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मृत्यु: छठवां घटनाक्रम

इतनी अफरा-तफरी के पश्चात्, इतनी कुंठाओं एवं निराशाओं के पश्चात्, इतने सारे सुखों एवं दुखों और उतार एवं चढ़ावों के पश्चात्, इतने सारे अविस्मरणीय वर्षों के पश्चात्, बार बार ऋतुओं को परिवर्तित होते हुए देखने के पश्चात्, कोई व्यक्ति बिना ध्यान दिए ही जीवन के महत्वपूर्ण मील के पत्थरों को पार कर जाता है, और बिजली के चमकते ही वह स्वयं को अपने जीवन के ढलते हुए वर्षों में पाता है। समय के चिन्हों से उसके सारे शरीर पर मुहर लगाई गई है: वह अब आगे से सीधा खड़ा नहीं हो सकता है, घने काले बालों वाला सिर अब सफेद, एवं चमकदार हो गया है, चमकीली आंखें धुंधली हो गई हैं एवं अँधेरा छा गया है, चिकनी एवं कोमल त्वचा झुर्रीदार एवं दागदार हो गई है। उसकी सुनने की शक्ति कमज़ोर हो गई है, उसके दांत ढीले हो गए हैं एवं गिर गए हैं, उसकी प्रतिक्रियाएं धीमी हो गई हैं, उसकी गतिविधियां सुस्त हो गई हैं। इस मुकाम पर, उसने अपनी जवानी के जोशीले दिनों को पूरी तरह से अलविदा कह दिया है और अपने जीवन की सांझ की हलकी रौशनी में प्रवेश किया है: बुढ़ापा। इसके आगे, वह मृत्यु का सामना करेगा, किसी मानव के जीवन का अंतिम घटनाक्रम।

1. केवल सृष्टिकर्ता के पास ही मनुष्य के जीवन एवं मृत्यु के ऊपर सामर्थ्य है।

यदि किसी व्यक्ति का जन्म उसके पहले के जीवन पर आधारित होता, तो उसकी मृत्यु उसकी नियति के अंत को चिन्हित करती। यदि किसी का जन्म इस जीवन में उसके मिशन का प्रारम्भ होता, तो उसकी मृत्यु उसके मिशन के अन्त को चिन्हित करती। जबकि सृष्टिकर्ता ने किसी व्यक्ति के जन्म के लिए परिस्थितियों की एक निश्चित श्रृंखला को निर्धारित किया है, तो स्पष्ट है कि उसने उसकी मृत्यु के लिए भी परिस्थितियों की एक निश्चित श्रृंखला का इंतज़ाम किया है। दूसरे शब्दों में, कोई भी व्यक्ति संयोगवश पैदा नहीं हुआ है, किसी भी व्यक्ति की मृत्यु अप्रत्याशित नहीं है, और जन्म एवं मृत्यु दोनों ही उसके पिछले एवं वर्तमान जीवन से आवश्यक रूप से जुड़े हुए हैं। किसी व्यक्ति के जन्म एवं मृत्यु की परिस्थितियों को सृष्टिकर्ता के द्वारा पूर्वनिर्धारित किया गया है; यह किसी व्यक्ति की मंज़िल है, और किसी व्यक्ति की नियति है। जैसा कि किसी व्यक्ति के जन्म के बारे में बहुत कुछ कहा जा सकता है, हर एक व्यक्ति की मृत्यु विशेष परिस्थितियों की एक भिन्न श्रृंखला में होगी, इसलिए लोगों के अलग अलग जीवनकाल और उनकी मृत्यु की अलग अलग रीतियांएवं समय होते हैं। कुछ लोग मज़बूत एवं स्वस्थ्य होते हैं और फिर भी जल्दी मर जाते हैं; कुछ लोग कमज़ोर एवं बीमार होते हैं फिर भी अपने बुढ़ापे तक जीवित रहते हैं, और शान्तिपूर्वक मर जाते हैं। कुछ अप्राकृतिक कारणों से नाश हो जाते हैं, और अन्य प्राकृतिक कारणों से।कुछ घर से दूर अपने जीवन को समाप्त करते हैं, अन्य अपने प्रियों के साथ उनके सानिध्य में अपनी आँखें हमेशा के लिए बन्द कर लेते हैं। कुछ अधर में मर जाते हैं, अन्य धरती के नीचे।कुछ पानी के नीचे डूब जाते हैं, अन्य आपदाओं में खो जाते हैं। कुछ सुबह मरते हैं, कुछ रात्रि में.... हर कोई एक शानदार जन्म, एक शानदार ज़िन्दगी, और एक गौरवशाली मृत्यु की कामना करता है, परन्तु कोई भी व्यक्ति अपनी स्वयं की नियति को पार नहीं कर सकता है, कोई भी सृष्टिकर्ता की संप्रभुता से बचकर निकलनहीं सकता है। यह मनुष्य की नियति है। मनुष्य अपने भविष्य के लिए सभी प्रकार की योजनाएं बना सकता है, परन्तु कोई भी अपने जन्म की रीति एवं समय और संसार से अपने प्रस्थान की योजना नहीं बना सकता है। यद्यपि लोग मृत्यु को टालने एवं उसका प्रतिरोध करने के लिए भरसक कोशिश करते है, फिर भी उन्हें बिना बताए मृत्यु ख़ामोशी से अभी भी उनके पास चली आती है। कोई नहीं जानता है कि वे कब मर जाएंगे या वे कैसे मर जाएंगे, और यह तो बिलकुल भी नहीं जानते हैं कि यह कहाँ होगा। स्पष्ट रूप से, यह मानवता नहीं है जो जीवन एवं मरण के ऊपर सामर्थ्य रखती है, और न ही इस प्राकृतिक संसार में कोई प्राणी, परन्तु केवल सृष्टिकर्ता ही सामर्थ्य रखता है, जिसका अधिकार अद्वितीय है। मानवजाति का जीवन एवं मृत्यु प्राकृतिक संसार के कुछ नियमों का नतीजा नहीं है, परन्तु सृष्टिकर्ता के अधिकार की संप्रभुता का एक परिणाम है।

