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15. क्यों कलिसियाएँ भ्रष्ट होकर धर्म बन जाने में सक्षम हैं?

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

परमेश्वर के कार्य के प्रत्येक चरण में मनुष्य से तद्नुरूपी अपेक्षाएँ भी होती हैं। जो पवित्र आत्मा की धारा के भीतर हैं वे सभी पवित्र आत्मा की उपस्थिति और अनुशासन के अधीन हैं, और जो पवित्र आत्मा की मुख्य धारा में नहीं हैं वे शैतान के नियन्त्रण में हैं, और वे पवित्र आत्मा के किसी भी कार्य से रहित हैं। जो लोग पवित्र आत्मा की धारा में हैं ये वे लोग हैं जो परमेश्वर के नए कार्य को स्वीकार करते हैं, ऐसे लोग हैं जो परमेश्वर के नए कार्य में सहयोग करते हैं। यदि इस मुख्य धारा के लोग सहयोग करने में अक्षम रहते हैं, और इस समय के दौरान परमेश्वर के द्वारा अपेक्षित सत्य का अभ्यास करने में असमर्थ रहते हैं, तो उन्हें अनुशासित किया जाएगा, और बहुत खराब स्थिति में उन्हें पवित्र आत्मा के द्वारा छोड़ दिया जाएगा। ...यह उन लोगों के लिए नहीं है जो नए कार्य को स्वीकार नहीं करते हैं: वे पवित्र आत्मा की धारा से बाहर हैं, और पवित्र आत्मा का अनुशासन और झिड़की उन पर लागू नहीं होते हैं। पूरा दिन, ये लोग देह में जीवन बिताते रहते हैं, वे अपने मन के भीतर जीवन बिताते हैं, और वे जो कुछ भी करते हैं वह सब उनके स्वयं के मस्तिष्क के विश्लेषण और अनुसंधान के द्वारा उत्पन्न हुए सिद्धान्त के अनुसार होता है। यह पवित्र आत्मा के नए कार्य की अपेक्षाएँ नहीं हैं, और यह परमेश्वर के साथ सहयोग तो बिलकुल भी नहीं है। जो लोग परमेश्वर के नए कार्य को स्वीकार नहीं करते हैं वे परमेश्वर की उपस्थिति से वंचित रहते हैं, और, इसके अतिरिक्त, वे परमेश्वर के आशीषों और सुरक्षा से रहित होते हैं। उनके अधिकांश वचन और कार्य पवित्र आत्मा की पुरानी अपेक्षाओं को थामे रहते हैं; वे सिद्धान्त हैं, सत्य नहीं। ऐसे सिद्धान्त और विनियमन यह साबित करने के लिए पर्याप्त हैं कि वह एकमात्र चीज़ जो उन्हें एक साथ लाती है धर्म है; वे चुने हुए लोग, परमेश्वर के कार्य के लक्ष्य नहीं हैं। उनमें से सभी लोगों की सभा को मात्र धर्म का महासम्मलेन कहा जा सकता है, और उन्हें कलीसिया नहीं कहा जा सकता है। यह एक अपरिवर्तनीय तथ्य है। उनके पास पवित्र आत्मा का नया कार्य नहीं है; जो कुछ वे करते हैं वह धर्म का द्योतक प्रतीत होता है, जैसा जीवन वे जीते हैं वह धर्म से भरा हुआ प्रतीत होता है; उनमें पवित्र आत्मा की उपस्थिति और कार्य नहीं होता है, और वे पवित्र आत्मा से अनुशासन या प्रबुद्धता प्राप्त करने के लायक तो बिलकुल भी नहीं हैं। ऐसे समस्त लोग निर्जीव लाशों और कीड़ों के समान हैं जो आध्यात्मिकता से रहित हैं। उन्हें मनुष्य की विद्रोहशीलता और विरोध का कोई ज्ञान नहीं है, मनुष्य के समस्त कुकर्मों का कोई ज्ञान नहीं है, और वे परमेश्वर के समस्त कार्य और परमेश्वर की वर्तमान इच्छा के बारे में बिलकुल भी नहीं जानते हैं। वे सभी अज्ञानी और अधम लोग हैं, वे कूडा करकट हैं जो विश्वासी कहलाने के योग्य नहीं हैं!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का अभ्यास" से उद्धृत

