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XI. परमेश्वर और बाइबल के मध्य के सम्बन्ध से जुड़े सत्य

4. बाइबल में अनन्त जीवन का कोई मार्ग नहीं है; यदि मनुष्य बाइबल को थामे रहता है और उसकी आराधना करता है, तो वह अनन्त जीवन को प्राप्त नहीं करेगा

संदर्भ के लिए बाइबल के पद:

"तुम पवित्रशास्त्र में ढूँढ़ते हो, क्योंकि समझते हो कि उसमें अनन्त जीवन तुम्हें मिलता है; और यह वही है जो मेरी गवाही देता है; फिर भी तुम जीवन पाने के लिये मेरे पास आना नहीं चाहते" (यूहन्ना 5:39-40)।

"मार्ग और सत्य और जीवन मैं ही हूँ; बिना मेरे द्वारा कोई पिता के पास नहीं पहुँच सकता" (यूहन्ना 14:6)।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

जीवन का मार्ग कोई साधारण चीज़ नहीं है जो चाहे कोई भी प्राप्त कर ले, न ही इसे सभी के द्वारा आसानी से प्राप्त किया जा सकता है। यह इसलिए कि जीवन केवल परमेश्वर से ही आता है, कहने का अर्थ है कि केवल स्वयं परमेश्वर ही जीवन के तत्व का अधिकारी है, स्वयं परमेश्वर के बिना जीवन का मार्ग नहीं है, और इसलिए केवल परमेश्वर ही जीवन का स्रोत है, और जीवन के जल का सदा बहने वाला सोता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "केवल अंतिम दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनन्त जीवन का मार्ग दे सकता है" से उद्धृत

परमेश्वर स्वयं ही जीवन है, सत्य है, और उसका जीवन और सत्य साथ ही साथ रहते हैं। जो सत्य को प्राप्त करने में असफल रहते हैं वे कभी भी जीवन को प्राप्त नहीं कर सकते। बिना मार्गदर्शन, सहायता और सत्य के प्रावधान के तुम केवल पत्र, सिद्धांत और मृत्यु को ही प्राप्त करोगे। परमेश्वर का जीवन सतत विद्यमान है, और उसका सत्य और जीवन एक साथ उपस्थित रहते हैं। यदि तुम सत्य के स्रोत को नहीं प्राप्त कर पाते, तो तुम जीवन के पोषण को प्राप्त नहीं कर पाओगे; यदि तुम जीवन के प्रावधान को प्राप्त नहीं कर सकते तो तुम्हारे जीवन में निश्चय ही सत्य नहीं होगा, और इसलिए कल्पनाओं और धारणाओं के अलावा, तुम्हारी सम्पूर्ण देह केवल देह होगी, तुम्हारी घिनौनी देह। ध्यान रखो कि किताबों की बातें जीवन के तौर पर नहीं गिनी जाती हैं, इतिहास के लेखों को सत्य के रूप में चित्रित नहीं किया जा सकता, और अतीत के सिद्धांत आज के समय में परमेश्वर के द्वारा कहे गए वचनों का लेखा-जोखा नहीं माने जा सकते। केवल वही बात जो परमेश्वर ने पृथ्वी पर आकर और लोगों के बीच रहकर कही है, सत्य, जीवन, परमेश्वर की इच्छा और कार्य करने का असली तरीका है। यदि तुम अतीत के युगों में परमेश्वर के द्वारा कहे गए वचनों को आज के संदर्भ में लागू करते हो, तो तुम एक पुरातत्ववेत्ता हो, और तुम्हें सबसे बेहतर ढंग से चित्रित करने के लिए ऐतिहासिक विरासत का विशेषज्ञ कहा जा सकता है। क्योंकि तुम हमेशा उन कार्यों के सुरागों के बारे में विश्वास करते हो जो परमेश्वर ने अतीत में किए हैं, केवल उन पदचिन्हों पर विश्वास करते हो जो तब के हैं जब परमेश्वर लोगों के बीच रह कर कार्य किया करता था। और तुम केवल उसी मार्ग पर विश्वास करते हो जो परमेश्वर ने पुराने समय में अपने अनुयायियों को दिया था। आज के समय में तुम परमेश्वर के कार्य के मार्गदर्शन के बारे में विश्वास नहीं करते, महिमामय मुखाकृति में विश्वास नहीं करते, और परमेश्वर के द्वारा आज के समय में व्यक्त किये गये सत्य के मार्ग पर विश्वास नहीं करते। अत: तुम एक ऐसे दिवास्वप्न दर्शी हो जो सच्चाई से कोसों दूर है। यदि तुम अभी भी उन वचनों से चिपके रहोगे जो जीवन प्रदान करने में असमर्थ हैं, तो तुम आशाहीन और एक निर्जीव काष्ठ[क] के समान हो। क्योंकि तुम बहुत ही रूढ़िवादी, असभ्य हो जो चीजों को तर्क की कसौटी पर नहीं कसते हो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "केवल अंतिम दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनन्त जीवन का मार्ग दे सकता है" से उद्धृत

