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छुटकारे के कार्य और अंत समयों में न्याय के कार्य में व्यक्त किये गये परमेश्वर के स्वभाव के बीच कौन-कौन से अंतर हैं?

संदर्भ के लिए बाइबल के पद:

"वह सताया गया, तौभी वह सहता रहा और अपना मुँह न खोला; जिस प्रकार भेड़ वध होने के समय और भेड़ी ऊन कतरने के समय चुपचाप शान्त रहती है, वैसे ही उसने भी अपना मुँह न खोला" (यशायाह 53:7)।

"देख, यहूदा के गोत्र का वह सिंह जो दाऊद का मूल है, उस पुस्तक को खोलने और उसकी सातों मुहरें तोड़ने के लिये जयवन्त हुआ है" (प्रकाशितवाक्य 5:5)।

"क्योंकि वह आनेवाला है। वह पृथ्वी का न्याय करने को आनेवाला है, वह धर्म से जगत का, और सच्‍चाई से देश देश के लोगों का न्याय करेगा" (भजन संहिता 96:13)।

"देख, मैं शीघ्र आनेवाला हूँ; और हर एक के काम के अनुसार बदला देने के लिये प्रतिफल मेरे पास है" (प्रकाशितवाक्य 22:12)।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

यीशु ऐसा परमेश्वर था जिसने मनुष्य को बचाया। उसका स्वरूप अनुग्रह, प्रेम, करुणा, सहनशीलता, धैर्य, विनम्रता, देखभाल और सहिष्णुता था, और उसने जो इतना अधिक कार्य किया वह मनुष्य के छुटकारे के वास्ते था। जहाँ तक उसके स्वभाव की बात है, यह करुणा और प्रेम का था, और क्योंकि वह करुणामय और प्रेममय था, इसलिए उसे मनुष्य के वास्ते सलीब पर ठोंक दिया जाना था, ताकि यह दिखाया जाए कि परमेश्वर मनुष्य से उसी प्रकार प्रेम करता था जैसे वह स्वयं से करता था, इस हद तक कि उसने स्वयं को अपनी सम्पूर्णता में बलिदान कर दिया। …अनुग्रह के युग के दौरान, परमेश्वर का नाम यीशु था, अर्थात्, परमेश्वर ऐसा परमेश्वर था जिसने मनुष्य को बचाया, और वह एक करुणामय और प्रेममय परमेश्वर था। परमेश्वर मनुष्य के साथ था। उसका प्यार, उसकी करुणा, और उसका उद्धार हर एक व्यक्ति के साथ था। केवल यीशु के नाम और उसकी उपस्थिति को स्वीकार करके ही मनुष्य शांति और आनन्द प्राप्त करने, उसके आशीष को प्राप्त करने, उसके विशाल और विपुल अनुग्रह को प्राप्त करने, और उसके द्वारा उद्धार को प्राप्त करने में समर्थ था। यीशु को सलीब पर चढ़ाने के माध्यम से, उसका अनुसरण करने वाले सभी लोगों को उद्धार प्राप्त हुआ और उनके पापों को क्षमा कर दिया गया। "परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)" से

