जाती है, तू महसूस करेगा कि परमेश्वर के सार को व्यक्त करने के लिए "पवित्र" शब्द का उपयोग और परमेश्वर को सूचित करने के लिए इस शब्द का उपयोग बिलकुल उचित एवं बिलकुल उपयुक्त दोनों है। कम से कम, जहाँ तक मानवजाति की वर्तमान भाषाओं की बात है, परमेश्वर को सूचित करने के लिए इस शब्द का उपयोग करना विशेष रूप से बिलकुल उचित है—परमेश्वर को सूचित करने के लिए यह मानवीय भाषा में एकमात्र शब्द है जो बहुत ही उपयुक्त है। परमेश्वर को सूचित करने के लिए इसका उपयोग करते समय यह एक खोखला शब्द नहीं है, न ही यह बिना किसी कारण के की गई प्रशंसा या एक खोखला अभिवादन है। हमारी संगति का उद्देश्य प्रत्येक को अनुमति देना है कि वह परमेश्वर के सार के इस पहलू के अस्तित्व के सत्य को पहचाने। परमेश्वर लोगों की समझ से नहीं डरता है, केवल उनकी ग़लतफहमी से डरता है। परमेश्वर चाहता है कि प्रत्येक व्यक्ति उसके सार और जो उसके पास है एवं जो वह है उसे जानें। अतः हम हर बार परमेश्वर के सार के एक पहलू का जिक्र करते हैं, तो हम कई तथ्यों की दुहाई दे सकते हैं ताकि लोगों को यह देखने की अनुमति मिले कि परमेश्वर के सार का यह पहलू वास्तव में अस्तित्व में है और यह बिलकुल सच्चा एवं बिलकुल वास्तविक दोनों है।

अब जबकि हमारे पास "पवित्र" शब्द की एक परिभाषा है, तो आओ हम कुछ उदाहरणों को लें। लोगों के विचारों में, उनके लिए अनेक "पवित्र" चीज़ों एवं लोगों की कल्पना करना आसान है। उदाहरण के लिए, क्या मानवजाति के शब्दकोशों में कुंवारे लड़कों एवं लड़कियों को पवित्र रूप में परिभाषित किया जा सकता है? क्या वे वास्तव में पवित्र हैं? (नहीं।) क्या यह तथाकथित "पवित्र" शब्द और वह "पवित्र" शब्द जिस पर हम आज संगति करना चाहते हैं वे एक एवं समान हैं? (नहीं।) लोगों के मध्य ऐसे लोगों को देखने पर जिनके पास ऊँची नैतिकता है, जिनके पास परिष्कृत एवं सुसंस्कृत बोली है, जो कभी किसी को चोट नहीं पहुंचाते हैं, जब वे बोलते हैं, तो वे दूसरों को सुकून पहुचाते हैं और सहमत कर लेते हैं—क्या वे पवित्र हैं? कन्फ्यूशी विद्वान या सज्जन पुरुष जिनके पास ऊँची नैतिकता है, जो शब्द एवं कार्य दोनों में परिष्कृत हैं—क्या वे पवित्र हैं? ऐसे लोग जो अकसर अच्छा कार्य करते हैं, वे दानशील हैं और दूसरों को बड़ी सहायता प्रदान करते हैं, ऐसे लोग जो लोगों की ज़िन्दगियों में बहुत सारा मनोरंजन लेकर आते हैं—क्या वे पवित्र हैं? (नहीं।) ऐसे लोग जो दूसरों के प्रति कोई स्वयंसेवी विचारों को आश्रय नहीं देते हैं, जो दूसरों से कठिन मांग नहीं करते हैं, जो किसी को भी सह लेते हैं—क्या वे पवित्र हैं? ऐसे लोग जिनका किसी के साथ कभी कोई विवाद नहीं हुआ है न ही कभी किसी का लाभ उठाया है—क्या वे पवित्र हैं? वास्तव में ऐसे लोग जो दूसरों की भलाई के लिए काम करते हैं, जो दूसरों को लाभ पहुंचाते हैं और हर प्रकार से दूसरों के लिए उन्नति लेकर आते हैं—क्या वे पवित्र हैं? ऐसे लोग जो दूसरों को अपने जीवन की सारी जमा पूंजी दे देते हैं और साधारण जीवन जीते हैं, जो स्वयं के साथ तो सख्त हैं परन्तु दूसरों से उदारता से व्यवहार करते हैं—क्या वे पवित्र हैं? (नहीं।) तुम सब को याद है कि तुम लोगों की माताएं तुम सब की परवाह करती थीं और हर एक विश्वसनीय तरीके से तुम सबकी देखभाल करती थीं—क्या वे पवित्र हैं? ऐसी मूर्तियां जिन्हें तुम लोग प्रिय मानते थे, चाहे वे प्रसिद्ध लोग हों, सितारे हों या महान लोग हों—क्या वे पवित्र हैं? (नहीं।) ये सब नियत है। आओ अब हम बाईबिल में उन भविष्यवक्ताओं को देखें जो भविष्य बताने के योग्य थे जिससे बहुत से अन्य लोग अनजान थे—क्या इस प्रकार का व्यक्ति पवित्र था? ऐसे लोग जो बाइबिल में परमेश्वर के वचनों और उसके कार्य के तथ्यों को लिखने के योग्य थे—क्या वे पवित्र थे? (नहीं।) क्या मूसा पवित्र था? क्या इब्राहिम पवित्र था? क्या अय्यूब पवित्र था? (नहीं।) तुम सब ऐसा क्यों कह रहे हो? ("पवित्र" शब्द का उपयोग केवल परमेश्वर को सूचित करने के लिए उपयोग किया जाता है।) परमेश्वर के द्वारा अय्यूब को धर्मी व्यक्ति कहकर पुकारा गया था, अतः उसने भी यह क्यों कहा था कि वह पवित्र नहीं है? तुम सब यहाँ कुछ शंका महसूस करते हो, क्या तुम लोग नहीं करते हो? ऐसे लोग जो परमेश्वर का भय मानते हैं और बुराई से दूर रहते हैं क्या वे वास्तव में पवित्र नहीं हैं? क्या वे पवित्र नहीं हैं? (नहीं।) तुम लोगों का उत्तर नकारात्मक है, क्या ऐसा है? वास्तव में तुम सब का नकारात्मक उत्तर किस पर आधारित है? (परमेश्वर अद्वितीय है।) यह अच्छी तरह से स्थापित आधार है; वास्तव में एक उत्कृष्ट आधार है! मैं पता लगा रहा हूँ कि तुम सब में चीज़ों को जल्दी से पकड़ने और जो तुम लोगों ने सीखा है उसका उपयोग करने की बड़ी योग्यता है, और यह कि तुम सभी के पास यह विशेष कुशलता है। तुम सब थोड़ा शंकालु हो, बहुत अधिक निश्चित नहीं हो, और तुम लोग "नहीं" कहने की हिम्मत नहीं करते हो, परन्तु न ही तुम लोग "हाँ" कहने की हिम्मत करते हो, अतः तुम लोगों को "नहीं" कहने के लिए बाध्य किया गया है। मुझे एक और प्रश्न पूछने दो। परमेश्वर के संदेशवाहक—वे संदेशवाहक जिन्हें परमेश्वर ने नीचे पृथ्वी पर भेजा—क्या वे पवित्र हैं? (नहीं।) इसे सावधानी से सोचो। जब एक बार तुम सभी इस पर सोच लो तब अपना उत्तर दो। क्या स्वर्गदूत पवित्र हैं? (नहीं।) मानवजाति जिसे शैतान के द्वारा भ्रष्ट नहीं किया गया है—क्या वे पवित्र हैं? (नहीं।) तुम सब ने प्रत्येक प्रश्न के लिए "नहीं" कहा है। किस आधार पर? क्या वह वाक्यांश जिसे मैंने अभी कहा था वह तुम लोगों के "नहीं" कहने का कारण है? तुम लोग भ्रमित हो गए हो, क्या तुम लोग भ्रमित नहीं हो? अतः स्वर्गदूतों को भी पवित्र क्यों नहीं कहा गया है? तुम सब यहाँ आशंकित महसूस करते हो, क्या तुम आशंकित महसूस नहीं करते हो? तब क्या तुम लोग पता लगा सकते हो कि किस आधार पर लोग, चीज़ें या नहीं सृजे गए प्राणी जिसका हमने पहले जिक्र किया था क्या वे पवित्र नहीं हैं? मैं सुनिश्चित हूँ कि तुम लोग इसका पता लगाने में असमर्थ हो, सही है? अतः क्या तुम लोगों का "नहीं" कहना तब थोड़ा सा गैरज़िम्मेदाराना है? क्या तुम रूखेपन से उत्तर नहीं दे रहे हो? कुछ लोग विचार कर रहे हैं: "तुम इस प्रकार पूछते हो, अतः ऐसा तो निश्चित तौर पर नहीं होगा।" बस रूखेपन से उत्तर न दो। सावधानी से सोचो कि उत्तर हाँ है या नहीं। तुम लोग जानोगे जब हम इस निम्नलिखित शीर्षक पर बातचीत करेंगे कि यह "नहीं" क्यों है। मैं तुम सब को बहुत जल्द ही उत्तर दूंगा। आओ हम पहले पवित्र शास्त्र के कुछ अंश को पढ़ें।

1. मनुष्य के लिए यहोवा परमेश्वर की आज्ञा

(उत्पत्ति 2:15-17) तब यहोवा परमेश्वर ने आदम को लेकर अदन की वाटिका में रख दिया, कि वह उसमें काम करे और उसकी रक्षा करे। और यहोवा परमेश्वर ने आदम को यह आज्ञा दी, "तू वाटिका के सब वृक्षों का फल बिना खटके खा सकता है; पर भले या बुरे के ज्ञान का जो वृक्ष है, उसका फल तू कभी न खाना: क्योंकि जिस दिन तू उसका फल खाएगा उसी दिन अवश्य मर जाएगा।"

2. सर्प के द्वारा स्त्री को बहकाया जाना

(3:1-5) यहोवा परमेश्वर ने जितने बनैले पशु बनाए थे, उन सब में सर्प धूर्त था; उसने स्त्री से कहा, "क्या सच है कि परमेश्वर ने कहा, 'तुम इस वाटिका के किसी वृक्ष का फल न खाना'?" स्त्री ने सर्प से कहा, "इस वाटिका के वृक्षों के फल हम खा सकते हैं; पर जो वृक्ष वाटिका के बीच में है, उसके फल के विषय में परमेश्वर ने कहा है कि न तो तुम उसको खाना और न उसको छूना, नहीं तो मर जाओगे।" तब सर्प ने स्त्री से कहा, "तुम निश्चय न मरोगे! वरन् परमेश्वर आप जानता है कि जिस दिन तुम उसका फल खाओगे उसी दिन तुम्हारी आखें खुल जाएंगी, और तुम भले बुरे का ज्ञान पाकर परमेश्वर के तुल्य हो जाओगे।"

ये दोनों अंश बाइबिल की किस किताब के लघु अंश हैं? (उत्पत्ति।) क्या तुम सभी इन दोनों अंशों से परिचित हो? यह कुछ ऐसा था जो आरम्भ में हुआ था जब पहली बार मानवजाति को सृजा गया था; यह एक वास्तविक घटना है। सबसे पहले आओ हम यह देखें कि यहोवा परमेश्वर ने आदम और हव्वा को किस प्रकार की आज्ञा दी थी, जैसे कि इस आज्ञा की विषयवस्तु आज हमारे शीर्षक के लिए अत्यंत आवश्यक है। "और यहोवा परमेश्वर ने आदम को यह आज्ञा दी...." निम्नलिखित अंश को निरन्तर पढ़ते रहो। ("तू वाटिका के सब वृक्षों का फल बिना खटके खा सकता है; पर भले या बुरे के ज्ञान का जो वृक्ष है, उसका फल तू कभी न खाना: क्योंकि जिस दिन तू उसका फल खाएगा उसी दिन अवश्य मर जाएगा।") इस अंश में मनुष्य को दी गई परमेश्वर की आज्ञा में क्या शामिल है? पहला, परमेश्वर मनुष्य को बताता है कि वह क्या खा सकता है, वहाँ सभी किस्म के पेड़ों के फल मौजूद थे। इसमें कोई खतरा या ज़हर नहीं है, सब कुछ खाया जा सकता है और बिना किसी सन्देह के अपनी इच्छा के अनुसार खाया जा सकता है। यह एक भाग है। दूसरा भाग एक चेतावनी है। यह चेतावनी मनुष्य को बताता है कि वह किस वृक्ष के फल को नहीं खा सकता है? (भले और बुरे के ज्ञान का वृक्ष।) उसे भले और बुरे के ज्ञान के वृक्ष से फल नहीं खाना चाहिए। यदि वह ऐसा करता है तब क्या होगा? (वह निश्चय ही मर जाएगा।) परमेश्वर ने मनुष्य से कहाः यदि तुम इसे खाओगे तो निश्चय ही मर जाओगे। क्या ये वाक्य स्पष्ट नहीं हैं? (हाँ)। यदि परमेश्वर ने तुम सब से यह कहा है किन्तु तुम लोग इसे नहीं समझ पाते हो कि ऐसा क्यों कहा, तो क्या तुम सब इसके साथ एक नियम या एक आज्ञा के रूप में व्यवहार करते जिसका पालन किया जाना चाहिए? इसका पालन किया जाना चाहिए, पालन नहीं किया जाना चाहिए? परन्तु मनुष्य इसका पालन करने के योग्य है या नहीं, परमेश्वर के वचन पूरी तरह से स्पष्ट हैं। परमेश्वर ने मनुष्य को बिलकुल साफ-साफ कहा कि वह क्या खा सकता है और क्या नहीं खा सकता है, और क्या होगा यदि वह उसे खाता है जिसे उसे नहीं खाना चाहिए। क्या तुम सब ने इन संक्षिप्त शब्दों में परमेश्वर के स्वभाव को देखा है जिसे परमेश्वर ने कहा था? क्या परमेश्वर के ये वचन सत्य हैं? (हाँ।) क्या इसमें कोई छलावा है? (नहीं।) क्या इसमें कोई झूठ है? (नहीं।) क्या इसमें कुछ भी डरावना है? (नहीं।) परमेश्वर ने ईमानदारी से, सच्चाई से और सत्यनिष्ठा से मनुष्य को बताया था कि वह क्या खा सकता है और क्या नहीं खा सकता है, जो स्पष्ट और सरल है। क्या इन वचनों में कोई छिपा हुआ अर्थ है? क्या ये वचन सरल हैं? एक झलक में उनका अर्थ स्पष्ट है, जैसे ही तुम सब इसे देखते हो तुम सब इसे समझ जाते हो। क्या अनुमान लगाने की कोई आवश्यकता है? (नहीं।) अंदाज़ा लगाना जरुरी नहीं है, ठीक है? यह पहले से ही बिल्कुल स्पष्ट है। परमेश्वर के मस्तिष्क में, जो कुछ वह कहना चाहता है, जो कुछ वह अभिव्यक्त करना चाहता है, वह उसके हृदय से आता है। ऐसी चीज़ें जिन्हें परमेश्वर व्यक्त करता है वे स्पष्ट, सरल एवं साफ हैं। यहाँ गुप्त इरादे या कोई छिपा हुआ अर्थ नहीं हैं। वह मनुष्य से सीधे बातचीत करता है, यह कहते हुए कि वह क्या खा सकता है और क्या नहीं खा सकता है। कहने का तात्पर्य है, परमेश्वर के इन वचनों के माध्यम से मनुष्य देख सकता है कि परमेश्वर का हृदय पारदर्शी है, और यह कि उसका हृदय सच्चा है। यहाँ पर बिल्कुल भी झूठ नहीं है, तुम लोगों को यह कहते हुए कि जो खाने के लायक है उसे तुम सब नहीं खा सकते हो या यह कहते हुए कि "इसे करो और देखो कि क्या होता है" उन चीज़ों के साथ जिन्हें तुम सब नहीं खा सकते हो। क्या इसका अर्थ यह है? (नहीं।) जो कुछ भी परमेश्वर अपने हृदय में सोचता है वही कहता है। यदि मैं कहूँ कि परमेश्वर पवित्र है क्योंकि वह इस प्रकार से इन वचनों में अपने आपको दिखाता और प्रगट करता है, तो हो सकता है कि तुम सब थोड़ा बहुत ऐसा महसूस करो कि मैंने बिना किसी बात पर बहुत बड़ा सौदा कर लिया है या मैंने अपनी व्याख्या को थोड़ी दूर तक खींच दिया है। यदि ऐसा है, तो चिंता मत करो, हमने अभी तक समाप्त नहीं किया है।

