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स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है X

परमेश्वर सभी चीज़ों के जीवन का स्रोत है (IV)

आज, हम एक खास विषय पर संवाद कर रहे हैं। तुम लोगों में से प्रत्येक के लिए, केवल दो ही बातें हैं जिन्हें जानने, अनुभव करने और समझने की तुम्हें आवश्यकता है—और ये दो बातें क्या हैं? पहली बात है, जीवन में लोगों का व्यक्तिगत रूप से प्रवेश, और दूसरी, परमेश्वर को जानने से संबंधित है। आज मैं तुम लोगों को एक विकल्प देता हूँ: एक को चुनो। क्या तुम लोग ऐसे विषय के बारे में सुनना पसंद करोगे जो लोगों के व्यक्तिगत जीवन अनुभव से संबंधित है, या स्वयं परमेश्वर को जानने के बारे में सुनना चाहोगे? और क्यों मैं तुम्हें ऐसा विकल्प देता हूँ? क्योंकि, आज, मेरे मन में है कि मैं परमेश्वर को जानने के बारे में तुम लोगों के साथ कुछ नई बातों की संगति करूँ। परन्तु, इन सब बातों से अलग, सबसे पहले मैं पहले तुम लोगों को उन दो बातों में से चुनने दूँगा जिनके बारे में मैनें अभी-अभी बोला है। (मैं उस एक को चुनता हूँ जो परमेश्वर को जानने के बारे में है)। (हमें भी लगता है कि परमेश्वर के ज्ञान की संगति करना बेहतर है)। क्या तुम लोगों को लगता है कि हाल ही में हम परमेश्वर को जानने के बारे में जो संगति करते रहे हैं वे साध्य हैं? यह कहना उचित होगा कि यह अधिकांश लोगों की पहुँच से परे है। इन बातों से तुम लोग शायद आश्वस्त न हुए हो। मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? क्योंकि जब तुम लोग उन बातों को सुन रहे थे जिन्हें मैं पहले कह रहा था, चाहे मैंने उसे किसी भी प्रकार से कहा हो, या किन्हीं भी शब्दों में कहा हो, शाब्दिक और सैद्धांतिक रूप में, तो तुम लोग जानते थे कि मैं क्या कह रहा था, परन्तु तुम्हारे साथ एक अत्यन्त गंभीर समस्या यह थी, कि तुमने नहीं समझा कि क्यों मैंने इन बातों को कहा, क्यों मैंने इन विषयों के बारे में बोला। यह समस्या का मूल है। और इसलिए, यद्यपि इन बातों को सुनने से परमेश्वर और उसके कर्मों के बारे में तुम्हारी समझ में वृद्धि और समृद्ध हुई है, तब भी तुम लोगों को परमेश्वर को जानने में कठिनाई हो रही है। जो कुछ मैंने कहा उसे सुनने के बाद, तुम लोगों में से अधिकांश नहीं समझते हैं कि मैंने ऐसा क्यों कहा, और परमेश्वर को जानने से इसका क्या संबंध है। क्या यह ऐसा नहीं है? परमेश्वर को जानने से इसके संबंध को समझने की तुम्हारी असमर्थता किससे जुड़ी हुई है? क्या तुम लोगों ने इस बारे में कभी विचार किया है? शायद तुम लोगों ने नहीं किया है। तुम लोग इन बातों को नहीं समझते हो इसका कारण है कि क्योंकि तुम लोगों के जीवन का अनुभव अत्यधिक सतही है। यदि परमेश्वर के वचन के बारे में लोगों का ज्ञान और अनुभव बहुत ही उथले स्तर का बना रहता है, तो परमेश्वर का उनका अधिकतर ज्ञान अस्पष्ट और अमूर्त होगा—वह प्राथमिक, मत-संबंधी और सैद्धान्तिक होगा। सैद्धांतिक रूप में, यह तर्कसंगत और उचित प्रतीत होता है, परन्तु अधिकांश लोगों के मुख से निकलने वाला परमेश्वर का ज्ञान खोखला होता है। और क्यों मैं ऐसा कहता हूँ कि यह खोखला होता है? क्योंकि, वास्तव में तुम लोग अपने हृदयों में इस बारे में स्पष्ट नहीं हो कि परमेश्वर को जानने के बारे में जो शब्द तुम्हारे मुख से निकलते हैं, वे सही हैं अथवा नहीं, कि वे विशुद्ध हैं या नहीं। और इसलिए, यद्यपि अधिकांश लोगों ने परमेश्वर को जानने के बारे में बहुत सी जानकारियों और विषयों को सुना है, फिर भी परमेश्वर के उनके ज्ञान को अभी भी सिद्धान्त और अस्पष्ट तथा अमूर्त सिद्धान्त से परे जाना है। तो इस समस्या को किस प्रकार सुलझाया जा सकता है? क्या तुम लोगों ने इस बारे में कभी सोचा है? यदि कोई सत्य की खोज नहीं करता है तो क्या वह वास्तविकता से सम्पन्न हो सकता है? यदि कोई सत्य की खोज नहीं करता है, तो निर्विवादित रूप से वह वास्तविकता रहित है और इसलिए निश्चित रूप से ऐसे लोगों को परमेश्वर के वचन का ज्ञान या अनुभव नहीं है। और क्या जो लोग परमेश्वर के वचन को नहीं जानते, वे परमेश्वर को जान सकते है? बिल्कुल नहीं! दोनों आपस में जुड़े हैं। इस प्रकार अधिकांश लोग कहते हैं, "परमेश्वर को जानना इतना कठिन कैसे हो सकता है? जब में स्वयं को जानने के बारे में बोलता हूँ तो मैं घण्टों तक बोल सकता हूँ, परन्तु जब परमेश्वर को जानने की बात आती है तो मेरे पास शब्दों का अभाव हो जाता है। यहाँ तक कि जब मैं थोड़ा सा बोल भी सकता हूँ, तो वह जबरदस्ती बोला गया और नीरस होता है—जब मैं इस पर बोलते हुए स्वयं को सुनता हूँ तो मुझे बेढंगा लगता है। यही स्रोत है। यदि तुम्हें लगता है कि परमेश्वर को जानना अत्यन्त कठिन है, कि तुम्हारे लिए यह अत्यन्त श्रमसाध्य है, कि तुम्हारे पास बोलने के लिए कुछ नहीं है—संगति करने और दूसरों को देने के लिए, और स्वयं को देने के लिए वास्तविक कुछ नहीं है—तो यह प्रमाणित करता है कि तुम कोई ऐसे व्यक्ति नहीं हो जिसने परमेश्वर के वचनों का अनुभव कर लिया है। परमेश्वर के वचन क्या हैं? क्या परमेश्वर के वचन परमेश्वर के स्वरूप की अभिव्यक्ति नहीं हैं? निश्चित रूप से नहीं। ये सभी बातें आपस में जुड़ी हुई हैं। यदि तुम्हें परमेश्वर के वचन का कोई भी अनुभव नहीं है तो तुम परमेश्वर की इच्छा को ग्रहण नहीं कर सकते हो, और नहीं जान पाओगे कि उसका स्वभाव क्या है, उसे क्या पसंद है, वह किस बात से घृणा करता है, मनुष्य के लिए उसकी क्या अपेक्षाएँ हैं, अच्छे लोगों के प्रति, और उनके प्रति जो दुष्ट हैं, उसका रवैया क्या है—यह सब निश्चित रूप से तुम्हारे लिए अस्पष्ट और धुँधला होगा। यदि इस तरह की अस्पष्टता के बीच तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो, जब तुम कहते हो कि तुम उनमें से एक हो जो सत्य की खोज करता और परमेश्वर का अनुसरण करता है, तो क्या ये शब्द वास्तविक हैं? नहीं हैं! इसलिए अब तुम लोग अपना विकल्प चुनो: आज तुम कौन सा विषय चुनते हो। (हम जीवन में प्रवेश को चुनते हैं)। जीवन में प्रवेश के बारे में विषय के किस क्षेत्र का तुम लोगों में अभाव है? क्या तुम्हारा हृदय तुम्हें कुछ कह रहा है? तुम अभी भी नहीं जानते हो, है ना? अन्य भाई-बहन कौन सा विषय चुनते हैं? (हम परमेश्वर को जानने के बारे में सुनना चाहते हैं)। तुम लोगों में से अधिकांश ने परमेश्वर को जानना चुना है। इसलिए आइए हम परमेश्वर के ज्ञान के बारे में बात करें।

आज हम जिस विषय पर बात करेंगे तुम लोग उसे सुनने के उत्सुक हो, ठीक है न? आज हम जिस विषय पर बात करने जा रहे हैं वह "परमेश्वर सभी चीज़ों के जीवन का स्रोत है" से भी संबंधित है जिसके बारे में हम हाल ही में बात करते रहे हैं। हमने "परमेश्वर सभी चीज़ों के जीवन का स्रोत है" के बारे में काफ़ी बातें की है, जिसका उद्देश्य लोगों को यह बताने के लिए विभिन्न साधनों और परिप्रेक्ष्यों का उपयोग करना था कि किस प्रकार परमेश्वर सभी चीज़ों पर शासन करता है, किन साधनों के द्वारा वह सभी चीज़ों पर शासन करता है, और किन सिद्धान्तों के द्वारा वह सभी चीज़ों का प्रबंधन करता है, ताकि वे इस ग्रह पर बने रहें जिसकी रचना परमेश्वर ने की है। हमने इस बारे में भी काफ़ी बातें की हैं कि कैसे परमेश्वर मनुष्यजाति का भरण-पोषण करता है: किन साधनों के द्वारा परमेश्वर मनुष्यजाति का भरण-पोषण करता है, किस प्रकार का जीने का पर्यावरण वह मनुष्यजाति को प्रदान करता है, और किन साधनों और किस प्रेरणा से वह मनुष्य के लिए जीने का स्थिर पर्यावरण देता है। यद्यपि मैंने सभी चीज़ों पर परमेश्वर के प्रभुत्व, सभी चीज़ों के उसके प्रशासन, और उसके प्रबंधन के बीच संबंध के बारे में प्रत्यक्ष रूप से नहीं बोला है, फिर भी मैंने परोक्ष रुप में बोला है कि क्यों वह सभी चीज़ों को इस प्रकार से प्रशासित करता है, और क्यों वह मनुष्यजाति का इस प्रकार से भरण-पोषण करता है और और पालन-पोषण करता है—जो कि सभी परमेश्वर के प्रबंधन से संबंधित है। जिस विषय-वस्तु की हमने चर्चा की वह बहुत विस्तृत हैः बृहद पर्यावरण से लेकर लोगों की मूलभूत आवश्यकताओं और भोजन जैसी बहुत छोटी बातों तक, कैसे परमेश्वर सभी चीज़ों पर शासन करता है और उन्हें व्यवस्थित रूप से परिचालित करवाता है, से लेकर सही और उचित जीने के पर्यावरण तक जो उसने संसार की हर प्रजाति के लिए बनाया, इत्यादि। यह समस्त विस्तृत विषय-वस्तु इन बात से जुड़ी है कि किस प्रकार मनुष्य देह में रहता है। कहने का तात्पर्य है कि, यह सब कुछ भौतिक संसार की चीज़ों से जुड़ा है जो नग्न आँखों को दिखाई देता है, और जिन्हें लोग महसूस कर सकते हैं, उदाहरण के लिए, पर्वत, नदियाँ, समुद्र, मैदान..... ये सभी वे वस्तुएँ हैं जिन्हें देखा और स्पर्श किया जा सकता है। जब मैं वायु और तापमान की बात करता हूँ, तो तुम लोग सीधे वायु का अस्तित्व महसूस करने के लिए अपनी श्वास का, और यह अनुभव करने के लिए कि तापमान उच्च है अथवा निम्न अपने शरीर का उपयोग कर सकते हो। वृक्ष, घास और वन के पक्षी और पशु, आकाश में उड़ने और धरती पर चलने वाली चीज़ें, और विभिन्न छोटे-छोटे जानवर जो बिलों से निकलते हैं, इन सभी को लोगों की स्वयं की आँखों से देखा और उनके स्वयं के कानों से सुना जा सकता है। यद्यपि ऐसी सभी वस्तुओं का दायरा विस्तृत है—फिर भी सभी चीज़ों के बीच वे केवल भौतिक संसार का प्रतिनिधित्व करती हैं। भौतिक वस्तुएँ वे हैं जिन्हें लोग देख और महसूस कर सकते हैं, कहने का आशय है, कि जब तुम इन्हें स्पर्श करोगे, तो तुम उनका अनुभव करोगे, और जब तुम्हारे नेत्र उन्हें देखेंगे, तो तुम्हारा मस्तिष्क एक छवि, एक चित्र तुम्हारे समक्ष रखेगा। ये वे वस्तुएँ हैं जो वास्तविक और सच्ची हैं; तुम्हारे लिये वे अमूर्त नहीं है, अपितु उनके आकार और रुप हैं; वे वर्गाकार, या वृताकार, या बड़ी या छोटी हो सकती हैं और प्रत्येक तुम पर एक भिन्न छाप छोड़ती है। ये सभी चीज़ें सभी चीज़ों के भौतिक भाग को दर्शाती हैं। और इसलिए "सभी चीज़ों पर परमेश्वर का प्रभुत्व" में कौन सी "सभी चीज़ें" परमेश्वर के लिए शामिल हैं? उनमें केवल वे ही चीज़ें शामिल नहीं हैं जिन्हें लोग देख और स्पर्श कर सकते हैं, बल्कि, इसके अलावा, वे भी शामिल हैं जो अदृश्य और अस्पृश्य हैं। यह सभी चीज़ों पर परमेश्वर के प्रभुत्व के असली अर्थों में से एक है। यद्यपि ये चीज़ें लोगों के लिए अदृश्य और अस्पृश्य हैं, फिर भी परमेश्वर के लिए, जब तक ये परमेश्वर की आँखों से देखी जा सकती हैं और उसकी संप्रभुता के भीतर हैं, तब तक वे वास्तव में अस्तित्व में हैं। यद्यपि, मनुष्यजाति के लिए वे अमूर्त और अकल्पनीय हैं—यद्यपि, इसके अलावा, वे अदृश्य और अस्पृश्य हैं—परमेश्वर के लिए वास्तव में और सच में अस्तित्व में है। सभी चीज़ों की दूसरी दुनिया ऐसी ही है जिन पर परमेश्वर शासन करता है, और यह उन सभी चीज़ों के दायरे का एक अन्य हिस्सा है जिसके ऊपर परमेश्वर शासन करता है। यही वह विषय है जिस पर हम आज संगति कर रहे हैं—किस प्रकार परमेश्वर आध्यात्मिक दुनिया पर शासन करता है और उसे चलाता है। चूँकि इस विषय में सम्मिलित किया गया है कि किस प्रकार परमेश्वर समस्त वस्तुओं पर शासन करता और उनका प्रबंधन करता है, इसलिए यह उस संसार से संबंधित है जो भौतिक संसार से बाहर है—आध्यात्मिक दुनिया—और इसलिए इसे समझना हमारे लिए सर्वाधिक आवश्यक है। केवल इस विषयवस्तु पर संगति करने और इसे समझ लेने के बाद ही लोग असलियत में—"परमेश्वर सभी चीज़ों के जीवन का स्रोत है"—शब्दों के सही अर्थ को समझ सकते हैं। यही कारण है कि क्यों हम इस विषय के बारे में बात करने जा रहे हैं। और इस विषय का उद्देश्य मूल विषय "परमेश्वर सभी चीज़ों पर शासन करता है, और परमेश्वर सब चीज़ों का प्रबंधन करता है", को पूर्ण करना है। शायद जब तुम लोग इस विषय को सुनो, तो यह तुम लोगों को अजीब और अविश्वासनीय लगे—किन्तु इस बात की परवाह किए बिना कि तुम लोग कैसा अनुभव करते हो, चूँकि आध्यात्मिक दुनिया उन सभी चीज़ों का एक भाग है जो परमेश्वर द्वारा शासित हैं, इसलिए तुम लोगों को इस विषय के बारे में कुछ अवश्य सीखना चाहिए। तुम लोगों के सीख लेने के पश्चात्, तुम लोगों को "परमेश्वर सभी चीज़ों के लिए जीवन का स्रोत है" शब्दों की गहरी सराहना, समझ और उनका ज्ञान होगा।

किस प्रकार परमेश्वर आध्यात्मिक संसार पर शासन करता है और उसे चलाता है

भौतिक संसार के विषय में, यदि कुछ बातें या घटनाएँ लोगों की समझ में नहीं आती हैं, तो वे प्रासंगिक जानकारी को खोज सकते हैं, या अन्यथा उनके मूल का और उनके पीछे की कहानी का पता लगाने के लिए वे विभिन्न माध्यमों का उपयोग कर सकते हैं। परन्तु जब दूसरे संसार की बात आती है जिसके बारे में हम आज बात कर रहे हैं—वह आध्यात्मिक संसार जिसका अस्तित्व भौतिक संसार के बाहर है—तो लोगों के पास इसके बारे में कुछ भी जानने का बिल्कुल भी कोई साधन या माध्यम नहीं हैं। मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? क्योंकि, मनुष्यजाति की दुनिया में, भौतिक संसार की हर चीज़ मनुष्य के भौतिक अस्तित्व से अवियोज्य है, और क्योंकि लोगों को ऐसा महसूस होता है कि भौतिक संसार की हर चीज़ उनकी भौतिक जीवन शैली और भौतिक जीवन से अवियोज्य है, इसलिए अधिकांश लोग केवल उन भौतिक चीज़ों से ही अवगत हैं, या उन्हें ही देखते हैं, जो उनकी आँखों के सामने होती हैं, जो चीज़ें उन्हें दिखाई पड़ती हैं। फिर भी जब आध्यात्मिक दुनिया की बात आती है—कहने का तात्पर्य है कि, हर चीज़ जो दूसरी दुनिया की है—तो कहना उचित है कि अधिकांश लोग विश्वास नहीं करते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि यह उन्हें दिखाई नहीं देती है, और वे मानते हैं कि इसे समझने की, या इसके बारे में कुछ भी जानने की कोई आवश्यकता नहीं है, आध्यात्मिक दुनिया भौतिक संसार से किस प्रकार पूरी तरह से भिन्न है इस बारे में कहने के लिए कुछ नहीं है। परमेश्वर के लिए, यह स्पष्ट है, लेकिन मनुष्यजाति के लिए यह छुपा हुआ है और स्पष्ट नहीं है, और इसलिए लोगों को कोई माध्यम खोजने में कठिनाई होती है जिसके माध्यम से वे इस दुनिया के विभिन्न पहलुओं को समझ सकें। आध्यात्मिक दुनिया के विभिन्न पहलुओं के बारे में जो बाते मैं कहने जा रहा हूँ उनका संबंध केवल परमेश्वर के प्रशासन और उसकी संप्रभुता से है। मैं रहस्यों का प्रकाशन नहीं कर रहा हूँ, न ही मैं तुम लोगों को उन रहस्यों में से कोई भी बता रहा हूँ, जिन्हें तुम लोग खोजना चाहते हो, क्योंकि यह परमेश्वर की संप्रभुता, परमेश्वर के प्रशासन, और परमेश्वर के भरण-पोषण से संबंधित है, और ऐसे में, मैं केवल उस अंश के बारे में बोलूँगा जिसे जानना तुम लोगों के लिए आवश्यक है।

सबसे पहले, मैं तुम लोगों से एक प्रश्न पूछता हूँ: तुम लोगों के मन में आध्यात्मिक दुनिया क्या है? मोटे तौर पर बोला जाए, तो यह वह दुनिया है जो भौतिक संसार से बाहर की है, एक ऐसी दुनिया जो लोगों के लिए अदृश्य और अस्पृश्य है। परन्तु तुम्हारी कल्पना में, आध्यात्मिक दुनिया को किस प्रकार का होना चाहिए? शायद, इसे न देख पाने के परिणामस्वरूप, तुम लोग इसकी कल्पना करने में सक्षम नहीं हो। बल्कि जब तुम लोग इसके बारे में दन्त कथाएँ सुनते हो, तब भी तुम लोग सोचते हो, कि तुम स्वयं को रोक नहीं पाओगे। और मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? कुछ ऐसी बात हैं जो बहुत से लोगों के साथ होती हैं जब वे छोटे होते हैं: जब कोई उन्हें कोई डरावनी कहानी सुनाता—भूतों और आत्माओं के बारे में—तो वे अत्यन्त भयभीत हो जाते हैं। और वे क्यों भयभीत होते हैं? क्योंकि वे इन चीज़ों की कल्पना कर रहे होते हैं; यद्यपि वे उन्हें नहीं देख सकते हैं, उन्हें महसूस होता है कि वे उनके कमरे के चारों ओर हैं, कमरे में कहीं छुपे हुए हैं, या कहीं अन्धेरे में हैं, और वे इतने डर जाते हैं कि उनकी सोने की हिम्मत नहीं होती है। विशेषरूप से रात के समय, वे अपने कमरे में अकेले, या आँगन में अकेले जाने की हिम्मत नहीं करते हैं। यह तुम्हारी कल्पना की आध्यात्मिक दुनिया है, और यह एक ऐसी दुनिया है जिसके बारे में लोग सोचते हैं कि भयावह है। वास्तव में, हर एक के पास थोड़ी बहुत कल्पना होती है, और हर कोई थोड़ा बहुत अनुभव कर सकता है।