बहुत से लोग यह विश्वास करते हैं कि बाइबल को समझना और उसकी व्याख्या करने में समर्थ होना सच्चे मार्ग की खोज करने के समान है—परन्तु वास्तव में, क्या ये चीज़ें इतनी सरल हैं? बाइबल की सच्चाई को कोई नहीं जानता हैः कि यह परमेश्वर के कार्य के ऐतिहासिक अभिलेख, और परमेश्वर के कार्य के पिछले दो चरणों की गवाही से बढ़कर और कुछ नहीं है, और तुम्हें परमेश्वर के कार्य के लक्ष्यों की कोई समझ नहीं देता है। जिस किसी ने भी बाइबल को पढ़ा है वह जानता है कि यह व्यवस्था के युग और अनुग्रह के युग के दौरान परमेश्वर के कार्य के दो चरणों को प्रलेखित करता है। पुराना विधान इस्राएल के इतिहास और सृष्टि के समय से लेकर व्यवस्था के अंत तक यहोवा के कार्य का कालक्रम से अभिलेखन करता है। नया विधान पृथ्वी पर यीशु के कार्य को, जो चार सुसमाचारों में है, और साथ की पौलुस के कार्य को भी अभिलिखित करता है; क्या वे ऐतिहासिक अभिलेख नहीं हैं? आज अतीत की चीज़ों को सामने लाने से वे इतिहास बन जाती हैं, और इस से कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे कितनी सच्ची और यथार्थ हैं, वे तब भी इतिहास होती हैं—और इतिहास वर्तमान को संबोधित नहीं कर सकता है। क्योंकि परमेश्वर पीछे मुड़कर इतिहास को नहीं देखता है! और इसलिए, यदि तुम केवल बाइबल को ही समझते हो, और उस कार्य को नहीं समझते हो जिसे परमेश्वर आज करने का इरादा करता है, और यदि तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो और पवित्र आत्मा के कार्य की खोज नहीं करते हो, तो तुम यह नहीं समझते हो कि परमेश्वर को खोजने का आशय क्या है? यदि तुम इस्राएल के इतिहास का अध्ययन करने एवं समस्त आकाश और पृथ्वी की सृष्टि के इतिहास की खोज करने के लिए बाइबल को पढ़ते हो, तो तुम परमेश्वर पर विश्वास नहीं करते हो। किन्तु आज, चूँकि तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो, और जीवन का अनुसरण करते हो, चूँकि तुम परमेश्वर के ज्ञान का अनुसरण करते हो, और मृत शब्दों और सिद्धांतों, या इतिहास की समझ का अनुसरण नहीं करते हो, इसलिए तुम्हें परमेश्वर की आज की इच्छा को अवश्य खोजना चाहिए, और पवित्र आत्मा के कार्य के निर्देश की तलाश अवश्य करनी चाहिए। यदि तुम एक पुरातत्ववेत्ता होते तो तुम बाइबल को पढ़ सकते थे—लेकिन तुम नहीं हो, तुम उन में से एक हो जो परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, और तुम्हारे लिए यह सब से अच्छा होगा कि तुम परमेश्वर की आज की इच्छा को खोजो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "बाइबल के विषय में (4)" से उद्धृत