2. मृत्यु के भय के द्वारा ऐसे व्यक्ति का निरन्तर पीछा किया जाएगा जो सृष्टिकर्ता की संप्रभुता को नहीं जानता है

जब कोई व्यक्ति वृद्धावस्था में प्रवेश करता है, तो ऐसी चुनौती जिसका वह सामना करता है वह परिवार के लिए आपूर्ति करना नहीं है या जीवन में अपनी भव्य महत्वाकांक्षाओं को निर्धारित करना नहीं है, परन्तु वह चुनौती जिसका वह सामना करता है वह यह है कि किस प्रकार अपने जीवन को अलविदा कहें, किस प्रकार अपने जीवन के अंत तक पहुंचें, और किस प्रकार उस समयावधि को अपने अस्तित्व के अंत में रखें। हालाँकि सतह पर ऐसा दिखाई देता है कि लोग मृत्यु पर थोड़ा सा ही ध्यान देते हैं, फिर भी कोई इस विषय पर खोजबीन करने से परहेज नहीं कर सकता है, क्योंकि कोई भी नहीं जानता है कि मृत्यु के पार कोई और संसार है या नहीं, एक ऐसा संसार जिसे मनुष्य आभास या एहसास नहीं कर सकता है, एक ऐसा संसार जिसके बारे में कोई कुछ भी नहीं जानता है। इससे सामने खड़ी मृत्यु का सामना करने के लिए लोग डर जाते हैं, वे इसका सामना करने से डरते हैं जैसा उनको करना चाहिए, और इसके बजाए वे इस विषय को टालने के लिए भरसक कोशिश करते हैं। और इस प्रकार यह प्रत्येक व्यक्ति को मृत्यु के भय से भर देता है, और जीवन के इस अपरिहार्य सत्य पर रहस्य का परदा जोड़ देता है, और प्रत्येक व्यक्ति के हृदय पर लगातार बने रहनेवाली छाया डाल देता है।

जब किसी व्यक्ति को लगता है कि उसका शरीर बद से बदतर हो रहा है, जब वह आभास करता है कि वह मृत्यु के और करीब आ रहा है, तो उसे एक अजीब सा डर, एवं अवर्णनीय भय का एहसास होने लगता है। मृत्यु के भय से वह और भी अधिक अकेला एवं असहाय महसूस करने लगता है, और इस मुकाम पर वह स्वयं से पूछता हैः मनुष्य कहाँ से आया है? मनुष्य कहाँ जा रहा है? क्या मनुष्य इसी तरह से मरनेवाला है, इस जीवन के साथ जो यों ही बेपरवाही से गुज़़र जाता है? क्या यही वह समय है जो मनुष्य के जीवन के अंत को चिन्हित करता है? अंत में, जीवन का क्या अर्थ है? बहरहाल, जीवन का मूल्य क्या है? क्या यह प्रसिद्धि एवं सौभाग्य के विषय में है? क्या यह परिवार को बढ़ाने के विषय में है? ... इसके बावजूद कि किसी ने इन विशेष प्रश्नों के बारे में सोचा है या नहीं, इसके बावजूद कि वह कितनी गहराई से मृत्यु से डरता है या नहीं, क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति के हृदय की गहराई में हमेशा से इन रहस्यों की जांच-पड़ताल करने की इच्छा, एवं जीवन के विषय में नासमझी की भावना होती है, और इनके साथ मिली हुई होती है,संसार के विषय में भावुकता,एवं छोड़कर जाने की अनिच्छा । कदाचित् कोई भी स्पष्ट तौर पर नहीं कह सकता है कि वह क्या है जिससे मनुष्य भयभीत होता है, वह क्या है जिसकी मनुष्य जाँच-पड़ताल करना चाहता है, वह क्या है जिसके विषय में वह भावुक है और वह किसे पीछे छोड़ने के लिए अनिच्छुक है।

क्योंकि वे मृत्यु से डरते हैं, इसलिए लोग बहुत ज्यादा चिंता करते है; क्योंकि वे मृत्यु से डरते हैं, इसलिए ऐसा बहुत कुछ है जिसे वे जाने नहीं देना चाहते हैं। जब वे मरने वाले होते हैं, तो कुछ लोग इसके या उसके विषय में कुढ़ते हैं; वे अपने बच्चों, अपने प्रियों, एवं धन-सम्पत्ति की चिंता करते हैं, मानो चिंता करके वे उस पीड़ा एवं भय को मिटा सकते हैं जो मृत्यु लेकर आती है, मानो जीवतों के साथ एक प्रकार की घनिष्ठता को बनाए रखने के द्वारा वे अपनी उस लाचारी एवं अकेलेपन से बच सकते हैं जो मृत्यु के साथ साथ आती है। मनुष्य के हृदय की गहराई में एक अजीब सा भय होता है, अपने प्रियजनों से बिछड़ जाने का भय, फिर कभी नीले आसमान पर निगाह न डाल पाने का भय, एवं फिर कभी इस भौतिक संसार पर निगाह न डाल पाने का भय। एक अकेला आत्मा, जो अपने प्रियजनों की संगति का आदी हो चुका है, वह अपनी पकड़ को ढीला करने और बिलकुल अकेले ही एक अनजाने एवं अपरिचित संसार में प्रस्थान करने के लिए अनिच्छुक है।

