III. क्या अंत के दिनों के मसीह में विश्वास किए बिना प्रभु यीशु में विश्वास करना पुत्र में एक सच्चा विश्वास है, और क्या यह शाश्वत जीवन की ओर ले जा सकता है?

सुसमाचार के प्रश्नोत्तर

01

सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "केवल अंतिम दिनों का मसीह मनुष्य को अनन्त जीवन का मार्ग प्रदान कर सकता है," तो मुझे वह याद आया जो प्रभु यीशु ने एक बार कहा था, "परन्तु जो कोई उस जल में से पीएगा जो मैं उसे दूँगा, वह फिर अनन्तकाल तक प्यासा न होगा; वरन् जो जल मैं उसे दूँगा, वह उसमें एक सोता बन जाएगा जो अनन्त जीवन के लिये उमड़ता रहेगा" (यूहन्ना 4:14)। हम पहले से ही जानते हैं कि प्रभु यीशु जीवन के सजीव जल का स्रोत हैं, और अनन्‍त जीवन का मार्ग हैं। क्या ऐसा हो सकता है कि सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर और प्रभु यीशु समान स्रोत हों? क्या उनके कार्य और वचन दोनों पवित्र आत्मा के कार्य और वचन हैं? क्या उनका कार्य एक ही परमेश्‍वर करते हैं?

उत्तर

दोनों बार जब परमेश्‍वर ने देह धारण की तो अपने कार्य में, उन्होंने यह गवाही दी कि वे सत्‍य, मार्ग, जीवन और अनन्‍त जीवन के मार्ग हैं। यह सिद्ध करने के लिए कि मसीह सत्‍य, मार्ग और जीवन हैं, वे कई सत्‍य व्यक्त करते हैं, और व्यावहारिक कार्य का एक चरण पूरा करते हैं। जो यह सिद्ध करने के लिए काफी है कि वे एक ही स्रोत से आते हैं। दोनों ही पवित्र आत्मा की वाणी व्‍यक्‍त करते हैं। वे एक ही परमेश्‍वर का कार्य करते हैं, और दोनों ही यह गवाही देते हैं कि परमेश्‍वर अपने सभी स्वरूपों में जीवन का स्रोत हैं, क्योंकि परमेश्‍वर द्वारा व्यक्त किया गया सत्‍य जीवन जल का अनन्‍त सोता है, जो उनके सिंहासन से बहने वाली जीवन की नदी और अनन्‍त जीवन का मार्ग है। यह इस बात को और ज्‍़यादा साबित करता है कि सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर, प्रभु यीशु का दूसरा आगमन हैं, और दोनों ही अपनी प्रबंधन योजना में कार्य कर रहे परमेश्‍वर हैं। प्रभु यीशु ने कहा था: "मैं पिता में हूँ और पिता मुझ में है ..." (यूहन्ना 14:10)। "मैं और पिता एक हैं" (यूहन्ना 10:30)। यह साबित करता है कि प्रभु यीशु परमेश्‍वर का प्रकटन हैं। प्रभु यीशु ने भविष्यवाणी की थी कि वे फ़िर आएंगे, और यह कि वे अंत के दिनों में न्याय का कार्य करने के लिए मनुष्य के पुत्र के रूप में देहधारण करेंगे। आइए, सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के वचन का एक अंश पढ़ें।

"यीशु और मैं एक ही पवित्रात्मा से आते हैं। यद्यपि हमारे देहों का कोई सम्बंध नहीं है, किन्तु हमारे पवित्रात्माएँ एक ही हैं; यद्यपि हम जो करते हैं और जिस कार्य को हम वहन करते हैं वे एक ही नहीं हैं, तब भी सार रूप में हम सदृश्य हैं; हमारी देहें भिन्न रूप धारण करती हैं, और यह ऐसा युग में परिवर्तन और हमारे कार्य की भिन्न आवश्यकताओं के कारण है; हमारी सेवकाईयाँ सदृश्य नहीं हैं, इसलिए जो कार्य हम लाते हैं और जिस स्वभाव को हम मनुष्य पर प्रकट करते हैं वे भी भिन्न हैं। …उनके पवित्रात्माएँ फिर भी एक ही हैं" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "देहधारण के महत्व को दो देहधारण पूरा करते हैं" से)।

"यद्यपि दो देहधारणों की देहों के कार्य भिन्न हैं, किन्तु देहों का सार, और उनके कार्यों का स्रोत समरूप है; यह केवल इतना ही है कि वे कार्य के दो विभिन्न चरणों को करने के लिए अस्तित्व में हैं, और दो विभिन्न युगों में सामने आते हैं। कुछ भी हो, देहधारी परमेश्वर के देह एक ही सार और एक ही स्रोत को साझा करते हैं-यह एक सत्य है जिसे कोई नकार नहीं सकता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "परमेश्वर द्वारा आवासित देह का सार" से)।

सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के वचन हमें साफ़-साफ़ बताते हैं कि सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर और प्रभु यीशु दोनों परमेश्‍वर की आत्मा द्वारा धारण किए हुए शरीर हैं। वे सिर्फ़ इस मायने में अलग हैं कि वे हर युग में अलग-अलग कार्य करते हैं और अलग-अलग नामों का उपयोग करते हैं, लेकिन वे एक ही परमेश्‍वर हैं। अब हम जानते हैं कि दोनों बार परमेश्‍वर ने देहधारण किया। उन्होंने यह गवाही दी कि वे जीवन जल का स्रोत हैं, और उनके पास जीवन जल का असीम भंडार है। वे यह भी गवाही देते हैं कि ख़ुद परमेश्‍वर ही अनन्‍त जीवन का मार्ग हैं। भले ही उनके वचन और बोलने का तरीका थोड़ा अलग होता है, मगर वे जो भी कहते हैं, उसका सार एक ही होता है। तो, अनन्‍त जीवन का मार्ग क्या है? अनन्‍त जीवन का मार्ग और स्वर्ग के राज्य में प्रवेश में आपस में क्‍या संबंध है? प्रभु यीशु ने कहा है कि सिर्फ़ स्‍वर्गिक पिता की इच्छा का पालन करके लोग स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकते हैं। जो लोग वाकई परमेश्‍वर की इच्छा का पालन करते हैं, वे ऐसे लोग हैं जो परमेश्‍वर के वचनों पर अमल करने और परमेश्‍वर की आज्ञाओं का पालन करने में सक्षम हैं। प्रभु यीशु ने हमें सिखाया कि हमें अपने हृदय, आत्मा और मन की गहराइयों से परमेश्‍वर से प्रेम करना चाहिए, और दूसरों से भी ऐसे प्रेम करना चाहिए जैसे कि हम अपने आप से करते हैं। लेकिन क्या हम उनके वचनों पर अमल कर पाये हैं? अगर हम उन वचनों पर अमल नहीं कर रहे हैं तो हम परमेश्‍वर की इच्छा के अनुसार नहीं चल रहे हैं। अगर हम परमेश्‍वर के वचनों पर अमल नहीं कर सकते और उनकी आज्ञाओं का पालन नहीं कर सकते हैं, तो हम कभी अनन्‍त जीवन के मार्ग को कैसे पाएंगे? कभी नहीं पाएंगे! का अर्थ है मनुष्यों को पवित्र करने और बचाने के लिए परमेश्‍वर द्वारा व्‍यक्‍त किये गए संपूर्ण सत्‍य को पाना और आखिर में परमेश्‍वर को जानने और उनकी इच्‍छा का पालन करने वाला इंसान बन जाना। अगर हम परमेश्‍वर में विश्वास करते हैं लेकिन सत्‍य को हासिल नहीं कर पाते, अपने जीवन स्वभाव में बदलाव नहीं लाते, और परमेश्‍वर की इच्छा का पालन नहीं करते, तो क्या हम स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकते हैं? तो क्या जो लोग स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने के काबिल नहीं, वे अनन्‍त जीवन पा सकते हैं? इसलिए जो लोग परमेश्‍वर की इच्‍छा को नहीं मानते, उन्हें अनन्‍त जीवन का मार्ग पाने का कोई तरीका नहीं मिलेगा। बाइबल में भी यह कहा गया है: "जो पुत्र पर विश्‍वास करता है, अनन्त जीवन उसका है; परन्तु जो पुत्र की नहीं मानता, वह जीवन को नहीं देखेगा …" (यूहन्ना 3:36)। पुत्र में विश्वास करने का मतलब है परमेश्‍वर ने जिसे भेजा है उस पर और देहधारी मसीह पर विश्वास करना। प्रभु यीशु मसीह मनुष्य के पुत्र थे। छुटकारे का कार्य ख़त्‍म करके वे स्वर्ग लौट गए। प्रभु यीशु ने हमसे वादा किया था कि वे फ़िर से आएंगे, इसलिए अंत के दिनों में लौटे हुए मसीह को स्वीकार करना बहुत ज़रूरी है। जो भी अंत के दिनों में लौटे मसीह को अपनाता है वह अनन्‍त जीवन का मार्ग पाएगा। अगर हम सिर्फ़ प्रभु यीशु में विश्वास करते हैं, और प्रभु यीशु के दूसरे आगमन को स्वीकार नहीं करते हैं, तो हम जीवन के सजीव जल के स्रोत के साथ अपना रिश्‍ता तोड़ रहे हैं! क्या प्रभु यीशु अभी भी हमें स्वीकार करेंगे? क्या हम अभी भी अनन्‍त जीवन को पा सकते हैं? प्रभु में विश्वास करते वक्‍त, हमें प्रभु यीशु के दूसरे आगमन को भी स्वीकार करना चाहिए, यही सच्‍चा "पुत्र में विश्वास" करना हुआ। सिर्फ़ वे लोग जो अंत के दिनों के मसीह का अनुसरण करते हैं, अनन्‍त जीवन को पाएंगे। अगर हम सिर्फ़ प्रभु यीशु में विश्वास करते हैं, और प्रभु यीशु की वापसी को नकारते हैं, तो हमारा विश्वास एक बेकार कोशिश है, बीच में आधा-अधूरा छोड़ा गया विश्‍वास, और इससे हम प्रभु यीशु की स्‍वीकृति कभी नहीं पाएंगे।