आओ हम "सर्प के द्वारा स्त्री को प्रलोभन" देने के विषय में बातचीत करें। यह सांप कौन है? (शैतान।) शैतान ने परमेश्वर के छः हज़ार वर्षों की प्रबंधकीय योजना में एक महीन परत की भूमिका निभाई है, और यह वह भूमिका है जिसका जिक्र करने से हम नहीं चूकते हैं जब हम परमेश्वर की पवित्रता की संगति करते हैं। मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? (क्योंकि शैतान उन सब का प्रतिनिधि एवं रचनाकार है जो घिनौना एवं भ्रष्ट है।) यदि तू शैतान और शैतान के स्वभाव की बुराई एवं भ्रष्टता को नहीं जानता है, तो तेरे पास इसे पहचानने का कोई तरीका नहीं है, न ही तू यह जान सकता है कि पवित्रता वास्तव में क्या है। भ्रम की स्थिति में, लोग यह विश्वास करते हैं कि शैतान जो कुछ करता है वह सही है, क्योंकि वे इस प्रकार के भ्रष्ट स्वभाव के अंतर्गत जीते हैं। बिना किसी महीन परत के, जहाँ तुलना करने के लिए कुछ भी नहीं है, तो तू नहीं जान सकता है कि पवित्रता क्या है, अतः यहाँ पर इस विषय का उल्लेख करना होगा। हमने शून्य से इस विषय को इकट्ठानहीं किया है, परन्तु इसके बजाय हम इसके शब्दों एवं कार्यों से देखेंगे कि शैतान कैसे काम करता है, वह मानवजाति को कैसे भ्रष्ट करता है, उसके पास किस प्रकार का स्वभाव है और उसका चेहरा किसके समान है। अतः इस स्त्री ने सर्प से क्या कहा था? जो कुछ यहोवा परमेश्वर ने स्त्री से कहा था उसने उसे सांप के सामने दोहराया। जो कुछ उसने कहा था उसके द्वारा न्याय करते हुए, जो कुछ परमेश्वर ने उससे कहा था क्या उसने उन सबकी पुष्टि की? वह इसकी पुष्टि नहीं कर सकती थी, क्या वह कर सकती थी? एक ऐसे प्राणी के रूप में जिसे नए रूप में सृजा गया था, उसके पास भले एवं बुरे को परखने की कोई योग्यता नहीं थी, न ही उसमें उसके आस पास की किसी भी चीज़ को जानने की योग्यता थी। ऐसे शब्द जो उसने सर्प से कहा था वे हमें बताते हैं कि उसने अपने हृदय में सही रीति से परमेश्वर के वचनों की पुष्टि नहीं की थी; उसके पास संशयवादी मनोवृत्ति थी। अतः जब सर्प ने देखा कि स्त्री के पास परमेश्वर के वचनों के प्रति कोई निश्चित मनोवृत्ति नहीं है, तो उसने कहा, "तुम निश्चय ही न मरोगे: वरन् परमेश्वर आप जानता है कि जिस दिन तुम उसका फल खाओगे उसी दिन तुम्हारी आखें खुल जाएंगी, और तुम भले बुरे का ज्ञान पाकर परमेश्वर के तुल्य हो जाओगे।" क्या इन शब्दों में कुछ ग़लत है? (हाँ।) क्या ग़लत है? इस वाक्य को पढ़ें। (और सर्प ने स्त्री से कहा, "तुम निश्चय ही न मरोगे: वरन् परमेश्वर आप जानता है कि जिस दिन तुम उसका फल खाओगे उसी दिन तुम्हारी आखें खुल जाएंगी, और तुम भले बुरे का ज्ञान पाकर परमेश्वर के तुल्य हो जाओगे।") इसे पढ़ने के बाद, क्या तुम लोग कुछ महसूस करते हो? जब तुम सब इस वाक्य को पढ़ना समाप्त कर लेते हो, तो क्या तुम लोगों को सर्प के इरादों का कोई आभास होता है? (हाँ।) सर्प के पास क्या इरादे हैं? (मनुष्य को पाप करने के लिए लुभाने हेतु।) वह उस स्त्री को लुभाना चाहता है ताकि वह परमेश्वर के वचनों को ध्यान से सुनने से उसे रोके, परन्तु क्या उसने इसे सीधे तौर पर कहा था? (नहीं।) उसने सीधे तौर पर नहीं कहा था, अतः हम कह सकते हैं कि वह बहुत ही चालाक है। वह अपने इच्छित उद्देश्य तक पहुंचने के लिए धूर्त एवं कपटपूर्ण तरीके से इसके अर्थ को व्यक्त करता है जिससे यह मनुष्य के भीतर ही छिपा रहे—यह सर्प की धूर्तता है। शैतान ने सदा इस प्रकार से ही बातचीत और कार्य किया है। एक अर्थ या दूसरे अर्थ की पुष्टि किए बिना ही, वह कहता है "निश्चय नहीं।" परन्तु इसे सुनने के बाद, क्या इस अबोध स्त्री का हृदय द्रवित हुआ था? (हाँ।) शैतान प्रसन्न हो गया चूँकि उसके शब्दों ने इच्छित प्रभाव को प्राप्त कर लिया था—यह सर्प का धूर्त इरादा था। इसके अतिरिक्त, एक परिणाम का वादा करके जिसे मनुष्य एक अच्छा परिणाम मानता था, उसने उसे बहका दिया था, यह कहते हुए कि, "जिस दिन तुम उसका फल खाओगे उसी दिन तुम्हारी आखें खुल जाएंगी।" इसलिए वह विचार करती है, "मेरी आखों का खुलना तो एक अच्छी बात है!" तब सर्प और भी अच्छे शब्दों को बोलता है, ऐसे शब्द जो मनुष्य के लिए अनजान हैं, ऐसे शब्द जो उन लोगों के ऊपर प्रलोभन का एक बड़ा सामर्थ्य रखते हैं जो उन्हें सुनते हैं: "और तुम भले बुरे का ज्ञान पाकर परमेश्वर के तुल्य हो जाओगे।" क्या ये शब्द उसके लिए बहुत ही अधिक प्रलोभन देनेवाले हैं? (हाँ।) यह किसी ऐसे के समान है जो तूझे कहता है: "तुम्हारे चेहरे को बहुत ही अच्छी तरह आकार दिया गया है। बस नाक के पास थोड़ा सा छोटा रह गया है, परन्तु यदि तू इसे सुधार ले, तो तेरी सुन्दरता विश्वस्तरीय होगी!" क्योंकि कोई ऐसा व्यक्ति जिसने कभी सौन्दर्य शल्यचिकित्सा नहीं कराना चाहा है, क्या इन शब्दों को सुनकर उनका हृदय द्रवित नहीं हो जाएगा? (हाँ।) अतः क्या ये शब्द प्रलोभन देने वाले हैं? क्या यह प्रलोभन तेरी परीक्षा ले रहा है? क्या यह एक परीक्षण है? (हाँ।) क्या परमेश्वर ऐसी बातें कहता है जो इसके समान है? (नहीं।) क्या इसके विषय में परमेश्वर के वचनों में कोई संकेत था जिसे हमने बस अभी अभी देखा था? (नहीं।) क्यों? क्या परमेश्वर उसे कहता है जिसे वह अपने दिल में सोचता है? क्या मनुष्य परमेश्वर के वचनों के माध्यम से उसके हृदय को देख सकता है? (हाँ।) परन्तु जब सर्प ने स्त्री से उन शब्दों को कहा था, तब क्या तू उसके हृदय को देख सकता था? (नहीं।) और मनुष्य की अज्ञानता के कारण, सर्प के शब्दों के द्वारा उन्हें आसानी से बहकाया गया था, उन्हें आसानी से कांटे में फंसाया गया था, और आसानी से ले जाया गया था। अतः क्या तू शैतान के इरादों को देख सकता था? जो कुछ उसने कहा था क्या तू उसके पीछे के उद्देश्य को देख सकता था? क्या तू उसकी साजिश एवं उसकी धूर्त युक्तियों को देख सकता था? (नहीं।) शैतान की बातचीत के तरीके के द्वारा किस प्रकार के स्वभाव को दर्शाया जाता है? इन शब्दों के माध्यम से तूने शैतान में किस प्रकार का सार देखा है? (बुरा।) बुरा। क्या यह भयानक है? कदाचित् ऊपर से वह तुझ पर मुस्कुराता है या किसी भी प्रकार की भाव भंगिमा को प्रकट नहीं करता है। परन्तु अपने हृदय में वह गणना कर रहा है कि किस प्रकार अपने उद्देश्य तक पहुंचा जाए, और यही वह उद्देश्य है जिसे देखने में तू असमर्थ है। तब तू उन सभी प्रतिज्ञाओं के द्वारा बहकाया जाता है जो वह तुझसे करता है, उन सभी फायदों के द्वारा बहकाया जाता है जिनके विषय में वह बात करता है। तुझे वे अच्छे दिखाई देते हैं, और तुझे महसूस होता है कि जो कुछ वह कहता है वह और भी अधिक उपयोगी है, और जो कुछ परमेश्वर कहता है उससे भी अधिक बड़ा है। जब यह होता है, तब क्या मनुष्य एक अधीन कैदी नहीं बन जाता है? (हाँ।) अतः क्या इसका अर्थ यह है कि शैतान के द्वारा उपयोग किया जाना पैशाचिक नहीं है? तू स्वयं को नीचे डूबाने देता है। बिना कुछ किए, इन दो वाक्यों द्वारा तुझसे खुशी-खुशी इसका अनुसरण करवाया जाता है, तुझसे इसका पालन करवाया जाता है। इसके उद्देश्य को प्राप्त कर लिया गया है। क्या ऐसा ही नहीं है? (हाँ।) क्या यह इरादा भयंकर नहीं है? क्या यह शैतान का असली चेहरा नहीं है? (हाँ।) शैतान के शब्दों से, मनुष्य उसके भयंकर इरादों को देख सकता है, उसके भयंकर चेहरे और उसके सार को देख सकता है। क्या यह सही नहीं है? (हाँ।) बिना समीक्षा किए, इन वाक्यों की तुलना करके, शायद तू सोच सकता है कि यहोवा के वचन सुस्त, साधारण एवं सामान्य हैं, यह कि वे परमेश्वर की ईमानदारी की स्तुति करने के विषय में बहुत अधिक ध्यान दिए जाने के लायक नहीं हैं। जब हम शैतान के शब्दों और उसके भयंकर चेहरे को लेते हैं और उन्हें एक महीन परत के रूप में उपयोग करते हैं, फिर भी, क्या आज के लोगों के लिए परमेश्वर के ये वचन बड़ा प्रभाव रखते हैं? (हाँ।) इस महीन परत के माध्यम से, मनुष्य परमेश्वर की पवित्र त्रुटिहीनता का आभास कर सकता है। क्या ऐसा कहने में मैं सही हूँ? (हाँ।) हर एक शब्द जिसे शैतान कहता है साथ ही साथ उसके प्रयोजन, इसके इरादे और जिस रीति से वह बोलता है—वे सब मिलावटी हैं। उसके बोलने के तरीके की मुख्य विशेषता क्या है? तुझे बिना दिखाए ही वह तुझे मोहित करने के लिए वाक्छल का उपयोग करता है, न ही वह तुझे यह परखने देता है कि उसका उद्देश्य क्या है; वह तुझे चारे को लेने देता है, और तुझसे अपनी स्तुति करवाता है और अपनी विशेष योग्यताओं के गीत गवाता है। क्या यह मामला है? (हाँ।) क्या यह शैतान की सतत चाल नहीं है? (हाँ।)

