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17. परमेश्वर मेरे जीवन की शक्ति है

शाओही, हेनान प्रान्त

14 वर्षों तक मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर का अनुसरण किया है। ये वर्ष मानो पलक झपकते बीत गए। इन तमाम वर्षों के दौरान मैंने कई उतार-चढ़ाव अनुभव किये हैं, और मार्ग अक्सर कठिन रहा है, लेकिन क्योंकि मेरे पास परमेश्वर के वचनों का सहारा था, साथ ही परमेश्वर का प्रेम और दया मेरे साथ थी, इसलिए मैंने विशेष रूप से सन्तुष्ट महसूस किया है। इन 14 वर्षों में मेरा सबसे ज़्यादा यादगार अनुभव अगस्त 2003 में हुई मेरी गिरफ़्तारी थी। हिरासत के दौरान मुझे सीसीपी पुलिस द्वारा क्रूर यातनाएँ दी गयी थीं, और लगभग अपाहिज़ बना दिया गया था। यह सर्वशक्तिमान परमेश्वर था जिसने मुझ पर नज़र रखी और मेरी रक्षा की, जिसने अपने वचनों से कई बार मेरा मार्गदर्शन किया, जिसने मुझे अन्ततः उन दैत्यों द्वारा दी जा रही यातना पर विजय प्राप्त करने की, दृढ़तापूर्वक खड़े रहने की, और गवाही देने की गुंजाइश दी। इस अनुभव के दौरान मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन की असाधारण शक्ति को और उसकी प्राणशक्ति की सामर्थ्य को महसूस किया, जिसके आधार पर मैंने ये जाना कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर वह एकमात्र सच्चा परमेश्वर है जिसकी समस्त प्राणियों पर सम्प्रभुता है और जो संसार की समस्त चीज़ों पर शासन करता है। इससे भी बढ़कर यह कि वही मेरा एकमात्र उद्धार है, वह एकमात्र सत्ता जिसपर मैं भरोसा कर सकती हूँ, और किसी भी शत्रु की ताक़त मुझे परमेश्वर से दूर नहीं ले जा सकती या मुझे उसके पदचिह्नों पर चलने से नहीं रोक सकती।

मुझे वो शाम अच्छे से याद है, मैं और मेरी दो बहनें साथ बैठी थीं, तब हमने सहसा बाहर कुत्ते के भौंकने की आवाज़, और साथ ही प्रांगण की दीवार की ओर से आते लोगों की आहट सुनी थी। उसके थोड़ी देर बाद, हमने किसी को तेज़ी के साथ दरवाज़ा पीटते और चिल्लाते हुए सुना, "दरवाज़ा खोलो! तुम लोग घिर चुकी हो!" हमने फुर्ती से अपनी चीज़ें समेटीं और उनको एक तरफ़ रख दिया, लेकिन तभी दरवाज़ा एक धड़ाके के साथ अन्दर की ओर खुला, और कई टार्चों की रोशनियाँ हमारी ओर चमक उठीं, इनसे हमारी आँखें इस क़दर चौंधिधिया गईं कि हमें अपनी आँखें बन्द करनी पड़ीं। तुरन्त ही, एक दर्जन से ज़्यादा लोग कमरे में घुसे और हमें ज़बरदस्ती दीवार की ओर धकेलते हुए चिल्लाये, "हिलना मत!कोई चालाकी मत करना!" इसके बाद उन्होंनेडकैतों की तरह मकान को तहस-नहस करते हुए उसकी तलाशी ली। ठीक उसी क्षण हमें बाहर से दो बार गोली चलने की आवाज़ आई और उसके बाद अन्दर एक पुलिस वाला चिल्लाया, "वे हमारे क़ब्ज़े में हैं! तीन लोग हैं!" उन्होंने हमें हथकड़ियाँ पहनायीं, फिर वे हमें बुरी तरह धकियाते हुए एक पुलिस वैन में ले गये। अब तक मैं सचेत हो चुकी थी, और मुझे अहसास हो गया था कि हमें पुलिस द्वारा गिरफ़्तार कर लिया गया था। जैसे ही हम उस गाड़ी में सवार हुए, विद्युत-छड़ी हाथ में लिये एक पुलिसवाला चिल्लाया, "सुनो, तुम सब: बिना हिले-डुले खड़ी रहो, क्योंकि जिस किसी ने भी हरक़त की उसको मैं बिजली के झटके दे दूँगा, और उससे भले ही तुम्हारी जान ही क्यों न चली जाए, क़ानून नहीं टूटेगा!" रास्ते में, इनमें से दो दुष्ट पुलिसवालों ने मुझे सीट पर अपने बीच दबोच लिया, और उनमें से एक ने मेरे पैर पकड़कर अपनी गोद में रख लिये और मुझे अपनी बाँहों में खींच लिया। उसने लम्पट अन्दाज़ में मुझसे कहा, "अगर मैंने तुम्हारा फ़ायदा नहीं उठाया तो मैं अपना एक मौक़ा गँवा दूँगा!" बावजूद इसके कि मैं अपनी पूरी ताकत से जूझ रही थी, उसने मुझे ज़ोर से भींच लिया और तब तक भींचे रहा जब तक कि एक अन्य पुलिसवाले ने कहा कि "खिलवाड़ बन्द करो! हमें फुर्ती से इस मुहिम को पूरा करना चाहिए ताकि हमें इससे छुटकारा मिले।" तब जाकर उसने मुझे छोड़ा।

वे हमें पुलिस स्टेशन ले गये और वहाँ उन्होंने हमें एक छोटे-से कमरे में बन्द कर दिया, जिसके बाद उन्होंने हम में से हर एक को अलग-अलग स्टील की कुर्सियों में जकड़ दिया। जिस व्यक्ति को हम पर निगरानी रखने की ज़िम्मेदारी सौंपी गयी थी उसने सख़्ती के साथ हमसे हमारे नाम और पते पूछे। मैं घबरायी हुई थी और समझ नहीं पा रही थी कि मुझे क्या कहना चाहिए, इसलिए मैंने ख़ामोश रहकर परमेश्वर से प्रार्थना करते हुए उससे बुद्धि देने और सही बातें कहने की शक्ति देने का अनुरोध किया। तभी परमेश्वर के इन वचनों ने मुझे प्रबुद्ध किया: "हमेशा परमेश्वर के परिवार की बातों को सर्वाधिक महत्व देना, फिर चाहे तुम कुछ भी क्यों न कर रहे हो, परमेश्वर के अवलोकन को स्वीकार करना और परमेश्वर के प्रबंधनों के प्रति समर्पण करना" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध कैसा है?")। यह सही है! मुझे परमेश्वर के परिवार के हितों को सबसे ऊपर रखना है। वे मुझे कितनी ही यातना क्यों न दें या कितना ही क्यों न तड़पायेँ, मैं अपने भाइयों और बहनों के साथ छल नहीं कर सकती, न ही मैं यहूदा बनकर परमेश्वर के साथ विश्वासघात कर सकती। मुझे दृढ़तापूर्वक परमेश्वर में अपनी आस्था की सार्वजनिक उद्घोषणा करनी थी। इसके बाद, उसने मुझसे जिस किसी भी तरह से पूछताछ की, मैंने उसकी उपेक्षा की। अगली सुबह, जब वे हमें नज़रबंदी केंद्र ले जाने वाले थे, तब उस लम्पट पुलिस अधिकारी ने कहा, "तुम्हें पकड़ने के लिए हमने बड़ा जाल बिछाया था! हम तब तक खोजते रहे जब तक तुम मिल नहीं गयीतुम्हें!" मुझे हथकड़ियाँ पहनाते हुए उसने मेरे स्तनों को छुआ, जिससे मैं आगबबूला हो उठी। मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि जनता की पुलिस इस तरह दिन-दहाड़े मेरे साथ अत्याचार करेगी। वे निरे गुण्डे और डकैत थे! यह सब वाक़ई कुत्सित और घृणित था!

