1. क्या एक अस्पष्ट, स्वर्गिक परमेश्वर में विश्वास करना और देहधारी मसीह में विश्वास नहीं करना परमेश्वर में सच्चा विश्वास है?

संदर्भ के लिए बाइबल के पद

"इसलिये मैं ने तुम से कहा कि तुम अपने पापों में मरोगे, क्योंकि यदि तुम विश्‍वास न करोगे कि मैं वही हूँ तो अपने पापों में मरोगे" (यूहन्ना 8:24)।

"परमेश्‍वर का आत्मा तुम इस रीति से पहचान सकते हो : जो आत्मा मान लेती है कि यीशु मसीह शरीर में होकर आया है वह परमेश्‍वर की ओर से है, और जो आत्मा यीशु को नहीं मानती, वह परमेश्‍वर की ओर से नहीं; और वही तो मसीह के विरोधी की आत्मा है" (1 यूहन्ना 4:2-3)।

"क्योंकि बहुत से ऐसे भरमानेवाले जगत में निकल आए हैं, जो यह नहीं मानते कि यीशु मसीह शरीर में होकर आया; भरमानेवाला और मसीह-विरोधी यही है" (2 यूहन्ना 1:7)।

परमेश्वर के अति-उत्कृष्ट वचन

अंत के दिनों के देहधारी परमेश्वर का आगमन अनुग्रह के युग के अंत को लाया है। वह मुख्य रूप से अपने वचनों को कहने, मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए वचनों का उपयोग करने, मनुष्य को रोशन और प्रबुद्ध करने, और मनुष्य के हृदय से अज्ञात परमेश्वर के स्थान को हटाने के लिए आया है। यह कार्य का वह चरण नहीं है जो यीशु ने तब किया था जब वह आया था। जब यीशु आया, तो उसने कई चमत्कार किए, उसने बीमारों को चंगा किया और पिशाचों को निकाला, और सलीब पर चढ़ने का छुटकारे का कार्य पूर्ण किया। परिणामस्वरूप, अपनी धारणाओं में, मनुष्य विश्वास करता है कि परमेश्वर को ऐसा ही होना चाहिए। क्योंकि जब यीशु आया, तो उसने मनुष्य के हृदय से अज्ञात परमेश्वर की छवि को हटाने का कार्य नहीं किया; जब वह आया, तो उसे सलीब पर चढ़ा दिया गया, उसने बीमारों को चंगा किया और पिशाचों को बाहर निकाला, और उसने स्वर्ग के राज्य के सुसमाचार को फैलाया। एक विचार से, अंत के दिनों के दौरान परमेश्वर का देहधारण मनुष्य की धारणाओं में अज्ञात परमेश्वर द्वारा धारण किए गए स्थान को हटाता है, ताकि मनुष्य के हृदय में अज्ञात परमेश्वर की छवि अब और नहीं रहे। अपने वास्तविक कार्य और वचनों का उपयोग करके, वह सम्पूर्ण देशों में जाता है और मनुष्यों के बीच वह जो कार्य करता है वह असाधारण रूप से वास्तविक और सामान्य होता है, इतना कि मनुष्य को परमेश्वर की सच्चाई पता लग जाती है, और मनुष्य के हृदय में अज्ञात परमेश्वर का स्थान समाप्त हो जाता है। दूसरे विचार से, परमेश्वर अपनी देह द्वारा कहे गए वचनों का उपयोग मनुष्य को पूर्ण करने, और सभी बातों को निष्पादित करने के लिए करता है। यही वह कार्य है जो परमेश्वर अंत के दिनों में निष्पादित करेगा। "आज परमेश्वर के कार्य को जानना" से