आइए, हम आध्यात्मिक दुनिया से आरम्भ करें। आध्यात्मिक दुनिया क्या है? मैं तुम्हें एक छोटा सा और सरल स्पष्टीकरण देता हूँ। आध्यात्मिक दुनिया एक महत्वपूर्ण स्थान है, एक ऐसा स्थान जो भौतिक संसार से भिन्न है। और मैं क्यों कहता हूँ कि यह महत्वपूर्ण है? हम इसके बारे में विस्तार से बात करने जा रहे हैं। आध्यात्मिक दुनिया का अस्तित्व मनुष्यजाति के भौतिक संसार से जटिल रूप से जुड़ा है। सभी चीज़ों के ऊपर परमेश्वर के प्रभुत्व में वह मानव जीवन और मृत्यु के चक्र में एक बड़ी भूमिका निभाता है; यह इसकी भूमिका है, और उन कारणों में से एक है कि क्यों इसका अस्तित्व महत्वपूर्ण है। क्योंकि यह एक ऐसा स्थान है जो पाँच इंद्रियों के लिये अगोचर है, इसलिए कोई भी इस बात का अनुमान नहीं लगा सकता कि इसका अस्तित्व है अथवा नहीं। आध्यात्मिक दुनिया की असामान्य घटनाएँ मनुष्यजाति के अस्तित्व के साथ गहराई से जुड़ी हुई हैं, जिसके परिणामस्वरूप जिस प्रकार से मनुष्यजाति रहती है, वह भी आध्यात्मिक दुनिया से बेहद प्रभावित होता है। क्या यह परमेश्वर की संप्रभुता से संबंधित है? यह संबंधित है। जब मैं ऐसा कहता हूँ, तो तुम लोग समझ जाओ कि क्यों मैं इस विषय पर चर्चा कर रहा हूँ: क्योंकि यह परमेश्वर की संप्रभुता से, और उसके प्रशासन से संबंधित है। इस तरह के एक संसार में—जो लोगों के लिए अदृश्य है—इसकी हर स्वर्गिक आज्ञा, आदेश और प्रशासनिक प्रणाली भौतिक संसार के किसी भी देश की व्यवस्थाओं और प्रणालियों से बहुत उच्च है, और संसार में रहने वाला कोई भी प्राणी उनकी अवहेलना करने या उन्हें हथियाने का साहस नहीं करेगा। क्या यह परमेश्वर की संप्रभुता और प्रशासन से संबंधित है? इस संसार में, स्पष्ट प्रशासनिक आदेश, स्पष्ट स्वर्गिक आज्ञाएँ और स्पष्ट विधान हैं। विभिन्न स्तरों पर और विभिन्न क्षेत्रों में, न्यायालय अधिकारी पूर्णरुप से अपने कर्तव्य का निर्वाह करते हैं, और नियमों और विनियमों का पालन करते है, क्योंकि वे जानते हैं कि स्वर्गिक आज्ञा के उल्लंघन का परिणाम क्या होता है, वे स्पष्ट रूप से अवगत हैं कि किस प्रकार परमेश्वर दुष्टों को दण्ड और भले लोगों को इनाम देता है, और वह किस प्रकार सभी चीज़ों को चलाता है, वह किस प्रकार हर चीज़ पर शासन करता है, और, इसके अतिरिक्त, वे स्पष्ट रुप से देखते हैं कि किस प्रकार परमेश्वर अपने स्वर्गिक आदेशों और विधानों को कार्यान्वित करता है। क्या ये उस भौतिक संसार से भिन्न हैं, जिसमें मनुष्यजाति रहती है? वे व्यापक रुप से भिन्न हैं। यह एक ऐसा संसार है जो भौतिक संसार से पूर्णतया भिन्न है। चूँकि यहाँ स्वर्गिक आदेश और विधान हैं, इसलिए यह परमेश्वर की संप्रभुता, प्रशासन, और इसके अतिरिक्त, परमेश्वर के स्वभाव तथा स्वरूप से संबंधित है। इसे सुनने के पश्चात्, क्या तुम लोगों को यह महसूस नहीं होता है कि इस विषय पर बोलना मेरे लिये अति आवश्यक है? क्या तुम लोग इसमें निहित रहस्यों को जानना नहीं चाहते हो? (हाँ, हम चाहते हैं)। आध्यात्मिक दुनिया की अवधारणा ऐसी है। यद्यपि यह भौतिक संसार के साथ सहअस्तित्व में है, और साथ-साथ परमेश्वर के प्रशासन और उसकी संप्रभुता के अधीन है, फिर भी इस दुनिया का परमेश्वर का प्रशासन और उसकी संप्रभुता भौतिक संसार की अपेक्षा बहुत सख्त है। जब विस्तार की बात आती है, तो हमें इस बात से आरम्भ करना चाहिए कि किस प्रकार आध्यात्मिक दुनिया मनुष्य के जीवन और म़ृत्यु के चक्र के कार्य के लिए उत्तरदायी है, क्योंकि यह कार्य आध्यात्मिक दुनिया के प्राणियों के कार्य का एक बड़ा भाग है।

मनुष्यजाति के बीच, मैं लोगों को तीन प्रकारों में वर्गीकृत करता हूँ। पहले प्रकार के लोग अविश्वासी हैं, ये वे हैं जो धार्मिक विश्वासों से रहित हैं। वे अविश्वासी कहलाते हैं। अविश्वासियों की बहुत बड़ी संख्या केवल धन में विश्वास रखती है, वे केवल अपना स्वार्थ सिद्ध करते हैं, वे भौतिकवादी हैं और वे केवल भौतिक संसार में विश्वास करते है, जीवन और मृत्यु में और देवताओं और प्रेतों की लोकोक्तियों में विश्वास नहीं रखते हैं। मैं उन्हें अविश्वासियों के रुप में वर्गीकृत करता हूँ, और वे पहला प्रकार हैं। दूसरा प्रकार अविश्वासियों से अलग विभिन्न मतों को मानने वाले लोगों का है। मनुष्यजाति के बीच, मैं इन मतों के लोगों को अनेक मुख्य प्रकारों में विभाजित करता हूँ: पहला यहूदी हैं, दूसरा कैथोलिक हैं, तीसरा ईसाई हैं, चौथा मुस्लिम और पाँचवाँ बौद्ध हैं, ये पाँच प्रकार हैं। ये विभिन्न प्रकार के मतों वाले लोग हैं। तीसरा प्रकार उन लोगों का है जो परमेश्वर में विश्वास करते हैं, जो तुम लोगों से संबंधित हैं। ऐसे विश्वासी वे लोग हैं जो आज परमेश्वर का अनुसरण करते हैं। इन लोगों को दो प्रकारों में विभाजित किया जाता है: परमेश्वर के चुने हुए लोग और सेवा करने वाले लोग। इन प्रमुख प्रकारों को स्पष्ट रुप से विभेदित किया गया है। तो अब, अपने मन में तुम लोग मनुष्यों के प्रकारों और क्रमों को स्पष्ट रुप से विभेदित करने में सक्षम हो। पहला अविश्वासी हैं। मैं कह चुका हूँ कि अविश्वासी कौन हैं। क्या वे लोग जो आकाश में वृद्ध मनुष्य में विश्वास करते हैं अविश्वासी गिने जाते हैं? कई विश्वासी केवल आकाश में वृद्ध मनुष्य में विश्वास करते हैं; वे मानते हैं कि वायु, वर्षा और आकाशीय बिजली आकाश में इस वृद्ध मनुष्य द्वारा नियंत्रित की जाती हैं, जिस पर वे फसल बोने और काटने के लिए निर्भर रहते हैं—फिर भी परमेश्वर पर विश्वास करने के उल्लेख पर वे अनिच्छुक बन जाते हैं। क्या इसे परमेश्वर में विश्वास कहा जा सकता है? ऐसे लोगों को अविश्वासियों में सम्मिलित किया जाता है। तुम इसे समझ गए, है न? इन श्रेणियों को समझने में ग़लती मत करना। दूसरा प्रकार है मतों वाले लोग। तीसरा प्रकार वे लोग हैं जो आज परमेश्वर का अनुसरण करते हैं। और क्यों मैंने सभी मनुष्यों को इन प्रकारों में विभाजित किया है? (क्योंकि उनके गंतव्य और अन्त भिन्न-भिन्न हैं)। यह एक पहलू है। क्योंकि, जब इन विभिन्न प्रजातियों और प्रकारों के लोग आध्यात्मिक दुनिया में लौटते हैं, तो उनमें से प्रत्येक का जाने का भिन्न स्थान होगा, वे जीवन और मृत्यु के चक्र की भिन्न—भिन्न व्यवस्थाओं के अधीन किए जाएँगे, और यही कारण है कि क्यों मैंने मनुष्यों को इन मुख्य प्रकारों में वर्गीकृत किया है।

1. अविश्वासियों का जीवन और मृत्यु का चक्र

आइए हम अविश्वासियों के जीवन और मृत्यु के चक्र से आरम्भ करें। मनुष्य की मृत्यु के पश्चात्, आध्यात्मिक दुनिया का एक न्यायालय अधिकारी उसे ले जाता है। और उनका कौन—सा भाग ले जाया जाता है? उसकी देह नहीं, बल्कि उसकी आत्मा। जब उनकी आत्मा ले जायी जाती है, तब वे ऐसे स्थान पर पहुँचते हैं जो आध्यात्मिक दुनिया की एक एजेंसी है, एक ऐसा स्थान जो अभी-अभी मरे हुए लोगों की आत्मा को ग्रहण करता है। (ध्यान दें: किसी के भी मरने के बाद पहला स्थान जहाँ वे जाते हैं, आत्मा के लिए अजनबी होता है)। जब उन्हें इस स्थान पर ले जाया जाता है, तो एक अधिकारी पहली जाँचें करता है, उनका नाम, पता, और आयु की पुष्टि करता है। उन्होंने अपने जीवन के साथ जो भी किया, हर चीज़ एक पुस्तक में लिखी होती है। और विशुद्धता के लिए उसका सत्यापन किया जाता है। इस सब की जाँच हो जाने के पश्चात्, उन मनुष्यों के पूरे जीवन के व्यवहार और कार्यकलापों का उपयोग यह निर्धारित करने के लिए किया जाता है कि उन्हें दण्ड दिया जाएगा या फिर से मनुष्य के रूप में जन्म लेंगे, जो कि पहला चरण है। क्या यह पहला चरण भयावह है? यह अत्यधिक भयावह नहीं है, क्योंकि इसमें केवल इतना ही हुआ है कि मनुष्य एक अन्धकारमय और अपरिचित स्थान में पहुँचा है जो अत्यधिक भयावह नहीं है।

दूसरे चरण में, यदि इस मनुष्य ने जीवनभर बहुत से बुरे कार्य किये हैं, यदि उसने अनेक दुष्ट कर्म किये हैं, तब उसे दण्ड देने के लिए दण्ड के स्थान पर ले जाया जाएगा। यह वह स्थान होगा जो स्पष्ट रूप से लोगों के दण्ड के लिए है। उन्हें किस प्रकार के दण्ड दिया जाता है इसका वर्णन उनके द्वारा किये गए पापों पर, और इस बात पर निर्भर करता है कि मृत्यु से पूर्व उन्होंने कितने दुष्टतापूर्ण कार्य किए—जो कि द्वितीय चरण में होने वाली पहली स्थिति है। उनकी मृत्यु से पूर्व उनके द्वारा किये गये कार्यों और उनकी दुष्टताओं की वजह से, दण्ड के पश्चात् जब वे पुनः जन्म लेते हैं—जब वे एक बार फिर से भौतिक संसार में जन्म लेते हैं—तो कुछ लोग मनुष्य बनते रहेंगे, और कुछ पशु बन जाएँगे। कहने का अर्थ है कि, आध्यात्मिक दुनिया में व्यक्तियों के लौटने के पश्चात् उनके द्वारा किए गए दुष्टता के कार्यों की वजह से उन्हें दण्डित किया जाता है; इसके अतिरिक्त, उनके द्वारा किए गए दुष्टता के कार्य की वजह से, अपने अगले जन्म में वे मनुष्य नहीं, बल्कि पशु बनते हैं। जो पशु वे बन सकते हैं उनमें गाय, घोड़े, सूअर, और कुत्ते शामिल हैं। कुछ लोग आकाश के पक्षी या एक बत्तख या कलहंस बन सकते हैं... पशुओं के रुप में उनके पुनर्जन्म लेने के बाद, जब वे मरते हैं तो वे आध्यात्मिक दुनिया में लौट जाते हैं, और, जैसा कि पहले कहा गया है, मरने से पहले उनके व्यवहार के आधार पर, आध्यात्मिक दुनिया तय करेगी कि वे मनुष्य के रुप में पुनर्जन्म लेंगे या नहीं। अधिकांश लोग बहुत अधिक दुष्टता करते हैं, उनके पाप अत्यन्त गंभीर होते हैं, और इसलिए जब उनका जन्म होता है तो वे सात से बारह बार तक पशु बनते हैं। सात से बारह बार—क्या यह भयावह है? (यह भयावह है)। तुम लोगों को क्या चीज़ डरा रही है? किसी मनुष्य का पशु बनना, यह भयावह है। और एक मनुष्य के लिए, एक पशु बनने में सर्वाधिक दुःखदायी बात क्या है? किसी भाषा का न होना, केवल कुछ साधारण विचार होना, केवल उन्हीं चीज़ों को कर पाना जो पशु करते हैं और वही खा पाना जो पशु खाते हैं, पशु के समान साधारण मानसिकता और हाव-भाव होना, सीधे खड़े हो कर चलने में समर्थ न होना, मनुष्यों के साथ संवाद न कर पाना, और मनुष्यों के किसी भी व्यवहार और गतिविधियों का पशुओं से कोई सम्बन्ध न होना। कहने का आशय है कि, सब चीज़ों के बीच, पशु होना सभी जीवित प्राणियों में तुम्हें निम्नतम कोटि का बना देता है, और यह मनुष्य होने से कहीं अत्यधिक दुःखदायी है। यह उन लोगों के लिए आध्यात्मिक दुनिया के दण्ड का एक पहलू है जिन्होंने बहुत अधिक दुष्टता के कार्य और बड़े पाप किए हैं। जब दण्ड की प्रचण्डता की बात आती है, तो यह इस बात पर निर्भर करता है कि वे किस प्रकार के पशु बनते हैं। उदाहरण के लिए, क्या एक कुत्ता बनने की तुलना में एक सूअर बनना अधिक अच्छा है? क्या कुत्ते की तुलना में सूअर अधिक अच्छा जीवन जीता है या बुरा? बदतर, है न? यदि लोग गाय या घोड़ा बनते हैं, तो क्या वे एक सूअर की तुलना में अधिक बेहतर जीवन जीएँगे या बदतर? (बेहतर)। ऐसा दिखाई देता है मानो कि यदि चुनने का अवसर दिया जाए, तो तुम लोगों की अभिरुचि होगी। यदि कोई बिल्ली बनता है तो क्या यह अधिक आरामदायक होगा? गाय या घोड़ा बनने की तुलना में यह कहीं अधिक आरामदायक होगा। यदि तुम्हें पशुओं के बीच चुनने दिया जाए, तो तुम बिल्ली बनना पसंद करोगे, और यह अधिक आरामदायक है क्योंकि तुम अपना अधिकांश समय नींद की सुस्ती में गुज़ार सकोगे। गाय या घोड़ा बनना अधिक मेहनत वाला काम है, और इसलिए यदि लोग गाय या घोड़े के रुप में पुनर्जन्म लेते हैं, तो उन्हें कठिन परिश्रम करना पड़ता है—जो एक कष्टप्रद दण्ड प्रतीत होता है। गाय या घोड़ा बनने की तुलना में कुत्ता बनना कुछ अधिक बेहतर है, क्योंकि कुत्ते का अपने स्वामी के साथ निकट संबंध होता है। इससे ज्यादा और क्या है कि, आजकल, बहुत से लोग कुत्ता पालते हैं और तीन से पाँच वर्ष पश्चात् वह उनकी कही हुई कई बातें समझने लगता है। क्योंकि कुत्ता अपने मालिक के बहुत से शब्दों को समझ सकता है, इसलिए उसे अपने मालिक की अच्छी समझ होती है, और कभी-कभी वह अपने मालिक के मिज़ाज और आवश्यकताओं के अनुरुप बन सकता है, इसलिये मालिक कुत्ते के साथ ज्यादा अच्छा व्यवहार करता है, और कुत्ता ज्यादा अच्छा खाता हैऔर अच्छा—पीता है, और जब वह पीड़ा में होता है तो इसकी अधिक देखभाल की जाती है—तो क्या कुत्ता एक अधिक सुखी जीवन व्यतीत नहीं करता है? इसलिये एक गाय या घोड़ा होने की तुलना में कुत्ता होना बेहतर है। इसमें, किसी मनुष्यों के दण्ड की प्रचण्डता यह निर्धारित करती है कि वे कितनी बार पशु के रूप में जन्म लेते हैं और किस प्रकार के पशु के रूप में वे जन्म लेते हैं। तुम लोग समझे, है न?

क्योंकि अपने जीवित रहने के समय उन्होनें बहुत से पाप किये थे, इसलिए कुछ लोगों को सात से बारह बार पशु के रूप में पुनर्जन्म लेने का दण्ड दिया जाएगा। पर्याप्त बार दण्डित होने के पश्चात्, जब वे आध्यात्मिक दुनिया मे लौटते हैं तो उन्हें अन्यत्र ले जाया जाता है। इस स्थान में विभिन्न आत्माएँ पहले ही दण्ड पा चुकी होती हैं, और उस प्रकार की होती हैं जो मनुष्य के रूप में जन्म लेने के लिये तैयार हो रही हैं। यह स्थान प्रत्येक आत्मा को उस प्रकार के परिवार जिसमें वे उत्पन्न होंगे, एक बार पुनर्जन्म लेने के बाद उनकी क्या भूमिका होगी, आदि, के अनुसार श्रेणीबद्ध करता है। उदाहरण के लिए, कुछ लोग जब इस संसार में आएँगे तो गायक बनेंगे, और इसलिए उन्हें गायकों के बीच रखा जाता है; कुछ लोग इस संसार में आएँगे तो व्यापारी बनेंगे और इसलिए उन्हें व्यापारी लोगों के बीच रखा जाता है; और यदि किसी को मनुष्य रूप में आने के बाद विज्ञान अनुसंधानकर्ता बनना है तो उन्हें अनुसंधानकर्ताओं के बीच रखा जाता है। उन्हें वर्गीकृत कर दिए जाने के पश्चात्, प्रत्येक को एक भिन्न-भिन्न समय और नियत तिथि के अनुसार भेजा जाता है, ठीक वैसे ही जैसे कि आजकल लोग ई-मेल भेजते हैं। इसमें जीवन और मृत्यु का एक चक्र पूरा हो जाएगा। जब कोई व्यक्ति आध्यात्मिक दुनिया में पहुँचता है उस दिन से ले कर जब तक उसका दण्ड समाप्त नहीं हो जाता है तब तक, उनका कई बार पशु के रुप में पुनर्जन्म हो सकता है, तथा फिर वह मनुष्य के रुप में पुनर्जन्म लेने के लिये तैयार हो जाता है; यह एक सम्पूर्ण प्रक्रिया है।

और क्या जिन्होंने दण्ड भोग लिया है और जो अब पशु के रुप में जन्म नहीं लेंगे, उन्हें मनुष्य बनने के लिए शीघ्र भौतिक संसार में भेजा जाएगा? या उन्हें मनुष्यों के बीच आने से पहले कितना समय लगेगा? वह आवृत्ति क्या है जिससे ये लोग मानव बनते हैं?[क] इसके कुछ लौकिक प्रतिबंध हैं। आध्यात्मिक दुनिया में होने वाली हर चीज़ कुछ उचित लौकिक प्रतिबंधों और नियमों के अधीन है—जिसे, यदि मैं संख्याओं के साथ समझाऊँ, तो तुम लोग समझ जाओगे। उनके लिये जो अल्पावधि में पुनर्जन्म लेते हैं, जब वे मरते हैं तो मनुष्य के रुप में उनका पुनर्जन्म तैयार किया जाएगा। अल्पतम समय तीन दिन है। कुछ लोगों के लिए, यह तीन माह है, कुछ के लिए यह तीन वर्ष है, कुछ के लिए यह तीस वर्ष है, कुछ के लिए यह तीन सौ वर्ष है, कुछ के लिए तो यह तीन हजार वर्ष तक भी है, इत्यादि। तो इन लौकिक नियमों के बारे में क्या कहा जा सकता है, और उनकी विशिष्टताएँ क्या हैं? भौतिक संसार में, मनुष्यों के संसार में, किसी आत्मा का पहुँचना, आवश्यकता पर आधारित होता है: यह उस भूमिका के अनुसार होता है जिसे इस आत्मा को इस संसार में निभाना है। जब लोग साधारण व्यक्ति के रुप में पुनर्जन्म लेते हैं, तो उनमें से अधिकांश अतिशीघ्र पुनर्जन्म लेते हैं, क्योंकि मनुष्य के संसार को ऐसे साधारण लोगों की महती आवश्यकता होती है और इसलिए तीन दिन के पश्चात् वे एक ऐसे परिवार में भेज दिए जाते हैं जो उनके मरने से पहले के परिवार से सर्वथा भिन्न होता है। परन्तु कुछ ऐसे होते हैं जो इस संसार में विशेष भूमिका निभाते हैं। "विशेष" का अर्थ है कि मनुष्यों के संसार में उनकी कोई बड़ी माँग नहीं होती है; ऐसी भूमिका के लिये अधिक व्यक्तियों की आवश्यकता नहीं होती है, और इसलिए उनके पुनर्जन्म लेने से पहले तीन सौ वर्ष का समय लग सकता है।[ख] कहने का तात्पर्य है कि यह आत्मा हर तीन सौ वर्ष में एक बार अथवा यहाँ तक कि तीन हजार वर्ष में भी एक बार आएगी। और ऐसा क्यों है? क्योंकि तीन सौ वर्ष या तीन हज़ार वर्ष तक संसार में ऐसी भूमिका की आवश्यकता नहीं है और इसलिए उन्हें आध्यात्मिक दुनिया के कहीं पर रखा जाता है। उदाहरण के लिए, कनफ्यूशियस को लें, पारंपरिक चीनी संस्कृति पर उसका गहरा प्रभाव था। उसके आगमन ने उस समय की संस्कृति, ज्ञान, परम्परा और उस समय के लोगों की सोच पर गहरा प्रभाव डाला था। परन्तु इस तरह के मनुष्य की हर एक युग में आवश्यकता नहीं होती है, इसलिए उसे पुनर्जन्म लेने से पहले तीन सौ या तीन हजार वर्ष तक प्रतीक्षा करते हुए, आध्यात्मिक दुनिया में ही रहना पड़ा था। क्योंकि मनुष्यों के संसार को ऐसे किसी व्यक्ति की आवश्यकता नहीं थी, इसलिए उसे निष्क्रिय रुप से प्रतीक्षा करनी पड़ी, क्योंकि इस तरह की बहुत कम भूमिकाएँ थी, उसके करने के लिए बहुत कम था, इसलिए उसे, निष्क्रिय, और मनुष्य के संसार में उसकी आवश्यकता पड़ने पर भेजे जाने के लिए, अधिकांश समय आध्यात्मिक दुनिया में कहीं पर रखना पड़ा था। जिस बारम्बारता के साथ अधिकतर लोग पुनर्जन्म लेते हैं उसके लिए इस प्रकार के आध्यात्मिक दुनिया के लौकिक नियम हैं। वे चाहे कोई साधारण या विशेष हों, आध्यात्मिक दुनिया में लोगों के पुनर्जन्म लेने की प्रक्रिया के लिये उचित नियम और सही अभ्यास हैं, और ये नियम और अभ्यास परमेश्वर की ओर से आते हैं, उन्हें परमेश्वर द्वारा भेजा जाता है उनका निर्णय या नियन्त्रण आध्यात्मिक दुनिया के किसी न्यायालय अधिकारी या प्राणी के द्वारा नहीं किया जाता है। अब तुम समझ गए, है ना?