(इ) शैतान सामाजिक चलन को मनुष्य को दूषित करने के लिए कैसे उपयोग करता है।

क्या सामाजिक चलन एक नई घटना है? (नहीं) तो फिर वे कब प्रारम्भ हुए? क्या यह कहा जा सकता है कि जब से शैतान ने मनुष्य को दूषित करना आरंभ किया तभी से सामाजिक चलन शुरु हुआ? (हां) सामाजिक चलन में क्या शामिल है? (कपड़ों की शैली और श्रृंगार) यह ऐसी कुछ चीज़ें हैं जिनसे लोगों का अक्सर सामना होता है। कपड़ों की शैली, फैशन, चलन यह एक छोटा पहलू है। क्या और भी कुछ है? क्या वह कहावत भी कुछ मायने रखती है जिसकी लोग अक्सर चर्चा करते हैं? क्या वह जीवनशैली भी मायने रखती है जिसकी लोग कामना करते हैं? क्या संगीत सितारे, विख्यात लोग, पत्रिकाएं और उपन्यास जिन्हें लोग पसंद करते हैं मायने रखती हैं? (हां) आपके विचार में इस चलन का कौन सा पहलू लोगों को दूषित करने के योग्य है? इन चलनों में से कौन सा आपके लिए बहुत मोहक है? कुछ लोग कहते हैं कि हम इतनी उम्र में पहुंच गए है। हम चालीस, पचास, साठ, सत्तर या अस्सी के हैं अब हम इस चलन में कहां जमते हैं और अब उन चीज़ों पर हमारा ध्यान नहीं जाता। क्या यह सही है? (नहीं) दूसरे कहते हैं कि हम विख्यात लोगों के पीछे नहीं भागते, यह सबकुछ किशोरों और नौजवानों के लिए है; हम फैशनवाले कपड़े भी नहीं पहनते, यह उन लोगों के लिये है जो अपनी छवि को लेकर काफी सतर्क रहते हैं। तो फिर इन में से कौन मनुष्य को दूषित करने के योग्य है? (मशहूर कहावत) क्या ये कहावतें लोगों को दूषित कर सकती हैं? मैं आपको एक बताता हूं आप देखिये कि यह लोगों को दूषित करती है या नहीं, "दाम संवारे सारे काम।" क्या यह चलन है? क्या यह चीज़ उस फैशन और स्वादिष्ट भोजन के चलन से भी ज़्यादा खराब नहीं है जिसका ज़िक्र आप कर चुके हैं? (हां।) "दाम संवारे सारे काम।" यह शैतान की विचारधारा है और यह हर मानव समाज के प्रचलन में है। आप कह सकते हैं कि यह एक चलन है क्योंकि यह प्रत्येक के अंदर डाला गया और अब उनके हृदय में पैठ गया है। लोगों ने आरंभ में इसे स्वीकार नहीं किया लेकिन फिर धीरे-धीरे इसके आदी होते चले गये और जब उनका वास्तविक जीवन से सम्पर्क हुआ, तब उन्होंने धीरे-धीरे इसे मौन सहमति दे दी, उसके अस्तित्व को माना और आखिरकार अपनी सहमति की भी मुहर लगा दी। क्या यह सही है? (हां) क्या यही तरीका नहीं है जिससे शैतान मनुष्य को बर्बाद कर रहा है? शायद आप जो यहां बैठे हैं इस कहावत को उस परिमाण में नहीं समझते, लेकिन इस कहावत को देखने और समझने का प्रत्येक का अपना नज़रिया है, जो इस बात पर निर्भर है कि उनके आसपास किस प्रकार की चीज़े घटित हुई हैं और इस विषय में उनका अपना अनुभव क्या कहता है, सही है न? चाहे इस कहावत से किसी का कितना ही अनुभव रहा हो, इसका किसी के हृदय पर कितना नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है? (लोग सोचेंगे कि पैसा कुछ भी कर सकता है और वे पैसे का आदर करेंगे।) इस संसार में इंसानी स्वभाव के ज़रिये, इसमें यहां बैठे लोग भी शामिल हैं, लोगों की कुछ चीज़ें प्रकट होती हैं। इसकी व्याख्या कैसे की जायेगी? यह पैसे की उपासना है। क्या इसे किसी के दिल में से निकालना कठिन है? यह बहुत कठिन है! ऐसा जान पड़ता है कि शैतान का मनुष्य को दूषित करना सचमुच व्यापक है। क्या हम ऐसा कह सकते हैं? (हां) तो जब शैतान मनुष्य को इस चलन के ज़रिये दूषित कर लेता है, यह चीज़ उनमें कैसे अभिव्यक्त होती है? क्या आपको नहीं लगता कि बिना पैसे के इस दुनिया में आप एक दिन भी जीवित नहीं रह सकते, एक दिन भी असम्भव होगा? (हां) लोगों की हैसियत और सम्मान इस बात पर निर्भर करता है कि उनके पास कितना पैसा है, गरीब की कमर शर्म से झुकी हुई है जबकि धनी अपने उच्च स्तर का मजा लेते रहते हैं। वे ऊंचे पर घमंड से खड़े होकर, ज़ोर से बोलते हैं और अंहकार से जीते हैं। यह कहावत और चलन लोगों को क्या देते हैं? क्या बहुत से लोग पैसा पाने को ही सबकुछ नहीं समझते? क्या बहुत से लोग और पैसा कमाने के पीछे अपनी प्रतिष्ठा और ईमानदारी का बलिदान नहीं कर देते? क्या और बहुत से लोग अपने काम को अंजाम देने और परमेश्वर को खोजने का अवसर पैसे के लिए नहीं खो देते हैं? क्या यह लोगों के लिए हानि नहीं है? (हां) क्या यह शैतान का अशुभ कार्य नहीं है कि इस तरीके से कहावत के उपयोग से मनुष्य को इस हद तक दूषित करे? क्या यह दुर्भावनापूर्ण चाल नहीं है? जैसे आप इस कहावत का विरोध करने से लेकर अंततः उसे सच स्वीकार करने तक बहते जाते हैं, आपका दिल पूरी तरह से शैतान की गिरफ्त में आ जाता है, और इस तरह आप अनजाने में उसी के साथ जीने लगते हैं। इस कहावत ने आप पर किस हद तक असर डाला है? हो सकता है कि आप सच्चा मार्ग जानते हों, हो सकता है आप सत्य को जानते हों, परन्तु आपमें इतनी शक्ति नहीं कि आप उसका पालन कर सको। हो सकता है आप परमेश्वर के वचन को स्पष्टता से जानते हैं, पर आप कीमत चुकाने को तैयार नहीं, कीमत चुकाने के लिये दुख उठाने को तैयार नहीं। बल्कि अंत तक परमेश्वर के विरुद्ध जाने के लिये आप अपना भविष्य और नियति त्यागने को भी तैयार हो जाएँगे। परमेश्वर क्या कहता है इससे कोई मतलब नहीं, परमेश्वर क्या करता है, उससे कोई सरोकार नहीं, भले ही आपको इसका कितना भी अहसास हो कि परमेश्वर आपसे कितना गहरा और महान प्रेम करता है, आप अपने ही रास्ते चलते रहेंगे और इस कहावत की कीमत चुकाएंगे। इसका मतलब यह है कि यह कहावत पहले से ही आप के विचारों और व्यवहारों पर नियंत्रण करती है और आप अपना भाग्य भी इसी कहावत से नियंत्रित कराते हैं और इस कहावत के लिए आप सब कुछ त्याग सकते हैं। लोग ऐसा करते हैं, वे इस कहावत द्वारा नियंत्रित किए जाते हैं और इस के द्वारा चलाए जाते हैं। क्या यह शैतान का मनुष्यों को दूषित करने का प्रभाव नहीं है? क्या यह शैतान की अवधारणा और दूषित स्वभाव आपके हृदय में जड़ नहीं पकड‌ते जा रहे हैं? यदि आप ऐसा करते हैं, तो क्या शैतान ने अपना लक्ष्य प्राप्त नहीं कर लिया है? (हां) क्या आप देख सकते हैं कि शैतान ने मनुष्य को किस तरह से दूषित किया है? (नहीं) आपने यह नहीं देखा। क्या आप इसे महसूस कर सकते हैं? (नहीं) आपने इसे महसूस नहीं किया। क्या आप यहां शैतान की बुराई देखते हैं (हां) शैतान हर समय और हर जगह मनुष्यों को दूषित करता है। शैतान मनुष्य के लिए अपना विरोध करना, असम्भव बना देता है और इसके लिए मनुष्य को असहाय बना देता है। शैतान आपसे अपने विचार, अपने दृष्टिकोण, और उनसे जो बुरी बातें आती हैं, इन परिस्थितियों में जहां आप अज्ञानता में हैं, और जब आपको यह भी मालूम नहीं है कि आपके साथ क्या हो रहा है, उन्हें स्वीकार करवाता है। लोग बिना किसी अपवाद के इन बातों को पूरी तरह ग्रहण करते हैं। वे खुश होते हैं और उन बातों को धरोहर की तरह रखते हैं, वे उन चालाकियों में आ जाते हैं और उनके हाथों में खिलौनों की तरह खेलते हैं। और इस प्रकार शैतान का मनुष्य को दूषित करना और गहरा होता जाता है।

पूर्व में उल्लेखित वे तरीके, जो शैतान लोगों को दूषित करने के लिए उपयोग करता है, प्रत्यक्ष है और प्रत्येक ने उनका अनुभव किया है; शैतान उनका उपयोग करता है और उनसे बचना सम्भव नहीं। मनुष्य के पास ज्ञान और कुछ वैज्ञानिक सिद्धांत हैं, मनुष्य पारम्परिक संस्कृति के प्रभाव में जीता है, और प्रत्येक पारम्परिक संस्कृति का वारिस है। मनुष्य शैतान के द्वारा दी गई पारम्परिक संस्कृति को पालन करने के लिए बाध्य है, और इसके साथ ही उन सामाजिक रीति-रिवाज़ के साथ सामंजस्य बैठाकर कार्य करने के लिये बाध्य है जो शैतान ने मनुष्यों को उपलब्ध कराये हैं। शैतान से अभिन्न होने के बावजूद, जो कुछ शैतान हर समय करता है उसमें सहयोग देना, उसकी धूर्तता, हठ, दुर्भावना और बुराई को स्वीकारना - शैतान के इन स्वभावों को आत्मसात करने के बाद - क्या मनुष्यों के बीच में और संसार में रहते हुए मनुष्य खुश है या दुखी? (दुखी) आप ऐसा क्यों कहेंगे? (वह इन बातों से बंधा हुआ है और उसका जीवन एक कड़वा संघर्ष है।) है न? हो सकता है आपने किसी ऐसे व्यक्ति को देखा हो जो चश्मा लगाए हुए है और दिखने में बहुत बुद्धिमान लगता हो; वह कभी चिल्लाता न हो, हमेशा बोलने में निपुण, बुद्धि सम्पन्न हो, और इसके अलावा, क्योंकि वह बहुत आयु का है, हर तरह के हालत से होकर गुजरा होगा और बहुत अनुभवी भी होगा, हो सकता है कि वह किसी भी मामले में, चाहे छोटा हो या बड़ा, विस्तार और अधिकार से बोल सकता हो, और जो कहता हो उसका उसके पास मजबूत आधार हो, हर बात की प्रमाणिकता और तर्क के लिये उसके पास सिद्धांत भी हों; लोग उसका व्यवहार, व्यक्तित्व, उसका आचरण, उसकी निष्ठा और उसका चरित्र देखकर सोचते हों कि उस व्यक्ति में तो कोई दोष नहीं है। ऐसे व्यक्ति मौजूदा सामाजिक रीतियों का विशेष ध्यान रखते हैं और कभी पुराने ढंग में नहीं देखे जाते; ऐसे व्यक्ति अग्रगण्य और आधुनिक शैली के होते हैं। ऐसा व्यक्ति वृद्ध होते हुये भी वक्त के साथ कदम मिलाकर चलता है और कभी पुराना नहीं पड़ता है। ऊपर से देखने पर ऐसे व्यक्ति में कोई दोष दिखाई नहीं देते, लेकिन अंदर से ऐसा व्यक्ति शैतान के द्वारा पूरी तरह से दूषित हो चुका होता है। ऊपर से कुछ भी गलत नहीं है, वह विनम्र है, सुसंस्कृत है, ज्ञानवान है और एक खास नैतिकता रखता है, वह निष्ठावान है और नौजवानों जितनी ही जानकारी रखता है। फिर भी, उसके स्वभाव और उसके तत्व के सम्बन्ध में, यह व्यक्ति शैतान का पूर्ण और जीवित नमूना है। वह शैतान का रूप और छवि है। यह शैतान के मनुष्य को दूषित करने का "फल" है। मैंने जो कहा हो सकता है कि वह आपके लिए दुखदायी हो, परन्तु यह सब सच है। जिस ज्ञान का मनुष्य अध्ययन करता है, जो विज्ञान वह समझता है और सामाजिक रीति में ठीक से व्यवस्थित होने के लिए वह जिस राह पर वह चलता है, बेशक ये शैतान के द्वारा दूषित करने वाले औजार हैं। यह बिल्कुल सच है। इसलिए मनुष्य एक दूषित स्वभाव में जीता है जो कि शैतान द्वारा पूरी तरह से भ्रष्ट किया गया है और मनुष्य के पास यह जानने का कोई तरीका नहीं है कि परमेश्वर की पवित्रता क्या है या परमेश्वर का तत्व क्या है। ऐसा इसलिए है क्योंकि शैतान मनुष्यों को जिस तरीके से दूषित करता है, उसमें ऊपरी सतह पर कोई दोष नहीं ढूंढ सकता, किसी के व्यवहार द्वारा कोई यह नहीं बता सकता कि उसमें कुछ कमी है। प्रत्येक व्यक्ति अपने कार्य पर सामान्य तौर पर जाता है और सामान्य जीवन जीता है, वह सामान्य तौर से पुस्तकें और समाचार पत्र पढता है, सामान्य तौर पर अध्ययन करता और बोलता है, कुछ लोगों ने तो यहां तक सीख लिया है कि नैतिकता का मुखौटा कैसे पहनें, जिससे उनके अभिवादन नम्र हों, शिष्ट बनें, दूसरों को समझने वाले बनें, मित्रवत बनें, दूसरों के मददगार बनें, दानशील बनें, और दूसरों के साथ हड़बड़ी करने वाला बनने से बचें और दूसरों का फायदा उठाने से बचें। जबकि उनके मन का दूषित शैतानी स्वभाव उनमें गहरी जड़ पकड़ चुका है। यह तत्व बाहरी प्रयासों से परिवर्तित नहीं किया जा सकता है। परमेश्वर के तत्व के कारण मनुष्य परमेश्वर की पवित्रता को समझ नहीं सकता, इस के बावजूद कि परमेश्वर की पवित्रता का तत्व मनुष्य के लिए सार्वजनिक कर दिया गया है, मनुष्य इसे गम्भीरता से नहीं लेता। ऐसा इसलिए है कि शैतान ने पहले से ही मनुष्य के एहसास, विचार, दृष्टिकोण और चिंतन को विभिन्न साधनों से अपने कब्जे में कर लिया है। यह कब्जा और भ्रष्टता अस्थायी या प्रासंगिक नहीं है; यह हर जगह और हर समय विद्यमान है। इसलिए बहुत से लोग जो 3 या 4 साल से या 5 या 6 साल से परमेश्वर पर विश्वास करते चले आ रहे हैं, वे अभी भी उन विचारों और दृष्टिकोण को, जो शैतान ने उनमें बैठा दिए हैं, ऐसे पकड़े हुए हैं जैसे कि कोई खज़ाना हो। क्योंकि मनुष्य ने बुरे, अहंकारी और शैतान के द्रोही स्वभाव को स्वीकार कर लिया है, और इस तरह मनुष्य अक्सर आपसी रिश्तों के अंतर्द्वंद्व में फंस जाता है, तर्क-वितर्क और असामंजस्यता की स्थिति में उलझ जाता है, और यह सब परिणाम है शैतान के अहंकारी स्वभाव का। यदि शैतान ने मानवजाति को सकारात्मक बातें दी होतीं - उदाहरण के लिए यदि मनुष्य द्वारा स्वीकृत पारम्परिक संस्कृति के कंफ्यूशीवाद और ताओवाद को अच्छा माना जाता तो उन्हें स्वीकार करने के बाद उसी प्रकार की मानसिकता वाले व्यक्तियों को आपस में मिलजुलकर रहना चाहिये था। जिन्होंने उन वादों को स्वीकार कर लिया था तो उनके बीच इतना विभाजन क्यों है? क्यों है ऐसा? यह इसलिए हुआ है क्योंकि ये बातें शैतान द्वारा दी गई हैं और शैतान लोगों में विभाजन उत्पन्न करता है। शैतान जो बातें देता है, वे धरातल पर कितनी भी प्रतिष्ठित और महत्वपूर्ण दिखाई पड़ें, पर कोई मतलब नहीं, वे मनुष्यों के जीवन में केवल घमण्ड़ और शैतान के बुरे स्वभाव की धूर्तता के अलावा और कुछ नहीं लातीं। क्या यह सही नहीं है? कुछ लोग जो अपने आप को छद्मरूप दे सकते हैं, ज्ञान का भंडार रखते हैं, जिनकी अच्छी परवरिश हुई है, उनके लिये अपने शैतानी स्वभाव को छुपा पाना बहुत कठिन होगा। कोई व्यक्ति अपने आपको कितना भी छिपाए, भले ही आप उसे संत समझें, या आप सोचें कि वह आदर्श व्यक्ति है, या आप सोचें कि वह फरिश्ता है, आप उसे कितना ही शुद्ध क्यों न मानें, उनका जीवन पर्दे के पीछे क्या होगा? उनके स्वभाव के प्रकाशन में आप किस तत्व को देखोगे? बिना किसी शक के आप शैतान का बुरा स्वभाव देखेंगे। क्या कोई ऐसा कह सकता है? (हां) उदाहरण के लिए ऐसा कोई व्यक्ति जो आप के निकट है जिसे आप सोचते हैं कि वह अच्छा व्यक्ति है, या आपका विचार उसके लिए अच्छा व्यक्ति होने का है, जिसे आप एक आदर्श व्यक्ति मानते हैं। अपनी वर्तमान हैसियत में आपके उसके बारे में क्या विचार हैं? पहले, आप यह देखोगे कि इस प्रकार के व्यक्ति में मानवता है या नहीं, क्या वे ईमानदार हैं, क्या उन्हें लोगों से सच्चा प्यार है, क्या उनके वचन और काम लाभप्रद हैं और दूसरों की मदद करते हैं। (नहीं) दिखावे की दयालुता, प्रेम या अच्छाई यहां प्रदर्शित होती है, आखिर यह है क्या? यह सब कुछ छलावा है, झूठ है। यह परदे के पीछे मुखौटे का एक गुप्त बुरा उद्देश्य है, उस व्यक्ति को प्रिय और पूजित बनाना है। क्या आप इसे स्पष्टता से देखते हैं? (हां)

