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परमेश्वर से दिल की बात

I

हे ईश्वर! अपने दिल की बातें बताना चाहती हूँ तुम्हें।

तुम्हारे वचनों से, खुले द्वार दिल के, सुनी वाणी तुम्हारी।

झरने की तरह देते पोषण दिल को सच्चे वचन तुम्हारे।

तुम्हारे वचन याद करके, चमकता, ख़ुश होता, चैन मिलता दिल को मेरे।

तुम्हारे वचनों पर अमल कर, समझी सत्य मैं।

वचनों में तुम्हारी धार्मिकता, पवित्रता और सच्चे प्रेम को देखती हूँ मैं।

प्रेम योग्य हो तुम; महसूस करती प्रियता तुम्हारी।

सुख-शांति पाई है आस्था में मैंने; नज़दीक हूँ तुम्हारे मैं।

अंत के दिनों का न्याय सार्थक है

भ्रष्ट इंसानियत के लिये देख लिया है मैंने।

तो सत्य के अनुसरण का संकल्प लिया है मैंने,

तुम्हारा प्रेम लौटाने को फ़र्ज़ निभाऊँगी मैं।

II

हे परमेश्वर! कितना कुछ है दिल में मेरे जो कहना चाहती हूँ मैं।

दिल बेधते, उजागर करते कुरूप रूह मेरी तुम्हारे वचन।

शैतानी स्वभाव से भरी हूँ,

दंभी, दुष्कर हूँ, झूठ बोलती, कपट करती तुमसे।

अंत के दिनों का न्याय सार्थक है

भ्रष्ट इंसानियत के लिये देख लिया है मैंने।

तो सत्य के अनुसरण का संकल्प लिया है मैंने,

तुम्हारा प्रेम लौटाने को फ़र्ज़ निभाऊँगी मैं।

III

भ्रष्ट हूँ, बेपनाह उम्मीदें मेरी, तुमसे सौदा करती हूँ।

शुद्ध करते, बचाते न्याय-ताड़ना तुम्हारे।

तुम्हारा विरोध कर, डूबती नरक में इनके बिन।

व्यर्थ होती आस्था तुम्हारे अंत के दिनों के सत्य बिन।

अंत के दिनों का न्याय सार्थक है

भ्रष्ट इंसानियत के लिये देख लिया है मैंने।

तो सत्य के अनुसरण का संकल्प लिया है मैंने,

तुम्हारा प्रेम लौटाने को फ़र्ज़ निभाऊँगी मैं।

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