3. परिणाम क्या होंगे यदि कोई अपने विश्वास में केवल यहोवा के नाम और प्रभु यीशु के नाम को पकड़े रहता है, और लौटे हुए परमेश्वर के नए नाम को स्वीकार नहीं करता है?

संदर्भ के लिए बाइबल के पद

"और तेरा एक नया नाम रखा जाएगा जो यहोवा के मुख से निकलेगा" (यशायाह 62:2)।

"जो जय पाए उसे मैं अपने परमेश्‍वर के मन्दिर में एक खंभा बनाऊँगा, और वह फिर कभी बाहर न निकलेगा; और मैं अपने परमेश्‍वर का नाम और अपने परमेश्‍वर के नगर अर्थात् नये यरूशलेम का नाम, जो मेरे परमेश्‍वर के पास से स्वर्ग पर से उतरनेवाला है, और अपना नया नाम उस पर लिखूँगा" (प्रकाशितवाक्य 3:12)।

"प्रभु परमेश्‍वर, जो है और जो था और जो आनेवाला है, जो सर्वशक्‍तिमान है, यह कहता है, मैं ही अल्फ़ा और ओमेगा हूँ" (प्रकाशितवाक्य 1:8)।

"चारों प्राणियों के छ: छ: पंख हैं, और चारों ओर और भीतर आँखें ही आँखें हैं; और वे रात दिन बिना विश्राम लिये यह कहते रहते हैं, पवित्र, पवित्र, पवित्र प्रभु परमेश्‍वर, सर्वशक्‍तिमान, जो था और जो है और जो आनेवाला है" (प्रकाशितवाक्य 4:8)।

"यह कहने लगे, हे सर्वशक्‍तिमान प्रभु परमेश्‍वर, जो है और जो था, हम तेरा धन्यवाद करते हैं कि तू ने अपनी बड़ी सामर्थ्य को काम में लाकर राज्य किया है" (प्रकाशितवाक्य 11:17)।

"हे सर्वशक्‍तिमान प्रभु परमेश्‍वर, तेरे कार्य महान् और अद्भुत हैं; हे युग-युग के राजा, तेरी चाल ठीक और सच्‍ची है" (प्रकाशितवाक्य 15:3)।

परमेश्वर के अति-उत्कृष्ट वचन

जोकार्य यीशु ने किया उसने यीशु के नाम का प्रतिनिधित्व किया, और अनुग्रह के युग का प्रतिनिधित्व किया; यहोवा द्वारा किए गए कार्यने यहोवा का प्रतिनिधित्व किया, और व्यवस्था के युग का प्रतिनिधित्व किया। उनका कार्य दो भिन्न-भिन्न युगों में एक ही पवित्रात्मा का कार्य था। ...यद्यपि उन्हें दो भिन्न-भिन्न नामों से बुलाया गया था, किन्तु कार्य के दोनों चरण एक ही पवित्रात्मा द्वारा किए गए थे, और दूसरा कार्य पहले के क्रम में था। चूँकि नाम भिन्न था, और कार्य की विषय-वस्तु भिन्न थी, इसलिए युग अलग था। जब यहोवा आया, तो वह यहोवा का युग था, और जब यीशु आया, तो वह यीशु का युग था। और इसलिए, हर बार जब परमेश्वर आता है, तो उसे एक नाम से बुलाया जाता है, वह एक युग का प्रतिनिधित्व करता है, और वह एक नया मार्ग खोलता है; और प्रत्येक नए मार्ग पर, वह एक नया नाम अपनाता है, जो दर्शाता है कि परमेश्वर हमेशा नया है और कभी पुराना नहीं पड़ता है, और यह कि उसका कार्य हमेशा आगे बढ़ रहा है। इतिहास हमेशा आगे बढ़ रहा है, और परमेश्वर का कार्य हमेशा आगे बढ़ रहा है। उसकी छः-हजार-वर्षीय प्रबंधन योजना के अंत तक पहुँचने के लिए, इसे अवश्य आगे प्रगति करते रहना चाहिए। प्रत्येक दिन उसे नया कार्य अवश्य करना चाहिए, प्रत्येक वर्ष उसे नया कार्य अवश्य करना चाहिए; उसे नए मार्गों को अवश्य खोलना चाहिए, अवश्य नए युगों को आरंभ करना चाहिए, नया और अधिक बड़ा कार्य आरंभ करना चाहिए और नए नाम और नया कार्य लाना चाहिए। "परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)" से