परमेश्वर ने शरीर में अनुग्रह के कार्य के एक चरण को पहले ही पूरा कर लिया है, और मनुष्य को भौतिक आशीषें प्रदान कर दी हैं - परंतु मनुष्य को केवल अनुग्रह, प्रेम और दया के साथ सिद्ध नहीं किया जा सकता। मनुष्य के अनुभवों में वह परमेश्वर के कुछ प्रेम का अनुभव करता है, और परमेश्वर के प्रेम और उसकी दया को देखता है, फिर भी कुछ समय तक इसका अनुभव करने के बाद वह देखता है कि परमेश्वर का अनुग्रह और उसका प्रेम और उसकी दया मनुष्य को सिद्ध बनाने में असमर्थ हैं, और उसे प्रकट करने में भी असमर्थ है जो मनुष्य में भ्रष्ट है, और न ही वे मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव से उसे आज़ाद कर सकते हैं , या उसके प्रेम और विश्वास को सिद्ध बना सकते हैं। परमेश्वर का अनुग्रह का कार्य एक अवधि का कार्य था, और मनुष्य परमेश्वर को जानने के लिए परमेश्वर के अनुग्रह का आनंद उठाने पर निर्भर नहीं रह सकता। परमेश्वर के द्वारा मनुष्य की सिद्धता किसके द्वारा पूरी होती है? उसके धर्मी स्वभाव के द्वारा। परमेश्वर के स्वभाव मुख्यतः धार्मिकता, क्रोध, भव्यता, न्याय और शाप शामिल है, और उसके द्वारा मनुष्य की सिद्धता प्राथमिक रूप से न्याय के द्वारा होती है। कुछ लोग नहीं समझते, और पूछते हैं कि क्यों परमेश्वर केवल न्याय और शाप के द्वारा ही मनुष्य को सिद्ध बना सकता है। वे कहते हैं कि यदि परमेश्वर मनुष्य को शाप दे, तो क्या वह मर नहीं जाएगा? यदि परमेश्वर मनुष्य का न्याय करे, तो क्या वह दोषी नहीं ठहरेगा? तब वह कैसे सिद्ध बनाया जा सकता है? ऐसे शब्द उन लोगों के होते हैं जो परमेश्वर के कार्य को नहीं जानते। परमेश्वर मनुष्य की अवज्ञाकारिता को शापित करता है, और वह मनुष्य के पापों को न्याय देता है। यद्यपि वह बिना किसी संवेदना के कठोरता से बोलता है, फिर भी वह उन सबको प्रकट करता है जो मनुष्य के भीतर होता है, और इन कठोर वचनों के द्वारा वह उन सब बातों को प्रकट करता है जो मूलभूत रूप से मनुष्य के भीतर होती हैं, फिर भी ऐसे न्याय के द्वारा वह मनुष्य को शरीर के सार का गहरा ज्ञान प्रदान करता है, और इस प्रकार मनुष्य परमेश्वर के समक्ष आज्ञाकारिता के प्रति समर्पित होता है। मनुष्य का शरीर पाप का है, और शैतान का है, यह अवज्ञाकारी है, और परमेश्वर की ताड़ना का पात्र है - और इसलिए, मनुष्य को स्वयं का ज्ञान प्रदान करने के लिए परमेश्वर के न्याय के वचनों का उस पर पड़ना आवश्यक है और हर प्रकार का शोधन होना आवश्यक है; केवल तभी परमेश्वर का कार्य प्रभावशाली हो सकता है। "केवल पीड़ादायक परीक्षाओं का अनुभव करने के द्वारा ही तुम परमेश्वर की मनोहरता को जान सकते हो" से