नज़रबंदी-गृह में, मुझसे मेरे घर का पता और परमेश्वर में मेरे विश्वास के बारे में जानकारी उगलवाने के उद्देश्य से पुलिस ने पहले एक स्त्री अधिकारी को भेजा ताकि वह एक भली पुलिसकर्मी का नाटक कर मुझे फुसलाये और मेरी ख़ुशामद करे। जब उनको लगा कि उनकी यह युक्ति काम नहीं आ रही, तो उन्होंने जबरन मेरा एक वीडियो तैयार किया, और कहा कि वे वह वीडियो लेकर टीवी स्टेशन जाएँगे और उसको प्रसारित कर मेरी इज़्ज़त को बर्बाद कर देंगे। लेकिन, मैं जानती थी कि मैं तो महज़ परमेश्वर में आस्था रखने वाली एक स्त्री हूँ जिसने हमेशा सत्य की साधना की थी और जीवन के सच्चे रास्ते पर चली थी, और मैंने कभी भी न तो कोई शर्मनाक काम किया था न कभी कोई गै़रक़ानूनी या अपराधिक कृत्य किया था, इसलिए मैंने आक्रामक लहज़े में जवाब दिया, "तुम्हें जो करना हो करो!" जब उन दुष्ट पुलिसवालों ने देखा कि उनकी यह युक्ति भी काम नहीं आ रही है, तो उन्होंने मुझे क्रूर यातना देने का फै़सला किया। मुझस एक पेशेवर अपराघी की तरह पेश आते हुए उन्होंने मुझे 5 किलो वज़न की हथकड़ियों और बेड़ियों में जकड़ दिया, और फिर वे मुझे एक गाड़ी की ओर ले गये जो मुझे पूछताछ के लिए ले जाने वाला था। मेरे पैरों में पड़ी बेड़ियाँ इतनी भारी थीं कि चलते हुए मुझे उनको अपने साथ घसीटना पड़ रहा था। चलना बहुत मुश्किल था, और कुछ ही क़दम चलने के बाद मेरे पैरों की चमड़ी घिस-घिस कर छिल गयी। जैसे ही हम गाड़ी में सवार हुए, उन्होंने तुरन्त ही मेरे सिर को एक काले थैले से ढँक दिया, और मुझे दो अधिकारियों के बीच में ज़रा-सी जगह में बैठा दिया गया। सदमे में मैंने घातसहसा मन-ही-मन सोचा, "इन दुष्ट पुलिसवालों में इंसानियत नाम की कोई चीज़ नहीं है, कौन जाने ये मेरे साथ किस तरह का क्रूरतापूर्ण बर्ताव करेंगे। जो कुछ वे करेंगे उसे अगर मैं सह न सकी तो क्या होगा?" इसलिए मैंने जल्दी से परमेश्वर से प्रार्थना की: "सर्वशक्तिमान परमेश्वर! मैं जिन परिस्थितियों का सामना करने जा रही हूँ उनके सामने मेरा शरीर बहुत कमज़ोर है। कृपया मेरी रक्षा कर और मुझे आस्था प्रदान कर। चाहे मुझे जो भी यातना दी जाए, मैं तुझे संतुष्ट करने के लिए तेरी गवाह देने में अडिग बनी रहना चाहती हूँ, तेरे साथ विश्वासघात करने से पूरी तरह इन्कार करती हूँ।" हम एक इमारत में दाख़िल हुए और उन्होंने मेरे सिर पर पड़ा थैला हटा दिया, और फिर मुझे पूरे दिन खड़े रहने का आदेश दिया। उस शाम, एक पुलिस अधिकारी मेरे सामने पालथी मारकर बैठ गया और उसने जंगली लहज़े में मुझसे कहा, "मेरा साथ देते हुए मेरे सवालों का जवाब दोगी, तो तुम्हें रिहा कर दिया जाएगा। तुम कितने वर्षों से परमेश्वर में विश्वास करती आ रही हो? तुम्हें इसका उपदेश किसने दिया था? तुम्हारे कलीसिया का मुखिया कौन है?" जब मैंने जवाब नहीं दिया तो वह गुस्से से चिल्लाया, "लगता है जब तक हम तेरा मुँह खुलवाने के दूसरे तरीक़े तुझे अच्छे से नहीं बताते, तब तक तू जवाब नहीं देगी!" उसने मुझे आदेश दिया कि मैं अपने दोनों हाथ सिर के ऊपर उठाकर बिना हिले-डुले खड़ी रहूँ। जल्दी ही मेरी बाँहें दुखने लगीं, और मुझे उनको ऊपर उठाये रखना मुश्किल हो गया, लेकिन वह मुझे उनको नीचे झुकाने की इजाज़त नहीं दे रहा था। आख़िरकार जब मैं पसीने से भीग गयी और नीचे से ऊपर तक काँपने लगी, तब कहीं उसने मुझे मेरी बाँहों को नीचे झुकाने की इजाज़त दी, लेकिन तब भी उसने मुझे बैठने नहीं दिया। मुझसे भोर होने तक शान्त खड़े रहने को कहा गया, और तब तक मेरी टाँगें और पैर सुन्न हो चुके थे और सूज गये थे।

अगले दिन सुबह उन्होंने मुझसे फिर से पूछताछ शुरू कर दी, लेकिन मैंने उनको कुछ भी नहीं बताया। उन्होंने एक तरफ की मेरी (जंज़ीर वाली) हथकड़ियाँ हटा दीं, और फिर उनके नेता ने 10 सेंटीमीटर मोटे और 70 सेंटीमीटर लम्बे डंडे से मेरे घुटनों को वहशियाना ढंग से पीटना शुरू कर दिया, जिसने मुझे घुटनों के बल बैठने पर मजबूर कर दिया। तब उसने मेरे मुड़े हुए घुटनों के सूराख़ में पीछे से वह डंडा घुसेड़ दिया, फिर मेरी बाँहों को डंडे के नीचे खींचकर फिर से हथकड़ियाँ पहनने पर मजबूर कर दिया। मैंने तत्काल अपनी छाती में दबाव महसूस किया, मेरे लिए साँस लेना मुश्किल हो गया, मेरे कन्घों की शिराओं में इस क़दर खिंचाव महसूस हुआ कि वे टूटने-टूटने को हो गयीं। मेरी पिण्डलियों में इतना तनाव था कि लग रहा था वे तड़कने को थीं। यह सब इतना पीड़ादायी था कि मैं नीचे से ऊपर तक काँप रही थी। क़रीब तीन मिनट बाद, मैंने अपनी शारीरिक स्थिति के साथ सामंजस्य बिठाने की कोशिश की, लेकिन मैं खुद को सँभाल नहीं सकी, और, धड़ाम से अपनी पीठ के बल गिर पड़ी। कमरे में मौजूद चार पुलिसवालों