किसी आत्मा के लिए उसका पुनर्जन्म और वह भूमिका जो वह निभाती है—इस जीवन में उसकी भूमिका क्या है—किस परिवार में वह जन्म लेती है और उसका जीवन किस प्रकार का होता है, इन सबका उसके पिछले जीवन से गहरा संबंध होता है। मनुष्य के संसार में हर प्रकार के लोग आते हैं, और उनके द्वारा निभाई जाने वाली भूमिकाएँ भिन्न—भिन्न होती हैं, उसी तरह से उनके द्वारा किए जाने वाले कार्य भिन्न-भिन्न होते हैं। ये कौन से कार्य हैं? कुछ लोग अपना कर्ज़ चुकाने आते हैं: यदि उन्होंने पिछली ज़िंदगी में किसी से बहुत सा पैसा उधार लिया था, तो वे इस ज़िंदगी में उस कर्ज़ को चुकाने के लिए आते हैं। कुछ लोग, इस बीच, अपना ऋण उगाहने के लिए आए हैं: विगत जीवन में उनके साथ बहुत सी चीज़ों में, और अत्यधिक पैसों का घोटाला किया गया था, और इसलिए उनके आध्यात्मिक दुनिया में आने के बाद, आध्यात्मिक दुनिया उन्हें न्याय देगी और उन्हें इस जीवन में अपना कर्जा उगाहने देगी। कुछ लोग एहसान का कर्ज़ चुकाने के लिए आते हैं: उनके पिछले जीवन के दौरान—उनकी मृत्यु से पूर्व—कोई उनके प्रति दयावान था, और इस जीवन में उन्हें पुनर्जन्म लेने के लिए एक बड़ा अवसर प्रदान किया गया है और इसलिए वे उस कृतज्ञता का बदला चुकाने के लिए पुनर्जन्म लेते हैं। इस बीच, दूसरे किसी का जीवन लेने के लिए इस जीवन में पैदा हुए हैं। वे किसका जीवन लेते हैं? उस व्यक्ति का जिसने पिछले जीवन में उसके प्राण लिये थे। सारांश में, प्रत्येक व्यक्ति का वर्तमान जीवन अपने विगत जीवन के साथ प्रगाढ़ रुप से संबंध रखता है, यह अविभाज्य रूप से जुड़ा है। कहने का तात्पर्य यह है कि प्रत्येक व्यक्ति का वर्तमान जीवन उसके पिछले जीवन से बहुत अधिक प्रभावित होता है। उदाहरण के लिए, झांग ने अपनी मृत्यु से पहले ली को एक बड़ी मात्रा में पैसों का धोखा दिया था। तो क्या झांग ली का ऋणी बन गया? क्योंकि वह ऋणी है, तो क्या यह स्वाभाविक है कि ली को झांग से अपना ऋण वसूल करना चाहिए? और इसलिए, उनकी मृत्यु के उपरान्त, उनके बीच निपटाए जाने के लिए एक ऋण है। और जब वे पुनर्जन्म लेते हैं और झांग मनुष्य बनता है, तो किस प्रकार से ली उससे अपना ऋण वसूल करता है? कहने का अर्थ है कि ली झांग के पुत्र के रुप में पुनः उत्पन्न होकर उससे अपना ऋण वसूल करता है, जिसमें झांग उसके पिता के रूप में होता है? इस जीवन में यही होता है। ली का पिता झांग खूब धन अर्जित करता है, और वह उसके पुत्र ली द्वारा उड़ा दिया जाता है। चाहे झांग कितना ही धन क्यों न कमाये, उसका पुत्र ली, उसे व्यय करने में उसकी "सहायता" करता है। चाहे झांग कितना ही धन क्यों न अर्जित करे, वह कभी पर्याप्त नहीं होता है, और इसी बीच उसका पुत्र किसी न किसी कारण से पिता के धन को विभिन्न तरीकों और साधनों से उड़ा देता है। झांग हैरान रह जाता हैः ‘‘यह क्या हो रहा है? क्यों मेरा पुत्र हमेशा दुर्भाग्यशाली रहता है? ऐसा क्यों है कि दूसरों के पुत्र इतने अच्छे हैं? क्यों मेरा पुत्र महत्वकांक्षी नहीं है। वह कोई धन अर्जित करने में इतना बेकार और अयोग्य क्यों है, क्यों मुझे सदा उसकी सहायता करनी पड़ती है? चूँकि मुझे उसे सहारा देना हैं तो मैं सहारा दूँगा, किन्तु ऐसा क्यों है कि चाहे मैं कितना ही धन उसे क्यों न दूँ, वह सदा और अधिक चाहता है? क्यों वह कोई ईमानदारी का काम नहीं कर सकता है? क्यों वह एक आवारा है, खाना-पीना, वेश्यावृत्ति और जुएबाजी करना—इन सभी में लगा रहता है? आखिर ये हो क्या रहा है?" फिर झांग कुछ समय तक विचार करता है: "ऐसा हो सकता है कि विगत जीवन में मैं उसका ऋणी रहा हूँ? तो ठीक है, मैं वह कर्ज उतार दूँगा! जब तक मैं पूरा चुकता नहीं कर दूँगा, यह मामला समाप्त नहीं होगा!" वह दिन आ सकता है जब ली अपना ऋण वसूल कर लेता है, और जब वह चालीस या पचास वर्ष का हो जाता है, तो एक दिन ऐसा आयेगा जब उसे अचानक अक्ल आएगी: "अपने जीवन के पूर्वार्द्ध में मैंने एक भी भला काम नहीं किया है! मैंने अपने पिता के कमाये हुए समस्त धन को उड़ा दिया है—मुझे एक अच्छा इन्सान होना चाहिए! मैं स्वयं को मज़बूत बनाऊँगा: मैं एक ऐसा व्यक्ति बनूँगा जो ईमानदार हो, और उचित रूप से जीवन जीता हो, और मैं अपने पिता को पुनः कभी दुःख नहीं पहुँचाऊँगा!" वह ऐसा क्यों सोचता है? वह अचानक अच्छे में कैसे बदल गया? क्या इसका कोई कारण है? क्या कारण है? (क्योंकि ली ने अपना ऋण वसूल कर लिया है, कर्ज चुकता हो चुका है)। इसमें, कार्य कारण है। कहानी बहुत पहले आरम्भ हुई थी, बहुत पहले, उन दोनों के पैदा होने से पहले, और उनके विगत जीवन की यह कहानी उनके वर्तमान जीवन तक लायी गई है, और दोनों में से कोई भी किसी को दोष नहीं दे सकता है। चाहे झांग ने अपने पुत्र को कुछ भी क्यों न सिखाया हो, उसके पुत्र ने कभी नहीं सुना, और एक दिन भी ईमानदारी से कार्य नहीं किया—परन्तु जिस दिन कर्ज चुका दिया गया, तो उसको सिखाने की कोई आवश्यकता नहीं रही; उसका पुत्र स्वाभाविक रुप से समझ गया। यह एक साधारण सा उदाहरण है और यहाँ, निःसन्देह, ऐसे अनेक उदाहरण हैं। और यह लोगों को क्या बताता है? (कि उन्हें अच्छा बनना चाहिए और उन्हें दुष्टता नहीं करनी चाहिए)। उन्हें कोई दुष्टता नहीं करनी चाहिए, और उनकी दुष्टता का प्रतिफल मिलेगा! अधिकांश अविश्वासी बहुत दुष्टता करते हैं, और उनकी दुष्टताओं का उन्हें प्रतिफल मिला है, ठीक है? परन्तु क्या यह प्रतिफल मनमाना है? प्रतिफल के साथ जो कुछ भी मिलता है उसकी पृष्ठभूमि होती है और एक कारण होता है। क्या तुम्हें लगता है कि तुम्हारे किसी के साथ पैसे की धोखाधड़ी करने के बाद तुम्हें कुछ नहीं होगा? क्या तुम्हें लगता है कि उसके साथ पैसों की धोखाधड़ी करने के पश्चात्, उसका धन हड़प लेने के बाद तुम्हें कोई परिणाम नहीं भुगतना पड़ेगा? यह तो असंभव होगा, और इसका परिणाम होगा! इस बात की परवाह किए बिना कि वह कौन है, या वह यह विश्वास करता है अथवा नहीं कि कोई परमेश्वर है, हर व्यक्ति को अपने व्यवहार का उत्तरदायित्व लेना होगा और अपनी करतूतों के परिणामों को भुगतना होगा। इस साधारण से उदाहरण के संबंध में—झांग को दण्डित किया जाना और ली का ऋण चुकाया जाना—क्या यह उचित नहीं है? जब लोग इस प्रकार के कार्य करते हैं तो इसी प्रकार का परिणाम होता है। और क्या यह आध्यात्मिक दुनिया के प्रशासन से पृथक है? यह आध्यात्मिक दुनिया के प्रशासन से अवियोज्य है। अविश्वासी होने के बावजूद, जो परमेश्वर में विश्वास नहीं करते हैं, उनका अस्तित्व ऐसी स्वर्गिक आज्ञाओं और आदेशों के अधीन होता है, इससे कोई बच कर नहीं भाग सकता है, इस सच्चाई से कोई नहीं बच सकता है।

वे लोग जिन्हें परमेश्वर में विश्वास नहीं है प्रायः मानते हैं कि प्रत्येक वह चीज़ जिसे देखा जा सकता है अस्तित्व में है, जबकि प्रत्येक वह चीज जिसे देखा नहीं जा सकता, या जो लोगों से बहुत दूर है, अस्तित्व में नहीं है। वे यह मानना पंसद करते हैं कि "जीवन और मृत्यु का चक्र" नहीं होता है, और कोई "दण्ड" नहीं होता है, और इसलिए वे बिना किसी मलाल के पाप और दुष्टता करते हैं—जिसके बाद वे दण्डित किये जाते हैं, या पशु के रुप में जन्म लेते हैं। अविश्वासियों में से अधिकतर लोग इस दुष्चक्र में फँस जाते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि वे इस बात से अनभिज्ञ होते हैं कि आध्यात्मिक दुनिया समस्त जीवित प्राणियों के अपने प्रशासन में सख्त है। चाहे तुम विश्वास करो अथवा नहीं, वह तथ्य अस्तित्व में रहता है, क्योंकि एक भी व्यक्ति या वस्तु उस दायरे से बच कर नहीं भाग सकती है जो परमेश्वर की आँखों के द्वारा देखा जा रहा है, और एक भी व्यक्ति या वस्तु परमेश्वर की स्वर्गिक आज्ञाओं और आदेशों के नियमों और उनकी सीमाओं से बच कर नहीं भाग सकती है। और इसलिए यह साधारण सा उदाहरण हर एक को बताता है कि इस बात की परवाह किए बिना कि तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो अथवा नहीं, पाप करना और दुष्टता करना अस्वीकार्य है, इनके दुष्परिणाम होते हैं। जब कोई जिसने किसी को धन का धोखा दिया है इस प्रकार से दण्डित किया जाता है, तो ऐसा दण्ड उचित है। इस तरह के आम तौर पर देखे जाने वाले व्यवहार को आध्यात्मिक दुनिया द्वारा दण्डित किया जाता है, परमेश्वर के आदेशों और स्वर्गिक आज्ञाओं द्वारा दण्डित किया जाता है और इसलिए गंभीर आपराधिक और दुष्टतापूर्ण व्यवहार—बलात्कार करना, लूटपाट करना, धोखाधड़ी और कपट, चोरी और डकैती, हत्या और आगजनी, इत्यादि—और भी अधिक भिन्न- भिन्न उग्रता वाले दण्ड की श्रृंखला के अधीन किए जाते हैं। और इन भिन्न-भिन्न उग्रता वाले दण्ड की श्रृंखला में क्या शामिल हैं? उनमें से कुछ उग्रता के स्तर का निर्धारण करने के लिये समय का प्रयोग किया जाता है, कुछ विभिन्न तरीकों का उपयोग करके ऐसा करते हैं और अन्य वहाँ के माध्यम से करते हैं जहाँ लोग जन्म के बाद जाते हैं। उदाहरण के लिए, कुछ लोग गालियाँ बकने वाले होते हैं। "गालियाँ बकनेवाले" किसे संदर्भित करता है? इसका अर्थ होता है प्रायः दूसरों को गाली देना और द्वेषपूर्ण भाषा का, ऐसी भाषा का उपयोग करना जो दूसरों को कोसती है। द्वेषपूर्ण भाषा क्या प्रकट करती है? यह प्रकट करती है कि किसी का हृदय कलुषित है। द्वेषपूर्ण भाषा जो लोगों को कोसती है, प्रायः ऐसे ही लोगों के मुख से निकलती है, और ऐसी द्वेषपूर्ण भाषा के साथ कठोर परिणाम जुड़े होते हैं। इन लोगों के मरने और उचित दण्ड भोग लेने के पश्चात्, उनका गूंगे के रूप में पुनर्जन्म अवश्य होना चाहिए। कुछ लोग, जब वे जीवित रहते हैं, तो बडे चौकस रहते हैं, वे प्रायः दूसरों का लाभ उठाते हैं, उनकी छोटी-छोटी योजनाएँ विशेषरूप से सुनियोजित होती हैं, और वे अधिकतर वही करते हैं जिनसे दूसरों को हानि पहुँचती है। जब उनका पुनर्जन्म होता है, तो वह मूर्ख या मानसिक रुप से विकलांग हो सकता है। कुछ लोग दूसरों की निजता में ताक झाँक करते हैं: उनकी आँखें बहुत सा वह देख लेती हैं जो उन तक साझा नहीं होना चाहिए, और वे बहुत सा वह जान लेते हैं जो उन्हें नहीं जानना चाहिए, और इसलिए जब उनका पुनर्जन्म होता है, तो वे अन्धे हो सकते हैं। कुछ लोग जब वे जीवित होते हैं तो बहुत फुर्तीले होते हैं, वे प्रायः झगड़ते हैं और बहुत दुष्टता करते हैं, और इसलिए जब उनका पुनर्जन्म होता है तो वे विकलांग, लंगड़े, बिना एक बाँह वाले हो सकते हैं, या वे कुबड़े हो सकते हैं, या टेढ़ी गर्दन वाले हो सकते हैं, वे लचक कर चलने वाले हो सकते हैं या उनका एक पैर दूसरे की अपेक्षा छोटा हो सकता है, इत्यादि। इसमें, उन्हें अपने जीवित रहने के दौरान की गई दुष्टता के स्तर के आधार पर विभिन्न दण्डों के अधीन किया जाता है। और तुम लोग क्या कहते हो, लोग भेंगे क्यों होते हैं? क्या ऐसे काफी लोग हैं? आजकल उनमें से बहुत से आस-पास हैं। कुछ लोग इसलिए भेंगे होते हैं क्योंकि अपने विगत जीवन में उन्होंने अपनी आँखों का बहुत अधिक उपयोग किया था, उन्होंने बहुत से बुरे कार्य किए थे, और इसलिए जब उनका इस जीवन में जन्म होता है तो उनकी आँखें भेंगी होती हैं और गंभीर मामलों में वे अन्धे भी होते हैं। तुम्हें क्या लगता है कि जो भेंगे होते हैं वे देखने में अच्छे लगते हैं? क्या वे एक अच्छी छाप छोड़ते हैं? देखें कि कैसे उनके चेहरे का ढाँचा सुन्दर है, उनकी त्वचा साफ और पीली है, उनके नेत्र बड़े और पलकें घनी हैं—किन्तु दुर्भाग्यवश उनकी एक आँख भेंगी है, वे किस प्रकार के दिखाई पड़ते हैं? क्या इसका मनुष्य के आचरण पर पूर्णरुप से प्रभाव नहीं पड़ता है? और इस प्रभाव के साथ, उनका जीवन किस प्रकार का हैं? जब वे अन्य लोगों से मिलते हैं, वे अपने आप में सोचते हैं: "मैं तो भेंगा हूँ! मुझे अवश्य सर झुका कर बात करनी चाहिए और लोगों को आमने-सामने नहीं देख सकता हूँ, जिससे वे मेरी आँखों को न देख सकते हैं।" उनकी भेंगी आँखों इस बात को प्रभावित करती हैं कि वे चीज़ो को कैसे देखते हैं, और लोगों को आमने-सामने देखने की क्षमता को प्रभावित करती हैं। इसमें, क्या उन्होंने अपनी आँखों के उपयोग को नहीं गँवा दिया है? और इस प्रकार, क्या विगत जीवन की उनकी ज्यादतियों का निवारण नहीं किया गया है? इसलिए, अगले जीवन में वे इस प्रकार की कोई बुराई करने का साहस नहीं करेंगे। यह प्रतिफल है! कुछ लोग अपनी मृत्यु से पूर्व दूसरों के साथ बहुत अच्छी तरह से निभाते हैं, या आर्थिक रूप से उनकी सहायता करते हैं, वे अपने प्रियजनों, दोस्तों, साथियों, या उनसे जुड़ें लोगों के लिए कई अच्छे कार्य करते हैं। वे दूसरों को दान देते हैं और उनकी सहायता करते हैं, या आर्थिक रुप से उनकी सहायता करते हैं, लोग उनके बारे में बहुत अच्छी राय रखते हैं, और जब ऐसे लोग आध्यात्मिक दुनिया में वापस आते है तब उन्हें दंडित नहीं किया जाता है। किसी अविश्वासी को किसी भी प्रकार से दण्डित नहीं किए जाने का अर्थ है कि वह बहुत अच्छा इन्सान था। परमेश्वर के अस्तित्व पर विश्वास करने के बजाय, वे केवल आकाश में वृद्ध व्यक्ति पर विश्वास करते हैं। वे केवल इतना ही विश्वास करते हैं कि उनसे ऊपर कोई आत्मा है जो हर उस चीज़ को देखती है जो वे करते हैं —वे केवल उसी में विश्वास करते हैं। और इसका क्या परिणाम होता है? वे बहुत अच्छे व्यवहार वाले होते हैं। ये लोग दयालु और परोपकारी होते हैं और जब अन्ततः वे आध्यात्मिक दुनिया में वापस आएँगे, तो आध्यात्मिक दुनिया उनके साथ बहुत अच्छा व्यवहार करेगी और शीघ्र ही उनका नया रूप होगा और वे पुनः पैदा होंगे। और वे किस प्रकार के परिवार में आएँगे? यद्यपि वह परिवार धनी नहीं होगा, किन्तु यह शान्तिमय होगा, इसके सदस्यों के बीच समरसता होगी, उनके दिन शांति, खुशहाली में गुज़रेंगे, हर कोई आनंदमय होगा, और उनका जीवन अच्छा होगा। जब तक व्यक्ति प्रौढ़ावस्था में पहुँचेगा, तो वह अनेक पुत्र और पुत्रियों को जन्म दे देगा और उसका परिवार बड़ा होगा, उसकी संतानें बुद्धिमान होंगी और सफलता का आनंद लेंगी, और वह तथा उसका परिवार सौभाग्य का आनन्द उठाएगा—और इस तरह का परिणाम व्यक्ति के विगत जीवन से जुड़ा होता है। कहने का आशय है कि, कोई व्यक्ति मरने के बाद कहाँ जाता है और कहाँ उसका पुनर्जन्म होता है, वह पुरुष होगा अथवा स्त्री, उसका ध्येय क्या है, जीवन में वह किन परिस्थितियों से गुज़रेगा, उसकी असफलताएँ, वह किन आशीषों का सुख भोगेगा, वह किनसे मिलेगा, उनके साथ क्या होगा—कोई भी इसकी भविष्यवाणी नहीं कर सकता है, इससे बच नहीं सकता है, या इससे छुप नहीं सकता है। कहने का अर्थ है कि, तुम्हारा जीवन निश्चित कर दिए जाने के पश्चात्, तुम्हारे साथ जो होता है उसमें, तुम इससे बचने का कैसा भी प्रयास करो, तुम किसी भी साधन द्वारा तुम बचने का प्रयास करो, आध्यात्मिक दुनिया में परमेश्वर ने तुम्हारे लिये जो मार्ग निर्धारित कर दिया है उसके उल्लंघन का तुम्हारे पास कोई उपाय नहीं है। क्योंकि जब तुम पुनर्जन्म लेते हो, तो तुम्हारे जीवन का भाग्य पहले ही निश्चित किया जा चुका होता है। चाहे वह अच्छा हो अथवा बुरा, प्रत्येक को इसका सामना करना चाहिए, और आगे बढते रहना चाहिए; यह एक ऐसा मुद्दा है जिससे इस संसार में रहने वाला कोई भी बच नहीं सकता है, और कोई भी मुद्दा इससे अधिक वास्तविक नहीं है, ठीक है, तुम यह सब समझ गए, है न?

