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XI. परमेश्वर और बाइबल के मध्य के सम्बन्ध से जुड़े सत्य

5. परमेश्वर में सच्चा विश्वास क्या है? किसी को परमेश्वर में कैसे विश्वास करना चाहिए कि वह परमेश्वर से प्रशंसा प्राप्त कर सके?

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

"परमेश्वर पर विश्वास" का अर्थ, यह विश्वास करना है कि परमेश्वर है; यह परमेश्वर पर विश्वास की सरलतम अवधारणा है। इससे बढ़कर यह बात है कि परमेश्वर है, यह मानना परमेश्वर पर सचमुच विश्वास करने जैसा नहीं है; बल्कि यह मजबूत धार्मिक प्रभाव के साथ एक प्रकार का सरल विश्वास है। परमेश्वर पर सच्चे विश्वास का अर्थ इस विश्वास के आधार पर परमेश्वर के वचनों और कामों का अनुभव करना है कि परमेश्वर सब वस्तुओं पर संप्रभुता रखता है। इस तरह से तुम अपने भ्रष्ट स्वभाव से मुक्त हो जाओगे, परमेश्वर की इच्छा को पूरा करोगे और परमेश्वर को जान जाओगे। केवल इस प्रकार की यात्रा के माध्यम से ही तुम्हें परमेश्वर पर विश्वास करने वाला कहा जा सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" के लिए प्रस्तावना से उद्धृत

परमेश्वर में सच्चा विश्वास करने का अर्थ सिर्फ़ बचाए जाने के लिए उस पर भरोसा करना नहीं है और इसका अर्थ एक अच्छा व्यक्ति होना तो उससे भी कम है। इसका अर्थ मनुष्य के समान आचरण रखने के लिए परमेश्वर में विश्वास करना भी नहीं है। दरअसल, लोगों को अपने विश्वास करने को सिर्फ इस विश्वास के रूप में नहीं देखना चाहिए कि एक परमेश्वर है, और उसके बाद कुछ और नहीं; ऐसा नहीं है कि तुम को केवल यह विश्वास करना चाहिए कि परमेश्वरसत्य, मार्ग और जीवन है, और इसके अलावा कुछ भी नहीं। न ही ऐसा है कि तुम परमेश्वर को केवल स्वीकार करो, और बस यह विश्वास कर लो कि परमेश्वर सभी चीजों पर शासन करता है, कि परमेश्वर सर्वशक्तिमान है, कि परमेश्वर ने दुनिया में सभी चीजें बनाई हैं, कि परमेश्वर अद्वितीय है और परमेश्वर ही सर्वोच्च है। यह केवल इतना नहीं है कि तुम इन तथ्यों पर विश्वास करो; परमेश्वर की इच्छा यह है कि तुम्हें—तुम्हारे सम्पूर्ण अस्तित्व और तुम्हारे पूरे दिल के साथ—परमेश्वर का अनुसरण करना चाहिए, और परमेश्वर के प्रति समर्पित होना चाहिए, अर्थात तुम्हें परमेश्वर का अनुसरण करना चाहिए ताकि परमेश्वर तुम्हें अपनी सेवा में इस्तेमाल कर सके, और यह कि तुम्हें उसके लिए सेवा करने में खुशी होनी चाहिए और तुम्हें परमेश्वर की खातिर कुछ भी करना चाहिए।

— "मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "केवल सत्य का अनुसरण ही परमेश्वर में सच्चा विश्वास है" से उद्धृत