क्योंकि जो प्रभु यीशु ने अनुग्रह के युग में किया, वो छुटकारे का कार्य है। उन्होंने सिर्फ़ मनुष्य के छुटकारे के बारे में सत्‍य व्यक्त किए, जो सिर्फ़ लोगों को उनके पापों को कबूल करने और पश्चाताप करने और परमेश्‍वर की ओर मुड़ने में मदद कर सकते हैं। लेकिन, चूंकि इंसानों की पापी प्रकृति और भ्रष्ट स्वभाव नहीं बदले हैं, भले ही उनके पापों को क्षमा कर दिया गया हो, वे अभी भी अक्सर परमेश्‍वर के ख़िलाफ़ पाप और बगावत करते हैं और परमेश्‍वर का विरोध करते हैं, यह एक तथ्य है। यह सबूत है कि जो भी प्रभु यीशु ने किया वह छुटकारे का कार्य था। अंत के दिनों में लौट आए प्रभु यीशु द्वारा किए गए न्याय का कार्य ही मानव जाति को पूरी तरह से बचा कर, उसे पाप और शैतान के प्रभाव से मुक्त होने, स्वाभावगत परिवर्तन पाने और परमेश्‍वर को प्राप्‍त होने दे सकता है। इसलिए, अंत के दिनों में लौटे प्रभु यीशु द्वारा किया गया न्याय का कार्य मानव जाति के उद्धार के लिए महत्वपूर्ण है। अगर हम सिर्फ़ प्रभु यीशु के छुटकारे के कार्य को स्वीकार करते हैं, और अंत के दिनों में लौट आए प्रभु यीशु के न्याय के कार्य को स्वीकार किए बिना, स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करना चाहते हैं, तो हम ख़याली पुलाव पका रहे हैं। दरअसल, प्रभु यीशु ने बहुत पहले कहा था: "मुझे तुम से और भी बहुत सी बातें कहनी हैं, परन्तु अभी तुम उन्हें सह नहीं सकते। परन्तु जब वह अर्थात् सत्य का आत्मा आएगा, तो तुम्हें सब सत्य का मार्ग बताएगा, क्योंकि वह अपनी ओर से न कहेगा परन्तु जो कुछ सुनेगा वही कहेगा, और आनेवाली बातें तुम्हें बताएगा" (यूहन्ना 16:12-13)। उस समय, कोई भी प्रभु यीशु के वचनों को नहीं समझा, क्योंकि मानवता बस परमेश्‍वर के सामने आई ही थी, और उसका आध्यात्मिक कद बहुत छोटा था। अगर प्रभु यीशु ने अंत के दिनों के न्याय के वचनों को व्यक्त किया होता, तो मनुष्य इसे सहन नहीं कर पाता। उस पूरे सत्‍य को अभिव्यक्त करने के लिए, जो मनुष्य को पवित्र करता, बचाता और उसे पूर्ण करता है, अंत के दिनों में उन्हें सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के आगमन का इंतज़ार करना पड़ा। जब हम सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के वचनों को देखते हैं, तो हम अचानक ही जागरूक होकर आखिरकार परमेश्‍वर की इच्छा को समझने लगते हैं। अनुग्रह के युग में परमेश्‍वर ने सीधे अंत के दिनों का न्याय का कार्य क्यों नहीं किया? ऐसा इसलिए है क्योंकि मानव जाति को बचाने की परमेश्‍वर की प्रबंधन योजना में कार्य के तीन चरण हैं। परमेश्‍वर अंत के दिनों में न्याय कार्य करते हैं, जैसा कि सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर कहते हैं: "यद्यपि यीशु ने मनुष्यों के बीच अधिक कार्य किया है, उसने केवल समस्त मानवजाति के छुटकारे के कार्य को पूरा किया और वह मनुष्य की पाप-बलि बना, मनुष्य को उसके भ्रष्ट स्वभाव से छुटकारा नहीं दिलाया। शैतान के प्रभाव से मनुष्य को पूरी तरह बचाने के लिये यीशु को न केवल पाप-बलि के रूप में मनुष्यों के पापों को लेना आवश्यक था, बल्कि मनुष्य को उसके भ्रष्ट स्वभाव से पूरी तरह मुक्त करने के लिए परमेश्वर को और भी बड़े कार्य करने की आवश्यकता थी जिसे शैतान द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया था। और इसलिए, मनुष्य को उसके पापों के लिए क्षमा कर दिए जाने के बाद, एक नये युग में मनुष्य की अगुवाई करने के लिए परमेश्वर वापस देह में लौटा, और उसने ताड़ना एवं न्याय के कार्य को आरंभ किया, और इस कार्य ने मनुष्य को एक उच्चतर क्षेत्र में पहुँचा दिया। वे सब जो परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन समर्पण करेंगे उच्चतर सत्य का आनंद लेंगे और अधिक बड़ी आशीषें प्राप्त करेंगे। वे वास्तव में ज्योति में निवास करेंगे, और सत्य, मार्ग और जीवन को प्राप्त करेंगे" ("वचन देह में प्रकट होता है" के लिए प्रस्तावना से)। प्रभु यीशु के छुटकारे के कार्य ने अंत के दिनों में मनुष्य के न्याय और शुद्धिकरण के कार्य का मार्ग प्रशस्त किया। वह सत्य जो मनुष्य को बचाता है, परिवर्तन लाता है, और उसे पूर्ण करता है, उसे पूरी तरह से लौटे हुए प्रभु यीशु द्वारा व्यक्त किया जाएगा। यह सत्‍य अंत के दिनों में सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर द्वारा मनुष्य को अनन्‍त जीवन प्रदान करने का मार्ग है। इसलिए, अगर हम अनन्‍त जीवन का मार्ग पाना चाहते हैं, तो उसकी कुंजी प्रभु यीशु की वापसी को स्वीकार करना है। प्रभु यीशु ने कहा था: "देख, मैं द्वार पर खड़ा हुआ खटखटाता हूँ; यदि कोई मेरा शब्द सुनकर द्वार खोलेगा, तो मैं उसके पास भीतर आकर उसके साथ भोजन करूँगा और वह मेरे साथ" (प्रकाशितवाक्य 3:20)। "...क्योंकि मेम्ने का विवाह आ पहुँचा है, और उसकी दुल्हिन ने अपने आप को तैयार कर लिया है। …धन्य वे हैं, जो मेम्ने के विवाह के भोज में बुलाए गए हैं" (प्रकाशितवाक्य 19:7-9)। जो लोग मसीह के दूसरे आगमन को स्वीकार करते हैं, वे बुद्धिमान कुंवारियां हैं। परमेश्‍वर की वाणी सुनने के बाद, वे मेमने के साथ भोज के लिए जाती हैं। ऐसे मनुष्यों को आशीष मिलता है, और उन्होंने मेमने के पदचिन्हों का अनुसरण किया होता है। वे अंत के दिनों में परमेश्‍वर के न्याय से शुद्ध किए गए पहले फल और परमेश्‍वर द्वारा बनाए गए विजेता हैं। इसलिए, सिर्फ़ वे लोग जो मसीह के दूसरे आगमन को स्वीकार करते हैं, वे ही अनन्‍त जीवन का मार्ग पाते हैं। "सिंहासन से बहता है जीवन जल" फ़िल्म की स्क्रिप्ट से लिया गया अंश

02

बाइबल कहती है, "वह जो पुत्र पर विश्वास करता है, वह शाश्वत जीवन प्राप्त करता है: और जो पुत्र पर विश्वास नहीं करता है, उसे जीवन का प्रकाश नहीं दिखेगा; बल्कि उसे परमेश्वर का क्रोध झेलना पड़ेगा" (यूहन्ना 3:36)। क्‍या प्रभु यीशु मनुष्य का पुत्र नहीं हैं, क्या वह मसीह नहीं है? प्रभु यीशु में विश्वास करके, हमें, इस प्रकार, शाश्‍वत जीवन का मार्ग भी मिलना चाहिए। लेकिन आप लोग इस बात की गवाही देते हैं कि अंतिम दिनों में मसीह के आसन के समक्ष न्‍याय और शुद्धिकरण का अनुभव कर सकें, और अंतिम दिनों में परमेश्‍वर से उद्धार प्राप्‍त कर सकें। हमारे लिये शाश्वत जीवन का मार्ग लाएँगे। मैं यह बिल्कुल नहीं समझ पा रहा हूँ, कि हम सभी प्रभु यीशु मसीह के अनुयायी हैं। यह शाश्‍वत जीवन के मार्ग को प्राप्त करने के लिए पर्याप्त क्यों नहीं है? तो हमें अंतिम दिनों के मसीह के वचनों और कार्य को क्यों स्वीकार करना है?