देहधारी परमेश्वर उस युग को अन्त की ओर लाता है जब सिर्फ यहोवा की पीठ ही मानवजाति को दिखाई दी थी, और साथ ही अस्पष्ट परमेश्वर में मानवजाति के विश्वास का भी समापन करता है। विशेष रूप में, अंतिम देहधारी परमेश्वर का कार्य सारी मानवजाति को एक ऐसे युग में लाता है जो और अधिक वास्तविक, और अधिक व्यावहारिक, एवं और अधिक मनोहर है। वह न केवल व्यवस्था एवं सिद्धान्त के युग का अन्त करता है; बल्कि अति महत्वपूर्ण रूप से, वह मानवजाति पर ऐसे परमेश्वर को प्रगट करता है जो वास्तविक एवं साधारण है, जो धर्मी एवं पवित्र है, जो प्रबंधकीय योजना के कार्य को चालू करता है और मानवजाति के रहस्यों एवं मंज़िल को प्रदर्शित करता है, जिसने मानवजाति को सृजा था और प्रबंधकीय कार्य को अन्त की ओर ले जाता है, और जो हज़ारों वर्षों से छिपा हुआ है। वह अस्पष्टता के युग को सम्पूर्ण अन्त की ओर ले जाता है, वह उस युग का अन्त करता है जिसमें समूची मानवजाति परमेश्वर के मुख को खोजने की इच्छा करती थी परन्तु वह ऐसा करने में असमर्थ थी, वह ऐसे युग का अन्त करता है जिसमें समूची मानवजाति शैतान की सेवा करती थी, और समस्त मानवजाति की अगुवाई पूरी तरह से एक नए विशेष काल (युग) में करता है। यह सब परमेश्वर के आत्मा के बजाए देह में प्रगट परमेश्वर के कार्य का परिणाम है। "भ्रष्ट मानवजाति को देह धारण किए हुए परमेश्वर के उद्धार की अत्यधिक आवश्यकता है" से

मनुष्य के साथ सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह केवल उन्हीं चीजों को प्यार करता है जिन्हें वह देख या स्पर्श नहीं कर सकता है, जो अत्यधिक रहस्यमयी और अद्भुत होती हैं, और मनुष्य के द्वारा अकल्पनीय एवं नश्वर मात्र द्वारा अप्राप्य हैं। जितनी अधिक अवास्तविक ये वस्तुएँ होती हैं, उतना ही अधिक मनुष्य के द्वारा विश्लेषित की जाती हैं, जिनकी वह सभी से बेपरवाह हो कर भी खोज करता है, और अपने आप को भुलावे में रखता है कि वह इन्हें प्राप्त करने में सक्षम है। जितना अधिक अवास्तविक ये होती हैं, उतना ही अधिक बारीकी से मनुष्य उनकी जाँच करता है और, यहाँ तक कि इतना दूर तक जा कर उनका विश्लेषण करता है, कि उनके बारे में अपने स्वयं की विस्तृत अवधारणाएँ बनाता है। इसके विपरीत, चीजें जितनी अधिक वास्तविक होती है, मनुष्य प्रायः उतना ही अधिक उनके प्रति उपेक्षापूर्ण होता है; वह केवल उन्हें हेय दृष्टि से देखता है और यहाँ तक कि उनके प्रति तिरस्कारपूर्ण भी हो जाता है। क्या यही प्रवृत्ति तुम लोगों की उस वास्तविक कार्य के प्रति नहीं है जो मैं आज करता हूँ? ये चीज़ें जितनी अधिक वास्तवकि होती हैं, तुम लोग उतना ही अधिक उनके विरुद्ध पूर्वाग्रही हो जाते हो। तुम लोग उनकी जाँच करने के लिए अपना कोई भी समय नहीं निकालते हो, बल्कि केवल उनकी उपेक्षा कर देते हो; तुम लोग इन वास्तविक, सीधी-सादी अपेक्षाओं को हेय दृष्टि से देखते हो, और यहाँ तक कि इस परमेश्वर के बारे में कई धारणाओं को प्रश्रय देते हो जो कि सर्वाधिक वास्तविक है, और केवल उसकी वास्तविकता और समान्यता को स्वीकार करने में अक्षम हो। इस तरह, क्या तुम लोग अज्ञातता के बीच विश्वास नहीं करते हो? अतीत में तुम लोगों का अज्ञात परमेश्वर में अविचल विश्वास था, और तुम लोगों की आज के वास्तविक परमेश्वर में कोई रुचि नहीं थी। क्या ऐसा इसलिए नहीं है क्योंकि कल का परमेश्वर और आज का परमेश्वर दो भिन्न-भिन्न युगों से हैं? क्या ऐसा इसलिए नहीं है क्योंकि कल का परमेश्वर स्वर्ग का उच्च परमेश्वर है, जबकि आज का परमेश्वर धरती पर छोटा सा मनुष्य है? इसके अलावा, क्या ऐसा इसलिए नहीं है क्योंकि मनुष्यों के द्वारा आराधना किया जाने वाला परमेश्वर उसकी अपनी धारणाओं से उत्पन्न हुआ है, जबकि आज का परमेश्वर धरती पर उत्पन्न वास्तविक देह है? हर चीज पर विचार करने के बाद, क्या ऐसा इसलिए नहीं है क्योंकि आज का परमेश्वर इतना अधिक वास्तविक है कि मनुष्य उसकी खोज नहीं करता है? क्योंकि आज का परमेश्वर मनुष्य से जो कहता है वह ठीक वही है जिसे करने का मनुष्य सबसे अधिक अनिच्छुक है, और जो उसे लज्जित महसूस करवाता है। क्या यह मनुष्यों के लिए चीज़ों को कठिन बनाना नहीं है? क्या यह उसके दागों को उघाड़ना नहीं है? इस प्रकार से, अधिकांश लोग जो वास्तविकता की खोज नहीं करते हैं वे देहधारी परमेश्वर के शत्रु बन जाते हैं, मसीह विरोधी बन जाते हैं। क्या यह एक प्रकट सत्य नहीं है? अतीत में, जब परमेश्वर को अभी देहधारी बनना था, तो तुमने किसी धार्मिक व्यक्ति, या किसी श्रद्धालु विश्वासी को देखा होगा। परमेश्वर के देहधारी हो जाने के बाद, इस प्रकार के कई श्रद्धालु विश्वासी अनजाने में मसीह विरोधी बन गए। क्या तुम जानते हो कि यहाँ क्या चल रहा है? परमेश्वर पर अपने विश्वास में, तुम वास्तविकता पर ध्यान नहीं देते हो या सत्य की खोज नहीं करते हो, बल्कि इसके बजाय तुम झूठ से ग्रस्त हो जाते हो—क्या यह देहधारी परमेश्वर के प्रति तुम्हारी शत्रुता का स्पष्टतम स्रोत नहीं है? देहधारी परमेश्वर मसीह कहलाता है, तो क्या वे सभी जो देहधारी परमेश्वर पर विश्वास नहीं करते हैं मसीह विरोधी नहीं हैं? और इसलिए क्या तुम जिस पर विश्वास करते हो और जिससे प्रेम करते हो वह सच में यह देहधारी परमेश्वर है? क्या यही वास्तव में जीवित, श्वास लेता हुआ वह परमेश्वर है जो बहुत ही वास्तविक और असाधारण रूप से सामान्य है? तुम्हारी खोज का वास्तव में उद्देश्य क्या है? क्या यह स्वर्ग में है या पृथ्वी पर है? क्या यह एक धारणा है या क्या यह एक सत्य है? क्या यह परमेश्वर है या कोई अलौकिक प्राणी है? "जो परमेश्वर को और उसके कार्य को जानते हैं केवल वे ही परमेश्वर को सन्तुष्ट कर सकते हैं" से

