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41. सर्वोत्कृष्ट उपहार जो परमेश्वर ने मुझे दिया है

यिक्ज़िन शिजिएजुआंग शहर, हेबेई प्रान्त

इससे पहले, मैं बार-बार अपने भाइयों एवं बहनों को यह कहते हुए सुनती थी कि, "परमेश्वर जो कुछ भी करता है वह बहुत अच्छे के लिए होता है; यही वह सब है जिसकी लोगों को आवश्यकता है।" मैंने इसे स्वीकार किया और इसके साथ सहमत थी, लेकिन मेरे स्वयं के अनुभव के माध्यम से मुझे कोई समझ नहीं थी। बाद में मुझे उसे बातावरण के जरिए इसकी कुछ समझ प्राप्त हुई जिसे परमेश्वर ने मेरे लिए सृजित किया था।

मेरे हृदय में हैसियत की विशेष रूप से एक प्रबल इच्छा थी। मैं हमेशा आशा करती रहती थी कि अगुवा मेरी ओर ध्यान देगा और यह कि मेरे भाई एवं बहन मेरे विषय में ऊँचा सोचेंगे, किन्तु वास्तविकता कभी वैसी नहीं थी जैसी मैंने आशा की थी कि ऐसी होगी। कई वर्षों के समय के दौरान, इस बात की परवाह किए बिना कि अपने कर्तव्य को पूरा करते समय मैंने किस के साथ भागीदारी की थी, मैं हमेशा "सहायक" ही थी। इस बात की परवाह किए बिना कि क्या चल रहा है, अगुवा हमेशा मेरे सहभागी से इसकी चर्चा करता और उसके लिए इंतज़ाम करता था कि वह चीज़ों की देखभाल करे। ऐसा प्रतीत होता था कि उस अगुवे की नज़रों में, मैं तुच्छ एवं महत्वहीन व्यक्ति हूँ। इसने वास्तव में मुझे डगमगा दिया। मैंने सोचा: "मैं उसी प्रकार के कर्तव्यों को पूरा करती हूँ और मैं दूसरों की अपेक्षा खराब नहीं हूँ। मैं हमेशा 'सहायक' क्यों हूँ? मैं हमेशा किसी अन्य के अधीन क्यों हूँ?" मैंने बड़ी मात्रा में शुद्धिकरण के कष्ट का अनुभव किया क्योंकि मेरी इच्छाएँ कभी भी संतुष्ट नहीं हो सकती थीं, और मैं परमेश्वर के बारे में अपनी गलतफ़हमी के बीच लगातार जी रही थी। मैं इससे बचकर नहीं निकल सकती थी। एक दिन, उस अगुवे ने मेरे सहभागी से कुछ पाठ इकठ्ठा करवाया, किन्तु सहायता के लिए मुझ से नहीं कहा। इसने मेरी दुखती रग पर चोट की। यद्यपि मैं जानती थी कि मुझे उस प्रकार की व्यर्थ बात के पीछे नहीं जाना चाहिए, फिर भी मैं बस इसे जाने नहीं दे सकी, और मैं एक बार फिर से दर्द में डूब गई। मैंने सोचा: इस तरह की स्थिति हमेशा मेरे साथ क्यों खोज लेती है? क्यों ये स्थितियाँ सदा वैसी नहीं होती हैं जैसा मैं चाहती हूँ? परमेश्वर चीज़ों को इस तरह से क्यों करता है? मैं इसे बिलकुल भी नहीं समझ सकती थी।