उत्तर

देहधारी बने परमेश्वर ही प्रभु यीशु हैं, परमेश्‍वर का प्रकटन हैं। प्रभु यीशु ने कहा, "और जो कोई भी मुझमें जीता और विश्वास करता है, वह कभी नहीं मरता है" (यूहन्ना 11:26)। "...परंतु जो पानी मैं उसे दूँगा वह उसमें एक कुएं का निर्माण करेगी जिससे उसे चिरस्थायी जीवन प्राप्त होगा" (यूहन्ना 4:14)। बाइबल कहती है, "वह जो पुत्र पर विश्वास करता है, वह शाश्वत जीवन प्राप्त करता है" (यूहन्ना 3:36)। ये सभी वचन सत्य हैं, वे सभी तथ्य हैं! क्योंकि देहधारी बने परमेश्वर ही प्रभु यीशु हैं, उनमें परमेश्‍वर का सार और पहचान है। वे स्‍वयं चिरस्थायी जीवन का मार्ग हैं। वे जो कुछ भी कहते हैं और करते हैं वह परमेश्वर के जीवन की एक स्वाभाविक अभिव्यक्ति है। वह जो कुछ व्यक्त करते हैं वह सत्‍य है और वह है जो परमेश्‍वर के पास है और जो परमेश्‍वर है। तो प्रभु यीशु स्‍वयं अनन्त जीवन हैं, और शाश्‍वत जीवन का मार्ग प्रदान कर सकते हैं। वह मृतक को में वापस जीवित कर सकते हैं। प्रभु यीशु में विश्वास करके, हम एकमात्र सच्चे परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, और इस तरह शाश्‍वत जीवन प्राप्त कर सकते हैं। इस पर तो सवाल ही नहीं है। प्रभु यीशु का लाज़रस का पुनस्र्ज्जीवन एक अच्छा प्रमाण है। कि प्रभु यीशु हमें शाश्‍वत जीवन का मार्ग प्रदान कर सकते हैं, उनके पास यह अधिकार है। फिर, ऐसा क्यों है कि प्रभु यीशु ने अनुग्रह के युग के दौरान शाश्‍वत जीवन का मार्ग प्रदान नहीं किया? ऐसा इसलिए है क्योंकि, मानवजाति के छुटकारे के लिए प्रभु यीशु सूली पर चढ़ने आये, अंतिम दिनों की तरह शुद्धिकरण और उद्धार का कार्य करने के लिये नहीं। प्रभु यीशु का छुटकारे का कार्य केवल मनुष्यों के पापों को क्षमा करने से संबंधित था, परन्तु इसने मनुष्य को उसकी शैतानी प्रकृति और स्वभाव से छुटकारा नहीं दिलाया। इसलिए, प्रभु पर विश्वास करके, हमें हमारे पापों के लिए माफ़ किया गया था, लेकिन हमारे शैतानी स्वभाव को किसी भी तरह से शुद्ध नहीं किया गया था। हम अभी भी स्वयं के बावजूद पाप करते हैं, परमेश्‍वर का विरोध करते हैं और उनसे विश्वासघात करते हैं । क्‍या यह सच नहीं है? हम्‍म। यह सब स्थापित करने के बाद, हमें कुछ किसी चीज पर स्पष्ट होना चाहिए। अनुग्रह के युग के दौरान प्रभु यीशु के छुटकारे के कार्य ने अंतिम दिनों में न्‍याय कार्य के लिये मार्ग प्रशस्त किया, इसलिए, जब प्रभु यीशु ने छुटकारे का कार्य पूरा कर लिया, तो उन्‍होने यह भी वादा किया कि वे फिर से आएँगे। प्रभु यीशु ने कहा था, "अभी भी मेरे पास कहने के लिए बहुत सी बातें हैं, लेकिन अभी तुम उन्हें सहन नहीं कर सकते हो। हालाँकि, जब वह, सत्य का आत्मा आएगी, तो वह सच्चाई की ओर तुम्हारा मार्गदर्शन करेगी: क्योंकि वह स्वयं कुछ नहीं बोलेगी; बल्कि वह जो कुछ भी सुनेगी, उसके बारे में वह तुम्हें बताएगी: वह तुम्हें होने वाली घटनाओं के बारे में बताएगी" (यूहन्ना 16:12-13)। प्रभु यीशु के शब्दों से हम देख सकते हैं कि जब परमेश्‍वर अंतिम दिनों में वापस आते हैं केवल तभी वह समस्त सत्य व्यक्त करेंगे जो मनुष्य को शुद्ध करता और बचाता है। यहाँ, "सत्य का आत्मा आएगी, तो वह सच्चाई की ओर तुम्हारा मार्गदर्शन करेगी।" ये सत्य वास्तव में वे सत्य हैं जो अंतिम दिनों के सर्वशक्तिमान परमेश्वर मानवजाति को शुद्ध करने और बचाने में व्यक्त करते हैं। ये वे शब्द हैं जो पवित्र आत्मा कलीसियों से कहती है, और वे शाश्‍वत जीवन के मार्ग हैं जो परमेश्‍वर ने अंतिम दिनों में मानवजाति को प्रदान किये हैं। यही कारण है कि अनुग्रह के युग में प्रभु के अनुयायी शाश्‍वत जीवन का मार्ग प्राप्त करने में असमर्थ थे। प्रभु यीशु ने कहा था, "और जो कोई भी मुझमें जीता और विश्वास करता है, वह कभी नहीं मरता है।" और बाइबल भी कहती है, "वह जो पुत्र पर विश्वास करता है, वह शाश्वत जीवन प्राप्त करता है।" परन्तु वास्तव में, परमेश्‍वर ने यह कहा ताकि वे इस तथ्य को प्रमाणित कर सकें कि वे स्‍वयं परमेश्‍वर का प्रकटन हैं। और केवल वे ही मनुष्य को शाश्‍वत जीवन प्रदान कर सकते हैं। प्रभु यीशु का वादा कि जो लोग उन पर विश्वास करते हैं वे कभी नहीं मरेंगे, परमेश्वर के अधिकार की गवाही है। परमेश्‍वर स्‍वयं शाश्‍वत जीवन का मार्ग हैं, परमेश्‍वर मनुष्य को शाश्‍वत जीवन प्रदान करने में सक्षम है। कहने का यह मतलब नहीं है कि प्रभु यीशु के कार्य को स्वीकार करने पर मनुष्‍य ने शाश्‍वत जीवन प्राप्त किया। मुझे विश्वास है कि हर कोई इस बात को समझता है। ... लेकिन प्रभु यीशु ने कई बार भविष्यवाणी क्यों की कि वे फिर से आएँगे? अगर कोई केवल प्रभु यीशु को स्वीकार करता है लेकिन उसकी वापसी को स्वीकार नहीं करता है, तो क्या यह वह व्यक्ति है जो वास्तव में पुत्र पर विश्वास करता है? …