जो विधियां शैतान लोगों को दूषित करने के लिए उपयोग में लाता है क्या वह मनुष्यता लाती हैं? क्या इसके विषय में कुछ भी सकारात्मक है? (नहीं) पहली बात, क्या मनुष्य अच्छे और बुरे में अंतर कर सकता है? (नहीं) देखिये, इस संसार में चाहे कोई बड़ा व्यक्ति हो, या कोई समाचार पत्र हो, या कोई रेडियो स्टेशन हो, वे सब यही कहते हैं कि यह या वह अच्छा या बुरा है, क्या वह सटीक है? (नहीं) क्या वह सही है? (नहीं) क्या घटनाओं और लोगों के बारे में उनका आकलन उचित है? (नहीं)। क्या इसमें कोई सच्चाई है? (नहीं) क्या यह संसार या मानवता, सकारात्मक और नकारात्मक बातों का आकलन सत्य के मानक के आधार पर करते हैं? (नहीं)। लोगों में वह योग्यता क्यों नहीं है? लोगों ने ज्ञान का इतना अधिक अध्ययन किया और विज्ञान के विषय में इतना जाना, तो क्या उनकी योग्यताएं इतनी महान नहीं हैं? वे सकारात्मक और नकारात्मक बातों में अंतर क्यों नहीं कर पाते? ऐसा क्यों है? (क्योंकि लोगों में सच्चाई नहीं है, विज्ञान और ज्ञान सत्य नहीं हैं।) प्रत्येक वस्तु जो शैतान मानवता के लिए लाता है उसमें बुराई और भ्रष्टाचार है, और उसमें सच, जीवन और सन्मार्ग का अभाव होता है। मनुष्य के लिये बुराई और भ्रष्टाचार लाने वाले शैतान क्या प्रेम हो सकता है? क्या आप कह सकते हैं कि मनुष्य के पास प्रेम है? कुछ लोग कह सकते हैं: "आप गलत हैं, इस सारे संसार में बहुत से लोग हैं जो गरीब और बेघर लोगों की मदद करते हैं, क्या वे अच्छे लोग नहीं हैं? कई धर्मार्थ संगठन भी हैं जो भले कार्य करते हैं, क्या उनके सब काम लोगों के भले के लिए नहीं हैं?" तो फिर इसके विषय में हम क्या कहें? शैतान मनुष्य को दूषित करने के लिए बहुत-सी अलग-अलग विधियों और सिद्धांतों का उपयोग करता है; क्या यह मनुष्य का दूषित होना अस्पष्ट धारणा है? नहीं यह अस्पष्ट नहीं है। शैतान कुछ व्यवहारिक बातें भी करता है जिनमें बहुत-सी बुरी बातों को ऐसा प्रस्तुत करता है जैसे अच्छी बात हो, और तो और, शैतान धोखेबाजी के कार्य भी, अपने निहित भाव और उद्देश्य के लिए करता है। दूषित लोग और शैतान एक जैसे हैं, वे भी इस संसार में हैं और समाज में एक दृष्टिकोण या सिद्धांत को बढ़ावा देते हैं। प्रत्येक राजवंश और प्रत्येक युग में वे एक सिद्धांत को बढ़ावा देते और मनुष्यों के भीतर कुछ विचार संस्थापित करते हैं। ये विचार और सिद्धांत धीरे-धीरे लोगों के दिमाग में जड़ पकड़ लेते हैं, और तब मनुष्य उन विचारों और सिद्धांतों के साथ जीना प्रारम्भ कर देते हैं; क्या वे अज्ञानतावश शैतान नहीं बन जाते हैं? क्या लोग शैतान के साथ एकाकार नहीं हो गये हैं? जब लोग शैतान के साथ एक हो जाते हैं, तब अंत में उनका व्यवहार परमेश्वर के प्रति क्या होता है, क्या वही आचरण नहीं हो जाता जो शैतान का परमेश्वर के प्रति है? कोई भी इसे मानने का साहस नहीं कर सकता, सही है न? यह बहुत भयानक है। मनुष्य शैतान हैं, और उनका स्वभाव ठीक शैतान के स्वभाव जैसा ही है। मैं क्यों कहता हूं कि शैतान का स्वभाव बुरा है? जो शैतान ने किया और जो बातें शैतान ने प्रकाशित की हैं, उनके आधार पर इसका निर्धारण और विश्लेषण किया गया है; यह कहना गलत नहीं होगा कि शैतान दुष्ट है। अगर मैं कहूं शैतान बुरा है, तो आप क्या सोचेंगे? आप सोचेंगे, "सही बात है, शैतान बुरा है।" फिर मैं आप से पूछूंगाः "शैतान का कौनसा पहलू बुरा है?" यदि आप कहें: "शैतान का परमेश्वर का विरोध करना बुरा है" आप अभी भी सफाई के साथ नहीं बोल रहे होंगे। अब हमने इस प्रकार से सुनिश्चित वर्णन किया; क्या आपको शैतान की बुराई के सार के विशिष्ट अंशों की समझ है? (हां) अब जबकि आप को शैतान के बुरे स्वभाव की समझ आ गई है, तो अपने स्वयं के बारे में आप कितना समझते हैं? क्या ये बातें जुड़ी हुई हैं? (हां) क्या यह जुड़ना आपको दुख देता है? (नहीं) क्या यह आपके लिए सहायक है? (हां) यह कितना सहायक है? (बहुत सहायक है) आइए सुस्पष्टता से बात करें, मैं अस्पष्ट शब्द नहीं सुनूंगा। यह "बहुत बड़ा" का क्या अभिप्राय है? (हम जानते हैं कि परमेश्वर किन बातों से घृणा करता है, कौन सी बातें परमेश्वर के विरोध में जाती हैं; हमारे दिल उन बातों को लेकर कुछ कुछ साफ हैं।) क्या और कुछ भी इसमें जोड़ने के लिए है? जब मैं परमेश्वर की पवित्रता के तत्व के विषय में संगति करता हूं तो क्या यह भी आवश्यक है कि मैं शैतान की बुराई के तत्व के बारे में भी संगति करूं? आपकी क्या राय है? (हां यह आवश्यक है) क्यों? (शैतान की बुराई परमेश्वर की पवित्रता को ऊंचे पर स्थापित करती है।) क्या यह ऐसा ही है? यह आंशिक तौर पर सही है कि बिना शैतान की बुराई के, लोग परमेश्वर की पवित्रता को नहीं जान पाएंगे; यह सही है। फिर भी यदि आप कहते हैं कि परमेश्वर की पवित्रता का अस्तित्व तभी है जब सामने शैतान की बुराई होती है। क्या यह सही है? यह तर्क गलत है। परमेश्वर की पवित्रता परमेश्वर का अंतर्निहित तत्व है; यद्यपि परमेश्वर इसे प्रगट करता या कार्य करता है, यह अंतर्निहित तत्व उसमें विद्यमान है और यह स्वभाविक रूप से प्रकट होता है, यह परमेश्वर में अंतर्भूत है और सदा से अस्तित्व में है, परन्तु मनुष्य उसे देख नहीं सकता। मनुष्य शैतान के दूषित स्वभाव में और दूषित तत्व में रहता है, और मनुष्य पवित्रता को या परमेश्वर की पवित्रता के विशिष्ट अंश को नहीं जानता है। क्या यह सही है? तो फिर क्या आप सोचते हैं कि हमें पहले शैतान के बुरे तत्व के बारे में संगति करनी आवश्यक है? (हां, आवश्यक है।) देखिये, हमने परमेश्वर की विशिष्टताओं के कई पहलुओं पर संगति की है और हमने शैतान के तत्व की चर्चा भी नहीं की, सही? कुछ लोग अपना शक कुछ इस प्रकार जाहिर कर सकते हैं, "आप केवल परमेश्वर के विषय में बात करते हैं, आप हर समय शैतान लोगों को दूषित करता है, और शैतान का स्वभाव बुराई है, ऐसा क्यों कह रहे हैं?" क्या आपने इस संदेह का समाधान कर लिया है? (हां) कैसे आपने इस संदेह का समाधान किया? (परमेश्वर की संगति के द्वारा, अंतर कर लिया कि बुराई क्या है) जब लोग बुराई पर विचार करते हैं और जब उनके पास उसकी एक सटीक परिभाषा होती है, जब लोग बुराई के विशिष्ट अंश और प्रकाशन को देख सकते हैं, बुराई के स्रोत और तत्व को देखते हैं - जब परमेश्वर की पवित्रता की अभी चर्चा होती है - तब लोग स्पष्ट रूप से जान पाएंगे और इसे परमेश्वर की सच्ची पवित्रता के रूप में पहचान पाएंगे। यदि मैं शैतान की बुराई की चर्चा नहीं करता, तो कुछ लोग गलतफहमी में यह विश्वास करेंगे कि लोग जो कुछ समाज में या लोगों के बीच में करते हैं - या इस संसार में करते हैं - वे पवित्रता से सम्बन्धित हो सकता है। क्या यह दृष्टिकोण गलत नहीं है? (हां) तभी तो मैंने शैतान के तत्व की चर्चा की है। आपने इतने वर्षों के अनुभव के द्वारा, परमेश्वर के वचन को देखने से और उसके कार्यों का अनुभव करने से अपने परमेश्वर की पवित्रता की कितनी समझ प्राप्त की है?। इस विषय में खुलकर बताइये। ऐसे शब्दों की आवश्यकता नहीं है जो कानों को अच्छे लगें, बल्कि अपने अनुभव से बोलें, क्या परमेश्वर की पवित्रता केवल उसका प्रेम है? क्या वह केवल परमेश्वर का प्रेम मात्र है जिसे हम उसकी पवित्रता कहते हैं? वह कुछ ज़्यादा ही एक तरफा होगा, सही? वह एक तरफा नहीं होगा क्या? (हां) इसलिए परमेश्वर के प्रेम के अलावा भी परमेश्वर के तत्व के दूसरे पहलू भी हैं जो आपने देखे हैं? (हां) आपने क्या देखा? (परमेश्वर की पवित्रता यह है कि परमेश्वर त्यौहारों और अवकाशों, रीतियों और अंधविश्वासों से घृणा करता है।) अभी आपने महज़ इतना कहा कि परमेश्वर कुछ बातों से घृणा करता है; परमेश्वर पवित्र है, तो इसीलिये वह घ्रणा करता है, क्या आपका यही मतलब है? (हां।) इसके मूल में, परमेश्वर की पवित्रता क्या है? परमेश्वर की पवित्रता में कोई ठोस तत्व ज्ञान नहीं है, वह केवल चीज़ों से घृणा करता है? क्या आप अपने दिमाग में यह सोच रहे हैं, "क्योंकि परमेश्वर इन बुरी बातों से घृणा करता है, इसलिए कह सकते हैं कि परमेश्वर पवित्र है?" क्या यह यहां केवल परिकल्पना नहीं है? क्या यह निष्कर्ष निकालने और न्याय का प्रकार नहीं है? जब परमेश्वर के तत्व को समझने की बात आती है तब सबसे बड़ा निषेध क्या है? (सच्चाई को पीछे छोड़ देना)। जब हम सिद्धांत की बात करने में वास्तविकता को पीछे छोड़ देते हैं, तो यह सर्वाधिक निषेध की बात होती है। और कुछ? (अटकलबाज़ी और कल्पना) अटकलबाज़ी और कल्पना, ये भी बहुत मजबूत निषेध हैं। अटकलबाज़ी और कल्पना उपयोगी क्यों नहीं हैं? क्या उन चीजों को जिनका आप अनुमान लगाते और कल्पना करते हैं उनको वास्तव में क्या देख सकते हैं? (नहीं) क्या वे परमेश्वर का सच्चा तत्व हैं? (नहीं) निषेध और क्या है? परमेश्वर के तत्व के विषय में कर्णप्रिय लगने वाले शब्दों के समूह को गिनना निषेध है क्या? (हां) क्या यह अहंकारी होना या बकवास करना नहीं है? कर्णप्रिय शब्दों के चयन की तरह ही धारणा और अटकलबाज़ी भी बकवास बातें हैं। क्या और कुछ भी है? खाली तारीफ भी बकवास है, सही? (हां) क्या परमेश्वर लोगों को ऐसी बकवास की बातें कहते हुए सुनना पसंद करता हैं? (नहीं, वह नहीं करता) किसी बात का "मजा नहीं लेना" का पर्याय क्या है? (परेशानी महसूस करना) यह सुनकर वह असुविधा महसूस करता है। परमेश्वर लोगों के एक समूह की अगुवाई करता है और उसे बचाता है। और बचाए जाने के बाद लोगों का यह समूह जब उसका शब्द सुनता है तो वह कभी भी यह नहीं समझता कि उसका अर्थ क्या है? कोई पूछ सकता हैः "क्या परमेश्वर अच्छा है?" और वे प्रत्युत्तर देंगे "अच्छा!" "कितना अच्छा?" "इतना अच्छा!" "क्या परमेश्वर मनुष्य से प्रेम करता है?" "हां" "कितना?" "इतना"। "क्या आप परमेश्वर के प्रेम की व्याख्या कर सकते हैं?" "वह सागर से भी ज्यादा गहरा है, आसामान से भी ऊंचा है!" क्या यह बकवास नहीं है? क्या यह वैसा ही निरर्थक नहीं है जैसा अभी आपने कहा, "परमेश्वर शैतान के दूषित स्वभाव से घृणा करता है, इसलिए परमेश्वर पवित्र है?" (हां) क्या अभी आपने जो कहा है वह बकवास नहीं है? ज्यादातर निरर्थक बातें जो कही जाती हैं वे कहाँ से आती हैं? (शैतान से)। वे शैतान से आती हैं। जो निरर्थक बातें कही जाती है, वे मूलत: लोगों की लापरवाही और परमेश्वर के प्रति अश्रद्धा होने के कारण आती है। क्या हम यह कह सकेंगे? (हां) अभी तक आपने समझ प्राप्त नहीं की अभी भी बकवास बातें करते हो, क्या यह गैरज़िम्मेदार होना नहीं है? क्या यह परमेश्वर के प्रति अशिष्ट होना नहीं है? आपने ज्ञान का कुछ अध्ययन किया है, कुछ कारणों को और कुछ तर्कों को समझा है, जिनका आपने यहां उपयोग किया और परमेश्वर को जानने का काम पूरा कर लिया। क्या आप सोचते हैं कि यह सुनकर परमेश्वर असुविधा महसूस करता है? इन विधियों का उपयोग कर आप परमेश्वर को कैसे जान सकते हैं? क्या यह विचित्र नहीं लगता? इसलिए, जब परमेश्वर के ज्ञान की बात आती है, व्यक्ति को बहुत ही अधिक सावधान रहने की आवश्यकता है; जहां आप परमेश्वर को जानते हैं, केवल उतना ही कहें। ईमानदारी से और व्यवहारिकता से बात करें और अपने शब्दों को रोज़मर्रा की सराहना से न सजाएं और चापलूसी न करें; परमेश्वर को इसकी आवश्यकता नहीं और इस प्रकार की बातें शैतान से आती हैं। शैतान का स्वभाव अंहकार है और शैतान चापलूसी और अच्छे शब्द सुनना पसंद करता है। यदि लोग कर्णप्रिय शब्दों की सूची बनाएं जो उन्होंने सीखे और उसे शैतान के लिए इस्तेमाल करें तो शैतान खुश और आनन्दित होगा। परन्तु परमेश्वर को इसकी आवश्यकता नहीं; परमेश्वर चाटुकारिता और चापलूसी पसंद नहीं करता। और उसे इसकी ज़रूरत नहीं कि लोग बकवास बात करें और आंख मूंदकर उसकी प्रशंसा करें। परमेश्वर ऐसी बातों से घृणा करता और उस प्रशंसा और चापलूसी को सुनेगा भी नहीं जो वास्तविकता की लीक से हटकर निकलती है। तो जब लोग आंख मूंदकर परमेश्वर की प्रशंसा करते हैं और जो वे कहते हैं वह उनके हृदय की बातों से मेल नहीं खाती, और वे बेकार में परमेश्वर की शपथ खाते हैं और लापरवाही से उससे प्रार्थना करते हैं, परमेश्वर बिल्कुल भी नहीं सुनता। आप जो कहते हैं आपको उसकी जवाबदारी लेनी चाहिए। यदि आप कुछ नहीं जानते, तो ऐसा कहिए, यदि आप कुछ जानते हैं तो उसे व्यवहारिक रूप से प्रगट कीजिए। अब परमेश्वर की पवित्रता के यथार्थ तत्व के विषय में, क्या आपको इसकी विशिष्ट समझ है? अब आप बकवास करने का साहस नहीं करेंगे, सही? आप निरर्थक बात नहीं कर रहे हैं पर बोलना बंद नहीं कर सकते, तो आप को कुछ समझदारी होना आवश्यक है, सही है? क्या आप इसके बारे में सोच रहे हैं? आप इसे निष्ठापूर्वक सम्भाल रहे हैं, सही? अब आप कुछ बातें कह सकते हैं। (अब मैंने बगावत की जब मैंने अतिक्रमण किया, मैंने परमेश्वर के न्याय और ताड‌‌ना को प्राप्त किया और उसमें मैंने परमेश्वर की पवित्रता को देखा। जब मैं उन परिस्थितियों और वातावरण में पड़ गया जो मेरी अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं थी, तब मैंने इन बातों के लिए प्रार्थना की और मैंने परमेश्वर की इच्छा को पुकारा और परमेश्वर ने अपने वचन के द्वारा मुझे शिक्षा और अगुवाई दी, और मैंने परमेश्वर की पवित्रता को देखा।) यह आपके स्वयं के अनुभव के द्वारा है, सही? (जब परमेश्वर सारे रास्ते में लोगों की अगुवाई करता है और जैसे वह लोगों के ऊपर प्रभुता करता है, उसमें मैं परमेश्वर की पवित्रता को देखता हूं। वास्वत में, जैसा परमेश्वर ने कहा है कि कैसे शैतान मनुष्य को दूषित करता है, और मनुष्य शैतान के भ्रष्टाचार और प्रभाव में जीता आया है, तो मनुष्य का उस पर कोई नियंत्रण नहीं है, मैं सचमुच परमेश्वर की पवित्रता को मनुष्यों में परमेश्वर के कार्य के द्वारा देखता हूँ।) (परमेश्वर ने जो कहा उसमें मैंने देखा है कि मनुष्य शैतान द्वारा इस प्रकार दूषित किया जाता है और उसे नुकसान पहुंचाता है। फिर भी, परमेश्वर ने हमें बचाने के लिए सब कुछ दे दिया है, और इसमें मैं परमेश्वर की पवित्रता को देखता हूं।) यह वास्तविक तरीका है और यह सच्चा ज्ञान है। क्या इसमें कोई अलग ख्याल है? (मेरी समझदारी सही है या नहीं, यह मैं नहीं जानता। उस संगति में जिसमें परमेश्वर हमारे साथ था, शैतान जो कहता और करता है, उसमें मैं शैतान की बुराई देखता हूं। पहली संगति में हमने देखा कि परमेश्वर ने मनुष्य को बताया कि वह क्या खा सकता और क्या नहीं खा सकता है, और परमेश्वर के वचन के स्वच्छता और सीधेपन को प्रकाशित किया; उसके द्वारा मैं परमेश्वर की पवित्रता को देखता हूं। मैं बस यही कह सकता हूं।) हूँ, आपने इन लोगों को जो कहते सुना है उनमें से अधिकांशतः किसके वचनों के लिए आप आमीन कहेंगे? किसका भाषण, किसकी संगति आज हमारी संगति के विषय के सबसे निकट था और सबसे अधिक वास्तविक था? अंतिम बहन की संगति कैसी थी? (अच्छी) जो उसने कहा उस पर आपने आमीन कहा, उसने जो कहा वह क्या सही लक्ष्य पर था? आप स्पष्टता से अपनी बात कहें, आप इस बात की चिंता न करें कि आप गलत हो सकते हैं। (उस बहन के अभी कहे हुए शब्दों में मैंने सुना कि परमेश्वर का वचन खरा और बहुत स्पष्ट है, वह शैतान के चक्करदार शब्दों के समान नहीं है। मैंने परमेश्वर की पवित्रता को इसमें देखा।) यह इसका भाग है। अभी क्या कहा गया आप सबने सुना था? (हां) क्या सही था? (हां) आइए हम ताली बजाकर बहन की प्रशंसा करें। बहुत अच्छा। मैं देखता हूं कि आपने हाल ही की इन दो संगतियों में कुछ प्राप्त किया है, परन्तु आपको लगातार कठिन परिश्रम करते रहना चाहिए। आपके कठिन परिश्रम करने का कारण यह है कि परमेश्वर के तत्व की समझदारी एक बहुत ही गहरा पाठ है; यह ऐसा नहीं है कि कोई आए और एक ही रात में समझ जाए या केवल कुछ ही शब्दों में स्पष्टता से बोल सके।