3. एक ऐसा जीवन जो प्रसिद्धि एवं सौभाग्य की तलाश करते हुए गुज़रा है मृत्यु का सामना होने पर उसे नुकसान होगा

सृष्टिकर्ता की संप्रभुता एवं पूर्वनिर्धारण के कारण, एक अकेला आत्मा जिसने शून्य से आरम्भ किया था वह परिवार एवं माता पिता को प्राप्त करता है, मानव जाति का एक सदस्य बनने का मौका प्राप्त करता है, मानव जीवन का अनुभव करने एवं इस संसार को देखने का मौका प्राप्त करता है; और साथ ही यह सृष्टिकर्ता की संप्रभुता का भी अनुभव करने का मौका प्राप्त करता है, जिससे सृष्टिकर्ता के द्वारा सृष्टि की अद्भुतता को जान सके, और सबसे बढ़कर, सृष्टिकर्ता के अधिकार को जान सके एवं उसके अधीन हो सके। परन्तु अधिकांश लोग वास्तव में इस दुर्लभ एवं क्षणिक अवसर को लपक नहीं पाते हैं। कोई व्यक्ति नियति के विरुद्ध लड़ते हुए जीवन भर की ऊर्जा को गवां देता है, अपने परिवार को खिलाने पिलाने की कोशिश करते हुए और धन-सम्पत्ति एवं हैसियत के बीच झूलते हुए अपना सारा समय बिता देता है। ऐसी चीज़ें जिन्हें लोग संजोकर रखते हैं वह परिवार, पैसा एवं प्रसिद्धि है; वे इन्हें जीवन में सबसे महत्वपूर्ण चीज़ों के रूप में देखते हैं। सभी लोग अपनी नियति के विषय में शिकायत करते हैं, फिर भी वे अपने दिमाग में इन प्रश्नों को पीछे धकेल देते हैं कि इसे जांचना एवं समझना अति महत्वपूर्ण हैः मनुष्य जीवित क्यों है, उसे कैसे जीवनयापन करना चाहिए, जीवन का मूल्य व अर्थ क्या है। उनका सम्पूर्ण जीवन, चाहे कितने ही वर्षों का क्यों न हो, वहसिर्फ़ प्रसिद्धि एवं सौभाग्य को तलाशते हुए शीघ्रता से गुज़र जाता है, तब तक जब तक कि उनकी युवा अवस्था चली नहीं जाती है, उनके बाल सफेद नहीं हो जाते एवं उनकी त्वचा में झुर्रियां नहीं पड़ जाती हैं; जब तक वे देख नहीं लेते हैं कि प्रसिद्धि व सौभाय किसी का बुढ़ापा आने से रोक नहीं सकते, यह कि धन हृदय के खालीपन को भर नहीं सकता है; जब तक वे यह नहीं समझ लेते हैं कि कोई भी व्यक्ति जन्म, उम्र के बढ़ने, बीमारी एवं मृत्यु के नियम से बच नहीं सकता है, और यह कि जो कुछ नियति ने संजोकर रखा हैं कोई उससे बच नहीं सकता है। जब उन्हें जीवन के अंतिम घटनाक्रम का सामना करने के लिए मजबूर किया जाता है केवल तभी वे सचमुच समझ पाते हैं कि चाहे कोई करोड़ों रुपयों की सम्पत्ति का मालिक हो जाए, भले ही किसी को विशेषाधिकार प्राप्त हो व ऊंचे पद पर हो, कोई भी मृत्यु से नहीं बच सकता, प्रत्येक मनुष्य अपनी मूल स्थिति में वापस लौटेगा: एक अकेला आत्मा, जिसके नाम कुछ भी नहीं है। जब किसी व्यक्ति के पास माता पिता होते हैं, तो वह सोचता है कि उसके माता पिता ही सब कुछ हैं; जब किसी व्यक्ति के पास सम्पत्ति होती है, तो वह सोचता है कि पैसा ही उसका मुख्य आधार है, यही उसके जीवन की सम्पत्ति है; जब लोगों के पास हैसियत होती है, तो वे उससे मज़बूती से चिपक जाते हैं और इसके लिए अपने जीवन को भी जोखिम में डाल देते हैं। जब लोग इस संसार को छोड़कर जाने लगते हैं केवल तभी वे यह सोचते हैं कि जिन चीज़ों का अनुसरण करते हुए उन्होंने अपने जीवन को बिताया है वे और कुछ नहीं बल्कि क्षणभंगुर बादल हैं, वे उनमें से किसी को भी थामे नहीं रह सकते हैं, वे उनमें से किसी को भी अपने साथ नहीं ले जा सकते हैं, उनमें से कोई भी मृत्यु से बच नहीं सकता है, उनमें से कोई भी उस आत्मा की वापसी यात्रा में उस अकेले आत्मा का साथ एवं सांत्वना नहीं दे सकता है; और इतना ही नहीं, उनमें से कोई भी किसी व्यक्ति का उद्धार नहीं कर सकता, एवं मृत्यु से पार जाने की अनुमति नहीं दे सकता है। प्रसिद्धि एवं सौभाग्य जिन्हें कोई व्यक्ति इस भौतिक संसार में हासिल करता है, वे उसे अल्पकालीन संतुष्टि, थोड़े समय का आनन्द, एवं सुकून का एक झूठा एहसास प्रदान करते हैं, और उसे उसके मार्ग से भटका देते हैं। और इस प्रकार लोग, जब वे मानवता के इस विशाल समुद्र में हाथ पैर मारते हैं, शान्ति, आराम, एवं हृदय की निश्चलता की लालसा करते हैं, तो वे लहरों के नीचे बार बार डूबते जाते हैं। जब लोगों ने अभी तक उन प्रश्नों का पता नहीं लगाया है जिन्हें समझना बहुत ही महत्वपूर्ण है-वे कहाँ से आते हैं, वे जीवित क्यों हैं, वे कहाँ जा रहे हैं, इत्यादि-वे