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43. किसी व्यक्ति के अंत का निर्णय परमेश्वर किस बात पर आधारित करता है?

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

अब वह समय है जब मैं प्रत्येक व्यक्ति का अंत करने का निश्चय करता हूँ, उस चरण का नहीं जिस पर मैंने मनुष्यों पर कार्य आरंभ किया था। मैं अपनी अभिलेख पुस्तक में एक-एक करके, प्रत्येक व्यक्ति के कथनों और कार्यों को, और साथ ही मेरा अनुसरण करने में उनके मार्ग को, उनके अंतर्निहित अभिलक्षणों को और उनके अंतिम प्रदर्शन को लिखता हूँ। इस तरह, किसी भी प्रकार का मनुष्य मेरे हाथ से नहीं बचेगा, और सभी अपने स्वयं के प्रकार के लोगों के साथ होंगे, जैसा मैं उन्हें नियत करूँगा। मैं प्रत्येक व्यक्ति की मंज़िल उसकी आयु, वरिष्ठता, पीड़ा की मात्रा के आधार पर नहीं और जिस हद तक वे दया आकर्षित करते हैं उस पर तो बिल्कल भी नहीं बल्कि इस बात के अनुसार तय करता हूँ कि वे सत्य को धारण करते हैं या नहीं। इसे छोड़कर अन्य कोई विकल्प नहीं है। तुम्हें यह अवश्य समझना चाहिए कि वे सब जो परमेश्वर की इच्छा का अनुसरण नहीं करते हैं, दण्डित किए जाएँगे। यह एक अडिग तथ्य है। इसलिए, वे सब जो दण्ड पाते हैं, वे परमेश्वर की धार्मिकता के कारण और अपने अनगिनत बुरे कार्यों के प्रतिफल के रूप में इस तरह से दण्ड पाते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "अपनी मंज़िल के लिए पर्याप्त संख्या में अच्छे कर्मों की तैयारी करो" से उद्धृत

मनुष्यों के विश्राम में प्रवेश करने से पहले, हर एक व्यक्ति का दण्ड या पुरस्कार पाना यह इस बात पर आधारित होगा कि क्या वे सत्य की खोज करते हैं, क्या वे परमेश्वर को जानते हैं, क्या वे साक्षात् परमेश्वर की आज्ञा का पालन कर सकते हैं। वे जिन्होंने साक्षात् परमेश्वर को सेवाएँ दीं, पर उसे नहीं जानते या आज्ञापालन नहीं करते हैं, उनमें सत्य नहीं है। ये लोग कुकर्मी हैं, और कुकर्मी निःसंदेह दण्डित किए जाएँगे। इससे अधिक, वे अपने बुरे आचरण के अनुसार दण्ड पाएँगे। परमेश्वर मनुष्यों द्वारा विश्वास किये जाने के लिए है, और वह मनुष्यों के द्वारा आज्ञापालन किये जाने योग्य भी है। वे लोग जो केवल अस्पष्ट और अदृश्य परमेश्वर पर विश्वास करते हैं वे लोग परमेश्वर पर विश्वास नहीं करते हैं, और वे परमेश्वर की आज्ञा मानने में भी असमर्थ हैं। यदि ये मनुष्य साक्षात् परमेश्वर पर विश्वास नहीं कर पाते, और उसके विजयी किए जाने के कार्य के पूरा होने तक अवज्ञाकरते रहते हैं और परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं—जो देह में दृश्यमान है, तो ये सबसे अधिक अस्पष्ट लोग हैं, और निःसंदेह नष्ट किये जाएँगे। यह उसी प्रकार है जैसे तुम लोगों के बीच यदि कोई मौखिक रूप में देहधारी परमेश्वर को मानता है, परंतु देहधारी परमेश्वर के प्रति सत्य को अमल में नहीं ला पाता है, तो वह अंत में निकाल दिया जाएगा और नष्ट कर दिया जाएगा और यदि कोई मौखिक रूप में साक्षात् परमेश्वर को मानता है और देहधारी परमेश्वर द्वारा अभिव्यक्त सत्य को खाता और पीता है परंतु फिर भी अस्पष्ट और अदृश्य परमेश्वर को खोजता है, तो भविष्य में और भी अधिक उसका नाश किया जाएगा। इन लोगों में से कोई भी, परमेश्वर का कार्य पूरा होने व उसके विश्राम का समय आने तक नहीं बच सकता है; विश्राम के समय जो लोग बच जाएँगे, उनमें इन लोगों के समान कोई भी नहीं होगा। दुष्ट लोग वे हैं जो सत्य पर अमल नहीं करते, उनका मूल तत्व प्रतिरोध करना और परमेश्वर की अवज्ञा करना है, उनमें परमेश्वर की आज्ञा मानने की लेशमात्र भी इच्छा नहीं है। ऐसे सभी लोग नष्ट होंगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे" से उद्धृत