प्रत्येक युग में परमेश्वर स्वयं द्वारा किया गया कार्य उसके सच्चे स्वभाव की अभिव्यक्ति से युक्त होता है, और उसका नाम और वह जो कार्य करता है युग के साथ बदल जाते हैं;वे सभी नए होते हैं। व्यवस्था के युग के दौरान, मानव जाति के मार्गदर्शन का कार्य यहोवा के नाम के अधीन किया गया था, और कार्य का पहला चरण पृथ्वी पर किया गया था। ...अनुग्रह के युग के दौरान, परमेश्वर का नाम यीशु था, जिसका अर्थ है कि परमेश्वर ऐसा परमेश्वर था जिसने मनुष्य को बचाया, और यह कि वह एक करुणामय और प्रेममय परमेश्वर था। परमेश्वर मनुष्य के साथ था। उसका प्यार, उसकी करुणा, और उसका उद्धार हर एक व्यक्ति के साथ था। मनुष्य केवल तभी शांति और आनन्द प्राप्त कर सकता था , उसका आशीष प्राप्त कर सकता था, उसका विशाल और विपुल अनुग्रह प्राप्त कर सकता था, और उसके द्वारा उद्धार प्राप्त कर लेता, यदि मनुष्य यीशु के नाम को स्वीकार कर लेता और उसकी उपस्थिति को स्वीकार कर लेता। यीशु को सलीब पर चढ़ाने के माध्यम से, उसका अनुसरण करने वाले सभी लोगों को उद्धार प्राप्त हुआ और उनके पापों को क्षमा कर दिया गया। अनुग्रह के युग दौरान, परमेश्वर का नाम यीशु था। दूसरे शब्दों में, अनुग्रह के युग का कार्य मुख्यतः यीशु के नाम से किया गया था। अनुग्रह के युग के दौरान, परमेश्वर को यीशु कहा गया था। उसने पुराने विधान से परे नया कार्य किया, और उसका कार्य सलीब पर चढ़ाए जाने के साथ ही समाप्त हो गया, और यह उसके कार्य की संपूर्णता थी। इसलिए, व्यवस्था के युग के दौरान परमेश्वर का नाम यहोवा था, और अनुग्रह के युग में यीशु के नाम ने परमेश्वर का प्रतिनिधित्व किया। अंत के दिनों के दौरान, उसका नाम सर्वशक्तिमान परमेश्वर—सर्वशक्तिमान है, और वह मनुष्य का मार्गदर्शन करने,मनुष्य पर विजय प्राप्त करने, और मनुष्य को प्राप्त करने, और अंत में,युग का समापन करने के लिए अपनी शक्ति का उपयोग करता है। हर युग में, अपने कार्य के हर चरण में, परमेश्वर का स्वभाव स्पष्ट है। "परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)" से

और इसलिए, जब अंतिम युग—अंत के दिनों के युग—का आगमन होगा, तो मेरा नाम पुनः बदल जाएगा। मुझे यहोवा, या यीशु नहीं कहा जाएगा, मसीहा तो कदापि नहीं, बल्कि मुझे स्वयं सामर्थ्यवान सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहा जाएगा, और इस नाम के अंतर्गत मैं समस्त युग को समाप्त करूँगा। एक समय मुझे यहोवा के नाम से जाना जाता था। मुझे मसीह भी कहा जाता था, और लोगों ने एक बार मुझे उद्धारकर्त्ता यीशु कहा था क्योंकि वे मुझ से प्रेम करते थे और मेरा आदर करते थे। किन्तु आज मैं वह यहोवा और यीशु नहीं हूँ जिसे लोग बीते समयों में जानते थे—मैं वह परमेश्वर हूँ जो अंत के दिनों में वापस आ गया है, वह परमेश्वर जो युग को समाप्त करेगा। वह परमेश्वर मैं स्वयं हूँ जो अपने स्वभाव की परिपूर्णता के साथ, और अधिकार, आदर एवं महिमा से भरपूर होकर पृथ्वी के अंतिम छोर से उदय होता हूँ। लोग कभी भी मेरे साथ संलग्न नहीं हुए हैं, उन्होंने मुझे कभी जाना नहीं है, और मेरे स्वभाव के प्रति हमेशा अनभिज्ञ रहे हैं। संसार की रचना के समय से लेकर आज तक, एक मनुष्य ने भी मुझे नहीं देखा है। यह वह परमेश्वर है जो अंत के दिनों के दौरान मनुष्यों पर प्रकट होता है किन्तु वह मनुष्य के बीच में छुपा हुआ है। वह, सामर्थ्य से भरपूर और अधिकार से लबालब भरा हुआ, धधकते हुए सूरज और दहकती हुई आग के समान, सच्चे और वास्तविक रूप में, मनुष्यों के बीच निवास करता है। कोई ऐसा मनुष्य या चीज़ नहीं है जिसका न्याय मेरे वचनों के द्वारा नहीं किया जाएगा, और कोई ऐसा मनुष्य या चीज़ नहीं है जिसे आग की जलती हुई लपटों के माध्यम से शुद्ध नहीं किया जाएगा। अंततः, मेरे वचनों के कारण सारे राष्ट्र धन्य हों जाएँगे, और मेरे वचनों के कारण टुकड़े-टुकड़े भी कर दिए जाएँगे। इस तरह, अंत के दिनों के दौरान सभी लोग देखेंगे कि मैं ही वह उद्धारकर्त्ता हूँ जो वापस लौट आया है, मैं ही वह सर्वशक्तिमान परमेश्वर हूँ जो समस्त मानवजाति को जीतता है, और मैं एक समय मनुष्य के लिए पाप बलि था, किन्तु अंत के दिनों में मैं सूरज की आग की ज्वाला भी बन जाता हूँ जो सभी चीज़ों को जला देती है, और साथ ही मैं धार्मिकता का सूर्य भी बन जाता हूँ जो सभी चीज़ों को प्रकट कर देता है। अंत के दिनों का मेरा कार्य ऐसा ही है। मैंने इस नाम को अपनाया है और मेरा यह स्वभाव है ताकि सभी लोग देख सकें कि मैं धर्मी परमेश्वर हूँ, और धधकता हुआ सूरज हूँ, और दहकती हुई आग हूँ। ऐसा इसलिए है ताकि सभी मेरी, एकमात्र सच्चे परमेश्वर की, आराधना कर सकें, और ताकि वे मेरे असली चेहरे को देख सकें: मैं न केवल इस्राएलियों का परमेश्वर हूँ, और न मात्र छुटकारा दिलाने वाला हूँ—मैं समस्त आकाश और पृथ्वी और महासागरों के सारे प्राणियों का परमेश्वर हूँ। "उद्धारकर्त्ता पहले से ही एक "सफेद बादल" पर सवार होकर वापस आ चुका है" से