प्रसिद्धि एवं सौभाग्य के द्वारा मोहित हो जाते हैं, गुमराह हो जाते हैं, उनके द्वारा नियन्त्रित किए जाते हैं और अंततः हमेशा के लिए खो जाते हैं। समय उड़ जाता हैः पलक झपकते ही वर्ष बीत जाते हैं, इससे पहले कि कोई इसका एहसास करता है, वह अपने जीवन के उत्तम वर्षों को अलविदा कह चुका होता है। जब कोई व्यक्ति जल्द ही संसार से जाने वाला होता है, तो वह आहिस्ता आहिस्ता इस एहसास की ओर पहुँचता है कि संसार में हर एक चीज़ दूर हो रही है, यह कि वह उन चीज़ों को थामे नहीं रह सकता है जो उसके अधिकार में थी; तब वह सचमुच में महसूस करता है कि अब उससे पास कुछ भी नहीं है, एक रोते हुए शिशु के समान जो अभी अभी इस संसार में आया है। इस मुकाम पर, कोई व्यक्ति इस बात पर विचार करने के लिए बाध्य हो जाता है कि उसने जीवन में क्या किया है, जीवित रहने का मूल्य क्या है, इसका अर्थ क्या है, वह इस संसार में क्यों आया है; इस मुकाम पर, वह और भी अधिक जानना चाहता है कि वास्तव में मरने के बाद कोई जीवन है या नहीं, स्वर्ग वास्तव में है या नहीं, वास्तव में गुनाहों की सज़ा है या नहीं .... जब कोई व्यक्ति मृत्यु के और नज़दीक आता है, तो वह और भी अधिक यह समझना चाहता है कि वास्तव में जीवन किस के विषय में है; जब कोई व्यक्ति मृत्यु के और नज़दीक आता है, तो उसका हृदय और भी अधिक खाली महसूस होता है, जब कोई व्यक्ति मृत्यु के और नज़दीक आता है, तो वह और भी अधिक असहाय महसूस करता है; और इस प्रकार मृत्यु के विषय में उसका भय दिन ब दिन बढ़ता ही जाता है। जब मृत्यु नज़दीक आने लगती है तो मनुष्य इस तरह व्यवहार क्यों करता है, इसके दो कारण हैं: पहला, वे अपनी प्रसिद्धि एवं सम्पत्ति को खोने वाले हैं जिन पर उनका जीवन आधारित था, वे हर उस चीज़ को पीछे छोड़ने वाले हैं जो इस संसार में दृश्यमान है; और दूसरा, वे बिलकुल अकेले ही एक अनजाने संसार, एक रहस्मयी एवं अज्ञात आयाम का सामना करने वाले हैं जहाँ वे कदम रखने से भयभीत होते हैं, जहाँ उनके पास कोई प्रिय जन नहीं है और किसी भी प्रकार की सहायता नहीं है। इन दो कारणों से, हर एक व्यक्ति जो मृत्यु का सामना करता है वह बेचैनी महसूस करता है, अत्यंत भय एवं लाचारी के एहसास का अनुभव करता है जिनको उन्होंने पहले कभी नहीं जाना था। जब लोग वास्तव में इस मुकाम पर पहुंचते हैं केवल तभी वे महसूस करते हैं कि पहली बात जो उन्हें समझनी चाहिये, जब कोई इस पृथ्वी पर कदम रखता है, वह है कि मानव कहाँ से आया है, लोग जीवित क्यों हैं, मानव की नियति को कौन नियन्त्रित करता है, कौन मानव के अस्तित्व के लिए आपूर्ति करता है और किसके पास उसके अस्तित्व के ऊपर संप्रभुता है। ये जीवन में वास्तविक सम्पत्तियां हैं, मानव के जीवित बचे रहने के लिए आवश्यक आधार हैं, यह सीखना नहीं है कि किस प्रकार अपने परिवार की आपूर्ति करें या किस प्रकार प्रसिद्धि एवं धन-सम्पत्ति प्राप्त करें, यह सीखना नहीं है कि किस प्रकार भीड़ से अलग दिखें या किस प्रकार और भी अधिक समृद्ध जीवन बिताएं, और यह सीखना तो बिलकुल नहीं कि किस प्रकार दूसरों से आगे बढ़ें और उनके विरुद्ध सफलतापूर्वक प्रतिस्पर्धा करें। हालाँकि जीवित रहने के लिये विभिन्न कुशलताएं जिन पर महारत हासिल करने के लिए लोग अपना जीवन खर्च कर देते हैं वे भरपूर भौतिक सुख सुविधाएं दे सकते हैं, फिर भी वे किसी मनुष्य के हृदय में सच्ची शान्ति एवं सांत्वना नहीं ला सकते हैं, परन्तु इसके बदले वे लोगों को निरन्तर उनकी दिशा से भटका देते हैं, उन्हें अपने आप पर नियन्त्रण करने में कठिनाई होती है, वे जीवन का अर्थ सीखने के लिए हर अवसर को खो देते हैं; और किस प्रकार उचित रीति से मृत्यु का सामना करें इसके विषय में वे परेशानी की एक नकारात्मक एवं गुप्त भावना पैदा कर लेते हैं। इस प्रकार, लोगों की ज़िन्दगियां बर्बाद हो जाती हैं। सृष्टिकर्ता प्रत्येक से उचित रीति से व्यवहार करता है, हर एक को जीवन भर के अवसर प्रदान करता है कि वे उसकी संप्रभुता का अनुभव करें एवं उसे जानें, फिर भी, जब मृत्यु नज़दीक आती है, जब मृत्यु का संकट उसके ऊपर लटकने लगता है, केवल तभी वह उस रोशनी को देखना प्रारम्भ करता है–और तब बहुत देर हो जाती है।