आज, परमेश्वर में वास्तविक विश्वास क्या है? यह परमेश्वर के वचन को अपने जीवन की वास्तविकता के रूप में स्वीकार करना, और परमेश्वर का सच्चा प्यार प्राप्त करने के लिए परमेश्वर के वचन से परमेश्वर को जानना है। स्पष्ट करने के लिए: यह परमेश्वर में विश्वास है जिसकी वजह से तुम परमरेश्वर की आज्ञा का पालन कर सकते हो, उससे प्रेम कर सकते हो, और उस कर्तव्य को कर सकते हो जो एक परमेश्वर के प्राणी द्वारा की जानी चाहिए। यही परमेश्वर पर विश्वास करने का लक्ष्य है। तुम्हें परमेश्वर के प्रेम का ज्ञान अवश्य प्राप्त करना चाहिए, या यह ज्ञान अवश्य प्राप्त करना चाहिए कि परमेश्वर कितने आदर के योग्य हैं, कैसे अपने सृजन किए गए प्राणियों में परमेश्वर उद्धार का कार्य करता है और उन्हें पूर्ण बनाता है—यह वह न्यूनतम है जो तुम्हें परमेश्वर पर विश्वास में धारण करना चाहिए। परमेश्वर पर विश्वास मुख्यतः देह के जीवन से परमेश्वर से प्रेम करने वाले जीवन में बदलना है, प्राकृतिकता के जीवन से परमेश्वर के अस्तित्व के जीवन में बदलना है, यह शैतान के अधिकार क्षेत्र से बाहर आना और परमेश्वर की देखभाल और सुरक्षा में जीवन जीना है, यह देह की आज्ञाकारिता को नहीं बल्कि परमेश्वर की आज्ञाकारिता को प्राप्त करने में समर्थ होना है, यह परमेश्वर को तुम्हारा संपूर्ण हृदय प्राप्त करने की अनुमति देना है, परमेश्वर को तुम्हें पूर्ण बनाने और तुम्हें भ्रष्ट शैतानी स्वभाव से मुक्त करने की अनुमति देना है। परमेश्वर में विश्वास मुख्यतः इस वजह से है ताकि परमेश्वर की सामर्थ्य और महिमा तुममें प्रकट हो सके, ताकि तुम परमेश्वर की इच्छा को पूर्ण कर सको, और परमेश्वर की योजना को संपन्न कर सको, और शैतान के सामने परमेश्वर की गवाही दे सको। परमेश्वर पर विश्वास संकेतों और चमत्कारों को देखने के उद्देश्य से नहीं होना चाहिए, न ही यह तुम्हारी व्यक्तिगत देह के वास्ते होना चाहिए। यह परमेश्वर को जानने की तलाश के लिए, और परमेश्वर की आज्ञा का पालन करने, और पतरस के समान, मृत्यु तक परमेश्वर का आज्ञापालन करने में सक्षम होने के लिए, होना चाहिए। यही वह सब है जो मुख्यतः प्राप्त करने के लिए है। परमेश्वर के वचन को खाना और पीना परमेश्वर को जानने और उसे संतुष्ट करने के उद्देश्य से है। परमेश्वर के वचन को खाना और पीना तुम्हें परमेश्वर का और अधिक ज्ञान देता है, केवल उसके बाद ही तुम उसका आज्ञा पालन कर सकते हो। केवल यदि तुम परमेश्वर को जानते हो तभी तुम उससे प्रेम कर सकते हो, और इस लक्ष्य को प्राप्त करना ही वह एकमात्र लक्ष्य है जो परमेश्वर के प्रति अपने विश्वास में मनुष्य को रखना चाहिए। यदि, परमेश्वर पर तुम्हारे विश्वास में, तुम सदैव संकेतों और चमत्कारों को देखने का प्रयास करते रहते हो, तब परमेश्वर पर तुम्हारे विश्वास का यह दृष्टिकोण गलत है। परमेश्वर पर विश्वास मुख्य रूप में परमेश्वर के वचन को जीवन की वास्तविकता के रूप में स्वीकार करना है। केवल उसके मुख से निकले वचनों को अभ्यास में लाना और उन्हें अपने स्वयं के भीतर पूरा करना, परमेश्वर के लक्ष्य की प्राप्ति है। परमेश्वर पर विश्वास करने में, मनुष्य को परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जाने, परमेश्वर के प्रति समर्पण करने में समर्थ होने की, और परमेश्वर के प्रति संपूर्ण आज्ञाकारिता की तलाश करनी चाहिए। यदि तुम बिना कोई शिकायत किए परमेश्वर का आज्ञापालन कर सकते हो, परमेश्वर की अभिलाषाओं का विचार कर सकते हो, पतरस के समान हैसियत प्राप्त कर सकते हो, और परमेश्वर द्वारा कही गई पतरस की शैली को धारण कर सकते हो, तो यह तब होगा जब तुमने परमेश्वर पर विश्वास में सफलता प्राप्त कर ली है, और यह इस बात की द्योतक होगी कि तुम परमेश्वर द्वारा जीत लिए गए हो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर के वचन के द्वारा सब कुछ प्राप्त हो जाता है" से उद्धृत