यदि लोग सत्य को वो धर्मसिद्धान्त मानते हैं जिसका उन्हें अपनी आस्था में पालन करना ही है, तो क्या वे धार्मिक अनुष्ठान में पड़ने के ख़तरे में हैं? और इस तरह के धार्मिक अनुष्ठान के अनुपालन और ईसाई धर्म के विश्वास के बीच क्या अंतर है? पुरानी और नई शिक्षाओं के बीच अंतर हो सकते हैं, और जो कहा जाता है वह अधिक गहन और अधिक प्रगतिशील हो सकता है, लेकिन यदि शिक्षाएँ एक तरह के सिद्धांत से ज्यादा कुछ नहीं हों और यदि वे लोगों के लिए सिद्धान्त, अनुष्ठान का एक रूप बन जाती हों—और इस तरह की और चीज़ें बन जाती हों, वे इससे सत्य प्राप्त नहीं कर सकते हों या सत्य की वास्तविकता में प्रवेश नहीं कर सकते हों, तो क्या उनका विश्वास केवल ईसाई धर्म के समान नहीं है? सार रूप में, क्या यह ईसाई धर्म नहीं है? इसलिए तुम लोगों के व्यवहार में और अपने कर्तव्य को करने में, तुम किन चीज़ों में ईसाई धर्म में विश्वासियों के समान या उसी तरह के विचार रखते हो? सतही अच्छे व्यवहार की खोज, फिर आध्यात्मिकता के आभास का उपयोग करके अपने लिए एक ढोंग बनाने की पूरी कोशिश करना; एक आध्यात्मिक व्यक्ति का रूप अपनाना; तू जो कहता है, करता है और प्रकट करता है उसमें आध्यात्मिकता का आभास देना; कुछ चीज़ें करना जो लोगों की अवधारणाओं और कल्पनाओं में प्रशंसनीय हैं—यह सब झूठी आध्यात्मिकता की खोज है, और यह पाखंड है। तू उच्च बातें करने वाले वचनों और सिद्धांत पर खड़ा है, लोगों को अच्छे कर्मों को करने, अच्छे लोग बनने, और सत्य की खोज करने पर ध्यान केंद्रित करने के लिए कहता है, लेकिन तेरे अपने व्यवहार और अपने कर्तव्य के प्रदर्शन में, तूने कभी भी सत्य की तलाश नहीं की, तूने कभी भी सत्य के सिद्धांतों के अनुसार कार्य नहीं किया, तू कभी भी यह नहीं समझ पाया है कि सत्य में किस बारे में बोला गया है, परमेश्वर की इच्छा क्या है, मनुष्य से उसे किन मानकों की अपेक्षा है—तूने इनमें से किसी को भी कभी भी गंभीरता से नहीं लिया है। जब तू कुछ समस्याओं का सामना करता है, तो तू पूरी तरह से अपनी मर्जी के अनुसार कार्य करता है और परमेश्वर को एक तरफ़ रख देता है। क्या ये बाहरी क्रियाएँ और आंतरिक स्थितियाँ, परमेश्वर का भय मानना और बुराई से दूर रहना हैं? यदि लोगों की आस्था और उनके सत्य के अनुसरण के बीच कोई संबंध नहीं है, तो फिर चाहे वे कितने भी वर्षों तक परमेश्वर में विश्वास क्यों न करें, वे वास्तव में परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने में असमर्थ होंगे। और इसलिए उस प्रकार के लोग किस प्रकार के मार्ग पर चल सकते हैं? वे अपने आप को किस चीज़ से सज्जित करने में अपने दिनों को बिताते हैं? क्या ये चीज़ें वचन और सिद्धांत नहीं हैं? क्या वे अपने आप को फरीसियों की तरह और अधिक बनाने, ऐसे लोगों की तरह अधिक बनाने के लिए जो कथित रूप से परमेश्वर की सेवा करते हैं, अपने आप को वचनों और सिद्धांतों से सज्जित, सुशोभित करते हुए, अपने दिनों को नही बिताते हैं? ये सभी क्रियाएँ क्या हैं? वे बस बँधे-बँधाये ढर्रे पर चल रहे हैं; वे विश्वास के ध्वज को लहरा रहे हैं और धार्मिक संस्कारों को निभा रहे हैं, आशीष पाने के अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए परमेश्वर को धोखा देने की कोशिश कर रहे हैं। वे परमेश्वर की आराधना बिल्कुल नहीं करते हैं। अंत में, क्या ऐसे लोगों के समूह का अंत ठीक कलीसिया के भीतर के उन लोगों की तरह नहीं होगा जो कथित रूप से परमेश्वर की सेवा करते हैं, और जो कथित रूप से परमेश्वर को मानते और उसका अनुसरण करते हैं?

