2. यदि कोई व्यक्ति अपने विश्वास में केवल बाइबल के पत्रों और नियमों को पकड़े रहता है और मसीह के साथ संगत होने के तरीके की तलाश नहीं करता है, तो क्या वह शाश्वत जीवन प्राप्त कर सकता है?

सुसमाचार के प्रश्नोत्तर

बाइबल परमेश्वर के कार्य की गवाही है, यह मानवजाति के लिए लाभदायक रही है। बाइबल के माध्यम से, हम समझ जाते हैं कि परमेश्‍वर सभी चीजों के सृष्टिकर्ता हैं, हम परमेश्‍वर के अद्भुत, महान कार्यों और उनकी सर्वक्षमता को देख पाते हैं। यदि बाइबल परमेश्वर के वचन और परमेश्वर को गवाही का अभिलेख है, तो बाइबल में शाश्‍वत जीवन का तरीका क्यों नहीं है? बाइबल में परमेश्वर के वचन हैं, तो शाश्वत जीवन का मार्ग बाइबिल में क्‍यों नहीं पाया जाता है?

उत्तर

परमेश्‍वर सभी चीजों के सृष्टिकर्ता हैं। ये बाइबल में कहा गया हैं हमने उसके अद्भुत कर्मों को पहचानना शुरू कर दिया। बाइबल परमेश्वर के कार्य के प्रथम दो चरणों की गवाही है। यह परमेश्‍वर के वचनों और कार्य का अभिलेख है। व्यवस्था के युग और अनुग्रह के युग के दौरान मनुष्य की गवाही है। इसलिए, हमारे विश्वास के लिए बाइबल बहुत महत्वपूर्ण है यदि बाइबल नहीं होती, तो मनुष्य कैसे परमेश्‍वर और परमेश्‍वर के वचनों को समझ पाता? और किस तरह से मनुष्‍य परमेश्‍वर के कर्मों की गवाही दे पाता। सच्‍चा विश्‍वास करना शुरू कर पाता? अगर मनुष्य बाइबल ना पढ़े, तो वह हर युग में परमेश्‍वर की आज्ञापालन करने वाले संतों की गवाही का गवाह कैसे बनेगा? इसलिए, बाइबल को पढ़ना आवश्यक है, और विश्वासी को कभी भी बाइबल से नहीं भटकना चाहिए। बाइबल से भटक कर प्रभु में विश्वास नहीं किया जा सकता। यह सभी युगों के संतों के अनुभवों में सत्यापित होता है। कोई भी अपनी आस्‍था में बाइबल को पढ़ने और अर्थ से इंकार करने की हिम्मत नहीं करता है। इसलिए, सभी युगों में संतों और विश्वासियों ने बाइबल की पढ़ाई को एक महत्‍वपूर्ण विषय के रूप में देखा है। उसका अध्‍ययन किया है बाइबल पढ़ना और प्रार्थना उतने ही जरूरी हैं जितने चलने के लिए हमारे दोनों पैर लेकिन प्रभु यीशु ने कहा है, "धर्मग्रन्थ खोजें; क्योंकि तुम सोचते हो कि उनमें शाश्वत जीवन है: और वे वे हैं जो मेरे बारे में गवाही देते हैं। और तुम मेरे पास नहीं आओगे, कि तुम जीवन पा सको" (यूहन्ना 5:39-40)। ख़ेैैैर, कुछ लोग भ्रमित हेैैं, सच्चाई उनकी समझ में नहीं आएगी। उन्‍हें लगता है कि बाइबल पढ़ने से शाश्‍वत जीवन मिलना चाहिए क्‍योंकि बाइबल परमेश्‍वर के वचन और इंंसानों की गवाही का एक अभिलेख है, तो ऐसा क्यों है कि प्रभु यीशु ने कहा कि बाइबल में कोई शाश्‍वत जीवन नहीं है? दरअसल, यह ऐसा मुश्किल विचार नहीं है। जब तक हम व्यवस्था के युग और अनुग्रह के युग के दौरान परमेश्‍वर के वचनों और कार्य को और साथ ही उनके माध्यम से प्राप्त प्रभाव को समझते हैं, तब हम महसूस करेंगे कि क्‍यों कोई बाइबल को पढ़कर शाश्‍वत जीवन प्राप्त नहीं कर सकता है। सबसे पहले, हम व्यवस्था के युग पर विचार करें। इस युग के दौरान, यहोवा मनुष्य के लिये व्यवस्थाओं, आज्ञाओं और अध्‍यादेशों के बारे में चिंतित थे। उनके वचन मानवता के लिए मार्गदर्शक थे, जो अभी भी आरंभिक अवस्था में इन में मनुष्य के स्वभाव को बदलना शामिल नहीं था। इसलिए व्‍यवस्‍था के युग के दौरान परमेश्‍वर के सभी वचनों का उद्देश्य लोगों से कानूनों और आज्ञाओं का पालन करवाना था। हालांकि वो वचन सत्‍य थे, पर वो बहुत अल्प विकसित सच के प्रतिनिधि थे। अनुग्रह के युग के दौरान, प्रभु यीशु के वचन और कार्य छुटकारे के कार्य पर केंद्रित थे। जो वचन उन्होंने दिये वे छुटकारे के सत्‍य के बारे में थे उन्‍होंने लोगों को सिखाया कि अपने पापों को स्वीकार करेें। पश्चाताप करें। दुष्टता से दूर रहेें प्रभु की प्रार्थना करने का सही तरीका भी सिखाया कहा, कि मनुष्य सच्‍चे दिल से प्रभु से प्रेम करें। पड़ोसी को अपना मानकर प्रेम करें। सहिष्णु और धैर्यवान बनना चाहिए। दूसरों को सात बार के सत्‍तर गुणेे तक माफ कर देना चाहिए। और मनुष्य को पूरी तरह परमेश्वर की इच्छा का सम्मान करना चाहिये। ये सभी पश्चाताप के तरीकों में शामिल हैं। इसलिए, बाइबल पढ़कर हम केवल व्‍यवस्‍था के युग और अनुग्रह के युग के दौरान परमेश्‍वर के कार्य को समझ सकते हैं। हमें पता चलता है कि सभी चीजें परमेश्‍वर ने बनाई हैं हम सीखते हैं कि पृथ्वी पर कैसे रहें। परमेश्‍वर की आराधना कैसे करें। पाप क्या है,कौन परमेश्‍वर द्वारा धन्य किए गए हैं और किन्हें श्राप दिया गया है कैसे अपने पापों को स्‍वीकार करें और पश्चाताप करें। हम मानवता, सहनशीलता और क्षमा करना सीख जाते हैं, हमें प्रभु का अनुसरण करने के लिये क्रॉस उठाना चाहिए। हम प्रभु यीशु की असीमित दया और करुणा स्‍वयं देखते हैं, और समझते हैं कि केवल प्रभु यीशु के सामने विश्वास में आने से ही हम उनके प्रचुर अनुग्रह और सत्‍य का आनंद ले पाएँगे। व्यवस्था के युग और अनुग्रह के युग के दौरान बाइबल में लिखित परमेश्‍वर के वचन और कार्य उस समय मानवजाति को बचाने और उसकी जरूरतों के अनुसार परमेश्वर के द्वारा व्‍यक्‍त किये गये सत्‍य थे। ये सत्‍य मनुष्‍य को केवल कुछ सतही अच्छे व्यवहार देते थे पर पाप की जडों को नहीं मिटाते थे वो मनुष्य के जीवन स्वभाव को बदलने, और मनुष्य को शुद्धिकरण, उद्धार, और परिपूर्णता देने में असमर्थ थे। इस तरह अनुग्रह के युग के दौरान प्रभु यीशु के दिए वचन केवल पश्चाताप का मार्ग कहे जा सकते हैं, लेकिन शाश्‍वत जीवन का मार्ग नहीं। तो शाश्‍वत जीवन का मार्ग क्या है? शाश्‍वत जीवन का मार्ग सत्य का मार्ग है जो मनुष्य को हमेशा जिंदा रहने देता है, यह वह तरीका है जो मनुष्य को पापमयी प्रकृति के बंधनों को त्‍यागने जीवन स्वभाव को बदलने की अनुमति देता है, सत्य को प्राप्त करने की, पूरी तरह शैतान के प्रभाव से मुक्त होने और मसीह के अनुकूल होने की अनुमति यह मनुष्य को जानने, आज्ञापालन करने और परमेश्‍वर का आदर करने की अनुमति देता है ताकि वो दुबारा परमेश्‍वर का विरोध या उनसे धोखा ना करे। जो मार्ग ऐसा करता है - उसे ही शाश्‍वत जीवन का मार्ग कहा जा सकता है। मनुष्य, पाप के परिणामस्वरूप मरता है। अगर इंसान सत्य को जीवन के रूप में पाकर अपने पापों का समाधान कर लेता है" तो परमेश्‍वर उसे सचमुच शाश्‍वत जीवन का आशीर्वाद देंगे। तो, केवल अंतिम दिनों में परमेश्‍वर का उद्धार प्राप्त करके हम शाश्‍वत जीवन का आनंद ले सकते हैं जो परमेश्‍वर मानवजाति को देते हैं। "मेरा प्रभु कौन है" फ़िल्म की स्क्रिप्ट से लिया गया अंश