पृथ्वी पर मेरे अनुयायी होने के लिए मैंने कई लोगों को खोजा है। इन सभी अनुयायियों में, ऐसे लोग हैं जो याजकों की तरह सेवा करते हैं, जो अगुवाई करते हैं, जो बेटों को आकार देते हैं, जो लोगों का गठन करते हैं और जो सेवा करते हैं। मैं उन्हें उस वफ़ादारी के अनुसार, जो वे मेरे प्रति दिखाते हैं, भिन्न-भिन्न श्रेणियों में विभाजित करता हूँ। जब सभी मनुष्यों को उनके प्रकार के अनुसार वर्गीकृत कर दिया जाएगा, अर्थात्, जब प्रत्येक प्रकार के मनुष्य की प्रकृति स्पष्ट कर दी जाएगी, तब मैं उनके उचित प्रकार के बीच प्रत्येक मनुष्य की गिनती करूँगा और प्रत्येक प्रकार को उसके उपयुक्त स्थान पर रखूँगा ताकि मैं मानवजाति के उद्धार के अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकूँ।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "बुलाए गए लोग बहुत हैं, परन्तु चुने हुए कुछ ही हैं" से उद्धृत

परमेश्वर मनुष्य के परिणाम को निर्धारित करने के लिए परीक्षणों का उपयोग करता है। मनुष्य के परिणाम को निर्धारित करने हेतु परीक्षणों का उपयोग करने के दो मानक हैं: पहला परीक्षणों की संख्या जिनसे होकर लोग गुज़रते हैं, और दूसरा इन परीक्षणों में लोगों का परिणाम है। ये दो संकेतक हैं जो मनुष्य के परिणाम को निर्धारित करते हैं। अब हम इन दो मानकों पर सविस्तार बात करेंगे।