बाद में, जब मैं परमेश्वर के वचन को खा और पी रही थी, तब मैंने परमेश्वर की ओर से निम्नलिखित वचनों को देखा: "... उनकी प्रकृति के भीतर के भ्रष्टाचार का हल परीक्षण के माध्यम से किया जाना चाहिए। जिन-जिन पहलुओं में तुमशुद्ध नहीं किए गए हो, इन पहलुओं में तुम्हें परिष्कृत किया जाना चाहिए—यह परमेश्वर की व्यवस्था है। परमेश्वर तुम्हारे लिए एक वातावरण बनाता है, परिष्कृत होने के लिए बाध्य करता है जिससे तुम अपने खुद के भ्रष्टाचार को जान जाओ। अंततः तुम उस बिंदु पर पहुंच जाते हो जहां तुम मर जाना और अपनी योजनाओं और इच्छाओं को छोड़ देन और परमेश्वर की सार्वभौमिकता और व्यवस्था के प्रति समर्पण करना अधिक पसंद करते हो। इसलिए यदि किसी को कई वर्षों का शुद्धिकरण नहीं मिला है, उसने एक हद तक पीड़ा नहीं सही है, तो वह, अपनी सोच और हृदय में देह के भ्रष्टाचार के बंधन से बचने में सक्षम नहीं होगा। जिन भी पहलुओं में तुम अभी भी शैतान के बंधन के अधीन हो, जिन भी पहलुओं में तुमअभी भी अपनी इच्छाएं रखते हो, जिनमें तुम्हारी अपनी मांगें हैं, यही वे पहलू हैं जिनमें तुम्हेंकष्ट उठाना होगा। केवल दुख से ही सबक सीखा, सत्य पाया और परमेश्वर के इरादा को समझा जा सकता है" ("मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "परीक्षणों के बीच परमेश्वर को कैसे संतुष्ट करें")। मैंने परमेश्वर के वचनों से अपने हृदय में एक गर्मजोशी की लहर का एहसास किया, मानो कि परमेश्वर मुझे आमने-सामने प्रबुद्ध कर रहा था, यह बताते हुए कि वह क्यों चीजों को इस तरह से कर रहा था, लक्ष्य क्या था, और मुझे उसके अच्छे इरादों को समझने की अनुमति दे रहा था। परमेश्वर की ओर से उस प्रबुद्धता के साथ, मैं वापस मुड़ने और उस वातावरण पर एक नए सिरे से नज़र डालने से अपने आपको नहीं रोक सकी जो उसने मेरे लिए सृजित किया था। तब मैंने देखा कि परमेश्वर मुझे बहुत अच्छी तरह से जानता था; वह उन पहलुओं को जानता था जिनमें शैतान के प्रभाव के बन्धन मुझ पर सबसे बुरे थे। वह इस बारे में भी स्पष्ट था कि हैसियत के कार्यक्षेत्र में शैतान की ओर से मेरी भ्रष्टता अत्यधिक गंभीर थी। परमेश्वर मुझे हमेशा शैतान के अधिकार क्षेत्र के अधीन जीते हुए और शैतान के द्वारा भ्रष्ट किए जाते हुए, दमन किए जाते हुए, यातना दिए जाते हुए और कुचले जाते हुए देखना सहन नहीं कर सकता था। इसलिए, परमेश्वर ने मेरी प्रकृति को लक्षित किया, और जिसकी मुझे आवश्यकता थी उसके अनुसार, वहाँ मुझे निरन्तर शुद्ध किया जहाँ मुझे शैतान के द्वारा बहुत ज़्यादा भ्रष्ट किया गया था। वे प्रकाशन, वे ताड़नाएँ, वे शुद्धिकरण—वे सभी मेरे लिए परमेश्वर के प्रेम के उद्धार थे। किन्तु इतने वर्षों तक, मैंने कभी भी परमेश्वर के अच्छे इरादों को नहीं समझा था। मैं अपने ऊपर "भंडाफोड़" के परमेश्वर के कार्य को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थी। इसीलिए मैं हमेशा उसके उपकार को गलत समझती थी और हमेशा महसूस करती थी कि वह मेरे प्रति कठोर है, वह मुझे दबाता रहता है, और वास्तव में वह मुझे स्वयं को दर्शाने की अनुमति नहीं देता है। अब जब मैं इसके बारे में सोचती हूँ, यदि मेरा, ऐसे व्यक्ति के रूप में जिसने हैसियत को स्वयं जीवन के रूप में देखा था, वास्तव में प्रत्येक क्षेत्र में अपना स्वयं का मार्ग होता, तो मेरी भीतरी इच्छाएँ बस बढ़ती जातीं और बढ़ती जातीं, और अन्त में मुझे सिर्फ बर्बाद किया जा सकता था। केवल तभी मैंने उस कठिन कार्य को समझा जिसे परमेश्वर ने कई वर्षों तक मुझ पर किया था; केवल तभी मैंने देखा कि वे वातावरण जो परमेश्वर ने मेरे लिए सृजित किए थे वे मुझे बचाने के लिए थे। यह ऐसा प्रेम है जिसे शब्दों से व्यक्त नहीं किया जा सकता है। मेरा हृदय परमेश्वर के निष्कपट प्रेम से द्रवित हो गया था और मेरे हृदय से परमेश्वर के प्रति मेरी गलतफहमियाँ गायब हो गईं थीं। मैं खुशी से उस वातावरण के भीतर आज्ञाकारी होने के लिए तैयार थी जो परमेश्वर ने मेरे लिए सृजित किया था।