इसे समझ लेने के बाद, क्या तुम लोग देखते हो कि परमेश्वर के पास अविश्वासियों के जीवन और मृत्यु के चक्र के लिए बिल्कुल सटीक और कठोर जाँच और व्यवस्था है? सबसे पहले, परमेश्वर ने आध्यात्मिक राज्य में विभिन्न स्वर्गिक आज्ञाएँ, आदेश और प्रणालियाँ स्थापित की हैं, इन स्वर्गिक आज्ञाओं, आदेशों और प्रणालियों की घोषणा के पश्चात्, आध्यात्मिक दुनिया के विभिन्न आधिकारिक पदों के प्राणियों के द्वारा, परमेश्वर के द्वारा निर्धारित किए गए अनुसार, उन्हें कड़ाई से कार्यान्वित किया जाता है, और कोई भी उनका उल्लंघन करने का साहस नहीं करता है। और इसलिए, मनुष्य के संसार में मनुष्यजाति के जीवन और मृत्यु के चक्र में, चाहे कोई पशु के रूप में पुनर्जन्म ले या इंसान के रूप में, दोनों के लिए नियम हैं। क्योंकि ये नियम परमेश्वर की ओर से आते हैं, इसलिए उन्हें तोड़ने का कोई साहस नहीं करता है, न ही कोई उन्हें तोडने में समर्थ है। यह केवल परमेश्वर की ऐसी संप्रभुता की वजह से है, और ऐसी व्यवस्थाओं की वजह से है, कि यह भौतिक संसार जिसे लोग देखते हैं नियमित और व्यवस्थित है; यह केवल परमेश्वर की ऐसी संप्रभुता के कारण ही है कि मनुष्य उस दूसरे संसार के साथ शान्ति से रहने में समर्थ है जो मनुष्यजाति के लिए पूर्णरुप से अदृश्य है, इसके साथ समरसता में सह-अस्तित्व में रहता है—जिसमें सभी समस्त परमेश्वर की संप्रभुता से अलंघनीय है। व्यक्ति के दैहिक जीवन की मृत्यु के पश्चात्, आत्मा में अभी भी जीवन रहता है, और इसलिए यदि वह परमेश्वर के प्रशासन से रहित होती तो क्या होता? आत्मा हर स्थान पर भटकती रहती, हर स्थान में हस्तक्षेप करती, और यहाँ तक कि मनुष्यजाति के संसार में जीवित प्राणियों को भी हानि पहुँचाती। ऐसी हानि न केवल मनुष्यजाति के प्रति ही नहीं होती, बल्कि वनस्पति और पशुओं की ओर भी हो सकती थी—लेकिन सबसे पहले हानि लोगों की होती। यदि ऐसा होता—यदि ऐसी आत्मा प्रशासनरहित होती, और वाकई लोगों को हानि पहुँचाती, वाकई दुष्टता के कार्य करती—तो ऐसे आत्मा को आध्यात्मिक दुनिया में ठीक से सँभाला जाता: यदि चीज़ें गंभीर होंगी तो शीघ्र ही आत्मा का अस्तित्व समाप्त हो जाता, वह नष्ट हो जाएगी; यदि संभव हुआ तो, उसे कहीं रख दिया जाएगा और फिर उसका पुनर्जन्म होगा। कहने का आशय है कि, आध्यात्मिक दुनिया में विभिन्न आत्माओं का प्रशासन व्यवस्थित होता है, और चरणबद्ध तथा नियमों के अनुसार किया जाता है। यह केवल ऐसे प्रशासन के कारण ही है कि मनुष्य का भौतिक संसार अराजकता में नहीं पड़ा है, कि भौतिक संसार की मनुष्यजाति एक सामान्य मानसिकता, साधारण तर्कशक्ति और एक व्यवस्थित दैहिक जीवन धारण करती है। मनुष्यजाति के केवल ऐसे सामान्य जीवन के बाद ही वे जो देह में रहते हैं, पनपते रहना और पीढ़ी दर पीढ़ी संतान उत्पन्न करना जारी रखने में समर्थ हो सकेंगे।

अभी-अभी तुमने जिन वचनों को सुना है उनके बारे में तुम क्या सोचते हो? क्या वे तुम्हारे लिए नये हैं? और आज मेरे इन वचनों की संगति करने के बाद तुम लोग क्या महसूस करते हो? वे बातें नई हैं इस के अतिरिक्त क्या तुम कुछ और महसूस करते हो? (लोगों को अच्छे व्यवहार वाला होना चाहिए, और मैं देखता हूँ परमेश्वर महान और भयावह है)। (मैं परमेश्वर के प्रति अधिक श्रद्धा अनुभव करता हूँ, भविष्य में जब मुझे कुछ होगा तो मैं और अधिक सचेत रहूँगा, मैं जो कहूँगा और जो करूँगा उसके प्रति में और अधिक सभ्य रहूँगा)। तुम ऐसा क्यों करोंगे? (विभिन्न प्रकार के लोगों के अंत से परमेश्वर कैसे निपटता है इस बारे में अभी-अभी परमेश्वर की संगति सुनने के बाद, एक तरह से मुझे लगता है कि परमेश्वर का स्वभाव किसी अपराध की अनुमति नहीं देता, और यह कि मुझे उसका आदर करना चाहिए; और दूसरी तरह से, मैं जानता हूँ कि परमेश्वर किस प्रकार के लोगों को पसंद करता है, और किस प्रकार के लोगों को पसंद नहीं करता है, और इसलिए मैं उनमें से एक बनना चाहूँगा जिन्हें परमेश्वर पसंद करता है)। क्या तुम लोग देखते हो कि परमेश्वर इस क्षेत्र में अपने कार्यों में उच्च सिद्धान्तों वाला है? वे कौन से सिद्धांत हैं जिनके द्वारा वह कार्य करता है? (लोग जो कार्य करते हैं उन्हीं के अनुसार वह लोगों का अन्त तय करता है)। यह अविश्वासियों के विभिन्न अंतों के बारे में है जिनकी हमने अभी-अभी बात की है। जब अविश्वासियों की बात आती है, तो क्या परमेश्वर की कार्यवाइयों के पीछे अच्छों को पुरस्कृत करने और दुष्टों को दण्ड देने का सिद्धांत है? क्या कोई अपवाद हैं? (नहीं)। क्या तुम लोग देखते हो कि परमेश्वर की कार्यवाइयों का एक सिद्धांत है? (हाँ)। अविश्वासी वास्तव में परमेश्वर में विश्वास नहीं करते हैं, वे परमेश्वर के आयोजनों का पालन नहीं करते हैं, और वे परमेश्वर की संप्रभुता से अनभिज्ञ हैं, परमेश्वर को स्वीकार तो बिल्कुल नहीं करते हैं। अधिक गंभीर बात यह है, कि वे परमेश्वर की निन्दा करते हैं और उसे कोसते हैं, और उन लोगों के प्रति शत्रुतापूर्ण होते हैं जो परमेश्वर में विश्वास करते हैं। यद्यपि इन लोगों का परमेश्वर के प्रति ऐसा रवैया होता है, फिर भी उनके प्रति परमेश्वर का प्रशासन अपने सिद्धांतो से विचलित नहीं होता है; वह अपने सिद्धांतों और अपने स्वभाव के अनुसार व्यवस्थित रूप से उन्हें प्रशासित करता है। परमेश्वर उनकी शत्रुता को किस प्रकार लेता है? अज्ञानता के रूप में! और इसलिए उसने इन लोगों का—अविश्वासियों में से अधिकतर का—एक बार पशु के रूप में पुनर्जन्म करवाया है। तो परमेश्वर की नज़रों में अविश्वासी क्या हैं? (मवेशी)। परमेश्वर की नज़रों में, वे इसी प्रकार के हैं, वे मवेशी हैं। परमेश्वर मवेशियों को प्रशासित करता है, और वह मनुष्यजाति को प्रशासित करता है और इस प्रकार के लोगों के लिए उसके सिद्धांत एक समान हैं। इन लोगों के परमेश्वर के प्रशासन में और इनके प्रति उसकी कार्यवाइयों में, अभी भी परमेश्वर के स्वभाव को और सभी चीज़ों पर उसके प्रभुत्व के लिए व्यवस्थआओं को देखा जा सकता है। और इसलिए, क्या तुम उन सिद्धांतों में परमेश्वर की संप्रभुता को देखते हो जिनके द्वारा वह उन अविश्वासियों को प्रशासित करता है जिसके बारे में मैंने अभी-अभी बोला है? क्या तुम परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव को देखते हो? (हम देखते हैं)। तुम परमेश्वर की संप्रभुता को देखते हो, और तुम उसके स्वभाव को देखते हो। और कहने का अर्थ है कि चाहे वह किसी भी चीज़ से क्यों न निपटे, परमेश्वर अपने स्वयं के सिद्धांतों और स्वभाव के अनुसार कार्य करता है। यही परमेश्वर का सार है। वह उन आदेशों या स्वर्गिक आज्ञाओं को यूँ ही नहीं तोड़ता है जो उसने स्थापित किए हैं क्योंकि वह ऐसे लोगों को मवेशी के रूप में मानता है। परमेश्वर ज़रा भी उलट-पलट किए बिना, सिद्धांतों के अनुसार कार्य करता है, उसकी कार्यवाइयाँ किसी भी कारक से अप्रभावित रहती है, और चाहे वह कुछ भी क्यों न करे, वह सब उसके स्वयं के सिद्धांतों के अनुपालन में होता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि परमेश्वर के पास स्वयं परमेश्वर का सार है, जो कि उसके सार का एक पहलू है, जो किसी सृजित किए गए प्राणी के पास नहीं होता है। परमेश्वर हर वस्तु, हर व्यक्ति, और सभी जीवित चीज़ों के बीच जो उसने सृजित की हैं, अपनी सँभाल में, उनके प्रति अपने दृष्टिकोण में, प्रबंधन में, प्रशासन में, और उन पर शासन में न्यायपरायण और उत्तरदायी है, और इसमें वह कभी भी लापरवाह नहीं रहा है। जो अच्छे हैं, वह उनके प्रति कृपापूर्ण और दयावान है; जो दुष्ट हैं, उन्हें वह निर्दयता से दंड देता है; और विभिन्न जीवित प्राणियों के लिए, वह समयबद्ध और नियमित तरीके से, विभिन्न समयों पर मनुष्यजाति के संसार की विभिन्न आवश्यकताओं के अनुसार उचित व्यवस्थाएँ करता है इस तरह से कि ये विभिन्न जीवित प्राणी उन भूमिकाओं के अनुसार जो वे निभाते हैं व्यवस्थित रूप से जन्म लेते रहें, और एक व्यवस्थित तरीके से भौतिक जगत और आध्यात्मिक दुनिया के बीच चलते रहें।

एक जीवित प्राणी की मृत्यु—भौतिक जीवन का अंत—यह दर्शाता है कि एक जीवित प्राणी भौतिक संसार से आध्यात्मिक दुनिया में चला गया है, जबकि एक नए भौतिक जीवन का जन्म यह दर्शाता है कि एक जीवित प्राणी आध्यात्मिक दुनिया से भौतिक संसार में आया है और उसने अपनी भूमिका ग्रहण करना और उसे निभाना आरम्भ कर दिया है। चाहे एक जीवित प्राणी का प्रस्थान हो या आगमन, दोनों आध्यात्मिक दुनिया के कार्य से अवियोज्य हैं। जब कोई व्यक्ति भौतिक संसार में आता है, तो परमेश्वर द्वारा आध्यात्मिक दुनिया में उस परिवार जिसमें वह जाता है, उस युग में जिसमें उसे आना है, उस समय जब उसे आना है, और उस भूमिका जो उसे निभानी है, की उचित व्यवस्थाएँ और विशेषताएँ पहले ही तैयार की जा चुकी होती हैं। और इसलिए इस व्यक्ति का सम्पूर्ण जीवन—जो काम वह करता है, और जो मार्ग वह चुनता है—जरा सी भी त्रुटि के बिना, आध्यात्मिक दुनिया की व्यवस्थाओं के अनुसार चलता है। जिस समय पर भौतिक जीवन समाप्त होता, इस बीच, और जिस तरह और जिस स्थान पर यह समाप्त होता है, आध्यात्मिक दुनिया के सामने वह स्पष्ट और प्रत्यक्ष होता है। परमेश्वर भौतिक संसार पर शासन करता है, और वह आध्यात्मिक दुनिया पर शासन करता है, और वह किसी आत्मा के जीवन और मृत्यु के साधारण चक्र को विलंबित नहीं करेगा, न ही वह किसी आत्मा के जीवन और मृत्यु के चक्र के प्रबंधन में कोई त्रुटि कर सकता है। आध्यात्मिक दुनिया के आधिकारिक पदों के सभी न्यायालय अधिकारी अपने कार्यों को कार्यान्वित करते हैं, और परमेश्वर के निर्देशों और नियमों के अनुसार वह करते हैं जो उन्हें करना चाहिए। और इसलिए, मनुष्यजाति के संसार में, मनुष्य द्वारा देखी गई कोई भी भौतिक घटना व्यवस्थित होती है, और उसमें कोई अराजकता नहीं होती है। यह सब कुछ सभी चीज़ों पर परमेश्वर के व्यवस्थित शासन की वजह से है, और साथ ही इस वजह से है क्योंकि परमेश्वर का अधिकार प्रत्येक वस्तु शासन करता है, और जिन चीज़ों पर वह शासन करता है उस सब में वह भौतिक संसार जिसमें मनुष्य रहता है, और, इसके अलावा, मनुष्य के पीछे का वह अदृश्य आध्यात्मिक दुनिया शामिल है। और इसलिए, यदि मनुष्यजाति एक अच्छा जीवन चाहती है, और एक अच्छे परिवेश में रहना चाहती है, तो सम्पूर्ण दृश्य भौतिक जगत प्रदान किए जाने के अलावा, मनुष्य को वह आध्यात्मिक दुनिया भी अवश्य प्रदान की जानी चाहिए, जिसे कोई देख नहीं सकता है, जो मनुष्यों की ओर से प्रत्येक जीवित प्राणी को संचालित करती है और जो व्यवस्थित है। इस प्रकार, जब यह कहा जाता है कि परमेश्वर सभी चीज़ों के जीवन का स्रोत है, तो क्या "सभी चीज़ों" के अर्थ की अपनी जानकारी और समझ में हमने कुछ जोड़ा नहीं है? (हाँ)।

2. विभिन्न आस्था वाले लोगों का जीवन और मृत्यु का चक्र

हमने अभी-अभी पहली श्रेणी—अविश्वासियों—के जीवन और मृत्यु के चक्र पर चर्चा की। अब आइए हम द्वितीय श्रेणी, विभिन्न आस्था वाले लोगों के बारे में चर्चा करें। ‘‘विभिन्न आस्था वाले लोगों का जीवन और मृत्यु का चक्र" भी एक महत्वपूर्ण विषय है, और यह समयोचित है कि तुम लोग इस बारे में कुछ समझो। सबसे पहले, आइए हम इस बात को समझें कि "आस्था वाले लोगों" में "आस्था" कौन सी आस्थाओं को संदर्भित करती है: इसका आशय यहूदी धर्म, ईसाई धर्म, कैथोलिक धर्म, इस्लाम और बुद्धधर्म, ये पाँच प्रमुख धर्म हैं। अविश्वासियों के अतिरिक्त, जो लोग इन पाँच धर्मों में विश्वास करते हैं उनका संसार की जनसंख्या में एक बड़ा अनुपात है। इन पाँच धर्मों के बीच, जिन्होंने अपने विश्वास में से जीवनवृत्ति बनाई है, वे बहुत थोड़े से हैं, फिर भी इन धर्मों में अनेक विश्वासी हैं। उनके विश्वासी जब मरते हैं तो वे भिन्न स्थान में जाते हैं। किससे "भिन्न"? अविश्वासियों से, उन लोगों से जिनमें कोई विश्वास नहीं है. से भिन्न, जिसके बारे में हम अभी-अभी बात कर रहे थे। जब वे मर जाते हैं उसके बाद, इन पाँचों धर्मों के विश्वासी किसी अन्य स्थान में जाते हैं, अविश्वासियों के स्थान से भिन्न कहीं और। किन्तु प्रक्रिया एक समान होती है। उन्होंने मरने से पहले जो कुछ भी किया था उसके आधार पर आध्यात्मिक दुनिया उनके बारे में निर्णय करेगी, उसके पश्चात् तदनुसार उनकी प्रक्रिया की जाएगी। परन्तु प्रक्रिया करने के लिए इन लोगों को किसी अन्य स्थान में क्यों रखा जाता है? इसका एक महत्वपूर्ण कारण है। और वह कारण क्या है? मैं एक उदाहरण का उपयोग करके तुम्हें बताऊँगा। किन्तु बताने से पहले, तुम स्वयं विचार कर रहे हो सकते हो: "हो सकता है कि ऐसा इसलिए हो क्योंकि परमेश्वर में उनका विश्वास थोड़ा सा हो! वे पूर्ण विश्वासी न हों।" यह कारण नहीं है कि क्यों। इसका एक महत्वपूर्ण कारण है कि क्यों उन्हें किसी अन्य स्थान में रखा जाता है।

बौद्धधर्म को लें: मैं तुम्हें एक सच्चाई बताता हूँ। एक बौद्ध, सबसे पहले, वह है जो बौद्धधर्म में धर्मांतरित हो गया है और वह कोई ऐसा व्यक्ति है जो जानता है कि उसका विश्वास क्या है। जब कोई बौद्ध अपने बाल काटते हैं और भिक्षु या भिक्षुणी बनते/बनती हैं, तो इसका अर्थ है कि उन्होंने अपने आपको लौकिक संसार से पृथक कर लिया है और मनुष्य को संसार के कोलाहल को बहुत पीछे छोड़ दिया है। प्रतिदिन वे मंत्रों का उच्चारण करते हैं और केवल शाकाहारी भोजन करते हैं, तपस्वी का जीवन व्यतीत करते हैं, और अपने दिन मक्खन के दिये की ठण्डी, क्षीण रोशनी में गुजारते हैं। वे अपना सारा जीवन इसी प्रकार व्यतीत करते हैं। जब उनका भौतिक जीवन समाप्त होता है, वे अपने जीवन का सारांश बनाते हैं, परन्तु अपने हृदय में उन्हें पता नहीं होता है कि मरने के बाद वे कहाँ जाएँगे, वे किससे मिलेंगे, और उनका अंत क्या होगा—अपने हृदय में वे इन चीज़ों के बारे स्पष्ट नहीं हैं। उन्होंने केवल एक विश्वास के साथ अपना सारा जीवन व्यतीत करने से अधिक कुछ नहीं किया है, जिसके पश्चात् वे इस संसार से अंधी इच्छाओं और आदर्शों के साथ चले जाते हैं। उनके भौतिक जीवन का अन्त इसी तरह का होता है जब वे जीवितों के संसार को छोड़ते हैं, और जब उनका शारीरिक जीवन समाप्त हो जाता है, तो वे अपने आध्यात्मिक दुनिया में मूल स्थान में वापस लौट जाते हैं। पृथ्वी पर वापिस लौटने और अपना स्वाध्याय करते रहने के लिए इस व्यक्ति का पुनर्जन्म होगा या नहीं, यह मृत्यु से पहले के उसके आचरण और स्वाध्याय पर निर्भर करता है। यदि अपने जीवनकाल में उन्होंने कुछ ग़लत नहीं किया, तो उन्हें शीघ्र ही पुनर्जन्म दिया जाएगा और फिर पृथ्वी पर वापस भेज दिया जाएगा, जहाँ वे एक बार फिर भिक्षु या भिक्षुणी बनेंगे। पहली बार की कार्यप्रणाली के अनुसार उनका भौतिक शरीर स्वाध्याय करता है, जिसके बाद वे मर जाते हैं, वे आध्यात्मिक दुनिया लौट जाते हैं, जहाँ उनकी जाँच की जाती है, जिसके बाद—यदि कोई समस्या नहीं है—तो वे एक बार फिर मनुष्यों के संसार में लौटते हैं, और एक बार फिर बौद्ध में धर्मांतरित होते हैं और अपना स्वाध्याय जारी रखते हैं। तीन से सात बार तक पुनर्जन्म लेने के बाद, वे एक बार फिर से आध्यात्मिक दुनिया में लौटेंगे, जहाँ उनके भौतिक जीवन की समाप्ति पर वे हर बार जाते हैं। यदि मानवीय दुनिया में उनकी विभिन्न योग्यताएँ और उनके व्यवहार आध्यात्मिक दुनिया की स्वर्गिक आज्ञाओं के मुताबिक हैं, तो इस बिन्दु से आगे वे वहीं रहेंगे; उन्हें मनुष्य के रुप में अब और जन्म नहीं दिया जाएगा, ना ही पृथ्वी पर दुष्ट कार्यों के लिए दण्डित किए जाने के किसी जोखिम पर होंगे। वे इस प्रक्रिया का अनुभव फिर कभी नहीं करेंगे। इसके बजाय, अपनी परिस्थितियों के अनुसार, वे आध्यात्मिक राज्य में एक पद ग्रहण करेंगे, इसे ही बौद्ध लोग अमरता की प्राप्ति बताते हैं। अमरता की प्राप्ति का मुख्य रूप से अर्थ है कि आध्यात्मिक दुनिया का एक अधिकारी बनना, और पुनर्जन्म लेने या दण्ड भोगने का आगे कोई अवसर नहीं होना। इससे भी अधिक, इसका अर्थ है कि पुनर्जन्म के बाद मनुष्य होने के कष्ट को अब और न भोगना। इसलिए क्या अभी भी उनका पशु के रुप में पैदा होने का कोई अवसर है? (नहीं)। इसका मतलब है कि वे आध्यात्मिक दुनिया में कोई भूमिका ग्रहण करने के लिए रहते हैं और उनका पुनर्जन्म नहीं होगा। बौद्ध धर्म में अमरत्व प्राप्ति का यह एक उदाहरण है। जहाँ तक उनकी बात है जो अमरत्व को प्राप्त नहीं करते हैं, आध्यात्मिक दुनिया में उनके लौटने पर, प्रासंगिक न्यायालय अधिकारी के द्वारा उनको जाँचा और सत्यापित किया जाता है और पाया जाता है कि उन्होंने परिश्रम से स्वाध्याय में नहीं किया है या बौद्धमत द्वारा निर्धारित सूत्रों को ईमानदारी से उच्चारित नहीं किया; इसके बजाय, उन्होंने अत्यधिक दुष्टता की, और वही अधिक किया जो बुरा था। तब आध्यात्मिक दुनिया में उनके दुष्ट कार्यों के बारे में निर्णय लिया जाता है, जिसके बाद उन्हें दण्डित किया जाना निश्चित है। इसमें कोई अपवाद नहीं हैं। तो कब इस प्रकार का व्यक्ति अमरत्व को प्राप्त करता है? उस जीवन में जब वे कोई बुरा कार्य नहीं करते हैं—जब, आध्यात्मिक दुनिया में लौटने के पश्चात्, यह देखा जाता है कि उन्होंने मृत्यु से पूर्व कुछ ग़लत नहीं किया था। वे पुनर्जन्म लेना जारी रखते हैं, वे मंत्रों को उच्चारित करना जारी रखते हैं, वे अपने दिन मक्खन के दिये के ठण्डे और क्षीण प्रकाश में गुज़ारते हैं, वे किसी जीवित प्राणी की हत्या नहीं करते हैं, मांस नहीं खाते हैं, और मनुष्य के संसार में हिस्सा नहीं लेते हैं, अपनी समस्याओं को बहुत पीछे छोड़ देते हैं, और उनका दूसरों के साथ कोई विवाद नहीं होता है। इस प्रक्रिया के दौरान, वे कोई दुष्टता नहीं करते हैं, जिसके पश्चात् वे आध्यात्मिक संसार में लौट आते हैं, और उनके समस्त क्रियाकलापों और व्यवहार की जाँच हो जाने के बाद, उन्हें एक बार पुनः मनुष्य के संसार में भेजा जाता है, ऐसे चक्र में जो तीन से सात बार तक चलता है। यदि इस दौरान कोई गडबड़ी नहीं होगी, तो उनकी अमरत्व की प्राप्ति अप्रभावित रहेगी, और विलंबित नहीं होगी। आस्था वाले लोगों के जीवन और मृत्यु के चक्र की यह एक विशिष्टता है: वे अमरत्व प्राप्त करने, और आध्यात्मिक संसार में कोई पद प्राप्त करने में समर्थ होते हैं। यही बात है जो उन्हें अविश्वासियों से अलग बनाती है। पहली बात, जब वे पृथ्वी पर जीवित होते हैं, तो उन लोगों का आचरण कैसा होता है जो आध्यात्मिक दुनिया में पद ग्रहण करने में समर्थ होते हैं? उनके लिये आवश्यक है कि वे कोई भी दुष्टता का कार्य बिल्कुल नहीं करें: उन्हें हत्या, आगजनी, बलात्कार, या लूटपाट के कार्य अवश्य नहीं करने चाहिए; यदि वे कपट, धोखाधड़ी, चोरी या डकैती करते हैं, तब वे अमरत्व को प्राप्त नहीं कर सकते हैं। कहने का अर्थ है कि, यदि दुष्टता के कार्य से उनका कोई भी संबंध या सम्बद्धता है, तो वे आध्यात्मिक दुनिया के दण्ड से बच कर भाग नहीं सकते हैं। आध्यात्मिक दुनिया उन बौद्धों के लिये उचित प्रबंध करती है जो अमरत्व को प्राप्त करते हैं: उन्हें उन लोगों को प्रशासित करने के लिए निर्दिष्ट किया जा सकता है कि जो बौद्धधर्म में विश्वास करते हुए प्रतीत होते हैं, और आकाश में वृद्ध मनुष्य, और बौद्धों के पास एक अधिकार-क्षेत्र दिया जाएगा, वे केवल अविश्वासियों को ही प्रशासित कर सकते हैं, या अन्यथा वे एक गौण न्यायालय अधिकारी हो सकते हैं। ऐसा बँटवारा इन आत्माओं की प्रकृति के अनुसार होता है। यह बौद्धधर्म का एक उदाहरण है।

