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स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI

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स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI

परमेश्वर की पवित्रता (III)

अपनी प्रार्थनाओं को कहने के बाद तुम लोग कैसा महसूस करते हो? (बहुत अधिक रोमांचित एवं द्रवित।) आइए हम अपनी संगति को प्रारम्भ करें। हमने पिछली बार किस विषय पर संगति की थी? (परमेश्वर की पवित्रता।) स्वयं परमेश्वर के किस पहलू से परमेश्वर की पवित्रता सम्बन्धित होती है? क्या यह परमेश्वर के सार से सम्बन्धित होती है? (हाँ।) अतः वास्तव में वह विषय क्या है जो परमेश्वर के सार से सम्बन्धित होता है? क्या यह परमेश्वर की पवित्रता है? (हाँ।) परमेश्वर की पवित्रताः यह परमेश्वर का अद्वितीय सार है। वह मुख्य विषय क्या था जिस पर हमने पिछली बार संगति की थी? (शैतान की दुष्टता को परखना।) और हमने शैतान की दुष्टता के सम्बन्ध में पिछली बार क्या संगति की थी? क्या तुम लोग याद कर सकते हो? (शैतान मानवजाति को किस प्रकार भ्रष्ट करता है। वह हमें भ्रष्ट करने के लिए ज्ञान, विज्ञान, पारम्परिक संस्कृति, अंधविश्वास एवं सामाजिक प्रवृत्तियों का उपयोग करता है।) सही है, यह वह मुख्य विषय था जिस पर हमने पिछली बार चर्चा की थी। शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए ज्ञान, विज्ञान, अंधविश्वास, पारम्परिक संस्कृति एवं सामाजिक प्रवृत्तियों का उपयोग करता है; ये वे तरीके हैं जिनके अंतर्गत शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करता है। ये कुल मिलाकर कितने तरीके हैं? (पाँच।) कौन से पाँच तरीके? (विज्ञान, ज्ञान, पारम्परिक संस्कृति, अंधविश्वास एवं सामाजिक प्रवृत्तियाँ।) तुम लोगों की सोच में वह क्या है जिसे शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए सबसे ज़्यादा उपयोग में लाता है, वह चीज़ जो उन्हें अत्यंत गहराई से भ्रष्ट करती है? (पारम्परिक संस्कृति।) कुछ भाई एवं बहन सोचते हैं कि यह पारम्परिक संस्कृति है। कोई और? (ज्ञान।) ऐसा प्रतीत होता है कि तुम लोगों के पास उच्च स्तर का ज्ञान है। कोई दूसरा? (ज्ञान।) तुम लोग उसी दृष्टिकोण को साझा करते हो। जिन भाइयों एवं बहनों ने पारम्परिक संस्कृति कहा था, क्या तुम लोग हमें बता सकते हो कि तुम लोग ऐसा क्यों सोचते हो? क्या तुम लोगों के पास इसकी कोई समझ है? क्या तुम लोग अपनी समझ का वर्णन नहीं करना चाहते हो? (शैतान के दर्शनज्ञान और कन्फ्युशियस (चीनी दर्शनशास्त्री) और मेन्च्युस (कन्फ्युशियस का अनुयायी) के सिद्धान्त हमारे मन में गहराई से बसे हुए हैं, अतः हम सोचते हैं कि ये हमें बहुत गहराई से भ्रष्ट करते हैं।) तुम लोगों में से जो यह सोचते हैं कि यह ज्ञान है, तो क्या तुम लोग समझा सकते हो कि यह ज्ञान क्यों है? अपने अपने कारणों को बताओ। (ज्ञान हमें कभी परमेश्वर की आराधना करने नहीं दे सकता है। यह परमेश्वर के अस्तित्व का इंकार करता है, और परमेश्वर के शासन को नकारता है। अर्थात्, ज्ञान हमें बताता है कि हमें कम उम्र से ही अध्ययन करना है, और केवल अध्ययन करने और ज्ञान अर्जित करने के माध्यम से ही हमारा भविष्य एवं हमारी नियति सुनिश्चित होती है। इस रीति से यह हमें भ्रष्ट करता है।) अतः शैतान तुम्हारे भविष्य एवं तुम्हारी नियति को नियन्त्रित करने के लिए ज्ञान का इस्तेमाल करता है, फिर यह तुम्हें अपनी नाक की सीध में ले चलता है, तुम इसी प्रकार से सोचते हो कि शैतान अत्यंत गहराई से मनुष्य को भ्रष्ट करता है। अतः तुम लोगों में अधिकांश यह सोचते हो कि शैतान मनुष्य को अत्यंत गहराई से भ्रष्ट करने के लिए ज्ञान का उपयोग करता है। क्या कोई दूसरी चीज़ें हैं? उदाहरण के लिए, विज्ञान या सामाजिक प्रवृत्तियों के बारे में क्या विचार है? क्या कोई इन बातों से सहमत है? (हाँ।) आज मैं फिर से उन पाँच तरीकों के बारे में संगति करूंगा जिसके अंतर्गत शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करता है और, जब एक बार मैं समाप्त कर दूँ, मैं यह देखने के लिए अभी भी तुम लोगों से कुछ प्रश्न पूछूँगा कि शैतान का कौन सा पहलू मनुष्य को अत्यंत गहराई से भ्रष्ट करता है। तुम लोग इस विषय को समझ गए, क्या तुम लोग नहीं समझे?

मनुष्य के विषय में शैतान की भ्रष्टता मुख्य रूप से पाँच पहलुओं में प्रदर्शित होती है; ये पाँच पहलू पाँच तरीके हैं जिनके अंतर्गत शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करता है। इन पाँच तरीकों में से पहला ज्ञान है जिसका हमने जिक्र किया था, अतः आइए हम पहले ज्ञान को अपनी संगति के लिए एक विषय के तौर पर लें। शैतान ज्ञान को एक चारे के तौर पर इस्तेमाल करता है। ध्यान से सुनें: यह बस एक प्रकार का चारा है। लोगों को लुभाया जाता है कि "कठिन अध्ययन करें और प्रति दिन बेहतर बनें," किसी हथियार के रूप में, ज्ञान के साथ स्वयं को सुसज्जित करें, फिर विज्ञान के द्वार को खोलने के लिए ज्ञान का उपयोग करें; दूसरे शब्दों में, जितना अधिक ज्ञान तुम अर्जित करते हो, उतना ही अधिक तुम समझोगे। शैतान लोगों को यह सब कुछ बताता है। शैतान मनुष्य को साथ ही साथ ऊँचे आदर्शों को बढ़ावा देने के लिए भी कहता है, ठीक उसी समय जब वे ज्ञान सीख रहे हैं, वह उन्हें बताता है कि उनके पास महत्वाकांक्षाएँ एवं आदर्श हों। लोगों की जानकारी के बिना, शैतान इस प्रकार के अनेक सन्देश देता है, लोगों को अवचेतन रूप से यह महसूस कराता है कि ये चीज़ें सही हैं, या लाभप्रद हैं। अनजाने में, लोग इस प्रकार के मार्ग पर चलते हैं, अनजाने में ही उनके स्वयं के आदर्शों एवं महत्वाकांक्षाओं के द्वारा आगे की ओर उनकी आगुवाई की जाती है। कदम दर कदम, लोग अनजाने में ही उस ज्ञान से सीखते हैं जिसे शैतान के द्वारा दिया गया है जो महान या प्रसिद्ध लोगों की सोच है, और इन विचारों को स्वीकार करते हैं। वे साथ ही कुछ ऐसे लोगों से एक चीज़ के बाद दूसरी चीज़ सीखते हैं जिन्हें लोग नायक मानते हैं। तुम लोग उन में से कुछ को जान सकते हो जिसका समर्थन शैतान इन नायकों के कार्यों के सन्दर्भ में मनुष्य के लिए कर रहा है, या जो कुछ वह मनुष्य के मन के भीतर डालना चाहता है? शैतान मनुष्य के मन के भीतर क्या डालता है? मनुष्य को देशभक्त होना चाहिए, उसके पास राष्ट्रीय अखण्डता होनी चाहिए, और उसे वीर होना चाहिए। मनुष्य कुछ ऐतिहासिक कहानियों से या प्रसिद्ध वीरों की कुछ जीवनी से क्या सीखता है? अपने साथी के लिए या किसी मित्र के लिए व्यक्तिगत वफादारी के एहसास का होना, या उसके लिए कुछ भी करना। शैतान के इस ज्ञान के अंतर्गत, मनुष्य अनजाने में कई चीज़ों को सीखता है, और कई गैर सकारात्मक चीज़ों को सीखता है। अनभिज्ञता के मध्य, शैतान के द्वारा उनके लिए बीजों को तैयार किया जाता है और उन्हें उनके अपरिपक्व मनों में बो दिया जाता है। ये बीज उन्हें यह महसूस कराते हैं कि उन्हें महान मनुष्य होना चाहिए, प्रसिद्ध होना चाहिए, नायक होना चहिए, देशभक्त होना चाहिए, ऐसे लोग होना चाहिए जो अपने परिवार से प्रेम करते हैं, ऐसे लोग होना चाहिए जो एक मित्र के लिए कुछ भी करेगा और उनके पास व्यक्तिगत वफादारी का एहसास होना चाहिए। शैतान के द्वारा बहकाए जाने के द्वारा, वे अनजाने में ही उस रास्ते पर चल पड़ते हैं जिसे उसने उनके लिए तैयार किया था। जब वे इस रास्ते पर चलते हैं, तो उन्हें शैतान के जीवन जीने के नियमों को स्वीकार करने के लिए बाध्य किया जाता है। अनजाने में और अपने आप में पूरी तरह से बेखबर, वे जीवन जीने के स्वयं के नियमों को विकसित कर लेते हैं, जबकि ये नियम शैतान के उन नियमों से बढ़कर और कुछ भी नहीं हैं जिन्हें जबरदस्ती उनके भीतर डाला गया है। सीखने की प्रक्रिया के दौरान, शैतान उन्हें उकसाता है कि वे अपने स्वयं के लक्ष्यों को बढ़ावा दें, कि अपने स्वयं के जीवन के लक्ष्यों को, जीवन जीने के सिद्धान्तों को, और जीवन की दिशा को निर्धारित करें, इसी बीच कहानियों का उपयोग करते हुए, जीवनी का उपयोग करते हुए, और सभी संभावित माध्यमों का उपयोग करते हुए शैतान उनमें इन चीज़ों को भरता है, ताकि लोग थोड़ा थोड़ा करके उसके चारे (प्रलोभन) को ले सकें। इस रीति से, लोग अपने सीखने के पथक्रम के दौरान अपने स्वयं के शौक एवं उद्यमों (अनुसरण) को विकसित कर लेते हैं: कुछ लोग साहित्य, कुछ लोग अर्थशास्त्र, कुछ लोग खगोल विज्ञान या भूगोल पसन्द करने लगते हैं। फिर यहाँ पर कुछ लोग हैं जो राजनीति को पसन्द करने लगते हैं, कुछ लोग हैं जो भौतिक विज्ञान, कुछ रसायन विज्ञान, और यहाँ तक कि कुछ लोग अध्यात्म विज्ञान को पसन्द करते हैं। ये सब ज्ञान का एक भाग है और तुम लोग इन के सम्पर्क में आ गए हो। अपने अपने हृदयों में, तुम लोगों में से प्रत्येक जानता है कि इन चीज़ों के साथ क्या होता है, हर कोई पहले से ही उनके साथ सम्पर्क में है। इस किस्म के ज्ञान के सम्बन्ध में, उनमें से किसी एक के विषय में कोई भी निरन्तर बिना रुके बात कर सकता है। और इस प्रकार यह स्पष्ट है कि यह ज्ञान मनुष्य के मन में कितनी गहराई से प्रवेश कर चुका है, यह उस स्थिति को दिखाता है जिस पर इस ज्ञान के द्वारा मनुष्य के मन में कब्ज़ा किया गया है और इसका मनुष्य पर कितना गहरा प्रभाव है। जब एक बार कोई व्यक्ति ज्ञान के किसी पहलू को पसन्द करता है, जब कोई व्यक्ति अपने हृदय में किसी एक के साथ गहराई से प्रेम करने लगता है, तब वे अनजाने में ही आदर्शों को विकसित कर लेते हैं: कुछ लोग ग्रंथकार बनना चाहते हैं, कुछ लोग लेखक बनना चाहते हैं, कुछ लोग राजनीति में अपनी जीवन वृत्ति (कैरियर) बनाना चाहते हैं, और कुछ अर्थशास्त्र में संलग्न होना और व्यवसायी बनना चाहते हैं। फिर लोगों का ऐसा समूह है जो नायक बनना चाहते हैं, महान या प्रसिद्ध बनना चाहते हैं। इसकी परवाह किए बगैर कि कोई किस प्रकार का व्यक्ति बनना चाहता है, उनका लक्ष्य यह है कि ज्ञान को सीखने के इस तरीके को लिया जाए और इसका उपयोग अपने उद्देश्य के लिए और अपनी इच्छाओं और आदर्शों को साकार करने के लिए किया जाए। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि यह कितना अच्छा सुनाई देता है—वे अपने स्वप्नों को हासिल करना चाहते हैं, वे इस जीवन को बेकार में जीना नहीं चाहते हैं, या वे अपनी जीवन वृत्ति (कैरियर) में लगे रहना चाहते हैं—वे अपने ऊँचे आदर्शों एवं महत्वाकांक्षाओं को बढ़ावा देते हैं परन्तु, मुख्य तौर पर, यह सब किस लिए है? क्या तुम लोगों ने इसके बारे में पहले कभी सोचा है? शैतान यह सब क्यों करना चाहता है? इन चीज़ों को मनुष्य के भीतर डालने में शैतान का क्या उद्देश्य है? तुम लोगों के हृदय इस प्रश्न के प्रति स्पष्ट होने चाहिए।

आओ अब हम इस विषय में बात करते हैं कि किस प्रकार शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए ज्ञान का उपयोग करता है। अब तक हमने जिस विषय पर बात की है उससे, क्या तुम लोगों ने शैतान के भयावह इरादों को पहचानना प्रारम्भ कर दिया है? (थोड़ा बहुत।) शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए ज्ञान का उपयोग क्यों करता है? वह ज्ञान का उपयोग करके मनुष्य के साथ क्या करना चाहता है? वह किस मार्ग पर ले जाने के लिए मनुष्य की अगुवाई करता है? (परमेश्वर का विरोध करने के लिए।) वह निश्चित रूप से परमेश्वर का विरोध करने के लिए ही है। यह वह प्रभाव है जिसे तुम उन लोगों के विषय में देख सकते हो जो ज्ञान को सीखते हैं, और यह वह परिणाम है जिसे तुम ज्ञान को सीखने के बाद देखते हो—अर्थात् परमेश्वर का प्रतिरोध। अतः शैतान की भयावह मंशाएँ क्या हैं? तुम स्पष्ट नहीं हो, क्या तुम स्पष्ट हो? मनुष्य के द्वारा ज्ञान सीखने की प्रक्रिया के दौरान, शैतान किसी भी तरीके का उपयोग कर सकता है जिससे लोग अपनी स्वयं की वासनाओं को संतुष्ट कर सकें और अपने स्वयं के आदर्शों को साकार कर सकें। क्या तुम स्पष्ट हो कि शैतान तुमको वास्तव में किस मार्ग पर ले जाना चाहता है? इसे नम्रतापूर्वक कहें, तो लोग सोचते हैं कि ज्ञान को सीखने में कुछ भी गलत नहीं है, यह तो सामान्य बात है। वे सोचते हैं कि ऊँचे विचारों को बढ़ावा देने और महत्वाकांक्षाओं के होने को महज आकांक्षाओं को रखना ही कहा जाता है, और यह कि लोगों के लिए इसे ही सही मार्ग होना चाहिए कि वे उसका अनुसरण करें। यदि लोग अपने स्वयं के आदर्शों को साकार कर सकते, या जीवन में कोई जीवन वृत्ति (कैरियर) बना लेते—तो क्या उस तरह से जीवन बिताना और भी अधिक गौरवशाली नहीं होता? उस प्रकार से न केवल किसी व्यक्ति के पूर्वजों का सम्मान करना बल्कि इतिहास पर उसकी छाप छोड़ देना—क्या यह एक अच्छी बात नहीं है? यह सांसारिक लोगों की दृष्टि में एक अच्छी एवं उचित बात है। फिर भी, क्या शैतान अपने भयावह इरादों के साथ, लोगों को इस प्रकार के मार्ग पर ले चलता है और तब निर्णय लेता है कि यह पूरा हो गया है? कदापि नहीं। वास्तव में, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि मनुष्य के आदर्श कितने ऊँचे हैं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि मनुष्य की इच्छाएँ कितनी वास्तविक हैं या वे कितनी उचित हो सकती हैं, क्योंकि वह सब जो मनुष्य हासिल करना चाहता है, और वह सब जिसे मनुष्य खोजता है वह गहन रूप से दो शब्दों से जुड़ा हुआ है। दो शब्द प्रत्येक व्यक्ति के जीवन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, और ये ऐसी चीज़ें हैं जिन्हें शैतान मनुष्य के भीतर डालने का इरादा करता है। ये दो शब्द कौन से हैं? एक "प्रसिद्धी" है और दूसरा "लाभ" है: ये प्रसिद्धि और लाभ हैं। शैतान बहुत ही धूर्त किस्म का मार्ग चुनता है, ऐसा मार्ग जो मनुष्य की धारणाओं के साथ बहुत अधिक मिलता जुलता है; यह किसी प्रकार का चरम मार्ग नहीं है। अनभिज्ञता के मध्य, लोग शैतान के जीवन जीने के तरीके, जीवन जीने के उसके नियमों को स्वीकार करने लगते हैं, जीवन के लक्ष्यों और जीवन में अपनी दिशा को स्थापित करते हैं, और ऐसा करने से वे अनजाने में ही जीवन में आदर्शों को प्राप्त करने लगते हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि जीवन में ये आदर्श कितने ऊँचे प्रतीत होते हैं, क्योंकि वह केवल एक बहाना है जो प्रसिद्धि और लाभ से गहन रूप से जुड़ा हुआ है। कोई भी महान या प्रसिद्ध व्यक्ति, और वास्तव में सभी लोग, जिस किसी चीज़ का वे जीवन में अनुसरण करते हैं वह केवल इन दो शब्दों से ही जुड़ा होता हैः "प्रसिद्धि" एवं "लाभ"। क्या ऐसा ही नहीं है? (हाँ।) लोग सोचते हैं कि जब एक बार उनके पास प्रसिद्धि एवं लाभ आ जाता है, तो वे ऊँचे रुतबे एवं अपार धन-सम्पत्ति का आनन्द लेने के लिए, और जीवन का आनन्द लेने के लिए उनका लाभ उठा सकते हैं। जब एक बार उनके पास प्रसिद्धि एवं लाभ आ जाता है, तो वे देह के सुख विलास की अपनी खोज में और अनैतिक आनन्द में उनका लाभ उठा सकते हैं। लोग स्वेच्छा से, यद्यपि अनजाने में, अपने शरीरों, मनों, वह सब जो उनके पास है, अपने भविष्य एवं अपनी नियति को शैतान के हाथों में दे देते हैं जिससे उस प्रसिद्धि एवं लाभ को अर्जित कर सकें जिनकी उन्होंने लालसा की है। लोग इसे एक पल की हिचकिचाहट के बगैर सदैव करते हैं, और उस आवश्यकता के प्रति सदैव अनजान होकर ऐसा करते हैं कि उन्हें सब कुछ पुनः प्राप्त करना है। क्या लोगों के पास अभी भी स्वयं पर कोई नियन्त्रण हो सकता है जब एक बार वे शैतान की ओर इस प्रकार से चले जाते हैं और उसके प्रति वफादार हो जाते हैं। कदापि नहीं। उन्हें पूरी तरह से और सम्पूर्ण रीति से शैतान के द्वारा नियन्त्रित किया जाता है। साथ ही वे पूरी तरह से और सम्पूर्ण रीति से अपने आप को उस दलदल से आज़ाद कराने में असमर्थ हो जिसके भीतर वे धँस गए हैं। जब एक बार कोई प्रसिद्धि एवं लाभ के दलदल में फँस जाता है, तो वे आगे से उसकी खोज नहीं करते हैं जो उजला है, जो धर्मी है या उन चीज़ों को जो खूबसूरत एवं अच्छी हैं। यह इसलिए है क्योंकि वह मोहक शक्ति जो प्रसिद्धि एवं लाभ लोगों के ऊपर रखता है वह बहुत बड़ा है, और वे लोगों के लिए ऐसी चीज़ें बन जाती हैं कि शुरूआत से लेकर अन्त तक और यहाँ तक कि बिना रुके पूरे अनंतकाल तक उनका अनुसरण किया जाता है। क्या यह सत्य नहीं है? कुछ लोग कहेंगे कि ज्ञान को सीखना तो कुछ पुस्तकों को पढ़ने या कुछ चीज़ों को सीखने से बढ़कर और कुछ भी नहीं है जिन्हें वे पहले से नहीं जानते हैं, यह कहते हैं कि वे ऐसा इसलिए करते हैं ताकि समय से पीछे न हों जाएँ या संसार के द्वारा पीछे न छोड़ दिए जाएँ। वे कहेंगे कि ज्ञान को सिर्फ इसलिए सीखा जाता है ताकि वे अपने स्वयं के भविष्य के लिए या मूलभूत आवश्यकताओं के लिए मेज़ पर भोजन रख सकें। अब क्या तुम मुझे बता सकते हो कि क्या कोई ऐसा व्यक्ति है जो मात्र मूलभूत आवश्यकताओं के लिए, और मात्र भोजन के मुद्दे का समाधान करने के लिए एक दशक के कठिन अध्ययन को सहेगा? (नहीं, ऐसा नहीं है।) इस प्रकार के कोई लोग नहीं हैं! अतः वह क्या है कि उसके लिए उसने इन सारे वर्षों में इन कठिनाईयों एवं कष्टों को सहन किया है? यह प्रसिद्धि और लाभ के लिए है: प्रसिद्धि एवं लाभ उसके आगे उसका इंतज़ार कर रहे हैं, उसे बुला रहे हैं, और वह विश्वास करता है कि केवल उसके स्वयं के परिश्रम, कठिनाईयों और संघर्ष के माध्यम से ही वह उस मार्ग का अनुसरण कर सकता है और इसके द्वारा प्रसिद्धि एवं लाभ प्राप्त कर सकता है। उसे अपने स्वयं के भविष्य के पथ के लिए, अपने भविष्य के आनन्द और एक बेहतर ज़िन्दगी के लिए इन कठिनाईयों को सहना ही होगा। क्या तुम लोग मुझे बता सकते हो कि इस पृथ्वी पर इस तथाकथित ज्ञान को क्या कहा जाता है? क्या यह जीवन जीने के नियम और जीवन के आर पार एक मार्ग नहीं है जिसे शैतान के द्वारा लोगों के भीतर डाला गया है, जिसे उनके ज्ञान सीखने के पथक्रम में शैतान के द्वारा सिखाया गया है? क्या यह जीवन के ऊँचे आदर्श नहीं हैं जिन्हें शैतान के द्वारा मनुष्य के भीतर डाला गया था? उदाहरण के लिए, महान लोगों के आदर्शों, प्रसिद्ध लोगों की खराई या प्रख्यात लोगों की बहादुरी के जज़्बे को लीजिए, या नायकों के शौर्य एवं उदारता और युद्ध कला के उपन्यासों में तलवारबाज़ों को लीजिए; ये विचार एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी पर अपना प्रभाव डाल रहे हैं, और प्रत्येक पीढ़ी को लाया जाता है ताकि इन विचारों को स्वीकार करे, इन विचारों के लिए जीए और बिना रुके इनका अनुसरण करे। यह वह मार्ग है, वह माध्यम है, जिसके अंतर्गत शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए ज्ञान का उपयोग करता है। अतः जब शैतान ने प्रसिद्धि एवं लाभ के मार्ग पर लोगों को अगुवाई की उसके पश्चात्, क्या तब भी उनके लिए परमेश्वर पर विश्वास करना, एवं उसकी आराधना करना सम्भव है? (नहीं, यह सम्भव नहीं है।) क्या जीवन जीने के ज्ञान एवं नियम जिन्हें शैतान के द्वारा मनुष्य के भीतर डाला गया उनमें परमेश्वर की आराधना का कोई विचार है? क्या वे कोई विचार रखते हैं जो सत्य से सम्बन्धित है? (नहीं, वे नहीं रखते हैं।) क्या वे परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने से कोई वास्तविकता रखते हैं? (नहीं, वे नहीं रखते हैं।) तुम लोग थोड़ी अनिश्चितता की बातें करते हुए प्रतीत होते हो, परन्तु कोई फर्क नहीं पड़ता है। सभी बातों में सत्य को खोजो और तुम सब सही उत्तरों को प्राप्त करोगे; सिर्फ सही उत्तरों से तुम लोग सही मार्ग पर चल सकते हो।