जैसा कि हम सभी जानते हैं, इस तथ्य के बावजूद कि जब मनुष्य ने अनुग्रह के युग में प्रभु यीशु द्वारा छुटकारे को स्वीकार किया, तो उनके पापों को माफ कर दिया गया और उन्हें परमेश्‍वर की प्रार्थना करने और उनके अनुग्रह और आशीषों का आनंद लेने का अधिकार दिया गया, इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि इस समय, मनुष्य अभी भी अपनी पापी प्रकृति से विवश है, वे अभी भी पाप में असहायपूर्वक रहते हैं, वे प्रभु के वचनों का पालन करने में पूरी तरह से असमर्थ हैं और उनमें परमेश्‍वर के प्रति कोई वास्तविक श्रद्धा और आज्ञाकारिता नहीं है। इस समय, मनुष्य अक्सर अभी भी झूठ बोल सकता है और परमेश्‍वर को धोखा दे सकता है, वे प्रसिद्धि और भाग्य, पैसे की लालसा के पीछे पड़े रहते हैं, और दुनिया की प्रवृत्ति का पालन करने में लगे रहते हैं। विशेषकर जब परमेश्वर का कार्य मनुष्यों के मतों के अनुरूप नहीं होता है, तो मनुष्य परमेश्‍वर को दोष देता है, उनकी आलोचना करता है और यहाँ तक कि परमेश्‍वर का विरोध भी करता है। ऐसे लोग वास्‍तव में पश्चाताप तक नहीं कर सकते, क्या ऐसे लोग परमेश्‍वर की स्वीकृति प्राप्त कर सकते हैं? यद्यपि बहुत से लोग अनुसरण करने, गवाही देने, यहाँ तक कि प्रभु के लिए अपने जीवन तक बलिदान करने में सक्षम होते हैं, और वास्तव में पश्चाताप करते हैं, वास्तव में, क्या उनके भ्रष्ट स्वभाव को शुद्ध किया गया है ताकि वे पवित्रता प्राप्‍त कर सकें? तो क्या वे सचमुच प्रभु को जानते हैं? क्या उन्होंने वास्तव में शैतान के प्रभाव से खुद को मुक्‍त कर लिया है परमेश्वर द्वारा प्राप्त कर लिये गए हैं? बिल्कुल नहीं, यह आमतौर पर स्वीकार्य तथ्य है। यह इस बात को साबित करने के लिए पर्याप्त है कि अनुग्रह के युग दौरान प्रभु यीशु का कार्य केवल छुटकारा दिलाने का कार्य था। यह निश्चित रूप से अंतिम दिनों का उद्धार और सिद्धि का कार्य नहीं था। अनुग्रह के युग के दौरान प्रभु यीशु के वचनों ने केवल लोगों को पश्चाताप का तरीका दिया, शाश्‍वत जीवन का मार्ग नहीं। इसलिए यही कारण है कि प्रभु यीशु ने कहा कि वे फिर से आएँगे। प्रभु यीशु की वापसी सत्य को व्यक्त करने के कार्य करने और मनुष्य को शाश्‍वत जीवन का मार्ग प्रदान करने के लिए है, ताकि वे खुद को शैतान के प्रभाव से छुड़ा सकें और जीवन के रूप में सत्य को प्राप्त कर सकें ऐसे मनुष्य बन सकें जो परमेश्वर को जानते हैं, परमेश्वर की आज्ञापालन करते हैं, परमेश्‍वर का आदर करते हैं और परमेश्वर के साथ अनुकूल हो सकें, ताकि वे स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकें और शाश्‍वत जीवन प्राप्त कर सकें। प्रभु यीशु द्वारा छुटकारे के कार्य की नींव पर, अंतिम दिनों में सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने परमेश्वर के घर से शुरूआत करके न्‍याय का कार्य आरंभ कर दिया है और मानवता को शुद्ध करने और बचाने के लिए समस्त सत्‍य व्यक्त कर दिया है। उसने मानवजाति को परमेश्‍वर के धार्मिक, प्रतापी, और अपमान न किए जाने योग्य स्वभाव को प्रकट कर दिया है, शैतान द्वारा मनुष्य को भ्रष्ट करने के सार और तथ्य को ऊजागर और न्‍याय किया है। उन्होंने परमेश्‍वर के प्रति मनुष्य के विद्रोह और प्रतिरोध के मूल को उघाड़ दिया है, और मनुष्‍य को परमेश्‍वर के सभी इरादों और अपेक्षाओं के बारे में बता दिया है। इसी समय, उन्‍होनें मानवजाति को स्पष्ट शब्दों में उन सभी सत्‍यों के बारे में समझाया है जिनकी उद्धार प्राप्त करने के लिए मुनष्‍य को आवश्यकता है, जैसे कि परमेश्‍वर के उद्धार के कार्य के सभी तीन चरणों की अंदर की कहानी और उनका सार और साथ ही इन तीन चरणों के बीच संबंध, परमेश्वर के कार्य और मनुष्य के कार्य के बीच का अंतर, बाइबल के अंदर की कहानी और सत्य, अंतिम दिनों में न्‍याय का रहस्य, बुद्धिमान कुँवारियों को स्वर्गारोहण किए जाने का रहस्य और आपदाओं से पहले लोगों को विजेताओं में सिद्ध बनाने का रहस्य, देहधारी बने परमेश्वर का रहस्य, और परमेश्वर में वास्तव में विश्‍वास करने, उनकी आज्ञापालन करने और उनसे प्रेम करने का मतलब है, कैसे परमेश्‍वर का आदर करें और मसीह के अनुकूल बनने के लिए कैसे बुराई को दूर रखें, कैसे अर्थपूर्ण जीवन जीयें, और इत्‍यादि। ये सत्‍य, शाश्‍वत जीवन के मार्ग हैं जो अंतिम दिनों में परमेश्‍वर द्वारा मानवजाति को प्रदान किये गए हैं। इसलिए, अगर हम सत्य और जीवन को प्राप्त करना चाहते हैं, उद्धार, शुद्धिकरण को प्राप्त करना और सिद्ध किया जाना चाहते हैं, तो हमें सर्वशक्तिमान परमेश्वर, अंतिम दिनों के मसीह के वचनों और कार्य को स्वीकार और उनका आज्ञापालन अवश्य करना चाहिए। यही एकमात्र तरीका है जिससे हम सत्य और जीवन को प्राप्त कर सकते हैं। आइए सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों पर एक नज़र डालें।

सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं: "परमेश्वर स्वयं ही जीवन है, सत्य है, और उसका जीवन और सत्य साथ ही साथ रहते हैं। जो सत्य को प्राप्त करने में असफल रहते हैं वे कभी भी जीवन को प्राप्त नहीं कर सकते। बिना मार्गदर्शन, सहायता और सत्य के प्रावधान के तुम केवल संदेश, सिद्धांत और मृत्यु को ही प्राप्त करोगे। परमेश्वर का जीवन सतत विद्यमान है, और उसका सत्य और जीवन एक साथ उपस्थित रहते हैं। यदि तुम सत्य के स्रोत को नहीं प्राप्त कर पाते, तो तुम जीवन के पोषण को प्राप्त नहीं कर पाओगे; यदि तुम जीवन के प्रावधान को प्राप्त नहीं कर सकते तो तुम्हारे जीवन में निश्चय ही सत्य नहीं होगा, और इसलिए कल्पनाओं और धारणाओं से दूरी होगी, तुम्हारी सम्पूर्ण देह केवल देह होगी, तुम्हारी घिनौनी देह। ध्यान रखो कि किताबों की बातें जीवन के तौर पर नहीं गिनी जाती हैं, इतिहास के लेखों को सत्य के रूप में चित्रित नहीं किया जा सकता, और अतीत के सिद्धांत आज के समय में परमेश्वर के द्वारा कहे गए वचनों का लेखा-जोखा नहीं माने जा सकते। केवल वही बात जो परमेश्वर ने पृथ्वी पर आकर और लोगों के बीच रहकर कही है, सत्य, जीवन, परमेश्वर की इच्छा है और कार्य करने का असली तरीका है। यदि तुम अतीत के युगों में परमेश्वर के द्वारा कहे गए वचनों को आज के संदर्भ में लागू करते हो, और अगर तुम अतीत के युगों में परमेश्वर द्वारा कहे गए वचनों को आज लागू करते हो, तो तुम एक पुरातत्ववेत्ता हो, और तुम्हें सबसे बेहतर ढंग से चित्रित करने के लिए ऐतिहासिक विरासत का विशेषज्ञ कहा जा सकता है। क्योंकि तुम हमेशा उन कार्यों के सुरागों के बारे में विश्वास करते हो जो परमेश्वर ने अतीत में किए हैं, केवल उन पदचिन्हों पर विश्वास करते हो जो तब के हैं जब परमेश्वर लोगों के बीच रह कर कार्य किया करता था। और तुम केवल उसी मार्ग पर विश्वास करते हो जो परमेश्वर ने पुराने समय में अपने अनुयायियों को दिया था। आज के समय में तुम परमेश्वर के कार्य के मार्गदर्शन के बारे में विश्वास नहीं करते, महिमामय मुखाकृति में विश्वास नहीं करते, और परमेश्वर के द्वारा आज के समय में व्यक्त किये गये सत्य के मार्ग पर विश्वास नहीं करते। अत: तुम एक ऐसे दिवास्वप्न दर्शी हो जो सच्चाई से कोसों दूर है। यदि तुम अभी भी उन वचनों से चिपके रहोगे जो जीवन प्रदान करने में असमर्थ हैं, तो तुम आशाहीन और एक निर्जीव काष्ठ[क] के समान हो। क्योंकि तुम बहुत ही रूढ़िवादी, असभ्य हो जो चीजों को तर्क की कसौटी पर नहीं कसते हो।