अतीत में, उद्धार का उसका साधन परम प्रेम और करुणा दिखाना रहा था, इतनी कि उसने संपूर्ण मानवजाति के बदले में अपना सर्वस्व शैतान को दे दिया। आज अतीत के जैसा कुछ नहीं है: आज, तुम लोगों का उद्धार, स्वभाव के अनुसार प्रत्येक के वर्गीकरण के दौरान, अंतिम दिनों के समय में होता है; तुम लोगों के उद्धार का साधन प्रेम या करुणा नहीं है, बल्कि ताड़ना और न्याय है ताकि मनुष्य को अधिक अच्छी तरह बचाया जा सके। इस प्रकार, तुम लोगों को जो भी प्राप्त होता है वह ताड़ना, न्याय और निष्ठुर मार है, लेकिन जान लें कि इस निर्दय मार में थोड़ा सा भी दण्ड नहीं है, जान लें कि इस बात की परवाह किए बिना कि मेरे वचन कितने कठोर हैं, तुम लोगों पर जो पड़ता है वह कुछ वचन ही है जो तुम लोगों को अत्यंत निर्दय प्रतीत होता है, और जान लें, कि इस बात की परवाह किए बिना कि मेरा क्रोध कितना अधिक है, तुम लोगों पर जो पड़ता है वे फिर भी शिक्षण के वचन हैं, और तुम लोगों को नुकसान पहुँचाना, या तुम लोगों को मार डालना मेरा आशय नहीं है। क्या यह सब सत्य नहीं है? जान लें कि आज, चाहे वह धर्मी न्याय हो या निष्ठुर शुद्धिकरण, सभी उद्धार के लिए है। इस बात की परवाह किए बिना कि चाहे आज स्वभाव के अनुसार प्रत्येक का वर्गीकरण है, या मनुष्य की श्रेणियाँ सामने लायी गई हैं, परमेश्वर के सभी कथन और कार्य उन लोगों को बचाने के लिए हैं जो परमेश्वर से प्यार करते हैं। धर्मी न्याय मनुष्य को शुद्ध करने के उद्देश्य से है, निर्दय शुद्धिकरण मनुष्य का परिमार्जन करने के उद्देश्य से है, कठोर वचन या ताड़ना सब शुद्ध करने के उद्देश्य से और उद्धार के लिए हैं। और इस प्रकार, उद्धार की आज की विधि अतीत की विधि के विपरीत है। आज, धर्मी न्याय तुम लोगों को बचाता है, और तुम लोगों में से प्रत्येक को स्वभाव के अनुसार वर्गीकृत करने का एक अच्छा साधन है, और निर्मम ताड़ना तुम लोगों के लिए सर्वोच्च उद्धार लाती है—और इस ताड़ना और न्याय का सामना होने पर तुम लोगों को क्या कहना है? क्या तुम लोगों ने शुरू से अंत तक उद्धार का आनंद नहीं लिया है? तुम लोगों ने देहधारी परमेश्वर को देखा है और उनकी सर्वसंभाव्यता और विवेक का एहसास किया है; इसके अलावा, तुमने बार-बार मार और अनुशासन का अनुभव किया है। लेकिन क्या तुम लोगों को सर्वोच्च अनुग्रह भी प्राप्त नहीं हुआ है? क्या तुम लोगों को प्राप्त हुए आशीष किसी भी अन्य की तुलना में अधिक नहीं हैं? तुम लोगों को प्राप्त हुए अनुग्रह सुलेमान के द्वारा उठाए गये महिमा और सम्पत्ति के आनंद की तुलना में कहीं अधिक विपुल हैं! इस बारे में विचार करें: यदि आगमन के पीछे मेरा इरादा तुम लोगों को निंदित करना और सज़ा देना होता, न कि तुम लोगों को बचाना, तो क्या तुम लोगों के दिन इतने लंबे समय तक टिकते? क्या तुम, मांस और रक्त के ये पापी प्राणी, आज तक जीवित रहते? यदि यह केवल तुम लोगों को दंड देने के लिए होता, तो मैं क्यों शरीर धारण करता और इस तरह के कठिन कार्य की शुरूआत करता? क्या तुम नश्वर-मात्र को दंडित करने के लिए एक वचन पर्याप्त नहीं होता? क्या तुम लोगों को निंदित करने के बाद अभी भी तुम लोगों को नष्ट करने का मेरा मन होगा? क्या तुम लोगों को अभी भी मेरे इन वचनों पर विश्वास नहीं है? क्या मैं केवल प्यार और करुणा के माध्यम से मनुष्य को बचा सकता हूँ? या मैं मनुष्यों को बचाने के लिए केवल सलीब पर चढ़ने का उपयोग कर सका था? क्या मेरा धर्मी स्वभाव मनुष्य को पूरी तरह आज्ञाकारी बनाने के लिए अनुकूल नहीं है? क्या यह मनुष्य को पूर्ण रूप से बचाने में अधिक सक्षम नहीं है? "तुम लोगों को हैसियत के आशीषों को अलग रखना चाहिए और मनुष्य के उद्धार के लिए परमेश्वर की इच्छा को समझना चाहिए" से