आइए हम संक्षेप में फिर से दोहराएँ: शैतान मनुष्य को घेरे रखने और नियन्त्रण में रखने के लिए किस का इस्तेमाल करता है? (प्रसिद्धि एवं लाभ।) अतः शैतान तब तक मनुष्य के विचारों को नियन्त्रित करने के लिए प्रसिद्धि एवं लाभ का इस्तेमाल करता है जब तक वे पूरी तरह से यह नहीं सोच सकते हैं कि यह प्रसिद्धि एवं लाभ है। वे प्रसिद्धि एवं लाभ के लिए संघर्ष करते हैं, प्रसिद्धि एवं लाभ के लिए कठिनाईयों को सहते हैं, प्रसिद्धि एवं लाभ के लिए अपमान सहते हैं, प्रसिद्धि एवं लाभ के लिए जो कुछ उनके पास है उसका बलिदान करते हैं, और प्रसिद्धि एवं लाभ दोनों को बरकरार रखने एवं अर्जित करने के लिए वे किसी भी प्रकार का आंकलन करेंगे या कोई भी निर्णय लेंगे। इस रीति से, शैतान मनुष्य को अदृश्य बन्धनों से बाँध देता है। इन बन्धनों को लोगों की देहों पर डाला जाता है, और उनके पास इन्हें उतार फेंकने की न तो सामर्थ होती है न ही साहस होता है। अतः लोग अनजाने में ही इन बन्धनों को सहते हुए बड़ी कठिनाई में भारी कदमों से नित्य आगे बढ़ते रहते हैं। इस प्रसिद्धि एवं लाभ की खातिर, मनुष्य परमेश्वर से दूर हो जाता है और उसे धोखा देता है। हर गुज़रती हुई पीढ़ी के साथ, मानवजाति और भी अधिक दुष्ट बनती जाती है, और भी अधिक अंधकार में पड़ती जाती है, और इस रीति से एक के बाद दूसरी पीढ़ी को शैतान के द्धारा नष्ट कर दिया जाता है। अब शैतान के कार्यों को देखने पर, उसके भयानक इरादे वास्तव में क्या हैं? अब यह स्पष्ट है, है कि नहीं? क्या शैतान घृणित नहीं है? (हाँ!) हो सकता है कि आज तुम लोग शैतान के भयानक इरादों के आर पार नहीं देख सकते हो क्योंकि तुम सब सोचते हो कि प्रसिद्धि एवं लाभ के बगैर कोई जीवन नहीं है। तुम लोग सोचते हो कि, यदि लोग प्रसिद्धि एवं लाभ को पीछे छोड़ देते हैं, तो वे आगे से सामने के मार्ग को देखने में सक्षम नहीं होंगे, आगे से अपने लक्ष्यों को देखने में सक्षम नहीं होंगे, उनका भविष्य अंधकार, धुंधला एवं उदास हो जाता है। परन्तु, धीरे धीरे तुम सभी यह पहचानोगे कि प्रसिद्धि एवं लाभ ऐसे भयानक बन्धन हैं जिनका इस्तेमाल शैतान मनुष्य को बाँधने के लिए करता है। उस दिन तक जब तुम इस पहचान जाते हो, तब तुम पूरी तरह से शैतान के नियन्त्रण का विरोध करोगे और उन बन्धनों का पूरी तरह से विरोध करोगे जिन्हें शैतान तुम्हें बाँधने के लिए लाता है। जब तुम्हारे लिए वह समय आता कि तुम इन सभी चीज़ों को फेंकने की इच्छा करते हो जिन्हें शैतान ने तुम्हारे भीतर डाला है, तब तुम शैतान से अपने आपको पूरी तरह से अलग कर लोगे और साथ ही सचमुच में उन सब से घृणा करोगे जिन्हें शैतान तुम्हारे लिए लेकर आता है। केवल तभी तुम्हारे पास परमेश्वर के लिए सच्चा प्रेम एवं लालसा होगी; केवल तभी तुम सत्य के अनुसरण (खोज) में जीवन के सही मार्ग पर चल सकते हो।

हमने बस अभी अभी बात की है कि किस प्रकार शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए ज्ञान का इस्तेमाल करता है, अतः इसके आगे आइए हम इस विषय में बात करें कि किस प्रकार शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए विज्ञान का इस्तेमाल करता है। पहली बात, मनुष्य को भ्रष्ट करने हेतु विज्ञान के उपयोग में, मनुष्य की जिज्ञासा को संतुष्ट करने के लिए शैतान विज्ञान के नाम का उपयोग करता है, विज्ञान का अनुसंधान करने और रहस्यों की छान बीन के लिए मनुष्य की इच्छा[क] को संतुष्ट करता है। साथ ही विज्ञान के नाम में, मनुष्य के जीवन की गुणवत्ता को निरन्तर बढ़ाने के लिए शैतान उसकी भौतिक आवश्यकताओं और उसकी माँगों को संतुष्ट करता है। इसलिए शैतान, इस नाम में, मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए विज्ञान के तरीके का इस्तेमाल करता है। क्या यह सिर्फ मनुष्य की सोच है या मनुष्य के मन में है जिसे शैतान विज्ञान के इस तरीके का इस्तेमाल करके भ्रष्ट करता है? हमारे आस पास के लोगों, घटनाओं, एवं चीज़ों के मध्य जिन्हें हम देख सकते हैं और जिनके सम्पर्क में हम आ सकते हैं, और ऐसा क्या है जिसे भ्रष्ट करने के लिए शैतान विज्ञान का उपयोग करता है? (प्राकृतिक वातावरण।) तुम सब सही हो। ऐसा प्रतीत होता है कि तुम लोगों को इसके द्वारा भारी नुकसान पहुँचाया गया है, और तुम भी इसके द्वारा बहुत अधिक प्रभावित हुए हो। मनुष्य को धोखा देने के लिए विज्ञान का इस्तेमाल करने, और मनुष्य को धोखा देने के लिए विज्ञान की सब प्रकार की विभिन्न खोजों एवं निष्कर्षों का उपयोग करने के अलावा, साथ ही शैतान जीवन जीने के इस वातावरण के मनमाने विनाश एवं दोहन को क्रियान्वित करने के लिए विज्ञान को एक माध्यम के रूप में भी इस्तेमाल करता है जिसे परमेश्वर के द्वारा मनुष्य को प्रदान किया गया था। वह इसे इस बहाने के अंतर्गत करता है कि यदि मनुष्य वैज्ञानिक अनुसंधान को क्रियान्वित करता है, तो मनुष्य का जीवन जीने का वातावरण और बेहतर होगा तथा मनुष्य के जीवन जीने के स्तर निरन्तर बढ़ेंगे, और इसके अतिरिक्त उस वैज्ञानिक विकास को मनुष्य की दैनिक रूप से बढ़ती हुई भौतिक आवश्यकताओं और नित्य ज़रूरतों का ध्यान रखने के लिए किया जाता है ताकि उनके जीवन की गुणवत्ता को बढ़ाया जाए। यदि कारण ये नहीं हैं, तो वह पूछता है कि विज्ञान का विकास करके तुम वास्तव में क्या कर रहे हो। यह विज्ञान के विषय में शैतान के विकास का सैद्धान्तिक आधार है। फिर भी विज्ञान के पास मानवजाति के लिए कौन कौन से नतीजे हैं? हमारा तात्कालिक वातावरण किन चीज़ों से मिलकर बना हुआ है? क्या उस वायु को जिसमें मानवजाति सांस लेती है दूषित नहीं किया गया है? क्या वह जल जिसे हम पीते हैं अभी भी सचमुच में शुद्ध है? (नहीं।) अतः उस भोजन के विषय में क्या कहें जिसे हम खाते हैं, क्या इसका अधिकांश भाग प्राकृतिक है? (नहीं।) अतः फिर यह क्या है? इसे उर्वरक का उपयोग करके उगाया जाता है और अनुवांशिक संशोधन का उपयोग करके इसकी खेती की जाती है, और साथ ही चीज़ों की अनुवांशिक किस्मों में परिवर्तन (म्यूटेशनस) भी हैं जिन्हें विभिन्न वैज्ञानिक पद्धतियों का उपयोग करके उत्पन्न किया जाता है, ताकि यहाँ तक कि वे सब्जियाँ और फल जिन्हें हम खाते हैं वे अब आगे से प्राकृतिक नहीं रहे। अब यह लोगों के लिए आसान नहीं है कि खाने के लिए असंशोधित (प्राकृतिक) खाद्य पदार्थों को पा सकें। पहले से ही शैतान के तथाकथित विज्ञान के द्वारा प्रक्रिया से होकर गुज़ारे जाने के बाद, यहाँ तक कि अंडे भी पहले के समान स्वादिष्ट नहीं रह गए हैं। बड़ी तस्वीर को देखने पर, समूचे वातावरण को नष्ट और प्रदूषित कर दिया गया है; पहाड़ें, झीलें, जंगल, नदियाँ, महासागर, एवं हर वह चीज़ जो भूमि के ऊपर एवं नीचे है उन सब को तथाकथित वैज्ञानिक उपलब्धियों के द्वारा बर्बाद कर दिया गया है। दूसरे शब्दों में, सम्पूर्ण पारिस्थितिक तंत्र, एवं जीवन जीने का सम्पूर्ण वातावरण जिसे परमेश्वर के द्वारा मानवजाति को प्रदान किया गया था उसे उस तथाकथित विज्ञान के द्वारा प्रदूषित एवं बर्बाद कर दिया गया है। हालाँकि ऐसे बहुत से लोग हैं जिन्होंने उसे प्राप्त किया है जिसकी अपेक्षा उन्होंने जीवन की गुणवत्ता के सन्दर्भ में की थी जिसे वे खोजते थे, और अपनी काम वासनाओं एवं अपने शरीर दोनों को संतुष्ट करते हैं, फिर भी वह वातावरण जिस में मनुष्य रहता है उसे मुख्य तौर पर उन विभिन्न "उपलब्धियों" के द्वारा प्रदूषित एवं बर्बाद कर दिया गया है जिन्हें विज्ञान के द्वारा लाया गया था। यहाँ तक कि बाहर या हमारे घरों में भी अब आगे से हमें शुद्ध हवा में एक सांस लेने का भी अधिकार नहीं है। तुम मुझे बताओ, क्या यह मानवजाति का दुःख है? क्या अभी भी कोई खुशी है कि उसे मनुष्य के लिए बोला जाए कि वह जीवन जीने के ऐसे परिक्षेत्र में रहता है? मनुष्य जीवन जीने के इस परिक्षेत्र में रहता है और, बिलकुल शुरुआत से ही, जीवन जीने के इस वातावरण को परमेश्वर के द्वारा मनुष्य के लिए सृजा गया था। वह जल जिसे लोग पीते हैं, वह वायु जिसमें लोग सांस लेते हैं, वह भोजन जिसे लोग खाते हैं, पौधे, पेड़, और महासागर—जीवन जीने के इस समस्त वातावरण को परमेश्वर के द्वारा मनुष्य को प्रदान किया गया था; यह प्राकृतिक है, और प्राकृतिक नियम के अनुसार संचालित होता है जिसे परमेश्वर के द्वारा स्थापित किया गया था। यदि कोई विज्ञान नहीं होता, और लोग उसका आनन्द उठा सकते जिसे परमेश्वर के मार्ग के अनुसार मनुष्य को प्रदान किया गया था, तो वे खुश होते और उसके अति प्राचीन (मूल) रूप में हर चीज़ का आनन्द उठा सकते थे। फिर भी, अब यह सब कुछ शैतान के द्वारा नष्ट और बर्बाद कर दिया गया है; मनुष्य का जीवन जीने का मूल परिक्षेत्र अब आगे से अपने अति प्राचीन (मूल) रूप में नहीं है। परन्तु कोई भी यह पहचानने के योग्य नहीं है कि किसने इस प्रकार के परिणाम को उत्पन्न किया है या यह कैसे हुआ है, और इसके अतिरिक्त और भी अधिक लोग शैतान के द्वारा उनमें डाले गए उन विचारों का उपयोग करने के द्वारा, और सांसारिक आँखों से विज्ञान को देखने के द्वारा विज्ञान को समझते हैं और नज़दीक आते हैं। क्या यह अत्यंत घृणास्पद एवं दयनीय नहीं है? शैतान के साथ अब उस परिक्षेत्र को जिसमें मानवजाति अस्तित्व में है और उसके जीवन जीने के वातावरण को लेने और उन्हें इस स्थिति तक भ्रष्ट करने, और मानवजाति के साथ निरन्तर इस रीति से विकसित होने के बाद, क्या परमेश्वर के हाथ से इस मानवजाति को पृथ्वी पर से मिटाने की कोई आवश्यकता है जो अत्यंत भ्रष्ट हो चुकी है और जो उसके प्रतिकूल हो गई है? क्या परमेश्वर के हाथ से मानवजाति को नष्ट करने की कोई आवश्यकता है? (नहीं।) यदि मानवजाति निरन्तर इस रीति से विकसित होती रहती, तो वह कौन सी दिशा लेगी? (बर्बादी।) मानवजाति को किस प्रकार बर्बाद किया जाएगा? प्रसिद्धि एवं लाभ के लिए मनुष्य के लोभी खोज के साथ, वे निरन्तर वैज्ञानिक अन्वेषण एवं गहरे अनुसंधान को क्रियान्वित करते रहते हैं, तो वे लगातार अपनी स्वयं की भौतिक आवश्यकताओं एवं काम वासना को संतुष्ट करते रहते हैं: फिर मनुष्य के लिए इसके क्या नतीजे हैं? सबसे पहले अब आगे से कोई पर्यावरणीय संतुलन नहीं रहा और, इसके साथ ही साथ, इस प्रकार के वातावरण के द्वारा समस्त मानवजाति के शरीरों को दूषित एवं क्षतिग्रस्त कर दिया गया है, और विभिन्न संक्रमित रोग, विपदाएँ, एवं धुंध हर जगह फैल गई है। यह ऐसी स्थति है जिस पर अब मनुष्य का कोई नियन्त्रण नहीं है, क्या यह सही नहीं है? अब तुम लोग इसे समझते हो, यदि मानवजाति परमेश्वर का अनुसरण नहीं करती है, परन्तु इस रीति से हमेशा शैतान का अनुसरण करती रहती है—अपने आपको लगातार समृद्ध करने के लिए ज्ञान का उपयोग करती है, बिना रुके मानवीय जीवन के भविष्य की खोज करने के लिए विज्ञान का उपयोग करती है, निरन्तर जीवन बिताते रहने के लिए इस प्रकार की पद्धति का उपयोग करती है—तो क्या तुम लोग पहचानने में समर्थ हो कि मानवजाति का स्वाभाविक अन्त क्या होगा? स्वाभाविक अंतिम परिणाम क्या होगा? (बर्बादी।) यह बर्बादी होगीः एक समय में एक कदम बढ़ाकर बर्बादी की ओर पहुँचना! एक समय में एक कदम के लिए दृष्टिकोण! अब ऐसा दिखाई देता है मानो विज्ञान एक प्रकार का जादुई पेय हो या धीमे धीमे कार्य करनेवाला ज़हर हो जिसे शैतान ने मनुष्य के लिए तैयार किया है, ताकि जब तुम लोग चीज़ों को परखने की कोशिश करो तो तुम लोग इसे कोहरेदार धुंध में करो; इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि तुम लोग कितने कठोर दिखाई देते हो, क्योंकि तुम लोग चीज़ों को साफ साफ नहीं देख सकते हो, और इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि तुम लोग कितनी कठोर कोशिश करते हो, क्योंकि तुम लोग उन्हें समझ नहीं सकते हो। फिर भी शैतान अभी भी विज्ञान के नाम का उपयोग करता है कि तुम्हारी भूख को बढ़ाए और एक कदम के बाद दूसरे कदम को रखते हुए नाक की सीध में अथाह कुण्ड की ओर एवं मृत्यु की ओर तुम्हारी अगुवाई करे। क्या ऐसा ही नहीं है? (हाँ।) यह दूसरा मार्ग है।