तुम लोग स्वर्ग के परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास करते हो परन्तु पृथ्वी के परमेश्वर के अस्तित्व से इनकार करते हो। हालाँकि, मैं तुम लोगों के विचारों का अनुमोदन नहीं करता हूँ। मैं केवल उन लोगों की सराहना करता हूँ जो अपने पैरों को ज़मीन पर रखते हैं और पृथ्वी के परमेश्वर की सेवा करते हैं, किन्तु उनकी कभी भी नहीं करता हूँ जो पृथ्वी के मसीह को स्वीकार नहीं करते हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि इस प्रकार के लोग स्वर्ग के परमेश्वर के प्रति कितने वफादार हैं, अंत में, वे मेरे हाथ से बच कर नहीं निकल सकते हैं जो दुष्टों को दण्ड देता है। इस प्रकार के लोग दुष्ट हैं; ये मनुष्य दुष्ट हैं; ये दुष्ट लोग हैं जो परमेश्वर का विरोध करते हैं और जिन्होंने कभी भी खुशी से मसीह का आज्ञापालन नहीं किया है। निस्संदेह, उनकी संख्या में वे सम्मिलित हैं जो मसीह को नहीं जानते हैं, और उसके अलावा, उसे अभिस्वीकृत नहीं करते हैं। तुम विश्वास करते हो कि तुम मसीह के प्रति जैसा चाहो वैसा व्यव्हार कर सकते हो जब तक कि तुम स्वर्ग के परमेश्वर के प्रति वफादार हो। गलत! मसीह के बारे में तुम्हारी अज्ञानता स्वर्ग के परमेश्वर के प्रति अज्ञानता है। इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता है कि तुम स्वर्ग के परमेश्वर के प्रति कितने वफादार हो, यह मात्र खोखली बात और दिखावा है, क्योंकि पृथ्वी का परमेश्वर न केवल सत्य और अधिक गहरे ज्ञान को प्राप्त करने का मनुष्यों में साधन है, बल्कि मनुष्यों की भर्त्सना करने के लिए और उसके बाद दुष्टों को दंडित करने के लिए तथ्यों पर कब्ज़ा करने में और भी बड़ा साधक है। क्या तुमने यहाँ लाभदायक और हानिकारक परिणामों को समझ लिया है? क्या तुमने उनका अनुभव किया है? मैं चाहता हूँ कि तुम लोग शीघ्र ही एक दिन इस सत्य को समझो: परमेश्वर को जानने के लिए, तुम्हें न केवल स्वर्ग के परमेश्वर को अवश्य जानना चाहिए बल्कि, इससे भी अधिक महत्वपूर्ण रूप से, पृथ्वी के परमेश्वर को भी अवश्य जानना चाहिए। अपनी प्राथमिकताओं को भ्रमित मत करवाओ या गौण को मुख्य से आगे निकलने की अनुमति मत दो। केवल इसी प्रकार से तुम परमेश्वर के साथ वास्तव में एक अच्छा सम्बन्ध बना सकते हो, परमेश्वर के नज़दीक हो सकते हो, और अपने हृदय को उसके और अधिक निकट ला सकते हो। "पृथ्वी के परमेश्वर को कैसे जानें" से