मैं अद्वितीय परमेश्‍वर स्‍वयं हूं, इसके अतिरिक्‍त मैं परमेश्‍वर का एकमात्र प्रतिनिधि हूं, और मैं, इस देह की समग्रता के साथ परमेश्‍वर का और अधिक पूर्ण प्रत्‍यक्षीकरण हूं। जो भी मेरा सम्‍मान न करने का साहस करता है, जो भी अपनी आंखों में अनादर प्रदर्शित करता है, जो भी मेरे विरूद्ध अवज्ञा के शब्‍द कहने की धृष्‍टता करता है वह निश्चित रूप से मेरे श्रापों और कोप से मारा जाएगा (मेरे कोप के कारण श्राप दिए जाएंगे)। और जो कोई भी मेरे प्रति निष्‍ठावान अथवा संतानोचित नहीं होता है, जो भी मुझसे चालबाज़ी करने का प्रयास करता है वह अवश्‍य मेरी घृणा में मारा जाएगा। मेरी धार्मिकता, प्रताप और न्‍याय सदा-सदा के लिए बने रहेंगे। पहले मैं प्रेममय और दयालु था, परंतु यह मेरी दिव्‍यता का पूर्ण स्‍वभाव नहीं है; धार्मिकता, प्रताप और न्‍याय महज़ मेरे स्‍वभाव हैं – स्‍वयं पूर्ण परमेश्‍वर। । अनुग्रह के युग में मैं प्रेममय और दयालु था। जो कार्य मुझे समाप्‍त करना था उस कारण मुझमें प्रेममय-कृपालुता और दयालुता थी, परंतु उसके पश्‍चात प्रेममय-कृपालुता या दयालुता की कोई आवश्‍यकता न रही (उसके पश्‍चात से कभी भी न रही)। यह अब पूरे तौर पर धार्मिकता, प्रताप और न्‍याय है और यह मेरी सामान्‍य मानवता के साथ जुड़ी मेरी पूर्ण दिव्‍यता का संपूर्ण स्वभाव है। आरम्भ में मसीह के कथन के "अध्याय 79" से