यद्यपि बाइबल जीवन के वचनों की कुछ पुस्तकों को एक साथ मिलाती है, जैसे कि पौलुस के धर्मपत्र और पतरस के धर्मपत्र, और यद्यपि इन पुस्तकों के द्वारा लोगों की आवश्यकताओं को प्रदान किया जा सकता है और उनकी सहायता की जा सकती है, फिर भी ये पुस्तकें अप्रचिलत हैं, और ये अभी भी पुराने युग से सम्बन्धित हैं, और इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वे कितनी अच्छी हैं, वे केवल एक युग के लिए ही उचित हैं, और चिरस्थायी नहीं हैं। क्योंकि परमेश्वर का कार्य निरन्तर विकसित हो रहा है, और यह केवल पौलुस और पतरस के समय में ही नहीं रूक सकता है, या हमेशा अनुग्रह के युग में बना नहीं रह सकता है जिसमें यीशु को सलीब पर चढ़ाया गया था। और इसलिए, ये पुस्तकें केवल अनुग्रह के युग के लिए उचित हैं, अंत के दिनों के राज्य के युग के लिए नहीं। ये केवल अनुग्रह के युग के विश्वासियों की जरूरतों को प्रदान कर सकती हैं, राज्य के युग के संतों की नहीं, और इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे कितनी अच्छी हैं, वे तब भी पुरानी हैं। यहोवा की सृष्टि के कार्य या इस्राएल में उसके काम के साथ भी ऐसा ही हैः इस से कोई फर्क नहीं पड़ता है कि यह कार्य कितना बड़ा था, यह अभी भी पुराना था, और वह समय अब भी आएगा जब यह ख़त्म हो जाएगा। परमेश्वर का काम भी ऐसा ही हैः यह महान है, किन्तु एक ऐसा समय आएगा जब यह समाप्त हो जाएगा; यह न तो सृष्टि के कार्य के बीच, और न ही सलीब पर चढ़ने के कार्य के बीच, हमेशा बना रह सकता है। इस से कोई फर्क नहीं पड़ता है कि सलीब पर चढ़ने का कार्य कितना विश्वास दिलाने वाला था, इस से कोई फर्क नहीं पड़ता है कि शैतान को हराने में यह कितना असरदार था, कार्य, आख़िरकार, तब भी कार्य ही है, और युग, आख़िरकार, तब भी युग ही हैं; कार्य हमेशा उसी नींव पर टिका नहीं रह सकता है, और न ही समय ऐसे होते हैं जो कभी नहीं बदल सकते हैं, क्योंकि सृष्टि हुई थी और अंत के दिन भी अवश्य होने चाहिए। यह अवश्यम्भावी है! इस प्रकार, आज नये विधान में जीवन के वचन—प्रेरितों के धर्मपत्र, और चार सुसमाचार—ऐतिहासिक पुस्तकें बन गए हैं, वे पुराने पंचांग बन गए हैं, और पुराने पंचांग लोगों को एक नए युग में लेकर कैसे जा सकते हैं? इस से कोई फर्क नहीं पड़ता है कि लोगों को जीवन प्रदान करने के लिए ये पंचांग कितने समर्थ हैं, इस से कोई फर्क नहीं पड़ता है कि सलीब तक लोगों की अगुवाई करने में वे कितने सक्षम हैं, क्या वे पुराने नहीं हो गए हैं? क्या वे मूल्य-विहीन नहीं हैं? इसलिए, मैं कहता हूँ कि तुम्हें आँख बंद करके इन पंचांगों पर विश्वास नहीं करना चाहिए। वे अत्यधिक पुराने हैं, वे तुम्हें नए कार्य में नहीं पहुँचा सकते हैं, वे केवल तुम पर भार डाल सकते हैं। न केवल वे तुम्हें नए कार्य में, और नए प्रवेश में नहीं ले जा सकते हैं, बल्कि वे तुम्हें पुरानी धार्मिक कलीसियाओं के भीतर ले जाते हैं—और यदि ऐसा होता है, तो क्या तुम परमेश्वर के प्रति अपने विश्वास में पीछे नहीं हट रहे हो?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "बाइबल के विषय में (4)" से उद्धृत