यदि मनुष्य हमेशा मुझे यीशु मसीह कहकर सम्बोधित करता है, किन्तु यह नहीं जानता है कि मैंने इन अंतिम दिनों के दौरान एक नए युग की शुरूआत कर दी है और एक नया साहसिक कार्य प्रारम्भ कर दिया है, और यदि मनुष्य हमेशा सनकियों की तरह उद्धारकर्त्ता यीशु के आगमन का इन्तज़ार करता रहता है, तो मैं कहूँगा कि ऐसे लोग उसके समान हैं जो मुझ पर विश्वास नहीं करते हैं। वे ऐसे लोग हैं जो मुझे नहीं जानते हैं, और मुझ पर उनका विश्वास एक ढकोसला है। क्या ऐसे लोग उद्धारकर्त्ता यीशु के स्वर्ग से आगमन का दर्शन कर सकते हैं? वे मेरे आगमन का इन्तज़ार नहीं करते हैं, बल्कि वे यहूदियों के राजा के आगमन का इन्तज़ार करते हैं। वे मेरे द्वारा इस पुराने अशुद्ध संसार के सम्पूर्ण विनाश की लालसा नहीं करते हैं, बल्कि इसके बजाए यीशु के द्वितीय आगमन की लालसा करते हैं, जिसके पश्चात उन्हें छुटकारा दिया जाएगा; वे यीशु की प्रतीक्षा करते हैं कि वह एक बार फिर से पूरी मानवजाति को इस अशुद्ध और अधर्मी भूमि से छुटकारा दिलाए। ऐसे लोग उनके समान कैसे बन सकते हैं जो अंत के दिनों के दौरान मेरे काम को पूरा करते हैं? मनुष्य की कामनाएँ मेरी इच्छाओं को प्राप्त करने या मेरे कार्य को पूरा करने में अक्षम हैं, क्योंकि मनुष्य मात्र उस कार्य की प्रशंसा करता है और उससे प्यार करता है जिसे मैंने पहले किया है, और उसे कोई अंदाजा नहीं है कि मैं परमेश्वर स्वयं हूँ जो हमेशा से नया है और कभी पुराना नहीं होता है। मनुष्य केवल इतना जानता है कि मैं यहोवा, और यीशु हूँ, और उसको कोई आभास नहीं है कि मैं ही अंतिम, वह एक हूँ जो मानवजाति को समाप्त करेगा। वह सब जिसके लिए मनुष्य तरसता है और जिसे जानता है वह उसकी स्वयं की धारणा है, और मात्र वह है जिसे वह अपनी आँखों से देख सकता है। यह उस कार्य के अनुसार नहीं है जो मैं करता हूँ, बल्कि उसके असंगत है। "उद्धारकर्त्ता पहले से ही एक "सफेद बादल" पर सवार होकर वापस आ चुका है" से