अंतिम दिनों का मसीह जीवन लेकर आता, और सत्य का स्थायी एवं अनन्त मार्ग प्रदान करता है। इसी सत्य के मार्ग के द्वारा मनुष्य जीवन को प्राप्त करेगा, और एक मात्र इसी मार्ग से मनुष्य परमेश्वर को जानेगा और परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त करेगा। यदि तुम अंतिम दिनों के मसीह के द्वारा प्रदान किए गए जीवन के मार्ग को नहीं खोजते हो, तो तुम कभी भी यीशु के अनुमोदन को प्राप्त नहीं कर पाओगे और कभी भी स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने के योग्य नहीं बन पाओगे क्योंकि तुम इतिहास के कठपुतली और कैदी दोनों हो। जो लोग नियमों, संदेशों के नियंत्रण में हैं और इतिहास की ज़ंजीरों में जकड़े हुए हैं वे कभी भी जीवन को प्राप्त नहीं कर सकते हैं, और कभी भी सतत जीवन के मार्ग को प्राप्त करने के योग्य नहीं बन सकते हैं। क्योंकि सिंहासन से प्रवाहित जीवन जल की अपेक्षा, उनके भीतर मैला पानी भरा है जो हज़ारों सालों से वहीं ठहरा हुआ है, जिनके पास जीवन का जल नहीं है वे हमेशा के लिए एक लाश, शैतान के खेलने की वस्तु और नरक की संतान बन जाएंगे। फिर वे परमेश्वर को कैसे देख सकते हैं? यदि तुम केवल अतीत को पकड़े रहने की कोशिश करोगे, केवल ठहरी हुई चीज़ों को पकड़ने की कोशिश में लगे रहोगे, और यथास्थिति को बदलने और इतिहास को तिलांजलि देने की कोशिश नहीं करोगे, तो क्या तुम हमेशा परमेश्वर के विरोध में नहीं रहोगे? परमेश्वर के कार्य के चरण बहुत ही विशाल और सामर्थी हैं, जैसे कि हिलोरे मारती हुई लहरें और गरजता हुआ तूफान - फिर भी तुम बैठकर निष्क्रियता से विनाश का इंतजार करते हो, अपनी ही मूर्खता से चिपके रहते हो और कुछ भी नहीं करते। इस प्रकार से, तुम्हें मेमने का अनुसरण करने वाले के रूप में कैसे देखा जा सकता है? और तुम इस बात को कैसे न्यायोचित ठहरा सकते हो कि तुम उस परमेश्वर पर निर्भर रहोगे जो हमेशा नया है और कभी पुराना नहीं होता? तुम्हारी पीली पड़ चुकी किताब के वचन तुम्हें नए युग में कैसे ले जा सकते हैं? वे कैसे तुम्हें परमेश्वर के चरणबद्ध तरीके से चलने वाले कार्यों तक लेकर जायेंगे? वे तुम्हें कैसे स्वर्ग लेकर जायेंगे? तुम्हारे हाथों में जो संदेश हैं वे तुम्हें केवल अस्थायी सांत्वना ही दे सकते हैं, वह सत्य नहीं दे सकते जो जीवन देने में सक्षम है। जो शास्त्र तुम पढ़ते हो वे तुम्हारी जिव्हा को आनंदित तो कर सकते हैं लेकिन ये वे विवेकपूर्ण वचन नहीं हैं जो तुम्हें मानव जीवन का बोध करा सकें। ये वह मार्ग तो दिखा ही नहीं सकते जो तुम्हें पूर्णता की ओर ले जायें। क्या यह भिन्नता तुम्हारे विचार-मंथन का कारण नहीं है? क्या यह तुम्हें अपने भीतर समाहित रहस्यों को समझने के लिए अनुमति नहीं देता है? क्या तुम अपने आप को परमेश्वर से मिलने के लिए स्वर्ग में ले जाने के योग्य हो? परमेश्वर के आये बिना, क्या तुम अपने आप को परमेश्वर के साथ पारिवारिक आनन्द मनाने के लिए स्वर्ग में ले जा सकते हो क्या तुम अभी भी स्वप्न देख रहे हो? मैं तुम्हें सुझाव देता हूं, कि तुम स्वप्न देखना बंद कर दो, और उनकी ओर देखो जो अभी कार्य कर रहे हैं, इन अंतिम दिनों में कौन मनुष्यों को बचाने के लिए कार्य कर रहा है। यदि तुम ऐसा नहीं करते हो, तो तुम कभी भी सत्य को नहीं प्राप्त कर सकते, और कभी भी जीवन प्राप्त नहीं कर सकते हो।

जो मसीह के द्वारा कहे गए सत्य पर भरोसा किए बिना जीवन प्राप्त करने की अभिलाषा करते हैं, वे पृथ्वी पर सबसे हास्यास्पद मनुष्य हैं और जो मसीह के द्वारा लाए गए जीवन के मार्ग को स्वीकार नहीं करते हैं वे कल्पना में ही खोए हुए हैं। इसलिए मैं यह कहता हूं कि लोग जो अंतिम दिनों में मसीह को स्वीकार नहीं करते हैं वे हमेशा के लिए परमेश्वर के द्वारा तुच्छ समझे जाएंगे। अंतिम दिनों में मसीह मनुष्यों के लिए परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करने का माध्यम है, जिसकी अवहेलना कोई भी नहीं कर सकता। मसीह के माध्यम बने बिना कोई भी परमेश्वर के द्वारा सिद्धता को प्राप्त नहीं कर सकता। परमेश्वर में तुम्हारा विश्वास है, और इसलिए तुम उसके वचनों को स्वीकार करो और उसके मार्गों का पालन करो। बिना सत्य को प्राप्त किए या बिना जीवन के प्रावधान को स्वीकार किए तुमको सिर्फ़ अनुग्रह प्राप्त करने के बारे में सोचना नहीं है। मसीह अंतिम दिनों में आता है ताकि वे सभी जो सच्चाई से उस पर विश्वास करते हैं उन्हें जीवन प्रदान किया जाए। उसका कार्य पुराने युग को समाप्त करने और नए युग में प्रवेश करने के लिए है और यही वह मार्ग है जिसे नए युग में प्रवेश करने वालों को अपनाना चाहिए। यदि तुम उसे पहचानने में असमर्थ हो , और उसकी भर्त्सना करते हो, निंदा करते हो और यहां तक कि उसे पीड़ा पहुंचाते हो, तो तुम अनन्त समय तक जलाए जाते रहने के लिए निर्धारित कर दिये गए हो और तुम कभी भी परमेश्वर के राज्य में प्रवेश नहीं कर पाओगे" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "केवल अंतिम दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनन्त जीवन का मार्ग दे सकता है" से)।