लोग धन-दौलत एवं प्रसिद्धि का पीछा करते हुए अपनी ज़िन्दगियों को बिता देते हैं; वे इन तिनकों को मज़बूती से पकड़े रहते हैं, यह सोचते हुए कि वे उनके जीविकोपार्जन का एकमात्र साधन है, मानों उन्हें प्राप्त करने के द्वारा वे निरन्तर जीवित रह सकते हैं, और अपने आपको मृत्यु से बचा सकते हैं। परन्तु जब वे मरने के करीब होते हैं केवल तभी उनको महसूस होता है कि ये चीज़ें उनसे कितनी दूर हैं, वे मृत्यु का सामना होने पर कितने कमज़ोर हैं, वे कितनी आसानी से बिखर सकते हैं, वे कितने अकेले एवं असहाय हैं, और सहायता के लिए कहीं नहीं जा सकते हैं। वे एहसास करते हैं कि जीवन धन दौलत एवं प्रसिद्धि से खरीदा नहीं जा सकता है, यह कि इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता है कि कोई व्यक्ति कितना धनी है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि उस पुरुष एवं स्त्री का पद कितना ऊंचा है, क्योंकि मृत्यु का सामना होने पर सभी लोग समान रूप से कंगाल एवं महत्वहीन होते हैं। वे एहसास करते हैं कि धन-दौलत जीवन को खरीद नहीं सकती, प्रसिद्धि मृत्यु को मिटा नहीं सकती, यह कि न धन-दौलत और न ही प्रसिद्धि किसी व्यक्ति के जीवन को एक मिनट, या एक पल के लिए भी बढ़ा सकती है। जितना अधिक लोग इस प्रकार से सोचते हैं, उतना ही अधिक वे निरन्तर जीवित रहने की लालसा करते हैं; जितना अधिक लोग इस प्रकार से सोचते हैं, उतना ही अधिक वे मृत्यु के आगमन से भयभीत होते हैं। केवल इसी मुकाम पर वे सचमुच में एहसास करते हैं कि उनका जीवन उनसे सम्बन्धित नहीं है, उनके नियन्त्रण में नहीं है, और कोई यह नहीं कह सकता है कि वह जीवित रहेगा या मर जाएगा, यह सब उसके नियन्त्रण से बाहर होता है।