चूँकि मनुष्य परमेश्वर में विश्वास करता है, तो उसे परमेश्वर के पदचिन्हों का करीब से, कदम दर कदम, अनुसरण करना होगा; और उसे "जहाँ कहीं मेम्ना जाता है उसका अनुसरण" करना चाहिए। केवल ये ही ऐसे लोग हैं जो सच्चे मार्ग को खोजते हैं, केवल ये ही ऐसे मनुष्य हैं जो पवित्र आत्मा के कार्य को जानते हैं। लोग जो दासत्व से पत्रों एवं सिद्धान्तों का अनुसरण करते हैं वे ऐसे लोग हैं जिन्हें पवित्र आत्मा के कार्य के द्वारा निष्कासित किया गया है। समय की प्रत्येक अवधि में, परमेश्वर नया कार्य आरम्भ करेगा, और प्रत्येक अवधि में, मनुष्य के बीच में एक नई शुरुआत होगी। यदि मनुष्य केवल इन सच्चाईयों में ही बना रहता है कि "यहोवा ही परमेश्वर है" और "यीशु ही मसीहा है," जो ऐसी सच्चाईयां हैं जो केवल एक अकेले युग पर ही लागू होती हैं, तो मनुष्य कभी भी पवित्र आत्मा के कार्य के साथ कदम नहीं मिला पाएगा, और वह हमेशा पवित्र आत्मा के कार्य को हासिल करने में असमर्थ रहेगा। इसकी परवाह किए बगैर कि परमेश्वर कैसे कार्य करता है, मनुष्य जरा सा भी सन्देह किए बिना अनुसरण करता है, और वह करीब से अनुसरण करता है। इस रीति से, पवित्र आत्मा के द्वारा मनुष्य को कैसे निष्काषित किया जा सकता है? इसकी परवाह किए बगैर कि परमेश्वर क्या करता है, जब तक मनुष्य को निश्चय है कि यह पवित्र आत्मा का कार्य है, और वह बिना किसी आशंका के पवित्र आत्मा के कार्य में सहयोग करता है, और परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा करने का प्रयास करता है, तो उसे कैसे दण्ड दिया जा सकता है? परमेश्वर का कार्य कभी नहीं रूका है, उसके पदचिन्ह कभी नहीं थमे हैं, और उसके प्रबंधन के कार्य की पूर्णता से पहले, वह सदैव से व्यस्त रहा है, और कभी नहीं रुका है। किन्तु मनुष्य अलग हैः पवित्र आत्मा के कार्य के आंशिक भाग को प्राप्त करने के बाद, वह ऐसा व्यवहार करता है मानो वह कार्य कभी नहीं बदलेगा; थोड़ा का ज्ञान प्राप्त करने के बाद, वह परमेश्वर के नए कार्य के पदचिन्हों का अनुसरण करने के लिए आगे नहीं बढ़ता है; परमेश्वर के कार्य के सिर्फ छोटे से भाग को देखने के बाद, वह तुरन्त ही परमेश्वर को लकड़ी की एक विशिष्ट आकृति के रूप में निर्धारित करता है, और यह मानता है कि परमेश्वर सदैव इस आकार में बना रहेगा जिसे वह अपने सामने देखता है, कि यह भूतकाल में ऐसा ही था और भविष्य में भी ऐसा ही बना रहेगा; सिर्फ एक सतही ज्ञान प्राप्त करने के बाद, मनुष्य इतना घमण्डी हो जाता है कि वह स्वयं को भूल जाता है और बेहूदा ढंग से परमेश्वर के स्वभाव एवं अस्तित्व के विषय में घोषणा करता है कि साधारण तौर पर उनका कोई अस्तित्व नहीं है; और पवित्र आत्मा के कार्य के एक चरण का दृढ़ता से अनुसरण करने का चुनाव करने के बाद, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है की वह किस किस्म का व्यक्ति है जो परमेश्वर के नए कार्य की घोषणा करता है, मनुष्य इसे स्वीकार नहीं करता है। ये ऐसे लोग हैं जो पवित्र आत्मा के नए कार्य को स्वीकार नहीं कर सकते हैं; वे अति रूढ़िवादी हैं, और वे नई चीज़ों को स्वीकार करने में असमर्थ हैं। इस प्रकार के लोग ऐसे हैं जो परमेश्वर में विश्वास तो करते हैं किन्तु परमेश्वर का तिरस्कार भी करते हैं। मनुष्य विश्वास करता है कि इस्राएली ग़लत थे क्योंकि उन्होंने "केवल यहोवा में विश्वास किया और यीशु में विश्वास नहीं किया", फिर भी अधिकांश लोग एक ऐसी भूमिका निभाते हैं जिसके अंतर्गत वे "केवल यहोवा में विश्वास करते हैं तथा यीशु को ठुकराते हैं" और "मसीहा के वापस लौटने की लालसा करते हैं, किन्तु उस मसीहा का विरोध करते हैं जिसे यीशु कहते हैं।" तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि लोग पवित्र आत्मा के कार्य के एक चरण को स्वीकार करने के पश्चात् अभी भी शैतान के प्रभुत्व के अधीन जीवन बिताते हैं, और उन्होंने अभी भी परमेश्वर की आशीषों को प्राप्त नहीं किया है। क्या यह मनुष्य के विद्रोहीपन का परिणाम नहीं है? ...