संदर्भ के लिए बाइबल के पद:

"जो मुझ से, 'हे प्रभु! हे प्रभु!' कहता है, उनमें से हर एक स्वर्ग के राज्य में प्रवेश न करेगा, परन्तु वही जो मेरे स्वर्गीय पिता की इच्छा पर चलता है। उस दिन बहुत से लोग मुझ से कहेंगे, 'हे प्रभु, हे प्रभु, क्या हम ने तेरे नाम से भविष्यद्वाणी नहीं की, और तेरे नाम से दुष्‍टात्माओं को नहीं निकाला, और तेरे नाम से बहुत से आश्‍चर्यकर्म नहीं किए?' तब मैं उनसे खुलकर कह दूँगा, 'मैं ने तुम को कभी नहीं जाना। हे कुकर्म करनेवालो, मेरे पास से चले जाओ'" (मत्ती 7:21—23)।

"परन्तु उसमें कोई अपवित्र वस्तु, या घृणित काम करनेवाला, या झूठ का गढ़नेवाला किसी रीति से प्रवेश न करेगा, पर केवल वे लोग जिनके नाम मेम्ने के जीवन की पुस्तक में लिखे हैं" (प्रकाशितवाक्य 21:27)।

"क्योंकि सच्‍चाई की पहिचान प्राप्‍त करने के बाद यदि हम जान बूझकर पाप करते रहें, तो पापों के लिये फिर कोई बलिदान बाकी नहीं। हाँ, दण्ड का एक भयानक बाट जोहना और आग का ज्वलन बाकी है जो विरोधियों को भस्म कर देगा" (इब्रानियों 10:26-27)।

"जगत के अन्त में ऐसा ही होगा। स्वर्गदूत आकर दुष्‍टों को धर्मियों से अलग करेंगे, और उन्हें आग के कुण्ड में डालेंगे। जहाँ रोना और दाँत पीसना होगा" (मत्ती 13:49-50)।

"परन्तु डरपोकों, और अविश्‍वासियों, और घिनौनों, और हत्यारों और व्यभिचारियों, और टोन्हों, और मूर्तिपूजकों, और सब झूठों का भाग उस झील में मिलेगा जो आग और गन्धक से जलती रहती है: यह दूसरी मृत्यु है" (प्रकाशितवाक्य 21:8)।

"देखो, वह बादलों के साथ आनेवाला है, और हर एक आँख उसे देखेगी, वरन् जिन्होंने उसे बेधा था वे भी उसे देखेंगे, और पृथ्वी के सारे कुल उसके कारण छाती पीटेंगे। हाँ। आमीन" (प्रकाशितवाक्य 1:7)।

"हाय–हाय करो, क्योंकि यहोवा का दिन समीप है; वह सर्वशक्‍तिमान की ओर से मानो सत्यानाश करने के लिये आता है" (यशायाह 13:6)।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