4. सृष्टिकर्ता के प्रभुत्व के अधीन आ जाओ और शान्ति से मृत्यु का सामना करो

उस घड़ी जब किसी व्यक्ति का जन्म होता है, तब एक अकेला आत्मा इस पृथ्वी पर जीवन के विषय में अपने अनुभवऔर सृष्टिकर्ता के अधिकार के विषय में अपने अनुभव का प्रारम्भ करता है जिसे सृष्टिकर्ता ने उसके लिए व्यवस्थित किया है। कहने की आवश्यकता नहीं है, उस व्यक्ति, अर्थात् उस आत्मा, के लिए यह सृष्टिकर्ता की संप्रभुता के ज्ञान को अर्जित करने के लिए, और उसके अधिकार को जानने और व्यक्तिगत तौर पर इसका अनुभव करने के लिए सबसे उत्तम अवसर है। लोग नियति के नियमों के अधीन अपने जीवन को जीते हैं जिसे सृष्टिकर्ता के द्वारा उनके लिए व्यवस्थित किया गया है, और किसी भी न्यायसंगत व्यक्ति के लिए जिसके पास विवेक है, सृष्टिकर्ता की संप्रभुता को स्वीकार करना और पृथ्वी पर मनुष्यों के कई दशकों के जीवनक्रम के ऊपर उसके अधिकार को पहचानना कोई कठिन कार्य नहीं है कि उसे किया न जा सके। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति के लिए यह पहचानना बहुत ही सरल होना चाहिए, कई दशकों से पुरुष या स्त्री के स्वयं के जीवन के अनुभवों के माध्यम से, कि सभी मनुष्यों की नियति को पूर्वनिर्धारित किया गया है, और इस बात का आभास करना एवं इसे संक्षेप में कहना चाहिए कि जीवित रहने का अर्थ क्या है। ठीक उसी समय जब कोई व्यक्ति जीवन की इन शिक्षाओं को स्वीकार करता है, तब वह धीरे-धीरे यह समझने लगता है कि जीवन कहाँ से आया है, यह आभास करता है कि हृदय को सचमुच में किसकी आवश्यकता है, कौन जीवन के सही मार्ग पर उसकी अगुवाई करेगा, किसी मानव के जीवन का मिशन एवं लक्ष्य क्या होना चाहिए; और वह धीरे-धीरे पहचानने लगेगा कि यदि वह सृष्टिकर्ता की आराधना नहीं करता है, यदि वह उसके प्रभुत्व के अधीन नहीं आता है, तो जब वह मृत्यु का सामना करता है–जब एक आत्मा एक बार फिर से सृष्टिकर्ता का सामना करने वाला है–तब उसका हृदय असीमित भय एवं बेचैनी से भर जाएगा। यदि कोई व्यक्ति इस संसार में कुछ दशकों से अस्तित्व में रहा है और फिर भी नहीं जान पाया है कि मानव जीवन कहाँ से आया है, अभी तक नहीं पहचान पाया है कि किसकी हथेली में मानव की नियति होती है, तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि वह शान्ति से मृत्यु का सामना करने के योग्य नहीं होगा या नहीं होगी। कोई व्यक्ति जिसने जीवन के कई दशकों का अनुभव करने के बाद सृष्टिकर्ता की संप्रभुता के ज्ञान को हासिल किया है, वह ऐसा व्यक्ति है जिसके पास जीवन के अर्थ एवं मूल्य की सही समझ है; वह ऐसा व्यक्ति है जिसके पास जीवन के उद्देश्य का गहरा ज्ञान है, और सृष्टिकर्ता की संप्रभुता का सच्चा अनुभव एवं सच्ची समझ है; और उससे भी बढ़कर, वह ऐसा व्यक्ति है जो सृष्टिकर्ता के अधिकार के अधीन हो सकता है। ऐसा व्यक्ति परमेश्वर के द्वारा मानवजाति की सृष्टि के अर्थ को समझता है, यह समझता है कि मनुष्य को सृष्टिकर्ता की आराधना करनी चाहिए, यह कि जो कुछ मनुष्य के पास है वह सृष्टिकर्ता से आता है और वह किसी दिन उसके पास लौटेगा जो भविष्य में ज़्यादा दूर नहीं है; ऐसा व्यक्ति समझता है कि सृष्टिकर्ता मनुष्य के जन्म की व्यवस्था करता है और उसके पास मनुष्य की मृत्यु के ऊपर संप्रभुता है, और यह कि जीवन व मृत्यु दोनों सृष्टिकर्ता के अधिकार द्वारा पूर्वनिर्धारित हैं। अतः, जब कोई व्यक्ति सचमुच में इन बातों का आभास कर लेता है, तो वह शांति से मृत्यु का सामना करने, अपनी सारी संसारिक सम्पत्तियों को शांतिपूर्वक दूर करने, और बाद में जो कुछ आता है उसको खुशी से स्वीकार करने एवं उसके अधीन होने, और सृष्टिकर्ता द्वारा व्यवस्थित जीवन के अंतिम घटनाक्रम का स्वागत करने योग्य हो जाएगा बजाए इसके कि आँख बंद करके इससे भय खाए और इसके विरुद्ध संघर्ष करे। यदि कोई जीवन को सृष्टिकर्ता की संप्रभुता का अनुभव करने के लिए एक अवसर के रूप में देखता है और उसके अधिकार को जानने लगता है, यदि कोई अपने जीवन को सृजे गये प्राणी के रूप में अपने कर्तव्य को निभाने के लिए और अपने मिशन को पूरा करने के लिए एक दुर्लभ अवसर के रूप में देखता है, तो उसके पास आवश्यक रूप से जीवन के विषय में सही नज़रिया होगा, और सृष्टिकर्ता के द्वारा वह आशीषित जीवन बिताएगा और मार्गदर्शन पाएगा, वह सृष्टिकर्ता के प्रकाश में चलेगा, सृष्टिकर्ता की संप्रभुता को जानेगा, उसके प्रभुत्व में आएगा, और उसके अद्भुत कार्यों एवं उसके अधिकार का एक गवाह बनेगा। कहने की आवश्यकता नहीं है, ऐसे व्यक्ति को सृष्टिकर्ता के द्वारा प्रेम किया जाएगा एवं स्वीकार किया जाएगा, और केवल ऐसा व्यक्ति ही मृत्यु के प्रति शांत मनोवृत्ति रख सकता है, और जीवन के अंतिम घटनाक्रम का प्रसन्नता से स्वागत कर सकता है। अय्यूब स्पष्ट रूप से मृत्यु के प्रति इस प्रकार की मनोवृत्ति रखता था; वह जीवन के अंतिम घटनाक्रम को प्रसन्नता से स्वीकार करने के लिए ऐसी स्थिति में था, और अपनी जीवन यात्रा को एक सुखदाई निष्कर्ष पर पहुँचाने के बाद, एवं जीवन में अपने मिशन को पूरा करने के बाद, वह सृष्टिकर्ता के पास वापस लौट गया।

5. अय्यूब के जीवन के उद्यमों एवं उपलब्धियों ने उसे शान्तिपूर्वक मृत्यु का सामना करने की अनुमति दी