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... जब तुम अपरिपक्व होगे, तब परमेश्वर तुम्हें एक बहुत ही निम्न मानक देगा; जब तुम्हारी कद-काठी थोड़ी बड़ी होगी, तब परमेश्वर तुम्हें थोड़ा ऊँचा मानक देगा। परन्तु जब तुम समस्त सच्चाईयों को समझ जाओगे तो उसके पश्चात् परमेश्वर क्या करेगा? परमेश्वर तुमसे और भी अधिक बड़े परीक्षणों का सामना करवाएगा। इन परीक्षणों के बीच, परमेश्वर जो कुछ पाना चाहता है, परमेश्वर जो कुछ देखना चाहता है वह परमेश्वर के बारे में तुम्हारा गहरा ज्ञान और तुम्हारा सच्चा भय है। इस समय, तुमसे परमेश्वर की माँगें उस समय की अपेक्षा और अधिक ऊँची और "अधिक कठोर" होंगी जब तुम्हारी कद-काठी अधिक अपरिपक्व थी (ध्यान दो: लोग इसे कठोर के रूप में देखते हैं, परन्तु परमेश्वर इसे तर्कसंगत के रूप में देखता है)। जब परमेश्वर लोगों के परीक्षण कर रहा है, तो परमेश्वर किस प्रकार की वास्तविकता की रचना करना चाहता है? परमेश्वर लगातार माँग कर रहा है कि लोग अपना हृदय उसे दें। ...जब परमेश्वर तुम्हारी कोई परीक्षा लेता है, तब परमेश्वर देखता है कि क्या तुम्हारा हृदय परमेश्वर के साथ है, शरीर के साथ है, या शैतान के साथ है। जब परमेश्वर तुम्हारी कोई परीक्षा लेता है, तब परमेश्वर देखता है कि क्या तुम परमेश्वर के विरोध में खड़े हो या तुम ऐसी स्थिति में खड़े हो जो परमेश्वर के अनुरूप है, और वह यह देखता है कि तुम्हारा हृदय उसकी तरफ है या नहीं। जब तुम अपरिपक्व होते हो और परीक्षणों का सामना कर रहे होते हो, तब तुम्हारा आत्मविश्वास बहुत ही नीचे होता है, और तुम ठीक-ठीक नहीं जान सकते हो कि वह क्या है जिसकी परमेश्वर के इरादों को संतुष्ट करने के लिए तुम्हें करने की आवश्यकता है क्योंकि तुम्हें सत्य की एक सीमित समझ है। इन सबके बावजूद, तुम तब भी ईमानदारी से और सच्चाई से परमेश्वर से प्रार्थना कर सकते हो, परमेश्वर को अपना हृदय देने के लिए तैयार हो सकते हो, परमेश्वर को अपना अधिपति बना सकते हो, और परमेश्वर को उन चीज़ों को अर्पित करने के लिए तैयार हो सकते हो जिन्हें तुम अत्यंत बहुमूल्य मानते हो। यही परमेश्वर को पहले से ही अपना हदय देना है। जब तुम अधिकाधिक धर्मोपदेश को सुनोगे, और तुम अधिकाधिक सत्य को समझोगे, तो तुम्हारी कद-काठी भी धीरे-धीरे परिपक्व हो जाएगी। वह मानक जिसकी माँग इस समय परमेश्वर तुमसे करता है वही नहीं रहती है जो तब थी जब तुम अपरिपक्व थे; वह उसकी अपेक्षा अधिक ऊँचे मानक की माँग करता है। जब धीरे-धीरे मनुष्य का हृदय परमेश्वर को दे दिया जाता है, तो यह परमेश्वर के निकटतर और निकटतर आ जाता है; जब मनुष्य सचमुच में परमेश्वर के निकट आ सकते हैं, तो उनके पास उत्तरोत्तर ऐसा हदय होता है जो उसका भय मानता है। परमेश्वर को इस प्रकार का हदय चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर के स्वभाव और उसके कार्य के परिणाम को कैसे जानें" से उद्धृत

