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किसके लिए जीना चाहिए इंसान को

I

साफ़ नहीं था इंसान जीए किसके लिए।

अब मिल गया है मुझे उसका जवाब।

प्रतिष्ठा और शोहरत की तलाश में, मैं जीता था बस अपने लिए।

सुंदर शब्दों से भरी होती थी मेरी दुआ,

पर असल में मैं जीता था अपने तरीके से।

भविष्य और किस्मत पर था निर्भर मेरा ईमान,

नहीं मेरी कोई सच्चाई और असलीयत।

रस्मों-रिवाज़, नियम सीमित करते थे मेरे ईमान को, मेरे ईमान को।

खालीपन के अलावा नहीं था कुछ भी मेरे पास, मेरे पास।

इंसान की तरह जीने में नाकामयाब,

परमेश्वर के प्रेम के लायक नहीं हूँ मैं, नहीं हूँ मैं, नहीं हूँ मैं।

II

मेरा दिल जाग उठा है अब,

कहता है मुझे लौटाना चाहिए परमेश्वर का प्रेम।

ख़ुद से है मुझे नफ़रत कि नहीं था मेरा कोई ज़मीर,

परमेश्वर की करता अवज्ञा और तोड़ता उसका दिल, और तोड़ता उसका दिल।

कभी नहीं थी परवाह मुझे परमेश्वर के दिल की,

कभी नहीं थी परवाह मुझे उनके वचनों की।

बिना ज़मीर और बिना समझ,

कैसे कोई बुला सकता है मुझे इंसान?

परमेश्वर का न्याय दिखाता है मुझे,

शैतान ने कर दिया था पूरी तरह दूषित मुझे।

जालों से भरी ये दुनिया है बुरी,

एक विश्वासी को चुनना चाहिए सत्य।

हे प्रभु, मुझसे कितना प्रेम तुम करते हो,

बचाने के लिए मुझे जो हो मुमकिन सब करते हो।

तुमने जो किया मेरे लिए, याद रहेगा मुझे हमेशा!

मैं भूलूँगा नहीं कभी।

परमेश्वर के दिल का ख्याल, यही है मेरी ख़्वाहिश।

हक़ीक़त पर चलने का मेरा पक्का इरादा, इरादा पक्का इरादा।

परमेश्वर के लिए खुद को खर्च करने का है मेरा इरादा,

ख़ुद को अर्पित करके है चुकाना उसका प्रेम,

ख़ुद को अर्पित करके है चुकाना उसका प्रेम।

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