क्योंकि यदि तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो, तो तुम्हें उसके वचन को खाना-पीना चाहिये, उसका अनुभव करना चाहिये और उसे जीना चाहिये। केवल यही परमेश्वर पर विश्वास करना है! यदि तुम कहते हो कि तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो, परंतु उसके किसी वचन पर अमल नहीं कर सकते या वास्तविकता उत्पन्न नहीं कर सकते तो यह नहीं माना जा सकता कि तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो। ऐसा करना भूख शांत करने के लिये रोटी की खोज करने जैसा है। केवल छोटी-छोटी बातों की गवाही, अनुपयोगी मसले और सतही मुद्दों के बारे में बातें करना, उनमें लेशमात्र भी वास्तविकता न होना, परमेश्वर पर विश्वास नहीं है। उसी तरह, तुमने परमेश्वर पर विश्वास करने के सही तरीके को नहीं समझा है। तुम्हें परमेश्वर के वचनों को क्यों अधिक खाना-पीना चाहिये? यदि तुम परमेश्वर के वचनों को खाते पीते नहीं और केवल स्वर्ग पर उठाये जाने की खोज में रहो तो क्या यह विश्वास माना जायेगा? परमेश्वर में विश्वास रखने वाले का पहला कदम क्या होता है? परमेश्वर किस मार्ग से मनुष्यों को पूर्ण बनाता है? क्या परमेश्वर के वचन को बिना खाए-पिए तुम पूर्ण बनाए जा सकते हो? क्या परमेश्वर के वचन को बिना अपनी वास्तविकता बनाये, तुम परमेश्वर के राज्य के व्यक्ति माने जा सकते हो? परमेश्वर में विश्वास रखना वास्तव में क्या है? परमेश्वर में विश्वास रखने वालों का कम से कम बाहरी तौर पर आचरण अच्छा होना चाहिये और सबसे महत्वपूर्ण बात परमेश्वर का वचन रखना है। तब चाहे कुछ भी हो तुम उसके वचन से भी दूर नहीं जा सकते। परमेश्वर के प्रति तुम्हारा ज्ञान और उसकी इच्छा को पूरा करना, सब उसके वचन के द्वारा हासिल किया जाता है। सभी देश, सम्प्रदाय, धर्म और प्रदेश भी भविष्य में वचन के द्वारा जीते जायेंगे। परमेश्वर सीधे बात करेगा, सभी लोग अपने हाथों में परमेश्वर का वचन थामकर रखेंगे; इसके द्वारा लोग पूर्ण बनाए जाएंगे। परमेश्वर का वचन सब तरफ फैलता जायेगा: इंसान परमेश्वर के वचन बोलेगा, परमेश्वर के वचन के अनुसार आचरण करेगा, और अपने हृदय में परमेश्वर का वचन रखेगा, भीतर और बाहर दोनों तरफ परमेश्वर के वचन में डूबा रहेगा। इस प्रकार इन्सान को पूर्ण बनाया जाएगा। परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने वाले और वे जो उसकी गवाही देते हैं, वे हैं जिन्होंने परमेश्वर के वचन को वास्तविकता बनाया है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "राज्य का युग वचन का युग है" से उद्धृत