में से एक ने दो अन्य पुलिसवालों को निर्देश दिया कि वे मेरे दोनों तरफ़ जाकर एक हाथ से डंडे को नीचे की ओर खीचें दूसरे हाथ से मेरे कन्घों को आगे की ओर धकेलें, और तीसरे पुलिसवाले को आदेश दिया कि वह अपने हाथों से मेरा सिर पकड़कर मेरी पीठ पर अपने जूतों की ठोकरें मारता रहे, ताकि मैं उस तरह उकड़ूँ बैठी रहूँ जिस तरह लगातार बैठे रहने के लिए उन्होंने मुझे आदेश दिया था। लेकिन मेरे सारे शरीर में असहनीय पीड़ा हो रही थी, मैं जल्दी ही फिर से लुढ़क गयी, जिसपर उन्होंने एकबार फिर मुझे उसी उकड़ूँ मुद्रा में बिठा दिया। मैं बारबार लुढ़कती रही और हर बार फिर से उकड़ूँ मुद्रा में बिठा दी जाती, और यह यातना लगभग एक घण्टे तक जारी रही, जिसके बाद अन्ततः जब उनकी साँसें फूलने लगीं और वे पसीने से भीग गये, तो उनके नेता ने कहा, "बस, बस, बहुत हो गया, अब मैं इस सबसे बहुत थक चुका हूँ!" तब कहीं जाकर उन्होंने यातना के उपकरणों को हटाया। मैं नीचे से ऊपर तक कमज़ोर महसूस कर रही थी, और पूरी तरह निढाल होकर फ़र्श पर पड़ी हाँफ रही थी। तब तक हथकड़ियाँ मेरी कलाईयों की चमड़ी को रगड़ चुकी थीं, और बेड़ियों के तले मेरे टखने ख़ून से तर हो चुके थे। मुझे इतना तेज़ दर्द हो रहा था कि मेरा सारा शरीर पसीने से भीगा हुआ था और थरथरा रहा था, और जब मेरा पसीना बहकर मेरे घावों में जाता था, तो ऐसा दर्द होता था जैसे चाकू से चीरा जा रहा हो। ऐसी घोर पीड़ा की हालत में मेरे पास मन ही मन यह पुकार लगाने के अलावा और कोई उपाय नहीं था, "हे परमेश्वर! मेरी रक्षा कर, मैं अब और बर्दाश्त नहीं कर सकती!" उस पल परमेश्वर के वचनों ने मुझे प्रबुद्ध किया "जब लोग अपने जीवन का त्याग करने के लिए तैयार होते हैं, तो सब कुछ तुच्छ हो जाता है, और कोई भी उनका लाभ नहीं उठा सकता। जीवन से अधिक महत्वपूर्ण क्या हो सकता है?" ("वचन देह में प्रकट होता है" में संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचनों के रहस्य की व्याख्या के "अध्याय 10")। परमेश्वर के वचनों ने मेरे मन में सारी स्थितियों को स्पष्ट कर दिया। शैतान जानता है कि लोग अपने शरीर को सँजो कर रखते हैं, और वे मौत से और भी ज़्यादा डरते हैं, इसलिए वह मेरे मन में मौत का ख़ौफ़ पैदा करने, और इस तरह मुझे परमेश्वर से विश्वासघात करने के लिए उकसाने की उम्मीद में मेरे शरीर को क्रूरतापूर्वक चोट पहुँचा रहा था। यह उसकी योजना थी, लेकिन परमेश्वर के प्रति मेरी आस्था और निष्ठा की परीक्षा लेने के लिए परमेश्वर शैतान की इस योजना का इस्तेमाल कर रहा था। परमेश्वर चाहता था कि मैं शैतान की मौजूदगी में उसकी गवाही दूँ, और इस तरह शैतान को अपमानित करूँ। जैसे ही मुझे परमेश्वर की इच्छा समझ में आ गयी, वैसे ही मैंने अपनी आस्था और शक्ति, और इसी के साथ-साथ दृढ़तापूर्वक खड़े होने और अपने जीवन की क़ीमत पर भी परमेश्वर की गवाही देने के संकल्प को फिर से हासिल कर लिया। जैसे ही मैंने परमेश्वर को सन्तुष्ट करने के लिए अपने जीवन को जोख़िम में डालने की शपथ ली, मेरी पीड़ा अत्यन्त कम हो गयी, और अब मैं उतना अधिक सन्तप्त और दुखी भी महसूस नहीं कर रही थी। इसके बाद, पुलिस ने मुझे खड़े होने का आदेश दिया, और गुस्से के साथ कहा, "मैं समझता हूँ, मैंने तुझसे खड़े रहने को कहा था! देखते हैं तू कितनी देर टिकी रह पाती है!" इस तरह, उन्होंने मुझे अँघेरा होने तक वहीं खड़े रहने के लिए मजबूर किया। शाम को, जब मैं गुसलख़ाने गयी, तो मेरे पैर सूजे हुए थे और बेड़ियों में पड़े रहने की वजह से जमे हुए ख़ून से रँगे हुए थे, इसलिए मैं फ़र्श पर एक बार में थोड़ी-थोड़ी दूर तक अपने पैरों को घसीट भर पा रही थी। मेरे लिए चलना बेहद मुश्किल था, क्योंकि हर बार जैसे ही मैं चलती थी, मुझे अपने पैरों में तीखा दर्द होता था, और हर क़दम के साथ ताज़े ख़ून की साफ़ लकीर बनती जाती थी। गुसलख़ाने तक चलकर जाने और वापस आने की 30 मीटर की दूरी पार करने में मुझे क़रीब एक घण्टे का वक़्त लगा। उस रात मुझे अपने सूजे हुए पैरों को अपने हाथों से रगड़ते रहना पड़ा, और चाहे मैं उनको अपने क़रीब सिकोड़ती या फैलाती, दोनों ही दशाओं में उनमें तक़लीफ़ बनी रही। मैं चरम पीड़ा की हालत में थी, लेकिन जिस चीज़ से मुझे तसल्ली मिल रही थी वह यह थी कि, चूँकि मुझे परमेश्वर का संरक्षण मिला हुआ था, इसलिए मैंने परमेश्वर के साथ विश्वासघात नहीं किया था।