— "मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "यदि तू हर समय परमेश्वर के सामने रह सकता है केवल तभी तू उद्धार के पथ पर चल सकता है" से उद्धृत

यहोवा पर विश्वास करने वालों को परमेश्वर कौन-सा नाम देता है? यहूदी धर्म। वे एक प्रकार का धार्मिक समूह बन गए। और परमेश्वर उन लोगों को कैसे परिभाषित करता है जो यीशु पर विश्वास करते हैं? उन्हें धार्मिक समूह—ईसाई धर्म के हिस्से के रूप में परिभाषित किया जाता है, है ना? परमेश्वर की नज़रों में, यहूदी धर्म और ईसाई धर्म धार्मिक समूह हैं। परमेश्वर उन्हें इस प्रकार क्यों परिभाषित करता है? उन सभी के बीच जो परमेश्वर द्वारा परिभाषित इन धार्मिक निकायों के सदस्य हैं, क्या कोई ऐसा है जो परमेश्वर से डरता है और बुराई से दूर रहता है, परमेश्वर के मार्ग का अनुसरण करता है, और परमेश्वर की इच्छा पूरी करता है? (नहीं।) परमेश्वर की नज़रों में, क्या जो लोग परमेश्वर का नाममात्र के लिए पालन करते हैं, वे सभी ऐसे लोग हो सकते हैं जिन्हें वह परमेश्वर में विश्वासियों के रूप में स्वीकार करता है? क्या उन सभी का परमेश्वर के साथ कोई संबंध हो सकता है? क्या वे सभी परमेश्वर के उद्धार के लिए लक्ष्य हो सकते हैं? (नहीं।) यद्यपि तुम लोगों ने अब अंत के दिनों के परमेश्वर के कार्य को स्वीकार कर लिया है, क्या ऐसा दिन आएगा जब तुम लोग उसमें बदल जाओगे जिसे परमेश्वर धार्मिक समूह के रूप में देखता है? यह अचिंतनीय प्रतीत होता है। यदि तुम लोग परमेश्वर की नज़र में एक धार्मिक समूह का हिस्सा बन जाते हो, तो तुम लोग उसके द्वारा बचाए नहीं जाओगे और इसका अर्थ है कि तुम लोग परमेश्वर के घर के नहीं हो। इसलिए सारांश करने का प्रयास करो: ये लोग जो नाममात्र में सच्चे परमेश्वर में विश्वास करते हैं लेकिन जिन्हें परमेश्वर एक धार्मिक समूह का हिस्सा मानता है—वे किस रास्ते पर चलते हैं? क्या ऐसा कहा जा सकता है कि ये लोग कभी भी उसके मार्ग का अनुसरण या उसकी आराधना नहीं करते हुए और परमेश्वर का त्याग करते हुए, विश्वास के झंडे को लहराने के मार्ग पर चलते हैं? अर्थात्, वे परमेश्वर पर विश्वास करने के मार्ग पर चलते हैं लेकिन शैतान की पूजा करते हैं, अपने स्वयं के प्रबंधन को अंजाम देते हैं, और अपना राज्य स्थापित करने की कोशिश करते हैं—क्या यही इसका सार है? क्या इस तरह के लोगों का मनुष्य के उद्धार की परमेश्वर की प्रबंधन योजना से कोई संबंध है? (नहीं।) चाहे कितने भी लोग परमेश्वर में विश्वास क्यों न करें, जैसे ही उनके विश्वासों को परमेश्वर द्वारा धर्म या समूह के रूप में परिभाषित किया जाता है, तब परमेश्वर ने निर्धारित किया है कि उन्हें बचाया नहीं जा