वह मुद्दा कि किस प्रकार शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए पारम्परिक संस्कृति का उपयोग करता है इसके विषय में भी स्पष्टीकरण की आवश्यकता है। पारम्परिक संस्कृति एवं अंधविश्वास के बीच में अनेक समानताएँ हैं, केवल पारम्परिक संस्कृति में ही कई कहानियाँ, संकेत, एवं स्रोत हैं। शैतान ने कई लोक कहानियों या इतिहास की पुस्तकों में कहानियों को गढ़ा है एवं अविष्कार किया है, और लोगों पर पारम्परिक संस्कृति या अंधविश्वासी प्रसिद्ध व्यक्तियों के विषय में गहरे प्रभाव डाले हैं। उदाहरण के लिए चीन की आठ अमर हस्तियाँ जो समुद्र को पार करती हैं, जरनी टू द वेस्ट, जेड सम्राट, नेज़्हा कंकर्स दि ड्रेगन किंग है, और परमेश्वरों के प्रतिष्ठापन को ही लो। क्या ये मनुष्य के मनों में गहराई से जड़ नहीं पकड़ चुकी हैं? भले ही कुछ लोग इन सभी विवरणों को नहीं जानते हैं, फिर भी वे अब भी सामान्य कहानियों को तो जानते ही हैं, और यही वह सामान्य विषय सूची है जो तुम्हारे हृदय एवं तुम्हारे मनों में चिपकी हुई है, और तुम इसे भूल नहीं सकते हैं। विभिन्न समयों पर इसके भिन्न भिन्न विचारों एवं जीवन दर्शनों को फैलाने के बाद, ये ऐसी चीज़ें हैं जिन्हें शैतान ने बहुत लम्बे समय पहले से मनुष्य के लिए निर्धारित किया था। ये चीज़ें सीधे तौर पर हानि पहुँचाती हैं और लोगों की आत्माओं को नष्ट करती हैं और लोगों को एक सम्मोहन के बाद दूसरे सम्मोहन में डालती हैं। कहने का तात्पर्य है कि जब एक बार तुमने इन चीज़ों को स्वीकार कर लिया है जो पारम्परिक संस्कृति, कहानियों या अंधविश्वास से उत्पन्न होती हैं, जब एक बार ये चीज़ें तुम्हारे मन में स्थापित हो जाती हैं, जब एक बार वे तुम्हारे हृदय में अटक जाती हैं, तो यह बस एक सम्मोहन के समान है—तुम उलझ जाते हो और इन संस्कृतियों, इन विचारों एवं पारम्परिक कहानियों के द्वारा प्रभावित हो जाते हो। वे तुम्हारे जीवन, एवं जीवन पर तुम्हारे बाह्य दृष्टिकोण को प्रभावित करती हैं और साथ ही वे चीज़ों के विषय में तुम्हारे फैसले को भी प्रभावित करती हैं। इससे बढ़कर वे जीवन के सच्चे मार्ग के लिए तुम्हारे अनुसरण को भी प्रभावित करती हैं: यह वास्तव में एक सम्मोहन है! तुम कोशिश तो करते हो परन्तु तुम उन्हें झटक कर दूर नहीं कर सकते हो; तुम उन्हें चोट पहुँचाते तो हो किन्तु तुम उन्हें काटकर नीचे नहीं गिरा सकते हो; तुम उन पर प्रहार तो करते हो किन्तु तुम उन पर प्रहार करने नीचे नहीं गिरा सकते हो। क्या ऐसा ही नहीं है? (हाँ)। इसके अतिरिक्त, जब मनुष्य को इस प्रकार के सम्मोहन में अनजाने में डाल दिया जाता है, तो वे अनजाने में शैतान की आराधना करना प्रारम्भ कर देते हैं, अपने अपने हृदय में शैतान की छवि को बढ़ावा देते हैं। दूसरे शब्दों में, वे शैतान को अपनी मूर्ति के रूप में, और ऐसी वस्तु के रूप में स्थापित कर लेते हैं कि उसकी आराधना करें और उसकी ओर देंखें, यहाँ तक कि उस हद तक चले जाते हैं कि उसके साथ उसी रीति से व्यवहार करते हैं जैसे वे परमेश्वर के साथ करते। अनजाने में ही, ये चीज़ें लोगों के हृदय में हैं जो उनके वचनों एवं कार्यों को नियन्त्रित कर रही हैं। तुम अनजाने में इन कहानियों के अस्तित्व को मान लेते हो, उन्हें वास्तविक प्रसिद्ध व्यक्ति बना देते हो, और उन्हें वास्तव में मौजूद वस्तुओं में बदल देते हो। अनभिज्ञता में, तुम अवचेतन रूप से इन विचारों को और इन चीज़ों के अस्तित्व को ग्रहण कर लेते हो। साथ ही तुम अवचेतन रूप से दुष्टों, शैतान एवं मूर्तियों को अपने स्वयं के घर में और अपने स्वयं के हृदय में ग्रहण कर लेते हो—यह वास्तव में एक सम्मोहन है! क्या तुम लोग ऐसा ही महसूस करते हो? (हाँ।) क्या तुम लोगों के बीच में कोई ऐसा है जिसने धूप जलायी हो और बुद्ध की आराधना की हो? (हाँ।) अतः धूप जलाने और बुद्ध की आराधना करने का उद्देश्य क्या था? (शान्ति के लिए प्रार्थना करना।) क्या शांति के लिए शैतान से प्रार्थना करना बेतुका है? क्या शैतान शान्ति लाता है? (नहीं।) इसके विषय में अब सोच रहे हो, क्या तुम लोग पहले अनजान थे? (हाँ।) उस प्रकार का आचरण बहुत ही बेतुका, अज्ञानी एवं नौसिखिया है, है कि नहीं? शैतान तुम्हें शान्ति नहीं दे सकता है। क्यों? शैतान सिर्फ यही विचार करता है कि किस प्रकार तुम्हें भ्रष्ट करे और वह तुम्हें शान्ति नहीं दे सकता है; वह तुम्हें केवल एक अस्थायी राहत दे सकता है। परन्तु तुम्हें एक प्रतिज्ञा करनी होगी और यदि तुम अपने वादे को तोड़ते हो या उस प्रतिज्ञा को तोड़ते हो जिसे तुमने उसके लिए किया है, तो तुम देखोगे कि वह तुम्हें किस प्रकार कष्ट देता है। तुमसे एक प्रतिज्ञा करवाने में, वह वास्तव में तुम्हें नियन्त्रित करना चाहता है, क्या वह नहीं चाहता है? जब तुम लोगों ने शान्ति के लिए प्रार्थना की थी, तो क्या तुम लोगों ने शान्ति पाई थी? (नहीं।) तुम लोगों ने शान्ति नहीं पाई थी, परन्तु इसके विपरीत वह दुर्भाग्य, अंतहीन आपदाएँ और विपत्तियों के पूरे समूह को लेकर आया था—सही मायने में कड़वाहट का असीम महासागर। शान्ति शैतान के अधिकार क्षेत्र के भीतर नहीं है, और यही सत्य है। सामंती अन्धविश्वास एवं पारम्परिक संस्कृति के विषय में यह मानवजाति का परिणाम है।

शैतान के मामले में भी विशेष व्याख्या की आवश्यकता है जो मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए सामाजिक प्रवृत्तियों का लाभ उठाता है। इन सामाजिक प्रवृत्तियों में अनेक बातें शामिल होती हैं। कुछ लोग कहते हैं: "क्या वे उन कपड़ों के विषय में हैं जिन्हें हम पहनते हैं? क्या वे नवीतनम फैशन, सौन्दर्य प्रसाधनों, बाल बनाने की शैली एवं स्वादिष्ट भोजन के विषय में हैं?" क्या वे इन चीज़ों के विषय में हैं? ये प्रवृतियों (प्रचलन) का एक भाग हैं, परन्तु हम यहाँ इन बातों के विषय में बात करना नहीं चाहते हैं। ऐसे विचार जिन्हें सामाजिक प्रवृत्तियाँ लोगों के लिए ले कर आती हैं, जिस रीति से वे संसार में स्वयं को संचालित करने के लिए लोगों को प्रेरित करती हैं, और जीवन के लक्ष्य एवं बाह्य दृष्टिकोण जिन्हें वे लोगों के लिए लेकर आती हैं हम केवल उनके विषय में ही बात करने की इच्छा करते हैं। ये अत्यंत महत्वपूर्ण हैं; वे मनुष्य के मन की दशा को नियन्त्रित एवं प्रभावित कर सकते हैं। एक के बाद एक, ये सभी प्रवृत्तियाँ एक दुष्ट प्रभाव को लेकर चलती हैं जो निरन्तर मनुष्य को पतित करती रहती हैं, जो उनकी नैतिकता एवं उनके चरित्र की गुणवत्ता को और भी अधिक नीचे ले जाती हैं, उस हद तक कि हम यहाँ तक कह सकते हैं कि अब अधिकांश लोगों के पास कोई ईमानदारी नहीं है, कोई मानवता नहीं है, न ही उनके पास कोई विवेक है, और कोई तर्क तो बिलकुल भी नहीं है। अतः ये प्रवृत्तियाँ क्या हैं? तुम नग्न आँखों से इन प्रवृत्तियों को नहीं देख सकते हो। जब एक प्रवृत्ति (प्रचलन) की हवा आर पार बहती है, तो कदाचित् सिर्फ कम संख्या में ही लोग प्रवृत्ति के निर्माता बनेंगे। वे इस किस्म की चीज़ों को करते हुए शुरुआत करते हैं, इस किस्म के विचार या इस किस्म के दृष्टिकोण को स्वीकार करते हैं। फिर भी अधिकांश लोगों को उनकी अनभिज्ञता के मध्य इस किस्म की प्रवृत्ति के द्वारा अभी भी संक्रमित, सम्मिलित एवं आकर्षित किया जाएगा, जब तक वे सब इसे अनजाने में एवं अनिच्छा से स्वीकार नहीं कर लेते हैं, और जब तक सभी को इस में डूबोया एवं इसके द्वारा नियन्त्रित नहीं किया जाता है। क्योंकि मनुष्य जो एक स्वस्थ्य शरीर एवं मन का नहीं है, जो कभी नहीं जानता है कि सत्य क्या है, जो सकारात्मक एवं नकारात्मक चीज़ों के बीच अन्तर नहीं बता सकता है, इन किस्मों की प्रवृत्तियाँ एक के बाद एक उन सभों को स्वेच्छा से इन प्रवृत्तियों, जीवन के दृष्टिकोण, जीवन के दर्शन ज्ञान एवं मूल्यों को स्वीकार करने के लिए प्रेरित करती हैं जो शैतान से आती हैं। जो कुछ शैतान उनसे कहता है वे उसे स्वीकार करते हैं कि किस प्रकार जीवन तक पहुँचना है और जीवन जीने के उस तरीके को स्वीकार करते हैं जो शैतान उन्हें "प्रदान" करता है। उनके सभी वह सामर्थ्य नहीं है, न ही उनके पास वह योग्यता है, प्रतिरोध करने की जागरूकता तो बिलकुल भी नहीं है। अतः पृथ्वी पर ये प्रवृत्तियाँ क्या हैं? मैंने एक साधारण सा उदाहरण चुना है कि तुम लोगों को समझ में आ सके। उदाहरण के लिए, अतीत में लोग अपने व्यवसाय को इस प्रकार से चलाते थे जो न तो किसी बूढ़े को धोखा देता था और न ही छोटे को, और जो सामानों को उसी दाम में बेचते थे इसकी परवाह किए बगैर कि कौन खरीद रहा है। क्या यहाँ पर विवेक एवं मानवता का एक संकेत नहीं दिया गया है? अपने व्यवसाय को संचालित करते समय जब लोग इस प्रकार की श्रद्धा का उपयोग करते हैं, तो क्या हम कह सकते हैं कि उनके पास अभी भी कुछ विवेक है, और अभी भी उस समय कुछ मानवता है? (हाँ।) परन्तु धन की हमेशा बढ़ती हुई मात्रा के लिए मनुष्य की माँग के साथ, लोग अनजाने में और भी अधिक धन से प्रेम, लाभ से प्रेम और आनन्द से प्रेम करने लग जाते थे। अतः क्या लोग धन को अत्यंत महत्वपूर्ण चीज़ के रुप में देखने लगे थे? जब लोग धन को अत्यंत महत्वपूर्ण चीज़ के रूप में देखते हैं, तो वे अनजाने में ही अपनी प्रसिद्धि, अपनी प्रतिष्ठा, इज्ज़त, एवं ईमानदारी की उपेक्षा करते हैं; वे इन सभी चीज़ों की उपेक्षा करते हैं, क्या वे उपेक्षा नहीं करते हैं? जब तुम व्यवसाय में संलग्न होते हो, तो तुम किसी और को अलग रास्तों को लेते हुए और लोगों को ठगने के लिए विभिन्न माध्यमों का उपयोग करते हुए और धनी बनते हुए देखते हो। हालाँकि जो धन कमाया गया है वह बेईमानी से प्राप्त हुआ लाभ है, फिर भी वे और भी अधिक धनी बनते जाते हैं। तुम्हारे ही समान उनका पूरा परिवार उसी व्यवसाय में लग जाता है, परन्तु जितना तुम आनन्द उठाते हो उसकी अपेक्षा वे कहीं अधिक जीवन का आनन्द उठाते हैं, और तुम यह कहते हुए बुरा महसूस करते हो: "मैं वैसा क्यों नहीं कर सकता हूँ? मैं उतना क्यों नहीं कमा सकता हूँ जितना वे कमाते हैं? मुझे और अधिक धन प्राप्त करने के लिए, एवं मेरे व्यवसाय की उन्नति के लिए किसी मार्ग के विषय में सोचना होगा।" तब तुम इस पर पूरी तरह से विचार करते हो। धन कमाने के सामान्य तरीके के अनुसार, न तो बूढ़े को और न ही छोटे को ठगते हो और सभों को एक ही कीमत पर सामानों को बेचते हो, तो वह धन जो तुम कमाते हैं वह अच्छे विवेक से है, परन्तु यह तुम्हें जल्दी से अमीर नहीं बना सकता है। फिर भी, लाभ कमाने के आवेग के अंतर्गत, तुम्हारी सोच क्रमिक रूपान्तरण से होकर गुज़रती है। इस रुपान्तरण के दौरान, तुम्हारे आचरण के सिद्धान्त भी बदलना शुरू हो जाते हैं। जब तुम पहली बार किसी को धोखा देते हो, जब तुम पहली बार किसी को ठगते हो, तो तुम्हारे पास अपने कारण होते हैं, यह कहते हुए, "यह आखिरी बार है कि मैं ने किसी को धोखा दिया है और मैं इसे दोबारा नहीं करूँगा। मैं लोगों को धोखा नहीं दे सकता हूँ। लोगों को धोखा देना केवल प्रतिशोध कमाएगा और मेरे ऊपर विनाश लेकर आएगा! यह आखिरी बार है कि मैं ने किसी को धोखा दिया है और मैं इसे दोबारा नहीं करूंगा।" जब तुम पहली बार किसी को धोखा देते हो तो तुम्हारे हृदय में कुछ सन्देह होते हैं; यह मनुष्य के विवेक का कार्य है—सन्देहों का होना और तुम्हारी निन्दा करना, ताकि जब तुम किसी को धोखा देते हो तो असहज महसूस होता है। परन्तु जब तुम किसी को सफलतापूर्वक धोखा दे देते हो उसके पश्चात् तुम देखोगे कि अब तुम्हारे पास पहले की अपेक्षा अधिक धन है, और तुम सोचते हो कि यह तरीका तुम्हारे लिए अत्यंत फायदेमंद हो सकता है। तुम्हारे हृदय में हल्का सा दर्द होने के बावजूद, तुम अभी भी ऐसा महसूस करते हो कि अपनी "सफलता" पर स्वयं को बधाई दें, और तुम्हें स्वयं से थोड़ी बहुत प्रसन्नता का एहसास होता है। क्योंकि पहली बार, तुमने अपने स्वयं के व्यवहार के विषय में मंजूरी दी है और अपने स्वयं के धोखे के विषय में मंजूरी दी है। इसके बाद, जब एक बार मनुष्य को ऐसे धोखे से दूषित कर दिया जाता है, तो वह उस व्यक्ति के समान होता है जो जुए में शामिल होता है और फिर एक जुआरी बन जाता है। अनभिज्ञता में, वह अपने धोखाधड़ी के व्यवहार को मंजूरी देता है और उसे स्वीकार कर लेता है। अनभिज्ञता में, वह धोखाधड़ी को जायज़ व्यावसायिक व्यवहार मान लेता है, और धोखाधड़ी को अपने ज़िन्दा बचे रहने के लिए और अपने जीवन के लिए अत्यंत उपयोगी माध्यम मान लेता है; वह सोचता है कि ऐसा करने के द्वारा वह जल्दी से धनी बन सकता है। इस प्रक्रिया की शुरुआत में लोग इस प्रकार के व्यवहार को स्वीकार नहीं करते हैं, जब तक वे व्यक्तिगत रीति से एवं प्रत्यक्ष रूप से इसकी कोशिश नहीं करते हैं और अपने स्वयं के तरीके से इसके साथ प्रयोग नहीं कर लेते हैं, वे इस व्यवहार को और इस रीति से कार्यों को अंजाम देने को नीची दृष्टि से देखते हैं, और तब उनका हृदय धीरे धीरे रूपान्तरित होना शुरू होता है। अतः यह रूपान्तरण क्या है? यह इस प्रवृत्ति (प्रचलन) की मंजूरी एवं स्वीकृति है, इस प्रकार के विचार की स्वीकृति एवं मंजूरी जिसे तुम्हारी सामाजिक प्रवृत्ति के द्वारा तुम्हारे भीतर डाला गया है। अनभिज्ञता में, तुम महसूस करते हो कि यदि तुम व्यवसाय में धोखा नहीं देते हो तो तुम हानि उठाओगे, यह कि यदि तुम धोखा नहीं देते हो तो तुम किसी चीज़ को खो चुके होगे। अनजाने में, यह धोखाधड़ी तुम्हारी आत्मा, तुम्हारा मुख्य आधार बन जाती है, और साथ ही एक प्रकार का व्यवहार भी बन जाती है जो तुम्हारे जीवन के लिए एक ज़रूरी नियम है। जब मनुष्य इस प्रकार के व्यवहार एवं ऐसी सोच को स्वीकार कर लेता है उसके बाद, क्या मनुष्य का हृदय किसी परिवर्तन से होकर गुज़रता है? तुम्हारा हृदय बदल गया है, अतः क्या तुम्हारी ईमानदारी बदल गई है? क्या तुम्हारी मानवता बदल गई है? (हाँ।) अतः क्या तुम्हारा विवेक बदल गया है? (हाँ।) मनुष्य की सम्पूर्णता एक गुणात्मक परिवर्तन से होकर गुज़रती है, उनके हृदय से लेकर उनके विचारों तक, उस हद तक कि वे भीतर से लेकर बाहर तक बदल जाते हैं। यह परिवर्तन तुम्हें परमेश्वर से दूर और दूर रखता है, तथा तुम और भी अधिक शैतान के अनुरूप, तथा और भी अधिक उसके समान होते जाते हो।