यह केवल इस अनुभव के माध्यम से ही हुआ कि मैंने सचमुच में पहचाना कि परमेश्वर मानवजाति की परीक्षा लेने एवं उसे शुद्ध करने के लिए वातावरण को सृजित करता है। इसके भीतर गहरा अर्थ एवं महान प्रेम दोनों है! सत्य यह है कि, मेरे लिए, जब ऐसी स्थितियाँ मेरे ऊपर थीं जो मेरी धारणाओं के समान नहीं थीं, तो वे बिलकुल वैसी ही थीं जिनकी मुझे जीवन में आवश्यकता थी। यह परमेश्वर का एक आवश्यक साधन था जो मुझे बचाने के लिए मुझसे उसकी पहचान और उसका आज्ञापालन करवा रहा था। ठीक वैसे ही जैसे एक माता अपने स्वयं के बच्चों के स्वास्थ्य को वास्तव में समझती है—किस बच्चे को किस चीज़ की आवश्यकता है, किस पोषण के पूरक की उन्हें आवश्यकता है—एक माता उसे अच्छे से समझती है। आज, जो कुछ परमेश्वर लोगों की ज़िन्दगियों में करता है वह ऐसा ही है। परमेश्वर लोगों के लिए एक वातावरण सृजित करता है और जो कुछ वह उनकी ज़िन्दगियों में करता है वह केवल उस पर आधारित होता है जिसकी उन्हें आवश्यकता होती है। यह सब कुछ उसके लिए है जो कुछ उनकी ज़िन्दगियों के लिए अत्यंत लाभदायक है और यह उन्हें सत्य को प्राप्त करने, परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता अर्जित करने, और शैतान के प्रभाव को उतार फेंकने की अनुमति देने के लिए है। यदि लोग उस वातावरण के भीतर आज्ञाकारी हो सकते हैं जिसे परमेश्वर ने उनके लिए सृजित किया है, तो वे सत्य को प्राप्त कर सकते हैं, जीवन को प्राप्त कर सकते हैं। यदि लोग अपने स्वयं के मिज़ाज एवं प्राथमिकताओं को खुली छूट देते हैं और परमेश्वर से उन्हें संतुष्ट करवाते हैं, तो वे न केवल कुछ भी प्राप्त नहीं करेंगे, बल्कि वे परमेश्वर को अप्रसन्न करेंगे, और अन्त में केवल अपने आपको नुकसान पहुँचा सकते हैं और बर्बाद कर सकते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि जो कुछ लोग पसन्द करते हैं वह उनके लिए उपयुक्त नहीं होता है, और यह परमेश्वर के द्वारा उनके उद्धार और उनकी सिद्धता के लिए तो बिलकुल भी लाभदायक नहीं है। जो कुछ परमेश्वर मानवजाति को देता है केवल वही सबसे अच्छा होता है; केवल यही वह चीज़ है जिसकी लोगों को अत्यधिक आवश्यकता होती है। यह उस समय हुआ कि अन्ततः मेरे पास जो कुछ परमेश्वर ने कहा था उसकी कुछ व्यवहारिक समझ थी: "... आज की राह न्याय और शाप के साथ चलती है, लेकिन तुम सबको पता होना चाहिए कि जो मैंने तुम लोगों को दिया है, चाहे वह न्याय हो या ताड़ना, वह उन उपहारों में से सबसे अच्छा है जो मैं तुम लोगों को दे सकता हूँ, और वे सब वे चीज़ें हैं जिनकी तुम लोगों को तत्काल आवश्यकता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "कितना नीच है तुम्हारा चरित्र!")।

मैं परमेश्वर के द्वारा प्रबुद्धता का धन्यवाद करती हूँ जिसने मुझ पर किए गए परमेश्वर के कार्य के बारे में मुझे कुछ ज्ञान एवं समझ प्राप्त करने की, और यह देखने की अनुमति दी है कि मैं जितना अधिक किसी चीज़ को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होती हूँ, उतनी ही अधिक मुझे उसकी आवश्यकता होती है, और उतना ही अधिक मुझे उसे स्वीकार करना चाहिए। केवल इसी तरह से मैं उस चीज़ को प्राप्त करने में सक्षम होऊँगी जो परमेश्वर मुझे दे रहा है। मैं यह भी एहसास करती हूँ कि परमेश्वर का सार अच्छा है, और जो कुछ भी वह मानवजाति के लिए करता है वह सब प्रेम है। यह सब वह है जो लोगों की ज़िन्दगियों के लिए अत्यंत लाभदायक है; यह वह जीवनाधार है जिसकी लोगों की ज़िन्दगियों में अत्यधिक आवश्यकता है, और यह परमेश्वर के द्वारा मनुष्य को दिया गया उत्कृष्ट उपहार है। आज से, मैं अपने आप को पूरी तरह से परमेश्वर के हाथों में रखने के लिए, उस सभी कार्य का आज्ञापालन करने और उसे स्वीकार करने के लिए तैयार हूँ जो परमेश्वर मुझ पर पूर्ण करता है। मैं सत्य को जानने का प्रयास करने के लिए, सत्य को प्राप्त करने के लिए, और जल्द ही उस वातावरण के भीतर स्वभाव में परिवर्तन लाने के लिए तैयार हूँ जिसे परमेश्वर मेरे लिए तैयार करता है।

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