सकता। मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? किसी गिरोह या लोगों की भीड़ में जो परमेश्वर के कार्य और मार्गदर्शन से रहित हैं और जो उसकी आराधना बिल्कुल भी नहीं करते हैं, वे किसकी आराधना करते हैं? वे किसका अनुसरण करते हैं? अपने हृदय में वे परमेश्वर को स्वीकार करते हैं, लेकिन वास्तव में, वे मानवीय हेरफेर और नियंत्रण के अधीन हैं। नामचारे के लिए, वे शायद किसी व्यक्ति का अनुसरण करते हों, लेकिन सार रूप में, वे शैतान, हैवान का अनुसरण करते हैं; वे उन ताक़तों का अनुसरण करते हैं जो परमेश्वर के प्रति शत्रुतापूर्ण हैं, जो परमेश्वर की दुश्मन हैं। क्या परमेश्वर इस तरह के लोगों के झुण्ड को बचा सकता है? क्या वे पश्चाताप करने में सक्षम हैं? वे मानव उद्यमों को चलाते हुए, अपने स्वयं के प्रबंधन का संचालन करते हुए विश्वास का झंडा लहराते हैं, और मनुष्यजाति के उद्धार के लिए परमेश्वर की प्रबंधन योजना के विपरीत चलते हैं। उनका अंतिम परिणाम परमेश्वर द्वारा नफ़रत और अस्वीकृत किया जाना है; परमेश्वर इन लोगों को संभवतः नहीं बचा सकता है, वे संभवतः पश्चाताप नहीं कर सकते है, वे पहले से ही शैतान के द्वारा पकड़ लिए गए हैं—वे पूरी तरह से शैतान के हाथों में हैं। ...यदि लोग परमेश्वर के मार्ग का अनुसरण करने में असमर्थ हैं और उद्धार के मार्ग पर चलने में असमर्थ हैं, तो उनका अंतिम परिणाम क्या होगा? उनका अंतिम परिणाम उन्हीं के समान होगा जो ईसाई और यहूदी धर्म को मानते हैं; कोई अंतर नहीं होगा। यह परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव है! चाहे तूने कितने भी धर्मोपदेश सुने हों, और तू कितने सत्यों को समझ चुका हो, यदि अंततः तू अभी भी लोगों का अनुसरण करता है और शैतान का अनुसरण करता है, और अंततः, तू अभी भी परमेश्वर के मार्ग का अनुसरण करने में अक्षम हैं और परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने में असमर्थ है, तो इस तरह के लोगों से परमेश्वर द्वारा नफ़रत की जाएगी और उन्हें अस्वीकार कर दिया जाएगा। हर पहलू से, ये लोग जो परमेश्वर द्वारा नफ़रत और अस्वीकृत किए जाते हैं वे पत्रों और सिद्धांतों के बारे में ज्यादा बात कर सकते हैं, और फिर भी वे परमेश्वर की आराधना करने में असमर्थ होते हैं; वे परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने में असमर्थ हैं, और परमेश्वर के प्रति पूर्ण आज्ञाकारी होने में असमर्थ हैं। परमेश्वर की नज़रों में, परमेश्वर उन्हें धर्म के रूप में, मनुष्य मात्र के एक समूह के रूप में, और शैतान के लिए एक निवास स्थान के रूप में परिभाषित करता है। उन्हें सामूहिक रूप से शैतान का गिरोह कहा जाता है, और परमेश्वर उनसे पूरी तरह से घृणा करता है।