प्रत्येक समयावधि में, परमेश्वर नया कार्य आरम्भ करेगा, और प्रत्येक अवधि में, मनुष्य के बीच एक नई शुरुआत होगी। यदि मनुष्य केवल सच्चाईयों का ही पालन करता है कि "यहोवा ही परमेश्वर है" और "यीशु ही मसीह है," जो ऐसी सच्चाईयाँ हैं जो केवल एक अकेले युग पर ही लागू होती हैं, तो मनुष्य कभी भी पवित्र आत्मा के कार्य के साथ कदम नहीं मिला पाएगा, और वह हमेशा पवित्र आत्मा के कार्य को हासिल करने में अक्षम रहेगा। इस बात की परवाह किए बिना कि परमेश्वर कैसे कार्य करता है, मनुष्य जरा से भी सन्देह के बिना अनुसरण करता है, और वह करीब से अनुसरण करता है। इस तरह, पवित्र आत्मा के द्वारा मनुष्य को कैसे निष्कासित किया जा सकता है? इस बात पर ध्यान दिए बिना कि परमेश्वर क्या करता है, जब तक मनुष्य को निश्चय है कि यह पवित्र आत्मा का कार्य है, और वह बिना किसी आशंका के पवित्र आत्मा के कार्य में सहयोग करता है, और परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा करने का प्रयास करता है, तो उसे कैसे दण्ड दिया जा सकता है? परमेश्वर का कार्य कभी नहीं रूका है, उसके कदम कभी नहीं थमे हैं, और उसके प्रबंधन के कार्य की पूर्णता से पहले, वह सदैव व्यस्त रहा है, और कभी नहीं रुकता है। किन्तु मनुष्य अलग हैः पवित्र आत्मा के कार्य के एक अंश को प्राप्त करने के बाद, वह इसके साथ ऐसा व्यवहार करता है मानो कि यह कभी नहीं बदलेगा; थोड़ा का ज्ञान प्राप्त करने के बाद, वह परमेश्वर के नए कार्य के पदचिह्नों का अनुसरण करने के लिए आगे नहीं बढ़ता है; परमेश्वर के कार्य के सिर्फ छोटे से भाग को देखने के बाद, वह तुरन्त ही परमेश्वर को लकड़ी की एक विशिष्ट आकृति के रूप में निर्धारित करता है, और यह मानता है कि परमेश्वर सदैव उसी स्वरूप में बना रहेगा जिसे वह अपने सामने देखता है, कि यह अतीत में ऐसा ही था और भविष्य में भी ऐसा ही बना रहेगा; सिर्फ एक सतही ज्ञान प्राप्त करने के बाद, मनुष्य इतना घमण्डी हो जाता है कि वह स्वयं को भूल जाता है और परमेश्वर के स्वभाव और अस्तित्व के बारे में बेहूदा ढंग से घोषणा करने लगता है जिसका बस कोई अस्तित्व नहीं होता है; और पवित्र आत्मा के कार्य के एक चरण के बारे में निश्चित हो जाने के बाद, परमेश्वर के नए कार्य की घोषणा करने वाला यह व्यक्ति चाहे किसी भी प्रकार का क्यों न हो, मनुष्य इसे स्वीकार नहीं करता है। ये ऐसे लोग हैं जो पवित्र आत्मा के नए कार्य को स्वीकार नहीं कर सकते हैं; वे अति रूढ़िवादी हैं, और वे नई चीज़ों को स्वीकार करने में अक्षम हैं। इस प्रकार के लोग ऐसे हैं जो परमेश्वर में विश्वास तो करते हैं किन्तु परमेश्वर को अस्वीकार भी करते हैं। मनुष्य विश्वास करता है कि इस्राएली "केवल यहोवा में विश्वास करने और यीशु में विश्वास नहीं करने" में ग़लत थे, मगर अधिकांश लोग एक ऐसी भूमिका निभाते हैं जिसमें वे "केवल यहोवा में विश्वास करते हैं और यीशु को अस्वीकार करते हैं" और "मसीहा के लौटने की लालसा करते हैं, किन्तु उस मसीहा का विरोध करते हैं जिसे यीशु कहते हैं।" तो कोई आश्चर्य नहीं कि लोग पवित्र आत्मा के कार्य के एक चरण को स्वीकार करने के पश्चात् अभी भी शैतान के अधिकार क्षेत्र के अधीन जीवन बिताते हैं, और अभी भी परमेश्वर के आशीषों को प्राप्त नहीं करते हैं। क्या यह मनुष्य की विद्रोहशीलता का परिणाम नहीं है? दुनिया भर के ईसाई जिन्होंने आज के नए कार्य के साथ कदम नहीं मिलाया है वे सभी उस विश्वास को थामे रहते हैं कि वे भाग्यशाली लोग हैं, कि परमेश्वर उनकी प्रत्येक इच्छा को पूरा करेगा। फिर भी वे निश्चयपूर्वक यह नहीं कह सकते हैं कि क्यों परमेश्वर उन्हें तीसरे स्वर्ग तक ले जाएगा, न ही वे इस बारे निश्चित हैं कि किस प्रकार यीशु उन्हें इकट्ठा करने के लिए सफेद बादल पर सवार होकर आएगा, और वे पूर्ण निश्चयपूर्वक यह तो बिलकुल नहीं कह सकते हैं कि यीशु सचमुच में उस दिन सफेद बदल पर सवार होकर आएगा या नहीं जिस दिन की वे कल्पना करते हैं। वे सभी चिन्तित हैं, और उनकी समझ में नहीं आता है; वे स्वयं भी नहीं जानते हैं कि परमेश्वर उनमें से प्रत्येक को ऊपर ले जाएगा या नहीं, जो विभिन्न समूहों के थोड़े से मुट्ठी भर लोग हैं, जो हरपंथ से आते हैं। जिस कार्य को परमेश्वर अब करता है, वर्तमान युग, परमेश्वर की इच्छा—उन्हें इनमें से किसी भी चीज़ की कोई समझ नहीं है, और वे अपनी अँगुलियों में दिनों को गिनने के अलावा और कुछ नहीं कर सकते हैं। जो लोग बिल्कुल अंत तक मेम्ने के पदचिह्नों का अनुसरण करते हैं केवल वे ही अन्तिम आशीष को प्राप्त कर सकते हैं, जबकि जो "चतुर लोग", बिल्कुल अंत तक अनुसरण करने में असमर्थ हैं मगर विश्वास करते हैं कि उन्होंने सब कुछ प्राप्त कर लिया है, वे परमेश्वर के प्रकटन को देखने में असमर्थ हैं। वे सभी विश्वास करते हैं कि वे पृथ्वी पर सबसे चतुर व्यक्ति हैं, और वे बिल्कुल अकारण ही परमेश्वर के कार्य के लगातार विकास को छोटा करते हैं, और पूर्ण निश्चय के साथ विश्वास करते हुए प्रतीत होते हैं कि परमेश्वर उन्हें स्वर्ग तक ले जाएगा, उन्हें जिनकी "परमेश्वर के प्रति अत्यधिक वफादारी है, जो परमेश्वर का अनुसरण करते हैं, और परमेश्वर के वचनों का पालन करते हैं।" यद्यपि उनकी परमेश्वर के द्वारा बोले गए वचनों के प्रति "अत्यधिक वफादारी" है, फिर भी उनके वचन और करतूतें अत्यंत घिनौने महसूस होते हैं क्योंकि वे पवित्र आत्मा के कार्य का विरोध करते हैं, और छल और दुष्टता करते हैं। जो लोग बिल्कुल अंत तक अनुसरण नहीं करते हैं, जो पवित्र आत्मा के कार्य के साथ कदम नहीं मिलाते हैं, और जो केवल पुराने कार्य से चिपके रहते हैं वे न केवल परमेश्वर के प्रति वफादारी हासिल करने में असफल हुए हैं, बल्कि इसके विपरीत, वे ऐसे लोग बन गए हैं जो परमेश्वर का विरोध करते हैं, ऐसे लोग बन गए हैं जिन्हें नए युग के द्वारा ठुकरा दिया गया है, और जिन्हें दण्ड दिया जाएगा। क्या उनसे भी अधिक बेचारा और कोई है? "परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का अभ्यास" से