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3. परिणाम क्या होंगे यदि कोई अपने विश्वास में केवल यहोवा के नाम और प्रभु यीशु के नाम को पकड़े रहता है, और लौटे हुए परमेश्वर के नए नाम को स्वीकार नहीं करता है?

कई हज़ार वर्षों तक, जो लोग परमेश्वर में विश्वास करते थे, उनका मानना था कि परमेश्वर का नाम अपरिवर्तनशील है, और परमेश्वर के नाम को पकड़े रहने को परमेश्वर में विश्वास होना समझते थे। तो फिर ऐसा क्यों है कि यहूदी धर्म में विश्वास करने वाले केवल यहोवा के नाम को पकड़े रहते हैं और प्रभु यीशु के नाम को स्वीकार नहीं करते हैं, और फिर भी निकाल दिए जाते हैं? बाइबल ने भविष्यवाणी की थी कि अंत के दिनों में परमेश्वर का नया नाम होगा: "और मैं अपने परमेश्‍वर का नाम और अपने परमेश्‍वर के नगर अर्थात् नये यरूशलेम का नाम, जो मेरे परमेश्‍वर के पास से स्वर्ग पर से उतरनेवाला है, और अपना नया नाम उस पर लिखूँगा" (प्रकाशितवाक्य 3:12)। यदि हम केवल प्रभु यीशु के नाम को पकड़े रहते हैं और लौटे हुए परमेश्वर के नए नाम को स्वीकार नहीं करते हैं, तो इस तरह से परमेश्वर में विश्वास करने के क्या परिणाम होंगे?

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