ऐसे लोग जो अंत तक मेम्ने के पदचिन्हों का अनुसरण करते हैं केवल वे ही अन्तिम आशीष को प्राप्त कर सकते हैं, जबकि वे "चतुर लोग", जो बिल्कुल अंत तक अनुसरण करने में असमर्थ हैं फिर भी विश्वास करते हैं कि उन्हें सब कुछ प्राप्त हो चुका है, वे परमेश्वर के प्रगटीकरण की गवाही देने में असमर्थ हैं। वे सब विश्वास करते हैं कि वे पृथ्वी पर सबसे चतुर व्यक्ति हैं, और वे अकारण ही परमेश्वर के कार्य के लगातार विकास को छोटा करते हैं, और ऐसा प्रतीत होता है कि वे पूर्ण निश्चयता के साथ विश्वास करते हैं कि परमेश्वर उन्हें स्वर्ग ले जाएगा, वे जिनके "पास परमेश्वर के प्रति अत्याधिक वफादारी है, परमेश्वर का अनुसरण करते हैं, और परमेश्वर के वचन में बने रहते हैं।" यद्यपि उनके पास परमेश्वर के द्वारा बोले गए वचनों के प्रति "अत्याधिक वफादारी" है, फिर भी उनके वचन एवं कार्य अत्यंत घिनौने लगते हैं क्योंकि वे पवित्र आत्मा के कार्य का विरोध करते हैं, और छल एवं दुष्टता करते हैं। ऐसे लोग जो बिल्कुल अंत तक अनुसरण नहीं करते हैं, जो पवित्र आत्मा के कार्य के साथ कदम नहीं मिलाते हैं, और जो केवल पुराने कार्य से चिपके रहते हैं और वे न केवल परमेश्वर के प्रति वफादारी हासिल करने में असफल नहीं हुए हैं, बल्कि इसके विपरीत, वे ऐसे लोग बन गए हैं जो परमेश्वर का विरोध करते हैं, वे ऐसे लोग बन गए हैं जिन्हें नए युग के द्वारा ठुकरा दिया गया है, और जिन्हें दण्ड दिया जाएगा। क्या उनसे भी अधिक बेचारा और कोई है? अनेक लोग यह भी विश्वास करते हैं कि वे सब जो प्राचीन व्यवस्था को ठुकराते हैं और नए कार्य को स्वीकार करते हैं वे विवेकहीन हैं। ये लोग, जो केवल विवेक की ही बात करते हैं, और पवित्र आत्मा के कार्य को नहीं जानते हैं, अन्ततः उनके स्वयं के विवेक द्वारा उनके भविष्य की संभावनाओं को छोटा कर दिया जाएगा। परमेश्वर का कार्य सिद्धान्त के द्वारा बना नहीं रहता है, और यद्यपि यह उसका स्वयं का कार्य है, फिर भी परमेश्वर इससे अभी भी चिपका नहीं रहता है। जिसे नकारा जाना चाहिए उसे नकारा गया है, जिसे हटाया जाना चाहिए उसे हटाया गया है। फिर भी मनुष्य परमेश्वर के प्रबंधन के कार्य के सिर्फ एक छोटे से भाग को ही पकड़े रहने के द्वारा स्वयं को परमेश्वर से शत्रुता की स्थिति में रख देता है। क्या यह मनुष्य की मूर्खता नहीं है? क्या यह मनुष्य की अज्ञानता नहीं है? लोग जितना अधिक भयभीत एवं अति सतर्क होते हैं क्योंकि वे परमेश्वर की आशीषों को प्राप्त न करने के विषय में डरते हैं, उतना ही अधिक वे और बड़ी आशीषों को हासिल करने, और अंतिम आशीष को पाने में असमर्थ होते हैं। ऐसे लोग जो दासत्व से व्यवस्था में बने रहते हैं वे सभी व्यवस्था के प्रति अत्यंत वफादारी का प्रदर्शन करते हैं, और वे जितना अधिक व्यवस्था के प्रति ऐसी वफादारी का प्रदर्शन करते हैं, उतना ही अधिक वे ऐसे विद्रोही होते हैं जो परमेश्वर का विरोध करते हैं। क्योंकि अब राज्य का युग है और व्यवस्था का युग नहीं है, और आज के कार्य को अतीत के कार्य के विरूद्ध रोका नहीं जा सकता है, और अतीत के कार्य की तुलना आज के कार्य से नहीं की जा सकती है। परमेश्वर का कार्य बदल चुका है, और मनुष्य का रीति व्यवहार भी बदल चुका है, उसे व्यवस्था को पकड़े रहना या क्रूस को उठाना नहीं है। अतः, व्यवस्था एवं क्रूस के प्रति लोगों की वफादारी परमेश्वर की स्वीकृति को प्राप्त नहीं करेगी। "परमेश्वर का कार्य एवं मनुष्य का रीति व्यवहार" से