हमने जिन पाँच धर्मों के बारे में कहा है, उनमें ईसाई धर्म कुछ विशेष है। और ईसाई धर्म के बारे में क्या विशेष है? ये वे लोग हैं जो सच्चे परमेश्वर में विश्वास करते हैं। जो सच्चे परमेश्वर में विश्वास करते हैं, उन्हें यहाँ कैसे सूचीबद्ध किया जा सकता है? चूँकि ईसाईयत एक प्रकार की आस्था है, तो यह, निःसंदेह, केवल आस्था से संबंधित है—यह एक प्रकार का अनुष्ठान, एक प्रकार का पंथ, एक प्रकार का धर्म है, और उन लोगों की आस्था से कुछ अलग है जो सच्चाई से परमेश्वर का अनुसरण करते हैं। इसे पाँच प्रमुख धर्मों के बीच सूचीबद्ध करने का मेरा कारण यह है क्योंकि ईसाईयत को भी उसी स्तर तक घटा दिया गया है जिस स्तर पर यहूदी, बौद्धधर्म और इस्लाम धर्म हैं। अधिकतर ईसाई इस बात पर विश्वास नहीं करते हैं कि कोई परमेश्वर है, या यह कि वह सभी चीज़ों पर शासन करता है, उसके अस्तित्व पर तो वे बिल्कुल भी विश्वास नहीं करते हैं। इसके बजाय, वे मात्र धर्मशास्त्र के बारे में बात करने के लिए धर्मग्रंथों का उपयोग करते हैं, लोगों को दयालु बनना, कष्टों को सहना और अच्छे कार्य करना सिखाने के लिए धर्मशास्त्र का उपयोग करते हैं। ईसाईयत धर्म इसी प्रकार का है: यह केवल धर्मशास्त्र संबंधी सिद्धांतो पर ध्यान केन्द्रित करता है, मनुष्य का प्रबंधन करने या उसे बचाने के परमेश्वर के कार्य से इसका बिल्कुल भी कोई संबंध नहीं है, यह उन लोगों का एक धर्म है जो ऐसे परमेश्वर का अनुसरण करते हैं जिसे परमेश्वर अंगीकार नहीं किया जाता है। लेकिन उनके प्रति अपने दृष्टिकोण में परमेश्वर के पास भी एक सिद्धांत है। वह अपनी मर्जी से उन्हें यूँही उसी तरह से सँभालता और उनके साथ निपटता नहीं है, जैसा कि वह अविश्वासियों के साथ करता है। उनके प्रति उसका दृष्टिकोण बौद्धों के समान ही हैः यदि जीवित रहते हुए, किसी ईसाई में आत्म-अनुशासन होता है, तो वह कठोरता से दस आज्ञाओं का पालन करने और उन माँगों में व्यवस्थाओं और आज्ञाओं का पालन करने में समर्थ है जो वह स्वयं के व्यवहार से करता है—और यदि वह अपने सम्पूर्ण जीवन भर इसे कर सकता है—तो उन्हें भी उतनी ही मात्रा में समय जीवन और मृत्यु के चक्र में से गुज़रते हुए व्यतीत करना होगा इससे पूर्व कि वे वास्तव में तथाकथित स्वर्गारोहण को प्राप्त कर सके। इस स्वर्गारोहण को प्राप्त करने के पश्चात्, वे आध्यात्मिक दुनिया में बने रहते हैं, जहाँ वे एक पद लेते हैं और उसके न्यायालय अधिकारियों में से एक बन जाते हैं। इसी प्रकार, यदि वे पृथ्वी पर दुष्टता करते हैं, यदि वे पापमय हैं और बहुत से पाप करते हैं, तब यह अपरिहार्य है कि वे भिन्न-भिन्न प्रचण्डताओं से दण्डित और अनुशासित किये जाएँगे। बौद्ध धर्म में अमरत्व प्राप्त करने का अर्थ है सुखावती में प्रवेश करना, किन्तु ईसाई धर्म में वे इसे क्या कहते है? इसे ‘‘स्वर्ग में प्रवेश करना" और ‘‘स्वर्गारोहण किए जाना" कहते हैं। जो वास्तव में स्वर्गारोहण करते हैं, वे भी जीवन और मृत्यु के चक्र से तीन से सात बार तक गुजरते हैं, जिसके पश्चात्, मर जाने पर, वे आध्यात्मिक दुनिया में आते हैं, मानों वे सो गए थे। यदि वे मानक तक हैं तो वे कोई भूमिका लेने के लिए बने रह सकते हैं, और, पृथ्वी पर के लोगों के विपरीत, साधारण तरीके से, या परिपाटी के अनुसार, उनका पुनर्जन्म नहीं होगा।

इन सब धर्मों में, जिस अन्त के बारे में वे बात करते हैं या जिसके लिए वे प्रयास करते हैं, वह वैसा ही है जैसा कि बौद्धधर्म में अमरत्व को प्राप्त करना—यह इतना ही है कि इसे भिन्न-भिन्न साधनों के द्वारा प्राप्त किया जाता है। वे सभी एक ही प्रकार के हैं। इन धर्मों के लोगों के इस भाग के लिए जो अपने आचरण में धार्मिक नीतिवचनों का कड़ाई से पालन करने में समर्थ हैं, परमेश्वर उन्हें एक उचित गंतव्य, जाने के लिए एक उचित स्थान देता है, और उन्हें उचित प्रकार से सँभालता है। यह सब तर्कसंगत है, किन्तु यह ऐसा नहीं जैसा कि लोग कल्पना करते हैं, है न? अब इस बात को सुनने के बाद कि ईसाईयों का क्या होता है, तुम कैसा अनुभव करते हो? क्या तुम उनके लिये दुःखी हो? क्या तुम उनके साथ सहानुभूति रखते हो? (थोड़ी—सी)। ऐसा कुछ नहीं है जो किया जा सकता है—वे केवलस्वयं को ही दोष दे सकते हैं। मै ऐसा क्यों कहता हूँ? परमेश्वर का कार्य सच्चा है, परमेश्वर जीवित और वास्तविक है और उसका कार्य सम्पूर्ण मनुष्यजाति और प्रत्येक मनुष्य पर लक्षित है—तो ईसाई लोग इसे स्वीकार क्यों नहीं करते हैं? क्यों वे पागलों की तरह परमेश्वर का विरोध करते हैं, उसे यातना देते हैं? इस तरह का अंत पा कर भी वे भाग्यशाली हैं, तो तुम उनके लिए अफ़सोस क्यों महसूस करते हो? इस प्रकार से सँभाला जाना उनके लिए बड़ी सहिष्णुता को दर्शाता है। जिस हद तक वे परमेश्वर का विरोध करते हैं, उसके हिसाब से तो उन्हें नष्ट कर दिया जाना चाहिए—फिर भी परमेश्वर ऐसा नहीं करता है, और ईसाई धर्म के साथ एक साधारण धर्म की तरह व्यवहार करता है। तो क्या अन्य धर्मों के बारे में विस्तार से जाने की कोई आवश्यकता है? इन सभी धर्मों की प्रकृति है कि लोग अधिक कठिनाइयों को सहन करें, कोई दुष्टता न करें, अच्छी बातें बोले, अच्छे कर्म करें, दूसरों को गाली न दें, दूसरों के विषय में जल्दबाजी में निर्णय न लें, विवादों से स्वयं को दूर रखें, भलाई के काम करें, एक अच्छा इन्सान बनें—अधिकांश धार्मिक शिक्षाएँ इसी प्रकार की हैं। और इसलिए, यदि ये आस्था वाले लोग‌—ये विभिन्न धर्मो और पंथों वाले लोग—यदि धार्मिक नीतियों का कडाई से पालन कर पाते हैं तो वे पृथ्वी पर अपने समय के दौरान बड़ी त्रुटियाँ या पाप नहीं करेंगे, और तीन से सात बार तक पुनर्जन्म लेने के बाद, सामान्यत: ये लोग, ये लोग जो धार्मिक नीतियों का कड़ाई से पालन कर पाते हैं, आध्यात्मिक दुनिया में एक भूमिका लेने के लिए बने रहेंगे। और क्या ऐसे बहुत से लोग है? (नहीं, अधिक नहीं हैं)। तुम्हारा उत्तर किस पर आधारित है? भलाई करना या धार्मिक नियमों और व्यवस्थाओं का पालन करना आसान नहीं है। बौद्ध धर्म लोगों को मांस नहीं खाने देता है—क्या तुम ऐसा कर सकते हो? यदि तुम्हें भूरे वस्त्र पहनकर किसी बौद्ध मंदिर में पूरे दिन मंत्रों का उच्चारण करना पड़े, तो क्या तुम ऐसा कर सकते हो? यह आसान नहीं होगा। ईसाई धर्म में दस आज्ञाएँ, आज्ञाएँ और व्यवस्थाएँ हैं, क्या इनका पालन करना आसान है? वे आसान नहीं है। दूसरों को गाली न देना को लें: लोग इस नियम का पालन करने में असमर्थ हैं? स्वयं को रोक पाने में असमर्थ, वे गाली देते हैं—और गाली देने के बाद वे उसे वापस नहीं ले सकते हैं, तो वे क्या करते हैं? रात्रि में वे अपने पापों को स्वीकार करते हैं! कभी-कभी दूसरों को गाली देने के बाद, उनके दिलों में फिर भी घृणा रहती है, और वे इतना आगे बढ़ जाते हैं कि वे योजना बनाते हैं कि कब वे उन्हें हानि पहुँचाएँ। संक्षेप में, जो इस मृत धर्म सिद्धान्तों के बीच जीते हैं उनके लिए, पाप न करना या दुष्टता न करना आसान नहीं है। और इसलिए, हर धर्म में, केवल कुछ लोग ही अमरत्व को प्राप्त कर पाते हैं। तुम्हें लगता है कि क्योंकि इतने अधिक लोग इन धर्मों का अनुसरण करते हैं, इसलिए अनेक लोग आध्यात्मिक राज्य में कोई भूमिका ग्रहण करने के लिए बने रहेंगे। लेकिन ऐसे लोग अधिक नहीं हैं, केवल कुछ ही इसे प्राप्त कर पाते हैं। आस्था वाले लोगों के जीवन और मृत्यु के चक्र में साधारणतः ऐसा ही होता है। जो चीज उन्हें अलग करती है वह है कि वे अमरत्व प्राप्त कर सकते हैं, अविश्वासियों में और उनमें यही अन्तर है।

3. परमेश्वर का अनुसरण करने वालों का जीवन और मृत्यु का चक्र

इसके बाद, आइए, अब हम उन लोगों के जीवन और मृत्यु के चक्र के बारे में बात करें जो परमेश्वर का अनुसरण करते हैं। इसका संबंध तुम लोगों से है, इसलिए ध्यान दो। सबसे पहले, इस बारे में विचार करो कि जो लोग परमेश्वर का अनुसरण करते हैं उन्हें किन श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है। (परमेश्वर के चुने हुए लोग और सेवा करने वाले लोग)। इसमें दो हैं: परमेश्वर के चुने हुए लोग और सेवा करने वाले लोग। पहले हम परमेश्वर के चुने हुए लोगों के बारे में बात करेंगे, जिसमें बहुत कम लोग हैं। "परमेश्वर के चुने हुए लोग" किसे संदर्भित करता है? परमेश्वर ने जब सारी चीज़ों की रचना कर दी और मनुष्यजाति अस्तित्व में आ गई, तो परमेश्वर ने उन लोगों के एक समूह को चुना जो उसका अनुसरण करते थे, और उन्हें मात्र "परमेश्वर के चुने हुए लोग" कहा जाता है। परमेश्वर का इन लोगों को चुनने का एक विशेष दायरा और महत्व है। वह दायरा यह है कि हर बार जब भी परमेश्वर कोई महत्वपूर्ण कार्य करता है तो उन्हें अवश्य आना है—जो कि उन चीज़ों में प्रथम है जो उन्हें विशेष बनाती हैं। और उनका महत्व क्या है? परमेश्वर द्वारा उनके चयन का अर्थ है कि वे बहुत महत्व रखते हैं। कहने का तात्पर्य है कि, परमेश्वर इन लोगों को पूर्ण बनाना चाहता है और इन्हें सिद्ध करना चाहता है, और प्रबंधन का उसका कार्य पूर्ण हो जाने के पश्चात् वह इन लोगों को प्राप्त कर लेगा। क्या यह महत्व महान नहीं है? इस प्रकार, ये चुने हुए लोग परमेश्वर के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि ये वे लोग हैं जिन्हें परमेश्वर प्राप्त करने का इरादा रखता है। जबकि सेवा करने वाले—खैर, आइए हम परमेश्वर द्वारा पूर्व-निर्धारण से हटें, और पहले उनके उद्गमों के बारे में बात करें। "सेवा करने वाले" का शाब्दिक अर्थ है वह जो सेवा करता है। वे जो सेवा करते हैं, वे क्षणिक हैं, वे लम्बे समय तक, या हमेशा के लिए ऐसा नहीं करते हैं, बल्कि उन्हें अस्थाई रुप से भाड़े पर लिया जाता है या नियुक्त किया जाता है। इनमें से अधिकांश को अविश्वासियों में से चुना जाता है। जब यह आदेश दिया जाता है कि वे परमेश्वर के कार्य में सेवा करने वाले की भूमिका ग्रहण करेंगे तब वे पृथ्वी पर आते हैं। हो सकता है कि वे अपने पिछले जीवन में पशु रहे होंगे, किन्तु वे अविश्वासियों में से भी एक रह चुके होंगे। सेवा करने वालों के उद्गम ऐसे ही होते हैं।

आइए, हम परमेश्वर के चुने हुए लोगों पर लौटें। जब वे मरते हैं, तो परमेश्वर के चुने हुए लोग अविश्वासियों से और विभिन्न आस्था वाले लोगों से बिल्कुल भिन्न किसी स्थान पर जाते हैं। यह वह स्थान है जहाँ उनके साथ स्वर्गदूत और परमेश्वर के दूत होते हैं, और एक ऐसा स्थान है जिसका प्रशासन परमेश्वर व्यक्तिगत रूप से करता है। यद्यपि, इस स्थान में, परमेश्वर के चुने लोग परमेश्वर को स्वयं अपनी आखों से नहीं देख पाते हैं, यह आध्यात्मिक राज्य में किसी भी अन्य स्थान के असदृश होता है; यह ऐसा स्थान है जहाँ इस भाग के लोग मरने के बाद जाते हैं। जब वे मरते हैं तो उन्हें भी परमेश्वर के दूतों की कड़ी छानबीन के अधीन किया जाता है। परमेश्वर के दूत इन लोगों के द्वारा अपने संपूर्ण जीवन में परमेश्वर की आस्था में लिए गए मार्ग की छानबीन करते हैं, उस समय के दौरान, उन्होंने कभी परमेश्वर का विरोध किया या उसे कोसा था या नहीं, और उन्होंने गंभीर पाप या दुष्टता की थी या नहीं। यह छानबीन इस प्रश्न का समाधान करती है कि क्या व्यक्ति जायेगा या ठहरेगा। "जाना" किस बात को संदर्भित करा है? और "ठहरना" किस बात को संदर्भित करता है? "जाना" इस बात को संदर्भित करता है कि क्या, अपने व्यवहार के आधार पर, वे परमेश्वर के चुने हुए लोगों की श्रेणी में रहेंगे। "ठहरना" संदर्भित करता है कि वे उन लोगों के बीच रह सकते हैं जिन्हें परमेश्वर द्वारा अंत के दिनों के दौरान पूर्ण बनाया जाता है। जो ठहरते हैं उनके लिए, परमेश्वर के पास विशेष व्यवस्थाएँ है। अपने कार्य की प्रत्येक अवधि के दौरान, परमेश्वर ऐसे लोगों को प्रेरितों के रूप में कार्य करने या कलीसियाओं को पुनर्जीवित करने, या उनकी देखभाल करने का कार्य करने के लिए भेजेगा। परन्तु जो लोग इस कार्य को करने में सक्षम हैं वे पृथ्वी पर बार-बार उस तरह से पुनर्जन्म नहीं लेते हैं जिस तरह से अविश्वासी जन्म लेते हैं, जो बार-बार पुनर्जन्म लेते हैं; इसके बजाय, वे परमेश्वर के कार्य की आवश्यकताओं और परमेश्वर के कार्य के कदमों के अनुसार पृथ्वी पर लौटाए जाते हैं, ऐसे नहीं होते हैं जो बार-बार जन्म लेते हैं। तो क्या इस बारे में कोई नियम हैं कि उनका पुनर्जन्म कब होगा? क्या वे हर कुछ वर्षो में एक बार आते हैं? क्या वे ऐसी बारम्बारता में आते हैं? वे ऐसे नहीं आते हैं यह किस पर आधारित है? यह परमेश्वर के कार्य पर, उसके कार्य के कदमों पर, और उनकी आवश्यकताओं पर आधारित है, और इसके कोई नियम नहीं हैं। एकमात्र नियम यही है कि जब परमेश्वर अंत के दिनों में अपने कार्य के अन्तिम चरण को करता है, तो ये सभी चुने हुए लोग आएँगे। जब वे सब आ जाएँगे, तो यह अन्तिम बार होगा कि उनका पुनर्जन्म होगा। और ऐसा क्यों है? यह परमेश्वर के कार्य के अन्तिम चरण के दौरान प्राप्त किये जाने वाले परिणामों पर आधारित होता है—क्योंकि कार्य के इस अंतिम चरण के दौरान, परमेश्वर इन चुने हुए लोगों को पूरी तरह से पूर्ण करेगा। इसका क्या अर्थ है? यदि, इस अन्तिम चरण के दौरान, इन लोगों को पूर्ण किया जाता है और सिद्ध किया जाता है, तब उनका पहले की तरह पुनर्जन्म नहीं होगा; मनुष्य बनने की प्रक्रिया और इसी प्रकार पुनर्जन्म की प्रक्रिया भी पूर्णतया समाप्त हो जाएगी। यह उनसे संबंधित है जो ठहरेंगे। तो जो ठहर नहीं सकते वे कहाँ जाते हैं? जो ठहर नहीं सकते हैं उनके जाने के लिए कोई उचित स्थान है। सबसे पहले, उनके दुष्ट कार्यों के, उन्होंने जो त्रुटियाँ की हैं, और जो पाप उन्होंने किए हैं, उनके परिणामस्वरुप वे भी दण्डित किए जाते हैं। दण्डित किये जाने के पश्चात, परमेश्वर उन्हें आविश्वासियों के बीच भेजता है; जैसा परिस्थितियों के अनुसार अनुकूल होगा, वह अविश्वासियों के, या अन्यथा विभिन्न आस्था वाले लोगों के बीच उनके होने की व्यवस्था करेगा। कहने का अर्थ है, कि उनके पास दो विकल्प हैं: एक है कि शायद दण्डित होने के बाद उन्हें एक विशेष धर्म के बीच रहना, और दूसरा है कि अविश्वासी बनना। यदि वे एक अविश्वासी बनते हैं, तो वे सारे अवसर गँवा देंगे। जबकि यदि वे आस्था वाला व्यक्ति बनते हैं—उदाहरण के लिए, यदि वे एक ईसाई बनते हैं—तो उनके पास अभी भी परमेश्वर के चुने हुओं की श्रेणियों के बीच लौटने का अवसर होगा; इसके बहुत जटिल संबंध हैं। संक्षेप में, यदि परमेश्वर का कोई चुना हुआ व्यक्ति कोई ऐसा काम करता है जो परमेश्वर का अपमान करता है, तो उसे अन्य किसी भी व्यक्ति के समान ही दण्ड दिया जाएगा। उदाहरण के लिये, पौलुस को लें, जिसके बारे में हमने पहले बात की थी। पौलुस दण्डित किए जाने वालों का एक उदाहरण है। तुम लोगों की समझ में आ रहा है कि मैं किस बारे में पर बात कर रहा हूँ? क्या परमेश्वर के चुने हुए लोगों का दायरा निर्धारित है? (अधिकांशत: निर्धारित है)। इसमें से अधिकतर निर्धारित है, परन्तु उसका एक छोटा हिस्सा निर्धारित नहीं है। ऐसा क्यों है? (क्योंकि उन्होंने दुष्टता की है)। यहाँ मैंने सबसे स्पष्ट उदाहरण को संदर्भित किया है: दुष्टता करना। जब वे दुष्टता करते हैं, तो परमेश्वर उन्हें नहीं चाहता, और जब परमेश्वर उन्हें नहीं चाहता है, तो वह उन्हें विभिन्न जातियों और प्रकार के लोगों के बीच फेंक देता है, जो उन्हें बिना किसी आशा के छोड़ देता है और उनके लिए वापस लौटना कठिन बना देता है। यह सब परमेश्वर के चुने हुए लोगों के जीवन और मृत्यु के चक्र से संबंधित है।