एक कहावत है जिस पर तुम लोगों को ध्यान देना चाहिए। मेरा मानना है कि यह कहावत अत्यधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह मेरे मन में हर दिन अनगिनत बार आती है। ऐसा क्यों है? क्योंकि हर बार जब मेरा किसी से सामना होता है, हर बार जब किसी की कहानी को सुनता हूँ, हर बार जब मैं किसी के अनुभव को या परमेश्वर में विश्वास करने की उनकी गवाही को सुनता हूँ, तो मैं इस बात का अंदाज़ा लगाने के लिए इस कहावत का उपयोग करता हूँ कि यह व्यक्ति उस प्रकार का व्यक्ति है या नहीं जिसे परमेश्वर चाहता है, उस प्रकार का व्यक्ति है या नहीं जिसे परमेश्वर पसंद करता है। तो फिर वह कहावत क्या है? ...यह है "परमेश्वर के मार्ग में चलें: परमेश्वर का भय मानें और दुष्टता से दूर रहें।" क्या यह अत्यंत सरल वाक्यांश नहीं है? हालाँकि यह कहावत सरल हो सकती है, तब भी कोई व्यक्ति जिसके पास असल में इसकी गहरी समझ है वह महसूस करेगा कि इसका बड़ा महत्व है; कि अभ्यास करने के लिए इसका बड़ा मूल्य है; कि सत्य की वास्तविकता के साथ यह जीवन की भाषा है; कि यह उनके लिए प्रयास करने हेतु जीवनपर्यन्त उद्देश्य है जो परमेश्वर को संतुष्ट करने की खोज करते हैं; कि यह किसी ऐसे व्यक्ति के द्वारा अनुसरण करने हेतु जीवनपर्यन्त मार्ग है जो परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशील हैं। ...मैं इस कहावत पर चर्चा क्यों करता हूँ? तुम लोगों के दृष्टिकोण, या जो तुम लोग क्या सोचोगे इसकी परवाह किए बिना, मुझे इस कहावत पर चर्चा करनी है क्योंकि यह इस बात के अत्यंत प्रासंगिक है कि किस प्रकार परमेश्वर मनुष्य के परिणामों को निर्धारित करता है। इस कहावत के बारे में तुम लोगों की वर्तमान समझ चाहे कुछ भी क्यों न हो, या तुम सब इससे कैसा भी व्यवहार क्यों न करते हो, मैं तब भी तुम लोगों को बताने जा रहा हूँ: यदि कोई व्यक्ति इस कहावत का उचित तराके से अभ्यास कर सकता है और परमेश्वर का भय मानने और दुष्टता से दूर रहने के मानक को प्राप्त कर सकता है, तो उसे जीवित बचे हुए इंसान के रूप में आश्वस्त किया जाता है, तो उसे किसी ऐसे व्यक्ति के रूप में आश्वस्त किया जाता है जिसके पास एक अच्छा परिणाम होता है। यदि तुम उस मानक को प्राप्त नहीं कर सकते हो जिसे इस कहावत के द्वारा रखा गया है, तो ऐसा कहा जा सकता है कि तुम्हारा परिणाम अज्ञात है। इस प्रकार मैं तुम लोगों की स्वयं की मानसिक तैयारी के लिए इस कहावत के बारे में तुम लोगों से कहता हूँ, और जिससे तुम लोग जान लो कि तुम लोगों को मापने के लिए परमेश्वर किस प्रकार के मानक का उपयोग करता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर के स्वभाव और उसके कार्य के परिणाम को कैसे जानें" से उद्धृत

प्रत्येक व्यक्ति का मूलतत्व तय करेगा कि उनका नाश किया जाएगा या नहीं, इसका निर्धारण उनके आचरण में प्रकट उनके मूलतत्व और उनकी सत्य की खोज में प्रकट होता है। उन लोगों में जो यही कार्य करते हैं और उतने ही परिमाण में कार्य करते हैं, वे लोग जिनका मानवीय मूलतत्व अच्छा है, और जो सत्य धारण करते हैं, वे ही लोग बच सकते हैं, परंतु वे जिनके मानवीय मूलतत्व बुरे हैं और जो साक्षात् परमेश्वर की आज्ञा का उल्लंघन करते हैं, वे नष्ट कर दिये जाएँगे। मनुष्य की नियति के संबंध में परमेश्वर के कोई भी कार्य या वचन, मनुष्यों के मूलतत्व के आधार पर उचित रीति से प्रत्येक मनुष्य में कार्य करते हैं, वहाँ कोई संयोग नहीं है, और निश्चय ही लेशमात्र भी त्रुटि नहीं है। केवल जब एक मनुष्य कार्य करेगा तब मनुष्य की भावनाएँ या अर्थ उसमें मिश्रित होंगे। परमेश्वर जो कार्य करता है, वह सबसे अधिक उपयुक्त होता है, वह निश्चित तौर पर किसी प्राणी के विरुद्ध झूठे दावे नहीं करेगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे" से उद्धृत

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