यदि तुम लोग परमेश्वर को मापने और निरूपित करने के लिए धारणाओं का उपयोग करते हो, मानो कि परमेश्वर मिट्टी की कोई अपरिवर्ती मूर्ति हो, और तुम लोग परमेश्वर को बाइबल के भीतर सीमांकित करते हो, और उसे कार्यों के एक सीमित दायरे में समाविष्ट करते हो, तो इससे यह प्रमाणित होता है कि तुम लोगों ने परमेश्वर को निन्दित किया है। क्योंकि पुराने विधान के युग के यहूदियों ने, अपने हृदयों में, परमेश्वर को प्रतिमा के साँचे में ढाला था, मानो कि परमेश्वर को मात्र मसीह ही कहा जा सकता था, और मात्र वही जिसे मसीह कहा जाता था परमेश्वर था, और क्योंकि वे परमेश्वर की सेवा और आराधना इस तरह से करते थे मानो कि वह मिट्टी की एक मूर्ति (निर्जीव) हो, इसलिए उन्होंने उस समय के यीशु को मौत की सजा देते हुए—निर्दोष यीशु को मृत्यु तक निन्दित करते हुए—सलीब पर चढ़ा दिया। परमेश्वर ने कोई अपराध नहीं किया था, फिर भी मनुष्य ने उसे नहीं छोड़ा, और दृढ़तापूर्वक उसे मृत्युदण्ड दे दिया। अतः यीशु को सलीब पर चढ़ाया दिया गया। मनुष्य सदैव विश्वास करता है कि परमेश्वर अपरिवर्ती है, और उसे बाइबल के अनुसार परिभाषित करता है, मानो कि उसने परमेश्वर के प्रबंधन की वास्तविक प्रकृति का पता लगा लिया हो, मानो कि परमेश्वर जो कुछ भी करता है सब मनुष्य के हाथों में हैं। लोग अत्यंत हास्यास्पद हैं, वे परम अहंकार से सम्पन्न हैं, और उन सबके पास आडंबरी वाक्पटुता की विशिष्ट योग्यता है। इस बात की परवाह किए बिना कि परमेश्वर के बारे में तुम्हारा ज्ञान कितना महान है, तब भी मैं कहता हूँ कि तुम परमेश्वर को नहीं जानते हो, कि ऐसे कोई नहीं हैं जो परमेश्वर के अधिक विरोध में हों, और कि तुम परमेश्वर की निंदा करते हो, क्योंकि तुम परमेश्वर के कार्य का अनुसरण करने में और परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाए जाने के मार्ग में चलने में सर्वथा अक्षम हो। क्यों परमेश्वर मनुष्य के कार्यकलापों से कभी भी संतुष्ट नहीं होता है? क्योंकि मनुष्य परमेश्वर को नहीं जानता है, क्योंकि उसकी अनेक धारणाएँ है, और क्योंकि, वास्तविकता का अनुपालन करने के बजाय, परमेश्वर का उसका समस्त ज्ञान उसी प्रकृति का है, कठोर और अनमनीय है। इस प्रकार, आज पृथ्वी पर आने पर, परमेश्वर को एक बार फिर मनुष्य द्वारा सलीब पर चढ़ा दिया गया है। "दुष्ट को दण्ड अवश्य दिया जाना चाहिए" से

