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अध्याय 10. जो लोग सच्चाई से प्रेम करते हैं, उनके पास अनुसरण करने का एक मार्ग होता है

लोगों की स्थितियाँ सामान्य हैं या नहीं, यह इस पर निर्भर करता है कि वे सच्चाई से प्रेम करते हैं या नहीं

बहुत से लोगों ने निम्नलिखित मुद्दे को उठाया है: उपरोक्त सहभागिता को सुनने के बाद, वे पूर्णतया स्पष्ट महसूस करते हैं, अधिक मजबूत हो जाते हैं, और उनमें नकारात्मकता की कोई भावना नहीं होती-लेकिन ऐसे हालात केवल करीब दस दिनों तक ही रहते हैं, जिसके बाद वे सामान्य स्थिति को बनाकर नहीं रख सकते। समस्या क्या है? क्या तुम लोगों ने कभी सोचा है कि यह किस कारण से होता है? शुरू के लगभग दस दिन में तुम्हारे हालात इतने अच्छे क्यों होते हैं? कुछ कहते हैं कि यह सत्य पर ध्यान केंद्रित नहीं करने का नतीजा है। लेकिन फिर सहभागिता को सुनने के बाद तुम इस स्तर की सामान्यता तक कैसे पहुँचे होगे? सच्चाई को सुनने के बाद तुम इतने खुश क्यों थे? कुछ लोग कहते हैं कि यह पवित्र आत्मा के काम के कारण है। तो फिर पवित्र आत्मा का काम करीब दस दिन के बाद रुक क्यों जाता है? कुछ कहते हैं, ऐसा इसलिए है कि वे सुस्त हो जाते हैं और आगे तथा ऊपर की ओर बढ़ना बंद कर देते हैं। पवित्र आत्मा तब भी क्यों काम नहीं करेगा जब लोग प्रगति करने की कोशिश कर रहे हों? क्या तुम आगे और ऊपर की ओर बढ़ने की कोशिश नहीं कर रहे थे? फिर पवित्र आत्मा कार्यरत क्यों नहीं है? लोग जो कारण दे रहे हैं वे वास्तविकता से हटकर हैं। यहाँ, हमें निम्नलिखित मुद्दा उठाना चाहिए: चाहे पवित्र आत्मा कार्यरत हो या न हो, लोगों के अपना सहयोग को अनदेखा नहीं किया जा सकता। जो लोग सच्चाई के बारे में स्पष्ट हैं और सच्चाई से प्रेम करते हैं वे हमेशा सामान्य स्थिति में बने रहेंगे, भले ही पवित्र आत्मा काम पर हो या नहीं। उन लोगों के लिए जो सच्चाई से प्रेम नहीं करते—भले ही सच्चाई उनके लिए विशेष रूप से स्पष्ट होती है और भले ही पवित्र आत्मा महान कार्य कर रहा हो—उस सच्चाई की जिसका वे अभ्यास करते हैं, और उस समय की जिसके दौरान वे अभ्यास कर सकते हैं, एक सीमा होती है। उस समय के अलावा, वे अपनी प्रकृति और व्यक्तिगत रुचियों को प्रकट करने से अधिक कुछ नहीं करते। तदनुसार, यह बात कि एक व्यक्ति की स्थिति सामान्यता का एक स्तर प्राप्त कर सकती है या नहीं, और वे व्यवहार में सच्चाई को ढाल सकते हैं या नहीं, पूरी तरह से इसके द्वारा निर्धारित नहीं की जाती है कि पवित्र आत्मा काम कर रहा है या नहीं, न ही केवल इसके द्वारा निर्धारित की जाती है कि वे सच्चाई के बारे में स्पष्ट हैं या नहीं, बल्कि इस बात पर निर्भर करती है कि वे सच्चाई का अभ्यास करने के इच्छुक हैं या नहीं और वे सच्चाई से प्रेम करते हैं या नहीं।