अगला सेवा करने वालों के जीवन और मृत्यु का चक्र है। हमने क्या कहा है कि सेवा करने वालों के उद्गम क्या थे? (कुछ अविश्वासी थे, कुछ जानवर थे)। इन सेवा करने वालों का पुनर्जन्म अविश्वासियों और जानवरों से हुआ था। कार्य के अंतिम चरण में आने के साथ ही, परमेश्वर ने अविश्वासियों में से ऐसे लोगों के एक समूह को चुना है और यह समूह बहुत खास है। ऐसे लोगों को चुनने का परमेश्वर का उद्देश्य अपने कार्य के लिए उनकी सेवा लेना है। "सेवा" एक बहुत शिष्ट सुनाई देने वाला शब्द नहीं है, न ही यह ऐसा कुछ है जिसे कोई चाहेगा, किन्तु हमें यह देखना है कि यह किसकी ओर लक्षित किया जाता है। परमेश्वर की सेवा करने वालों के अस्तित्व का एक विशेष महत्व है। कोई अन्य उनकी भूमिका नहीं निभा सकता है, क्योंकि उन्हें परमेश्वर के द्वारा चुना गया है। और इन सेवा करने वालों की भूमिका क्या है? परमेश्वर के चुने हुए लोगों की सेवा करना। मुख्य रूप से, उनकी भूमिका परमेश्वर के काम आना, परमेश्वर के कार्य में सहयोग करना, और परमेश्वर के चुने हुए लोगों की पूर्णमा में सहयोग करना है। इस बात की परवाह किए बिना कि वे मेहनत कर रहे हैं, कोई कार्य कर रहे हैं, या कुछ कार्यों को लिए हुए हैं, परमेश्वर की इन लोगों से क्या अपेक्षा है? क्या वह इनसे बहुत अधिक की माँग कर रहा है? (नहीं, परमेश्वर कहता है कि वे वफादार रहें)। सेवा करने वालों को भी वफादार होना है। इस बात की परवाह किए बिना कि तुम्हारे उद्गम कहाँ से हैं, या परमेश्वर ने तुम्हें क्यों चुना है, तुम्हें वफादार अवश्य होना चाहिए: तुम्हें परमेश्वर के प्रति, परमेश्वर के तुम्हारे लिए आदेशों के प्रति, और साथ ही उस कार्य के प्रति जिसके लिए तुम उत्तरदायी हो और उस कर्तव्य के प्रति जो तुम करते हो, वफ़ादार अवश्य होना चाहिए। यदि सेवा करने वाले वफ़ादार होने, और परमेश्वर को संतुष्ट करने में सक्षम हैं, तो उनका अन्त क्या होगा? वे शेष रह पाएँगे। क्या सेवा करने वाला होना उस व्यक्ति के लिए एक आशीष है जो शेष रह जाता है? शेष रहने का क्या अर्थ है? इस आशीष का क्या अर्थ है? हैसियत में, वे परमेश्वर के चुने हुए लोगों के असदृश दिखाई देते हैं, वे भिन्न दिखाई देते हैं। हालाँकि, वास्तव में, क्या इस जीवन में वे जिसका आनंद लेते हैं, क्या यह वही नहीं है जैसा परमेश्वर के चुने हुए लेते हैं हैं? कम से कम, इस जीवन में तो यह वैसा ही है। तुम लोग इससे इनकार नहीं करते हो, है ना? परमेश्वर के कथन, परमेश्वर का अनुग्रह, परमेश्वर द्वारा भरण-पोषण, परमेश्वर के आशीष—कौन इन चीज़ों का आनन्द नहीं उठाता है? हर कोई ऐसी बहुतायत का आनन्द उठाता है। सेवा करने वाले की पहचान सेवा करने वाले की ही है, किन्तु परमेश्वर के लिए, वे उन चीज़ों में से एक ही हैं जिनकी उसने रचना की है—यह मात्र इतना ही है कि उनकी भूमिका सेवा करने वालों की है। परमेश्वर के प्राणियों में से एक के रूप में, क्या एक सेवा करने वाले और परमेश्वर के चुने हुए लोगों के बीच कोई अन्तर है? वस्तुतः, अंतर नहीं है। नाममात्र के लिए कहें तो, एक अंतर है, सार रूप में एक अन्तर है, वे जो भूमिका निभाते हैं उसके अनुसार अन्तर है, किन्तु परमेश्वर इन लोगों में कोई भेदभाव नहीं करता है। तो क्यों इन लोगों को सेवा करने वालों के रुप में परिभाषित किया जाता है? तुम लोगों को इस बात को समझना चाहिए। सेवा करने वाले अविश्वासियों में से आते हैं। अविश्वासियों का उल्लेख हमें बताता है कि उनका अतीत बुरा है: वे सब नास्तिक हैं, अपने अतीत में वे नास्तिक थे, वे परमेश्वर में विश्वास नहीं करते थे, और वे परमेश्वर के, सत्य के, और सकारात्मक बातों के प्रति शत्रुतापूर्ण थे। वे परमेश्वर में विश्वास नहीं करते थे और नहीं मानते थे कि कोई परमेश्वर है, तो क्या वे परमेश्वर के वचनों को समझने में सक्षम हैं? यह कहना उचित होगा कि, काफी हद तक, वे सक्षम नहीं हैं। ठीक जैसे कि पशु मनुष्य के शब्दों को समझने में सक्षम नहीं हैं, वैसे ही सेवा करने वालों को भी यह समझ में नहीं आता है कि परमेश्वर क्या कह रहा है, वह क्या चाहता है, उसकी ऐसी अपेक्षा क्यों है—उनकी समझ में नहीं आता है, ये बातें उनकी समझ से बाहर हैं, वे अप्रबुद्ध रहते हैं। और इस कारण से, वे लोग उस जीवन को धारण नहीं करते हैं जिसके बारे में हमने बात की थी। बिना जीवन के, क्या लोग सत्य को समझ सकते हैं? क्या वे सत्य से सुसज्जित है? क्या वे परमेश्वर के वचनों के अनुभव और ज्ञान से सुसज्जित हैं? (नहीं)। सेवा करने वालों के इसी तरह के उद्गम है। किन्तु चूँकि परमेश्वर इन लोगों को सेवा करने वाला बनाता है, इसलिए उनसे उसकी अपेक्षाओं के भी स्तर हैं; वह उन्हें तुच्छ दृष्टि से नहीं देखता है, और वह उनके प्रति बेपरवाह नहीं है। यद्यपि वे उसके वचनों को नहीं समझते हैं, और बिना जीवन के हैं, फिर भी परमेश्वर उनके प्रति दयावान है, और तब भी उनसे उसकी अपेक्षाओं के मानक हैं। तुम लोगों ने अभी-अभी इन मानकों के बारे में बोला है: परमेश्वर के प्रति वफादार होना, और वही करना जो वह कहता है। अपनी सेवा में तुम्हें अवश्य वहीं सेवा करनी चाहिए जहाँ आवश्यकता है, और बिल्कुल अंत तक सेवा करनी चाहिए। यदि तुम बिल्कुल अंत तक सेवा कर सकते हो, यदि तुम एक निष्ठावान सेवा करने वाले बन सकते हो, और अन्त तक सेवा कर सकते हो, यदि तुम एक वफादार सेवा करने वाला बन सकते हो, बिल्कुल अंत तक सेवा करने में सक्षम हो हो, और परमेश्वर द्वारा तुम्हें दिए गए आदेश को सर्वथा पूर्ण कर पाते हो, तो तुम एक मूल्यवान जीवन जीओगे और इसलिए तुम शेष रह पाओगे। यदि तुम थोड़ा अधिक प्रयास करते हो, यदि तुम थोड़ा अधिक परिश्रम से प्रयास करते हो, परमेश्वर को जानने के अपने प्रयास को दोगुना कर पाते हो, परमेश्वर के ज्ञान के बारे में थोड़ा अधिक बोल पाते हो, परमेश्वर की गवाही दे सकते हो, और इसके अतिरिक्त, यदि तुम परमेश्वर की इच्छा में से कुछ समझ सकते हो, परमेश्वर के कार्य में सहयोग कर सकते हो, और परमेश्वर की इच्छा के प्रति कुछ-कुछ सचेत हो सकते हो, तब तुम्हारे, इस सेवा करने वाले के, भाग्य में बदलाव होगा। और भाग्य में यह परिवर्तन क्या होगा? तुम अब और मात्र शेष नहीं रह पाओगे। तुम्हारे आचरण और तुम्हारी व्यक्तिगत आकांक्षाओं और खोज के आधार पर, परमेश्वर तुम्हें चुने हुओं में से एक बनाएगा। यह तुम्हारे भाग्य में परिवर्तन होगा। सेवा करने वालों के लिए, इस बारे में सर्वोत्तम बात क्या है? वह यह है कि वे परमेश्वर के चुने हुए लोगों में से एक बन सकते हैं। और यदि वे परमेश्वर के चुने हुए लोगों में से एक बन जाते हैं तो इसका अर्थ क्या होता है? इसका अर्थ है कि उनका अब अविश्वासियों के समान पशु के रुप में पुनर्जन्म नहीं होगा। क्या यह अच्छा है? हाँ है, और यह एक अच्छा समाचार है। कहने का तात्पर्य है कि, सेवा करने वालों को ढाला जा सकता है। यह वह मामला नहीं है कि सेवा करने वाले के लिए, जब परमेश्वर उसे सेवा के लिए निर्धारित करता है, तो वह हमेशा ऐसा ही करेगा; ऐसा होना आवश्यक नहीं है। उसके व्यक्तिगत आचरण के आधार पर, परमेश्वर उसे भिन्न तरीके से सँभालेगा, और उसे भिन्न प्रकार से उत्तर देगा।

परन्तु ऐसे सेवा करने वाले हैं जो बिल्कुल अन्त तक सेवा नहीं कर पाते हैं; अपनी सेवा के दौरान, ऐसे लोग हैं जो आधे में छोड़ देते हैं और परमेश्वर को त्याग देते हैं, ऐसे लोग हैं जो अनेक बुरे कार्य करते हैं, और यहाँ तक कि ऐसे भी हैं जो परमेश्वर के कार्य को बड़ा नुकसान करते हैं और बड़ी क्षति पहुँचाते हैं, ऐसे सेवा करने वाले भी हैं जो परमेश्वर को कोसते हैं, इत्यादि—और इन असाध्य परिणामों का क्या अर्थ है? ऐसे किसी भी दुष्टता पूर्ण कार्यों का अर्थ होगा उनकी सेवा की समाप्ति होगा। क्योंकि तुम्हारे सेवा काल के दौरान तुम्हारा आचरण बहुत ख़राब रहा है, क्योंकि तुमने अपनी हदें पार की हैं, जब परमेश्वर देखता है कि तुम्हारी सेवा अपेक्षित स्तर तक नहीं है, वह तुम्हें सेवा करने की तुम्हारी पात्रता से वंचित कर देगा, वह तुम्हें सेवा नहीं करने देगा, वह तुम्हें अपनी आँखों के सामने से, और परमेश्वर के घर से हटा देगा। कहीं ऐसा तो नहीं है कि तुम सेवा नहीं करना चाहते हो? क्या तुम हमेशा दुष्टता करना नहीं चाहते हो? क्या तुम हमेशा से बेवफ़ा नहीं रहे हो? तब ठीक है, एक सरल उपाय है: तुम्हें सेवा करने की तुम्हारी पात्रता से वंचित कर दिया जाएगा। परमेश्वर की दृष्टि में, किसी सेवा करने वाले को उसकी सेवा करने की पात्रता से वंचित करने का अर्थ है कि इस सेवा करने वाले के अन्त की घोषणा की जा चुकी है, और ऐसे लोग परमेश्वर की अब और सेवा करने पात्र नहीं होंगे, परमेश्वर को उनकी सेवा की अब और आवश्यकता नहीं है, और चाहे वे कितनी ही अच्छी बातें क्यों न करें, ये बातें व्यर्थ होंगी। जब हालात इस स्थिति तक पहुँच जाएँगे, तो यह परिस्थिति असाध्य बन गई होगी; इस तरह के सेवा करने वालों के पास लौटने का कोई मार्ग नहीं होगा। और परमेश्वर इस प्रकार के सेवा करने वालों के साथ किस प्रकार से निपटता है? क्या वह केवल उन्हें सेवा करने से रोक देता है? नहीं। क्या वह उन्हें केवल बने रहने से रोकता है? या वह उन्हें एक तरफ कर देता है, और उनके सुधरने की प्रतीक्षा करता है? वह ऐसा नहीं करता है। सचमुच, परमेश्वर सेवा करने वालों के प्रति इतना प्रेममय नहीं है। यदि परमेश्वर की सेवा के प्रति किसी व्यक्ति की इस प्रकार की प्रवृत्ति है, तो इस प्रवृत्ति के कारण, परमेश्वर उसे सेवा करने की उसकी पात्रता से वंचित कर देगा, और उसे एक बार फिर से अविश्वासियों के बीच फेंक देगा। और जिस सेवा करने वाले को अविश्वासियों में फेंक दिया गया हो, उसका क्या भाग्य होता है? वह अविश्वासियों के समान होता है: एक पशु के रुप में पुनर्जन्म दिया जाना और आध्यात्मिक दुनिया में अविश्वासियों वाला दण्ड दिया जाना। और उनके दण्ड में परमेश्वर व्यक्तिगत रुचि नहीं लेगा, क्योंकि परमेश्वर के कार्य से उनकी अब और कोई प्रासंगिकता नहीं है। यह न केवल परमेश्वर में उनकी आस्था के जीवन का अन्त है, बल्कि उनके स्वयं के भाग्य का भी अन्त है, उनके भाग्य की उद्घोषणा है। इसलिए यदि सेवा करने वाले ख़राब ढंग से सेवा करते हैं, तो उन्हें स्वयं परिणाम भुगतने पड़ेंगे। यदि कोई सेवा करने वाला बिल्कुल अन्त तक सेवा करने में असमर्थ है, या बीच में ही सेवा करने की उसकी पात्रता से वंचित कर दिया जाता है, तो उसे अविश्वासियों के बीच फेंक दिया जाएगा—और यदि उसे अविश्वासियों के बीच फेंक दिया जाता है तो उसके साथ मवेशियों के समान ही, उसी प्रकार से निपटा जाएगा जैसे कि अज्ञानियों और तर्कहीन व्यक्तियों के साथ निपटा जाता है। जब इसे मैं इस प्रकार से कहता हूँ, तो तुम्हारी समझ में आता है, है न?

परमेश्वर अपने चुने हुए लोगों और सेवा करने वालों के जीवन और मृत्यु चक्र को ऐसे ही सँभालता है। यह सुनने के बाद तुम लोग कैसा महसूस करते हो? क्या मैंने पहले कभी उस विषय पर बोला है जिसके बारे में मैंने अभी-अभी बात की है, परमेश्वर के चुने हुए लोगों और सेवा करने वालों का विषय? दरअसल मैंने बात की है, लेकिन तुम लोगों को याद नहीं। परमेश्वर अपने चुने हुओं और सेवा करने वालों के प्रति धार्मिक है। हर तरह से वह धार्मिक है, है न? क्या कहीं किसी जगह तुम दोष ढूँढ सकते हो? क्या ऐसे लोग हैं जो कहेंगे: क्यों परमेश्वर चुने हुओं के प्रति इतना सहिष्णु है? और क्यों वह सेवा करने वालों के प्रति केवल थोड़ा सा ही सहिष्णु है? "क्या कोई सेवा करने वालों के लिये खड़े होने की इच्छा रखता है।" "क्या परमेश्वर सेवा करने वालों को और समय दे सकता है, तथा उनके प्रति और अधिक धैर्यवान और सहिष्णु हो सकता है?" क्या ये शब्द सही हैं? (नहीं, ये सही नहीं हैं)। और क्यों वे सही नहीं है? (क्योंकि हमें केवल सेवा करने वाला बना कर वास्तव में हम पर उपकार दर्शाया गया है)। सेवा करने वालों को केवल सेवा की अनुमति देकर ही उन पर उपकार दर्शाया गया है! "सेवा करने वाले" शब्द के बिना, और सेवा करने वालों के कार्य के बिना, ये सेवा करने वाले कहाँ होते? अविश्वासियों के बीच, मवेशियों के साथ जीते और मरते। आज वे, परमेश्वर के सामने आने की अनुमति, और परमेश्वर के घर में आने की अनुमति दिए जा कर, कितने अनुग्रह का आनंद लेते हैं! यह एक ज़बरदस्त अनुग्रह है! यदि परमेश्वर ने तुम्हें सेवा करने का अवसर न दिया होता, तो तुम्हें कभी भी परमेश्वर के सामने आने का अवसर न मिलता। और क्या कहें, यदि तुम कोई ऐसे हो जो बौद्धधर्म को मानता है और तुमने अमरत्व पा लिया लिया, तो ज़्यादा से ज़्यादा तुम आध्यात्मिक दुनिया में छोटा-मोटा प्रशासनिक कार्य करने वाले हो; तुम कभी भी परमेश्वर से नहीं मिलोगे, या उसकी आवाज़ को नहीं सुनोगे, न उसके वचनों को सुनोगे, या अपने लिये उसके प्रेम और आशीषों को महसूस करोगे, और तुम संभवतः कभी उसके आमने-सामने नहीं हो सकोगे। बौद्धों के सामने केवल साधारण काम होते हैं। वे संभवतः परमेश्वर को नहीं जान सकते हैं, और केवल अंधों की तरह अनुपालन और आज्ञापालन करते हैं, जबकि सेवा करने वाले कार्य के इस चरण में बहुत कुछ प्राप्त करते हैं! सर्वप्रथम, वे परमेश्वर के आमने-सामने आने, उसकी आवाज़ को सुनने, उसके वचनों को सुनने, और उन अनुग्रहों और आशीषों का अनुभव करने में में समर्थ होते हैं जो वह लोगों को देता है। इसके अलावा, वे परमेश्वर के द्वारा दिये गए वचनों और सत्यों का आनंद उठाने में समर्थ होते हैं। उन्हें वास्तव में बहुत ज्यादा प्राप्त होता है! बहुत ज्यादा! तो यदि एक सेवा करने वाले के रूप में, तुम सही प्रयत्न नहीं भी कर सकते हो, तो क्या परमेश्वर तब भी तुम्हें रखेगा? वह तुम्हें नहीं रख सकता है। वह तुमसे ज्यादा माँग नहीं करता है, बल्कि परमेश्वर तुम वह कुछ भी सही ढंग से नहीं करते हो जो वह तुमसे चाहता है, तुम अपने कर्तव्य के मुताबिक नहीं चलते हो—और इसलिए—बिना संदेह के, परमेश्वर तुम्हें नहीं रख सकता है। परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव ऐसा ही है। परमेश्वर तुम्हारे नख़रे नहीं उठाता है, किन्तु वह तुम्हारे साथ किसी तरह का भेदभाव भी नहीं करता है। इन्हीं सिद्धांतों के अनुसार परमेश्वर कार्य करता है। सभी लोगों और प्राणियों के प्रति परमेश्वर इसी तरह से कार्य करता है।

जब आध्यात्मिक दुनिया की बात आती है, तो यदि इसके विभिन्न जीव कुछ ग़लत करते हैं, यदि वे अपना कार्य को ठीक ढंग से नहीं करते हैं, तो परमेश्वर के पास उनसे निपटने के लिए उसी के अनुरूप स्वर्गिक फ़र्मान और निर्णय हैं—यह परम सिद्धांत है। तो परमेश्वर के कई-हजारों-वर्षों के प्रबंधन कार्य के दौरान, जिन कुछ न्यायालय अधिकारियों ने ग़लत कार्य किया था, उन्हें पूर्णतया विनष्ट कर दिया गया है, कुछ आज भी हिरासत में हैं और दंडित किए जा रहे हैं। आध्यात्मिक दुनिया में हर प्राणी को इसका सामना अवश्य करना पडता है। यदि वे कुछ ग़लत करते हैं या कोई दुष्टता करते हैं, तो वे दंडित किए जाते हैं—और यह वैसा ही है जैसा कि परमेश्वर अपने चुने हुए लोगों और सेवा करने वालों के साथ करता है। और इसलिए चाहे यह आध्यात्मिक दुनिया में हो या भौतिक संसार में, परमेश्वर जिन सिद्धांतों से काम करता है, वे बदलते नहीं हैं। इस बात की परवाह किए बिना कि तुम परमेश्वर के कार्यकलापों को देख सकते हो या नहीं, उसके सिद्धांत नहीं बदलते हैं। सर्वत्र, सभी चीज़ के प्रति परमेश्वर का दृष्टिकोण और सभी चीज़ों को सँभालने के उसके सिद्धांत एकही रहे हैं। यह अपरिवर्तनशील है। परमेश्वर अविश्वासियों में से उन लोगों के प्रति भी दयालु रहेगा जो अपेक्षाकृत सही तरीके से जीते हैं, और हर धर्म में से उन लोगों के लिये अवसर बचाकर रखेगा जो सद्व्यवहार करते हैं और दुष्टता नहीं करते हैं, उन्हें परमेश्वर द्वारा प्रबंधन की गई सभी चीज़ों में एक भूमिका निभाने देगा, और वह करने देगा जो उन्हें करना चाहिए। इसी प्रकार, उन लोगों के बीच जो परमेश्वर का अनुसरण करते हैं, उन लोगों के बीच जो उसके चुने हुए हैं, परमेश्वर इन सिद्धांतों के अनुसार, किसी भी व्यक्ति के साथ भेदभाव नहीं करता है। जो कोई भी ईमानदारी से उसका अनुसरण कर पाता है, वह उसके प्रति दयालु है, और उस हर एक को प्रेम करता है जो ईमानदारी से उसका अनुसरण करता है। केवल इतना ही है कि इन विभिन्न प्रकार के लोगों—अविश्वासियों, विभिन्न आस्थाओं वाले लोगों और परमेश्वर के चुने हुए लोगों—के लिए वह जो उन्हें प्रदान करता है, वह भिन्न होता है। अविश्वासियों को ही लो: यद्यपि वे परमेश्वर पर विश्वास नहीं करते हैं, और परमेश्वर उन्हें मवेशियों के रूप में देखता है, फिर भी सब बातों के बीच उनमें से हर एक के पास खाने के लिए भोजन होता है, उनका अपना एक स्थान होता है, और जीवन और मृत्यु का सामान्य चक्र होता है। जो दुष्टता करते हैं वे दण्ड पाते और जो भला करते हैं वे धन्य होते हैं और परमेश्वर की दया प्राप्त करते हैं। क्या ऐसा नहीं है? आस्थावान लोगों के लिए, यदि वे पुनर्जन्म के बाद पुनर्जन्म में धार्मिक विचारों का कठोरता से पालन कर पाते हैं, तो इन सभी पुनर्जन्मों के बाद परमेश्वर अंततः उनके लिए अपनी उद्घोषणा करेगा। इसी प्रकार, आज तुम लोगों के लिए, चाहे आप परमेश्वर के चुने हुए लोगों में से एक हो या कोई सेवा करने वाले हो, परमेश्वर तुम्हें भी राह पर लाएगा और अपने द्वारा नियत किए गए विनियमों और प्रशासनिक आदेशों के अनुसार तुम लोगों का अंत निर्धारित करेगा। इन विभिन्न प्रकार की आस्थाओं वाले लोगों—विविध प्रकार की आस्था के लोगों के बीच जो विविध धर्मों से संबंधित हैं—क्या परमेश्वर ने उन्हें रहने का स्थान दिया है? यहूदी धर्म कहाँ है? क्या परमेश्वर ने उनकी आस्था में हस्तक्षेप किया है? उसने नहीं किया है, है न? और ईसाई धर्म का क्या? उसने उसमें में भी हस्तक्षेप नहीं किया है। वह उन्हें उनकी स्वयं की पद्धतियों का पालन करने देता है, और उनसे बात नहीं करता है, या उन्हें कोई प्रबुद्धता नहीं देता है, और, इसके अलावा, वह उन पर कुछ भी प्रकट नहीं करता है: "यदि तुम्हें लगता है कि यह सही है, तो इसी तरह से विश्वास करो"! कैथोलिक मरियम पर विश्वास करते हैं, और यह कि यह मरियम के माध्यम से था कि समाचार यीशु तक पहुँचाया गया था; उनकी आस्था ऐसा ही रूप है। और क्या कभी परमेश्वर ने उनके विश्वास को सुधारा है? परमेश्वर उन्हें स्वतंत्र छोड़ देता है, वह उन पर कोई ध्यान नहीं देता है, और उन्हें जीवित रहने के लिए एक निश्चित स्थान देता है। और क्या मुसलमानों और बौद्धों के प्रति भी वह वैसा ही है? उसने उनके लिए भी सीमा-रेखाएँ तय कर दी हैं, और, उनकी संबंधित आस्थाओं में हस्तक्षेप किए बिना, उन्हें अपना स्वयं का जीवित रहने का स्थान लेने देता है। सब कुछ सुव्यवस्थित है। और इस सब में तुम लोग क्या देखते हो? यही कि परमेश्वर अधिकार धारण करता है, किन्तु वह अपने अधिकार का दुरुपयोग नहीं करता है। परमेश्वर सभी चीजों को अचूक क्रम में व्यवस्थित करता है और रीतिबद्ध है, और इसमें उसकी बुद्धि और सर्वशक्तिमत्ता निहित है।