तीसरे दिन सुबह इन दुष्टपुलिसवालों ने मुझे यातना देने के लिए फिर से वही तरीक़ा इस्तेमाल किया। हर बार जब भी मैं लुढ़कत तो मुख्य पुलिसवाला बुरे ढंग से हँसता और कहता, "ये टपकना तो मज़ेदार था! एक बार और हो जाए!" और फिर वे मुझे उठाते, और मैं फिर गिर जाती, और वह कहता, "मुझे तुम्हारी यह मुद्रा पसन्द है, ये अच्छी लगती है। एकबार फिर से करो!" वे लगभग एक घण्टे तक मुझे इसी तरह यातना देते रहे, जिसके बाद वे अन्ततः थक कर रुक गये, उनके माथों से पसीना बह रहा था। मैं फ़र्श परपीठ के बल ढेर होकर ऐसा महसूस कर रही थी मानो आसमान घूम रहा हो। मैं खुद को काँपने से नहीं रोक पा रही थी, खारे पसीने की धाराओं की वजह से मैं आखें नहीं खोल पा रही थी, और मेरा पेट इस बुरी तरह घुमड़ रहा था कि मुझे उल्टी करने को मन हो रहा था। मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मैं मरने ही वाली हूँ। यही वह क्षण था जब परमेश्वर के ये वचन मेरे दिमाग़ में कौंधे: "'क्योंकि हमारा पल भर का हल्का सा क्लेश हमारे लिये बहुत ही महत्वपूर्ण और अनन्त महिमा उत्पन्न करता जाता है।' ...यह बड़ा लाल अजगर परमेश्वर को सताता है और परमेश्वर का शत्रु है, इसलिए इस देश में, जो परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, उन्हें अपमानित किया जाता और सताया जाता है। इस कारण ये वचन तुम्हारे समूह के लोगों में वास्तविकता बन जाएंगे" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "क्या परमेश्वर का कार्य उतना सरल है, जितना मनुष्य कल्पना करता है?")। परमेश्वर के वचनों ने मुझे समझाया कि दैत्यों द्वारा शासित चीन जैसे एक देश में, जहाँ परमेश्वर में विश्वास करने और परमेश्वर का अनुसरण करने से यह तय हो जाता है कि आपको बहुत ज़्यादा अपमान और नुकसान झेलना पड़ेगा, वहाँ परमेश्वर इस उत्पीड़न का इस्तेमाल विजेताओं का एक समूह तैयार करने और इस तरह शैतान को पराजित करने के लिए करता है।और यह ठीक वह वक़्त है जब हमें परमेश्वर की महिमा को प्रकाशित करना और उसकी गवाही देनी चाहिए। परमेश्वर की महिमा की ख़ातिर मैं अपनी यह भूमिका निभा सका यह मेरा सौभाग्य था। परमेश्वर के वचनों का मार्गदर्शन पा कर, मैंने न सिर्फ़ एक सशक्त बल प्राप्त किया, बल्कि मन ही मन शैतान के सामने यह ऐलान भी किया कि "घृणित दैत्य, मैंने स्वयं को मजबूत बना लिया है, और तू मुझे चाहे कितनी ही यातना दे, मैं तेरे सामने नहीं झुकूँगी। अगर मैं मर भी जाती हूँ, तब भी मैं परमेश्वर के संग खड़े होने की शपथ लेती हूँ।" जब मुख्य अधिकारी ने देखा कि मैं अब भी उसके सवालों के जवाब नहीं दे रही थी, तो उसने तमकते हुए वह डंडा हटा लिया और गुस्से से भरकर बोला, "अब तू खड़ी हो जा! देखते हैं कि तेरी यह अकड़ कब तक टिकती है। हम तेरे साथ लम्बा खेल खेलेंगे। मुझे पूरा यक़ीन है कि हम तुझे वश में कर लेंगे!" मेरे पास तड़पते हुए अपने पैरों के बल उठ खड़े होने के सिवा और कोई चारा नहीं था, लेकिन मेरे पैर इतने सूजे हुए और दर्दनाक हालत में थे कि मैं तनकर खड़ी नहीं हो सकी, और मुझे दीवार का सहारा लेना पड़ा। उस दोपहर,मुख्य अधिकारी ने मुझसे कहा, "जब दूसरे लोग 'इस झूले को झूलते हैं' तो वे सब पहली बार में ही मुँहखोल देते हैं। तू तो काफ़ी मार सह सकती है! ज़रा अपने पैरों की हालत देख, और तू अब भी मुँह नहीं खोल रही है। मेरी समझ से परे है कि तुझे यह ताक़त कहाँ से मिल रही है...।" उसके बाद, उसने फिर मेरी ओर देखा और चिल्लाया, "मैंने बहुत-से लोगों से उनके राज़ उगलवाये हैं, और तू है कि मुझसे लड़ने की गुस्ताख़ी कर रही है? हह! अगर हम तेरा मुँह नहीं भी खुलवा पाते हैं, तब भी हम तुझे 8 से 10 साल के लिए जेलतो भेज ही सकते हैं, और हम तुझे हर दिन कै़दियों से गालियाँ दिलवाएँगे और पिटवाएँगे! हम तुझे ठीक कर ही देंगे!" जब मैंने उसे यह कहते सुना, "तो मैंने सोचा, परमेश्वर मेरे साथ है, इसलिए अगर तुम मुझे 8 या 10 साल के लिए जेल भी भेज देते हो, तो भी मुझे भय नहीं है।" जब मैंने जवाब नहीं दिया, तो उसने अपनी जाँघ पर हाथ मारा, अपना पैर पटका, और कहा, "हमने तेरी हिम्मत तोड़ने में कई दिन गँवा दिये हैं। अगर हर कोई तेरे जैसा होता, तो मैं अपना काम कैसे कर पाता?" जब मैंने उसे यह कहते सुना, तो मैं मन ही मन मुस्करायी, क्योंकि शैतान नपुंसक था, जो परमेश्वर के हाथ बुरी तरह पराजित हुआ था! उस पल मैं परमेश्वर के इन वचनों के बारे में सोचे बिना नहीं रह सकी: "परमेश्वर की जीवन शक्ति किसी भी शक्ति पर प्रभुत्व कर सकती है; इसके अलावा, वह किसी भी शक्ति से अधिक है। उसका जीवन अनन्त काल का है, उसकी सामर्थ्य असाधारण है, और उसके जीवन की शक्ति आसानी से किसी भी प्राणी या शत्रु की शक्ति से पराजित नहीं हो सकती" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "केवल अंतिम दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनन्त जीवन का मार्ग दे सकता है")। परमेश्वर का एक-एक वचन सत्य है, और उस दिन इस बात को मैंने निजी तौर पर अनुभव किया। पिछले तीन दिनों से मैंने न तो कुछ खाया-पिया था और न हीमैं सोयी थी, और मुझे बुरी तरह यातना दी गयी थी, और तब भी मैं प्रतिरोध कर रही थी, और यह सब पूरी तरह से उस ताक़त की वजह से था जो मुझे परमेश्वर द्वारा प्रदान की गयी थी। परमेश्वर मेरी रखवाली कर रहा था और मुझे बचा रहा था। परमेश्वर के मजबूत सहारे के बिना मैं बहुत पहले टूट चुकी होती। परमेश्वर की जीवन-शक्ति में सचमुच असाधारण सामर्थ्य है, और परमेश्वर सचमुच सर्वशक्तिमान है! परमेश्वर के कर्मों की साक्षी होने के बाद शैतान के समक्ष परमेश्वर की गवाही देने की मेरी आस्था और भी मजबूत हो गयी थी।