आम तौर पर, एक व्यक्ति सच्चाई को सुनता है और, कुछ समय के लिए, उसकी परिस्थितियाँ काफी सामान्य होती हैं। सामान्यता के उस समय में, सच्चाई तुम्हारे हालातों को सामान्यता में उठाती है। यह तुम्हें अपने भ्रष्ट स्वभाव से अवगत कराती है; तुम्हारा दिल खुश होता है और मुक्त हो जाता है और तुम्हारे हालात बेहतर होने के लिए एक मोड़ लेते हैं। लेकिन कुछ समय के बाद, कोई बात तुम्हें भ्रमित कर सकती है; तुम्हारे में सच्चाई अंधकारमय हो जाती है और तुम अनजाने में सच्चाई को अपने मन के पीछे रख देते हो; अपने कार्यों में तुम ईश्वर की तलाश करने की कोशिश नहीं करते हो, तुम हर बात अपने मन के मुताबिक करते हो और सच्चाई का अभ्यास करने का इरादा बिलकुल नहीं रखते। जैसे-जैसे समय बीतता है, तुम उस सच्चाई को खो देते हो जो तुम्हारे पास थी। तुम लगातार अपनी प्रकृति को प्रकट करते हो, जिससे पवित्र आत्मा को तुम में कार्य करने का कोई मौका नहीं मिलता है; तुम कभी भी ईश्वर के इरादों को नहीं खोजते हो; जब तुम परमेश्वर के करीब भी होते हो, तब भी तुम बिना उत्साह के बस काम करते हो। उस पल जब तुम वास्तव में अपनी बीमारी की वास्तविकता को महसूस करते हो, तुम्हारा दिल परमेश्वर से बहुत दूर हो चुका होता है; तुम ने कई चीजों में परमेश्वर का विरोध किया है और उसकी बहुत निंदा की है। अभी भी उन लोगों के लिए छुटकारा है जो इस पथ पर बहुत दूर नहीं निकल गए हैं, लेकिन उन लोगों के लिए जो इस हद तक बढ़ गए हैं कि परमेश्वर की निन्दा करते हैं और खुद को परमेश्वर के मुकाबले में खड़ा करते हैं, पद के लिए और भोजन और कपड़े के लिए होड़ करते हैं, उनके लिए कोई छुटकारा नहीं है। सच्चाई के बारे में स्पष्ट सहभागिता करने का उद्देश्य लोगों द्वारा सच्चाई का अभ्यास कराना और उनके स्वभाव को बदलना है, न सिर्फ उन्हें खुश करना। यदि तुम सच्चाई को समझते तो हो लेकिन इसका अभ्यास नहीं करते, तो सच्चाई के बारे में सहभागिता और सच्चाई की समझ का कोई महत्व नहीं होगा। यदि तुम सच्चाई को समझते तो हो लेकिन इसका अभ्यास नहीं करते हो, तो तुम सच्चाई को पाने का मौका और बचाए जाने की सभी संभावनाओं को खो दोगे। यदि तुम उस सच्चाई का अभ्यास करते हो जिसे तुम समझते हो, तो तुम और अधिक, और गहरी सच्चाई को प्राप्त करोगे; तुम परमेश्वर के उद्धार को प्राप्त करोगे; तुम पवित्र आत्मा के प्रबोधन, प्रकाश और मार्गदर्शन को प्राप्त करोगे। बहुत लोग केवल शिकायत करते हैं कि पवित्र आत्मा उन्हें कभी भी प्रबोधित नहीं करता है, लेकिन वे इसे नहीं समझते कि तत्वतः वे सच्चाई को अभ्यास में नहीं ढाल रहे हैं। इसलिए, उनके हालात कभी भी सामान्यता प्राप्त नहीं करेंगे और वे ईश्वर की इच्छा को कभी नहीं समझेंगे।

तुम्हें केवल सच्चाई का अभ्यास करने की आवश्यकता है और रास्ता तुम्हारे सामने खुल जाएगा

कुछ लोग कहते हैं कि सच्चाई का अभ्यास करने से उनकी समस्याएँ हल नहीं हो जाएँगी। दूसरों का मानना ​​है कि सच्चाई पूरी तरह से लोगों के भ्रष्ट स्वभाव को हल नहीं कर सकती है। सच यह है कि लोगों की सारी समस्याएँ हल की जा सकती हैं; कुंजी यह है कि लोग सत्य के अनुसार कार्य कर सकते हैं या नहीं। तुम लोगों की वर्तमान समस्याएँ कैंसर या असाध्य रोग नहीं हैं; यदि तुम लोग सच्चाई को अभ्यास में डाल सकते हो, तो इन सभी समस्याओं को बदला जा सकता है, जो इस पर निर्भर करता है कि तुम सच्चाई के अनुसार कार्य कर सकते हो या नहीं। यदि तुम सही रास्ते पर चल रहे हो, तो तुम सफल होगे; यदि तुम गलत रास्ते पर चल रहे हो, तो तुम गए काम से हो जाओगे। उदाहरण के लिए, कुछ लोग अपने काम को करते समय कभी यह नहीं सोचते कि वे किस तरह से चीज़ों को करें जो काम के लिए उपयोगी हो सके या उनका काम करने का तरीका परमेश्वर की इच्छा के अनुसार है या नहीं; नतीजतन, वे कई ऐसी चीज़ों को करते हैं जिनसे परमेश्वर घृणा करता है। यदि वे हर बात में सच्चाई के अनुसार काम करते, तो क्या वे ऐसे लोग नहीं होते जो परमेश्वर के दिल के अनुकूल हों? कुछ लोग सच्चाई को जानते हैं लेकिन इसे अभ्यास में नहीं डालते, वे ऐसा मानते हैं कि सच्चाई सिर्फ यही है और कुछ और नहीं। उनका विश्वास है कि यह उनकी धारणाओं और उनकी भष्टता को हल नहीं कर सकता है। क्या इस तरह का व्यक्ति हास्यास्पद नहीं है? क्या वे बेतुके नहीं हैं? क्या वे खुद को चतुर नहीं समझते हैं? यदि लोग सच्चाई के अनुसार कार्य करते हैं, तो उनका भ्रष्ट स्वभाव बदल जाएगा; यदि लोग अपने प्राकृतिक व्यक्तित्व के अनुसार ही परमेश्वर में विश्वास और उसकी सेवा करते हैं, तो उनमें से कोई भी अपना स्वभाव परिवर्तित नहीं कर सकता। कुछ लोग अपनी ही चिंताओं में दिन भर उलझे रहते हैं और उस सच्चाई की जांच या उसका अभ्यास नहीं कर पाते हैं जो आसानी से उपलब्ध होती है। यह व्यवहार बहुत बेतुका है; इस तरह के लोग अंतर्निहित रूप से पीड़ित होते हैं, उनके पास आशीषें तो होती हैं लेकिन वे उनका आनंद नहीं लेते! रास्ता तो है, तुम्हें सिर्फ इतना करना है कि इसे अभ्यास में डालना है। यदि तुम सच्चाई को व्यवहार में डालने के लिए कृत-संकल्प हो, तो तुम्हारी कमजोरी और घातक खामियों को बदला जा सकता है, लेकिन तुम्हें हमेशा सतर्क और सावधान रहना होगा और अधिक कठिनाइयों को सहना होगा। परमेश्वर में विश्वास करने के लिए एक विवेकी हृदय होना चाहिए-यदि तुम ऐसा लापरवाह तरीका अपनाते हो, तो क्या तुम परमेश्वर में उचित रूप से विश्वास कर सकते हो?