अब, सभी लोगों ने देख लिया है कि जो कोई परमेश्वर की सेवा करता है, उसे न केवल यह जान लेना चाहिए कि परमेश्वर के वास्ते कैसे कष्ट सहना है, बल्कि उससे भी ज्यादा, उसे यह समझ लेना चाहिए कि परमेश्वर पर विश्वास करना, उसे प्यार करने की तलाश करने के प्रयोजन से है। परमेश्वर द्वारा तुम्हारा उपयोग, सिर्फ तुम्हें शुद्ध करना या तुम्हें पीड़ित करवाना नहीं है, बल्कि उसके कार्यों को तुम्हें ज्ञात करवाना है, मानव जीवन के सच्चे महत्व को ज्ञात करवाना है, और विशेष रूप से तुम्हें यह ज्ञात करवाना है कि परमेश्वर की सेवा करना कोई आसान काम नहीं है। परमेश्वर के कार्य का अनुभव करना, अनुग्रह का आनन्द लेने के बारे में नहीं है बल्कि उसके प्रति तुम्हारे प्रेम के कारण कष्ट सहने के बारे में अधिक है। चूँकि तुम परमेश्वर के अनुग्रह का आनन्द लेते हो, इसलिए तुम्हें परमेश्वर की ताड़ना का भी आनन्द अवश्य लेना चाहिए—तुम्हें इन सभी चीज़ों का अनुभव अवश्य करना चाहिए। तुम परमेश्वर द्वारा प्रबुद्धता को अपने अंदर अनुभव कर सकते हो, और तुम अपने साथ परमेश्वर को व्यवहार करते हुए तथा उसके न्याय का अनुभव भी कर सकते हो। इस प्रकार, तुम सभी पहलुओं का अनुभव करते हो। परमेश्वर ने तुम पर न्याय का काम किया है, और उसने तुम पर ताड़ना का काम भी किया है। परमेश्वर के वचन ने तुम्हारे साथ व्यवहार किया है, लेकिन इसने तुम्हें प्रबुद्ध और रोशन भी किया है। जब तुम भागना चाहते हो, तो परमेश्वर का हाथ तब भी तुम्हें झटके से खींचता है। यह सब तुम्हें यह ज्ञात कराने के लिए है कि मनुष्य के बारे में सब कुछ परमेश्वर की दया पर निर्भर है। तुम सोच सकते हो कि परमेश्वर पर विश्वास करना कष्ट सहने के बारे में है, या उसके लिए कई चीजें करना है, या तुम्हारी देह की शान्ति के लिए है, या इसलिए है कि तुम्हारे साथ सब कुछ ठीक रहे, सब कुछ आरामदायक रहे—परन्तु इनमें से कोई भी ऐसा उद्देश्य नहीं है जिसे परमेश्वर पर विश्वास करने के लिए लोगों में होना चाहिए। यदि तुम ऐसा विश्वास करते हो, तो तुम्हारा दृष्टिकोण गलत है और तुम्हें पूर्ण बनाया ही नहीं जा सकता है। परमेश्वर के कार्य, परमेश्वर की धार्मिक स्वभाव, उसकी बुद्धि, उसके वचन, और उसकी अद्भुतता और अगाधता इन सभी बातों को मनुष्यों को अवश्य समझना चाहिए। इस समझ का उपयोग व्यक्तिगत अनुरोधों, और साथ ही व्यक्तिगत आशाओँ और तुम्हारे हृदय की अवधारणाओं से छुटकारा पाने के लिए करो। केवल इन इन्हें दूर करके ही तुम परमेश्वर के द्वारा माँग की गई शर्तों को पूरा कर सकते हो। केवल इसी के माध्यम से ही तुम जीवन प्राप्त कर सकते हो और परमेश्वर को संतुष्ट कर सकते हो। परमेश्वर पर विश्वास करना उसे संतुष्ट करने के वास्ते और उस स्वभाव को जीने के लिए है जो वह अपेक्षा करता है, ताकि इन अयोग्य लोगों के समूह के माध्यम से परमेश्वर के कार्य और उसकी महिमा को प्रदर्शित किया जा सके। परमेश्वर पर विश्वास करने के लिए और उन लक्ष्यों के लिए जिन्हें तुम्हें खोजना चाहिए, यही सही दृष्टिकोण है। परमेश्वर पर विश्वास करने का तुम्हारा सही दृष्टिकोण होना चाहिए और तुम्हें परमेश्वर के वचनों को प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए। तुम्हें परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने, और सत्य को जीने, और विशेष रूप से उसके व्यवहारिक कर्मों को देखने, सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में उनके अद्भुत कर्मों को देखने, और साथ ही देह में उसके द्वारा किए जाने वाले व्यवहारिक कार्य को देखने में सक्षम होने की आवश्यकता है। अपने वास्तविक अनुभवों के द्वारा, लोग बस इस बात की सराहना कर सकते हैं कि कैसे परमेश्वर उन पर अपना कार्य करता है, उनके प्रति उसकी क्या इच्छा है। यह सब उनके भ्रष्ट शैतानी स्वभाव को दूर करने के लिए है। अपने भीतर की अशुद्धता और अधार्मिकता से मुक्ति पाओ, अपने गलत इरादों को उतार फेंको, और तुम परमेश्वर में सच्चा विश्वास उत्पन्न कर सकते हो। केवल सच्चा विश्वास रख कर ही तुम परमेश्वर को सच्चा प्रेम कर सकते हो। तुम केवल अपने विश्वास की बुनियाद पर ही परमेश्वर से सच्चा प्रेम कर सकते हो। क्या तुम परमेश्वर पर विश्वास किए बिना उसके प्रति प्रेम को प्राप्त कर सकते हैं? चूँकि तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो, इसलिए तुम इसके बारे में नासमझ नहीं हो सकते हो। कुछ लोगों में जोश भर जाता है जैसे ही वे देखते हैं कि परमेश्वर पर विश्वास करना उनके लिए आशीषें लाएगा, परन्तु सम्पूर्ण ऊर्जा को खो देते है जैसे ही वे देखते हैं कि उन्हें शुद्धिकरणों को सहना पड़ेगा। क्या यह परमेश्वर पर विश्वास करना है? अंतत:, अपने विश्वास में परमेश्वर के सामने तुम्हें पूर्ण और अतिशय आज्ञाकारिता हासिल करनी होगी। तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो परन्तु फिर भी उससे माँगें करते हो, तुम्हारी कई धार्मिक अवधारणाएँ हैं जिन्हें तुम छोड़ नहीं सकते हो, तुम्हारे व्यक्तिगत हित हैं जिन्हें तुम जाने नहीं दे सकते हो, और तब भी देह में आशीषों को खोजते हो और चाहते हो कि परमेश्वर तुम्हारी देह को बचाए, तुम्हारी आत्मा की रक्षा करे—ये सब गलत दृष्टिकोण वाले लोगों की अभिव्यक्तियाँ हैं। यद्यपि धार्मिक विश्वास वाले लोगों का परमेश्वर पर विश्वास होता है, तब भी वे स्वभाव-संबंधी बदलाव का प्रयास नहीं करते हैं, परमेश्वर के ज्ञान की खोज नहीं करते हैं, और केवल अपने देह के हितों की ही तलाश करते हैं। तुम में से कई लोगों के विश्वास हैं जो धार्मिक आस्थाओं की श्रेणी से सम्बन्धित हैं। यह परमेश्वर पर सच्चा विश्वास नहीं है। परमेश्वर पर विश्वास करने के लिए लोगों पास उसके लिए पीड़ा सहने वाला हृदय और स्वयं को त्याग देने की इच्छा होनी चाहिए। जब तक वे इन दो शर्तों को पूरा नहीं करते हैं तब तक यह परमेश्वर पर विश्वास करना नहीं माना जाता है, और वे स्वभाव संबंधी परिवर्तनों को प्राप्त करने में सक्षम नहीं होंगे। केवल वे लोग जो वास्तव में सत्य का अनुसरण करते हैं, परमेश्वर के ज्ञान की तलाश करते हैं, और जीवन की खोज करते हैं ऐसे लोग हैं जो वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "पूर्ण बनाए जाने वालों को शुद्धिकरण से अवश्य गुज़रना चाहिए" से उद्धृत