लोगों के दूषित शैतानी स्वभाव, ज्ञान, दर्शनशास्त्र का प्रत्येक पहलू, लोगों के विचार और दृष्टिकोण और व्यक्तिगत पहलू, उन्हें परमेश्वर के तत्व को पहचानने में सबसे बड़ी बाधा बनते हैं; तो जब आप ये विषय सुनते हैं, तो कुछ विषय आप की पहुंच से बाहर हो सकते हैं, कुछ विषयों को को आप समझ नहीं सकते हो, और कुछ विषयों को आप वास्तविकता के साथ आधारभूत रूप से मिला नहीं पायेंगे। इस सबसे अलग, मैंने आपकी परमेश्वर की पवित्रता की समझ के विषय में सुना है और मैं जानता हूं कि परमेश्वर की पवित्रता के विषय में जो मैंने कहा और संगति की है, अपने हृदय में उसे आपने मानना प्रारम्भ कर दिया है। मैं जानता हूं कि आपके हृदय में परमेश्वर की पवित्रता के तत्व को समझने की इच्छा अंकुरित होने लगी है। पर मुझे और भी आनन्दित क्या करता है? वह यह कि आप में से कुछ परमेश्वर की पवित्रता के ज्ञान को साधारण शब्दों में व्याख्या करने के योग्य हो गए हैं। यद्यपि यह कहने के लिए एक साधारण सी बात है और इसे मैंने पहले भी कहा है कि आप में से अधिकांश के मन में अभी भी यह बात को सहमति मिलना या इसका प्रभाव पड‌ना बाकी है। तथापि, आप में से कुछ ने इन शब्दों को अपने दिल में लिया है यह बहुत अच्छा है और यह एक अच्छी शुरूआत है। मैं आशा करता हूं कि वह विषय जो आपको गम्भीर लगते हैं - या जो विषय आपकी पहुंच से बाहर हैं - आप संगति कायम रखना जारी रखेंगे, और ज्यादा से ज्यादा संगति करेंगे। उन विषयों में जो आपकी पहुंच से बाहर हैं, कोई न कोई आपको और अधिक मार्गदर्शन देता रहेगा। यदि आप उन क्षेत्रों में अधिक संगति करते हैं जो अब आपकी पहुंच में हैं अभी, पवित्रात्मा आप में काम करेगा और आप महान समझदारी को प्राप्त करोगे। समझदारी, परमेश्वर का तत्व और परमेश्वर के तत्व को जानना लोगों के जीवन में अपार सहायता प्रदान करता है। मैं आशा करता हूं कि आप इसमें लापरवाही नहीं बरतेंगे इसे एक खेल की तरह नहीं लेंगे; क्योंकि परमेश्वर को जानना, परमेश्वर में मनुष्य के विश्वास का आधार है और मनुष्य की सत्य और मुक्ति की खोज की नींव है और एक ऐसी चीज़ है जिसे किसी भी कीमत पर छोड़ा नहीं जा सकता। यदि मनुष्य परमेश्वर पर भरोसा रखता है फिर भी परमेश्वर को नहीं जानता, और यदि मनुष्य शब्दों और सिद्धांतों के बीच में जीता रहता है, तो आप कभी भी उद्धार प्राप्त नहीं कर सकते चाहे सत्य के आडम्बरपूर्ण शब्दों के अनुसार आप कार्य करें या जियें। तात्पर्य यह है कि, यदि आपका परमेश्वर पर विश्वास उसको जानने के आधार पर नहीं है, तो आपके विश्वास का कोई अर्थ नहीं है। आप समझ गये न? (हां, हम समझ गये) आज हमारी संगति यहां पर समाप्त होती है।