जो परमेश्वर के देहधारी होने को इनकार करते हैं, वे ऐसे लोग होते हैं जो आत्मा को या उन सिद्धान्तों को नहीं जानते हैं जिनके द्वारा परमेश्वर कार्य करता है। जो मानते हैं कि अब पवित्र आत्मा का युग है फिर भी उसके नए कार्य को स्वीकार नहीं करते हैं वे अस्पष्ट विश्वास में जीने वाले लोग हैं। मनुष्यों का इस प्रकार का व्यवहार कभी भी पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त नहीं करेगा। जो लोग चाहते हैं कि पवित्र आत्मा प्रत्यक्ष रूप से उनसे बात करे और अपना कार्य करे, फिर भी वे देहधारी परमेश्वर के वचनों या कार्य को स्वीकार नहीं करते हैं, वे कभी भी नए युग में प्रवेश या परमेश्वर से पूरी तरह से उद्धार प्राप्त नहीं कर पाएँगे। "वह मनुष्य किस प्रकार परमेश्वर के प्रकटनों को प्राप्त कर सकता है जिसने उसे अपनी ही धारणाओं में परिभाषित किया है?" से

यदि कोई व्यक्ति परमेश्वर के देह धारण पर विश्वास नहीं करता है, अर्थात कोई जो प्रत्यक्ष परमेश्वर के कार्य और बातों पर और प्रत्यक्ष परमेश्वर पर विश्वास न करके स्वर्ग के अदृश्य परमेश्वर की आराधना करता है—उसके हृदय में परमेश्वर नहीं है। ये वे लोग हैं जो परमेश्वर की अवज्ञा और प्रतिरोध करते हैं। इन लोगों के पास मानवीयता और विवेक का अभाव होता है, फिर सत्य के बारे में तो क्या कहें। ये वे लोग हैं जो प्रत्यक्ष और स्पर्शनीय परमेश्वर पर विश्वास नहीं कर सकते किंतु अदृश्य और अस्पर्शनीय परमेश्वर इनके लिए सर्वाधिक विश्वसनीय है और उनके हृदयों को सबसे अधिक खुशी देता है। वे जिसे खोजते हैं वह वास्तविकता का सत्य नहीं है, न ही जीवन का वास्तविक सार है, परमेश्वर की योजना तो है ही नहीं; वे केवल रोमांच का पीछा करते हैं। वे सब बातें या वस्तुएँ जो उन्हें अधिक से अधिक उनकी अपनी इच्छाओं को पूरा करने का अवसर देती हैं, वे ही हैं जिन पर वे विश्वास करते और जिनका वे पीछा करते हैं। वे परमेश्वर पर केवल इसलिए विश्वास करते हैं कि निज इच्छाओं को पूरा करें—सत्य की खोज के लिए नहीं। क्या ये लोग बुरे कार्य करने वाले नहीं हैं? वे अत्यधिक आत्मविश्वास से भरे हैं, और वे यह विश्वास नहीं करते कि स्वर्ग का परमेश्वर उन्हें नष्ट कर देगा, इन "इन भले लोगों को"। बल्कि ये विश्वास करते हैं कि परमेश्वर उन्हें बचाकर रखेगा, और इससे भी अधिक यह कि प्रचुरता से पुरस्कार देगा, क्योंकि उन्होंने परमेश्वर के लिए बहुत से कार्य किये हैं, और बड़े परिमाण में परमेश्वर के प्रति "निष्ठा" का प्रदर्शन किया है। यदि उन्हें साक्षात् परमेश्वर का पीछा करना हो, तो जैसे ही उनकी अभिलाषाएँ अधूरी रहें, वे तुरंत परमेश्वर के विरुद्ध बोलने लगेंगे और क्रोध से भर जाएँगे। ये बुरे लोग हैं जो अपनी अभिलाषाएँ पूरी करने की खोज में रहते हैं, ये लोग सत्य का पीछा करने वाले निष्ठावान लोग नहीं हैं। इस प्रकार के लोग तथाकथित दुष्ट लोग हैं जो मसीह के पीछे चलते हैं। जो लोग सत्य की खोज नहीं करते हैं वे सत्य पर विश्वास नहीं कर सकते हैं। वे मानवजाति के भविष्य के परिणाम को समझने में और भी अधिक अयोग्य हैं, क्योंकि वे प्रत्यक्ष परमेश्वर के किसी कार्य या वाणी पर विश्वास नहीं करते हैं, और वे मानव जाति के भविष्य के गंतव्य पर विश्वास नहीं कर सकते हैं। इस कारण, यदि वे साक्षात् परमेश्वर का अनुसरण करें तब भी वे बुरा करेंगे और सत्य को नहीं खोजेंगे, और न उस सत्य पर अमल करेंगे, जिसे मैं चाहता हूँ। "परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे" से