पवित्र शास्त्र में अय्यूब के विषय में ऐसा लिखा हुआ हैः "अन्त में अय्यूब वृद्धावस्था में दीर्घायु होकर मर गया" (अय्यूब 42:17)। इसका अर्थ है कि जब अय्यूब की मृत्यु हुई, उसे कोई पछतावा नहीं था और उसने किसी तकलीफ का एहसास नहीं किया, परन्तु प्राकृतिक रुप से इस संसार से चला गया। जैसा हर कोई जानता है, अय्यूब ऐसा इंसान था जो परमेश्वर से डरता था और बुराई से दूर रहता था जब वह जीवित था; परमेश्वर ने उसके धार्मिकता के कार्यों की सराहना की थी, लोगों ने उन्हें स्मरण रखा, और उसका जीवन किसी भी इंसान से बढ़कर अहमियत एवं महत्व रखता था। अय्यूब ने परमेश्वर की आशीषों का आनन्द लिया और उसे पृथ्वी पर उसके द्वारा धर्मी कहा गया, और साथ ही परमेश्वर के द्वारा उसे परखा गया और शैतान के द्वारा उसकी परीक्षा भी ली गई; वह परमेश्वर का गवाह बना रहा और वह धर्मी पुरुष कहलाने के योग्य था। परमेश्वर के द्वारा परखे जाने के बाद कई दशकों के दौरान, उसने ऐसा जीवन बिताया जो पहले से कहीं अधिक बहुमूल्य,अर्थपूर्ण, स्थिर, एवं शान्तिपूर्ण था। उसकी धार्मिकता के कार्यों के कारण, परमेश्वर ने उसे परखा था; उसकी धार्मिकता के कार्यों के कारण, परमेश्वर उसके सामने प्रकट हुआ और सीधे उससे बात की। अतः, उसके परखे जाने के बाद के वर्षों के दौरान अय्यूब ने जीवन के मूल्यों को और अधिक ठोस तरीके से समझाऔर उसकी सराहना की थी, सृष्टिकर्ता की संप्रभुता की और अधिक गहरी समझ प्राप्त की थी, और किस प्रकार सृष्टिकर्ता अपनी आशीषों को देता एवं वापस लेता है इसके विषय में और अधिक सटीक एवं निश्चित ज्ञान हासिल किया था। बाईबिल में दर्ज है कि यहोवा परमेश्वर ने अय्यूब को पहले की अपेक्षा कहीं अधिक आशीषें प्रदान की थीं, सृष्टिकर्ता की संप्रभुता को जानने के लिए एवं शान्ति से मृत्यु का सामना करने के लिए उसने अय्यूब को और भी बेहतर स्थिति में रखा था। इसलिएअय्यूब, जब वृद्ध हुआ और मृत्यु का सामना किया, तो वह निश्चित रूप से अपनी सम्पत्ति के विषय में चिंतित नहीं हुआ होगा। उसे कोई चिन्ता न थी, कुछ पछतावा नहीं था, और वास्तव में वह मृत्यु से भयभीत नहीं था; क्योंकि उसने अपना सम्पूर्ण जीवन परमेश्वर का भय मानते हुए, बुराई से दूर रहते हुए बिताया था, और अपने स्वयं के अन्त के बारे में चिन्ता करने का कोई कारण नहीं था। आज कितने लोग हैं जो अय्यूब के सभी मार्गों के अनुसार कार्य कर सकते हैं जब उसने अपनी मृत्यु का सामना किया था? कोई भी व्यक्ति इस प्रकार के सरल बाह्य व्यवहार को बनाए रखने रखने के योग्य क्यों नहीं है? केवल एक ही कारण हैः अय्यूब ने अपना जीवन परमेश्वर की संप्रभुता के प्रति विश्वास, पहचान, एवं समर्पण के आत्मनिष्ठ उद्यम (अनुसरण) में बिताया था, और यह इस विश्वास, पहचान एवं समर्पण के साथ था कि उसने अपने जीवन में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम को उत्तीर्ण किया था, औरअपने जीवन के अंतिम घटनाक्रम का अभिनन्दन किया था। इसके बावजूद कि अय्यूब ने जो कुछ अनुभव किया, जीवन में उसकेउद्यम (अनुसरण) एवं लक्ष्य खुशगवार थे, न कि कष्टपूर्ण। अय्यूब आनन्दित था न केवल उन आशीषों या सराहनाओं के कारण जिन्हें सृष्टिकर्ता के द्वारा उसे प्रदान किया गया था, किन्तु अधिक महत्वपूर्ण रूप से, अपने उद्यमों (अनुसरण) एवं जीवन के लक्ष्यों के कारण, सृष्टिकर्ता की संप्रभुता के क्रमिक ज्ञान एवं सही समझ के कारण जिन्हें उसने परमेश्वर का भय मानने एवं बुराई से दूर रहने के माध्यम से अर्जित किया था, और इससे अतिरिक्त, उसके अद्भुत कार्यों के कारण जिन्हें अय्यूब ने सृष्टिकर्ता की संप्रभुता के प्रति एक अधीनस्थ व्यक्ति के रूप में अपने समय के दौरान व्यक्तिगत रूप से अनुभव किया था, और मनुष्य एवं परमेश्वर के बीच सह-अस्तित्व, जान-पहचान, एवं परस्पर समझ के सरगर्म एवं अविस्मरणीय अनुभवों एवं यादों के कारण; उस राहत एवं प्रसन्नता के कारण जो सृष्टिकर्ता की इच्छा को जानने से आई थी; उस परम आदर के कारण जो यह देखने से बाद उभरा कि वह कितना महान, अद्भुत, प्रेमी एवं विश्वासयोग्य है। वह कारण कि अय्यूब बिना किसी कष्ट के अपनी मृत्यु का सामना करने के योग्य हो पाया वह यह था क्योंकि वह जानता था कि, मरने पर, वह सृष्टिकर्ता के पास वापस लौट जाएगा। और जीवन में यही उसका उद्यम एवं उपलब्धि थी जिसने उसे शान्ति से मृत्यु का सामना करने, सृष्टिकर्ता के द्वारा उसके जीवन को वापस लेने की सम्भावना का स्थिर हृदय के साथ सामना करने, और इसके अतिरिक्त, शुद्ध एवं चिंतामुक्त होकर, सृष्टिकर्ता के सामने खड़े होने की अनुमति दी थी। क्या आजकल लोग उस प्रकार की प्रसन्नता को हासिल कर सकते हैं जो अय्यूब के पास थी? क्या तुम सब स्वयं ऐसा करने के स्थिति में हो? जबकि लोग आजकल ऐसा करने की स्थिति में होते हैं, फिर भी वे अय्यूब के समान खुशी से जीवन बिताने में असमर्थ क्यों हैं? वे मृत्यु के भय के कष्ट से बच निकलने में असमर्थ क्यों हैं? मृत्यु का सामना करते समय, कुछ पसीने से भीग जाते हैं; कुछ कांपते, मूर्छित होते, तथा स्वर्ग एवं मनुष्य के विरुद्ध समान रूप से तीखे शब्दों से हमला करते हैं, और यहाँ तक कि रोते एवं विलाप करते हैं। ये किसी भी तरह से अचानक होनेवाली प्रतिक्रियाएं नहीं हैं जो तब घटित होती हैं जब मृत्यु नज़दीक आ जाती है।लोग मुख्यत: ऐसे शर्मनाक तरीकों से व्यवहार करते हैं क्योंकि, अपने हृदय की गहराई में वे मृत्यु से डरते हैं, क्योंकि उनके पास परमेश्वर की संप्रभुता एवं उसके इंतज़ामों के विषय में स्पष्ट ज्ञान एवं समझ नहीं है, और सही मायने में वे उनके अधीन तो बिलकुल भी नहीं होते हैं; क्योंकि लोगों को स्वयं ही हर चीज़ का इंतज़ाम एवं शासन करने, अपनी नियति, अपने जीवन एवं मृत्यु का नियन्त्रण करने के सिवाय और कुछ नहीं चाहिए। इसलिए इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि लोग कभी मृत्यु के भय से बचने में समर्थ नहीं होते हैं।

