3. परिणाम क्या होंगे यदि कोई अपने विश्वास में केवल यहोवा के नाम और प्रभु यीशु के नाम को पकड़े रहता है, और लौटे हुए परमेश्वर के नए नाम को स्वीकार नहीं करता है?

सुसमाचार के प्रश्नोत्तर

शास्त्रों में यह स्‍पष्‍ट रूप से लिखा है "यीशु मसीह कल और आज और युगानुयुग एक–सा है" (इब्रानियों 13:8)। तो, प्रभु का नाम नहीं बदल सकता! वे कहते हैं कि यीशु का नाम अंत के दिनों में बदल जाता है बाइबल में यह इतने साफ़ तौर पर लिखा है। आप इसकी व्याख्या कैसे कर सकते हैं?

उत्तर

भाइयो और बहनो, बाइबल में कहा गया है, "यीशु मसीह कल और आज और युगानुयुग एक–सा है" (इब्रानियों 13:8)। इससे इस सच्‍चाई का पता चलता है कि ईश्‍वर का स्‍वभाव और उसका मूल सार शाश्‍वत है और यह बदलता नहीं है । इसका मतलब यह नहीं होता कि उसका नाम ही नहीं बदलेगा। चलिए, सर्व शक्तिमान परमेश्वर के वचनों पर नजर डालते हैं।

सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं: "ऐसे लोग हैं जो कहते हैं कि परमेश्वर अपरिवर्तशील है। यह सही है, किन्तु यह परमेश्वर के स्वभाव और सार की अपरिवर्तनशीलता का संकेत करता है। उसके नाम और कार्य में परिवर्तन से यह साबित नहीं होता है कि उसका सार बदल गया है; दूसरे शब्दों में, परमेश्वर हमेशा परमेश्वर रहेगा, और यह कभी नहीं बदलेगा। यदि तुम कहते हो कि परमेश्वर का कार्य हमेशा वैसा ही बना रहता है, तो क्या वह अपनी छः-हजार वर्षीय प्रबंधन योजना को पूरा करने में सक्षम होगा? तुम केवल यह जानते हो कि परमेश्वर हमेशा ही अपरिवर्तनीय है, किन्तु क्या तुम जानते हो कि परमेश्वर हमेशा नया रहता है और कभी पुराना नहीं पड़ता है? यदि परमेश्वर का कार्य कभी नहीं बदला था, तो क्या वह मानवजाति को आज के दिन तक ला सकता था? यदि परमेश्वर अपरिवर्तशील है, तो ऐसा क्यों है कि उसने पहले ही दो युगों का कार्य कर लिया है? ...और "परमेश्वर अपरिवर्तशील है" वचन उस संदर्भ में हैं जो परमेश्वर का अंतर्निहित स्वरूप है। इसके बावज़ूद, तुम एक बिंदु में छह-हज़ार-वर्ष के कार्य को परिभाषित नहीं कर सकते हो, या इसे केवल अपरिवर्ती वचनों से चित्रित नहीं कर सकते हो। मनुष्य की मूर्खता ऐसी ही है। परमेश्वर इतना सरल नहीं है जितना मनुष्य कल्पना करता है, और उसका कार्य एक युग में नहीं रुक सकता है। उदाहरण के लिए, यहोवा हमेशा परमेश्वर के नाम का नहीं हो सकता है; परमेश्वर यीशु के नाम के तहत भी अपना कार्य कर सकता है, जो कि इस बात का प्रतीक है कि कैसे परमेश्वर का कार्य हमेशा आगे की ओर आगे बढ़ रहा है।

परमेश्वर हमेशा परमेश्वर रहेगा, और कभी भी शैतान नहीं बनेगा;शैतान हमेशा शैतान रहेगा,और कभी भी परमेश्वर नहीं बनेगा। परमेश्वर की बुद्धि, परमेश्वर की चमत्कारिकता, परमेश्वर की धार्मिकता, और परमेश्वर का प्रताप कभी नहीं बदलेंगे। उसका सार और उसका स्वरूप कभी नहीं बदलेगा। उसका कार्य, हालाँकि, हमेशा आगे प्रगति कर रहा है और हमेशा गहरा होता जा रहा है, क्योंकि वह हमेशा नया रहता है और कभी पुराना नहीं पड़ता है। हर युग में परमेश्वर एक नया नाम अपनाता है, हर युग में वह नया कार्य करता है, और हर युग में वह अपने प्राणियों को अपनी नई इच्छा और नए स्वभाव को देखने की अनुमति देता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)" )।

सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के वचनों में हमने देखा है कि, परमेश्‍वर स्‍वयं में नहीं बदलते। इसका मतलब परमेश्‍वर के स्‍वभाव और उसके मूल सार से है, न कि उसके नाम से। मानवता की रक्षा के कार्य को करते हुए हर युग में परमेश्‍वर ने तमाम तरह के कार्य किए हैं, और अलग अलग नाम अंगीकृत किये हैं। उसका मूल सार नहीं बदल सकता. परमेश्‍वर सदा परमेश्‍वर ही रहेगा। तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसका नाम यहोवा है या फिर यीशु, उसका मूल सार कभी नहीं बदल सकता. ईश्‍वर सदा एक सा ही रहता है। तथापि, उस समय यहूदियों और फरीसियों को यह बात पता नहीं थी कि हर बदलते युग के साथ, उनका कार्य और उनका नाम भी बदलता है। उनके अनुसार उनका रक्षक, उनका परमेश्‍वर एकमात्र यहोवा ही था, क्योंकि, पिछले कई युगों से वो यही मानते आ रहें हैं कि, मात्र यहोवा ही एकमात्र परमेश्‍वर है और उसके अलावा कोई भी उनका रक्षक नहीं है। इसके परिणामस्‍वरूप, परमेश्‍वर ने जब अपना नाम बदला और वह 'यीशु' के नाम से छुटकारे का कार्य करने आए तो उन्होंने पागलों की तरह प्रभु यीशु की निंदा की, उनके कार्यों में बाधा डाली और अंत में उन्हें सूली पर चढ़ा दिया, इस तरह एक जघन्‍य अपराध किया, और परमेश्वरने उन सब को दण्डित किया। इसी तरह से, हम आज अंत के दिनों में हैं, यदि हमने परमेश्‍वर के मूल सार को और यह मानने को नकारा कि यह सब एक ही ईश्‍वर का कार्य है सिर्फ़ इस लिए क्योंकि उन्होंने अपना कार्य और नाम बदल लिया है, तो यह हमारी नासमझी और लापरवाही होगी। हर युग में परमेश्‍वरने जो भी नाम अंगीकृत किया हो, उसकी बड़ी महिमा रही है और उन्होंने मानवता का सदैव कल्‍याण किया है।