अब जबकि हमने शैतान के बारे में बात करना समाप्त कर दिया है, तो आओ हम फिर से अपने परमेश्वर के बारे में बात करें। परमेश्वर की छः हजार वर्षीय प्रबंधकीय योजना के दौरान, परमेश्वर की प्रत्यक्ष वाणी के विषय में बहुत थोड़ा सा ही बाइबल में दर्ज किया गया है, और जो कुछ दर्ज किया गया है वह बहुत ही सरल है। अतः आओ हम आदि से प्रारम्भ करें। परमेश्वर ने मनुष्य की सृष्टि की और तब से उसने हमेशा ही मानवजाति के जीवन की अगुवाई की है। चाहे मानवजाति को आशीष देना हो, उन्हें व्यवस्था एवं अपनी आज्ञाओं को देना हो, या जीवन के लिए विभिन्न नियमों का अनुबंध करना हो, क्या आप सब जानते हैं कि इन चीज़ों को करने में परमेश्वर का इच्छित लक्ष्य क्या है? पहला, क्या आप लोग निश्चित तौर पर कह सकते हैं कि वह सब कुछ जो परमेश्वर करता है वह मानवजाति की भलाई के लिए है? (हाँ, हम कह सकते हैं) आप सब सोच सकते हैं कि यह वाक्य अपेक्षाकृत व्यापक एवं खोखला है, किन्तु विशेष रूप से कहें, तो जो कुछ परमेश्वर करता है वह एक सामान्य जीवन जीने के प्रति मनुष्य की अगुवाई एवं मार्गदर्शन के लिए है। चाहे यह ऐसा है जिससे मनुष्य उसके नियमों को माने या उसकी व्यवस्था का पालन करे, तो मनुष्य के लिए परमेश्वर का लक्ष्य है कि वह शैतान की आराधना न करे, और शैतान के द्वारा आहत न हो; यही मूलभूत बात है, और यह वही है जिसे बिलकुल शुरुआत में किया गया था। बिलकुल शुरुआत में, जब मनुष्य परमेश्वर की इच्छा को नहीं जानता था, तब उसने कुछ सरल व्यवस्थाओं एवं नियमों को लिया था और ऐसे प्रावधान किए थे जो प्रत्येक बोधगम्य पहलु को समेटता था। ये प्रावधान बहुत ही सरल हैं, फिर भी उनमें परमेश्वर की इच्छा शामिल है। परमेश्वर मानवजाति को संजोता, पोषण करता और बहुत प्रेम करता है। क्या स्थिति ऐसी ही नहीं है? (हाँ।) तो क्या हम कह सकते हैं कि उसका हृदय पवित्र है? क्या हम कह सकते हैं कि उसका हृदय साफ है? (हाँ।) क्या परमेश्वर के किसी प्रकार के कोई गुप्त इरादे हैं? (नहीं।) तो क्या उसका यह लक्ष्य सही एवं सकारात्मक है? (हाँ।) यह सकारात्मक है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि परमेश्वर ने कौन कौन से प्रावधान किए हैं, उसके कार्य के दौरान उन सब का प्रभाव मनुष्य के लिए सकारात्मक है, और वे मार्ग की अगुवाई करते हैं। अतः क्या परमेश्वर के मन में कोई आत्म-सेवी विचार चल रहे हैं? जहाँ मनुष्य की बात आती है तो क्या परमेश्वर के किसी प्रकार के अतिरिक्त उद्देश्य हैं, या क्या वह किसी तरह से मनुष्य का उपयोग करना चाहता है? बिलकुल भी नहीं। परमेश्वर जैसा कहता है वैसा करता है, और वह अपने हृदय में भी इसी तरह से सोचता है। इसमें कोई मिलावटी उद्देश्य नहीं है, कोई आत्म-सेवी विचार नहीं हैं। वह अपने लिए कुछ नहीं करता है, बल्कि निश्चित तौर पर बिना किसी व्यक्तिगत उद्देश्य के पूरी तरह से सब कुछ मनुष्य के लिए करता है। यद्यपि उसके पास मनुष्य के लिए योजनाएं एवं इरादे हैं, फिर भी वह खुद के लिए कुछ नहीं करता है। वह जो कुछ भी करता है उसे विशुद्ध रूप से मानवजाति के लिए, मानवजाति को बचाने के लिए, और मानवजाति को गुमराह होने से बचाने के लिए करता है। अतः क्या यह हृदय बहुमूल्य नहीं है? (हाँ।) क्या आप इस बहुमूल्य हृदय का सूक्ष्म संकेत भी शैतान में देख सकते हैं? (नहीं।) क्या आप इसे देख सकते हैं? देख सकते हैं? आप शैतान में इसका एक भी संकेत नहीं देख सकते हैं। हर एक चीज़ जिसे परमेश्वर करता है उसे प्राकृतिक रूप से प्रगट किया जाता है। जिस तरह से परमेश्वर कार्य करता है, उसे देखकर क्या लगता है, वह किस प्रकार कार्य करता है? क्या परमेश्वर जादू मन्त्र के सोने के छल्ले[क] के समान इन व्यवस्थाओं एवं अपने वचनों को लेता है और प्रत्येक व्यक्ति के सिर पर कसकर बांध देता है, और इन्हें प्रत्येक मनुष्य पर थोपता है? क्या वह इस तरह से कार्य करता है? (नहीं।) तो परमेश्वर किस तरह से अपना कार्य करता है? (वह हमारा मार्गदर्शन करता है।) ठीक है, यह एक पहलु है। कोई अन्य? परमेश्वर अनेक तरीकों से आप पर कार्य करता है, ऐसे कैसे हो सकता है कि सिर्फ एक बात कहने के बाद आपके पास उन चीज़ों की कमी हो गई है? (वह समझाता है और प्रोत्साहन देता है।) यह दूसरी बात हुई। कोई अन्य? क्या वह धमकाता है? क्या वह आपसे गोल मोल बात करता है? (नहीं।) जब आप सत्य को नहीं समझते हैं, तो परमेश्वर आपका मार्गदर्शन कैसे करे? (वह ज्योति चमकाता है।) ठीक है, वह आप पर एक ज्योति चमकाता है, आपको स्पष्ट रूप से बताता है कि यह सत्य के अनुरूप नहीं है, और आपको क्या करना चाहिए। अतः इन तरीकों से जिसके अंतर्गत परमेश्वर कार्य करता है, आपको क्या महसूस होता है कि आपका परमेश्वर के साथ किस प्रकार का रिश्ता है? क्या वे आपको महसूस कराते हैं कि परमेश्वर आपकी समझ से परे है? (नहीं।) तो वे आपको कैसा महसूस कराते हैं? परमेश्वर विशेष रूप से आपके बहुत करीब है, आपके बीच में कोई दूरी नहीं है। जब परमेश्वर आपकी अगुवाई करता है, जब वह आपको प्रदान करता है, आपकी सहायता करता है और आपको सहारा देता है, तो आप परमेश्वर के मिलनसार स्वभाव, एवं उसकी प्रतिष्ठा को महसूस करते हैं, और आप महसूस करते हैं कि वह कितना प्यारा है, और कितना स्नेही है। किन्तु जब परमेश्वर आपकी भ्रष्टता के लिए आपकी भर्त्सना करता है, या जब वह अपने विरुद्ध विद्रोह करने के लिए आपका न्याय करता है एवं आपको अनुशासित करता है, तो परमेश्वर किन तरीकों का उपयोग करता है? क्या वह शब्दों से आपकी भर्त्सना करता है? (हाँ।) क्या वह वातावरण एवं लोगों, मामलों, एवं चीज़ों के माध्यम से आपको अनुशासित करता है? (हाँ।) तो यह अनुशासन किस स्तर तक पंहुचता है? (उस स्तर तक जिसे मनुष्य सह सकता है।) क्या अनुशासन करने का उसका स्तर वहाँ तक पहुंचता है जहाँ शैतान मनुष्य को नुकसान पहुंचाता है? (नहीं।) परमेश्वर सौम्यता, प्रेम, कोमलता एवं सावधानी से कार्य करता है, ऐसा तरीका जो विशेष रूप से नपा-तुला और उचित है। उसका तरीका आप में तीव्र भावनाओं को उत्पन्न नहीं करता है, यह कहते हुए कि, "परमेश्वर इसे करने के लिए मुझे अनुमति नहीं देगा" या "इसे करने के लिए परमेश्वर को मुझे अनुमति देनी चाहिए" परमेश्वर आपको कभी भी उस किस्म की तीव्र मानसिकता या तीव्र भावनाएं नहीं देता है जो चीज़ों को असहनीय बना देती हैं। क्या स्थिति ऐसी ही नहीं है? (हाँ।) यहाँ तक कि जब आप न्याय एवं ताड़ना के विषय में परमेश्वर के वचनों को ग्रहण करते हैं, तब आप कैसा महसूस करते हैं? जब आप परमेश्वर के अधिकार एवं सामर्थ को महसूस करते हैं, तब आप कैसा महसूस करते हैं? क्या आप परमेश्वर की अनुलंघनीय ईश्वरीयता को महसूस करते हैं? (हाँ।) क्या आप इन समयों में परमेश्वर से दूरी महसूस करते हैं? क्या आपको परमेश्वर से भय महसूस होता है? (नहीं।) इसके बजाए, आप परमेश्वर के लिए भययुक्त सम्मान महसूस करते हैं। क्या लोग परमेश्वर के कार्य के कारण इन सब चीज़ों को महसूस करते हैं? (हाँ।) तो क्या उनके पास ये भावनाएं होती यदि शैतान मनुष्य पर काम करता? (नहीं।) परमेश्वर मनुष्य की निरन्तर आपूर्ति के लिए, एवं मनुष्य को सहारा देने के लिए अपने वचनों, अपनी सच्चाई एवं अपने जीवन का उपयोग करता है। जब मनुष्य कमज़ोर होता है, जब मनुष्य निराश होता है, तब परमेश्वर निश्चित तौर पर कठोरता से बात नहीं करता है, यह कहते हुए कि, "निराश मत हो। तुम निराश क्यों हो? तुम किसके लिए कमज़ोर हो? ऐसा क्या है जिसके विषय में तुम कमज़ोर हो? तुम कितने कमज़ोर हो, तुम मर भी सकते हो। तुम हमेशा इतने निराश रहते हो, जीने से क्या मतलब है? मर जाओ!" क्या परमेश्वर इस तरह से कार्य करता है? (नहीं।) क्या परमेश्वर के पास इस तरह से कार्य करने का अधिकार है? (हाँ।) पर क्या परमेश्वर इस तरह से कार्य करता है? (नहीं।) परमेश्वर के इस रीति से कार्य नहीं करने की वजह है उसका सार-तत्व, परमेश्वर की पवित्रता का सार-तत्व। मनुष्य के लिए उसके प्रेम को, और उसके द्वारा मनुष्य को संजोकर रखने और उसका पोषण करने को एक या दो वाक्य में अभिव्यक्त नहीं किया जा सकता है। यह कोई ऐसी चीज़ नहीं है जो मनुष्य के डींग हांकने के द्वारा घटित होती है बल्कि यह ऐसी चीज़ है जिसे परमेश्वर वास्तविक तौर पर अमल में लाता है; यह परमेश्वर के सार-तत्व का प्रकाशन है। क्या ये सभी तरीके जिसके अंतर्गत परमेश्वर कार्य करता है वे मनुष्य को परमेश्वर की पवित्रता को देखने की अनुमति दे सकते हैं? इन सभी तरीकों में जिसके अंतर्गत परमेश्वर कार्य करता है, जिसमें परमेश्वर के अच्छे इरादे शामिल हैं, जिसमें वे प्रभाव शामिल हैं जिन्हें परमेश्वर मनुष्य पर हासिल करना चाहता है, जिसमें विभिन्न तरीके शामिल हैं जिन्हें परमेश्वर मनुष्य पर कार्य करने के लिए अपनाता है, जिसमें उस प्रकार का कार्य शामिल है जिसे वह करता है, जिसे वह मनुष्य को समझाना चाहता है—क्या आपने परमेश्वर के अच्छे इरादों में कोई दुष्टता या धूर्तता देखी है? (नहीं)। आप कोई दुष्टता नहीं देख सकते हैं, क्या आप देख सकते हैं? (नहीं।) अतः जो कुछ परमेश्वर करता है, जो कुछ परमेश्वर कहता है, जो कुछ वह अपने हृदय में सोचता है, साथ ही साथ परमेश्वर का सारा सार-तत्व जिसे वह प्रगट करता है—क्या हम परमेश्वर को पवित्र कह सकते हैं? (हाँ।) क्या किसी मनुष्य ने संसार में, या अपने अंदर कभी ऐसी पवित्रता देखी है? परमेश्वर को छोड़कर, क्या आपने इसे कभी किसी मनुष्य या शैतान में देखा है? (नहीं।) अब तक जिसके विषय में हमने बात की है, क्या हम परमेश्वर को अद्वितीय, स्वयं पवित्र परमेश्वर कह सकते है? (हाँ।) वह सब कुछ जो परमेश्वर मनुष्य को देता है, जिसमें परमेश्वर के वचन शामिल हैं, वे विभिन्न तरीके जिनके अंतर्गत परमेश्वर मनुष्य पर कार्य करता है, वह जिसे परमेश्वर मनुष्य को बताता है, वह जिसे परमेश्वर मनुष्य को स्मरण कराता है, वह जिसकी वह सलाह देता है एवं उत्साहित करता है, यह सब एक सार-तत्व से उत्पन्न होता है: यह सब परमेश्वर की पवित्रता से उत्पन्न होता है। यदि कोई ऐसा पवित्र परमेश्वर नहीं होता, तो कोई मनुष्य उस कार्य को करने के लिए उसका स्थान नहीं ले सकता जिसे वह करता है। यदि परमेश्वर इन लोगों को लेता और पूरी तरह से इन्हें शैतान को सौंप देता, तो क्या आप सब ने कभी सोचा है कि आप में से वे लोग जो यहाँ पर उपस्थित हैं वे किस प्रकार की परिस्थिति में होते? क्या आप सब यहाँ सही सलामत और सुरक्षित बैठे होते? (नहीं।) तो आप किस के समान होते? क्या आप भी कहते: "मैं पृथ्वी पर इधर-उधर घूमते-फिरते और डोलते-डालते आया हूँ।" क्या आप लोग ऐसे ही अकड़ते, ऐसे ही निर्लज्ज हो जाते और परमेश्वर के सामने बिना किसी शर्म के घमण्ड करते, और ऐसे ही गोल मोल बात करते? (हाँ।) हाँ, आप लोग करते। आप सब सौ प्रतिशत करते! आप लोग बिलकुल करते! मनुष्य के प्रति शैतान की मनोवृत्ति उन्हें यह देखने की अनुमति देती है कि शैतान का स्वभाव परमेश्वर से पूर्णतः अलग है। उसका सार-तत्व परमेश्वर से पूरी तरह से अलग है। शैतान का कौन सा सार-तत्व परमेश्वर की पवित्रता के विपरीत है? (उसकी दुष्टता।) शैतान का दुष्ट स्वभाव परमेश्वर की पवित्रता के विपरीत है। अधिकांश लोग यह क्यों नहीं समझ पाते हैं कि परमेश्वर की यह अभिव्यक्ति परमेश्वर की पवित्रता के सार-तत्व को दर्शाती है? वह इसलिए क्योंकि वे शैतान के प्रभुत्व के अधीन, शैतान की भ्रष्टता के अंतर्गत, और शैतान के समकालीन घेरे के भीतर रहते हैं। वे नहीं जानते हैं पवित्रता क्या है, या यह नहीं जानते हैं कि पवित्रता को कैसे परिभाषित करें। परमेश्वर की पवित्रता का एहसास कर लेने के बावजूद, आप किसी निश्चय के साथ परमेश्वर की पवित्रता के रूप में इसे परिभाषित नहीं कर सकते हैं। यह परमेश्वर की पवित्रता के विषय में मनुष्य की पहचान की असमानता है।