युग का समापन करने के अपने अंतिम कार्य में, परमेश्वर का स्वभाव ताड़ना और न्याय का है, जिसमें, सार्वजनिक रूप से सभी लोगों का न्याय करने, और उन लोगों को सिद्ध बनाने के लिए, जो एक ईमानदार हृदय से उसे प्यार करते हैं, वह सब कुछ प्रकट करता है जो अधार्मिक है। केवल इस तरह का एक स्वभाव ही युग का समापन कर सकता है। अंत के दिन पहले ही आ चुके हैं। सृष्टि की सभी चीज़ों को उनके प्रकार के अनुसार वर्गीकृत किया जाएगा, और उनकी प्रकृति के आधार पर विभिन्न श्रेणियों में विभाजित किया जाएगा। यही वह क्षण है जब परमेश्वर लोगों के परिणाम और उनकी मंज़िल को प्रकट करता है। यदि लोग ताड़ना और न्याय से नहीं गुज़रते हैं, तो उनकी अवज्ञा और अधार्मिकता को प्रकट करने का कोई तरीका नहीं होगा। केवल ताड़ना और न्याय के माध्यम से ही सभी सृजनों का अंत प्रकट हो सकता है। मनुष्य केवल तभी अपने वास्तविक रंगों को दिखाता है जब उसे ताड़ना दी जाती है और उसका न्याय किया जाता है। दुष्ट को दुष्ट के साथ, भले को भले के साथ रखा जाएगा, और समस्त मानव जाति को उनके प्रकार के अनुसार वर्गीकृत किया जाएगा। ताड़ना और न्याय के माध्यम से, सभी सृजनों का अंत प्रकट किया जाएगा, ताकि दुष्ट को दंडित किया जा सके और अच्छे को पुरस्कृत किया जा सके, और सभी लोग परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन हो जाएँगे। यह समस्त कार्य धार्मिक ताड़ना और न्याय के माध्यम से अवश्य प्राप्त किया जाना चाहिए। क्योंकि मनुष्य की भ्रष्टता अपने चरम पर पहुँच गई है और उसकी अवज्ञा अत्यंत गंभीर हो गई है, इसलिए केवल परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव ही, जो मुख्यत: ताड़ना और न्याय से संयुक्त है और जो अंत के दिनों दिनों में प्रकट होता है, मनुष्य को रूपान्तरित और पूर्ण बना सकता है। केवल यह स्वभाव ही दुष्टता को उजागर कर सकता है और इस तरह सभी अधार्मिकों को गंभीर रूप से दण्डित कर सकता है। इसलिए, इस तरह का एक स्वभाव अस्थायी महत्व से सम्पन्न होता है, और उसके स्वभाव का प्रकटन और प्रदर्शन प्रत्येक नए युग के कार्य के वास्ते अभिव्यक्त किया जाता है। ऐसा नहीं है कि परमेश्वर अपने स्वभाव को मनमाने ढंग से और महत्व के बिना प्रकट करता है। माना कि, जब अंत के दिनों के दौरान मनुष्य का परिणाम प्रकट करने में, मनुष्य को धार्मिक न्याय के अधीन नहीं करके, बल्कि इसके बजाय उसके प्रति सहिष्णुता, धैर्य और क्षमा दर्शाते हुए, और चाहे मनुष्य का पाप कितना ही गंभीर क्यों न हो उसे माफ़ करते हुए, रत्ती भर भी धार्मिक न्याय के बिना, परमेश्वर अभी भी मनुष्य पर अनन्त करुणा और प्रेम प्रदान करता और उसके प्रति प्रेममय रहना जारी रखता: तब परमेश्वर के समस्त प्रबंधन का कभी भी कब अंत किया जाता? इस तरह का कोई स्वभाव कब मानव जाति की उचित मंज़िल में अगुआई करने में सक्षम होगा? उदाहरण के लिए, ऐसे न्यायाधीश को लें जो हमेशा प्रेममय है, ऐसा न्यायाधीश जिसका उदार चेहरा और सौम्य हृदय हो। वह लोगों को उनके द्वारा किए गए अपराधों के बावजूद प्यार करता हो, और चाहे कोई भी हो वह उसके प्रति प्रेममय और सहिष्णु रहता हो। ऐसी स्थिति में, वह कब न्यायोचित निर्णय तक पहुँचने में समर्थ होगा? अंत के दिनों के दौरान, केवल धार्मिक न्याय ही मनुष्य का उसके प्रकार के अनुसार वर्गीकरण कर सकता है और मनुष्य को एक नए राज्य में ला सकता है। इस तरह, परमेश्वर के न्याय और ताड़ना के धार्मिक स्वभाव के माध्यम से समस्त युग का अंत किया जाता है। …क्योंकि अंत के दिनों का कार्य किए जाने के लिए, युग का अंत करने के लिए ज्वलन, न्याय, ताड़ना, कोप, और विनाश अवश्य होने चाहिए। अंत के दिन अंतिम युग को संदर्भित करते हैं। अंतिम युग के दौरान, क्या परमेश्वर युग का अंत नहीं करेगा? युग को समाप्त करने के लिए, परमेश्वर को अपने साथ ताड़ना और न्याय अवश्य लाने चाहिए। केवल इसी तरह से वह युग को समाप्त कर सकता है। यीशु का प्रयोजन ऐसा था ताकि मनुष्य अस्तित्व में रहना जारी रख सके, जीवित रह सके, और ताकि एक बेहतर तरीके से विद्यमान रह सके। उसने मनुष्य को पाप से बचाया ताकि वह चरित्रहीनता में उतरने से रुक सके और अधोलोक और नरक में अब और नहीं रहे, और मनुष्य को अधोलोक और नरक से बचा कर उसने मनुष्य को जीवित रहने दिया। अब, अंत के दिन आ गए हैं। वह मनुष्य का सर्वनाश कर देगा, मनुष्य जाति को पूरी तरह से नष्ट कर देगा, अर्थात्, वह मनुष्यजाति की विद्रोहशीलता को रूपान्तरित कर देगा। इस कारण से, अतीत के करुणामय और प्रेममय स्वभाव के साथ, परमेश्वर के लिए युग को समाप्त करना असमर्थ होगा, और प्रबंधऩ की अपनी छः-हजार-वर्षीय योजना को पूरा सफल बनाना असंभव होगा। "परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)" से