कुछ लोग केवल आपातकालीन स्थितियों के लिए, या खुद को त्याग कर दूसरों की मदद करने के लिए खुद को कुछ सच्चाइयों से लैस करते हैं, अपनी परेशानियों को हल करने के लिए नहीं; हम उन्हें "निस्वार्थ लोग" कहते हैं। वे दूसरों को सच्चाई की कठपुतलियाँ और खुद को सच्चाई के स्वामी के रूप में मानते हैं, वे दूसरों को सच्चाई को कस कर पकड़े रहना और निष्क्रिय न होना सिखाते हैं, जबकि वे खुद दर्शकों की तरह बाजु में खड़े रहते हैं-ये किस प्रकार के लोग हैं? केवल दूसरों को भाषण देने के लिए सच्चाई के कुछ वचनों से लैस होना, जबकि स्वयं के विनाश को रोकने के लिए कुछ नहीं करना-यह कितना कितना दयनीय है! यदि उनके शब्द दूसरों की मदद कर सकते हैं, तो वे खुद की सहायता क्यों नहीं कर सकते हैं? हमें उनको ढोंगी कहना चाहिए, जिनके पास कोई वास्तविकता नहीं है। वे दूसरों के लिए सच्चाई के वचनों की आपूर्ति करते हैं और दूसरों को उनसे अभ्यास करने का आग्रह करते हैं, लेकिन खुद अभ्यास करने की कोई कोशिश नहीं करते हैं-क्या वे घृणा के योग्य नहीं हैं? स्पष्ट रूप से, वे स्वयं तो इसे कर नहीं सकते, फिर भी वे दूसरों को सच्चाई के वचनों को आचरण में लागू करने के लिए मजबूर करते हैं-यह एक कैसा क्रूर तरीका है! वे दूसरों की मदद करने के लिए वास्तविकता का उपयोग नहीं कर रहे हैं; वे मातृत्व भरे एक दिल से दूसरों को मुहैय्या नहीं कर रहे हैं; वे सिर्फ लोगों को धोखा दे रहे हैं और उन्हें भ्रष्ट कर रहे हैं। यदि यह सिलसिला जारी रहता है-प्रत्येक व्यक्ति सच्चाई के वचनों को अगले को पारित करता रहे-तो क्या हर किसी का अंजाम यही न होगा कि सच्चाई के वचन तो बोले जाएँ पर उनका अभ्यास करने में असमर्थ बने रहें? ऐसे लोगों को कैसे परिवर्तित किया जा सकता है? वे अपनी समस्याओं को बिल्कुल भी नहीं पहचानते हैं; उनके लिए कोई रास्ता कैसे हो सकता है?

प्रत्येक समस्या के हल का एक रास्ता होता है; हर समस्या के लिए एक उपयुक्त सच्चाई होगी जिस पर तुम विचार कर सकते हो, ताकि तुम्हें आगे का एक रास्ता मिल सके और तुम बदलने में समर्थ हो सको। यहाँ तक ​​कि अगर परिवर्तन तुरंत नहीं भी होता है, तुम अब अपनी स्थिति को पहचान सकते हो। अगर ये सच्चाइयाँ लोगों की समस्याओं को हल नहीं कर सकती हैं, तो क्या परमेश्वर ने व्यर्थ बात नहीं की होगी? इसलिए, यदि तुम सच्चाई को व्यवहार में ढालने के लिए तैयार हो, तो तुम्हारे पास हमेशा अनुसरण करने का एक मार्ग होगा।

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