मनुष्य पर किए गए शैतान के कार्य के द्वारा किस प्रकार का प्रतीकात्मक लक्षण दिखाया गया है? तुम लोगों को अपने स्वयं के अनुभवों से इसके विषय में जानना चाहिए—शैतान का अत्यंत प्रतीकात्मक लक्षण, वह कार्य जिसे वह सबसे अधिक करता है, वह कार्य जिसे वह हर एक व्यक्ति के साथ करने की कोशिश करता है। उसके पास एक लक्षण है जिसे शायद तुम सब देख नहीं सकते हो, ताकि तुम सब यह न सोचो कि शैतान कितना भयावह एवं घृणित है। क्या कोई जानता है कि यह लक्षण क्या है? मुझे बताओ। (हर एक चीज़ जिसे वह करता है उसे मनुष्य को नुकसान पहुंचाने के लिए किया जाता है।) वह मनुष्य को नुकसान पहुंचाने के लिये कार्य करता है। वह मनुष्य को कैसे नुकसान पहुंचाता है? क्या तुम सब मुझे और अधिक विशिष्टता से तथा और अधिक विस्तार से दिखा सकते हो? (वह मनुष्य को लुभाता, फुसलाता एवं प्रलोभन देता है।) यह सही है, यह विभिन्न पहलुओं को दिखाता है। और कुछ? (यह मनुष्य को ठगता है।) वह ठगता है, आक्रमण करता है एवं दोष लगाता है। हाँ, इनमें से सब कुछ। क्या और भी कुछ है? (वह झूठ बोलता है।) धोखा देना और झूठ बोलना शैतान में स्वाभाविक रीति से आता है। वह ऐसा इतनी बार करता है कि झूठ उसके मुंह से होकर बहता है और इसके विषय में सोचने की जरुरत भी नहीं है। और कुछ? (वह मतभेद प्रकट करता है।) यह उतना महत्वपूर्ण नहीं है। मैं तुम लोगों को कुछ चीज़ें बताऊंगा जो तुम लोगों को भयभीत कर देगा, परन्तु मैं तुम लोगों को डराने के लिए इसे नहीं करूंगा। परमेश्वर मनुष्य पर कार्य करता और मनुष्य परमेश्वर की मनोवृत्ति एवं उसके हृदय में पोषित होता है। इसके विपरीत, क्या शैतान मनुष्य को पोषित करता है? वह मनुष्य को पोषित नहीं करता है। वह मनुष्य से क्या चाहता है? वह मनुष्य को हानि पहुंचाना चाहता है, वह जो कुछ सोचता है वह मनुष्य को हानि पहुंचाने के विषय में होता है। क्या यह सही नहीं है? अतः जब वह मनुष्य को हानि पहुंचाने का विचार करता है, तो क्या वह ऐसा मस्तिष्क के दबाव की स्थिति में करता है? (हाँ।) अतः जब मनुष्य पर शैतान के कार्य की बात आती है, तो यहाँ मेरे पास दो शब्द हैं जो शैतान की दुर्भावना एवं दुष्ट स्वभाव की बहुतायत से व्याख्या कर सकते हैं, जो सचमुच में तुम लोगों को शैतान की घृणा को जानने की अनुमति दे सकता है: मनुष्य तक शैतान की पहुंच में, वह हमेशा बलपूर्वक "कब्जा" करता है और स्वयं को उनमें से प्रत्येक के साथ "जोड़ता" है ताकि वह उस बिन्दु तक पहुंच सके जहाँ वह मनुष्य को पूरी तरह से नियन्त्रण में रखता है, और मनुष्य को नुकसान पहुंचता है, ताकि वह इस उद्देश्य एवं अनियन्त्रित महत्वाकांक्षाओं को हासिल कर सके। "बलपूर्वक कब्जा" करने का अर्थ क्या है? क्या यह आपकी सहमति के साथ होता है, या बिना आपकी सहमति से होता है? क्या यह तुम्हारी जानकारी से होता है, या तुम्हारी जानकारी के बगैर होता है? यह पूरी तरह से तुम्हारी जानकारी के बगैर होता है। ऐसी परिस्थितियों में जहाँ तू अनजान रहता है, संभवतः जब उसने कुछ भी नहीं कहा है या संभवतः जब उसने कुछ भी नहीं किया है, जब कोई प्रतिज्ञा नहीं है, और कोई सन्दर्भ नहीं है, वहाँ वह आपके चारों ओर है, और आपको घेरे हुए है। वह तेरा शोषण करने के लिए एक अवसर तलाशता है, तब वह बलपूर्वक तुझ पर कब्जा करता है, स्वयं को तुझसे जोड़ देता है, और पूरी तरह से तुझ पर नियन्त्रण करने एवं तुझे नुकसान पहुँचाने के अपने उद्देश्य को हासिल करता है। मानवजाति के लिए परमेश्वर के विरुद्ध शैतान की लड़ाई में यह एक अति प्रतीकात्मक इरादा एवं व्यवहार है। जब तुम लोगों ने इसे सुना तो तुम सब को कैसा महसूस हुआ? (अपने हृदय में भयभीत एवं डरे हुए)। क्या तुम सब घृणा महसूस करते हो? (हाँ, हम घृणा महसूस करते हैं।) तो जब तुम लोग घृणित महसूस करते हो, तो क्या तुम लोग सोचते हो कि शैतान निर्लज्ज है? (हाँ।) जब तुम लोग सोचते हो कि शैतान निर्लज्ज है, तो क्या तुम सबने उन लोगों के प्रति घृणा महसूस की जो तुम लोगों को नियन्त्रित करना चाहते हैं, ऐसे लोग जिनके पास हैसियत एवं रुचियों के लिए अनियन्त्रित महत्वाकांक्षाएं हैं। (हाँ) अतः शैतान मनुष्य के साथ अपने आपको बलपूर्वक जोड़ने और उस पर कब्जा करने के लिए कौन से तरीकों का उपयोग करता है? क्या तुम लोग इसके विषय में स्पष्ट हो? जब तुम सब बलपूर्वक "कब्जे" एवं "जुड़ने" जैसे दो शब्दों को सुनते हो, तो तुम लोगों को अजीब सा एवं घृणा का एहसास होता है, क्या तुम लोगों को नहीं होता है? क्या तुम लोगों ने उसके बुरे स्वाद को चखा है? तेरी सहमति या तेरी जानकारी के बिना वह स्वयं को तुझसे जोड़ लेता है, और तुझ पर कब्जा करता है एवं तुझे भ्रष्ट करता है। तू अपने हृदय में क्या महसूस कर सकता है? घृणा? (हाँ!) घृणा? (हाँ!) अतः जब तू शैतान के इस तरीके के लिए नफ़रत एवं घृणा महसूस करता है, तो तेरे पास परमेश्वर के लिए किस प्रकार का एहसास होता है? (कृतज्ञ।) तुझे बचाने के लिए परमेश्वर का कृतज्ञ। अतः अब, इस घड़ी, क्या तेरे पास वह चाहत या वह इच्छा है कि परमेश्वर तेरी समस्त जिम्मेदारी ले ले और तेरे सर्वस्व पर शासन करे? (हाँ) किस सन्दर्भ में? क्या तू इसलिए हाँ कहता है क्योंकि तुझे शैतान के द्वारा बलपूर्वक कब्जा किए जाने एवं जोड़े जाने का डर है? तेरे पास इस किस्म की मानसिकता नहीं हो सकती है, यह सही नहीं है। डरो मत, परमेश्वर यहाँ है। यहाँ डरने के लिए कुछ भी नहीं है, ठीक है? जब एक बार तू शैतान के बुरे सार को समझ जाता है, तो तेरे पास परमेश्वर के प्रेम, परमेश्वर के अच्छे इरादों, तथा मनुष्य और उसकी धार्मिक रुचि के लिए परमेश्वर की करुणा एवं उदारता के विषय में और अधिक सटीक समझ या अधिक गहराई से पालन करना चाहिए। शैतान कितना घृणित है, फिर भी यदि यह अभी भी परमेश्वर के विषय में तेरे प्रेम और परमेश्वर पर तेरी निर्भरता एवं परमेश्वर में तेरे भरोसे को प्रेरित नहीं करता है, तो तू किस प्रकार का व्यक्ति होगा? क्या तू तैयार है कि शैतान तुझे इस प्रकार से नुकसान पहुंचाए? शैतान की दुष्टता एवं भयंकरता को देखने के पश्चात्, हम उसे घुमाते हैं और तब परमेश्वर को देखते हैं। क्या परमेश्वर के विषय में तुम्हारी जानकारी किसी बदलाव से होकर गुज़री है? (हाँ।) किस तरह का बदलाव? क्या हम कह सकते हैं परमेश्वर पवित्र है? क्या हम कह सकते हैं कि परमेश्वर दोष रहित है? (हाँ।) "परमेश्वर अद्वितीय पवित्रता है" —क्या परमेश्वर इस उपाधि के अंतर्गत प्रसन्नता से बना रह सकता है? (हाँ।) अतः इस संसार में और सब चीजों के मध्य, क्या यह केवल स्वयं परमेश्वर ही है जो मनुष्य की इस समझ के अंतर्गत प्रसन्नता से बना रह सकता है? क्या अन्य लोग भी हैं? (नहीं।) अतः परमेश्वर ने ठीक-ठीक मनुष्य को क्या दिया है? जब तू ध्यान नहीं दे रहा होता है क्या उसने तुझे सिर्फ थोड़ी सी देखरेख, देखभाल एवं विचार करता है? परमेश्वर ने मनुष्य को क्या दिया है? परमेश्वर ने मनुष्य को जीवन दिया है, और उसने मनुष्य को सब कुछ दिया है, और किसी चीज़ की मांग किए बगैर, और किसी गुप्त इरादे के बगैर वह बिना किसी शर्त के मनुष्य को आपूर्ति करता है। वह मनुष्य की अगुवाई एवं मार्गदर्शन करने के लिए सच्चाई का उपयोग करता है, अपने वचनों का उपयोग करता है, एवं अपने जीवन का उपयोग करता है, और मनुष्य को शैतान के नुकसान से दूर ले जाता है, शैतान के प्रलोभन से दूर ले जाता है, शैतान के बहकावे से दूर ले जाता है और वह मनुष्य को अनुमति देता है कि वह शैतान के दुष्ट स्वभाव एवं उसके भयंकर चेहरे के आर पार साफ साफ देखे। अतः क्या मानवजाति के लिए परमेश्वर का प्रेम एवं चिंता सही है? क्या यह कुछ ऐसा है जिसे तुम लोगों में से हर कोई अनुभव कर सकता है? (हाँ।)