अब इन सामाजिक प्रवृत्तियों को समझना तुम्हारे लिए आसान है। मैंने बस एक सरल उदाहरण को चुना था, साधारण रूप में देखा जानेवाला उदाहरण जिससे लोग परिचित से होंगे। क्या इन सामाजिक प्रवृत्तियों का लोगों पर बड़ा प्रभाव होता है? (हाँ!) अतः क्या इन सामाजिक प्रवृत्तियों का लोगों पर अत्यंत हानिकारक प्रभाव होता है? (हाँ!) लोगों पर बहुत ही गहरा हानिकारक प्रभाव होता है। शैतान मनुष्य की किस चीज़ को भ्रष्ट करने के लिए इन सामाजिक प्रवृत्तियों को एक के बाद एक इस्तेमाल करता है? (विवेक, तर्क, मानवता, नैतिकता।) और क्या? (जीवन के प्रति मनुष्य का दृष्टिकोण।) क्या ये मनुष्य में क्रमिक पतन को अंजाम देते हैं? (हाँ।) शैतान इन सामाजिक प्रवृत्तियों का इस्तेमाल करता है ताकि एक समय में एक कदम उठाकर लोगों को दुष्ट आत्माओं के घोंसले में आने के लिए लुभा सके, ताकि ऐसे लोग जो सामाजिक प्रवृत्तियों में फँस जाते हैं वे अनजाने में ही धन एवं भौतिक इच्छाओं की तरफदारी करें, साथ ही साथ दुष्टता एवं हिंसा की तरफदारी करें। जब एक बार ये चीज़ें मनुष्य के हृदय में प्रवेश कर जाती हैं, तो मनुष्य क्या बन जाता है? मनुष्य दुष्ट शैतान बन जाता है! यह मनुष्य के हृदय में मनोवैज्ञानिक ज्ञान के अर्जन के कारण है? मनुष्य किस बात की तरफदारी करता है? मनुष्य दुष्टता एवं हिंसा को पसन्द करना शुरू कर देता है। वे खूबसूरती या अच्छाई को पसन्द नहीं करते हैं, और शांति को तो बिलकुल भी पसन्द नहीं करते हैं। लोग सामान्य मानवता के साधारण जीवन को जीने की इच्छा नहीं करते हैं, परन्तु इसके बजाए ऊँचे रुतबे एवं अपार धन समृद्धि का आनन्द उठाने की, एवं देह के सुखविलासों में मौज करने की इच्छा करते हैं, और उन्हें रोकने के लिए प्रतिबंधों के बिना और बन्धनों के बिना अपनी स्वयं की देह को संतुष्ट करने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ते हैं। अतः जब मनुष्य इस किस्म की प्रवृत्तियों में डूब जाता है, तो वह ज्ञान जो तुमने सीखा है क्या वह तुम्हें स्वतन्त्र करने में तुम्हारी सहायता कर सकता है? पारम्परिक संस्कृति एवं अंधविश्वास जिन्हें तुम जानते हो क्या वे इस भीषण परिस्थिति को दूर करने में तुम्हारी सहायता कर सकते हैं? पारम्परिक आचार व्यवहार एवं पारम्परिक धार्मिक विधि विधान जिन्हें मनुष्य समझता है क्या वे उन्हें संयम बरतने में सहायता कर सकते हैं? उदाहरण के लिए तीन उत्कृष्ट चरित्र के उदाहरण को लो। क्या यह इन प्रवृत्तियों के रेतीले दलदल[ख] से अपने पावों को बाहर निकालने में लोगों की सहायता कर सकता है? (नहीं, यह नहीं कर सकता।) इस रीति से, मनुष्य और भी अधिक क्या बनता जाता है? और भी अधिक दुष्ट, अभिमानी, अपने को ऊँचा दिखाने वाला, स्वार्थी एवं दुर्भावनापूर्ण। लोगों के बीच में अब और कोई स्नेह नहीं रह गया है, परिवार के सदस्यों के बीच अब और कोई प्रेम नहीं रह गया है, रिश्तेदारों एवं मित्रों के बीच में अब और कोई समझदारी नहीं रह गई है; मानवीय रिश्ते धोखेबाज़ी से भर गए हैं, और हिंसा से भरपूर हो गए हैं। हर एक व्यक्ति अपने साथी मनुष्य के मध्य रहने के लिए धोखा देने के माध्यमों एवं हिंसक तरीकों का उपयोग करना चाहता है; वे झूठ बोलते हैं, धोखा देते हैं और हिंसक हो जाते हैं जिससे अपनी स्वयं की आजीविका पर कब्ज़ा कर सकें; वे हिंसा का इस्तेमाल करके अपने पद स्थान को जीत लेते हैं और स्वयं के लाभों को अर्जित करते हैं और वे हिंसा एवं बुरे तरीकों का उपयोग करके जो कुछ चाहते हैं वह करते हैं। क्या ऐसी मानवता भयावह नहीं है? (हाँ।) अभी अभी मुझे इन चीज़ों के विषय में बात करते हुए सुनने के बाद, क्या तुम लोग नहीं सोचते हो कि इस प्रकार की भीड़ के बीच में रहना, इस संसार में एवं इस पर्यावरण में रहना भयावह है जिसे शैतान ने भ्रष्ट कर दिया है? (हाँ।) अतः क्या तुम लोगों ने कभी अपने आपको अभागा महसूस किया है? अब तुम सब थोड़ा बहुत ऐसा महसूस करते होगे। (हाँ।) तुम लोगों के स्वर को सुनकर, ऐसा प्रतीत होता है मानो तुम लोग सोच रहे हो कि "शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए कितने सारे भिन्न-भिन्न तरीकों का इस्तेमाल करता है। वह प्रत्येक अवसर को झपट लेता है और जहाँ कहीं हम जाते हैं वह वहाँ है। क्या मनुष्य को अभी भी बचाया जा सकता है?" क्या अभी भी मानवजाति के लिए कोई आशा है? क्या मनुष्य अपने आपको बचा सकता है? (नहीं।) क्या जेड सम्राट मनुष्य को बचा सकता है? क्या कन्फयूशियस (चीनी दर्शनशास्त्री) मनुष्य को बचा सकता है? क्या गुआन्यिन (guanyin) बोधिसत्व मनुष्य को बचा सकता है? (नहीं।) अतः मनुष्य को कौन बचा सकता है? (परमेश्वर।) फिर भी, कुछ लोग अपने अपने हृदय में ऐसे प्रश्नों को उठाएँगेः "शैतान हमें इतनी बुरी तरह से हानि पहुँचाता है, इतने पागलपन से कि हमारे पास जीने की कोई उम्मीद नहीं होती है, न ही जीवन में कोई दृढ़ विश्वास होता है। हम सभी भ्रष्टता के बीच में जीते हैं और हर एक व्यक्ति किसी न किसी तरीके से परमेश्वर का प्रतिरोध करता है, जिससे अब हमारा हृदय पूरी तरह से सुन्न हो गया है। अतः जब शैतान हमें भ्रष्ट कर रहा है, तो परमेश्वर कहाँ है? परमेश्वर क्या कर रहा है? जो कुछ भी परमेश्वर हमारे लिए कर रहा है हम उसे कभी महसूस नहीं करते हैं!" कुछ लोग अनिवार्य रूप से कुछ हानि उठाते हैं और अनिवार्य रूप से कुछ निराशा का अनुभव करते हैं। तुम लोगों के लिए, यह अनुभूति एवं यह एहसास बहुत ही गहरा है क्योंकि वह सब जो मैं कहता रहा हूँ वह इसलिए है कि लोगों को धीरे धीरे समझ में आ जाए, कि वे और भी अधिक यह महसूस करें कि वे आशारहित हैं, कि वे और भी अधिक यह महसूस करें कि उन्हें परमेश्वर के द्वारा छोड़ दिया गया है। परन्तु चिंता न करें। आज हमारी संगति का विषय, "शैतान की दुष्टता," हमारी वास्तविक विषय वस्तु नहीं है। फिर भी, परमेश्वर की पवित्रता के सार के बारे में बातचीत करने के लिए, किस प्रकार शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करता है और शैतान की दुष्टता के विषय में हमें पहले बात करना होगा ताकि इसे लोगों के लिए और अधिक स्पष्ट किया जाए कि मानवजाति इस समय किस प्रकार की स्थिति में है और वास्तव में किस हद तक मनुष्य को भ्रष्ट कर दिया गया है। इसके विषय में बात करने का एक लक्ष्य यह है कि लोगों को शैतान की दुष्टता के बारे में जानने की अनुमति दी जाए, जबकि अन्य लक्ष्य यह है कि लोगों को यह समझने की अनुमति दी जाए कि सच्ची पवित्रता क्या है। अब तुम लोग समझ गए हो, क्या तुम लोग नहीं समझे हो?

ये चीज़ें जिनके विषय में मैं ने अभी अभी बात की है क्या वे पिछली बार की अपेक्षा कहीं अधिक विस्तृत हैं? (हाँ।) अतः तो क्या अब तुम लोगों की समझ थोड़ी गहरी हुई है? (हाँ।)

मैं जानता हूँ कि बहुत सारे लोग अपेक्षा कर रहे हैं कि मैं कहूँ कि वास्तव में परमेश्वर की पवित्रता क्या है, परन्तु जब मैं परमेश्वर की पवित्रता के बारे में बात करता हूँ तो मैं सबसे पहले उन कार्यों के बारे में बात करूँगा जिन्हें परमेश्वर करता है। तुम लोगों को ध्यानपूर्वक सुनना चाहिए, तब मैं तुम लोगों से पूछूँगा कि परमेश्वर की पवित्रता वास्तव में क्या है। मैं तुम लोगों को सीधे तौर पर नहीं बताऊँगा, परन्तु इसके बजाए तुम लोगों को ही इसे पता लगाने दूँगा, इसे समझने के लिए तुम लोगों को मौका दूँगा। तुम लोग इस तरीके के बारे में क्या सोचते हो? (यह अच्छा है।) अतः ध्यान से सुनो।

जब कभी शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करता है या बेलगाम क्षति में संलग्न हो जाता है, तो परमेश्वर आलस्य से किनारे खड़ा नहीं रहता है, न तो वह एक तरफ हट जाता है या न ही अपने चुने हुओं को अनदेखा करता है जिन्हें उसने चुना है। वह सब जो शैतान करता है वह बिलकुल स्पष्ट है और उसे परमेश्वर के द्वारा समझा जाता है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि शैतान क्या करता है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वह किस प्रवृत्ति (प्रचलन) को उत्पन्न करता है, क्योंकि परमेश्वर वह सब जानता है जिसे शैतान करने का प्रयास कर रहा है, और परमेश्वर उन लोगों को नहीं छोड़ता है जिन्हें उसने चुना है। इसके बजाए, परमेश्वर कोई ध्यान आकर्षित किए बिना, गुप्त रीति से, शांति से, सब कुछ करता है जो आवश्यक है। जब वह किसी पर कार्य करना प्रारम्भ करता है, जब वह किसी को चुनता है, तो वह इसकी घोषणा किसी पर नहीं करता है, न ही वह इसकी घोषणा शैतान पर करता है, कोई भव्य भाव प्रदर्शन तो बिलकुल भी नहीं करता है। वह बस बहुत शान्ति से, बहुत स्वभाविक रीति से जो ज़रूरी है उसे करता है। पहले, वह तुम्हारे लिए एक परिवार चुनता है; उस परिवार की पृष्ठभूमि किस प्रकार की है, तुम्हारे माता पिता कौन हैं, तुम्हारे पूर्वज कौन हैं—यह सब पहले से ही परमेश्वर के द्वारा निर्धारित किया गया था। दूसरे शब्दों में, ये उस पल के फैसलों की प्रेरणा नहीं थे जिन्हें उसके द्वारा लिया गया था, परन्तु इसके बजाए यह ऐसा कार्य था जिसे लम्बे समय पहले शुरू किया था। जब एक बार परमेश्वर तुम्हारे लिए किसी परिवार का चुनाव करता है, तो वह उस तिथि को भी चुनता है जिसमें तुम्हारा जन्म होता है। वर्तमान में, जब तुम रोते हुए इस संसार में जन्म लेते हो तो परमेश्वर देखता है, तुम्हारे जन्म को देखता है, तुम्हें देखता है जब तुम अपने पहले वचनों को बोलते हो, तुम्हें देखता है जब तुम लड़खड़ाते हो और अपने पहले कदमों को उठाते हो, और सीखते हो कि कैसे चलना है। पहले तुम एक कदम लेते हो फिर दूसरा कदम लेते हो ... अब तुम दौड़ सकते हो, अब तुम कूद सकते हो, अब तुम बातचीत कर सकते हो, अब तुम अपनी भावनाओं को व्यक्त कर सकते हो। इस समय के दौरान, जब मनुष्य बड़ा होने लगता है, शैतान की नज़रें उनमें से प्रत्येक पर जम जाती हैं, जैसे कोई बाघ अपने शिकार को देख रहा हो। परन्तु अपने कार्य को करने में, परमेश्वर कभी भी मनुष्य, घटनाओं या चीज़ों, अन्तराल या समय की सीमाओं से पीड़ित नहीं हुआ है; वह उसे करता है जिसे उसे करना चाहिए और उसे करता जिसे उसे आवश्य करना चाहिए। बड़े होने की प्रक्रिया में, हो सकता है कि तुम कई चीज़ों का सामना करो जो तुम्हें पसन्द न आएँ, और बीमारियों एवं तनावों का सामना करो। परन्तु जैसे-जैसे तुम इस मार्ग पर चलते हो तुम्हारा जीवन एवं तुम्हारा भविष्य सख्ती से परमेश्वर की देखरेख के अधीन होता है। तुम्हारे सम्पूर्ण जीवन में बने रहने के लिए परमेश्वर तुम्हें एक विशुद्ध गारंटी देता है, क्योंकि वह बिलकुल तुम्हारे बगल में ही है, तुम्हारी रक्षा करता है और तुम्हारी देखभाल करता है। इस बात से अनजान, तुम बढ़ते जाते हो। तुम नई नई बातों के सम्पर्क में आने लगते हो और इस संसार को और इस मानवजाति को जानना प्रारम्भ करते हो। तुम्हारे लिए हर एक चीज़ ताज़ा एवं नया होता है। तुम अपने कार्य को करना पसन्द करते हो और तुम उसे करना पसन्द करते हो जो तुमको अच्छा लगता है। तुम अपनी स्वयं की मानवता के भीतर रहते हो, तुम अपने स्वयं के जीवन के दायरे में भीतर जीते हो, और तुम्हारे पास परमेश्वर के अस्तित्व के विषय में जरा सी भी अनुभूति नहीं होती है। परन्तु जैसे जैसे तुम बड़े होते जाते हैं परमेश्वर मार्ग के हर कदम पर तुम्हें देखता है, और तुम्हें देखता है जब तुम आगे की ओर हर कदम उठाते हो। यहाँ तक कि जब तुम ज्ञान अर्जित करते हो, या विज्ञान की पढ़ाई करते हो, किसी भी कदम पर परमेश्वर ने तुम्हें कभी अकेला नहीं छोड़ा है। इस मामले में तुम भी अन्य लोगों के ही समान हो, इस संसार को जानने और उसके साथ सम्पर्क में आने के पथक्रम में, तुमने अपने स्वयं के आदर्शों को स्थापित कर लिया है, तुम्हारे पास तुम्हारे स्वयं के शौक, तुम्हारी स्वयं की रूचियाँ हैं, और साथ ही तुम ऊँची महत्वाकांक्षाओं को भी आश्रय देते हो। तुम अकसर अपने स्वयं के भविष्य पर विचार करते हो, अकसर रूपरेखा खींचते हो कि तुम्हारे भविष्य को कैसा दिखना चाहिए। परन्तु इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि मार्ग पर क्या होता है, क्योंकि परमेश्वर साफ आँखों से सब कुछ देखता है। हो सकता है कि तुम अपने स्वयं के अतीत को भूल गए हो, परन्तु परमेश्वर के लिए, ऐसा कोई नहीं है जो उससे बेहतर तुम्हें समझ सकता है। तुम परमेश्वर की दृष्टि में जीवन बिताते हो, बढ़ते हो, और परिपक्व होते हो। इस समय अवधि के दौरान, परमेश्वर का सबसे महत्वपूर्ण कार्य कुछ ऐसा है जिसका एहसास कोई कभी नहीं करता है, कुछ ऐसा है जिसे कोई नहीं जानता है। परमेश्वर ने निश्चय ही तुम्हें इसके बारे में नहीं बताया है। अतः यह सबसे महत्वपूर्ण चीज़ क्या है? क्या तुम लोग जानते हो? (लोगों को उसके सामने लाना।) अतः लोगों को अपने सामने लाने के लिए परमेश्वर क्या करता है? वह किस समय लोगों को अपने सामने लाता है? क्या तुम लोग जानते हो? क्या यह परमेश्वर का मुख्य कार्य है? क्या यह सबसे महत्वपूर्ण चीज़ है जिसे परमेश्वर करता है? कोई व्यक्ति कह सकता है कि इस बात की गारंटी है कि परमेश्वर किसी व्यक्ति को बचाएगा। इसका अर्थ है कि परमेश्वर इस व्यक्ति को बचाना चाहता है, अतः उसे इसे करना ही होगा, और यह कार्य मनुष्य एवं परमेश्वर दोनों के लिए आवश्यक रूप से महत्वपूर्ण है। क्या तुम लोग इसे जानते हो? ऐसा लगता है कि तुम लोगों के पास इसके विषय में कोई एहसास नहीं है, या इसके विषय में कोई धारणा नहीं है, अतः मैं तुम्हें बताऊँगा। जब तुम्हारा जन्म हुआ उस समय से लेकर अब तक, परमेश्वर ने तुम में बहुत सारे कार्यों को सम्पन्न किया है, परन्तु हर बार जब भी उसने कुछ किया तो उसने तुम्हें नहीं बताया। तुम्हें नहीं जानना था, अतः तुम्हें नहीं बताया गया था, ठीक है? (हाँ।) मनुष्य के लिए, हर चीज़ जो परमेश्वर करता है वह महत्वपूर्ण है। परमेश्वर के लिए, यह ऐसी चीज़ है जिसे उसे करना ही होगा। परन्तु उसके हृदय में कोई महत्वपूर्ण चीज़ है जिसे उसे करने की आवश्यकता है जो इन चीज़ों से कहीं बढ़कर है। वह क्या है? अर्थात्, जब मनुष्य पैदा हुआ था उस समय से लेकर अब तक, परमेश्वर को उनमें से प्रत्येक की सुरक्षा की गारंटी देनी होगी। हो सकता है कि तुम लोग ऐसा महसूस करो मानो तुम लोगों ने पूरी तरह से नहीं समझा है, यह कहते हुए, "क्या यह सुरक्षा इतनी महत्वपूर्ण है?" अतः "सुरक्षा" का शाब्दिक अर्थ क्या है? हो सकता है कि तुम लोग इसे इस अभिप्राय से समझते हो कि यह शांति है या हो सकता है कि तुम लोग इसे इस अभिप्राय से समझते हो कि कभी विपत्ति या आपदा का अनुभव न करना, अच्छे से जीवन बिताना, एक सामान्य जीवन बिताना। परन्तु अपने हृदय में तुम लोगों को जानना होगा कि यह उतना आसान नहीं है। अतः पृथ्वी पर यह क्या चीज़ है जिसके विषय में मैं बात करता रहा हूँ, जिसे परमेश्वर को करना है? परमेश्वर के लिए इसका क्या अर्थ है? क्या यह वास्तव में तुम्हारी सुरक्षा की गारंटी है? ठीक इसी वक्त के समान? नहीं। अतः वह क्या है जो परमेश्वर करता है? इस सुरक्षा का अर्थ यह है कि तुम्हें शैतान के द्वारा फाड़ कर खाया नहीं जा रहा है। क्या यह महत्वपूर्ण है? तुम्हें शैतान के द्वारा फाड़ कर खाया नहीं जा रहा है, अतः क्या यह तुमकी सुरक्षा से सम्बन्धित है, या नहीं? यह वास्तव में तुम्हारी व्यक्तिगत सुरक्षा से सम्बन्धित है, और इससे अधिक महत्वपूर्ण और कुछ भी नहीं हो सकता है। जब एक बार तुम्हें शैतान के द्वारा फाड़ खाया (नष्ट किया) जाता है, तब न तो तुम्हारी आत्मा और न ही तुम्हारा शरीर आगे से परमेश्वर का है। परमेश्वर तुम्हें अब आगे से नहीं बचाएगा। परमेश्वर ऐसी आत्माओं को छोड़ देता है और ऐसे लोगों को छोड़ देता है। अतः मैं कहता हूँ कि सबसे महत्वपूर्ण कार्य जिसे परमेश्वर को करना है वह तुम्हारी सुरक्षा की गारंटी देना है, यह गारंटी देना कि तुम्हें शैतान के द्वारा फाड़ कर खाया नहीं जाएगा। यह अति महत्वपूर्ण है, है कि नहीं? अतः तुम लोग उत्तर क्यों नहीं दे सकते हो? ऐसा प्रतीत होता है कि तुम लोग परमेश्वर की महान दया को महसूस नहीं कर सकते हो!