अंत के दिनों का मसीह जीवन लेकर आता है, और सत्य का स्थायी एवं अनन्त मार्ग प्रदान करता है। इसी सत्य के मार्ग के द्वारा मनुष्य जीवन को प्राप्त करेगा, और एक मात्र इसी मार्ग से मनुष्य परमेश्वर को जानेगा और परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त करेगा। यदि तुम अंत के दिनों के मसीह के द्वारा प्रदान किए गए जीवन के मार्ग को नहीं खोजते हो, तो तुम कभी भी यीशु के अनुमोदन को प्राप्त नहीं कर पाओगे और कभी भी स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने के योग्य नहीं बन पाओगे क्योंकि तुम इतिहास के कठपुतली और कैदी दोनों हो। जो लोग नियमों, लिखे गये पत्रों के नियंत्रण में हैं और इतिहास की ज़ंजीरों में जकड़े हुए हैं वे कभी भी जीवन को प्राप्त नहीं कर सकते हैं, और कभी भी सतत जीवन के मार्ग को प्राप्त करने के योग्य नहीं बन सकते हैं। क्योंकि सिंहासन से प्रवाहित जीवन जल की अपेक्षा, उनके भीतर मैला पानी भरा है जो हज़ारों सालों से वहीं ठहरा हुआ है, जिनके पास जीवन का जल नहीं है वे हमेशा के लिए एक लाश, शैतान के खेलने की वस्तु और नरक की संतान बन रहेंगे। फिर वे परमेश्वर को कैसे देख सकते हैं? यदि तुम केवल अतीत को पकड़े रहने की कोशिश करोगे, केवल ठहरी हुई चीज़ों को पकड़ने की कोशिश में लगे रहोगे, और यथास्थिति को बदलने और इतिहास को तिलांजलि देने की कोशिश नहीं करोगे, तो क्या तुम हमेशा परमेश्वर के विरोध में नहीं रहोगे? परमेश्वर के कार्य के चरण बहुत ही विशाल और सामर्थी हैं, जैसे कि हिलोरे मारती हुई लहरें और गरजता हुआ तूफान—फिर भी तुम बैठकर निष्क्रियता से विनाश का इंतजार करते हो, अपनी ही मूर्खता से चिपके रहते हो और कुछ भी नहीं करते। इस प्रकार से, तुम्हें मेमने का अनुसरण करने वाले के रूप में कैसे देखा जा सकता है? और तुम जिस परमेश्वर पर निर्भर रहते हो उसे उस परमेश्वर के रूप में न्यायोचित कैसे ठहरा सकते हो जो हमेशा नया है और कभी पुराना नहीं होता? तुम्हारी पीली पड़ चुकी किताब के वचन तुम्हें नए युग में कैसे ले जा सकते हैं? वे कैसे तुम्हें परमेश्वर के चरणबद्ध तरीके से चलने वाले कार्यों तक लेकर जायेंगे? वे तुम्हें कैसे स्वर्ग लेकर जायेंगे? तुम्हारे हाथों में जो पत्र हैं वे तुम्हें केवल अस्थायी सांत्वना ही दे सकते हैं, वह सत्य नहीं दे सकते जो जीवन देने में सक्षम है। जो शास्त्र तुम पढ़ते हो वे तुम्हारी जिव्हा को आनंदित तो कर सकते हैं लेकिन ये वे विवेकपूर्ण वचन नहीं हैं जो तुम्हें मानव जीवन का बोध करा सकें। ये वह मार्ग तो दिखा ही नहीं सकते जो तुम्हें पूर्णता की ओर ले जायें। क्या यह भिन्नता तुम्हें विचार-मंथन का कारण नहीं देती? क्या यह तुम्हें अपने भीतर समाहित रहस्यों को समझने के लिए अनुमति नहीं देता है? क्या तुम अपने आप को परमेश्वर से मिलने के लिए स्वर्ग में ले जाने के योग्य हो? परमेश्वर के आये बिना, क्या तुम अपने आप को परमेश्वर के साथ पारिवारिक आनन्द मनाने के लिए स्वर्ग में ले जा सकते हो? क्या तुम अभी भी स्वप्न देख रहे हो? मैं तुम्हें सुझाव देता हूँ, कि तुम स्वप्न देखना बंद कर दो, और उसकी ओर देखो जो अभी कार्य कर रहा है, उसकी ओर जो अंत के दिनों में मनुष्यों को बचाने के लिए कार्य कर रहा है। यदि तुम ऐसा नहीं करते हो, तो तुम कभी भी सत्य को नहीं प्राप्त कर सकते, और कभी भी जीवन प्राप्त नहीं कर सकते हो। "केवल अंतिम दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनन्त जीवन का मार्ग दे सकता है" से