चौथे दिन सुबह, उस दुष्ट पुलिस ने मुझे अपनी बाँहें सीधे रखते हुए आगे फैला कर अर्ध-अश्वमुद्रा में बैठने के लिए मजबूर किया, जिसके बाद उन्होंने लकड़ी का एक बेंत मेरे हाथों पर रख दिया। मैं इस मुद्रा में ज़्यादा देर नहीं रह सकी। मेरे हाथ लटक गये और वह बेंत फ़र्श पर गिर गया। उन्होंने बेंत उठाया और उससे मेरी अँगुलियों के जोड़ों और घुटनों पर बर्बरतापूर्वक प्रहार करने लगे, जिसकी हर चोट मुझे तीखे दर्द से भर दे रही थी, और इसके बाद उन्होंनेफिर से मुझे अर्ध-अश्वमुद्रा बैठे रहने के लिए मजबूर कर दिया। कई दिनों की यातना के बाद मेरे पैर पहले ही सूजे हुए थे और दर्द कर रहे थे, इसलिए पल भर उकड़ूँ बैठने के बाद, मेरे पैर मेरे वज़न को सह नहीं सके, और मैं बेतहाशा फ़र्श पर ढेर हो गयी। उन्होंने मुझे फिर से उठाया, लेकिन जैसे ही उनकी पकड़ छूटी मैं फिर से ढेर हो गयी। यह सिलसिला कई बार जारी रहा। मेरे चूतड़ पहले ही इतने छिल चुके थे कि वे इस तरह के फ़र्श के टकराव को सह नहीं सके, और मुझे इस क़दर दर्द हुआ कि मैं सिर से पैर तक पसीने से नहा गयी। उन्होंने लगभग एक घंटे तक मुझे इसी तरह यन्त्रणा दी। इसके बाद, उन्होंने मुझे फ़र्श पर बैठने का हुक्म दिया, फिर वे एक कटोरे में बेहद खारा पानी लेकर आयेऔर मुझसे वह पानी पीने को कहा। मैंने मना कर दिया, जिस पर उनमें से एक दुष्ट पुलिसवाले ने मेरे चेहरे को दोनों हाथों से पकड़ लिया, और दूसरे ने एक हाथ मेरे माथे पर रखा और दूसरे हाथ से जबरन मेरा मुँह खोला और वह पानी मेरे गले में उँडेल दिया। नमक का वह पानी मुझे अपने गले में बहुत तीखा और कसैला महसूस हुआ, तत्काल लगा जैसे पेट में आग लग गयी हो, और वह इतना असहनीय था कि मेरा मन रो पड़ने को हो रहा था। जब उन्होंने मेरी बेचैनी देखी, तो उन्होंने क्रूरतापूर्वक कहा, "नमक का पानी पी के बाद अब हम तुझ पर चोट करेंगे, तो तेरे शरीर से आसानी से ख़ून नहीं बहेगा।" यह सुनकर मेरे मन में क्रोघ का जो उबाल आया उसे मैं बमुश्किल रोक पायी। मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि चीन की ईमानदार पीपल्स पुलिस इतनी भयावह और दुष्ट हो सकती थी। इन दुष्ट दैत्यों का इरादा न सिर्फ़ मेरे साथ खिलवाड़ करने और मुझे नुकसान पहुँचाने का था, बल्कि वे मुझे अपमानित भी करना चाहते थे। उस रात, इनमें से एक दुष्ट पुलिसवाला मेरे पास आकर अश्वमुद्रा में बैठ गया और उसने अश्लील शब्द बोलते हुए अपने हाथ से मेरे चेहरे को छुआ। मैं इस क़दर आगबबूला हो उठी कि मैंने सीधे उसके मुँह पर थूक दिया। वह बुरी तरह भड़क उठा और उसने मुझे जोर से थप्पड़ जड़ दिया, जिससे मेरी आँखों के सामने तारे नाच गये और कान सनसना उठे। इसके बाद उसने धमकाने वाले लहज़े में कहा, "तूने अभी तक पूछताछ की हमारी बाक़ी तकनीकों का तजुरबा नहीं लिया है। अगर तू यहाँ मर जाती है, तो किसी को कुछ पता नहीं चलेगा। सब कुछ सच-सच उगल दे, नहीं तो हमारे पास अभी बहुत से ऐसे खेल हैं जो हम तेरे साथ खेल सकते हैं!" उस रात, मैं हिलने-डुलने में पूरी तरह असमर्थ फ़र्श पर पड़ी रही। मैं गुसलख़ाने जाना चाहती थी, तो उन्होंने मुझसे खुद ही उठकर खड़े होने को कहा। अपनी पूरी ताक़त लगाते हुए मैंखड़ी तो हुई, लेकिन महज़ एक क़दम चलने के बाद ही फिर से ढेर हो गयी। मैं हिल-डुल नहीं पा रही थी, इसलिए एक महिला पुलिसकर्मी को मुझे घसीटते हुए गुसलख़ाने तक ले जाना पड़ा, जहाँ मैं फिर से बेहोश हो गयी। जब मैं जागी, तो मैं वापस अपने कमरे में थी। मैंने देखा कि मेरे पैर इतने सूजे हुए थे कि मेरी चमड़ी चमकने लगी थी, हथकड़ियाँ और बेड़ियाँ मेरी कलाइयों और एड़ियों की चमड़ी से कस गयी थीं, घावों से ख़ून और मवाद रिस रहा था, और दर्द इतना था कि वह मेरे बयान की सामर्थ्य से बाहर था। मैंने यातना की उन बाक़ी तकनीकों के बारे में सोचा जिनका इस्तेमाल करने की बात उस अधिकारी ने की थी जिसने मेरा चेहरा छुआ था, और मैं कमज़ोर महसूस किये बिना नहीं रह सकी, इसलिए मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की: "परमेश्वर! मैं नहीं जानती कि मुझे सताने के लिए ये पिशाच और क्या करेंगे, और अब मैं और नहीं टिकी रह सकती। कृपया मेरा मार्गदर्शन कर, मुझे आस्था दे, मुझे सामर्थ्य दे, और मुझे गुंजाइश दे कि मैं तेरी गवाही दे सकूँ।" प्रार्थना करने के बाद, मैंने उस पीड़ा को याद किया जो परमेश्वर ने तब भोगी थी जब उसने मानव-जाति की रक्षा की ख़ातिर दो बार देहधारणकिया था: अनुग्रह के युग में, मानव-जाति को छुटकारा दिलाने के लिए, प्रभु यीशु के साथ खिलवाड़किया गया था, उनको पीटा गया था, सैनिकों और भीड़ द्वारा अपमानित किया गया था, उनको काँटों का ताज पहने को मजबूर किया गया था, और अन्ततः जीते जी उनको सलीब पर कीलों से ठोंक दिया गया था; आज, परमेश्वर ने नास्तिकों के एक मुल्क में काम करने के लिए देहधारण कर और भी बड़ा जोख़िम उठाया है और, उसने उत्पीड़न और सीसीपी सरकार द्वारा गिरफ़्तार किये जाने को ख़ामोश बने रह कर, बिना कोई शिकायत किये सहा है, और इसी के साथ-साथ वह धार्मिक जगत के वहशी प्रतिरोध, तिरस्कार, और निन्दा को सह रहा है। मैंने एकबर फिर परमेश्वर के वचनों को याद किया: "इस समय तुम लोग जिस पीड़ा से गुज़र रहे हो, क्या यह वही परमेश्वर की पीड़ा नहीं है? तुम परमेश्वर के साथ पीड़ा सहते हो, और परमेश्वर उनकी पीड़ा में लोगों के साथ है, है न? आज तुम सब की मसीह के क्लेश, राज्य और धैर्य में एक भूमिका है, और अंत में तुम महिमा प्राप्त करोगे। इस प्रकार का दुख सार्थक है, है न? संकल्प नहीं होने से काम नहीं चलेगा। तुम्हें आज के दुखों के महत्व को समझना होगा और समझना होगा कि तुम्हें क्यों पीड़ा सहने की आवश्यकता है। इस में थोड़ा-सा सत्य ढूंढों और थोड़ा-सा परमेश्वर के इरादे को समझो, और उसके बाद तुम्हें पीड़ा सहन करने का संकल्प मिलेगा" ("मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "केवल सत्य की खोज करके ही तू अपने स्वभाव में परिवर्तन को प्राप्त कर सकता है")। यह सही है कि जिस पीड़ा से मैं गुज़र रही हूँ, उसको परमेश्वर ने बहुत पहले सहा था। परमेश्वर निर्दोष था, तब भी भ्रष्ट मानवजाति की रक्षा के लिए परमेश्वर ने हर तरह की यन्त्रणा और अपमान सहे थे, जबकि जो पीड़ा मैं भोग रही थी वह इसलिए थी कि मैं खुद ही पापों से सच्ची मुक्त हासिल नहीं कर सकी थी। इस मुद्दे पर क़रीब से विचार करते हुए, मुझे अहसास हुआ कि जो पीड़ा परमेश्वर ने सही थी उसके आगे मेरी अपनी पीड़ा तो शायद उल्लेखनीय भी नहीं है। हमारी रक्षा करने के लिए परमेश्वर ने जो यन्त्रणा और अपमान भोगे थे उनकी विशालता को मैंने अन्ततः समझ लिया, और महसूस किया कि मानवजाति के प्रति परमेश्वर का प्रेम सचमुच शक्तिशाली और निःस्वार्थ है! मैंने अपने हृदय में परमेश्वर के लिए आकांक्षा और लालसा महसूस की। मेरी पीड़ा के माध्यम से परमेश्वर ने मुझे उसके सामर्थ्य और अधिकार को और अधिक समझने, और इस बात को सराहने दिया कि उसके वचन मनुष्य की जीवन-शक्ति हैं, और वे मुझे किसी भीकठिनाई पर विजय पाने की राह दिखा सकते हैं; इस पीड़ा के माध्यम से परमेश्वर मेरी आस्था का परिष्कार भी कर रहा था, मेरी इच्छा-शक्ति को मजबूत कर रहा था, और मुझे मेरी कमियों को दूर करने की तथा मेरी अपनी अपूर्णताओं को पूर्णताओं में बदलने की गुंजाइश दे रहा था। मैंने परमेश्वर की इच्छा को समझ लिया और मुझे अहसास हो गया कि उस दिन जो पीड़ा मैंने भोगी थी वह परमेश्वर के अनुग्रह का एक महान उपहार था, और परमेश्वर मेरे साथ था, इसलिए मैं अकेली नहीं थी। मैं कलीसिया के इस भजन को याद किये बिना न रह सकी: "परमेश्वर मेरा सहारा है, मैं किससे डरूं? अंत तक शैतान के साथ लड़ने के लिए अपने जीवन को सौंपने की मैं प्रतिज्ञा करता हूं। परमेश्वर हमें उठाता है, हमें सब कुछ पीछे छोड़कर मसीह के लिए गवाही देने के लिए लड़ना चाहिए। परमेश्वर पृथ्वी पर अपनी इच्छा पूरी करेगा। मैं अपना प्यार और वफ़ादारी तैयार करूंगा और परमेश्वर को ये सब समर्पित करूंगा। जब वह महिमा में उतरेगा, तो मैं ख़ुशी से परमेश्वर की वापसी का स्वागत करूंगा, और जब मसीह का राज्य साकार होगा, मैं उससे फिर से मिलूंगा" (मेमने का अनुसरण करना और नए गीत गाना में "राज्य")।