फरीसियों ने यीशु का विरोध क्यों किया, क्या तुम लोग उसका कारण जानना चाहते हो? क्या तुम फरीसियों के सार को जानना चाहते हो? वे मसीहा के बारे में कल्पनाओं से भरे हुए थे। इससे ज्यादा और क्या, उन्होंने केवल इस बात पर विश्वास किया कि मसीहा आएगा, मगर जीवन के इस सत्य की खोज नहीं की। और इसलिए, वे आज भी मसीहा की प्रतीक्षा करते हैं, क्यों उन्हें जीवन के मार्ग के बारे में कुछ भी ज्ञान नहीं है, और नहीं जानते कि सत्य का मार्ग क्या है? तुम लोग कैसे कहते हो कि ऐसे मूर्ख, हठधर्मी और अज्ञानी लोग परमेश्वर के आशीष प्राप्त करेंगे? वे मसीहा को कैसे देख सकते हैं? वे यीशु का विरोध करते थे क्योंकि वे पवित्र आत्मा के कार्य की दिशा को नहीं जानते थे, क्योंकि वे यीशु के द्धारा कहे गए सत्य के मार्ग को नहीं जानते थे, और, ऊपर से, क्योंकि उन्होंने मसीहा को नहीं समझा था। और क्योंकि उन्होंने मसीहा को कभी नहीं देखा था, और कभी भी मसीहा के साथ नहीं रहे थे, उन्होंने सिर्फ़ मसीहा के नाम को खोखली श्रद्धांजलि देने की गलती की जबकि किसी न किसी ढंग से मसीहा के सार का विरोध करते रहे। ये फरीसी सार रूप से हठधर्मी एवं अभिमानी थे और सत्य का पालन नहीं करते थे। परमेश्वर में उनके विश्वास का सिद्धांत है: इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि तुम्हारा उपदेश कितना गहरा है, इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि तुम्हारा अधिकार कितना ऊँचा है, तुम मसीह नहीं हो जब तक तुम्हें मसीहा नहीं कहा जाता। क्या ये दृष्टिकोण हास्यास्पद और मूर्खतापूर्ण नहीं हैं? मैं तुम लोगों से पुनः पूछता हूँ: मान लीजिए कि तुम लोगों में यीशु के बारे में थोड़ी सी भी समझ नहीं है, तो क्या तुम लोगों के लिए उन गलतियों को करना अत्यंत आसान नहीं है जो बिल्कुल आरंभ के फरीसियों ने की थी? क्या तुम सत्य के मार्ग को जानने के योग्य हो? क्या तुम सचमुच में यह विश्वास दिला सकते हो कि तुम ईसा का विरोध नहीं करोगे? क्या तुम पवित्र आत्मा के कार्य का अनुसरण करने के योग्य हो? यदि तुम नहीं जानते हो कि क्या तुम ईसा का विरोध करोगे, तो मेरा कहना है कि तुम पहले से ही मौत के कगार पर जी रहे हो। जो लोग मसीहा को नहीं जानते थे वे सभी यीशु का विरोध करने में, यीशु को अस्वीकार करने में, उन्हें बदनाम करने में सक्षम थे। जो लोग यीशु को नहीं समझते हैं वे सब उसे अस्वीकार करने एवं उन्हें बुरा भला कहने में सक्षम हैं। इसके अलावा, वे यीशु के लौटने को शैतान के द्वारा दिए जाने वाले धोखे के समान देखने में सक्षम हैं और अधिकांश लोग देह में लौटने की यीशु की निंदा करेंगे। क्या इस सबसे तुम लोगों को डर नहीं लगता है? जिसका तुम लोग सामना करते हो वह पवित्र आत्मा के विरोध में ईशनिंदा होगी, कलीसियाओं के लिए पवित्र आत्मा के वचनों का विनाश होगा और यीशु के द्वारा व्यक्त किए गए समस्त को ठुकराना होगा। यदि तुम लोग इतने संभ्रमित हो तो यीशु से क्या प्राप्त कर सकते हो? यदि तुम लोग हठधर्मिता से अपनी गलतियों को मानने से इनकार करते हो, तो श्वेत बादल पर यीशु के देह में लौटने पर तुम लोग यीशु के कार्य को कैसे समझ सकते हो? यह मैं तुम लोगों को बताता हूँ: जो लोग सत्य को स्वीकार नहीं करते हैं, मगर अंधों की तरह यीशु के श्वेत बादलों पर आगमन का इंतज़ार करते हैं, निश्चित रूप से पवित्र आत्मा के विरोध में ईशनिंदा करेंगे, और ये वे प्रजातियाँ हैं जो नष्ट कर दी जाएँगीं। तुम लोग सिर्फ़ यीशु के अनुग्रह की कामना करते हो, और सिर्फ़ स्वर्ग के सुखद राज्य का आनंद लेना चाहता हो, मगर जब यीशु देह में लौटा, तो तुमने यीशु के द्वारा कहे गए वचनों का कभी भी पालन नहीं किया, और यीशु के द्वारा व्यक्त किये गए सत्य को कभी भी ग्रहण नहीं किया है। यीशु के एक श्वेत बादल पर वापस आने के तथ्य के बदले में तुम लोग क्या थामें रखना चाहोगे? क्या वही ईमानदारी जिसमें तुम लोग बार-बार पाप करते रहते हो, और फिर बार-बार उनकी स्वीकारोक्ति करते हो? एक श्वेत बादल पर वापस आने वाले यीशु के लिए तुम बलिदान में क्या अर्पण करोगे? क्या कार्य के वे वर्ष जिनकी तुम लोग स्वयं सराहना करते हो? लौट कर आये यीशु को तुम लोगों पर विश्वास कराने के लिए तुम लोग किस चीज को थाम कर रखोगे? क्या वह आपका अभिमानी स्वभाव है,जो किसी भी सत्य का पालन नहीं करता है?