परमेश्वर मनुष्य को सुरक्षा की गारंटी देने, और यह गारंटी देने के अतिरिक्त बहुत कुछ करता है कि उन्हें शैतान के द्वारा फाड़ कर खाया नहीं जाएगा; वह किसी को चुनने और उनको बचाने की तैयारी में बहुत सारे कार्य करता है। पहला, तुम्हारे पास किस प्रकार का चरित्र है, किस प्रकार के परिवार में तुम पैदा होगे, तुम्हारे माता-पिता कौन हैं, तुम्हारे कितने भाई और बहन हैं, तुम्हारे परिवार की स्थिति एवं आर्थिक दशा क्या है, तुम्हारे परिवार की परिस्थितियाँ क्या हैं—परमेश्वर के द्वारा तुम्हारे लिए इन सब का प्रबंध कड़ी मेहनत से किया जाता है। जहाँ तक अधिकांश लोगों की बात है, क्या तुम लोग जानते हो कि परमेश्वर के चुने हुए लोग अधिकांशतः किस प्रकार के परिवार में पैदा होते हैं? क्या वे प्रमुख परिवार होते हैं? उनमें से कुछ हो सकते हैं। हम निश्चित रूप से कह नहीं सकते हैं कि कोई भी नहीं होते, परन्तु वे बहुत कम होते हैं। क्या वे असाधारण धन-सम्पत्ति वाले परिवार होते हैं, जैसे कि अरबपति या खरबपति? वे प्रायः कभी इस प्रकार के परिवार नहीं होते हैं। अतः परमेश्वर लोगों के लिए अधिकांशतः किस प्रकार के परिवार की व्यवस्था करता है? (साधारण परिवार।) अतः कौन से परिवार साधारण परिवार होते हैं? वे मुख्य तौर पर काम करने वाले परिवार और कृषक परिवार होते हैं। कर्मचारी जीने के लिए अपने वेतन पर आश्रित होते हैं और आधारभूत आवश्यकताओं को जुटा सकते हैं। वे तुम्हें किसी भी सूरत में भूखा रहने नहीं देंगे, परन्तु तुम यह अपेक्षा नहीं कर सकते कि तुम्हारी सारी भौतिक आवश्यकताओं को पूरा किया जाए। कृषक अपने भोजन के लिए फसल उगाने पर आश्रित होते हैं, उनके पास खाने के लिए अन्न होता है और, चाहे जो भी हो, तुम भूखे नहीं रहोगे, परन्तु तुम्हारे पास बहुत अच्छे कपड़े नहीं हो सकते हैं। फिर कुछ ऐसे परिवार हैं जो व्यवसाय में संलग्न हैं या छोटे व्यवसायों को चलाते हैं, और कुछ मातापिता बुद्धिमान होते हैं, और इन्हें भी साधारण परिवार के रूप में ही गिना जा सकता है। कुछ ऐसे माता पिता भी होते हैं जो ज़्यादा से ज़्यादा कार्यालय के कर्मचारी होते हैं या मामूली सरकारी अधिकारी होते हैं, उन्हें भी प्रमुख परिवारों के रुप में नहीं गिना जा सकता है। अधिकतर लोग साधारण परिवारों में पैदा होते हैं, और इन सब का प्रबंध परमेश्वर के द्वारा किया जाता है। कहने का तात्पर्य है, सबसे पहले तो यह वातावरण जिसमें तुम रहते हो वह पर्याप्त साधनों का परिवार नहीं होता जिसकी तुम कल्पना करते हो, बल्कि यह ऐसा परिवार होता है जिसे परमेश्वर के द्वारा तुम्हारे लिए निर्धारित किया गया है, और अधिकांश लोग इस प्रकार के परिवार की सीमाओं के भीतर जीवन बिताएँगे; हम यहाँ पर अपवादों की चर्चा नहीं करेंगे। अतः सामाजिक रुतबे के विषय में क्या कहें? अधिकांश माता-पिता की आर्थिक स्थितियाँ औसत दर्जे की होती हैं और उनके पास ऊँचा सामाजिक रुतबा नहीं होता है—उनके लिए बस किसी रोजगार का होना ही अच्छा है। क्या कोई ऐसे होते हैं जो राज्यपाल हों? क्या कोई ऐसे होते हैं जो राष्ट्रपति हों? (नहीं)। ज़्यादा से ज़्यादा वे ऐसे लोग होते हैं जैसे छोटे व्यवसाय के प्रबंधक या छोटे-मोटे मालिक, जो औसत सामाजिक रुतबे के होते हैं, जो औसत आर्थिक स्थितियों में रहते हैं। अन्य कारक परिवार के जीवन यापन का वातावरण है। सबसे पहले, ऐसे कोई माता-पिता नहीं होते जो स्पष्ट रूप से अपने बच्चों को भविष्यवाणी और भावी कथन के पथ पर चलने के लिए प्रभावित करते हों; ऐसे भी बहुत ही कम होते हैं। अधिकांश माता-पिता बहुत ही सामान्य होते हैं और तुम लोगों के समान ही होते हैं। परमेश्वर ठीक उसी समय लोगों के लिए इस प्रकार के वातावरण को निर्धारित करता है जब वह उन्हें चुनता है, और यह लोगों को बचाने के उसके कार्य के लिए अत्यंत लाभदायक होता है। बाहरी तौर पर, ऐसा प्रतीत होता है कि परमेश्वर ने मनुष्य के लिए ऐसा कुछ नहीं किया है जो पृथ्वी को हिला दे; वह बस सब-कुछ गुप्त रीति से, विनम्रता से और खामोशी से करता है। परन्तु वास्तव में, वह सब जो परमेश्वर करता है तुम्हारे उद्धार हेतु एक नींव डालने के लिए, आगे के मार्ग को तैयार करने के लिए और तुम्हारे उद्धार के लिए सभी आवश्यक स्थितियों को तैयार करने के लिए करता है। तत्काल ही प्रत्येक व्यक्ति के निर्दिष्ट समय पर, परमेश्वर उन्हें वापस अपने सामने लाता है—जब परमेश्वर की आवाज़ सुनने के लिए तुम्हारा समय आता है, तब यह वह समय होता है जब तुम उसके सामने आते हो। उस समय जब यह घटित होता है, कुछ लोग तो पहले ही स्वयं माता-पिता बन चुके होते हैं, जबकि अन्य लोग तो सिर्फ किसी के बच्चे होते हैं। दूसरे शब्दों में, कुछ लोगों ने विवाह कर लिया होता है और उनके बच्चे हो जाते हैं जबकि अन्य लोग अभी भी अकेले ही होते हैं, उन्होंने अभी तक अपने परिवार शुरू नहीं किये होते हैं। परन्तु लोगों की स्थितियों की परवाह किए बगैर, परमेश्वर ने पहले से ही समय को निर्धारित कर दिया है जब तुम्हें चुना जाएगा और जब उसका सुसमाचार और वचन तुम तक पहुँचेगा। परमेश्वर ने परिस्थितियों को निर्धारित किया है, किसी व्यक्ति या किसी सन्दर्भ को निर्धारित किया है जिसके माध्यम से तुम तक सुसमाचार पहुँचाया जाएगा, ताकि तुम परमेश्वर के वचन को सुन सको। परमेश्वर ने तुम्हारे लिए पहले से ही सभी आवश्यक परिस्थितियों को तैयार कर लिया है ताकि, अनजाने में, तुम उसके सामने आ जाओ और परमेश्वर के परिवार में वापस लौट जाओ। तुम भी अनजाने में परमेश्वर का अनुसरण करते हो और उसके कदम दर कदम कार्य में प्रवेश करते हो, परमेश्वर के कार्य करने के तरीके में प्रवेश करते हो जिसे उसने तुम्हारे लिए कदम दर कदम तैयार किया है। सभी कार्यों में सबसे छोटा कार्य जिसे परमेश्वर करता है और जिसे इस समय मनुष्य को देता है वह सर्वप्रथम वह देखभाल एवं सुरक्षा है जिसका मनुष्य लाभ उठाता है, और यह वास्तव में सच्चा है। अतः परमेश्वर किस प्रकार के तरीकों का इस्तेमाल करता है? परमेश्वर विभिन्न लोगों, घटनाओं, एवं चीज़ों को व्यवस्थित करता है ताकि मनुष्य उनमें परमेश्वर के अस्तित्व एवं कार्यों को देख सके। उदाहरण के लिए, कुछ ऐसे लोग होते हैं जो परमेश्वर पर विश्वास करते हैं क्योंकि उनके परिवार में कोई बीमार है, और वे कहते हैं "मेरे परिवार का एक सदस्य बीमार है, मैं क्या करूं?" तब कुछ लोग कहते हैं "यीशु में विश्वास करो!" अतः वे परमेश्वर पर विश्वास करना प्रारम्भ कर देते हैं, और परमेश्वर में यह विश्वास परिस्थिति के कारण आया है। अतः किसने इस परिस्थिति का निर्माण किया है? (परमेश्वर ने।) उस परिस्थिति के माध्यम से वे परमेश्वर की ओर फिरते हैं। कुछ इस तरह के परिवार होते हैं जहाँ सभी विश्वासी होते हैं, बच्चे और बूढ़े, जबकि कुछ ऐसे भी परिवार होते हैं जहाँ विश्वास व्यक्तिगत होता है। अतः तुम मुझे बताओ, उस विश्वासी ने परमेश्वर से क्या प्राप्त किया है? जाहिर तौर पर बीमारी आई है, परन्तु वास्तव में यह एक परिस्थिति है जिसका निमाण इसलिए किया गया है ताकि वह परमेश्वर के सामने आए—यह परमेश्वर की कृपा है। क्योंकि कुछ लोगों का पारिवारिक जीवन कठिन होता है और वे कोई शान्ति नहीं पा सकते हैं, एक अनपेक्षित अवसर साथ में आता है जहाँ कोई सुसमाचार देगा और कहेगा "तुम्हारे परिवार के लिए यह कठिन समय है। यीशु में विश्वास करो। यीशु में विश्वास करो। और तुम्हें शान्ति मिलेगी।" अवचेतन रूप से, तब यह व्यक्ति अत्यंत स्वाभाविक परिस्थितियों के अंतर्गत परमेश्वर में विश्वास करने लगता है, अतः क्या यह एक प्रकार की परिस्थिति नहीं है? (है।) और क्या उसके परिवार को ऐसे अनुग्रह से शान्ति नहीं मिलती है जिसे परमेश्वर के द्वारा प्रदान किया गया है? (मिलती है।) अच्छा, यहाँ पर कुछ ऐसे लोग भी हैं जो कुछ अन्य कारणों से परमेश्वर पर विश्वास करने लगते हैं, परन्तु इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि कौन-सा कारण तुम्हारे अंदर उसके प्रति विश्वास पैदा करता है, इन सबका प्रबंध एवं मार्गदर्शन वास्तव में बिना किसी सन्देह के परमेश्वर के द्वारा किया जाता है।

पहले तो परमेश्वर ने तुम्हें चुनने के लिए और तुम्हें अपने परिवार में लाने के लिए विभिन्न तरीकों का प्रयोग किया। यह पहला कार्य है जिसे वह करता है और यह एक अनुग्रह है जिसे वह हर एक व्यक्ति को देता है। अब अंत के दिनों में परमेश्वर के कार्य के साथ, वह मनुष्य को सिर्फ अनुग्रह एवं आशीषें ही नहीं देता है जैसा उसने शुरुआत में किया था, न ही वह लोगों को आगे बढ़ने के लिए फुसलाता है—यह अनुग्रह के युग में कार्य की उस नींव के कारण है। इन अंत के दिनों के कार्य के दौरान, परमेश्वर के कार्य के सभी पहलुओं से मनुष्य ने क्या देखा जिन्हें उन्होंने अनुभव किया है? उन्होंने न केवल परमेश्वर के प्रेम को देखा है, बल्कि परमेश्वर के न्याय एवं ताड़ना को भी देखा है। इस समय, परमेश्वर मनुष्य को और अधिक प्रदान करता है, सहारा देता है, और मनुष्य को प्रकाशन एवं मार्गदर्शन देता है, जिससे वे धीरे-धीरे उसके इरादों को जानने लगें, उन वचनों को जानने लगें जिन्हें वह बोलता है और उस सच्चाई को जानने लगें जिसे वह मनुष्य को प्रदान करता है। जब मनुष्य कमज़ोर होता है, जब वे हतोत्साहित होते हैं, जब उनके पास कहीं और जाने के लिए कोई स्थान नहीं होता है, तब परमेश्वर उन्हें राहत, सलाह, एवं प्रोत्साहन देने के लिए अपने वचनों का उपयोग करेगा, ताकि कम हैसियत वाला मनुष्य धीरे-धीरे अपनी सामर्थ्य को पा सके, सकारात्मकता में खड़ा हो जाए और परमेश्वर के साथ सहयोग करने के लिए तैयार हो जाए। परन्तु जब मनुष्य परमेश्वर की आज्ञा का उल्लंघन करता है या उसका विरोध करता है, या जब वे अपनी स्वयं की भ्रष्टता को प्रगट करते हैं और परमेश्वर का विरोध करते हैं, तब परमेश्वर उनको ताड़ना देने में और उन्हें अनुशासित करने में कोई दया नहीं दिखाएगा। फिर भी, मनुष्य की मूर्खता, अज्ञानता, दुर्बलता, एवं अपरिपक्वता के प्रति परमेश्वर सहिष्णुता एवं धैर्य दिखाएगा। इस रीति से, उस समस्त कार्य के माध्यम से जिसे परमेश्वर मनुष्य के लिए करता है, मनुष्य धीरे-धीरे परिपक्व होता है, बढ़ता है, और परमेश्वर के इरादों को जानने लगता है, कुछ सच्चाई जानने लगता है, सकारात्मक चीज़ें क्या हैं और नकारात्मक चीज़ें क्या हैं, उनको जानने लगता है, और यह जानने लगता है कि बुराई क्या है और अंधकार क्या है। परमेश्वर हमेशा मनुष्य को प्रताड़ित एवं अनुशासित नहीं करता रहता है, न ही वह हमेशा सहिष्णुता एवं धैर्य दिखाता है। बल्कि उनकी विभिन्न अवस्थाओं में और उनके अलग-अलग हैसियत एवं क्षमता के अनुसार वह विभिन्न तरीकों से प्रत्येक व्यक्ति के लिए आपूर्ति करता है। वह मनुष्य के लिए अनेक कार्य करता है और बड़ी कीमत पर करता है; मनुष्य इस कीमत के विषय में या इन कार्यों के विषय में जिन्हें परमेश्वर करता है कुछ भी एहसास नहीं करता है, फिर भी वह जो कुछ करता है उसे वास्तविकता में हर एक व्यक्ति के लिये सम्पन्न किया जाता है। परमेश्वर का प्रेम सच्चा हैः परमेश्वर के अनुग्रह के माध्यम से मनुष्य एक के बाद एक आपदा को टालता है, जबकि मनुष्य की दुर्बलता के लिए, परमेश्वर समय-समय पर अपनी सहिष्णुता दिखाता है। परमेश्वर का न्याय एवं ताड़ना लोगों को मानवजाति की भ्रष्टता और उनके भ्रष्ट शैतानी सार को धीरे-धीरे जानने की अनुमति देते हैं। जो कुछ परमेश्वर प्रदान करता है, मनुष्य के लिए उसका प्रकाशन एवं उसका मार्गदर्शन वे सब मानवजाति को अनुमति देते हैं कि वे सत्य के सार को और भी अधिक जानें, और लगातार यह जानें कि लोगों की क्या आवश्यकता है, उन्हें कौन-सा मार्ग लेना चाहिए, उन्हें किसके लिए जीना है, उनकी ज़िंदगी का मूल्य एवं अर्थ क्या है, और आगे के मार्ग पर कैसे चलना है। ये सभी कार्य जिन्हें परमेश्वर करता है वे उसके एकमात्र मूल उद्देश्य से अभिन्न हैं। तो यह उद्देश्य क्या है? क्या तुम लोग जानते हो? परमेश्वर मनुष्य पर अपने कार्य को क्रियान्वित करने के लिए इन तरीकों का उपयोग क्यों करता है? वह क्या परिणाम प्राप्त करना चाहता है? दूसरे शब्दों में, वह मनुष्य में क्या देखना चाहता है और उनसे क्या प्राप्त करना चाहता है? जो कुछ परमेश्वर देखना चाहता है वह यह है कि मनुष्य के हृदय को पुनर्जीवित किया जा सके। दूसरे शब्दों में, ये तरीके जिन्हें वह मनुष्य में कार्य करने के लिए उपयोग करता है वे मनुष्य के हृदय को निरन्तर जागृत करने के लिए हैं, मनुष्य के आत्मा को जागृत करने के लिए हैं, मनुष्य को यह जानने के लिए हैं कि वे कहाँ से आए हैं, कौन उन्हें मार्गदर्शन दे रहा है, उनकी सहायता कर रहा है, उनके लिए आपूर्ति कर रहा है, और किसकी बदौलत मनुष्य अब तक जीवित है; वे मनुष्य को यह जानने देने के लिए हैं कि सृष्टिकर्ता कौन है, उन्हें किसकी आराधना करनी चाहिए, उन्हें किस प्रकार के मार्ग पर चलना चाहिए, और मनुष्य को किस रीति से परमेश्वर के सामने आना चाहिए; मनुष्य के हृदय को धीरे-धीरे पुनर्जीवित करने के लिए उनका उपयोग किया जाता है, इस प्रकार मनुष्य परमेश्वर के हृदय को जान पाता है, परमेश्वर के हृदय को समझ पाता है, और मनुष्य को बचाने के लिए उसके कार्य के पीछे की बड़ी देखभाल एवं विचार को समझ पाता है। जब मनुष्य के हृदय को पुनर्जीवित किया जाता है, तब वे आगे से एक पतित एवं भ्रष्ट स्वभाव के जीवन को जीने की इच्छा नहीं करते हैं, बल्कि परमेश्वर की संतुष्टि के लिये सत्य की खोज करने की इच्छा करते हैं। जब मनुष्य के हृदय को जागृत कर दिया जाता है, तो वे शैतान के साथ स्थायी रूप से सम्बन्ध तोड़ने में सक्षम हो जाते हैं, शैतान उन्हेंअब आगे से कोई हानि नहीं पहुँचा पाता है, उन्हें अब आगे से नियंत्रित नहीं कर पाता या मूर्ख नहीं बना पाता है। बल्कि, मनुष्य परमेश्वर के हृदय को संतुष्ट करने के लिए परमेश्वर के कार्य में और उसके वचन में सकारात्मक रूप से सहयोग कर सकता है, इस प्रकार परमेश्वर के भय को प्राप्त करता है और बुराई से दूर रहता है। यह परमेश्वर के कार्य का मूल उद्देश्य है।