परमेश्वर पर अपने विश्वास में, पतरस ने हर एक बात में परमेश्वर को संतुष्ट करने का प्रयास किया था और उन सब में जो परमेश्वर से आया था, उसमें उसने आज्ञा मानने का प्रयास किया। बिना ज़रा सी भी शिकायत के, वह ताड़ना एवं न्याय, साथ ही साथ शुद्धिकरण, क्लेश एवं अपने जीवन में मौजूद कमी को स्वीकार कर सकता था, उसमें से कुछ भी परमेश्वर के प्रति उसके प्रेम को पलट नहीं सकता था। क्या यह परमेश्वर के लिए चरम प्रेम नहीं है? क्या यह परमेश्वर के एक प्राणी के कर्तव्य की परिपूर्णता नहीं है? चाहे ताड़ना हो, न्याय हो, या क्लेश—तू मृत्यु तक आज्ञाकारिता हासिल करने में सदैव सक्षम हो, यह वह चीज़ है जिसे परमेश्वर के एक प्राणी के द्वारा हासिल किया जाना चाहिए, यह परमेश्वर को प्रेम करने की शुद्धता है। यदि मनुष्य इतना कुछ हासिल कर सकता है, तो वह परमेश्वर का एक योग्य प्राणी है, तथा ऐसा और कुछ नहीं है जो सृष्टिकर्ता की इच्छा को बेहतर ढंग से संतुष्ट कर सकता है। कल्पना कर कि तू परमेश्वर के लिए काम कर सकता है, फिर भी तू परमेश्वर की आज्ञा नहीं मानता है, और सच्चाई से परमेश्वर से प्रेम करने में असमर्थ है। इस रीति से, तूने न केवल परमेश्वर के एक प्राणी के अपने कर्तव्य को नहीं निभाया होगा, बल्कि तू परमेश्वर के द्वारा निन्दित भी किया जाएगा, क्योंकि तू ऐसा व्यक्ति है जो सत्य धारण नहीं करता है, जो परमेश्वर की आज्ञा का पालन करने में असमर्थ है, और जो परमेश्वर के प्रति अनाज्ञाकारी है। तू केवल परमेश्वर के लिए कार्य करने के विषय में परवाह करता है, और सत्य को अभ्यास में लाने, या स्वयं को जानने की परवाह नहीं करता है। तू सृष्टिकर्ता को समझता एवं जानता नहीं है, और सृष्टिकर्ता से प्रेम या उसकी आज्ञा का पालन नहीं करता है। तू ऐसा व्यक्ति है जो स्वाभाविक रूप से परमेश्वर के प्रति अनाज्ञाकारी है, और इसलिए ऐसे लोग सृष्टिकर्ता के प्रिय नहीं है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "सफलता या असफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है" से उद्धृत