मैं सारे विश्व में खुले तौर पर अपनी प्रशासनिक आज्ञाओं की घोषणा करते हुए, अपने प्रचण्ड प्रकोप को इनके राष्ट्रों के ऊपर तेजी से फेंकूँगा, और जो कोई उनका उल्लंघन करता है उनको ताड़ना दूँगा: जैसे ही मैं बोलने के लिए विश्व की तरफ अपने चेहरे को घुमाता हूँ, सारी मानवजाति मेरी आवाज़ को सुनती है, और उसके बाद उन सभी कार्यों को देखती है जिसे मैंने समूचे ब्रह्माण्ड में गढ़ा है। वे जो मेरी इच्छा के विरूद्ध जाते हैं, अर्थात्, जो मनुष्य के कार्यों से मेरा विरोध करते हैं, वे मेरी ताड़ना के अधीन नीचे गिर जाएँगे। मैं स्वर्ग के असंख्य तारों को लूँगा और उन्हें फिर से नया कर दूँगा, और मेरे कारण सूर्य और चन्द्रमा को नया बना दिया जायेगा—आकाश अब और वैसा नहीं रहेगा जैसा वह था; पृथ्वी पर बेशुमार चीज़ों को फिर से नया बना दिया जाएगा। मेरे वचनों के माध्यम से सभी पूर्ण हो जाएँगे। विश्व के भीतर अनेक राष्ट्रों को नए सिरे से विभक्त कर दिया जाएगा और मेरे राष्ट्र के द्वारा बदल दिया जाएगा, जिसकी वजह से पृथ्वी के राष्ट्र हमेशा हमेशा के लिए विलुप्त हो जाएँगे और एक राष्ट्र बन जाएँगे जो मेरी आराधना करता हो; पृथ्वी के सभी राष्ट्रों को नष्ट कर दिया जाएगा, और उनका अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। विश्व के भीतर मनुष्यों में, वे सभी जो शैतान से संबंध रखते हैं उनका सर्वनाश कर दिया जाएगा; वे सभी जो शैतान की आराधना करते हैं उन्हें जलती हुई आग के द्वारा नीचा दिखाया जायेगा—अर्थात उनको छोड़कर जो अभी इस धारा के अन्तर्गत हैं, बाकियों को राख में बदल दिया जाएगा। जब मैं बहुत से लोगों को ताड़ना देता हूँ, तो वे जो, भिन्न-भिन्न अंशों में, धार्मिक संसार में हैं, मेरे कार्यों के द्वारा जीत लिए जा कर मेरे राज्य में लौट आएँगे, क्योंकि उन्होंने एक श्वेत बादल पर सवार पवित्र जन के आगमन को देख लिया होगा। समस्त मानवता अपने-अपने स्वभाव का अनुसरण करेगी, और जो कुछ उसने किया है उससे भिन्न-भिन्न ताड़नाएँ प्राप्त करेगी। वे जो मेरे विरूद्ध खड़े हुए हैं सभी नष्ट हो जाएँगे; जहाँ तक उनकी बात है जिन्होंने पृथ्वी पर अपने कार्यों में मुझे शामिल नहीं किया है, वे अपने आपको दोषमुक्त करने के ढंग के कारण, पृथ्वी पर मेरे पुत्रों और मेरे लोगों के शासन के अधीन निरन्तर बने रहेंगे। मैं अपने महान कार्य की समाप्ति की घोषणा करने के लिए पृथ्वी पर अपनी ध्वनि आगे करते हुए अपने आपको असंख्य लोगों और असंख्य राष्ट्रों के सामने प्रकट करूँगा, ताकि समस्त मानवजाति अपनी आँखों से देखे। संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन के "अध्याय 26" से