अपने अब तक के जीवन में पीछे मुड़कर उन सब कार्यों को देखो जिन्हें परमेश्वर ने तेरे विश्वास के उन सभी वर्षों में किया है। तू इसे गहराई से महसूस करता है या नहीं, क्या यह अत्यंत आवश्यक नहीं था? क्या यह वह नहीं है जिसे प्राप्त करना तेरे लिए अत्यंत आवश्यक था? (हाँ।) क्या यह सच नहीं है? क्या यह जीवन नहीं है? (हाँ।) अतः इन चीज़ों को देने के पश्चात् कुछ वापस करने के लिए या बदले में कोई चीज़ देने के लिए क्या परमेश्वर ने तुझे कभी प्रबुद्ध किया? (नहीं।) तो परमेश्वर का उद्देश्य क्या है? परमेश्वर इसे क्यों करता है? क्या परमेश्वर के पास भी तुझ पर कब्जा करने के लिए कोई उद्देश्य है? (नहीं।) क्या परमेश्वर मनुष्य के हृदयों में अपने सिंहासन को ऊंचा उठाना चाहता है? (हाँ।) अतः परमेश्वर के द्वारा अपने सिंहासन को ऊंचा उठाने और शैतान के बलपूर्वक कब्जा करने के बीच क्या अन्तर है? परमेश्वर मनुष्य के हृदय को अर्जित करना चाहता है, वह मनुष्य के हृदय में काबिज़ होना चाहता है—इसका क्या मतलब है? क्या इसका अर्थ यह है कि परमेश्वर मनुष्य को अपनी कठपुतलियां, एवं अपनी मशीनें बनाना चाहता है? (नहीं।) तो परमेश्वर का उद्देश्य क्या है? क्या मनुष्य के हृदयों में काबिज़ होने की परमेश्वर की इच्छा और शैतान के बलपूर्वक कब्जे, और उसके द्वारा स्वयं को मनुष्य से जोड़ने के बीच कोई अन्तर है? (हाँ।) अन्तर क्या है? क्या तू मुझे साफ साफ बता सकता है? (शैतान इसे बलपूर्वक करता है किन्तु परमेश्वर मनुष्य को स्वेच्छा से करने देता है) शैतान इसे बलपूर्वक करता है जबकि परमेश्वर तुझे स्वेच्छा से करने देता है। क्या यही अन्तर है? अतः यदि तू स्वेच्छा से नहीं करता है, तो क्या? यदि तू स्वेच्छा से नहीं करता, तो क्या परमेश्वर कुछ करता है? (वह कुछ मार्गदर्शन एवं प्रबुद्धता देता है, किन्तु यदि अंत में मनुष्य इच्छुक नहीं है, तो वह उसे बाध्य नहीं करता है) परमेश्वर तेरा हृदय किस लिए चाहता है? और इसके अतिरिक्त, परमेश्वर किस लिए तुझ पर काबिज़ होना चाहता है? तुम सब अपने हृदय में "परमेश्वर मनुष्य के हृदय पर काबिज़ होता है" के बारे में किस तरह से समझते हो? हमें यहाँ पर परमेश्वर के प्रति ईमानदार होना होगा, नहीं तो लोग हमेशा, यह कहते हुए ग़लत समझेंगे कि: "परमेश्वर हमेशा से मुझ पर कब्जा करना चाहता है। वह मुझ पर किस लिए कब्जा करना चाहता है? मैं नहीं चाहता हूँ कि मुझ पर कब्जा किया जाए, मैं जैसा हूँ बस वैसा ही रहना चाहता हूँ। तुम लोग कहते हो कि शैतान लोगों पर कब्जा करता है, किन्तु परमेश्वर भी लोगों पर कब्जा करता है। क्या ये एक समान ही नहीं हैं? मैं किसी को भी मुझ पर कब्जा करने की अनुमति नहीं देना चाहता हूँ। मैं स्वयं मैं हूँ।" यहाँ अन्तर क्या है? इसके विषय में सोचने के लिए एक मिनट लीजिए। (मैं सोचता हूँ कि परमेश्वर मनुष्य को बचाने के लिए, एवं मनुष्य को सिद्ध बनाने के लिए मनुष्य के हृदय को प्राप्त करना और उस पर काबिज़ होना चाहता है।) जो तू कहता है कि वह मनुष्य के विषय में परमेश्वर के प्रबंधन का लक्ष्य है—उसे सिद्ध बनाने के लिए। अतः क्या तू समझ गया कि "कब्जा" करने का अर्थ यहाँ क्या है? (इसका अर्थ है कि शैतान को मनुष्य पर कब्जा करने नहीं देना। यदि परमेश्वर उस स्थान पर काबिज़ होता है, तो शैतान के पास कब्जा करने का कोई मार्ग नहीं है।) तेरा मतलब है कि परमेश्वर वहाँ कब्जा करने वाला पहला शख्स है; किसी खाली घर के समान, जो कोई पहले प्रवेश करता है वह उस घर का मालिक बन जाता है। वह जो बाद में आता है वह उस घर का मालिक नहीं बन सकता है, परन्तु इसके बदले वह नौकर बन जाता है, या फिर वह बिलकुल भी प्रवेश नहीं कर सकता है। क्या यही तेरा मतलब है? (हाँ, मेरा मतलब कुछ ऐसा ही है।) क्या किसी के पास एक अलग नज़रिया है? ("परमेश्वर मनुष्य के हृदय पर काबिज़ होता है" इसके विषय में मेरी स्वयं की समझ यह है कि परमेश्वर हम से अपने परिवार के समान व्यवहार करता है, हमारी देखभाल करता है और हम से प्रेम करता है। शैतान हमें बर्बाद करने के लिए, एवं नुकसान पहुंचाने के लिए मनुष्य के हृदय पर कब्जा करता है।) यह "परमेश्वर मनुष्य पर काबिज़ होता है" के विषय में तेरी समझ है, है ना? क्या कोई भिन्न समझ या नज़रिया है? (परमेश्वर अपने वचन का उपयोग करते हुए मनुष्य पर काबिज़ होता है, इस आशा में कि मनुष्य परमेश्वर के वचन को अपने जीवन में स्वीकार कर सकता है, जिससे मनुष्य परमेश्वर के वचन के अनुसार जीवन जी सकता है।) "परमेश्वर मनुष्य पर काबिज़ होता है," इसके पीछे का सही अर्थ यही है, है ना? क्या कोई भिन्न नज़रिया है? (मेरा दृष्टिकोण यह है कि परमेश्वर सत्य का मूर्त रूप है इसलिए परमेश्वर हमें सारी सच्चाईयां प्रदान करना चाहता है, और क्योंकि हमने उस सच्चाई को अर्जित किया है और हमें उसकी देखरेख एवं सुरक्षा के अधीन लाया गया है, इसलिए हम शैतान की धूर्त युक्तियों में फंसने और उससे हताहत होने को टाल सकते हैं। व्यावहारिक तौर पर कहें, तो परमेश्वर मनुष्य के हृदय को पाना चाहता है ताकि मनुष्य इस पृथ्वी पर एक सामान्य जीवन जी सके और परमेश्वर की आशीषों को प्राप्त कर सके।) किन्तु तूने अभी तक "परमेश्वर मनुष्य के हृदय पर काबिज़ होता है" के वास्तविक अर्थ को नहीं छुआ है। (मनुष्य मूल रूप से परमेश्वर के द्वारा बनाया गया है, अतः मनुष्य को उसकी आराधना करना और उसके पास वापस लौट जाना चाहिए। मनुष्य परमेश्वर का है।) मैं आप लोगों से पूछता हूँ, कि क्या "परमेश्वर मनुष्य पर काबिज़ होता है" एक खोखला वाक्यांश है? क्या मनुष्य पर परमेश्वर के काबिज़ होने का अर्थ है कि परमेश्वर तेरे हृदय में रहता है। क्या परमेश्वर तेरे प्रत्येक शब्द एवं प्रत्येक हलचल पर शासन करता है? यदि वह तुझ से कहता है कि अपना बायां हाथ उठाओ, तो क्या तुम लोग दायां हाथ उठाने की हिम्मत नहीं करते हो? यदि वह तुमसे कहता है कि बैठो, तो क्या तुम सब खड़े होने की हिम्मत नहीं करते हो? यदि वह तुझसे कहता है कि पूर्व दिशा में जाओ, तो क्या तू पश्चिम दिशा में जाने की हिम्मत नहीं करता है? क्या यह एक कब्जा है जिसका अर्थ कुछ ऐसा है? (नहीं।) तो यह क्या है? (मनुष्य के लिए इसका अर्थ है कि जो परमेश्वर के पास है एवं जो वह है मनुष्य उसे जीए।) परमेश्वर ने सालों से मनुष्य का प्रबंध किया है, अतः इस अंतिम चरण में अब तक मनुष्य पर किए गए परमेश्वर के कार्य में, उन सब वचनों का मनुष्य पर क्या असर होगा जिन्हें परमेश्वर ने कहा था? क्या यह ऐसा है कि जो परमेश्वर के पास एवं जो वह है मनुष्य उसे जीता है? "परमेश्वर मनुष्य के हृदय पर काबिज़ होता है" के शाब्दिक अर्थ को देखने पर, ऐसा प्रतीत होता है मानो परमेश्वर मनुष्य के हृदयों को लेता है और उन पर कब्जा करता है, उनमें रहता है और फिर बाहर नहीं आता है; वह उनके भीतर रहता है और मनुष्य के हृदयों का स्वामी बन जाता है, ताकि अपनी इच्छा से मनुष्य के हृदयों पर प्रभुता करे और उनका प्रबंध करे, जिससे मनुष्य को वहाँ जाना होगा जहाँ जाने के लिए परमेश्वर उससे कहता है। अर्थ के इस स्तर पर, ऐसा प्रतीत होता है मानो हर व्यक्ति परमेश्वर बन गया है, और उसने परमेश्वर के सार को धारण किया है, एवं परमेश्वर के स्वभाव को धारण किया है। अतः इस स्थिति में, क्या मनुष्य भी परमेश्वर के कार्यों एवं कृत्यों को अंजाम दे सकता है? क्या "कब्जे" को इस रीति से समझाया जा सकता है? (नहीं।) तो वह क्या है? (ऐसे लोग जिन्हें परमेश्वर चाहता है वे कठपुतलियां नहीं हैं, उनके पास विचार हैं और उनके हृदय जीवित हैं। इसलिए, मनुष्य पर परमेश्वर का काबिज़ होना इस आशा से है कि मनुष्य के पास विचार हो सकते हैं और वह परमेश्वर की खुशियों एवं दुखों का एहसास कर सकता है; मनुष्य एवं परमेश्वर परस्पर एक दूसरे के साथ व्यवहार करते हैं।) मैं तुम सब से पूछता हूँ: सारे वचन एवं सत्य जिन्हें परमेश्वर मनुष्य को प्रदान करता है क्या वे परमेश्वर के सार और जो उसके पास है एवं जो वह है उसका एक प्रकटीकरण है? (हाँ।) यह निश्चित है, है कि नहीं? किन्तु सभी वचन जिन्हें परमेश्वर मनुष्य को प्रदान करता है क्या वे स्वयं परमेश्वर के अभ्यास के लिए हैं, एवं स्वयं परमेश्वर के धारण करने के लिए हैं? इसके विषय में सोचने के लिए एक मिनट लीजिए। जब परमेश्वर मनुष्य का न्याय करता है, तो वह किस कारण ऐसा करता है? ये वचन कहाँ से आए हैं? इन वचनों की विषय-वस्तु क्या है जिन्हें परमेश्वर बोलता है जब वह मनुष्य का न्याय करता है? वे किस पर आधारित हैं? क्या वे मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव पर आधारित हैं? (हाँ।) अतः क्या वह प्रभाव जिसे मनुष्य पर परमेश्वर के न्याय के द्वारा हासिल किया गया है वह परमेश्वर के सार पर आधारित होता है? (हाँ।) अतः क्या परमेश्वर का मनुष्य पर काबिज़ होना एक खोखला वाक्यांश है? यह निश्चित तौर पर नहीं है। अतः परमेश्वर इन वचनों को मनुष्य से क्यों कहता है? इन वचनों को कहने में उसका क्या उद्देश्य है? क्या वह मनुष्य के जीवन के लिए इन वचनों को कहना चाहता है? (हाँ।) परमेश्वर इस समस्त सच्चाई का उपयोग करना चाहता है जिसे उसने मनुष्य के जीवन के लिए कहा है। अतः जब मनुष्य इस समस्त सच्चाई और परमेश्वर के वचन को लेता है और उन्हें अपने जीवन में रूपान्तरित करता है, तब क्या मनुष्य परमेश्वर की आज्ञा मानेगा? तब क्या मनुष्य परमेश्वर का भय मानेगा? तब क्या मनुष्य बुराई से दूर रह सकता है? जब मनुष्य इस बिन्दु तक पहुंच जाता है, तब क्या वह परमेश्वर की संप्रभुता एवं प्रबन्ध को मानेगा? तब क्या मनुष्य परमेश्वर के अधिकार के अधीन होने की स्थिति में होता है? जब अय्यूब या पतरस के जैसे लोग अपने मार्ग के अंत में पहुंच जाते हैं, जब यह माना जाता है कि उनका जीवन परिपक्व हो चुका है, जब उनके पास परमेश्वर की वास्तविक समझ होती है—क्या शैतान उन्हें अभी भी भटका सकता है? क्या शैतान उन पर अभी भी कब्जा कर सकता है? क्या शैतान अभी भी स्वयं को उनके साथ बलपूर्वक जोड़ सकता है? (नहीं।) तो यह किस प्रकार का व्यक्ति है? क्या यह कोई ऐसा है जिसे परमेश्वर के द्वारा पूरी तरह से प्राप्त कर लिया गया है? (हाँ।) अर्थ के इस स्तर पर, तुम सब इस प्रकार के व्यक्ति को किस प्रकार देखते हो जिसे परमेश्वर के द्वारा पूरी तरह से प्राप्त कर लिया गया है? परमेश्वर के लिए, इन परिस्थितियों के अंतर्गत वह पहले से ही इस व्यक्ति के हृदय में काबिज़ हो चुका है। किन्तु यह व्यक्ति कैसा महसूस करता है? क्या यह ऐसा है कि परमेश्वर का वचन, परमेश्वर का अधिकार, और परमेश्वर का मार्ग मनुष्य के भीतर जीवन बन जाता है, फिर यह जीवन जो मनुष्य के सम्पूर्ण अस्तित्व पर काबिज़ हो जाता है वह उसका जीवन निर्माण करता है जिसे वह प्रचुरता से जीता है, और परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए उसके सार को पर्याप्त कर देता है? अतः परमेश्वर के लिए, क्या इस घड़ी मनुष्य के हृदय पर उसके द्वारा कब्जा किया गया है? (हाँ।) अब तुम लोग इस स्तर के अर्थ को कैसे समझते हो? क्या यह परमेश्वर का आत्मा है जो तुझ पर काबिज़ होता है? (नहीं।) अतः वह वास्तव में क्या है जो तुझ पर काबिज़ हो जाता है? (परमेश्वर का वचन)। ठीक है, परमेश्वर का वचन, परमेश्वर का मार्ग। यह वह सच्चाई एवं परमेश्वर का वचन है जो तेरा जीवन बन गया है। इस समय, तो मनुष्य के पास वह जीवन है जो परमेश्वर से आता है, किन्तु हम यह नहीं कह सकते हैं कि यह जीवन परमेश्वर का जीवन है। यह वह जीवन है जिसे मनुष्य को परमेश्वर के वचन से पाना चाहिए। क्या हम कह सकते हैं कि यह जीवन परमेश्वर का जीवन है? (नहीं।) अतः इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि मनुष्य कितने लम्बे समय तक परमेश्वर का अनुसरण करता है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि मनुष्य परमेश्वर से कितने वचनों को प्राप्त करता है, क्योंकि मनुष्य कभी परमेश्वर नहीं बन सकता है। क्या यह सही नहीं है? (हाँ।) भले ही परमेश्वर ने किसी दिन कहा था, "मैं तेरे हृदय में काबिज़ हो गया हूँ, अब तू मेरे जीवन को धारण कर," क्या तब तुझे लगा कि तू परमेश्वर है? (नहीं।) तब तुम क्या बन जाओगे? क्या तुम्हारे पास परमेश्वर के प्रति सम्पूर्ण आज्ञाकारिता नहीं होगी? क्या तुम्हारा शरीर एवं तुम्हारा हृदय उस जीवन से भरपूर नहीं हो जाएगा जिसे परमेश्वर ने तुझे प्रदान किया है? यह बहुत ही सामान्य सा प्रकटीकरण है जब परमेश्वर मनुष्य के हृदयों पर काबिज़ हो जाता है। यह एक तथ्य है। अतः इसे इस पहलू से देखने पर, क्या मनुष्य परमेश्वर बन सकता है? (नहीं।) जब मनुष्य ने परमेश्वर के सारे वचनों को प्राप्त कर लिया है, जब मनुष्य परमेश्वर का भय मान सकता है और बुराई से दूर रह सकता है, तो क्या मनुष्य परमेश्वर की पहचान को धारण कर सकता है? (नहीं।) तो क्या मनुष्य परमेश्वर के सार को धारण कर सकता है? (नहीं।) इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि क्या घटित हुआ है, क्योंकि मनुष्य अभी भी मनुष्य है जब सब कुछ कहा एवं किया गया है। तू एक रचना है; जब तुमने परमेश्वर से परमेश्वर के वचन को ग्रहण किया और परमेश्वर के मार्ग को ग्रहण किया, तो तूने केवल उस जीवन को धारण किया है जो परमेश्वर के वचन से आता है, और तू कभी परमेश्वर नहीं बन सकता है।

इसी समय अपने विषय पर वापस लौटते हुए, मैं ने तुम सब से पूछा था कि इब्राहिम पवित्र था या नहीं। वह नहीं है, और इसे तुम लोगों ने अब समझा है, क्या तुम लोगों ने नहीं समझा? क्या अय्यूब पवित्र है? (नहीं।) इस पवित्रता के भीतर परमेश्वर का सार निहित है। मनुष्य के पास परमेश्वर के सार या परमेश्वर का स्वभाव नहीं है। यहाँ तक कि जब मनुष्य ने परमेश्वर के समस्त वचन का अनुभव कर लिया है और परमेश्वर के वचन के सार को धारण कर लिया है, तब भी मनुष्य को पवित्र नहीं कहा जा सकता है; मनुष्य मनुष्य है। तुम सब समझ गए, सही है? (हाँ।) तो तुम सब अब इस वाक्यांश को कैसे समझते हो "परमेश्वर मनुष्य के हृदयों में काबिज़ होता है?" (यह परमेश्वर का वचन है, परमेश्वर का मार्ग है और उसकी सच्चाई है जो मनुष्य का जीवन बन जाता है।) आप सब ने इसे याद कर लिया है, सही है? मैं आशा करता हूँ कि अब तुम लोगों के पास और अधिक गहरी समझ है। कुछ लोग पूछ सकते हैं, "तो ऐसा क्यों कहते हैं कि परमेश्वर के सन्देशवाहक एवं स्वर्गदूत पवित्र नहीं हैं?" तुम सब इस प्रश्न के बारे में क्या सोचते हैं? कदाचित् आप लोगों ने इससे पहले इस पर विचार नहीं किया है। मैं एक साधारण से उदाहरण का उपयोग करूंगा: जब तू एक रोबोट को चालू करता है, तब वह नृत्य एवं बातचीत दोनों कर सकता है, और जो कुछ वह कहता है तू उसे समझ सकता है, परन्तु क्या तू उसे प्यारा कह सकता है? क्या तू उसे सजीव कह सकता है? तू ऐसा कह सकता है, परन्तु रोबोट नहीं समझेगा क्योंकि उसके पास जीवन नहीं है। जब तू उसकी विद्युत आपूर्ति को बन्द कर देता है, तो क्या वह तब भी इधर-उधर हिल-डुल सकता है? (नहीं।) जब यह रोबोट सक्रिय होता है, तो तू देख सकता है कि यह सजीव एवं प्यारा है। तू इसका मूल्यांकन कर सकता है, चाहे यह एक आवश्यक मूल्यांकन हो या सतही मूल्यांकन, किन्तु स्थिति चाहे कुछ भी हो तेरी आँखें इसे हरकत करते हुए देख सकती है। परन्तु जब तू उसकी विद्युत आपूर्ति बन्द कर देता है, तो क्या उसमें किसी प्रकार की विशेषता दिखाई देती है? क्या तू देखता है कि यह किसी प्रकार के सार को धारण किए हुए है? जो कुछ मैं कह रहा हूँ क्या तू उसके अर्थ को समझ रहा है? (हाँ।) तू समझ सकता है, सही है? कहने का तात्पर्य है, यद्यपि यह रोबोट हिल-डुल सकता है और यह रुक सकता है, फिर भी तू इसका वर्णन कभी नहीं कर सकता है कि इसके पास "किसी प्रकार का सार है।" क्या यह एक तथ्य नहीं है? हम इस पर और अधिक बात नहीं करेंगे। यह तुम लोगों के लिए पर्याप्त है कि तुम सबके पास इस अर्थ की एक सामान्य समझ है। आओ हम अपनी संगति को यहाँ पर समाप्त करते हैं। अलविदा!

17 दिसम्बर, 2013

पदटिप्पणियां:

क. "दी इन्कैन्टेशन ऑफ द गोल्डन हूप" प्रसिद्ध चीनी उपन्यास "जर्नी टू द वेस्ट" की ओर संकेत करता है, जिसमें भिक्षु ज़ुयानज़ैंग एक सोने के छल्ले के माध्यम से वानर राजा को अपने वश में लाने के लिए एक जादू मन्त्र का उपयोग करता है जिसे वानर राजा के सिर पर रखा गया था जिसे जादुई रूप से कसा जा सकता है, इस प्रकार यह असहनीय दर्द उत्पन्न करता है। यह क्रमशः लोगों को बांधने के लिए उपमा अलंकर बन गया है।

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