यदि तुम्हें परमेश्वर से कुछ ज्ञान प्राप्त होता है और उसके विरुद्ध कुछ सावधानी प्रयोग करते हो, तो क्या यह कार्य वास्तव में अनुचित नहीं है? अगर कोई कार्य पवित्रात्मा का है, तो बिना बाइबल के प्रमाण की आवश्यकता के, तुम्हें उसे स्वीकार कर लेना चाहिये, जब तक कि यह पवित्र आत्मा का कार्य है, क्योंकि तुम परमेश्वर का अनुसरण करने के लिए परमेश्वर पर विश्वास करते हो, न कि उसकी जाँच-पड़ताल करने के लिए। मेरे यह दिखाने के लिए कि मैं तुम्हारा परमेश्वर हूँ, तुम्हें और सबूत नहीं खोजने चाहिए। इसके बजाय तुम्हें यह विचार करना चाहिए कि क्या मैं तुम्हारे लिए लाभ का हूँ, यही मुख्य बात है। भले ही तुम्हें बाइबल में बहुत सारे अखंडनीय सबूत प्राप्त हो जाएँ; ये तुम्हें पूरी तरह से मेरे सामने नहीं ला सकते हैं। तुम एक ऐसे व्यक्ति हो जो बाइबल के सीमा में ही रहता है, न कि मेरे सामने; बाइबल मुझे जानने में तुम्हारी सहायता नहीं कर सकती है, न ही यह मेरे लिए तुम्हारे प्रेम को गहरा कर सकती है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "मनुष्य, जिसने परमेश्वर को अपनी ही धारणाओं में सीमित कर दिया है, वह किस प्रकार उसके प्रकटनों को प्राप्त कर सकता है?" से उद्धृत