आज हमने एक नये और खास विषय पर बात की, जिसका संबंध आध्यात्मिक दुनिया से है, जो कि आध्यात्मिक दुनिया के परमेश्वर के प्रबंधन और उस पर उसके प्रभुत्व का एक पहलू है। जब तुम लोग इन बातों को नहीं समझते थे, तो हो सकता है कि तुमने कहा हो: "इससे संबंधित हर चीज़ एक रहस्य है, और इसका हमारे जीवन में प्रवेश से कुछ लेना देना नहीं है; ये चीज़ें उन बातों से अलग हैं कि लोग कैसे जीते हैं, और हमें उन्हें समझने की आवश्यकता नहीं है और न ही हम उनके बारे में सुनना चाहते हैं। परमेश्वर को जानने से उनका बिल्कुल भी कोई संबंध नहीं है"। अब, क्या तुम लोगों को लगता है कि ऐेसी सोच के साथ कोई समस्या है? क्या यह सही है? (नहीं)। ऐसी सोच सही नहीं है, और इसमें गंभीर समस्या है। ऐसा इसलिए है क्योंकि, यदि तुम यह समझने की इच्छा रखते हो कि कैसे परमेश्वर सभी चीज़ों पर शासन करता है, तो तुम मात्र और केवल यह नहीं समझ सकते कि तुम क्या देख सकते हो और तुम्हारी सोच के द्वारा क्या प्राप्त करने योग्य है। तुम्हें उस दुनिया को भी थोड़ा अवश्य समझना चाहिए जो तुम्हारे लिए अदृश्य है, किन्तु इस जगत से जटिलता से जुड़ी हुई है जिसे तुम देख सकते हो। यह परमेश्वर की संप्रभुता से संबंधित है, इसका संबंध "परमेश्वर सभी चीज़ों के जीवन का स्रोत है" विषय से है; यह उसके बारे में जानकारी है। इस जानकारी के बिना, इस बारे में लोगों के ज्ञान में दोष और कमियाँ होंगी कि कैसे परमेश्वर सभी चीज़ों के जीवन का स्रोत है। इस प्रकार, आज हमने जिस बारे में बात की है, उसे जिसके बारे में हम पहले बात कर चुके हैं उसका, और साथ ही "परमेश्वर सभी चीज़ों के जीवन का स्रोत है" की विषय-वस्तु का समापन किया जाना कहा जा सकता है। इसे समझ लेने के बाद, क्या तुम लोग इस विषय-वस्तु के माध्यम से परमेश्वर को जानने में समर्थ हो? और जो अधिक महत्वपूर्ण वह है कि आज, मैंने सेवा करने वालों से संबंधित एक बहुत महत्वपूर्ण सूचना दी है। मैं जानता हूँ कि तुम लोग इस तरह के विषय पर सुनना वास्तव पसंद करते हो, कि तुम लोग वास्तव में इन चीज़ों की परवाह करते हो, तो मैंने आज जो चर्चा की है क्या तुम उससे संतुष्ट हो? (हाँ, हम हैं)। तुम लोगों पर शायद अन्य दूसरी चीज़ों का ज़बरदस्त प्रभाव न हुआ हो, परन्तु तुम पर सेवा करने वालों के लिए कही गई बातों के बारे में ज़बरदस्त प्रभाव पड़ा है, क्योंकि यह विषय तुममें से हरेक की आत्मा को स्पर्श करता है।

मनुष्य से परमेश्वर की अपेक्षाएँ

1. स्वयं परमेश्वर की पहचान और हैसियत

हम "परमेश्वर सभी चीज़ों के जीवन का स्रोत है" और साथ ही "परमेश्वर स्वयं अद्वितीय परमेश्वर है" विषय के अंत में आ गए हैं। ऐसा करने के बाद, हमें एक सारांश बनाने की आवश्यकता है। किस प्रकार का सारांश? एक स्वयं परमेश्वर के बारे में। चूँकि यह स्वयं परमेश्वर के बारे में है, तो इस परमेश्वर के हर पहलू से, और साथ ही परमेश्वर में लोगों के विश्वास के स्वरूप से सम्बंधित अवश्य होना चाहिए। और इसलिए, पहले मुझे तुम लोगों से पूछना है: उपदेश को सुनने के बाद, तुम लोगों के मन की आँखों में परमेश्वर कौन है? (सृष्टिकर्ता)। तुम लोगों की मन की आँखों में परमेश्वर सृष्टिकर्ता है। क्या कुछ और है? परमेश्वर सभी चीज़ों का प्रभु है। क्या ये शब्द उचित हैं? (उचित हैं)। परमेश्वर ही एकमात्र है जो सभी चीज़ों पर शासन करता है, और सभी चीज़ों को चलाता है। जो कुछ है वह उसी ने रचा है, जो कुछ है वही उसे चलाता है और जो कुछ है उस सब पर वही शासन करता है और जो कुछ है उस सब का वही भरण-पोषण करता है। यह परमेश्वर की हैसियत और परमेश्वर की पहचान है। सभी चीजों के लिए और जो कुछ भी है उस सब के लिए, परमेश्वर की असली पहचान सृजनकर्ता, और सभी चीज़ों के शासक की है। परमेश्वर उसी प्रकार की पहचान धारण करता है और वह सभी चीज़ों में अद्वितीय है। परमेश्वर की कोई भी रचना—चाहे वह मनुष्य के बीच हो या आध्यात्मिक दुनिया में हो—परमेश्वर की पहचान और हैसियत का वेष धारण करने या उसका स्थान लेने के लिए किसी भी साधन या बहाने का उपयोग नहीं कर सकती है, क्योंकि सभी चीज़ों में एकमात्र वह ही है जो इस पहचान, सामर्थ्य, अधिकार, और सभी बातों पर शासन करने की क्षमता से सम्पन्न है: हमारा अद्वितीय परमेश्वर स्वयं। वह सभी चीज़ों के बीच रहता और चलता है; वह सभी चीज़ों से ऊपर, सर्वोच्च स्थान तक उठ सकता है; वह मनुष्य बनकर, जो मांस और लहू के हैं उनमें से एक बन कर, लोगों के साथ आमने-सामने होकर और उनके सुख—दुःख बाँट कर, अपने आप को विनम्र बना सकता है; साथ ही, जो कुछ भी है वह सब को नियंत्रित करता है, और जो कुछ भी है उस का भाग्य और किस दिशा में इसे जाना है यह तय करता है, इसके अलावा, वह संपूर्ण मनुष्यजाति के भाग्य, और मनुष्यजाति की दिशा का पथप्रदर्शन करता है। इस तरह के परमेश्वर की सभी जीवित प्राणियों के द्वारा आराधना की जानी चाहिए, उसका आज्ञापालन किया जाना चाहिए और उसे जानना चाहिए। और इसलिए, इस बात की परवाह किए बिना कि तुम मनुष्यजाति में से किस समूह और किस प्रकार सम्बन्धित हो, परमेश्वर में विश्वास करना, परमेश्वर का अनुसरण करना, परमेश्वर का आदर करना, परमेश्वर के शासन को स्वीकार करना, और अपने भाग्य के लिए परमेश्वर की व्यवस्थाओं को स्वीकार करना ही किसी भी व्यक्ति के लिए, किसी जीवित प्राणी के लिए एकमात्र विकल्प और आवश्यक विकल्प है। परमेश्वर की अद्वितीयता में, लोग देखते हैं कि उसका अधिकार, उसका धार्मिक स्वभाव, उसका सार, और वे साधन जिनके द्वारा वह सभी चीज़ों का भरण-पोषण करता है, सभी अद्वितीय हैं; उसकी अद्वितीयता, स्वयं परमेश्वर की असली पहचान को निर्धारित करती है, और यह उसकी हैसियत को निर्धारित करती है। और इसलिए, सभी प्राणियों के बीच, यदि आध्यात्मिक दुनिया में या मनुष्यों के बीच कोई जीवित प्राणी परमेश्वर की जगह खड़ा होने की इच्छा करता है, तो यह असंभव होगा, जैसे कि परमेश्वर का रूप धरने का प्रयास कर रहा हो। यह तथ्य है। इस तरह के सृजनकर्ता और शासक की, जो स्वयं परमेश्वर की पहचान, सामर्थ्य और हैसियत को धारण करता है, मनुष्यजाति के बारे में क्या अपेक्षाएँ हैं? यह हर एक को स्पष्ट हो जाना चाहिए, और उनके द्वारा याद रखा जाना चाहिए, और यह परमेश्वर और मनुष्य दोनों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है!

2. परमेश्वर के प्रति मनुष्य की विभिन्न प्रवृत्तियाँ

लोग परमेश्वर के प्रति कैसा बर्ताव करते हैं यह उनका भविष्य निर्धारित करता है, और यह निर्धारित करता है कि कैसे परमेश्वर उनके साथ बर्ताव करता है और उनसे निपटता है। यहाँ पर मैं कुछ उदाहरण देने जा रहा हूँ कि कैसे लोग परमेश्वर के प्रति बर्ताव करते हैं। आइए, इस बारे में कुछ सुनते हैं कि उनका ढंग और रवैया जिससे वे परमेश्वर के प्रति बर्ताव करते हैं सही है या नहीं। आइए, हम निम्नलिखित सात प्रकार के लोगों के आचरण पर विचार करें:

1. एक प्रकार के ऐसे लोग होते हैं जिनका व्यवहार परमेश्वर के प्रति विशेष रूप से बेतुका होता है। वे सोचते हैं कि परमेश्वर एक बोधिसत्व या मानव बुद्धि वाला पवित्र प्राणी जैसा है, और चाहता है कि जब लोग मिलें तो वे तीन बार उसके सामने झुकें और खाने के बाद उसके सामने धूप जलाएँ। और इस तरह जब, उनके हृदयों में, वे परमेश्वर के प्रति उसके अनुग्रह के लिए कृतज्ञ होते हैं, और परमेश्वर के प्रति आभारी होते हैं, तो अक्सर उनके अंदर इस तरह का संवेग आता है। वे ऐसी कामना करते हैं कि जिस परमेश्वर में वे आज विश्वास करते हैं वह, उस पवित्र प्राणी की तरह जिसकी वे अपने मन में लालसा रखते हैं, अपने प्रति उनके उस व्यवहार को स्वीकार कर सकता है जिसमें वे तीन बार उसके सामने झुकते हैं जब वे मिलते हैं, और खाने के बाद धूप जलाते हैं।

2. कुछ लोग परमेश्वर को जीवित बुद्ध के रूप में देखते हैं जो सभी जीवितों के कष्टों को हटाने और उन्हें बचाने में सक्षम है; वे परमेश्वर को जीवित बुद्ध के रूप में देखते हैं जो उन्हें दुःख के सागर से दूर ले जाने में सक्षम है। परमेश्वर में इन लोगों का विश्वास बुद्ध के रूप में परमेश्वर की आराधना करना है। यद्यपि वे धूप नहीं जलाते हैं, दण्डवत् नहीं करते हैं, या अर्पण नहीं करते हैं, लेकिन उनके हृदय में उनका परमेश्वर केवल इस तरह का एक बुद्ध है, और वह केवल यह चाहता है कि वे बहुत दयालु और धर्मार्थ हों, कि वे किसी जीवित चीज़ को नहीं मारें, दूसरों को गाली नहीं दें, ऐसा जीवन जीएँ जो ईमानदार दिखायी दे, और कुछ बुरा नहीं कररें—केवल यही बातें। उनके हृदय में यही परमेश्वर है।

3. कुछ लोग परमेश्वर की आराधना किसी महान या प्रसिद्ध व्यक्ति के रूप में करते हैं। उदाहरण के लिए, यह महान व्यक्ति चाहे किसी भी साधन से बोलना पसंद करता हो, वह किसी भी स्वर-शैली में बोलता हो, वह किसी भी शब्द और शब्दावली का उपयोग करता हो, उसका लहजा, उसके हाथ का संकेत, उसके विचार और कार्यकलाप, उसका आचरण—वे उस सब की नकल करते हैं, और ये सब ऐसी चीज़ें हैं जो परमेश्वर में अपने विश्वास को पैदा करने के लिए उन्हें पूरी तरह से उत्पन्न करना ज़रूरी है।

4. कुछ लोग परमेश्वर को एक सम्राट के रूप में देखते हैं, वे महसूस हैं कि वह सबसे ऊपर है, और कोई भी उसका अपमान करने का साहस नहीं करता है—और यदि वे ऐसा करते हैं, तो उन्हें दण्डित किया जाएगा। वे ऐसे सम्राट की आराधना इसलिए करते हैं क्योंकि उनके हृदय में सम्राट के लिए एक निश्चित जगह है। सम्राटों के विचार, तौर तरीके, अधिकार और स्वभाव—यहाँ तक कि उनकी रूचियाँ और व्यक्तिगत जीवन—यह सब कुछ ऐसा बन जाता है जिसे इन लोगों को अवश्य समझना चाहिए, ऐसे मुद्दे और मामले हैं जिसके बारे में वे चिंतित होते हैं, और इसलिए वे परमेश्वर की आराधना एक सम्राट के रूप में करते हैं। इस तरह का विश्वास बेहूदा है।

5. कुछ लोगों की परमेश्वर के अस्तित्व में एक विशेष आस्था होती है, एक ऐसी आस्था जो गहन और होती है। क्योंकि उनका परमेश्वर के बारे में ज्ञान बहुत उथला होता है और उन्हें परमेश्वर के वचन का ज्यादा अनुभव नहीं होता है, इसलिए वे उसकी आराधना एक प्रतिमा के रूप में करते हैं। यह प्रतिमा उनके हृदय में एक परमेश्वर है, यह कुछ ऐसा है जिससे उन्हें अवश्य डरना चाहिए और उसके सामने झुकना चाहिए, और जिसका उन्हें अनुसरण और अनुकरण अवश्य करना चाहिए। वे परमेश्वर को प्रतिमा के रूप में देखते हैं, एक ऐसी जिसका उन्हें अपने जीवनभर अनुसरण अवश्य करना चाहिए। वे उस लहजे की नक़ल करते हैं जिसमें ईश्वर बोलता है, और बाहरी रूप में वे उनकी नक़ल करते हैं जिन्हें परमेश्वर पसंद करता है। वे अक्सर ऐसे काम करते हैं जो भोले-भाले, शुद्ध, और ईमानदार प्रतीत होते हैं, और यहाँ तक कि वे इस प्रतिमा का एक ऐसे सहभागी या साथी के रूप में अनुसरण करते हैं जिससे वे कभी अलग नहीं हो सकते हैं। यह उनके विश्वास का ऐसा ही रूप है।

6. कुछ ऐसे लोग हैं जो, परमेश्वर के बहुत से वचनों को पढ़ने और बहुत से उपदेशों को सुनने के बावजूद, अपने हृदयों में महसूस करते हैं कि परमेश्वर के प्रति उनका एकमात्र सिद्धांत यह है कि उन्हें हमेशा चापलूस और खुशामदी होना चाहिए, या अन्यथा उस तरह से परमेश्वर की स्तुति और सराहना करनी चाहिए जो वास्तविक न हो। वे विश्वास करते हैं कि परमेश्वर ही ऐसा परमेश्वर है जो उनसे इस तरह से व्यवहार करवाना चाहता है, और मानते हैं कि यदि वे ऐसा नहीं करते हैं, तो वे किसी भी समय वे उसके क्रोध को भड़का सकते हैं, या उसके विरुद्ध पाप कर सकते हैं, और पाप करने के परिणामस्वरुप परमेश्वर उन्हें दण्डित करेगा। उनके हृदय में इसी तरह का परमेश्वर है।

7. और फिर ऐसे लोगों की बहुतायत है जो परमेश्वर में आध्यात्मिक सहारा ढूँढते हैं। क्योंकि वे इस जगत में रहते हैं, इसलिए वे शांति या आनंद से रहित हैं, और उन्हें कहीं शांति प्राप्त नहीं होती है। परमेश्वर को प्राप्त करने के बाद, जब वे उसके वचनों को देख और सुन लेते हैं, तो अपने हृदयों में वे गुप-चुप रूप से आनंदित और प्रफुल्लित होते हैं। उनका मानना है कि उन्होंने आख़िरकार कोई जगह प्राप्त कर ली है जो उनके लिए आनंद लाएगी, कि उन्होंने आख़िरकार ऐसा परमेश्वर प्राप्त कर लिया है जो उन्हें आध्यात्मिक सहारा देगा। ऐसा इसलिए क्योंकि, उनके परमेश्वर को स्वीकार कर लेने और अनुकरण करना शुरू करने के बाद, वे खुश हो गए हैं, उनके जीवन संतुष्ट हैं, वे अविश्वासियों के समान अब और नहीं हैं, जो जीवन में जानवरों की तरह नींद में चलते हैं, और अब वे महसूस करते हैं कि उनके पास जीवन में आगे देखने के लिए कुछ है। इस प्रकार, उन्हें लगता है कि यह परमेश्वर उनकी आध्यात्मिक आवश्यकताओं को पूरा कर सकता है और मन और आत्मा दोनों में एक बड़ा आनंद ला सकता है। इसका अहसास किए बिना, वे इस परमेश्वर को छोड़ने में असमर्थ हो जाते हैं जो उन्हें आध्यात्मिक सहारा देता है, जो उनकी आत्मा और पूरे परिवार के लिए आनंद लाता है। वे मानते हैं कि ईश्वर में विश्वास को उनके जीवन में आध्यात्मिक सहारा लाने से ज्यादा कुछ और करने की जरुरत नहीं है।

क्या परमेश्वर के प्रति ऊपर उल्लिखित इन विभिन्न प्रकार के लोगों की प्रवृत्तियाँ तुम लोगों में विद्यमान है? (हाँ, हैं)। यदि, परमेश्वर में अपने विश्वास में, किसी के हृदय में इस प्रकार की कोई भी प्रवृत्ति है, तो क्या वह सच में परमेश्वर के सम्मुख आने में समर्थ है? यदि किसी के हृदय में इसमें से कोई भी प्रवृत्ति है, तो क्या वह परमेश्वर में विश्वास करता है? क्या वे स्वयं अद्वितीय परमेश्वर में विश्वास करते हैं? (नहीं)। चूँकि तुम स्वयं अद्वितीय परमेश्वर में विश्वास नहीं करते हो, तो तुम किसमें विश्वास करते हो? यदि तुम जिसमें विश्वास करते हो वह स्वयं अद्वितीय परमेश्वर नहीं है, तो यह संभव है कि तुम किसी प्रतिमा में, या किसी महान आदमी में, या किसी बोधिसत्व में विश्वास करते हो, कि तुम अपने हृदय में बुद्ध की आराधना करते हो। और इसके अलावा, यह भी संभव है कि तुम किसी साधारण व्यक्ति में विश्वास करते हो। संक्षेप में, परमेश्वर के प्रति लोगों के विभिन्न प्रकारों के विश्वास और प्रवृत्तियों की वजह से, लोग अपनी अनुभूति के परमेश्वर को अपने हृदयों में जगह देते हैं, वे परमेश्वर के ऊपर अपनी कल्पनाएँ थोप देते हैं, वे परमेश्वर के बारे में अपनी प्रवृत्तियों और कल्पनाओं को स्वयं अद्वितीय परमेश्वर के साथ-साथ रखते हैं, और उनका उत्सव मनाने के लिए उन्हें पकडे रहते हैं। जब लोग परमेश्वर के प्रति इस प्रकार के अनुचित दृष्टिकोण रखते हैं तो इसका क्या अर्थ है? इसका अर्थ है कि उन्होंने स्वयं सच्चे परमेश्वर को अस्वीकार कर दिया है और झूठे ईश्वर की आराधना करते हैं, इसका अर्थ है कि परमेश्वर में विश्वास करने के साथ-साथ, वे परमेश्वर को अस्वीकार करते हैं, और उसका विरोध करते हैं, और यह कि वे सच्चे परमेश्वर के अस्तित्व से इनकार करते हैं। यदि लोग इस प्रकार का विश्वास रखते रहेंगे, उनके लिए क्या परिणाम होंगे? इस प्रकार के विश्वास के साथ, क्या वे कभी परमेश्वर की अपेक्षा को पूरा करने के निकट आ पाएँगे? (नहीं, वे नहीं आ पाते हैं)। इसके विपरीत, अपनी धारणाओं और कल्पनाओं के कारण, ये लोग परमेश्वर के पथ से और दूर हो जाएँगे, क्योंकि वे जिस दिशा की खोज करते हैं वह उससे ठीक विपरीत है जिस की परमेश्वर उनसे अपेक्षा करता है। क्या कभी तुम लोगों ने वह कहानी सुनी है कि "रथ को उत्तर की ओर चलाकर दक्षिण की ओर जाना?" यह ठीक उत्तर की ओर रथ चला कर दक्षिण की ओर जाने का मामला हो सकता है। यदि लोग परमेश्वर में इस ऊटपटांग ढंग से विश्वास करेंगे, तो तुम जितनी अधिक कोशिश करोगे, तुम परमेश्वर से उतना ही दूर भागोगे। और इसलिए मैं तुम लोगों को यह चेतावनी देता हूँ: इससे पहले कि तुम आगे बढ़ो, तुम्हें पहले यह जरुर देखना चाहिएँ कि तुम सही दिशा में जा रहे हो या नहीं? अपने प्रयासों को लक्षित करो, और स्वयं से यह पूछना निश्चित करो, "क्या जिस परमेश्वर पर मैं विश्वास करता हूँ वह सभी चीज़ों का शासक है? क्या यह परमेश्वर जिस पर मैं विश्वास करता हूँ मात्र कोई ऐसा है जो मुझे आध्यात्मिक सहारा देता है? क्या वह मेरा आदर्श है? जिस परमेश्वर में मैं विश्वास करता हूँ वह मुझसे क्या चाहता है? क्या परमेश्वर उस सब को अनुमोदित करता है जो मैं करता हूँ? क्या जो कुछ भी मैं करता और खोजता हूँ, वह परमेश्वर को जानने की कोशिश में है? क्या यह मुझसे परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुकूल है? क्या जिस पथ पर मैं चलता हूँ वह परमेश्वर के द्वारा मान्य और अनुमोदित है? क्या परमेश्वर मेरी आस्था से संतुष्ट है?" तुम्हें अक्सर और बार-बार अपने आप से ये प्रश्न पूछने चाहिए। यदि तुम परमेश्वर के ज्ञान की खोज करते हो, तो, इससे पहले कि तुम परमेश्वर को संतुष्ट कर सको, तुम्हारे पास एक स्पष्ट चेतना और स्पष्ट उद्देश्य अवश्य होना चाहिए।