पाँचवें दिन, इस दुष्टपुलिस ने मुझे उसी अर्ध-अश्वमुद्रा मुद्रा में बने रहने को बाध्य किया। मेरी टाँगें और पैर पहले से ही इतने सूजे हुए थे कि मैं बिल्कुल भी खड़ी नहीं हो पा रही थी, इसलिए पुलिस ने मुझे चारों ओर से घेर लिया और वे मुझे एक-दूसरे की ओर धकेलने लगे। उनमें से कुछ ने मेरी हालत का नाजायज़ फ़ायदा उठाते हुए मुझे अश्लील ढंग से छुआ। एक गुड़िया की तरह वे मेरे साथ खिलवाड़ कर रहे थे और मैं सुन्न बनी रहकर उनको यह करने देने की छूट देने के अलावा और कुछ नहीं कर पा रही थी। मैं पहले ही उस इन्तिहा तक सतायी जा चुकी थी कि मेरा सिर घूम रहा था और मेरी दृष्टि धुंधला गयी थी। लेकिन ठीक उस क्षण जब मेरे लिए और अधिक सह पाना असम्भव हो गया, तभी मैंने दरवाज़े के बाहर क़दमों की आहट सुनी, जिसके बाद वे दरवाज़े की ओर भागे, उन्होंने उसे बन्द किया, और अपना वह क्रूरतापूर्ण खेल रोक दिया। मैं जानती थी कि यह परमेश्वर था जो मुझ पर दया दिखा रहा था, और वह मेरी पीड़ा को कम कर रहा था। उस रात, उनमें से एक दुष्टपुलिसवाला मेरे पास आया, उसने अपना जूता उतारा, और अपना बदबूदार पैर मेरे चेहरे के सामने कर लम्पट तरीक़े से बोला, "यहाँ बैठी-बैठी तू किसके बारे में सोच रही है? मर्दों के बारे में? तो, ये कैसा है? तुझे मेरे पैर की बू कैसी लग रही है? मैं समझता हूँ कि यह मेरे पैर की बदबू ही है जिसकी तुझे याद आती रही है!" उसकी गन्दी ज़ुबान ने मुझे गुस्से से भर दिया। मैंने आँखें तरेरते हुए उसकी ओर देखा, और जब उसके बेशर्म, घृणित चेहरे पर मेरी निगाह पड़ी, तो मैंने याद किया कि किस तरह मुझे बारबार स्वेच्छाचारी ढंग से प्रताड़ित और अपमानित किया जाता रहा था। उनमें मानवता का पूरी तरह अभाव था, वे पशुओं से भी बदतर थे, वे विवेक से पूरी तरह रिक्त दैत्यों के झुण्ड से ज़्यादा कुछ नहीं थे, और मैं इन पिशाचों के प्रति नफ़रत से भर उठी। इन पिछले कई दिनों के अपने निजी अनुभव के माध्यम से मैंने यह समझ लिया था जिस पीपल्स पुलिस को मैं अतीत में सम्मानीयता के आदर्श के रूप में देखती रही थी वे निर्लज्ज खलनायकों के सिवा और कुछ नहीं थे, और इस अहसास ने मुझे शैतान को त्याग देने और अडिग बने रहने और परमेश्वर को सन्तुष्ट करने के लिए उसकी गवाही देने संकल्प प्रदान किया।

छठवें दिन से मैं अनायास ही सोने लग गयी। मुख्य अधिकारी ने गर्व के साथ ऐलान किया, "आखिरकार तूने सोना शुरू कर दिया! तू सोना चाहती है? भूल जा! जब तक हम तेरा मुँह नहीं खुलवा लेते तब तक नींद का तो सवाल ही नहीं! देखते हैं तू कब तक टिकी रह पाती है!" वे बारी-बारी से मुझपर निगाह रखने लगे, और मैं जैसे ही अपनी आँखें बन्द करती या ऊँघना शुरू करती, वे मेज़ पर चाबुक मारकर आवाज़ करते, या लकड़ी की पतली छड़ी से मेरे उन पैरों पर चोट करते, जो इतने सूजे हुए थे कि उनकी चमड़ी चमक रही थी, या फिर वे झपटकर मेरे बाल खींच देते, या मेरा पैर कुचल देते, और हर बार मैं चौंककर जाग जाती। कभी-कभी वे मेरी बेड़ियों पर भी ठोकर मार देते थे, और जब मेरी बेड़ियाँ मवाद से भरे मेरे घावों को छूतीं, तो उससे होने वाला दर्द ही मुझे जगाये रखने के लिए काफ़ी होता था। आखिर में मेरे सिर में इतना दर्द उठा कि लगा वह फट जाएगा, वह कमरा मुझे घूमता हुआ महसूस होने लगा, और मैं सिर के बल फ़र्श पर गिर पड़ी और बेहोश हो गयी...। बेहोशी के उस धुंधलके में मैंने डॉक्टर को कहते हुए सुना, "आपने इसे कई दिनों से खाने-पीनेया सोने नहीं दिया है? आप कुछ ज़्यादा ही कठोरता बरत रहे हैं। और ये बेड़ियाँ मांस में धंस चुकी हैं। यह इनको अब और नहीं पहने रह सकती।" डॉक्टर के जाने के बाद, पुलिस ने मुझे 2.5 किलो की बेड़ियाँ डाल दीं और दवा दी, और तब कहीं जाकर मैं होश में आयी। मैं जानती थी कि मैं केवल परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता की वजह से ही जीवित बची थी, और इसलिए कि परमेश्वर गुप्त ढंग से मेरी रक्षा कर रहा था, डॉक्टर की मार्फ़त बोलते हुए मेरे दर्द को सहनीय और मेरी यातना को कम कर रहा था। परमेश्वर में मेरी आस्था कहीं ज़्यादा बढ़ गयी थी, और मैंने अपने भीतर आख़िरी क्षण तक शैतान से लड़ने का संकल्प पाया। परमेश्वर मेरा मजबूत सहारा और मेरी शरण था। मैं जानती थी कि शैतान मुझे कितनी ही यातना क्यों न दे, परमेश्वर की इजाज़त के बिना वह मेरा जीवन नहीं छीन सकता था।

सातवें दिन की सुबह मैं इतना थक चुकी थी कि और अधिक सह पाना सम्भव नहीं था, और मैं बार-बार सो जाती थी। एक दुष्ट पुलिसवाला मेरी यह हालत देख रहा था और लगातार मेरे पैर के अँगूठे को कुचल रहा था, मेरे हाथ के पीछे चिकोटी काट रहा था, और मेरे चेहरे पर थप्पड़ मार रहा था। उस दोपहर,दुष्टपुलिस ने एक बार फिर मुझसे कलीसिया के बारे में जानकारी की माँग की। मैंने तुरंत परमेश्वर से प्रार्थना की, "हे परमेश्वर! मैं नींद से इस क़दर वंचित हूँ कि साफ़ सोच नहीं पा रही हूँ। कृपया मेरी रक्षा कर और मुझे एक स्पष्ट दिमाग़ प्रदान कर, ताकि मैं हमेशा तेरी गवाही देती रह सकूँ।" परमेश्वर के संरक्षण की बदौलत, भोजन, पानी और नींद के बिना सात दिन और छह रातों तक जागते रहने के बावजूद, मेरा दिमाग़ एकदम साफ़ हो गया, और उनके