परमेश्‍वर पर विश्वास करने में पतरस का मार्ग अपनाने को सारांशित करने के लिए, यह सत्य को खोजने का मार्ग अपनाना है, जो वास्तव में स्वयं को जानना और अपने स्वभाव को बदलने का मार्ग भी है। केवल पतरस के मार्ग पर चलने के द्वारा ही कोई परमेश्वर के द्वारा सिद्ध बनाए जाने के मार्ग पर जा रहा होगा। किसी को भी इस बारे में स्पष्ट अवश्य होना चाहिए कि विशेष रूप से कैसे पतरस का मार्ग अपनाना है और कैसे इसे अभ्यास में लाना है। सबसे पहले, किसी को भी अपने स्वयं के इरादों, अनुचित कार्यों, और यहाँ तक कि अपने परिवार और अपनी स्वयं की देह की सभी चीज़ों को एक ओर रखना होगा। उसे पूर्ण हृदय से समर्पित अवश्य होना चाहिए, अर्थात्, स्वयं को पूरी तरह से परमेश्वर के वचन के प्रति समर्पित करना चाहिए, परमेश्वर के वचन को खाने और पीने पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए, सत्य की खोज पर, परमेश्वर के वचनों में उसके इरादे की खोज पर अवश्य ध्यान केन्द्रित करना चाहिए, और हर चीज़ में परमेश्वर की इच्छा को समझने का प्रयास करना चाहिए। यह अभ्यास की सबसे बुनियादी और अति महत्वपूर्ण पद्धति है। यह वही है जो पतरस ने प्रभु यीशु को देखने के बाद किया था, और केवल इसी तरह से अभ्यास करने से ही कोई सबसे अच्छा परिणाम प्राप्त करता है। परमेश्वर के वचनों के प्रति हार्दिक समर्पण का अर्थ है सत्य की खोज करना, परमेश्वर के वचनों में उसके इरादों की खोज करना, परमेश्वर की इच्छा को समझने पर ध्यान केन्द्रित करना, और परमेश्वर के वचनों से सत्य को समझना तथा और अधिक प्राप्त करना। उसके वचनों को पढ़ते समय, पतरस ने सिद्धांतों को समझने पर ध्यान केंद्रित नहीं किया था और उसने धार्मिक ज्ञान प्राप्त करने पर बिल्कुल भी ध्यान केंद्रित नहीं किया था; इसके बजाय, सच्चाई को समझने और परमेश्वर की इच्छा को समझने पर उसका ध्यान केंद्रित था, उसके स्वभाव और उसकी सुंदरता की समझ को प्राप्त करना। उसने परमेश्वर के वचनों से मनुष्य की विभिन्न भ्रष्ट अवस्थाओं को समझने, और मनुष्य की भ्रष्ट प्रकृति को तथा मनुष्य की कमियों को समझने का भी प्रयास किया, और परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए, उसकी इंसान से अपेक्षित माँगों के सभी पहलुओं को प्राप्त किया। उसके पास परमेश्वर के वचनों के भीतर अनेक सही अभ्यास थे; यह परमेश्वर की इच्छा के सर्वाधिक अनुकूल है, और यह परमेश्वर के कार्य के उसके अनुभव में उसका सर्वोत्तम सहयोग है। ...