— "मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "यदि तू हर समय परमेश्वर के सामने रह सकता है केवल तभी तू उद्धार के पथ पर चल सकता है" से उद्धृत

संदर्भ के लिए धर्मोपदेश और संगति के उद्धरण:

जब हम "परमेश्वर का अनुसरण करने" की बात करते हैं तो हमारा तात्पर्य क्या होता है? हम परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने और सत्य को स्वीकार करने के बारे में बात कर रहे हैं। यदि तुम सत्य को स्वीकार नहीं करते हो, यदि तुम परमेश्वर के कार्य का अनुभव नहीं करते हो, तो तुम परमेश्वर के न्याय और उसकी ताड़ना का अनुभव नहीं करोगे, जिसका अर्थ है कि तुम परमेश्वर का अनुसरण नहीं करते हो। हम उन लोगों को क्या कहते हैं जो परमेश्वर का अनुसरण नहीं करते हैं, लेकिन परमेश्वर में विश्वास करते हैं? हम उन्हें धार्मिक विश्वासी कहते हैं। क्या इस तरह का विश्वास उन लोगों के जैसा नहीं है जो धार्मिक दुनिया के भीतर परमेश्वर पर विश्वास करते हैं? वे केवल स्वर्ग के परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, लेकिन वे परमेश्वर का अनुसरण नहीं करते हैं, वे परमेश्वर के कार्य का अनुभव नहीं करते हैं, वे सिर्फ अपनी बाइबल को पकड़े रहते हैं, वे सिर्फ अपने तथाकथित धर्म-शास्त्र को पकड़े रहते हैं। हर दिन, वे एक अनुच्छेद पढ़ते हैं और धार्मिक तरीके से प्रार्थना करते हैं, और बस, यही इसका अंत होता है। जिस तरह से वे रहते हैं उसका उनकी जिंदगी से कोई सरोकार नहीं होता है। वे वही करते हैं जो वे सोचते हैं कि उन्हें करना चाहिए। इसे ही एक धार्मिक विश्वासी होना कहा जाता है। वे परमेश्वर के कार्य को स्वीकार नहीं करते हैं, न ही वे परमेश्वर के कार्य का अनुभव करते हैं। इसलिए, उनकी आस्था सिर्फ उनकी आत्मा के एक शून्य को भरने, उनके दुःखी हृदयों को संतुष्ट करने, और किसी तरह के जीवनाधार की तलाश करने के लिए है। क्या इस तरह के विश्वास वाले लोग परमेश्वर के लिए एक ज़बर्दस्त, खूबसूरत गवाही दे सकते हैं? निश्चित रूप से वे गवाही देने की बात नहीं करेंगे, क्योंकि वे लागत की चर्चा नहीं करते हैं, न ही व्यय की, न आज्ञाकारिता, और न ही जीवन की चर्चा करते हैं। इस वजह से, वे गवाही नहीं देते हैं। इसलिए, जब वे सताए जाते हैं, तो उनमें से बहुत कम लोग अडिग रह पाते हैं। जब उनके जीवन गंभीर जोखिम में होते हैं, तो वे सभी परमेश्वर के साथ विश्वासघात कर देते हैं। शायद तुम लोगों में से कुछ मैंने जो बात अभी-अभी कही है, उसका खंडन करोगे, शायद तुम मुझसे कहोगे: "अनुग्रह के युग में और व्यवस्था के युग में, क्या बहुत से शहीद नहीं हुए थे?" यह ग़लत नहीं है। उन शहीदों में पवित्र आत्मा का कार्य था, उन युगों में वे भी परमेश्वर के अनुयायी थे, ठीक वैसे ही जैसे कि आज हम हैं। वे धार्मिक विश्वासियों का हिस्सा नहीं थे। व्यवस्था के युग के दौरान जो लोग परमेश्वर के कार्य का अनुभव करते थे, ये वे लोग थे जो व्यवस्था के युग में परमेश्वर का अनुसरण करते थे। अनुग्रह के युग के दौरान जो लोग परमेश्वर के कार्य का अनुभव करते थे, ये वे लोग थे जो अनुग्रह के युग में परमेश्वर का अनुसरण करते थे। राज्य के युग में, हममें से जो अंत के दिनों में परमेश्वर के कार्य का अनुभव करते हैं, वे भी परमेश्वर के अनुयायी हैं। हालाँकि, अब अंत के दिनों के देहधारी परमेश्वर के अपने कार्य को व्यक्तिगत रूप से पूरा करने के कारण, वे विश्वासीजो अभी भी अनुग्रह के युग में और व्यवस्था के युग में हैं, उनके विश्वास धार्मिक विश्वास में बदल गए हैं।

— जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति (XI) में "सत्य का अनुसरण करने के अभिप्राय और महत्व के बारे में और चर्चा" से उद्धृत