इस वक्त शैतान की बुराई के बारे में बात करने से हर एक को ऐसा महसूस हुआ है मानो लोग कितनी अप्रसन्नता में जीवन जीते हैं और यह कि मनुष्य का जीवन दुर्भाग्य से घिरा हुआ होता है। परन्तु अब तुम लोग कैसा महसूस करते हो जबकि मैंने परमेश्वर की पवित्रता और उस कार्य के बारे में बातचीत की है जिसे वह मनुष्य पर करता है? (अत्यधिक प्रसन्नता।) हम अब देख सकते हैं कि जो कुछ भी परमेश्वर करता है, वह सब बेदाग है जिसे वह अत्यंत परिश्रम से मनुष्य के लिए व्यवस्थित करता है। हर एक कार्य जिसे परमेश्वर करता है वह बिना किसी गलती के होता है, यानी कि यह त्रुटिहीन होता है, सुधारने, सलाह देने या कोई बदलाव करने के लिए किसी की ज़रूरत नहीं होती है। परमेश्वर प्रत्येक प्राणी के लिए जो कुछ करता है, वह सन्देह से परे होता है; वह अपने हाथ से हर किसी की अगुवाई करता है, हर क्षण तुम्हारी देखरेख करता है और तुम्हारा साथ कभी नहीं छोड़ता है। चूंकि लोग इस प्रकार के वातावरण में पलते हैं और इस प्रकार की पृष्ठभूमि में पलते हैं, क्या हम कह सकते हैं कि लोग वास्तव में परमेश्वर की हथेली में पलते हैं? (हाँ।) अतः क्या अब भी तुम लोगों को नुकसान का एहसास होता है? (नहीं।) क्या कोई अभी भी हतोत्साहित महसूस करता है? (नहीं) अतः क्या कोई ऐसा महसूस करता है कि परमेश्वर ने मानवजाति को छोड़ दिया है? (नहीं) तो आखिर परमेश्वर ने किया क्या है? (वह मानवजाति को सुरक्षित रखता है।) जो कुछ परमेश्वर करता है उसके पीछे के महान विचार एवं देखभाल सवालों से परे है। और क्या कहें, परमेश्वर जब इस कार्य को क्रियान्वित करता है, तो उसने कभी भी किसी के सामने कोई शर्त नहीं रखी है या कोई अपेक्षा नहीं की है कि तुम उस कीमत को जानो जो उसने तुम्हारे लिए चुकाई है, ताकि तुम उसके प्रति अत्यंत आभारी महसूस करो। क्या परमेश्वर ने पहले कभी ऐसा कुछ किया है? (नहीं।) अपने लम्बे जीवन में, मूलत: प्रत्येक व्यक्ति ने अनेक खतरनाक परिस्थितियों का सामना किया है और वह अनेक प्रलोभनों से होकर गुज़र चुका है। यह इसलिए है क्योंकि शैतान बिलकुल तुम्हारे बगल में है, उसकी आंखें निरन्तर तुम्हारे ऊपर जमी होती हैं। वह इसे पसन्द करता है जब तुम पर आपदा आती है, विपदाएँ हैं, जब तुम्हारे लिए कुछ भी सही नहीं होता है तो उसे अच्छा लगता है, और जब तुम शैतान के जाल में फँस जाते तो तो उसे अच्छा लगता है। जहाँ तक परमेश्वर की बात है, वह निरन्तर तुम्हारी सुरक्षा कर रहा है, एक के बाद एक दुर्भाग्य से और एक के बाद एक आपदा से तुम्हें बचा रहा है। इसीलिए मैं कहता हूँ कि जो कुछ शान्ति एवं आनन्द, आशीषें एवं व्यक्तिगत सुरक्षा—मनुष्य के पास है, वह सब-कुछ वास्तव में परमेश्वर के अधीन है, और वह प्रत्येक प्राणी के जीवन एवं उसकी नियति का मार्गदर्शन एवं निर्धारण करता है। परन्तु क्या परमेश्वर के अंदर अपनी पदस्थिति को लेकर किसी तरह का कोई अहंकार का भाव है, जैसा कि कुछ लोग कहते हैं? तुम्हें ऐसा कहना कि "मैं सबसे महान हूँ, वह मैं हूँ जो तुम लोगों की ज़िम्मेदारी लेता है, तुम लोगों को मुझ से अवश्य दया की भीख माँगनी चाहिए और आज्ञा उल्लंघन करने वालों को मृत्युदंड दिया जाएगा।" क्या परमेश्वर ने कभी मानवजाति को इस प्रकार से धमकी दी है? (नहीं) क्या उसने कभी कहा है "मानवजाति भ्रष्ट है अतः इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि मैं उनसे कैसा व्यवहार करता हूँ, मैं कैसा भी मनमाना व्यवहार कर सकता हूँ; मुझे उनके लिए चीज़ों को बहुत अच्छे ढंग से व्यवस्थित करने की कोई आवश्यकता नहीं है।" क्या परमेश्वर इस तरह से सोचता है? (नहीं।) अतः क्या परमेश्वर ने इस रीति से कार्य किया है? (नहीं) इसके विपरीत, प्रत्येक व्यक्ति से परमेश्वर का बर्ताव सच्चा एवं ज़िम्मेदारीपूर्ण है, यहाँ तक कि जितना तुम स्वयं के प्रति ज़िम्मेदार हो उससे भी कहीं अधिक। क्या ऐसा ही नहीं है? परमेश्वर व्यर्थ में बात नहीं करता है, न ही वह ऊँचाई पर खड़ा होकर हवा में बात करता है और न ही वह मनुष्य को मूर्ख बनाकर काम चलता है। बल्कि वह ईमानदारी एवं खामोशी से उन कार्यों को करता है जिन्हें उसे स्वयं करने की आवश्यकता है। ये चीज़ें मनुष्य के लिए आशीषें, शान्ति एवं आनन्द लाती हैं, वे मनुष्य को शांति एवं प्रसन्नता से परमेश्वर की दृष्टि के सामने और उसके परिवार में लाती हैं और वे मनुष्य के लिए सही वजह, सही सोच, सही न्याय, एवं सही मनःस्थिति लाती हैं जिनकी उन्हें आवश्यकता है ताकि परमेश्वर के सामने आएँ और परमेश्वर के उद्धार को प्राप्त करें। अतः क्या परमेश्वर अपने कार्य में मनुष्य के साथ कभी धोखेबाज़ रहा है? (नहीं)। क्या उसने कभी उदारता का झूठा प्रदर्शन किया है, कुछ हँसी-मजाक के साथ मनुष्य को मनाया है, फिर मनुष्य से मुँह फेर लिया हो? (नहीं।) क्या परमेश्वर ने कभी कोई बात कही हो और फिर दूसरा कार्य किया हो? (नहीं) क्या परमेश्वर ने यह कहते हुए कभी खोखले वादे किए हैं और घमण्ड किया है कि वह तुम्हारे लिए यह कर सकता है या वह करने के लिए तुम्हारी सहायता कर सकता है, और फिर गायब हो गया हो? (नहीं।) परमेश्वर में कोई छल नहीं है, और कोई झूठ नहीं है। परमेश्वर विश्वासयोग्य है और जो कुछ वह करता है वह सही एवं वास्तविक है। वह ही ऐसा एकमात्र शख्स है जिस पर लोग भरोसा कर सकते हैं परमेश्वर ही एकमात्र ऐसा है जिसे लोग अपना जीवन एवं अपना सब कुछ सौंप सकते हैं। चूँकि परमेश्वर में कोई छल नहीं है, तो क्या हम ऐसा कह सकते हैं कि वह सबसे अधिक ईमानदार है? (हाँ।) निश्चित रूप से हम कह सकते हैं, ठीक है न? हालाँकि, इस शब्द के विषय में अभी बात करना, जब इसे परमेश्वर पर लागू करते हैं तो यह अत्यंत दुर्बल लगता है, बहुत मानवीय, लेकिन कुछ नहीं कर सकते चूँकि मानवीय भाषा की अपनी सीमाएँ हैं। यहाँ पर परमेश्वर को ईमानदार कहना थोड़ा सा अनुचित लगता है, परन्तु हम कुछ समय के लिए इसी शब्द का उपयोग करेंगे। परमेश्वर विश्वासयोग्य एवं ईमानदार है, है कि नहीं? (हाँ, है।) अतः इन पहलुओं के बारे में बात करने का हमारा क्या अभिप्राय है? क्या हमारा अभिप्राय परमेश्वर एवं मनुष्य के बीच और परमेश्वर एवं शैतान के बीच भिन्नताओं से है? हम ऐसा कह सकते हैं क्योंकि मनुष्य परमेश्वर में शैतान के भ्रष्ट स्वभाव का कोई नामों निशान नहीं देखता है। ऐसा कहने में क्या मैं सही हूँ? क्या मैं इसके लिए आमीन सुन सकता हूँ? (आमीन!) हम शैतान की किसी भी बुराई को परमेश्वर में प्रगट होते हुए नहीं देखते हैं। वह सब जिसे परमेश्वर अंजाम देता है और प्रगट करता है वह पूरी तरह से मनुष्य के लिए लाभप्रद एवं सहायक है, वह पूरी तरह से मनुष्य को प्रदान करने के लिए है, वह जीवन से भरपूर है और मनुष्य को अनुसरण करने के लिए एक मार्ग और चलने के लिए एक दिशा देता है। इसके अतिरिक्त, परमेश्वर भ्रष्ट नहीं है और इस वक्त हर एक चीज़ जिसे परमेश्वर करता है उसे देखने पर, क्या हम कह सकते हैं कि परमेश्वर पवित्र है? (हाँ।) चूँकि परमेश्वर के पास मानवजाति की कोई भ्रष्टता नहीं है और यहाँ तक कि दूर-दूर तक उसके पास मानवजाति के भ्रष्ट स्वभाव या शैतान का सार के समान ऐसा कुछ भी नहीं है, तो इस दृष्टिकोण से हम कह सकते हैं कि परमेश्वर पवित्र है। परमेश्वर कोई भ्रष्टता प्रगट नहीं करता है, और उसके कार्य में उसके स्वयं के सार का प्रकाशन ही हमारे लिये आवश्यक इस बात की पूरी पुष्टि है कि स्वयं परमेश्वर पवित्र है। क्या अब तुम लोग देख रहे हो? कहने का तात्पर्य है, परमेश्वर के पवित्र सार को जानने के लिए, कुछ समय के लिए आइए हम इन दो पहलुओं पर नज़र डालें: 1) परमेश्वर में कोई भ्रष्ट स्वभाव नहीं है; 2) मनुष्य पर किए गए परमेश्वर के कार्य का सार मनुष्य को परमेश्वर के स्वयं के सार को देखने की अनुमति देता है और यह सार पूरी तरह से सकारात्मक एवं वास्तविक है। क्योंकि ऐसी कौन सी चीज़ें हैं जिन्हें परमेश्वर के कार्य का हर तरीका मनुष्य के लिए लेकर आता है? वे सभी सकारात्मक चीज़ें हैं, वे सब प्रेम हैं, सारी सच्चाई एवं सारी वास्तविकता है। सबसे पहले, परमेश्वर अपेक्षा करता है कि मनुष्य ईमानदार हो—क्या यह सकारात्मक नहीं है? परमेश्वर मनुष्य को बुद्धि देता है—क्या यह सकारात्मक नहीं है? परमेश्वर मनुष्य को भले एवं बुरे के बीच परख करने के लिए सक्षम बनाता है—क्या यह सकारात्मक नहीं है? वह मनुष्य को मानवीय जीवन के अर्थ एवं मूल्य समझने की अनुमति देता है—क्या यह सकारात्मक नहीं है? वह मनुष्य को सत्य की अनुरूपता में लोगों, घटनाओं, एवं चीज़ों के सार के भीतर देखने की अनुमति देता है—क्या यह सकारात्मक नहीं है? (है।) और इन सब का परिणाम यह है कि मनुष्य अब शैतान के द्वारा धोखा नहीं खाता है, अब शैतान के द्वारा उसे लगातार नुकसान नहीं पहुँचाया जाता है या उसके द्वारा नियन्त्रित नहीं किया जाता है। दूसरे शब्दों में, वे लोगों को अनुमति देते हैं कि शैतान की भ्रष्टता से अपने आप को पूरी तरह से स्वतन्त्र करा लें, और इसलिए वे धीरे-धीरे परमेश्वर का भय मानने एवं बुराई से दूर रहने के मार्ग पर चलते हैं। अब तक तुम लोग इस पथ पर कितनी दूर तक चल चुके हो? यह कहना कठिन है, नहीं क्या? परन्तु कम से कम अब क्या तुम लोगों के पास इस बात की प्रारम्भिक समझ है कि शैतान किस प्रकार मनुष्य को भ्रष्ट करता है, और कौन-सी चीज़ें बुरी हैं एवं कौन-सी नकारात्मक हैं? (हाँ।) इस प्रारम्भिक समझ के साथ, तुम लोग कम से कम अब सही पथ पर चल रहे हो, सत्य को जानने लगे हो, जीवन की रोशनी को देखने लगे हो, और इस प्रकार परमेश्वर में तुम लोगों का विश्वास ज़्यादा बढ़ा है।

अब हम परमेश्वर की पवित्रता के बारे में बात करना समाप्त करेंगे, अतः तुम लोगों के बीच में ऐसा कौन है जो, वह सब जिसे तुम लोगों ने सुना और प्राप्त किया है उससे, यह कह सकता है कि परमेश्वर की पवित्रता क्या है? परमेश्वर की पवित्रता किसकी ओर संकेत करती है जिसके विषय में मैं ने बता की है? एक पल के लिए इसके विषय में सोचिए। परमेश्वर की पवित्रता क्या है? क्या परमेश्वर की सत्यता ही उसकी पवित्रता है? (हाँ) क्या परमेश्वर की विश्वासयोग्यता ही उसकी पवित्रता है? (हाँ।) क्या परमेश्वर की निःस्वार्थता ही उसकी पवित्रता है? (हाँ।) क्या परमेश्वर की विनम्रता ही उसकी पवित्रता है? (हाँ।) क्या मनुष्य के लिए परमेश्वर का प्रेम ही उसकी पवित्रता है? (हाँ।) परमेश्वर मनुष्य को मुफ्त में सत्य एवं जीवन प्रदान करता है—क्या यह ही उसकी पवित्रता है? (हाँ।) यह सब जिसे परमेश्वर प्रगट करता है वह अद्वितीय है; यह भ्रष्ट मानवता के भीतर मौजूद नहीं है, न ही इसे वहाँ देखा जा सकता है। मनुष्य के विषय में शैतान की भ्रष्टता की प्रक्रिया के दौरान, इसका थोड़ा सा भी नामों निशान नहीं देखा जा सकता है, न तो शैतान के भ्रष्ट स्वभाव में और न ही शैतान के सार या स्वभाव में। अतः जो कुछ परमेश्वर के पास है और जो वह है वह अद्वितीय है और केवल स्वयं परमेश्वर के पास ही इस प्रकार का सार है, केवल स्वयं परमेश्वर ही इस प्रकार के सार को धारण करता है। अब तक इस पर चर्चा करने के बाद, क्या तुम लोगों में से किसी ने मानवजाति में इस प्रकार के पवित्र जन को देखा है? (नहीं।) अतः प्रसिद्ध लोगों, महान लोगों और उन आदर्शों के मध्य क्या कोई इतना पवित्र है जिनकी तुम लोग मानवजाति के बीच आराधना करते हो? (नहीं।) ऐसा कोई तो बिलकुल भी नहीं है जिसे पवित्र कहा जा सकता है! अविश्वासियों के तथाकथित संत वे सभी पाखंड करनेवाले ढोंगी हैं और वे अत्यंत धूर्त हैं, और अत्यंत घातक शैतान हैं। यह परम सत्य से कुछ कम नहीं है। अब हम केवल यह कह सकते हैं कि केवल परमेश्वर ही सचमुच में पवित्र है, यह कि परमेश्वर की पवित्रता अद्वितीय है और केवल वह ही इस नाम में और साथ ही साथ सत्य में इसे मूर्त रूप दे सकता है। इसके अतिरिक्त, इसका व्यावहारिक पक्ष भी है। क्या इस पवित्रता जिसके विषय में मैं अब बात करता हूँ और उस पवित्रता के बीच में कोई भिन्नता है जिसके विषय में तुम लोगों ने पहले सोचा था एवं कल्पना की थी? (हाँ।) तो यह अन्तर कितना बड़ा है? (बहुत ही बड़ा!) तुम लोगों के अपने ही वचनों का उपयोग करते हुए, लोगों का अभिप्राय प्रायः क्या होता है जब वे पवित्रता के बारे में बात करते हैं? (कुछ बाहरी व्यवहार।) व्यवहार या कुछ वर्णन करते समय, वे कहते हैं कि यह पवित्र है। अतः क्या "पवित्रता" का यह वर्णन एक सिद्धान्त है? यह बस कुछ ऐसा है जो साफ एवं सुन्दर दिखाई देता है, कुछ ऐसा है जो लोगों को अच्छा दिखाई एवं सुनाई तो देता है, किन्तु पवित्रता का कोई सच्चा सार नहीं होता है। जो कुछ लोग कल्पना करते हैं कि पवित्रता ऐसी होनी चाहिए इसके विषय में कुछ भी वास्तविक नहीं है। इसके अलावा, वह "पवित्रता" जिसके विषय में लोग सोचते हैं वह वास्तव में किसकी ओर संकेत करता है? क्या यह वही है जिसकी वे कल्पना या आँकलन करते है कि यह ऐसा है? उदाहरण के लिए, अभ्यास करते समय कुछ बौद्ध लोग मर जाते हैं, जब वे आसन लगाकर सो जाते हैं तब गुज़र जाते हैं। कुछ लोग कहते हैं कि वे पवित्र हो गए हैं और स्वर्ग की ओर उड़ गए हैं। यह भी एक प्रकार की कल्पना है। फिर कुछ ऐसे लोग हैं जो यह सोचते हैं कि एक परी जो स्वर्ग से नीचे उतरती है वह पवित्र है। साथ ही कुछ ऐसे भी लोग हैं जो सोचते हैं कि कभी शादी न करना, दरिद्रता से भोजन करना एवं कपडे पहनना और अपने जीवन भर दुख सहना पवित्रता है। वास्तव में, "पवित्रता" के शब्द के बारे में लोगों की धारणा हमेशा से ही सिर्फ एक प्रकार की खोखली कल्पना एवं सिद्धान्त रहा है जिसमें मूलरूप कोई सच्चा सार नहीं है, और इसके अतिरिक्त इसका पवित्रता के सार के साथ कोई लेना देना नहीं है। पवित्रता का सार सच्चा प्रेम है, परन्तु इससे भी अधिक यह सत्य, धार्मिकता एवं ज्योति का सार है। "पवित्र" शब्द केवल तभी उपयुक्त होता है जब इसे परमेश्वर के लिए लागू किया जाता है; सृष्टि में ऐसा कोई नहीं है जो पवित्र कहलाने के योग्य हो। मनुष्य को इसे समझना होगा। सच्ची पवित्रता क्या है उसे न जानना परमेश्वर को नहीं जानना है। केवल परमेश्वर ही पवित्र है, और यह एक निर्विवादित सत्य है।

आओ हम इसके विषय में बात करने के लिए पीछे जाएँ कि शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए कौन से माध्यमों को काम में लाता है। हमने अभी अभी परमेश्वर के विभिन्न तरीकों के विषय में बात की है जिसके अंतर्गत परमेश्वर मनुष्य पर कार्य करता है जिसे तुम लोगों में से हर एक स्वयं के लिए अनुभव कर सकता है, अतः मैं अधिक विस्तार में नहीं जाऊँगा। परन्तु अपने हृदयों में कदाचित् तुम लोग उन साधनों के बारे में अस्पष्ट हो जिन्हें शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए इस्तेमाल करता है, या तुम विस्तृत रूप से उसके बारे में नहीं जानते हो, अतः इसके बारे में बात करना तुम लोगों को लाभ पहुँचाएगा। क्या तुम लोग इसे समझना चाहते हो? (हाँ।) हो सकता है कि तुम लोगों में से कुछ लोग पूछोगेः "शैतान के बारे में फिर से बात क्यों करना? हमने पहले ही देख लिया है कि शैतान दुष्ट है और हमने पहले से ही शैतान से घृणा की है, अतः क्या शैतान हमें अभी भी भ्रष्ट कर सकता है?" वास्तव में, हालाँकि हो सकता है कि तुम लोग शैतान से घृणा करो, फिर भी तुम लोग इसकी सही प्रकृति का पूरी तरह से पता नहीं लगा सकते हो। ऐसी कुछ चीज़ें हैं जिन्हें तुम लोगों को सामना करने की आवश्यकता है, अन्यथा तुम लोग वास्तव में शैतान के प्रभाव से अलग नहीं हो सकते हो।