जो मसीह के द्वारा कहे गए सत्य पर भरोसा किए बिना जीवन प्राप्त करने की अभिलाषा करते हैं, वे पृथ्वी पर सबसे हास्यास्पद मनुष्य हैं और जो मसीह के द्वारा लाए गए जीवन के मार्ग को स्वीकार नहीं करते हैं वे कल्पना में ही खोए हुए हैं। इसलिए मैं यह कहता हूँ कि लोग जो अंत के दिनों में मसीह को स्वीकार नहीं करते हैं वे हमेशा के लिए परमेश्वर के द्वारा तुच्छ समझे जाएंगे। अंत के दिनों में मसीह मनुष्यों के लिए परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करने का माध्यम है, जिसकी अवहेलना कोई भी नहीं कर सकता। मसीह के माध्यम बिना कोई भी परमेश्वर के द्वारा पूर्णता को प्राप्त नहीं कर सकता। परमेश्वर में तुम्हारा विश्वास है, और इसलिए तुम उसके वचनों को स्वीकार करो और उसके मार्ग का पालन करो। बिना सत्य को प्राप्त किए या बिना जीवन के प्रावधान को स्वीकार किए तुमको सिर्फ़ अनुग्रह प्राप्त करने के बारे में सोचना नहीं है। मसीह अंत के दिनों में आता है ताकि वे सभी जो सच्चाई से उस पर विश्वास करते हैं उन्हें जीवन प्रदान किया जाए। उसका कार्य पुराने युग को समाप्त करने और नए युग में प्रवेश करने के लिए है और यही वह मार्ग है जिसे नए युग में प्रवेश करने वालों को अपनाना चाहिए। यदि तुम उसे पहचानने में असमर्थ हो, और उसकी भर्त्सना करते हो, निंदा करते हो और यहां तक कि उसे पीड़ा पहुंचाते हो, तो तुम अनन्त समय तक जलाए जाते रहने के लिए निर्धारित कर दिये गए हो और तुम कभी भी परमेश्वर के राज्य में प्रवेश नहीं कर पाओगे। इसी कारण से मसीह ही स्वयं पवित्र आत्मा और परमेश्वर की अभिव्यक्ति है, जिसे परमेश्वर ने पृथ्वी पर अपना कार्य सौंपा है। इसलिए मैं कहता हूँ कि अंत के दिनों में जो मसीह के द्वारा कार्य किया गया है उसे तुम स्वीकार नहीं करते हो तो तुम पवित्र आत्मा की निंदा करते हो। और उसका प्रतिकार पवित्र आत्मा की निंदा करने वालों को सहना होगा वह सभी के लिए स्वत:-स्पष्ट है। मैं यह भी कहता हूँ कि यदि तुम अंत के दिनों में मसीह का विरोध करोगे और उसे नकारोगे, तो ऐसा कोई भी नहीं है जो तुम्हारे लिए इसका नतीजा भुगत ले। इसके अलावा, आज के बाद से फिर कभी तुम्हें परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त करने का अवसर नहीं मिलेगा; यदि तुम अपने उद्धार की कोशिश भी करते हो, तो तुम कभी भी परमेश्वर का चेहरा नहीं देख पाओगे। क्योंकि तुम जिसका विरोध करते हो वह मनुष्य नहीं है, जिसको नकार रहे हो वह नन्हा-सा प्राणी नहीं है, बल्कि मसीह है। क्या तुम परिणामों के बारे में जानते हो? तुमने कोई छोटी-मोटी गलती नहीं की है, बल्कि एक बहुत ही जघन्य अपराध किया है। इसलिए मैं प्रत्येक को सलाह देता हूं कि सत्य के सामने अपने ज़हरीले दांत मत दिखाओ, या लापरवाही से आलोचना मत करो, क्योंकि केवल सत्य ही तुमको जीवन दिला सकता है और सत्य के अलावा कुछ भी तुमको नया जन्म देने के लिए या परमेश्वर का चेहरा देखने के लिए अनुमति नहीं दे सकता है। "केवल अंतिम दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनन्त जीवन का मार्ग दे सकता है" से