सर्वशक्तिमान परमेश्वर, अंतिम दिनों के मसीह ने सभी सत्यों को व्यक्त किया है जो मानवता को शुद्ध करेंगे और बचाएँगे। ये वचन प्रचुर मात्रा में हैं, व्यापक हैं और इनमें वे सभी जीवनाधार हैं जो परमेश्वर प्रदान करते हैं। वे हमारी आँखें खोलते हैं और हमारे ज्ञान को समृद्ध करते हैं, हमें यह देखने की इजाजत देते हैं कि मसीह ही सत्‍य है, मार्ग है, और जीवन है। मसीह शाश्‍वत जीवन का मार्ग है। ये वचन जो परमेश्वर ने राज्‍य के युग में व्यक्त किये व्‍यवस्‍था के युग और अनुग्रह के युग के दौरान जो कुछ कहा गया उन सबसे परे जाते हैं। विशेष रूप से, जैसा कि "परमेश्‍वर का संपूर्ण ब्रह्माण्ड को कथन" में है वचन देह में प्रकट हुआ में परमेश्‍वर स्‍वयं को समस्त मानवता के लिए पहली बार ज्ञात करवाते हैं। यह भी पहली बार है कि मानवजाति सभी मनुष्यों के लिये सृष्टिकर्ता के कथनों को सुनती है। इसने संपूर्ण ब्रह्माण्ड को आश्चर्यचकित करके मनुष्यों की आँखें खोल दी। यह अंतिम दिनों में महान श्वेत सिंहासन के समक्ष न्याय का काम है। राज्य का युग वह युग है जिसमें परमेश्वर न्याय का कार्य करते हैं, और वह युग है जहाँ परमेश्वर का धर्मी स्‍वभाव समस्त मानव जाति के लिए अभिव्यक्त होता है। इसलिए, राज्य के युग में, परमेश्वर मनुष्य का न्याय करते हुए, उसे शुद्ध और सिद्ध करते हुए अपना वचन व्यक्त करते हैं। वे मनुष्य पर सभी प्रकार की आपदाएँ भेजते हैं, अच्‍छों को पुरस्कृत करते हैं और बुरों को दंड देते हैं। वे परमेश्वर की धार्मिकता, प्रताप और क्रोध को मानव जाति को प्रकट करते हैं। वे सभी सत्यों जो सर्वशक्तिमान परमेश्वर मनुष्‍य को शुद्ध करने, बचाने और सिद्ध करने के लिये व्‍यक्‍त करते हैं शाश्‍वत जीवन के वे मार्ग हैं जिन्हें परमेश्वर अंतिम दिनों में मनुष्य को प्रदान करते हैं। ये सत्य जीवन की नदी का जल है जो सिंहासन से बहता है। इसलिए, हमारे परमेश्वर पर विश्वास में अगर हम शाश्‍वत जीवन का मार्ग हासिल करना चाहते हैं, और स्वर्गारोहण प्राप्त करके स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करना चाहते हैं, तो हमें अंतिम दिनों में सर्वशक्तिमान परमेश्वर, मसीह के न्याय के कार्य को स्वीकार अवश्य करना चाहिए, और साथ ही उनके वचनों के न्‍याय और ताड़ना को भी स्वीकार अवश्य करना चाहिए। केवल इसी तरह से हम पवित्र आत्मा के कार्य को हासिल कर सकते हैं, सत्‍य को समझ और हासिल कर सकते हैं, शुद्धि प्राप्त कर सकते हैं, और बचाए जा सकते हैं। केवल जो लोग अंतिम दिनों में सर्वशक्तिमान परमेश्वर के न्‍याय और ताड़ना से गुज़रते हैं, वे ही परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करने के हकदार हैं। यह एक परम तथ्य है! यदि हम अपने धार्मिक मतों का अनुसरण करते रहें, तो अंत में हमें ही नुकसान सहना होगा। बुद्धिमान कुँवारियाँ केवल सत्य की खोज और परमेश्‍वर के वचनों को सुनने पर ध्यान केंद्रित करती हैं, लेकिन मूर्ख कुँवारियाँ केवल बाइबल के अक्षरों और अपनी अवधारणाओं और कल्पनाओं का पालन करती हैं, और सत्य की तलाश नहीं करती हैं या परमेश्‍वर की वाणी को नहीं सुनती हैं। फिर एक दिन, वे अचानक विपत्ति में पड़ जाएँगी और विलाप करेंगी और दाँत पीसेंगी। और तब पश्चाताप भी बेकार होगा। इसलिए, वे सभी जो सर्वशक्तिमान परमेश्वर को स्वीकार नहीं करते हैं, वे विपत्ति में पड़ेंगे और दंडित किए जाएँगे। यही है वह जिसका परमेश्वर ने आदेश दिया है और कोई भी इसे बदल नहीं सकता है। विशेष रूप से वे जो अंतिम दिनों में सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कार्य की बेतहाशा निंदा करते हैं पहले से ही परमेश्वर के द्वारा प्रकट कर दिये गए हैं कि वे अंतिम दिनों के ईसा-विरोधी हैं - वे लोग शाश्‍वत दंड भुगतेंगे और उन्‍हें परमेश्‍वर से मिलने का अब और अवसर नहीं मिलेगा। यह स्पष्ट है कि अंतिम दिनों में सर्वशक्तिमान परमेश्वर का कार्य, लोगों के परिणामों का निर्धारण करने और युग का समापन करने के लिए, मनुष्य को प्रकारों के अनुसार वर्गीकृत करना है।

फुटनोटः

क. मृतक लकड़ी का एक टुकड़ाः एक चीनी मुहावरा है, जिसका अर्थ "मदद से परे" है। "मेरा प्रभु कौन है" फ़िल्म की स्क्रिप्ट से लिया गया अंश

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IV.यहूदी फरीसियों ने केवल यहोवा परमेश्वर में विश्वास किया, और प्रभु यीशु में नहींI उन्होंने प्रभु यीशु की निंदा और विरोध भी किया, और इसलिए परमेश्वर द्वारा दण्डित और शापित हुएI यह हमें क्या चेतावनी देता है?

वास्तव में कैसे किसी को परमेश्वर में विश्वास करना चाहिए? प्रभु यीशु ने कहा: "यदि तुम विश्‍वास न करोगे कि मैं वही हूँ तो अपने पापों में मरोगे" (यूहन्ना 8:24)। आरंभिक दिनों के बारे में सोचने पर, यहूदी फरीसियों ने केवल एक अस्पष्ट स्वर्गिक परमेश्वर में विश्वास किया था, और जब देहधारी परमेश्वर—यीशु मसीह—प्रकट हुआ और उसने अपना कार्य किया, तो न केवल उन्होंने उस पर विश्वास नहीं किया बल्कि उन्होंने उसका विरोध और उसकी निंदा भी की। अंततः, उन्होंने प्रभु यीशु को क्रूस पर कीलों से जड़ दिया और इसलिए वे परमेश्वर द्वारा दंडित और शापित किए गए थे। अंत के दिनों में, परमेश्वर ने अपना कार्य करने के लिए एक बार पुनः मनुष्य के पुत्र के प्रकटन के रूप में देहधारण किया है, और यदि लोग इस देहधारी, व्यावहारिक परमेश्वर—अंत के दिनों के मसीह में विश्वास नहीं करते हैं—और केवल एक अस्पष्ट, स्वर्गिक परमेश्वर में विश्वास करते हैं, तो क्या यह परमेश्वर में सच्चा विश्वास है?

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