अंत के दिनों का मसीह जीवन लेकर आता है, और सत्य का स्थायी एवं अनन्त मार्ग प्रदान करता है। इसी सत्य के मार्ग के द्वारा मनुष्य जीवन को प्राप्त करेगा, और एक मात्र इसी मार्ग से मनुष्य परमेश्वर को जानेगा और परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त करेगा। यदि तुम अंत के दिनों के मसीह के द्वारा प्रदान किए गए जीवन के मार्ग को नहीं खोजते हो, तो तुम कभी भी यीशु के अनुमोदन को प्राप्त नहीं कर पाओगे और कभी भी स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने के योग्य नहीं बन पाओगे क्योंकि तुम इतिहास के कठपुतली और कैदी दोनों हो। जो लोग नियमों, लिखे गये पत्रों के नियंत्रण में हैं और इतिहास की ज़ंजीरों में जकड़े हुए हैं वे कभी भी जीवन को प्राप्त नहीं कर सकते हैं, और कभी भी सतत जीवन के मार्ग को प्राप्त करने के योग्य नहीं बन सकते हैं। क्योंकि सिंहासन से प्रवाहित होने वाले जीवन जल की अपेक्षा, उनके पास मैला पानी है जिससे वे हज़ारों सालों से चिपके हुए हैं। जिनके पास जीवन का जल नहीं है वे हमेशा के लिए एक लाश, शैतान के खेलने की वस्तु और नरक की संतान बने रहेंगे। फिर वे परमेश्वर को कैसे देख सकते हैं? यदि तुम केवल अतीत को पकड़े रहने की कोशिश करोगे, केवल ठहरी हुई चीज़ों को पकड़ने की कोशिश में लगे रहोगे, और यथास्थिति को बदलने और इतिहास को तिलांजलि देने की कोशिश नहीं करोगे, तो क्या तुम हमेशा परमेश्वर के विरोध में नहीं रहोगे? परमेश्वर के कार्य के चरण बहुत ही विशाल और सामर्थी हैं, जैसे कि हिलोरे मारती हुई लहरें और गरजता हुआ तूफान—फिर भी तुम बैठकर निष्क्रियता से विनाश का इंतजार करते हो, अपनी ही मूर्खता से चिपके रहते हो और कुछ भी नहीं करते। इस प्रकार से, तुम्हें मेमने का अनुसरण करने वाले के रूप में कैसे देखा जा सकता है? और तुम जिस परमेश्वर पर निर्भर रहते हो उसे उस परमेश्वर के रूप में न्यायोचित कैसे ठहरा सकते हो जो हमेशा नया है और कभी पुराना नहीं होता? तुम्हारी पीली पड़ चुकी किताब के वचन तुम्हें नए युग में कैसे ले जा सकते हैं? वे कैसे तुम्हें परमेश्वर के चरणबद्ध तरीके से चलने वाले कार्यों तक लेकर जायेंगे? वे तुम्हें कैसे स्वर्ग लेकर जायेंगे? तुम्हारे हाथों में जो पत्र हैं वे तुम्हें केवल अस्थायी सांत्वना ही दे सकते हैं, वह सत्य नहीं दे सकते जो जीवन देने में सक्षम है। जो शास्त्र तुम पढ़ते हो वे तुम्हारी जिव्हा को सम्पन्न बना सकते हैं लेकिन ये वे विवेकपूर्ण वचन नहीं हैं जो तुम्हें मानव जीवन का बोध करने में मदद कर सकते हैं, ये वह मार्ग तो बिल्कुल ही नहीं हैं जो तुम्हें पूर्णता की ओर ले जायें। क्या यह भिन्नता तुम्हें विचार-मंथन का कारण नहीं देती? क्या यह तुम्हें अपने भीतर समाहित रहस्यों को समझने के लिए अनुमति नहीं देता है? क्या तुम अपने आप को परमेश्वर से मिलने के लिए स्वर्ग में ले जाने के योग्य हो? परमेश्वर के आये बिना, क्या तुम अपने आप को परमेश्वर के साथ पारिवारिक आनन्द मनाने के लिए स्वर्ग में ले जा सकते हो? क्या तुम अभी भी स्वप्न देख रहे हो? मैं तुम्हें सुझाव देता हूँ, कि तुम स्वप्न देखना बंद कर दो, और उसकी ओर देखो जो अभी कार्य कर रहा है, उसकी ओर जो अंत के दिनों में मनुष्यों को बचाने के लिए कार्य कर रहा है। यदि तुम ऐसा नहीं करते हो, तो तुम कभी भी सत्य को नहीं प्राप्त कर सकते, और कभी भी जीवन प्राप्त नहीं कर सकते हो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "केवल अंतिम दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनन्त जीवन का मार्ग दे सकता है" से उद्धृत

फुटनोट:

क. ए पीस ऑफ़ डेडवुड: एक चीनी मुहावरा, जिसका अर्थ है—"सहायता से परे"।

पिछला:बाइबल मनुष्य द्वारा संकलित की गई थी, परमेश्वर द्वारा नहीं; बाइबल परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकती।

अगला:परमेश्वर में सच्चा विश्वास क्या है? किसी को परमेश्वर में कैसे विश्वास करना चाहिए कि वह परमेश्वर से प्रशंसा प्राप्त कर सके?

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