हमने पहले पाँच तरीकों के बारे में चर्चा की है जिसके अंतर्गत शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करता है, क्या हमने चर्चा नहीं की है? इन पाँच तरीकों के अंतर्गत वे माध्यम हैं जिन्हें शैतान काम में लाता है, जिसके आर पार मनुष्य को देखना होगा। ऐसे तरीके जिनके अंतर्गत शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करता है वे मात्र एक किस्म के आवरण हैं; सबसे घातक वे माध्यम हैं जो इस मुखौटे के पीछे छिपे हुए हैं और वह अपने लक्ष्यों को हासिल करने के लिए इन माध्यमों का उपयोग करना चाहता है। ये माध्यम क्या हैं? मेरे लिए उनका सार निकालिए। (वह धोखा देता है, लुभाता एवं धमकाता है।) जितनी अधिक तुम लोग सूची बनाते हो, उतना ही करीब तुम लोग आते हो। ऐसा दिखाई देता है मानो उसके द्वारा तुम लोगों को भारी नुकसान पहुँचाया गया है और इस विषय पर तुम्हारे पास गहरी भावनाएँ हैं। (वह मीठी मीठी बातों एवं झूठ का भी इस्तेमाल करता है, वह प्रभावित करता है, धोखा देता है एवं बलपूर्वक कब्ज़ा करता है।) बलपूर्वक कब्ज़ा करता है—यह एक बहुत ही गहरा प्रभाव देता है, है कि नहीं? लोग शैतान के बलपूर्वक कब्ज़े से डरते हैं। और कोई? (वह हिंसक रूप से लोगों को हानि पहुँचाता है, धमकियों और प्रलोभनों दोनों का उपयोग करता है, और वह झूठ बोलता है।) झूठ उसके कार्यों का मूल-तत्व है और वह तुम्हें धोखा देने के लिए झूठ बोलता है। झूठ का स्वभाव क्या है? क्या झूठ बोलना धोखा देने के समान नहीं है? झूठ बोलने का लक्ष्य वास्तव में तुम्हें धोखा देना है। और कोई? साहस के साथ बोलो। उन सभी बातों को मुझे बताओ जिसके विषय में तुम लोग जानते हो। (यह उकसाता है, हानि पहुँचाता हैं, अंधा करता है एवं धोखा देता है।) तुम लोगों में से अधिकांश इस धोखे के विषय में बिलकुल ऐसा ही महसूस करते हो, क्या तुम लोग महसूस नहीं करते हो? (वह खुशामद करने वाली चापलूसी करता है, मनुष्य को नियन्त्रित करता है, मनुष्य को जकड़ लेता है, मनुष्य को आतंकित करता है और मनुष्य को परमेश्वर पर विश्वास करने से रोकता है।) मैं बहुत अच्छे से जानता हूँ कि तुम लोगों का क्या अभिप्राय है और वे सभी समान रूप से अच्छे हैं। तुम सभी लोग इसके विषय में कुछ तो जानते हो, अतः आओ अब हम इसका सार निकालें।

यहाँ पर छः प्राथमिक माध्यम हैं जिन्हें शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए काम में लाता है।

पहला नियन्त्रण एवं जोर जबरदस्ती है। अर्थात्, तुम्हारे हृदय को नियन्त्रित करने के लिए शैतान हर सभंव कार्य करेगा। "जोर जबरदस्ती" का अर्थ क्या है? (इसका अर्थ है विवशता।) वह तुम्हें धमकाता है और तुम्हें बाध्य करता है कि उस पर ध्यान दो, यदि तुम बात नहीं मानते हो तो तुम्हें उन परिणामों के विषय में सोचने के लिए मजबूर करता है। तुम भयभीत होते हो और उसकी अवहेलना करने की हिम्मत नहीं करते हो, अतः तब तुम्हारे पास उसके प्रभाव के अधीन आने के सिवाए कोई विकल्प नहीं होता है।

दूसरा है धोखा देना और छल कपट करना। "धोखा देने और छल कपट करने" के साथ क्या जुड़ा होता है? शैतान कुछ कहानियों एवं झूठी बातों को बनाता है, तुम्हें छल कपट में फँसाता है कि उन पर विश्वास करें। वह तुम्हें कभी नहीं बताता है कि मनुष्य को परमेश्वर के द्वारा सृजा गया था, किन्तु न ही वह सीधे तौर पर यह कहता है कि तुम्हें परमेश्वर के द्वारा सृजा नहीं गया था। यह "परमेश्वर" शब्द का उपयोग बिलकुल भी नहीं करता है, परन्तु इसके बजाए एक विकल्प के रूप में किसी और चीज़ का इस्तेमाल करता है, तुम्हें धोखा देने के लिए इस चीज़ का उपयोग करता है ताकि तुम्हारे पास परमेश्वर के अस्तित्व के विषय में मूल रूप से कोई विचार न हो, और वह तुम्हें यह जानने की अनुमति नहीं देता है कि परमेश्वर वास्तव में कौन है। निश्चित रूप से यह छल कपट, न केवल सिर्फ इसे, बल्कि कई पहलुओं को शामिल करता है।

तीसरा है ज़बरदस्ती सिद्धान्तों को मनवाना। क्या ज़बरदस्ती सिद्धान्तों को मनवाया जाता है? (हाँ।) किस बात के विषय में ज़बरदस्ती सिद्धान्तों को मनवाना? क्या ज़बरदस्ती सिद्धान्तों को मनवाना मनुष्य के स्वयं के चुनाव के द्वारा होता है? क्या इसे मनुष्य की सहमति से किया जाता है? (नहीं।) यदि तुम इससे सहमत नहीं होते हो तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। तुम्हारी अनभिज्ञता में वह तुम्हारे भीतर उँडेलता है, शैतान की सोच, जीवन के उसके नियमों और उसके बुरे सार को तुम्हारे भीतर डालता है। वास्तव में, वह सब जिसे शैतान तुम्हारे भीतर डालता है वे झूठ हैं, ऊपर से आकर्षक लगनेवाली भ्रान्तियाँ हैं, और वास्तव में झूठी शिक्षाएँ एवं भ्रान्तियाँ हैं जिन्हें शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए इस्तेमाल करता है। इस शैतानी ज़हर को मनुष्य के दिमागों में और उनके मनों में रोपा जाता है, और यह सचमुच में मनुष्य का मत परिवर्तित करता है। जब एक बार कोई व्यक्ति इस शैतानी ज़हर को स्वीकार कर लेता है, तो मानवता के किसी अंश के बगैर, वे न तो मनुष्य बनते हैं और न ही प्रेत।

चौथा है धमकियाँ एवं प्रलोभन। अर्थात्, शैतान विभिन्न माध्यमों को काम में लाता है ताकि तुम उसे स्वीकार करो, उसका अनुसरण करो, उसकी सेवा में कार्य करो; वह किसी भी ज़रूरी माध्यम से अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने की कोशिश करता है। वह कई बार तुम पर छोटी छोटी कृपा करता है परन्तु अभी भी तुम्हें पाप करने के लिए लुभाता है। यदि तुम उसका अनुसरण न करो, तो वह तुम्हें कष्ट भुगतने के लिए मजबूर करेगा और तुम्हें दण्ड देगा और वह तुम पर आक्रमण करने और तुम्हें जाल में फँसाने के लिए विभिन्न तरीकों का इस्तेमाल करेगा।

पाँचवा है धोखा एवं लकवा। "धोखा एवं लकवा" वह है जिससे शैतान कुछ मधुर सुनाई देने वाले कथनों एवं विचारों को गढ़ता है जो लोगों की धारणाओं के साथ होती हैं ताकि ऐसा दिखाई दे मानो वह लोगों के शरीरों का ध्यान रख रहा है या उनके जीवन एवं भविष्य के बारे में सोच रहा है, जबकि वास्तव में यह बस तुम्हें बेवकूफ़ बनाने के लिए है। तब वह तुम्हें लकवाग्रस्त कर देता है ताकि तुम यह न जानो कि क्या सही है और क्या ग़लत है, ताकि तुम अनजाने में ही उसके मार्ग का अनुसरण करो और फलस्वरूप उसके नियन्त्रण के अधीन आ जाओ।

छठा है शरीर एवं मस्तिष्क विनाश। शैतान मनुष्य की किस चीज़ का विनाश करता है? (उनका मस्तिष्क, और उनका पूरा अस्तित्व।) शैतान तुम्हारे मस्तिष्क का नाश करता है, विरोध करने के लिए तुम्हें शक्तिहीन बना देता है, इसका अर्थ है कि स्वयं के बजाए बिलकुल धीरे धीरे तुम्हारा हृदय शैतान की ओर मुड़ने लगता है। वह हर दिन इन चीज़ों को तुम्हारे भीतर डालता है, तुम्हें प्रभावित एवं तुम्हारा पोषण करने के लिए प्रतिदिन इन विचारों एवं संस्कृतियों का उपयोग करता है, बिलकुल धीरे धीरे तुम्हारी इच्छा शक्ति को बर्बाद करता है, तुम्हें मजबूर करता है कि आगे से एक अच्छा इंसान बनने की इच्छा न करो, तुम्हें मजबूर करता है कि आगे से उसके लिए निरन्तर खड़े रहने की इच्छा न करो जिसे तुम धार्मिकता कहते हो। अनजाने में, आगे से तुम्हारे पास और कोई इच्छा शक्ति नहीं होती है कि तुम लहर के खिलाफ ऊपर धारा में तैरो, परन्तु इसके बजाए तुम उसके साथ नीचे की ओर बहते हो। "विनाश" का अर्थ है कि शैतान लोगों को इतना अधिक कष्ट देता है कि वे न तो मनुष्य के समान बनते हैं और न ही प्रेत के समान, तब वह उन्हें फाड़ खाने के लिए उस अवसर को पकड़ लेता है।

इन में से प्रत्येक माध्यम जिसे शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए काम में लाता है वह विरोध करने के लिए मनुष्य को निर्बल कर देता है; उनमें से कोई भी लोगों के लिए घातक हो सकता है और विरोध करने के लिए उन्हें कोई मौका बिलकुल भी नहीं देता है। दूसरे शब्दों में, कोई भी कार्य जो शैतान करता है और कोई भी माध्यम जो वह काम में लाता है उससे वह तुम्हें पतित कर सकता है, तुम्हें शैतान के नियन्त्रण के अधीन ला सकता है और तुम्हें दुष्टता के दलदल में धँसा सकता है ताकि तुम बचकर निकल न सको। ये वे माध्यम हैं जिन्हें शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए काम में लाता है और वे बहुत ही क्रूर, दुर्भावनापूर्ण, भयानक एवं नीच होते हैं। प्रत्येक व्यक्ति ने व्यक्तिगत तौर पर इन माध्यमों की कड़वाहट को चखा है, अतः तब मनुष्य का हृदय शैतान से बहुत ज़्यादा घृणा कर सकता है और इस दुष्ट शैतान के खिलाफ विरोध करने के लिए दृढ़ निश्चय कर सकता है।

हम कह सकते हैं कि शैतान दुष्ट है, परन्तु इसकी पुष्टि करने के लिए हमें फिर भी देखना होगा की मनुष्य को शैतान के द्वारा भ्रष्ट किए जाने के क्या परिणाम होते हैं और वह मनुष्य के लिए कौन कौन से स्वभाव एवं सार लेकर आता है। तुम सभी लोग इसमें से कुछ को जानते हो, अतः इसके विषय में बोलो। जब एक बार शैतान मनुष्य को भ्रष्ट कर देता है, तो वे कौन कौन से शैतानी स्वभावों को व्यक्त एवं प्रगट करते हैं? (अहंकारी एवं अभिमानी, स्वार्थी एवं घिनौने, टेढ़े एवं कपटी, भयानक एवं द्वेषपूर्ण, एवं मानवतारहित।) कुल मिलाकर, हम कह सकते हैं कि उनके पास कोई मानवता नहीं है, सही है? अन्य भाइयों एवं बहनों को बोलने दीजिए। (घमण्डी, कपटी, द्वेषपूर्ण, स्वार्थी, लालची, अल्पज्ञानी, झूठा।) यह न कहें कि कुछ पहलुओं के स्वभाव के द्वारा क्या प्रगट होता है; तुम्हें कहना होगा कि उस स्वभाव का सार क्या है। तुम समझ गए? (जब एक बार मनुष्य को शैतान के द्वारा भ्रष्ट कर दिया जाता है, तो वे आम तौर पर अत्यधिक अहंकारी एवं स्वयं में धर्मी, स्वयं में महत्वपूर्ण, और आत्म-अभिमानी, लालची एवं स्वार्थी होते हैं। ये अत्यंत गंभीर हैं।) (शैतान के द्वारा मनुष्य को भ्रष्ट किए जाने के बाद, वे अनैतिक ढंग से भौतिक एवं आत्मिक दोनों रूप में कार्य करते हैं। तब वे परमेश्वर के प्रतिकूल (शत्रु) हो जाते हैं, परमेश्वर का सामना करते हैं, परमेश्वर की अनाज्ञाकारिता करते हैं, और वे उस विवेक एवं तर्क को खो देते हैं जो मनुष्य के पास होना चाहिए।) जो कुछ तुम लोगों ने कहा है वह सब मात्र मामूली अन्तर के साथ मूल रूप से वैसा ही है, तुम लोगों में से कुछ मामूली अन्तर पर अधिक ध्यान देते हैं। संक्षेप में कहें, तो "अहंकारी" वह शब्द है जिसका अधिकांश बार उल्लेख किया गया है—अहंकारी, कपटी, द्वेषपूर्ण एवं स्वार्थी। परन्तु तुम लोगों ने उस एक चीज़ को अनदेखा किया है। ऐसे लोग जिनके पास कोई विवेक नहीं है, जिन्होंने अपने तर्क को खो दिया है और जिनके पास कोई मानवता नहीं है—फिर भी यहाँ ऐसी चीज़ है जो इतना ही महत्वपूर्ण है जिसे तुम लोगों में से किसी ने भी नहीं कहा है। अतः वह क्या है? (विश्वासघात करना) सही है! किसी ने भी नहीं कहा था "विश्वासघात करना।" जब एक बार उन्हें शैतान के द्वारा भ्रष्ट कर दिया जाता है तो ये स्वभाव जो किसी मनुष्य में मौजूद होते हैं उनका अंतिम परिणाम परमेश्वर के प्रति उनका विश्वासघात है और आगे से परमेश्वर को न पहचानना है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि परमेश्वर मनुष्य को क्या कहता है या वह उन पर कौन सा कार्य करता है, क्योंकि जो कुछ वे जानते है उसे स्वीकार नहीं करते हैं कि वह सत्य है, और यह देखा जा सकता है कि वे आगे से परमेश्वर को नहीं पहचानते हैं और वे उससे विश्वासघात करते हैं: मनुष्य के विषय में यह शैतान की भ्रष्टता का परिणाम है और मनुष्य के समस्त भ्रष्ट स्वभावों के लिए यह एक समान है। उन तरीकों के मध्य जिन्हें शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए इस्तेमाल करता है—वह ज्ञान जिसे मनुष्य सीखता है, वह विज्ञान जिसे वे जानते हैं, वे अंधविश्वास, वे पारम्परिक संस्कृतियाँ एवं वे सामाजिक प्रवृत्तियाँ जिन्हें वे समझते हैं—क्या कोई ऐसी चीज़ है जिसे मनुष्य यह बताने के लिए उपयोग कर सकता है कि धर्मी क्या है और अधर्मी क्या है? क्या यहाँ से कार्य करने के लिए कुछ मापदण्ड हैं? (नहीं।) क्या कोई ऐसी चीज़ है जो मनुष्य की यह जानने में सहायता कर सकती है कि क्या पवित्र है और क्या अपवित्र है? (नहीं।) ऐसे कोई मापदण्ड एवं कोई आधार नहीं हैं जो मनुष्य की सहायता कर सकते हैं। भले ही लोग "पवित्र" शब्द को जानते हैं, फिर भी ऐसा कोई नहीं है जो वास्तव में जानता हो कि पवित्र क्या है। अतः ये चीज़ें जिन्हें शैतान मनुष्य के लिए लेकर आता है क्या वे उन्हें सत्य को जानने की अनुमति दे सकती हैं? वे मनुष्य को सत्य को जानने की अनुमति कभी नहीं दे सकते हैं। क्या वे मनुष्य को बढ़ती मानवता के साथ जीवन जीने की अनुमति दे सकते हैं? क्या वे मनुष्य को बढ़ती समझ में जीवन जीने की अनुमति दे सकते हैं कि किस प्रकार सचमुच में परमेश्वर की आराधना करनी है? (नहीं।) यह स्पष्ट है कि वे मनुष्य को परमेश्वर की आराधना करने की अनुमति नहीं दे सकते हैं, न ही वे मनुष्य को यह जानने की अनुमति दे सकते हैं कि पवित्रता एवं बुराई क्या है। इसके विपरीत, मनुष्य और भी अधिक पतित होता जाता है, परमेश्वर से और दूर होता जाता है, और भी अधिक दुष्ट होता जाता है, और भी अधिक बिगड़ता जाता है। हम क्यों शैतान को दुष्ट कहते हैं इसके पीछे का मुख्य कारण यही है। शैतान के इतने सारे अवगुणों को विच्छेदित करने के बाद, उसके गुणों में या उसके सार की अपनी अपनी समझ में क्या तुम लोगों ने देखा है कि शैतान के पास पवित्रता का कोई तत्व है? (नहीं।) यह निश्चित है, है कि नहीं? अतः क्या तुम लोगों ने शैतान के किसी सार को देखा है जो परमेश्वर के साथ किसी समानता को साझा करता हो? (नहीं।) क्या शैतान की कोई अभिव्यक्ति परमेश्वर के साथ किसी समानता को साझा करती है? (नहीं।) अतः अब मैं तुम लोगों से पूछना चाहता हूँ, तुम्हारे स्वयं के वचनों का उपयोग करते हुए, कि परमेश्वर की पवित्रता वास्तव में क्या है? सबसे पहले, परमेश्वर की पवित्रता क्या है जिसे इस सम्बन्ध में कहा गया है? क्या इसे परमेश्वर के सार के सम्बन्ध में कहा गया है? या इसे उसके स्वभाव के किसी पहलू के सम्बन्ध में कहा गया है? (इसे परमेश्वर के सार के सम्बन्ध में कहा गया है।) हमें अपने इच्छित विषय में एक स्पष्ट पकड़ को पाना ही होगा। इसे परमेश्वर के सार के सम्बन्ध में कहा गया है। सबसे पहले, हमने शैतान की दुष्टता को परमेश्वर के सार के प्रति एक विषमता के रूप में इस्तेमाल किया है, अतः क्या तुमने शैतान के किसी सार को परमेश्वर में देखा है? (नहीं।) मानवजाति के किसी सार के विषय में क्या? (नहीं।) कोई मुझे बताए। (परमेश्वर की पवित्रता अद्वितीय है, यह विश्वासयोग्य है, ईमानदार है और परमेश्वर में कोई भ्रष्ट स्वभाव नहीं है। परमेश्वर सम्पूर्ण रीति से सकारात्मक है, वैसे ही हर चीज़ सकारात्मक है जिसे वह मनुष्य के लिए लेकर आता है।) (परमेश्वर का सम्पूर्ण सार सकारात्मक है, वह सब जिसे वह प्रगट करता है वह मनुष्य के उद्धार के लिए है और मनुष्य के लिए है ताकि वह सामान्य मानव के समान जीवन बिताए। ऐसा इसलिए है ताकि वह सचमुच में मनुष्य की सुरक्षा कर सके और ताकि मनुष्य एक सामान्य मानवता का जीवन बिता सके।) क्या यह सिर्फ एक सामान्य मानवता को जीने के लिए है? (ऐसा इसलिए है ताकि मनुष्य सचमुच में सत्य को जान सके; मानवजाति के प्रति उसका सच्चा प्रेम एवं उद्धार ही उसकी पवित्रता है।) (वह सब जिसे परमेश्वर के सार के द्वारा प्रगट किया जाता है वह सकारात्मक है। परमेश्वर की सत्यता, उसकी विश्वासयोग्यता, उसकी निःस्वार्थता, उसकी विनम्रता और मानवजाति के लिए उसका प्रेम यह सब परमेश्वर की पवित्रता के सार को व्यक्त करता है।) (परमेश्वर अभिमानी नहीं है, न ही स्वार्थी है और वह विश्वासघात नहीं करता है, और इस पहलू में परमेश्वर के पवित्र सार को भी प्रगट होते हुए देखा जाता है।) हम्म। जोड़ने के लिए कुछ और? (परमेश्वर के पास शैतान के भ्रष्ट स्वभाव का कोई नामो निशान नहीं है। जो कुछ शैतान के पास है वह पूरी तरह से नकारात्मक है, जबकि जो कुछ परमेश्वर के पास है वह और कुछ नहीं बल्कि सकारात्मक है। हम देख सकते हैं कि परमेश्वर हमेशा हमारी ओर है। जब हम बहुत छोटे से थे उस समय से लेकर अब तक, खासतौर पर जब हमने अपने मार्ग को खो दिया था, वह हमेशा वहाँ था, हमारी निगरानी कर रहा था, और हमें सुरक्षित रख रहा था। परमेश्वर में कोई कपट नहीं है, कोई कपट नहीं है। वह साफ साफ और सरलता से बोलता है, और यह भी परमेश्वर का सच्चा सार है।) बहुत अच्छा! (हम परमेश्वर के कार्य में शैतान के किसी भी भ्रष्ट स्वभाव को नहीं देख सकते हैं, कोई कपट नहीं है, कोई घमण्ड नहीं, कोई खोखली प्रतिज्ञाएँ एवं कोई छल नहीं। परमेश्वर ही वह एकमात्र शख्स है जिसमें मनुष्य विश्वास कर सकता है और परमेश्वर का कार्य विश्वासयोग्य एवं ईमानदार है। परमेश्वर के कार्य से हम परमेश्वर को लोगों को यह बाताते हुए देखते हैं कि ईमानदार बनो, बुद्धि पाओ, भले और बुरे में अन्तर करने में सक्षम बनो, और विभिन्न लोगों, घटनाओं, एवं चीज़ों के विषय में परखने की शक्ति पाओ। इस में हम परमेश्वर की पवित्रता को देख सकते हैं।) जोड़ने के लिए और कुछ? क्या तुम लोगों ने समाप्त कर लिया है? (हाँ।) जो कुछ तुम लोगों ने कहा है क्या तुम लोग उससे संतुष्ट हो? तुम लोगों के हृदय में वास्तव में कितनी समझ है? और तुम लोग परमेश्वर की पवित्रता को कितना समझते हो? मैं जानता हूँ कि तुम लोगों में से हर एक एवं प्रत्येक के हृदय में कुछ स्तर की बोधात्मक समझ है, क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति उन पर परमेश्वर के कार्य को महसूस कर सकता है और, विभिन्न मात्राओं में, वे परमेश्वर से बहुत सी चीज़ों को प्राप्त करते हैं; वे अनुग्रह एवं आशीषों को प्राप्त करते हैं, उन्हें अद्भत प्रकाशन एवं अद्भुत ज्योति से प्रकाशित किया गया है, और वे परमेश्वर के न्याय एवं ताड़ना को प्राप्त करते हैं ताकि मनुष्य के पास कुछ साधारण समझ आ सके।