कई लोगों को परमेश्वर के दूसरे देहधारण के बारे में बुरी अनुभूति है, क्योंकि मनुष्य को यह बात स्वीकार करने में कठिनाई होती है कि न्याय का कार्य करने के लिए परमेश्वर देह बन जाएगा। तथापि, मैं तुम्हें अवश्य बता दूँ कि प्रायः परमेश्वर का कार्य मनुष्य की अपेक्षाओं से बहुत अधिक होता है और मनुष्य के मन इसे स्वीकार करने में कठिनाई महसूस करते हैं। क्योंकि मनुष्य पृथ्वी पर मात्र कीड़े-मकौड़े हैं, जबकि परमेश्वर सर्वोच्च है जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में समाया हुआ है; मनुष्य का मन गंदे पानी से भरे हुए एक गड्डे के सदृश है जो केवल कीड़े-मकोड़ों को ही उत्पन्न करता है, जबकि परमेश्वर के विचारों द्वारा निर्देशित कार्य का प्रत्येक चरण परमेश्वर की बुद्धि का ही आसवन है। मनुष्य निरंतर परमेश्वर के साथ झगड़ा करता रहता है, जिसके लिए मैं कहता हूँ कि यह स्वतः-प्रमाणित है कि कौन अंत में नुकसान सहेगा। मैं तुम सभी लोगों को प्रोत्साहित करता हूँ कि तुम लोग अपने आप को स्वर्ण की अपेक्षा अधिक महत्वपूर्ण मत समझो। यदि अन्य लोग परमेश्वर के न्याय को स्वीकार कर सकते हैं, तो तुम क्यों नहीं स्वीकार कर सकते हो? तुम दूसरों की अपेक्षा कितने ऊँचे खड़े हो? यदि दूसरे लोग सत्य के आगे अपने सिर झुका सकते हैं, तो तुम भी ऐसा क्यों नहीं कर सकते हो? परमेश्वर के कार्य का संवेग अविरल है। वह तुम्हारी "योग्यता" के वास्ते न्याय के कार्य को फिर से नहीं दोहराएगा, और तुम इतने अच्छे अवसर को चूकने पर असीम पछतावे से भर जाओगे। यदि तुम्हें मेरे वचनों पर विश्वास नहीं है, तो बस आकाश में उस महान श्वेत सिंहासन द्वारा तुम पर "न्याय पारित करने" की प्रतीक्षा करो! तुम्हें अवश्य पता होना चाहिए कि सभी इस्राएलियों ने यीशु को ठुकराया और अस्वीकार किया था, मगर यीशु द्वारा मानवजाति के छुटकारे का तथ्य अभी भी ब्रह्माण्ड के सिरे तक फैल रहा है। क्या यह एक वास्तविकता नहीं है जिसे परमेश्वर ने बहुत पहले बनाया? यदि तुम अभी भी यीशु के द्वारा स्वर्ग में उठाए जाने का इंतज़ार कर रहे हो, तो मैं कहता हूँ कि तुम एक ज़िद्दी अवांछित व्यक्ति हो।[क] यीशु तुम जैसे किसी भी झूठे व्यक्ति विश्वासी को स्वीकृत नहीं करेगा जो सत्य के प्रति निष्ठाहीन है और केवल आशीषों की ही माँग करता है। इसके विपरीत, वह तुम्हें दस हज़ार वर्षों तक जलने देने के लिए आग की झील में फेंकने में कोई दया नहीं दिखाएगा। "मसीह न्याय का कार्य सत्य के साथ करता है" से

