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39. धार्मिक दुनिया के भीतर प्रत्येक वर्ग मानता है कि उन्हीं का मार्ग सच्चा मार्ग है, फिर कोई सच्चे मार्ग को झूठे मार्गों से अलग कैसे पहचाने?

परमेश्वर के वचन से जवाब:

सच्चे मार्ग की तलाश करने में सबसे बुनियादी सिद्धान्त क्या है? तुम्हें देखना होगा कि क्या इसमें पवित्र आत्मा का कार्य है कि नहीं, क्या ये वचन सत्य की अभिव्यक्ति हैं या नहीं, किसके लिए गवाही देनी है, और यह तुम्हारे लिए क्या ला सकता है। सच्चे मार्ग और गलत मार्ग के मध्य अंतर करने के लिए बुनियादी ज्ञान के कई पहलुओं की आवश्यकता होती है, जिनमें सबसे बुनियादी है यह बताना कि क्या इसमें पवित्र आत्मा का कार्य है या नहीं। क्योंकि परमेश्वर पर विश्वास का मनुष्य का सार पवित्र आत्मा पर विश्वास है, और यहाँ तक कि देहधारी परमेश्वर पर उसका विश्वास इसलिए है क्योंकि यह देह परमेश्वर के आत्मा का मूर्तरूप है, जिसका अर्थ यह है कि ऐसा विश्वास पवित्र आत्मा पर विश्वास है। आत्मा और देह के मध्य अंतर हैं, परन्तु क्योंकि यह देह पवित्रात्मा से आता है और वचन देहधारी होता है, इसलिए मनुष्य जिस में विश्वास करता है वह अभी भी परमेश्वर का अन्तर्निहित सार है। और इसलिए, इस बात का विभेद करने में कि यह सच्चा मार्ग है या नहीं, सर्वोपरि तुम्हें यह अवश्य देखना चाहिए कि क्या इसमें पवित्र आत्मा का कार्य है या नहीं, जिसके बाद तुम्हें अवश्य देखना चाहिए कि क्या इस मार्ग में सत्य है अथवा नहीं। यह सत्य सामान्य मानवता का जीवन स्वभाव है, अर्थात्, वह जो मनुष्य से तब अपेक्षित था कि जब परमेश्वर ने आरंभ में उसका सृजन किया था, यानि, सभी सामान्य मानवता (मानवीय भावना, अंतर्दृष्टि, बुद्धि और मनुष्य होने का बुनियादी ज्ञान) है। अर्थात्, तुम्हें यह देखने की आवश्यकता है कि क्या यह मार्ग मनुष्य को एक सामान्य मानवता के जीवन ले जाता है या नहीं, क्या बोला गया सत्य सामान्य मानवता की आवश्यकता के अनुसार अपेक्षित है या नहीं, क्या यह सत्य व्यवहारिक और वास्तविक है या नहीं, और क्या यह सबसे सही समय पर है या नहीं। यदि इसमें सत्य है, तो यह मनुष्य को सामान्य और वास्तविक अनुभवों में ले जाने में सक्षम है; इसके अलावा, मनुष्य हमेशा से अधिक सामान्य बन जाता है, मनुष्य का देह में जीवन और आध्यात्मिक जीवन हमेशा से अधिक व्यवस्थित हो जाता है, और मनुष्य की भावनाएँ हमेशा से और अधिक सामान्य हो जाती हैं। यह दूसरा सिद्धान्त है। एक अन्य सिद्धान्त है, जो यह है कि क्या मनुष्य के पास परमेश्वर का बढ़ता हुआ ज्ञान है या नहीं, क्या इस प्रकार के कार्य और सत्य का अनुभव करना उसमें परमेश्वर के लिए प्रेम को प्रेरित कर सकता है या नहीं, और उसे हमेशा से अधिक परमेश्वर के निकट ला सकता है या नहीं। इसमें यह मापा जा सकता है कि क्या यह सही मार्ग है अथवा नहीं। सबसे अधिक बुनियादी बात यह है कि क्या यह मार्ग अलौकिक के बजाए यर्थाथवादी है, और क्या यह मनुष्य का जीवन प्रदान करने में सक्षम है या नहीं। यदि यह इन सिद्धान्तों के अनुरूप है, तो निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि यह मार्ग सच्चा मार्ग है। …यदि यह पवित्र आत्मा का कार्य है, तो मनुष्य हमेशा से अधिक सामान्य बन जाता है, और उसकी मानवता हमेशा से अधिक सामान्य बन जाती है। मनुष्य को अपने स्वभाव का, जिसे शैतान के द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया है और मनुष्य के सार का बढ़ता हुआ ज्ञान होता है, और उसकी सत्य के लिए हमेशा से अधिक ललक होती है। अर्थात्, मनुष्य का जीवन अधिकाधिक बढ़ता जाता है और मनुष्य का भ्रष्ट स्वभाव अधिकाधिक बदलावों में सक्षम हो जाता है – जिस सब का अर्थ है परमेश्वर का मनुष्य का जीवन बनना। यदि एक मार्ग उन चीजों को प्रकट करने में असमर्थ है जो मनुष्य का सार हैं, मनुष्य के स्वभाव को बदलने में असमर्थ है, और, इसके अलावा, उसे परमेश्वर के सामने लाने में असमर्थ है या उसे परमेश्वर की सच्ची समझ प्रदान कराने में असमर्थ है, और यहाँ तक कि उसकी मानवता का हमेशा से अधिक निम्न होने और उसकी भावना का हमेशा से अधिक असामान्य होने का कारण बनता है, तो यह मार्ग अवश्य सच्चा मार्ग नहीं होना चाहिए और यह दुष्टात्मा का कार्य, या पुराना मार्ग हो सकता है। संक्षेप में, यह पवित्र आत्मा का वर्तमान का कार्य नहीं हो सकता है। …यदि तुम इन अनेक मुख्य नियमों को समझ लो, तो चाहे जो कुछ भी हो जाए तुम धोखा नहीं खाओगे।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "जो परमेश्वर को और उसके कार्य को जानते हैं केवल वे ही परमेश्वर को सन्तुष्ट कर सकते हैं" से

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