6. सिर्फ सृष्टिकर्ता की संप्रभुता को स्वीकार करने के द्वारा ही कोई व्यक्ति उसकी ओर वापस आ सकता है

जब किसी व्यक्ति के पास सृष्टिकर्ता की संप्रभुता एवं उसके इंतज़ामों के विषय में स्पष्ट ज्ञान एवं अनुभव नहीं होता है, तो नियति एवं मृत्यु के विषय में उसका ज्ञान आवश्यक रूप से असंगत होगा। लोग स्पष्ट रूप से नहीं देख सकते हैं कि यह सब परमेश्वर की हथेली में होता है, यह एहसास नहीं कर सकते हैं कि परमेश्वर उनके ऊपर नियन्त्रण एवं संप्रभुता रखता है, यह पहचान नहीं सकते हैं कि मनुष्य ऐसी संप्रभुता को दूर नहीं फेंक सकता है या उससे बच नहीं सकता है; और इस प्रकार मृत्यु का सामना करते समय उनके अंतिम शब्दों, चिंताओं एवं पछतावों का कोई अन्त नहीं होता है। वे अत्याधिक बोझ, अत्याधिक अनिच्छाओं, अत्याधिक भ्रम, से नीचे दबे हुए होते हैं, और इन सब से उन्हें मृत्यु का भय होता है। क्योंकि कोई भी व्यक्ति जिसने इस संसार में जन्म लिया है, उनका जन्म ज़रूरी होता है और उसकी मृत्यु अनिवार्य होती है, और कोई भी इस पथक्रम से बढ़कर नहीं हो सकता है। यदि कोई इस संसार से बिना किसी तकलीफ के चले जाना चाहता है, यदि कोई जीवन के इस अंतिम घटनाक्रम का बिना किसी अनिच्छा या चिंता के सामना करने के योग्य होना चाहता है, तो इसका एक ही रास्ता है कि कोई पछतावा न करें। और बिना किसी पछतावे के चले जाने का एकमात्र मार्ग है सृष्टिकर्ता की संप्रभुता को जानना, उसके अधिकार को जानना है, और उनके अधीन हो जाना। केवल इसी तरह से ही कोई व्यक्ति मानवीय लड़ाई-झगड़ों से, बुराई से, एवं शैतान के बन्धन से दूर रह सकता है; केवल इसी तरह से ही कोई व्यक्ति अय्यूब के समान जीवन जी सकता है जो सृष्टिकर्ता के द्वारा निर्देशित एवं आशीषित था, ऐसा जीवन जो बंधनों से मुक्त हो, ऐसा जीवन जिसका मूल्य एवं अर्थ हो, और ऐसा जीवन जो सत्यनिष्ठ एवं खुले हृदय का हो; केवल इसी तरह से ही कोई व्यक्ति अय्यूब के समान इस बात के अधीन हो सकता है कि उसे सृष्टिकर्ता के द्वारा परखा एवं वंचित किया जाए, केवल इसी तरह से ही कोई व्यक्ति सृष्टिकर्ता के आयोजनों एवं इंतज़ामों के अधीन हो सकता है; केवल इसी तरह से ही वह अपने जीवन भर सृष्टिकर्ता की आराधना कर सकता है और उसकी प्रशंसा को अर्जित कर सकता है, जैसा अय्यूब ने किया था, एवं उसकी आवाज़ को सुना था, और उसे प्रकट होते हुए देखा था; केवल इसी तरह से ही कोई व्यक्ति अय्यूब के समान बिना किसी तकलीफ, चिंता एवं पछतावे के आनन्दपूर्वक जी एवं मर सकता है; केवल इसी तरह से ही कोई व्यक्ति अय्यूब के समान प्रकाश में जीवन बिता सकता है, प्रकाश में अपने जीवन के घटनाक्रमों से होकर गुज़र सकता है, अपनी यात्रा को प्रकाश में सरलता से पूरा कर सकता है, और अपने मिशन को सफलतापूर्वक हासिल कर सकता है – एक सृजे गए प्राणी के रूप में सृष्टिकर्ता की संप्रभुता का अनुभव करना, सीखना, और जानना–और प्रकाश में मर सकता है, और उसके पश्चात् एक सृजे गए प्राणी के रूप में हमेशा सृष्टिकर्ता के पास खड़ा हो सकता है, और उसके द्वारा सराहना पा सकता है।

"वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी" से

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