परमेश्‍वर हमेशा नये होते हैं, कभी भी पुराने नहीं। वे परमेश्‍वर हैं जो सबको खुद में समाये हुए हैं। परमेश्‍वर के अलग-अलग नाम संभवत: उनकी संपूर्णता को रूपायित करते हैं। इसलिए जैसे-जैसे युग आगे बढ़ते हैं, उनके नाम भी बदलते रहते हैं। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं: "यीशु का नाम छुटकारे के कार्यहेतु लिया गया था, तो क्या जब वह अंत के दिनों में लौटेगा तो तब भी उसे उसी नाम से बुलाया जाएगा?क्या वह अभी भी छुटकारे का कार्य करेगा? ऐसा क्यों है कि यहोवा और यीशु एक ही हैं, फिर भी उन्हें भिन्न-भिन्न युगों में भिन्न-भिन्न नामों से बुलाया जाता है? क्या यह इसलिए नहीं कि उनके कार्य के युग भिन्न-भिन्न हैं? क्या केवल एक ही नाम परमेश्वर का उसकी संपूर्णता में प्रतिनिधित्व कर सकता है? इस तरह, भिन्न युग में परमेश्वर को भिन्न नाम के द्वारा अवश्य बुलाया जाना चाहिए, उसे युग को परिवर्तित करने और युग का प्रतिनिधित्व करने के लिए नाम का उपयोग अवश्य करना चाहिए, क्योंकि कोई भी एक नाम पूरी तरह से परमेश्वर स्वयं का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता है और प्रत्येक नाम केवल एक निश्चित युग के दौरान परमेश्वर के स्वभाव के अस्थायी पहलू का ही प्रतिनिधित्व कर सकता है; और प्रत्येक नाम को केवल उसके कार्य का प्रतिनिधित्व ही करना है। इसलिए, समस्त युग का प्रतिनिधित्व करने के लिए परमेश्वर अपने स्वभाव के लिए हितकारी किसी भी नाम को चुन सकता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)" )। "क्या यीशु का नाम, "परमेश्वर हमारे साथ," परमेश्वर के स्वभाव को उसकी समग्रता से व्यक्त कर सकता है? क्या यह पूरी तरह से परमेश्वर को स्पष्ट कर सकता है? यदि मनुष्य कहता है कि परमेश्वर को केवल यीशु कहा जा सकता है, और उसका कोई अन्य नाम नहीं हो सकता है क्योंकि परमेश्वर अपना स्वभाव नहीं बदल सकता है, तो ऐसे वचन ईशनिन्दा हैं! क्या तुम मानते हो कि यीशु नाम, परमेश्वर हमारे साथ, परमेश्वर का समग्रता से प्रतिनिधित्व कर सकता है? परमेश्वर को कई नामों से बुलाया जा सकता है, किन्तु इन कई नामों के बीच, एक भी ऐसा नहीं है जो परमेश्वर के स्वरूप को सारगर्भित रूप से व्यक्त कर सकता हो, एक भी ऐसा नहीं जो परमेश्वर का पूरी तरह से प्रतिनिधित्व कर सकता हो। और इसलिए परमेश्वर के कई नाम हैं, किन्तु ये बहुत से नाम परमेश्वर के स्वभाव को पूरी तरह से स्पष्ट नहीं कर सकते हैं, क्योंकि परमेश्वर का स्वभाव अत्यधिक समृद्ध है, और मनुष्य के ज्ञान से परे विस्तारित है। मनुष्य की भाषा परमेश्वर की समस्त विशेषताओं को पूरी तरह से सारगर्भित रूप से व्यक्त करने में असमर्थ है। ...एक विशेष शब्द या नाम परमेश्वर का उसकी समग्रता में प्रतिनिधित्व करने में असमर्थ है। तो क्या परमेश्वर एक निश्चित नाम धारण कर सकताहै? परमेश्वर इतना महान और पवित्र है, तो तुम उसे प्रत्येक नए युग में अपना नाम बदलने की अनुमति क्यों नहीं देते हो? वैसे तो, प्रत्येक युग में जिसमें परमेश्वर स्वयं अपना कार्य करता है, वह एक नाम का उपयोग करता है, जो उसके द्वारा किए गए कार्य की समस्त विशेषताओं को सारगर्भित रूप से व्यक्त करने के लिए युग के अनुकूल होता है। वह उस युग के अपने स्वभाव का प्रतिनिधित्व करने के लिए इस विशेष नाम, एक नाम जो अस्थायी महत्व से सम्पन्न है, का उपयोग करता है। परमेश्वर अपने स्वयं के स्वभाव को व्यक्त करने के लिए मनुष्य की भाषा का उपयोग करता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)" )। परमेश्‍वर बुद्धिमान, सर्वशक्तिमान शासक हैं। वे महान हैं, वे प्रचुर हैं, और सबको समेटे हुए हैं। कोई एक नाम शायद वह सब नहीं दर्शा सकता जो कि परमेश्‍वर हैं। इस सबसे बढ़कर, हरेक युग में परमेश्‍वर ने अपने कार्य का एक अंश ही पूरा किया है, और उन्होंने अपने स्वभाव का एक अंश ही प्रकट किया है। उन्होंने वो सब व्यक्त नहीं किया है, जो उनके पास था और जो उनका अस्तित्‍व है। इसलिए, अपने कार्य के हर चरण में, वे एक विशेष नाम अपनाते हैं, जिसमें उस युग की महत्ता समायी होती है, ताकि उस युग के उनके कार्य और उनके द्वारा व्यक्त किये जा रहे स्वभाव को दर्शाया जा सके। यह परमेश्‍वर के कार्य का सिद्धांत है, और यही वो बुनियादी वजह है कि वे अपना नाम बदल लेते हैं। "परमेश्‍वर का नाम बदल गया है?!" फ़िल्म की स्क्रिप्ट से लिया गया अंश

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चूंकि आप कहती हैं कि हर युग में परमेश्‍वर का नाम उनकी संपूर्णता को नहीं दर्शा सकता, तो हर युग में उनके नाम की क्या अहमियत है?

एक बेहद अहम सवाल, सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं: ""यहोवा" वह नाम है जिसे मैंने इस्राएल में अपने कार्य के दौरान अपनाया था, और इसका अर्थ है इस्राएलियों (परमेश्वर के चुने हुए लोग) का परमेश्वर जो मनुष्य पर दया कर सकता है, मनुष्य को शाप दे सकता है, और मनुष्य के जीवन को मार्गदर्शन दे सकता है। इसका अर्थ है वह परमेश्वर जिसके पास बड़ी सामर्थ्य है और जो बुद्धि से भरपूर है। "यीशु" इमैनुअल है, और इसका मतलब है वह पाप बलि जो प्रेम से परिपूर्ण है, करुणा से भरपूर है, और मनुष्य को छुटकारा देता है। उसने अनुग्रह के युग का कार्य किया, और वह अनुग्रह के युग का प्रतिनिधित्व करता है, और वह प्रबन्धन योजना के केवल एक भाग का ही प्रतिनिधित्व कर सकता है। अर्थात्, केवल यहोवा ही इस्राएल के चुने हुए लोगों का परमेश्वर, इब्राहीम का परमेश्वर, इसहाक का परमेश्वर, याकूब का परमेश्वर, मूसा का परमेश्वर, और इस्राएल के सभी लोगों का परमेश्वर है। …

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