मनुष्यों के विश्राम में प्रवेश करने से पहले, हर एक व्यक्ति का दण्ड या पुरस्कार पाना यह इस बात पर आधारित होगा कि क्या वे सत्य की खोज करते हैं, क्या वे परमेश्वर को जानते हैं, क्या वे साक्षात् परमेश्वर की आज्ञा का पालन कर सकते हैं। वे जिन्होंने साक्षात् परमेश्वर को सेवाएँ दीं, पर उसे नहीं जानते या आज्ञापालन नहीं करते हैं, उनमें सत्य नहीं है। ये लोग कुकर्मी हैं, और कुकर्मी निःसंदेह दण्डित किए जाएँगे। इससे अधिक, वे अपने बुरे आचरण के अनुसार दण्ड पाएँगे। परमेश्वर पर मनुष्यों द्वारा विश्वास किया जाता है, और वह मनुष्यों के द्वारा आज्ञापालन किये जाने योग्य भी है। वे लोग जो केवल अस्पष्ट और अदृश्य परमेश्वर पर विश्वास करते हैं वे लोग परमेश्वर पर विश्वास नहीं करते हैं, और वे परमेश्वर की आज्ञा मानने में भी असमर्थ हैं। यदि ये मनुष्य साक्षात् परमेश्वर पर विश्वास नहीं कर पाते, और उसके विजयी किए जाने के कार्य के पूरा होने तक अवज्ञाकारी बने रहते हैं और परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं—जो देह में दृश्यमान है, तो ये सबसे अधिक अस्पष्ट लोग हैं, और निःसंदेह नष्ट किये जाएँगे। "परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे" से

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2. यदि कोई व्यक्ति अपने विश्वास में केवल बाइबल के पत्रों और नियमों को पकड़े रहता है और मसीह के साथ संगत होने के तरीके की तलाश नहीं करता है, तो क्या वह शाश्वत जीवन प्राप्त कर सकता है?

परमेश्वर में कई विश्वासियों का मानना है कि बाइबल परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करती है, और यह कि परमेश्वर में विश्वास बाइबल में विश्वास है, और बाइबल को पकड़े रह कर वे अनंत जीवन प्राप्त कर सकते हैं। और फिर भी प्रभु यीशु ने कहा था: "तुम पवित्रशास्त्र में ढूँढ़ते हो, क्योंकि समझते हो कि उसमें अनन्त जीवन तुम्हें मिलता है; और यह वही है जो मेरी गवाही देता है; फिर भी तुम जीवन पाने के लिये मेरे पास आना नहीं चाहते" (यूहन्ना 5:39-40)। प्रभु यीशु द्वारा बोले गए इन वचनों का वास्तविक अर्थ क्या है? यदि कोई केवल बाइबिल को पकड़े रहता है और मसीह के साथ संगत होने के तरीके की तलाश नहीं करता है, तब क्या वह शाश्वत जीवन प्राप्त कर सकता है?

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