जो लोग पवित्र आत्मा के नए कार्य का सामना करते समय सचेत नहीं होते हैं, जो अपना मुँह चलाते रहते हैं, वे आलोचनात्मक होते हैं, जो पवित्र आत्मा के धार्मिक कार्यों को नकारने की अपनी प्राकृतिक सहज प्रवृत्ति पर लगाम नहीं लगाते और उसका अपमान और ईशनिंदा करते हैं—क्या इस प्रकार के असभ्य लोग पवित्र आत्मा के कार्य के बारे में अनभिज्ञ नहीं रहते हैं? इसके अलावा, क्या वे अभिमानी, अंतर्निहित रूप से घमण्डी और अशासनीय नहीं हैं? भले ही ऐसा दिन आए जब ऐसे लोग पवित्र आत्मा के नए कार्य को स्वीकार करें, तब भी परमेश्वर उन्हें सहन नहीं करेगा। न केवल वे उन्हें तुच्छ समझते हैं जो परमेश्वर के लिए कार्य करते हैं, बल्कि स्वयं भी परमेश्वर के विरुद्ध, ईशनिंदा करते हैं। इस प्रकार के उजड्ड लोग, न तो इस युग में और न ही आने वाले युग में, क्षमा किए जाएँगे, और वे हमेशा के लिए नरक में सड़ेंगे! "परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है" से

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