पहले यह समझना होगा कि धार्मिक मंडलों का गठन कैसे हुआ था और कलीसिया और धर्म के बीच क्या अंतर है। इन बातों को स्पष्ट करना बहुत ज़रूरी है। बाइबल से यह देखना संभव है कि परमेश्वर के कार्य के हर चरण के दौरान, परमेश्वर के चुने हुए लोगों का नेतृत्व उन लोगों ने किया जिन्हें परमेश्वर ने स्वयं आगे बढ़ाया और नियुक्त किया था। उदाहरण के लिए, व्यवस्था के युग के दौरान, परमेश्वर ने इस्राएल के लोगों का सीधा नेतृत्व करने के लिए मूसा का इस्तेमाल किया था, और उसने मूसा से पादरी व्यवस्था का आयोजन करवाया था। मूसा का काम पूरा हो जाने के बाद, पृथ्वी पर और कोई भी ऐसे लोग नहीं थे, जिन्हें सीधे इस्राएलियों का नेतृत्व करने के लिए परमेश्वर ने नियुक्त किया हो। पादरियों का चुनाव अब लोगों द्वारा किया जाने लगा। यही यहूदी धार्मिक मंडल के गठन की पृष्ठभूमि है। तब से, धार्मिक मंडलों में से चुनावों द्वारा यहूदी धर्म की याजक प्रणाली का गठन होता आया है। बहुत बार, धार्मिक मंडल भ्रष्ट हो गए क्योंकि गलत याजक चुने गए थे। जब देहधारी प्रभु यीशु प्रकट हुआ और उसने अनुग्रह के युग के दौरान काम किया, तो धार्मिक मंडलियां मसीह का विरोध और उसकी निंदा करने तथा परमेश्वर का प्रतिरोध करने की सीमा तक गिर गयीं थीं। यह एक ऐसा तथ्य है जिसे हर कोई देख सकता है। जब प्रभु यीशु अपने छुटकारे के कार्य के लिए पृथ्वी पर आया था, उसने व्यक्तिगत रूप से बारह प्रेरितों का चयन किया। पवित्र आत्मा ने भी कार्य करना शुरू किया, और वह प्रभु यीशु के चेलों के साथ था। इस समय, पृथ्वी पर जिन लोगों ने प्रभु यीशु के कार्य को स्वीकार किया था, उनके सम्मलेन को एक कलीसिया कहा जाता था, और इसकी देख-रेख पूरी तरह से परमेश्वर के नियुक्त किये गए लोगों के द्वारा, दूसरे शब्दों में, पवित्र आत्मा द्वारा इस्तेमाल किए गए लोगों के द्वारा होती थी। उस समय सच्ची कलीसिया का निर्माण हुआ और यही कलीसिया का स्रोत है। प्रभु यीशु के देहत्याग, पुनरुत्थान और स्वर्गारोहण के करीब तीस साल बाद, बारह प्रेरितों में से अधिकांश शहीद हो गए थे और पृथ्वी पर कलीसिया की देख-रेख अब सीधे प्रभु यीशु द्वारा नियुक्त प्रेरितों द्वारा नहीं होती थी। इसलिए, विभिन्न प्रकार के धार्मिक समूहों का गठन होना शुरू हुआ। यही अनुग्रह के युग के दौरान धार्मिक मंडलों के गठन की पृष्ठभूमि है। उसके बाद, भले ही लोगों के पास पवित्र आत्मा का कार्य हो या न हो, वे एक कलीसिया का आयोजन कर सकते थे जब तक कि वे बाइबल की विस्तृत व्याख्या कर सकें। जब तक उनके पास कुछ प्रतिभाएँ होती थीं, तब तक वहाँ उनके साथ सहमत होने और उनका अनुसरण करने वाले लोग होते थे। लोग बिना किसी प्रतिबंध के काम और प्रचार कर सकते थे, इसलिए विभिन्न मत और संप्रदाय बनने लगे। एक कलीसिया क्या होती है, और धर्म क्या है? तुम कह सकते हो कि जो पवित्र आत्मा द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले लोगों के नेतृत्व और देख-रेख में है, वह एक कलीसिया है, और जो पवित्र आत्मा द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले लोगों के नेतृत्व और देख-रेख में नहीं है, वह एक धर्म है। यह सबसे आसान, सबसे सच्चा विभाजन है। सच्ची कलीसियाओं में पवित्र आत्मा का कार्य है। धर्मों में विरले ही पवित्र आत्मा का कार्य होता है। अगर हो भी तो यह उन कुछ ही लोगों पर होता है जो वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करते हैं और सत्य की तलाश करते हैं। यही कलीसिया और धर्म के बीच अंतर है। यह सवाल कि क्या चरवाहों पर काम किया जाता है और पवित्र आत्मा द्वारा उन्हें इस्तेमाल किया जाता है, कलीसियाओं के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। अगर चरवाहा कोई ऐसा है जो सत्य को खोजता है और सही मार्ग पर चलता है, तो पवित्र आत्मा का कार्य मौजूद है। अगर चरवाहा ऐसा व्यक्ति नहीं है जो सत्य को खोजता हो, मगर वह फरीसियों के रास्ते पर चलता हो, तो उसमें पवित्र आत्मा का कार्य मौजूद नहीं है। जब तक लोग असली और नकली चरवाहों के बीच भेद कर सकते हैं, वे एक वास्तविक कलीसिया को पा सकते हैं।

— ऊपर से संगति में से उद्धृत

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