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सहता है बहुत से कष्ट परमेश्वर इंसान को बचाने को

I

बहुत पहले दुनिया में आया परमेश्वर

इंसानों की तरह मुसीबत उठाई है उसने।

बरसों इंसानों के साथ रहा है वो, मगर उसका वजूद खोजा नहीं किसी ने।

उस काम को करते हुए जो साथ लाया है,

सहता है चुपचाप दुनिया की तकलीफ़ें।

उस काम को करते हुए जो साथ लाया है,

सहता है चुपचाप दुनिया की तकलीफ़ें।

बहुत पहले दुनिया में आया परमेश्वर

इंसानों की तरह मुसीबत उठाई है उसने।

इंसानियत की ख़ातिर, परमपिता की इच्छा की ख़ातिर

वो सहता है, दुख उठाता है, परमपिता की इच्छा की ख़ातिर।

दीन बनकर, ख़ामोशी से करता है सेवा इंसान की,

परमपिता की इच्छा की ख़ातिर।

II

देहधारी हुआ है अब की बार, अधूरे काम को पूरा करने।

लाया है न्याय सबके लिए, और इस युग को समापन की ओर ले जाने।

जीतता है इंसान को वो, बचाता है दुखों और अंधेरों की जकड़ से उन्हें।

और स्वभाव उनका बदलता है।

न कभी शिकायत की, न कोई मांग की कभी उसने।

योजना के मुताबिक वो करता रहे काम,

इसलिये सबकुछ सहा उसने।

इंसान के हित में गुज़ारी हैं उसने, जागकर सभी रातें।

शिखर से निम्नतम गहराइयों तक, रहा है ज़िंदा-नर्क में संग उनके।

सहा है उसने दुनिया का अपमान, ताकि इंसान को मिले आराम।

आया है शेर की माँद में वो, इंसान को बचाने, इंसान को बचाने,

इंसान को बचाने, इंसान को बचाने, इंसान को बचाने, इंसान को बचाने।

"वचन देह में प्रकट होता है" से

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