हालाँकि परमेश्वर की पवित्रता जिसकी आज हम चर्चा कर रहे हैं वह शायद अधिकांश लोगों को अजीब सी लगे, इसकी परवाह किए बगैर कि यह कैसा प्रतीत हो सकता है हमने इस विषय को प्रारम्भ किया है, तुम लोगों के पास एक गहरी समझ होगी जब तुम लोग अपने आगे के मार्ग में बढ़ते जाते हो। यह तुम लोगों से अपेक्षा करता है कि धीरे-धीरे एहसास करो और अपने स्वयं के अनुभव को भीतर से समझो। अब परमेश्वर के सार के विषय में तुम लोगों की बोधात्मक समझ को अब भी इसे सीखने के लिए, इसकी पुष्टि करने के लिए, इसका एहसास करने के लिए एवं इसका अनुभव करने के लिए एक लम्बी समय अवधि की आवश्यकता है, उस दिन तक जब तुम लोग अपने हृदय के केन्द्रीय भाग से परमेश्वर की पवित्रता को जान लोगे कि वह परमेश्वर का दोषरहित सार है, एवं परमेश्वर का निःस्वार्थ प्रेम है, जो सभी चीज़ों के विषय में वह निःस्वार्थ प्रेम है जिसे परमेश्वर मनुष्य को प्रदान करता है, और तुम लोग यह जान पाओगे कि परमेश्वर की पवित्रता बेदाग एवं निष्कलंक है। परमेश्वर के ये सार मात्र ऐसे वचन नहीं हैं जिसे वह अपनी पहचान का दिखावा करने के लिए उपयोग करता है, परन्तु इसके बजाए परमेश्वर हर एक एवं प्रत्येक व्यक्ति के साथ खामोशी से एवं ईमानदारी से व्यवहार करने के लिए अपने सार का उपयोग करता है। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर का सार खोखला नहीं है, न ही यह सैद्धान्तिक या नियम सम्बन्धित है और यह निश्चित रूप से एक किस्म का ज्ञान नहीं है। यह मनुष्य के लिए एक प्रकार की शिक्षा नहीं है, परन्तु इसके बजाए परमेश्वर के स्वयं के कार्यों का सच्चा प्रकाशन है और यह जो कुछ परमेश्वर के पास है एवं जो वह है उसका प्रकाशित सार है। मनुष्य को इस सार को जानना एवं इसे समझना चाहिए, चूँकि हर एक चीज़ जिसे परमेश्वर करता है और हर वचन जिसे वह कहता है उसका हर एक व्यक्ति के लिए बड़ा मूल्य एवं बड़ा महत्व होता है। जब तुम परमेश्वर की पवित्रता को समझने लगते हो, तब तुम वास्तव में परमेश्वर में विश्वास कर सकते हो; जब तुम परमेश्वर की पवित्रता को समझने लगते हो, तब तुम वास्तव में इन शब्दों "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है" के असली अर्थ का एहसास कर सकते हो। तुम आगे से कल्पना नहीं करोगे कि तुम अन्य मार्गों पर चलने का चुनाव कर सकते हो, और तुम आगे से हर एक चीज़ के प्रति विश्वासघात करने की इच्छा नहीं करोगे जिसे परमेश्वर ने तुम्हारे लिए व्यवस्थित किया है। क्योंकि परमेश्वर का सार पवित्र है; इसका मतलब है कि केवल परमेश्वर के माध्यम से ही तुम जीवन के आर पार उज्जवल, एवं सही मार्ग पर चल सकते हो; केवल परमेश्वर के माध्यम से ही तुम जीवन के अर्थ को जान सकते हो, केवल परमेश्वर के माध्यम से ही तुम वास्तविक जीवन को जी सकते हो, सच्चाई को धारण कर सकते हो, सच्चाई को जान सकते हो, और केवल परमेश्वर के माध्यम से ही तुम सच्चाई से जीवन प्राप्त कर सकते हो। केवल स्वयं परमेश्वर ही तुम्हें बुराई से दूर रहने में सहायता कर सकता है और शैतान की हानि एवं नियन्त्रण से छुटकारा दे सकता है। परमेश्वर के अलावा, कोई भी व्यक्ति एवं कोई भी चीज़ तुम्हें कष्ट के सागर से नहीं बचा सकती है ताकि तुम आगे से कष्ट न सहो: इसे परमेश्वर के सार के द्वारा निर्धारित किया जाता है। केवल स्वयं परमेश्वर ही इतने निःस्वार्थ रूप से तुम्हें बचाता है, केवल परमेश्वर ही अंततः तुम्हारे भविष्य के लिए, तुम्हारी नियति के लिए और तुम्हारे जीवन के लिए ज़िम्मेदार है, और वह तुम्हारे लिए सभी हालातों को व्यवस्थित करता है। यह कुछ ऐसा है जिसे कोई सृजा गया या न सृजा गया प्राणी हासिल नहीं कर सकता है। क्योंकि कोई सृजा गया या न सृजा गया प्राणी परमेश्वर के इस प्रकार के सार को धारण नहीं कर सकता है, किसी व्यक्ति या प्राणी में तुम्हें बचाने या तुम्हारी अगुवाई करने की योग्यता नहीं है। मनुष्य के लिए परमेश्वर के सार का यही महत्व है। कदाचित् तुम लोगों को लगे कि ये वचन जो मैंने कहे हैं वे सिद्धान्त में वास्तव में थोड़ी सहायता कर सकते हैं। परन्तु यदि तुम सत्य को खोज करते हो, यदि तुम सत्य से प्रेम करते हो, तो इसके बाद तुम्हारे अनुभव में ये वचन न केवल तुम्हारी नियति को बदल देंगे, बल्कि इससे अधिक जीवन के आर पार तुम्हें सही मार्ग पर ले आएँगे। तुम इसे समझते हो, क्या तुम समझते हो? (हाँ।) अतः परमेश्वर के सार को पहचानने में क्या अब तुम लोगों की कोई रूची है? (हाँ।) रूची लेना अच्छी बात है। आज हम यहाँ पर परमेश्वर की पवित्रता को पहचानने के अपने विषय पर बातचीत करना समाप्त करेंगे।

मैं तुम लोगों से किसी चीज़ के विषय में बात करना चाहता हूँ जिसे तुम लोगों ने किया था जिसने आज हमारी सभा के आरम्भ में मुझे आश्चर्य में डाल दिया था। कदाचित् तुम लोगों में से कुछ उस वक्त कृतज्ञता के एहसास को आश्रय दे रहे थे, या धन्यवादी महसूस कर रहे थे, और इस प्रकार जो कुछ तुम लोगों के मन में था तुम सब उसे शारीरिक रूप से व्यक्त करना चाहते थे। यह निन्दा से परे है, और न तो सही और न ही गलत है। परन्तु वह क्या है जो मैं तुम लोगों को बताना चाहता हूँ? जो कुछ तुम लोगों ने किया था वह गलत नहीं है और मैं किसी भी प्रकार से तुम लोगों की निन्दा नहीं करना चाहता हूँ। मैं चाहता हूँ कि तुम लोग कुछ समझो। यह क्या है? पहले मैं तुम लोगों से उसके विषय में पूछना चाहूँगा जिसे तुम लोगों ने अभी अभी किया था। क्या यह आराधना करने के लिए दण्डवत् (साष्टांग प्रणाम) करना था या घुटने टेकना था? क्या कोई मुझे बता सकता है? (हम विश्वास करते हैं कि यह दण्डवत् करना था। हम इस प्रकार से दण्डवत् करते हैं।) तुम लोग विश्वास करते हो कि यह दण्डवत् करना था, अतः फिर दण्डवत् का क्या अर्थ है? (आराधना।) अतः फिर आराधना करने के लिए घुटने टेकना क्या है? मैंने तुरन्त ही तुम लोगों से इसका जिक्र नहीं किया उसका कारण यह था क्योंकि संगति के लिए आज हमारा विषय बहुत ही महत्वपूर्ण है और मैं तुम लोगों के मिजाज़ को प्रभावित नहीं करना चाहता था। क्या तुम लोग अपनी सामान्य सभाओं में दण्डवत् करते हो? (नहीं।) जब तुम लोग अपनी प्रार्थनाएँ करते हो तब क्या तुम लोग दण्डवत् करते हो? (हाँ।) हर बार जब तुम लोग प्रार्थना करते हो तब क्या तुम लोग दण्डवत् करते हो, जब परिस्थितियाँ अनुमति देती हैं? (हाँ।) यह बहुत ही अद्भुत है। परन्तु वह क्या है जो मैं चाहता हूँ कि आज तुम लोग समझो? ऐसे दो प्रकार के लोग हैं जिनके घुटने टेकने के व्यवहार को परमेश्वर स्वीकार करता है। हमें बाइबल से या आध्यात्मिक चरित्रों के व्यवहार से परामर्श लेने की आवश्यकता नहीं है, और मैं अभी और यहीं पर तुम लोगों को कुछ सच्चाई बताना चाहता हूँ। पहला, दण्डवत् और आराधना करने के लिए घुटने टेकना एक ही चीज़ नहीं है। परमेश्वर उन लोगों के घुटने टेकने के व्यवहार को क्यों स्वीकार करता है जो स्वयं दण्डवत् करते हैं? यह इसलिए है क्योंकि परमेश्वर किसी व्यक्ति को अपने पास बुलाता है और ऐसे व्यक्ति को परमेश्वर के महान आदेश को स्वीकार करने के लिए कहता है, अतः वह परमेश्वर के लिए स्वयं दण्डवत् करता है। यह पहले प्रकार का व्यक्ति है। दूसरे प्रकार का व्यक्ति ऐसा व्यक्ति है जो आराधना करने के लिए घुटने टेकता है जो परमेश्वर का भय मानता और बुराई से दूर रहता है। सिर्फ दो ही प्रकार के ऐसे लोग हैं। अतः तुम लोग किस प्रकार के लोगों से सम्बन्धित हो? क्या तुम लोग कह सकते हो? यह एक तथ्यात्मक सच्चाई है, हालाँकि यह तुम लोगों की भावनाओं को थोड़ी चोट पहुँचा सकती है। प्रार्थना के दौरान लोगों के घुटने टेकने के व्यवहार के बारे में कहने के लिए कुछ नहीं है—यह उचित है और यह ऐसा है जैसा इसे होना चाहिए, क्योंकि जब लोग प्रार्थना करते हैं तो अधिकांशतः किसी चीज़ के लिए प्रार्थना करते हैं, परमेश्वर के लिए अपने हृदय को खोलते हैं और उसके आमने सामने आते हैं। यह परमेश्वर के साथ दिल से दिल तक पहुँचने वाला वार्तालाप एवं संवाद है। परन्तु जब मैं संगति में तुम लोगों के साथ मिलता हूँ, तो मैंने तुम लोगों से नहीं कहा कि तुम लोग स्वयं दण्डवत् करो। आज जो कुछ तुम लोगों ने किया है उसके लिए तुम लोगों की निन्दा करना मेरा अभिप्राय यह नहीं था। तुम लोग जानते हो कि मैं बस इसे तुम लोगों के लिए स्पष्ट करना चाहता हूँ ताकि तुम लोग इस सिद्धान्त को समझो, क्या तुम लोग नहीं समझते हो? (हम जानते हैं।) ताकि तुम लोग इसे लगातार न करते रहो। क्या तब लोगों के पास परमेश्वर के मुख के सामने दण्डवत् करने एवं घुटने टेकने का कोई अवसर होता है? हमेशा एक अवसर होगा। जल्दी या देर से ही सही ऐसा दिन आएगा, परन्तु वह समय अभी नहीं है। क्या तुम लोगों ने देखा? (हाँ।) क्या इसने तुम लोगों को उदास कर दिया है? (नहीं।) यह अच्छा है। हो सकता है कि ये वचन तुम लोगों को प्रेरित करेंगे या प्रेरणा देंगे जिससे तुम लोग अपने हृदय में परमेश्वर एवं मनुष्य के बीच की वर्तमान दुर्दशा को और अब उनके बीच में किस प्रकार का सम्बन्ध अस्तित्व में है उसको जान सकते हो। हालाँकि हमने हाल ही में काफी बातचीत एवं संवाद किया है, फिर भी परमेश्वर के विषय में मनुष्य की समझ अभी बिलकुल पर्याप्त नहीं है। परमेश्वर को समझने का प्रयास करने के लिए मनुष्य को अभी भी इस मार्ग पर बहुत दूर तक जाना है। मेरा इरादा यह नहीं है कि तुम लोगों से इस कार्य को शीघ्रता से करवाऊँ, या इस प्रकार की आकांक्षाओं या भावनाओं को व्यक्त करने के लिए तुम लोगों से जल्दबाज़ी करवाऊँ। आज जो कुछ तुम लोगों ने किया था वह शायद तुम लोगों की सच्ची भावनाओं को प्रकट एवं व्यक्त करता है, और मैंने इसका एहसास किया है। अतः जब तुम लोग इसे कर रहे थे, तब मैं बस खड़ा होना और तुम लोगों को अपनी शुभ कामनाएँ देना चाहता था, क्योंकि मैं तुम लोगों के भले की कामना करता हूँ। अतः मेरे हर वचन और हर कार्य में मैं तुम लोगों की सहायता करने के लिए, एवं तुम लोगों का मार्गदर्शन करने के लिए अपना भरसक प्रयास करता हूँ, ताकि तुम लोगों के पास सभी चीज़ों की सही समझ एवं सही दृष्टिकोण हो सके। तुम इसे समझ सकते हो? सही है? (हाँ।) यह बहुत अच्छा है। हालाँकि मनुष्य के पास परमेश्वर के विभिन्न स्वभाव, अर्थात् जो उसके पास है एवं जो वह है और वह कार्य जो परमेश्वर करता है उनके पहलुओं की कुछ समझ है, फिर भी इस समझ का अधिकांश भाग किसी पृष्ठ के शब्दों को पढ़ने, या सिद्धान्त में उन्हें समझने, या सिर्फ उनके बारे में सोचने की अपेक्षा ज़्यादा दूर नहीं जाता है। जिस बात की लोगों में अत्यंत घटी है वह सच्ची समझ एवं सच्चा दृष्टिकोण है जो वास्तविक अनुभव से आते हैं। यद्यपि परमेश्वर मनुष्य के हृदय को जागृत करने के लिए विभिन्न तरीकों का उपयोग करता है, फिर भी एक लम्बा मार्ग है जिस पर चलना है इससे पहले कि मनुष्य के दिलों को अन्ततः जागृत किया जाए। मैं किसी को ऐसा महसूस करते हुए नहीं देखना चाहता हूँ मानो परमेश्वर ने उन्हें बाहर ठण्ड में छोड़ दिया हो, यह कि परमेश्वर उन्हें त्याग दिया हो या उनसे मुँह फेर लिया हो। मैं सिर्फ हर एक व्यक्ति को बिना किसी सन्देह के, एवं बिना किसी बोझ को उठाए हुए, सत्य की खोज करने के लिए और परमेश्वर की समझ की खोज करने के लिए अटल इच्छा के साथ दृढ़ता से आगे बढ़ते रहने के मार्ग पर देखना चाहूँगा। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि तुमने क्या गलतियाँ की हैं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि तुम कितनी दूर तक भटक गए हो या तुमने कितने अधिक अपराध किए हैं, परमेश्वर को समझने हेतु अपने अनुसरण में इन चीज़ों को अपने साथ ढोने के लिए बोझ या अतिरिक्त सामान बनने मत दो: निरन्तर आगे की ओर बढ़ते जाओ। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि यह कब घटित होता है, परमेश्वर का हृदय जो मनुष्य का उद्धार है वह कभी नहीं बदलता है: यह परमेश्वर के सार का सबसे अधिक मूल्यवान हिस्सा है। क्या अब तुम लोग कुछ अच्छा महसूस कर रहे हो? (हाँ।) मैं आशा करता हूँ कि तुम लोग सभी चीज़ों और उन वचनों के प्रति सही दृष्टिकोण अपना सकते हो जिन्हें मैंने कहा है। आइए हम यहाँ पर इस संगति को समाप्त करें। सभी को अलविदा! (अलविदा)!

11 जनवरी 2014

फुटनोट:

क. मूलपाठ में पढ़ा जाता है "विज्ञान के विषय में मनुष्य के अनुसन्धान को संतुष्ट करना और रहस्यों की छानबीन करना।"

ख. मूलपाठ "के रेतीले दलदल" को छोड़ देता है।

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