...यीशु का लौटना उन लोगों के लिए एक महान उद्धार है जो सत्य को स्वीकार करने में सक्षम हैं, परन्तु उनके लिए जो सत्य को स्वीकार करने में असमर्थ हैं यह निंदा का एक संकेत है। तुम लोगों को अपना स्वयं का रास्ता चुनना चाहिए, और पवित्र आत्मा के विरोध में ईशनिंदा नहीं करनी चाहिए और सत्य को अस्वीकार नहीं करना चाहिए। तुम लोगों को अज्ञानी और अभिमानी व्यक्ति नहीं बनना चाहिए, बल्कि ऐसा बनना चाहिए जो पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन का पालन करता हो और सत्य की खोज करने के लिए लालायित हो; सिर्फ़ इसी तरीके से तुम लोग लाभान्वित होगे। मैं तुम लोगों को परमेश्वर में विश्वास के रास्ते पर सावधानी से चलने की सलाह देता हूँ। निष्कर्ष तक न पहुँचें; इससे ज्यादा और क्या, परमेश्वर में अपने विश्वास में लापरवाह और निश्चिन्त न बनें। तुम लोगों को जानना चाहिए, कि कम से कम, जो परमेश्वर में विश्वास करते हैं उन्हें विनम्र और श्रद्धावान होना चाहिए। जिन्होंने सत्य को सुन लिया है और फिर भी इस पर अपनी नाक भौं सिकोड़ते हैं वे मूर्ख और अज्ञानी हैं। जिन्होंने सत्य को सुन लिया है और फिर भी लापरवाही के साथ निष्कर्षों तक पहुँचते हैं या सकी निंदा करते हैं ऐसे लोग अभिमान से घिरे हुए हैं। जो कोई भी यीशु पर विश्वास करता है वह दूसरों को श्राप देने या दूसरों की निंदा करने के योग्य नहीं है। तुम सब लोगों को एक ऐसा होना चाहिए जो तर्कसंगत हो और सत्य को स्वीकार करता हो। शायद, सत्य के मार्ग को सुन कर और जीवन के वचन को पढ़ कर, तुम विश्वास करते हो कि इन 10,000 वचनों में से सिर्फ़ एक ही वचन है जो तुम्हारे दृढ़ विश्वास के अनुसार और बाइबल के समान है, और फिर तुम्हें उसमें इन वचनों में से 10,000वें वचन की खोज करते रहना चाहिए। मैं अब भी तुम्हें सुझाव देता हूँ कि विनम्र बनो, अति-आत्मविश्वासी न बनो, और अपने आप को बहुत ऊँचा न उठाओ। परमेश्वर के लिए अपने हृदय में इतना थोड़ा सा आदर रखकर, तुम बड़े प्रकाश को प्राप्त करोगे। यदि तुम इन वचनों की सावधानी से जाँच करो और इन पर बार-बार मनन करो, तब तुम समझोगे कि वे सत्य हैं या नहीं, वे जीवन हैं या नहीं। शायद, केवल कुछ वाक्यों को पढ़ कर, कुछ लोग इन वचनों की बिना देखे ही यह कहते हुए निंदा करेंगे, "यह पवित्र आत्मा की कुछ प्रबुद्धता से अधिक कुछ नहीं है," अथवा "यह एक झूठा मसीह है जो लोगों को धोखा देने के लिए आया है।" जो लोग ऐसी बातें कहते हैं वे अज्ञानता से अंधे हो गए हैं! तुम परमेश्वर के कार्य और बुद्धि को बहुत कम समझते हो और मैं तुम्हें पुनः आरंभ से शुरू करने की सलाह देता हूँ! अंत के दिनों में झूठे मसीहों के प्रकट होने की वजह से परमेश्वर द्वारा व्यक्त किये गए वचनों की तुम लोगों को निंदा अवश्य नहीं करनी चाहिए, और क्योंकि तुम लोग धोखे से डरते हो इसलिए तुम लोगों को ऐसा अवश्य नहीं बनना चाहिए जो पवित्र आत्मा के विरोध में ईशनिंदा करे। क्या यह एक बड़ी दया नहीं होगी? यदि, बहुत जाँच के बाद, अब भी तुम्हें लगता है कि ये वचन सत्य नहीं हैं, मार्ग नहीं हैं, और परमेश्वर की अभिव्यक्ति नहीं हैं, तो फिर अंततः तुम दण्डित किए जाओगे, और आशीषों के बिना होगे। यदि तुम ऐसे सत्य को जो साफ़-साफ़ और स्पष्ट रूप से कहा गया है स्वीकार नहीं कर सकते हो, तो क्या तुम परमेश्वर के उद्धार के अयोग्य नहीं हो? क्या तुम कोई ऐसे नहीं हो जो परमेश्वर के सिंहासन के सामने लौटने के लिए पर्याप्त सौभाग्यशाली नहीं है? इस बारे में विचार करें! उतावले और अविवेकी न बनें, और परमेश्वर में विश्वास को एक खेल की तरह न समझें। अपनी मंजिल के लिए, अपनी संभावनाओं के लिए, अपने जीवन के लिए विचार करें, और अपने स्वंय के साथ ऊपरी तौर से दिलचस्पी न लें। क्या तुम इन वचनों को स्वीकार कर सकते हो? "जब तुम यीशु के आध्यात्मिक शरीर को देख रहे होगे ऐसा तब होगा जब परमेश्वर स्वर्ग और पृथ्वी को नये सिरे से बना चुका होगा" से

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शास्त्रों में यह स्‍पष्‍ट रूप से लिखा है "यीशु मसीह कल और आज और युगानुयुग एक–सा है" (इब्रानियों 13:8)। तो, प्रभु का नाम नहीं बदल सकता! वे कहते हैं कि यीशु का नाम अंत के दिनों में बदल जाता है बाइबल में यह इतने साफ़ तौर पर लिखा है। आप इसकी व्याख्या कैसे कर सकते हैं?

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