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परमेश्वर को जानने का तरीका

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परमेश्वर की बुद्धिमता और सर्व-शक्तिमत्ता के बारे में उसके आध्यत्मिक दुनिया के ऊपर नियंत्रण और प्रशासन के तथ्य से जानना

जब आत्मिक जगत की बात आती है, यदि इसमें इतने जीव कुछ गलत करते हैं, यदि वे अपना कार्य ठीक ढंग से नहीं करते हैं, तो परमेश्वर के पास उनसे निपटने के लिये उसी के अनुरूप स्वर्गिक धर्मादेश और निर्णय हैं-यह बात बिल्कुल सही है। तो परमेश्वर के हजारों काल के प्रबंधकीय कार्य के दौरान, जिन दूतों ने कुछ गलत किया था, उन्हें बाहर निकाल दिया गया, कुछ आज भी बंद हैं और दंडित किये जा रहे हैं – आत्मिक जगत में हर जीव को इसका सामना करना पडता है। यदि वे कुछ गलत करते हैं या कोई बुराई करते हैं तो वे दंडित किए जाते हैं – और यह ठीक वैसा ही है जैसा परमेश्वर अपने चुने हुए लोगों और सेवकाई करने वालों के साथ करता है। अत: चाहे वह आत्मिक संसार में हो या भौतिक संसार में, परमेश्वर जिन सिद्धांतों से काम करता है, वे बदलते नहीं हैं। चाहे जो हो तुम परमेश्वर के कामों को देख पाओ या नहीं, उसके सिद्धांत नहीं बदलते हैं। शुरु से ही हर चीज़ के प्रति परमेश्वर का दृष्टिकोण और चीज़ों के प्रबंधन के उसके सिद्धांत वही रहे हैं। यह अपरिवर्तनीय हैं। परमेश्वर उन अविश्वासी लोगों के प्रति भी उदार रहेगा जो अपेक्षाकृत सही तरीके से जीते हैं, और हर धर्म में उन लोगों के लिये अवसर बचाकर रखेगा जो सद्व्यवहार करते हैं और बुराई नहीं करते, उन्हें उन सब कामों में एक भूमिका देगा परमेश्वर जिन कामों का प्रबंध करता है, ताकि वे उन कामों को करें जो उन्हें करने चाहिए। ठीक उसी प्रकार, उन लोगों के बीच जो परमेश्वर का अनुसरण करते हैं, जो उसके चुने हुए लोग हैं, परमेश्वर इन सिद्धांतों के अनुसार, किसी भी व्यक्ति के साथ पक्षपात नहीं करता। जो कोई भी ईमानदारी से उसका अनुसरण करता है, वह उसके प्रति दयालु है, और वह उसे प्रेम करता है। अंतर केवल इतना है कि जो इस प्रकार के लोग हैं जैसे-अविश्वासी, विभिन्न आस्थाओं वाले लोग और परमेश्वर के चुने हुए लोग-वह जो उन्हें प्रदान करता है, वह भिन्न है। अविश्वासियों को ही लीजियेः हालांकि वे परमेश्वर पर विश्वास नहीं करते और परमेश्वर भी उन्हें ऐसे देखता है, जैसे मवेशी, सब बातों के बीच उनके पास खाने योग्य भोजन है, उनका अपना एक स्थान और जीवन और मृत्यु का सामान्य चक्र होता है। जो बुरा करते हैं वे दण्ड पाते और जो अच्छा करते हैं वे परमेश्वर से आशीष पाते और परमेश्वर की दया प्राप्त करते हैं। यह इस प्रकार से चलता है। आस्थावान लोगों के लिये, यदि वे हर जन्म में अपने धार्मिक विश्वासों का दृढ़ता से पालन करते रहें, तो इन सारे पुनर्जन्मों के बाद परमेश्वर अंततः इनके लिए अपनी उद्घोषणा करेगा। ठीक उसी प्रकार से प्रत्येक जो आज यहां पर है, चाहे वे परमेश्वर के चुने हुए लोग हों या सेवकाई करने वाले लोग हों, परमेश्वर उन्हें भी राह पर लाएगा और अपने द्वारा बनाए गए नियमों और प्रबंधनकारिणी निर्देशों के अनुसार उनके अंत का निर्णय करेगा। देखिए, ये जो विभिन्न प्रकार के लोग हैं, विभिन्न आस्थाओं के लोग, जो विभिन्न धर्मों को मानते हैं, क्या परमेश्वर ने उन्हें रहने का स्थान दिया है? यहूदी धर्म कहां है? क्या परमेश्वर उनके विश्वास में हस्तक्षेप करता है? बिल्कुल नहीं। और ईसाई धर्म का क्या? वह उसमें में बिल्कुल दखलअंदाजी नहीं करता। वह उन्हें उनके रिवाजों में बने रहने की अनुमति देता है और उनसे बात नहीं करता, और न ही किसी तरह का प्रकाशन देता है, और, उससे भी अधिक, वह उन पर कुछ भी प्रगट नहीं करता "यदि तुम सोचते हो कि यह सही है तो इसी तरह विश्वास करो!" कैथोलिक मरियम पर विश्वास रखते हैं, और मानते हैं कि वह मरियम ही थी जिसके द्वारा सुसमाचार यीशु तक पहुंचाया गया; यह उनकी आस्था का रूप है। और क्या कभी परमेश्वर ने उनके विश्वास को सुधारा? परमेश्वर उन्हें स्वत्रंत छोड़ दिया है, वह उन पर ध्यान नहीं देता और उन्हें उसमें जीने की आज़ादी दे दी है। और क्या मुसलमानों और बौद्धों के प्रति भी वह वैसा ही है? उसने उनके लिये भी एक दायरा तय कर दिया है, ताकि बिना किसी हस्तक्षेप के वे उस दायरे में अपनी आस्था का पालन करते हुए जी सकें। सब कुछ व्यवस्थित है। और इन सब में तुम क्या देखते हो? यही कि हर चीज़ पर परमेश्वर का अधिकार है, लेकिन वह उस अधिकार का दुरुपयोग नहीं करता। परमेश्वर सब बातों को आदर्श क्रम में लगाता है और सुव्यवस्थित है और इसमें उसकी बुद्धि और सर्वव्याप्ता वास करती है।

"वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी" से

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