यदि कोई अपना कर्तव्य निभाते हुए परमेश्वर को संतुष्ट करने में समर्थ हो जाता है, और अपने कार्यों और क्रियाकलापों में सैद्धांतिक है और सत्य के समस्त पहलुओं की वास्तविकता में प्रवेश कर सकता है, तो वह परमेश्वर द्वारा सिद्ध किया गया एक व्यक्ति होगा। यह कहा जा सकता है कि परमेश्वर का कार्य और उसके वचन इस व्यक्ति के लिए पूरी तरह से प्रभावी हैं, कि परमेश्वर के वचन उसका जीवन बन जाते हैं, वह सच्चाई को प्राप्त करता है, और वह परमेश्वर के वचनों के अनुसार जी सकता है। इसके बाद, उसके देह की प्रकृति, अर्थात, उसके मूल अस्तित्व की नींव, हिलकर ढह जाएगी। जब परमेश्वर के वचन किसी का जीवन बन जाते हैं, तो उसके बाद वह एक नया व्यक्ति बन जाता है। परमेश्वर के वचन उसका जीवन बन जाते हैं; परमेश्वर के कार्य का दर्शन, मनुष्य से उसकी अपेक्षाएँ, मनुष्य का उसका प्रकाशन, और एक सच्चे जीवन के वे मानक जो परमेश्वर अपेक्षा करता है कि मनुष्य प्राप्त करे, उसका जीवन बन जाते हैं—वह इन वचनों और सच्चाइयों के अनुसार जीता है, और यह व्यक्ति परमेश्वर के वचनों द्वारा सिद्ध बन जाता है। परमेश्वर के वचनों के माध्यम से वह पुनर्जन्म का अनुभव करता है और एक नया इंसान बन जाता है। यह वह मार्ग है जिसके द्वारा पतरस ने सत्य की खोज की; यह सिद्ध बनाए जाने, परमेश्वर के वचनों से सिद्ध बनाए जाने, और परमेश्वर के वचनों से जीवन को पाने का मार्ग था। परमेश्वर द्वारा व्यक्त किया गया सत्य उसका जीवन बन गया, और केवल तभी वह एक ऐसा व्यक्ति बना जिसने सत्य को प्राप्त किया।

— "मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "पतरस का मार्ग कैसे अपनाएँ" से उद्धृत

पिछला:बाइबल में अनन्त जीवन का कोई मार्ग नहीं है; यदि मनुष्य बाइबल को थामे रहता है और उसकी आराधना करता है, तो वह अनन्त जीवन को प्राप्त नहीं करेगा।

अगला:बाइबल के साथ कैसे पेश आना चाहिए और उसका उपयोग किस तरह से करना चाहिए कि वह परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप हो? बाइबल का मूलभूत मूल्य क्या है?

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