हर तरह के बहकावे के बावजूद मैंने तब भी उनको कुछ नहीं बताया। उसके बाद, मुख्य पुलिस अधिकारी ने धर्म-प्रचारक कर्मचारियों की वह सूची निकाली जो मैंने तैयार की थी, और फिर उसने मुझसे बलात् दूसरे नाम उगलवाने की कोशिश की। लेकिन इन लोगों द्वारा बरती गयी क्रूरता को अनुभव करने के बाद मैं अपने किन्हीं भी भाई-बहनों को उनके हाथ नहीं लगने देने वाली थी, इसलिए मैंने परमेश्वर से गुहार लगायी कि वह मुझे ताक़त दे, और जब उस पुलिसवाले का ध्यान मेरी तरफ़ नहीं था, मैं आगे की ओर झपटी, नामों की वह सूची पकड़ी, उसको अपने मुँह में ठूँसकर गुटक लिया। दो दुष्टपुलिसवाले मुझे गाली देते हुए तेज़ी से आगे बढ़े और उन्होंने जबरन मेरा मुँह खोलने की कोशिश की और निर्दयतापूर्वक मेरे चेहरे पर थप्पड़ मारे। इन प्रहारों की वजह से मेरे मुँह के कोनों से ख़ून बहने लगा, मेरा सिर चकरा गया, और चेहरा सूज गया।

इस निस्सार पूछताछ के कई दौर बीत जाने के बाद, उनके पास हार मान लेने के अलावा कोई चारा नहीं था, इसलिए उन्होंने मुझे वापस नज़रबन्दी गृह में भेज दिया। नज़रबन्दी गृह के पुलिसवालों ने देखा कि मैं किस क़दर ज़ख़्मी थी, और वे डरे हुए थे कि अगर मैं वहाँ मर गयी तो इसकी ज़िम्मेदारी उनके सिर न आन पड़े, इसलिए उन्होंने मुझे लेने से इन्कार कर दिया। पूछताछ करने वाले वे दुष्ट, हताष होकर मुझे ऑक्सीजन देने के लिए अस्पताल ले जाने पर मजबूर हुए। उसके बाद, वे मुझे नज़बन्दी गृह में वापस छोड़ गये, और मैं चार दिन और चार रातों तक अचेत अवस्था में पड़ी रही। दूसरे कै़दियों द्वारा जगाये जाने के बाद मैं फिर दो बार और बेहोष हुई। अन्ततः सीसीपी सरकार ने मुझे "शी जियाओ संगठन में शामिल होने" के जुर्म में सश्रम कारावास में फिर से शिक्षित होने की एक साल नौ महीने की सज़ा सुना दी। लेकिन, चूँकि मुझे बुरी तरह यातना दी गयी थी, इसलिए मैं पक्षाघात की शिकार हो गयी थी और चल नहीं पाती थी, और लेबर कैम्प मुझे स्वीकार करने को तैयार नहीं था, इसलिए पुलिस ने टेलिविज़न पर मेरा एक वीडियो प्रकाशित कर दिया। तीन महीने बाद, अन्ततः मेरे पति को पता चल पाया कि मेरे साथ क्या हुआ था और उसने जेल से मेरी निगरानीयाफ़्ता रिहाई के लिए जमानत पर 12,000 युआन ख़र्च किये। जब मेरे पति मुझे लेने आये, तो मैं इतनी ज़ख़्मी थी कि चल नहीं पा रही थी, इसलिए उन्हेंमुझे उठाकरकार तक ले जाना पड़ा। घर लौटने के बाद, मेरी जाँच करने वाले डॉक्टरों ने पाया कि मेरी रीढ़ की दो डिस्कें अपनी जगह से खिसक चुकी थीं, कि मैं भविष्य में खुद अपने बल पर अपने काम नहीं कर पाऊँगी, और मैं जीवन भर के लिए पंगु हो चुकी थी, लेकिन परमेश्वर की कृपा से और निरन्तर जारी रहे इलाज़ की वजह से एक साल बाद मेरा शरीर धीरे-धीरे चंगा होने लगा। मैं सच्चे अर्थों में परमेश्वर की सर्वशक्तिमान सामर्थ्यऔर मेरे लिए उसके प्रेमकी गवाह थी। परमेश्वर की शुक्रगुज़ार हूँ कि मैं एक सृजित प्राणी के रूप में फिर से अपने कर्तव्यों को निभाने के क़ाबिल हो सकी!

बावजूद इसके कि मैंने अधिकतम सीमा तक पीड़ा का अनुभव किया था, इन दुखों और कठिनाइयों के माध्यम से मैंने जीवन-धन भी हासिल किया था। मैंने न सिर्फ़ सीसीपी सरकार के राक्षसी सार को स्पष्ट रूप से देख लिया था बल्कि इससे ज़्यादा महत्वपूर्ण रूप से मैंने परमेश्वर के आश्चर्यजनक कर्मों को भी देख लिया था, मैंने परमेश्वर के वचनों की प्रभुता और सामर्थ्य को देख लिया था, और मैंने परमेश्वर की जीवन-शक्ति की असाधारणता तथा उसके विस्तार को महसूस कर लिया था: यह परमेश्वर ही था जिसने मेरे सबसे कमज़ोर और सबसे ज़्यादा असहाय क्षणों में मुझे शक्ति और साहस प्रदान किया, और जिसने मुझे शैतान की अन्धकार की शक्तियों से आज़ाद होने की आस्था प्रदान की; जब मेरा शरीर और अधिक यातना और प्रताड़ना नहीं सह पा रहा था, तब परमेश्वर ने मेरे बोझ को हल्का करने के लिए लोगों, परिस्थितियों, और घटनाओं का इन्तज़ाम किया; जब मैं दैत्यों द्वारा दी गयी यातना की वजह से अपनी चेतना खो बैठी थी, तब परमेश्वर के विस्मयकारी कृत्य ने एक रास्ता खोल दिया और मुझे ख़तरे से सुरक्षित बाहर निकाल दिया...। इन सारी चीज़ों को अनुभव करने के बाद, मैंने देखा कि परमेश्वर मेरी रखवाली करता हुआ, मेरा बचाव करता हुआ, मेरे साथ-साथ चलता हुआ, हमेशा मेरे साथ रहा था। मेरे प्रति परमेश्वर का प्रेम सचमुच महान है! जब भी मुझे ज़रूरत होती है, तबपरमेश्वर मेरे जीवन की शक्ति, मेरा सहायक और सहारा होता है, और मैं परमेश्वर के लिए अपना शरीर और आत्मा समर्पित करने की, परमेश्वर को जानने की, और एक सार्थक जीवन जीने की कामना करती हूँ।

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