क्या यह संभव है कि, अपनी सहिष्णुता के परिणामस्वरूप, परमेश्वर अनिच्छा से इन अनुचित प्रवृत्तियों को स्वीकार करेगा जिनके बारे में मैंने अभी-अभी बात की है? क्या परमेश्वर इन लोगों की प्रवृत्तियों की सराहना कर सकेगा? परमेश्वर की मनुष्यजाति से और जो उसका अनुकरण करते हैं उनसे, क्या अपेक्षाएँ है? क्या तुम्हें यह स्पष्ट है कि वह लोगों से किस प्रकार की प्रवृत्ति की अपेक्षा करता है? आज मैं बहुत कह चुका हूँ, मैं स्वयं परमेश्वर के विषय के बारे में, और साथ ही परमेश्वर के कर्मों और उसके स्वरूप के बारे में, बहुत बोल चुका हूँ। क्या अब तुम लोग जानते हो कि परमेश्वर लोगों से क्या प्राप्त करना चाहता है? क्या तुम जानते हो कि परमेश्वर तुमसे क्या चाहता है? बोलो। यदि अनुभवों और अभ्यास से तुम्हारे ज्ञान में अभी भी कमी है या यह बहुत सतही है, तो तुम लोग इन वचनों के अपने ज्ञान के बारे में कुछ कह सकते हो। क्या तुम्हारे पास ज्ञान का सार है? परमेश्वर मनुष्य से क्या चाहता है? (वफ़ादारी, आज्ञापालन)। वफ़ादारी और आज्ञापालन के अलावा, और क्या? (इन कुछ संगतियों के दौरान, परमेश्वर ने इस बात की आवश्यकता को महत्व दिया है कि, हम परमेश्वर को जानें उसके कर्मों को जानें, यह जानें कि वही सभी चीज़ों के जीवन का स्रोत है, उसकी हैसियत और पहचान को जानें, और परमेश्वर के जीवों के रूप में अपने कर्तव्य को जाने। परमेश्वर के इस बारे में स्पष्ट वचन हैं कि हमें अपने सभी प्रयास किस पर समर्पित करने चाहिए, वह हमसे क्या अपेक्षा करता है, वह किस प्रकार के लोगों को पसंद करता है, और वह किस प्रकार के लोगों से घृणा करता है)। और जब परमेश्वर कहता है कि लोग उसे जानें, तो उसका अंतिम परिणाम क्या होता है? (वे जानते हैं कि परमेश्वर सृजनकर्ता है, और यह कि लोग सृजित प्राणी हैं)। जब वे इस प्रकार का ज्ञान पा लेते हैं, तो परमेश्वर के प्रति लोगों की प्रवृत्ति में, उनके व्यवहार में, कार्यान्वयन के तरीके में, या उनके जीवन स्वभाव में क्या बदलाव आते हैं? क्या तुम लोगों ने कभी इस बारे में सोचा है? कहीं ऐसा तो नहीं, कि परमेश्वर को जानने, और उसे समझने के बाद, वे भले व्यक्ति बन जाते हैं? (परमेश्वर पर विश्वास करना एक भला आदमी बनने की खोज करना नहीं है)। तो उन्हें किस प्रकार का व्यक्ति अवश्य होना चाहिए? (उन्हें परमेश्वर का योग्य प्राणी अवश्य होना चाहिए)। (वे ईमानदार अवश्य होने चाहिए)। क्या कुछ और भी है? (उन्हें ऐसा अवश्य होना चाहिए जो परमेश्वर के आयोजन के प्रति समर्पित होता हो, जो वास्तव में परमेश्वर की आराधना और उससे प्रेम कर पाता हो)। (उनमें विवेक और बोध हो, और सच में परमेश्वर का आज्ञापालन कर पाता हो)। और क्या? (परमेश्वर को सच में और सही ढंग से जानने के बाद, हम परमेश्वर के प्रति परमेश्वर के रूप में व्यवहार कर पाते हैं, हम जानते हैं कि परमेश्वर सदैव ही परमेश्वर है, कि हम सृजित किए गए प्राणी हैं, हमें परमेश्वर की आराधना करनी चाहिए, और अपनी स्थिति पर टिके रहना चाहिए)। बहुत अच्छा! आइए, कुछ अन्य लोगों से भी सुनें। (परमेश्वर की संगतियाँ सभी चीज़ों पर शासन करने के परमेश्वर के अधिकार को जानने में सक्षम बनाती है, ये हमें इस बात को स्वीकार करने देती हैं कि परमेश्वर सभी चीज़ों का शासक है, ताकि हम उस पर्यावरण के प्रति समर्पित हो सकें जिसकी परमेश्वर हमारे लिए प्रतिदिन व्यवस्था करता है, और वास्तव में उस कर्तव्य के प्रति समर्पित हो सकें जो परमेश्वर द्वारा हमें दिया गया है)। (हम परमेश्वर को जानते हैं, अंततः ऐसे व्यक्ति बन पाते हैं जो सच में परमेश्वर का आज्ञापालन करते हैं, परमेश्वर का आदर करते हैं और बुराई से दूर रहते हैं)। यह सही है।

3. वह दृष्टिकोण जो परमेश्वर अपेक्षा करता है कि उसके प्रति मनुष्यजाति का होना चाहिए

वास्तव में, परमेश्वर लोगों से ज्यादा अपेक्षा नहीं करता है—या कम से कम, वह उतनी अपेक्षा नहीं करता है जितनी लोग कल्पना करते हैं। परमेश्वर के कथनों के बिना, या उसके स्वभाव की किसी अभिव्यक्ति, कर्मों, या वचनों के बिना, परमेश्वर को जानना तुम लोगों के लिए बहुत कठिन होगा, क्योंकि लोगों को परमेश्वर के इरादों और उसकी इच्छा का अनुमान लगाना पड़ेगा, जो उनके लिए बहुत कठिन है। किन्तु उसके कार्य के अंतिम चरण के संबंध में, परमेश्वर ने बहुत से वचन कहे हैं, बहुत सा कार्य किया है, और मनुष्य से बहुत सी अपेक्षाएँ की हैं। उसने अपने वचनों में, और अपने कार्य की विशाल मात्रा में लोगों को बता दिया है कि उसे क्या पसंद है, उसे किससे घृणा है, और उन्हें किस प्रकार मनुष्य बनना चाहिए। इन बातों को समझने के बाद, लोगों के अपने हृदयों में परमेश्वर की अपेक्षाओं की सही परिभाषा होनी चाहिए, क्योंकि वे अस्पष्ट परमेश्वर में अब और विश्वास नहीं करते हैं, या अस्पष्टता और अमूर्तता, और शून्यता के बीच परमेश्वर का अनुसरण अब और नहीं करते हैं; इसके बजाय, लोग परमेश्वर के कथनों को सुनने में समर्थ हैं, वे उसकी अपेक्षाओं के मानकों को समझने में, और उन्हें प्राप्त करने में समर्थ हैं, और परमेश्वर लोगों को वह सब बताने में मनुष्य की भाषा का उपयोग करता है जो उन्हें जानना और समझना चाहिए। आज, यदि लोग अभी भी इस बात से अनजान हैं कि परमेश्वर की उनसे क्या अपेक्षाएँ हैं, परमेश्वर क्या है, क्यों वे परमेश्वर में विश्वास करते हैं और कैसे उन्हें परमेश्वर में विश्वास करना चाहिए और उससे व्यवहार करना चाहिए, तो इसमें फिर एक समस्या है। अभी-अभी तुम में से प्रत्येक ने एक क्षेत्र के बारे में बोला; तुम लोग कुछ बातों से परिचित हो, चाहे वे बातें विशिष्ट हों या सामान्य—लेकिन मैं तुम लोगों को परमेश्वर की मनुष्य से सही, पूर्ण और विशिष्ट अपेक्षाएँ बताना चाहता हूँ। वे केवल कुछ वचन हैं, और बहुत साधारण हैं। हो सकता है कि तुम लोग पहले से ही इन वचनों को जानते हों। परमेश्वर की मनुष्य से और जो उसाका अनुसरण करते हैं उनसे सही अपेक्षाएँ निम्नानुसार हैं। परमेश्वर की उनसे पाँच अपेक्षाएँ हैं जो उसका अनुसरण करते हैं: सच्चा विश्वास, वफादार अनुकरण, पूर्ण आज्ञापालन, सच्चा ज्ञान और हार्दिक आदर।

इन पाँच बातों में, परमेश्वर चाहता है कि लोग उससे अब और प्रश्न करें, और न ही अपनी कल्पना या अस्पष्ट और अमूर्त दृष्टिकोण का उपयोग करके उसका अनुसरण करें; उन्हें किन्हीं भी कल्पनाओं या धारणाओं के साथ उसका अनुसरण अवश्य नहीं करना चाहिए। परमेश्वर चाहता है कि जो उसका अनुसरण करते हैं, वे सभी ऐसा पूरी वफादारी से करें, आधे-अधूरे मन से या बिना किसी प्रतिबद्धता के नहीं करें। जब परमेश्वर तुमसे कोई अपेक्षा करता है, या तुम्हारा परीक्षण करता है, तुमसे निपटता या तुम्हारी काट-छाँट करता है, या तुम्हें अनुशासित करता और दंड देता है, तो तुम्हें पूर्ण रूप से उसका आज्ञाकारी होना चाहिए। तुम्हें कारण नहीं पूछना चाहिए, या शर्तें नहीं रखनी चाहिए, और तुम्हें तर्क तो बिल्कुल नहीं करना चाहिए। तुम्हारी आज्ञाकारिता चरम होनी चाहिए। परमेश्वर को जानना एक ऐसा क्षेत्र है जिसका लोगों में बहुत अभाव हैं। वे अक्सर परमेश्वर पर ऐसी कहावतों, कथनों, और वचनों को थोपते हैं जो उससे असंबंधित होते हैं, ऐसा विश्वास करते हैं कि ये वचन परमेश्वर के ज्ञान की सबसे सही परिभाषा हैं। उन्हें बहुत थोड़ा सा पता है कि ये कहावतें, जो लोगों की कल्पनाओं से आती हैं, उनके अपने तर्क, और अपनी अक़्ल से आती हैं, उनका परमेश्वर के सार से ज़रा सा भी सम्बन्ध नहीं है। और इसलिए, मैं तुम लोगों को बताना चाहता हूँ कि परमेश्वर द्वारा इच्छित लोगों के ज्ञान में, परमेश्वर मात्र यह नहीं कहता कि तुम परमेश्वर और उसके वचनों को पहचानो, बल्कि यह कि परमेश्वर का तुम्हारा ज्ञान सही हो। भले ही तुम केवल एक वाक्य बोल सको, या केवल थोड़ा सा ही जानते हो, तो यह थोड़ा सा जानना सही और सच्चा हो, और स्वयं परमेश्वर के सार के अनुकूल हो। क्योंकि परमेश्वर लोगों की अवास्तविक और अविवेकी स्तुति और सराहना से घृणा करता है। उससे भी अधिक, जब लोग उससे हवा की तरह बर्ताव करते हैं तो वह इससे घृणा करता है। जब परमेश्वर के बारे में विषयों की चर्चा के दौरान, लोग छिछोरेपन से बात करते हैं, जैसा चाहे वैसा और बेझिझक बोलते हैं, जैसा उन्हें ठीक लगे वैसा बोलते हैं, तो वह इससे घृणा करता है; इसके अलावा, वह उनसे नफ़रत करता है जो यह मानते हैं कि वे परमेश्वर को जानते हैं, और परमेश्वर के ज्ञान के बारे में डींगे मारते हैं, परमेश्वर के बारे में विषयों पर बिना किसी रुकावट या विचार किए चर्चा करते हैं। उन पाँच अपेक्षाओं में अंतिम अपेक्षा हार्दिक आदर करना थी। यह परमेश्वर की उनसे परम अपेक्षा है जो उसका अनुसरण करते हैं। जब किसी को परमेश्वर का सही और सच्चा ज्ञान होता है, तो वह परमेश्वर का सच में आदर करने और बुराई से दूर रहने में सक्षम होता है। यह आदर उसके हृदय की गहराई से आता है, यह स्वैच्छिक है, और इस कारण नहीं है कि परमेश्वर ने उन पर दबाव डाला है। परमेश्वर यह नहीं कहता कि तुम उसे किसी अच्छी प्रवृत्ति, या आचरण, या बाहरी व्यवहार का कोई उपहार दो; उसके बजाय, वह कहता है कि तुम अपने हृदय की गहराई से उसका आदर करो और उससे डरो। यह आदर तुम्हारे जीवन स्वभाव में बदलाव के परिणामस्वरूप प्राप्त किया जाता है, क्योंकि तुम्हें परमेश्वर का ज्ञान है, क्योंकि तुम्हें परमेश्वर के कर्मों की समझ है, परमेश्वर के सार की तुम्हारी समझ के कारण है और क्योंकि तुमने इस तथ्य को स्वीकार कर लिया है कि तुम परमेश्वर के प्राणियों में से एक हो। और इसलिए, आदर को समझाने के लिए "हार्दिक" शब्द का उपयोग करने का मेरा लक्ष्य यह है ताकि मनुष्यजाति समझे कि परमेश्वर के लिए लोगों का आदर उनके हृदय की गहराई से आना चाहिए।

अब उन पाँच अपेक्षाओं पर विचार करें: क्या तुम लोगों के बीच कोई से हैं जो प्रथम तीन को प्राप्त करने में सक्षम हैं? जिससे मेरा तात्पर्य सच्चा विश्वास, वफ़ादार अनुसरण, और पूर्ण आज्ञापालन है। क्या तुम लोगों में से कोई ऐसे हैं जो इन चीजों में सक्षम हैं? मैं जानता हूँ कि यदि मैंने सभी पाँच कहे होते, तो निश्चित रूप से तुम लोगों में से कोई नहीं होता जो सक्षम हो—किन्तु मैंने इसे तीन तक कम कर दिया है। इस बारे में सोचो कि तुम लोग इन्हें प्राप्त कर चुके हो या नहीं। क्या "सच्चा विश्वास" प्राप्त करना आसान है? (नहीं, आसान नहीं है)। यह आसान नहीं है, क्यों कि लोग प्रायः परमेश्वर पर प्रश्न करते हैं। "वफ़ादार अनुसरण" के बारे में कैसा है? यह "वफादार" किसका उल्लेख करता है? (आधे-अधूरे मन से नहीं बल्कि पूरे मन से)। आधे-अधूरे मन से नहीं पूरे मन से। तुमने तीर सही निशाने पर लगाया है! तो क्या तुम लोग इस अपेक्षा को प्राप्त करने में सक्षम हो? तुम्हें अधिक कड़ी मेहनत करनी होगी, है न? अभी तुम्हें इस अपेक्षा को प्राप्त करना बाकी है! "पूर्ण आज्ञापालन" के बारे में क्या कहेंगे—क्या तुमने इसे प्राप्त कर लिया है? (नहीं)। तुमने इसे भी प्राप्त नहीं किया है। तुम प्रायः अवज्ञाकारी, विद्रोहशील हो जाते हो, तुम प्रायः नहीं सुनते हो, या आज्ञापान करना नहीं चाहते हो, या सुनना नहीं चाहते हो। ये तीन मूलभूत अपेक्षाएँ हैं जिन्हें जीवन में प्रवेश करने के बाद लोगों द्वारा प्राप्त की जाती हैं और तुममें अभी ये प्राप्त की जानी बाकी हैं। तो, इस वक्त, क्या तुममें बहुत अधिक क्षमता है? आज, मुझे इन वचनों को कहते हुए सुन कर, क्या तुम चिंतित महसूस करते हो? (हाँ)! यह सही है कि तुम चिंतित महसूस करते हो। चिंतित मत हो। तुम लोगों की ओर से मैं चिंतित महसूस करता हूँ! मैं अन्य दो अपेक्षाओं पर नहीं जाऊँगा; बिना संदेह के, इन्हें कोई भी प्राप्त करने में सक्षम नहीं है। तुम चिंतित हो। तो क्या तुम लोगों ने अपने लक्ष्य निर्धारित कर लिए हैं? कौन से लक्ष्यों की, किस दिशा की ओर तुम्हें खोज करनी चाहिए, और अपने प्रयासों को समर्पित करना चाहिए? क्या तुम्हारा कोई लक्ष्य है? (हाँ)। तुम्हारा लक्ष्य क्या है? (सत्य की खोज करना, परमेश्वर के वचनों के भीतर उसके ज्ञान की खोज करना, और अंततः परमेश्वर के प्रति आदर और आज्ञाकारिता प्राप्त करना)। मुझे स्पष्ट रूप से कहने दो: जब तुम इन पाँच अपेक्षाओं को प्राप्त कर लोगे, तो तुमने परमेश्वर को संतुष्ट कर लिया होगा। उनमें से प्रत्येक एक संकेतक है, परिपक्वता में पहुँचने के बाद लोगों का जीवन में प्रवेश का और इसके अंतिम लक्ष्य का संकेतक। भले ही मैं इन अपेक्षाओं में से एक के बारे में ही विस्तार से बोलना चुनूँ और जो तुम लोगों से अपेक्षित हैं, तब भी इसे प्राप्त करना आसान नहीं होगा; लोगों को कुछ हद तक कठिनाई झेलने और विशेष प्रयास करने की आवश्यकता होगी। और तुम लोगों की मानसिकता किस प्रकार की होनी चाहिए? यह वैसी ही होनी चाहिए जैसी एक कैंसर के मरीज की होती है जो ऑपरेशन की टेबल पर जाने की प्रतीक्षा कर रहा है। और मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? यदि तुम परमेश्वर में विश्वास करना चाहते हो, परमेश्वर को प्राप्त करना और उसकी संतुष्टि को प्राप्त करना चाहते हो, तब यदि तुम कुछ हद कष्ट सहन नहीं करते हो या विशेष प्रयास नहीं करते हो, तो तुम इन चीजों को प्राप्त करने में समर्थ नहीं होगे। तुम लोगों ने बहुत उपदेश सुन लिया है, किन्तु इसे सुनने का यह मतलब नहीं कि उपदेश तुम्हारा हो गया है; तुम्हें इसे अवश्य आत्मसात करना चाहिए और इसे किसी ऐसी वस्तु में रूपांतरित करना चाहिए जो तुमसे सम्बंधित हो, तुम्हें इसे अपने जीवन में आत्मसात कर लेना चाहिए, और इसे अपने अस्तित्व में ले आना चाहिए, इन वचनों और उपदेश को तुम्हारे जीने के तरीके की अगुवाई करने देना चाहिए, और तुम्हारे जीवन में अस्तित्व संबंधी मूल्य और अर्थ लाने देना चाहिए—और तब तुम्हारे लिए इन वचनों को सुनने का महत्व होगा। यदि ये वचन जो मैंने कहे हैं, तुम्हारे जीवन में कोई सुधार, या तुम्हारे अस्तित्व में कोई मूल्य नहीं लाते हैं, तो तुम्हारा इन्हें सुनना कोई अर्थ नहीं रखता है। तुम लोग इसे समझते हो, है न? इसे समझने के बाद, जो कुछ शेष रहता है वह तुम लोगों पर है। तुम लोगों को काम पर अवश्य लग जाना चाहिए! तुम्हें इन सभी बातों में ईमानदार अवश्य होना चाहिए! भ्रम में मत रहो—समय तेज़ी से गुज़र रहा है! तुम लोगों में से अधिकांश पहले से ही दस साल से ज्यादा विश्वास कर चुके हैं। परमेश्वर में इन दस सालों से अधिक के विश्वास पर पलटकर देखो: तुम लोगों ने कितना पाया है? इस जीवन के कितने दशक तुम्हारे पास शेष हैं? अधिक समय नहीं बचा है। इस बारे में भूल जाओ कि परमेश्वर का कार्य तुम्हारी प्रतीक्षा करता है या नहीं, कि क्या उसने तुम्हारे लिए कोई अवसर छोड़ा है या नहीं, कि क्या वह उसी कार्य को पुनः करेगा या नहीं; उस बारे में बात मत करो। क्या तुम अपने पिछले दस वर्षों को वापिस ला सकते हो? हर गुज़रते हुए दिन और हर उठते हुए कदम के साथ जो तुम लेते हो, जो दिन तुम्हारे पास हैं उनमें से एक दिन कम हो जाता है। समय किसी व्यक्ति की प्रतीक्षा नहीं करता है! तुम परमेश्वर में विश्वास से केवल तभी प्राप्त करोगे, यदि तुम इसे अपने जीवन की सबसे बड़ी चीज़, भोजन, कपडे, या किसी भी अन्य चीज की तुलना में सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण के रूप में देखोगे! यदि तुम केवल तभी विश्वास करते हो जब तुम्हारे पास समय होता है, और अपने विश्वास के प्रति अपना पूरा ध्यान समर्पित करने में असमर्थ हो, यदि तुम हमेशा भ्रम में फँसे रहते हो, तो तुम कुछ भी प्राप्त नहीं करोगे। तुम लोग इसे समझे, है न? आज के लिए हम यहीं समाप्त करेंगे। अगली बार मिलेंगे! (परमेश्वर का धन्यवाद)

15 फरवरी, 2014

फुटनोट:

क. मूल पाठ में "जिससे ये लोग मानव बनते हैं" को छोड़ा दिया गया है।

ख. मूल पाठ में "उनके पुनर्जन्म लेने से पहले" को छोड़ा गया है।

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