अनुग्रह के युग में, यीशु संपूर्ण पतित मानवजाति (सिर्फ इस्राएलियों को नहीं) को छुटकारा दिलाने के लिए आया। उसने मनुष्य के प्रति दया और करुणा दिखायी। मनुष्य ने अनुग्रह के युग में जिस यीशु को देखा वह करुणा से भरा हुआ और हमेशा ही प्रेममय था, क्योंकि वह मनुष्य को पाप से मुक्त कराने के लिए आया था। जब तक उसके सूली पर चढ़ने ने मानव जाति को वास्तव में पाप से मुक्त नहीं कर दिया तब तक वह मनुष्य के पाप माफ करता रहा। उस समय के दौरान, परमेश्वर मनुष्य के सामने दया और करुणा के साथ प्रकट हुआ; अर्थात्, वह मनुष्य के लिए एक पापबलि बना और मनुष्य के पापों के लिए सलीब पर चढ़ाया गया ताकि उन्हें हमेशा के लिए माफ किया जा सके। …हालाँकि, अब कार्य अन्य जाति के राष्ट्रों में गहराई से भ्रष्ट मनुष्यों को जीतना और न केवल चीन के परिवार की बल्कि समस्त विश्व की अगुआई करना है। तुम्हें लगता है कि यह कार्य सिर्फ़ चीन में हो रहा है, परन्तु वास्तव में इसने पहले से ही विदेश में फैलना शुरू कर दिया है। ऐसा क्यों है कि विदेशी बार-बार सच्चे मार्ग को खोजते हैं? यह इसलिए है क्योंकि आत्मा ने अपना कार्य पहले से ही शुरू कर दिया है, और ये वचन अब समस्त विश्व के लोगों की ओर निर्देशित हैं। इसके साथ, आधा कार्य पहले से ही हो चुका है। विश्व के सृजन से लेकर आज तक, परमेश्वर के आत्मा ने इतना महान कार्य किया है; उसने विभिन्न युगों के दौरान, और भिन्न-भिन्न देशों में भिन्न-भिन्न कार्य किए हैं। प्रत्येक युग के लोग उसके भिन्न स्वभाव को देखते हैं, जो कि उस भिन्न कार्य के माध्यम से प्राकृतिक रूप से प्रकट होता है जिसे वह करता है। वह दया और करुणा से भरा हुआ परमेश्वर है; वह मनुष्य के लिए पापबलि है और उसकी चरवाही करने वाला है, लेकिन वह मनुष्य का न्याय, ताड़ना, और श्राप भी है। वह पृथ्वी पर दो हजार साल तक जीवन-यापन के लिये मनुष्य की अगुआई कर सका और वह भ्रष्ट मानवजाति को पाप से छुटकारा भी दिला सका था। और आज, वह उस मानवजाति को जीतने में भी सक्षम है जो उसे नहीं जानती है और उसे अपने प्रभुत्व के अधीन करने में सक्षम है, ताकि सभी पूरी तरह से उसके आगे समर्पण कर दें। अंत में, वह समस्त विश्व में मनुष्यों के अंदर जो कुछ भी अशुद्ध और अधर्मी है उसे जला कर दूर कर देगा, ताकि उन्हें यह दिखाए कि वह न सिर्फ दया, करुणा, बुद्धि, चमत्कार और पवित्रता का परमेश्वर है, बल्कि इससे भी अधिक, वह एक ऐसा परमेश्वर है जो मनुष्य का न्याय करता है। मानवजाति के बीच बुरों के लिए, वह प्रज्ज्वलन, न्याय और दण्ड है; जिन्हें पूर्ण किया जाना है उनके लिए, वह क्लेश, शुद्धिकरण, और परीक्षण, और साथ ही आराम, संपोषण, वचनों की आपूर्ति, व्यवहार करने वाला और काँट-छाँट है। और जिन्हें हटा दिया जाता है उनके लिए, वह सजा, और साथ ही प्रतिशोध भी है। "देहधारण के महत्व को दो देहधारण पूरा करते हैं" से

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