अंतिम दिनों के मसीह के कथन- संकलन

विषय-वस्तु

परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III

इन अनेक सभाओं ने प्रत्येक व्यक्ति पर एक बड़ा प्रभाव डाला है। अब तक तो, लोग वास्तव में परमेश्वर के सच्चे अस्तित्व का एहसास कर पाये होंगे और यह कि परमेश्वर वास्तव में उन के अति निकट है। यद्यपि लोगों ने बहुत सालों से परमेश्वर पर विश्वास किया है, फिर भी उन्होंने उसके विचारों और युक्तियों को सचमुच में कभी भी वैसा नहीं समझा है जैसा वे अब समझते हैं, और ना ही उन्होंने उसके व्यावहारिक कार्यों को सचमुच में वैसा अनुभव किया है जैसा वे अब करते हैं। चाहे उस का ज्ञान हो या वास्तविक अभ्यास, अधिकतर लोगों ने कुछ नया सीखा है और एक ऊँची समझ को प्राप्त किया है, और भूतकाल में जो कुछ वे स्वयं कर रहे थे उस में हुई ग़लती को महसूस किया है,अपने अनुभव के छिछलेपन का एहसास किया है और यह कि किसी चीज़ की अत्यंत परमेश्वर के इच्छानुसार नहीं होता है, और यह महसूस किया कि जिस बात की मनुष्य में सब से ज़्यादा कमी है वह है परमेश्वर के स्वभाव का ज्ञान। लोगों के लिए ऐसा ज्ञान एक प्रकार का भावनात्मक ज्ञान है; ताकि तर्कसंगत ज्ञान के स्तर तक ऊँचा उठ सकें जिसे अपने अनुभवों के द्वारा धीरे धीरे गहरा और बलवंत हाने की जरूरत है। मनुष्य के द्वारा सचमुच में परमेश्वर को समझने से पहले, आत्म चेतना के सम्बंध में ऐसा कहा जा सकता है कि वे अपने हृदय में परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास करते हैं, परन्तु उन के पास विशेष प्रश्नों की वास्तविक समझ नहीं है जैसे वह वास्तव में किस प्रकार का परमेश्वर है, उस की इच्छा क्या है, उस का स्वभाव क्या है, और मानव जाति के प्रति उस की वास्तविक मनोवृत्तिक्या है। यह वृहद रूप से लोगों के परमेश्वर पर के विश्वास के साथ समझौता करता है - उन का विश्वास साधारण तौर पर शुद्धता और सिद्धता हासिल नहीं कर सकता है। भले ही आप परमेश्वर के वचन के आमने सामने हों, या यह महसूस करें कि आपने अपने अनुभवों के द्वारा परमेश्वर का सामना किया है, फिर भी यह कहा नहीं जा सकता है कि आपने पूर्णत: उसे समझा है। क्योंकि आप परमेश्वर के विचारों को नहीं जानते हैं, या वह किस से प्रेम करता है और क्या नफरत करता है, उसे क्या क्रोधित करता है और किस से उसे आनन्द मिलता है, आपके पास उस की सही समझ नहीं है। आप का विश्वास धुँधलाहट और कल्पना की नींव पर बना हुआ है और आप के आत्म चेतना सम्बंधी इच्छाओं पर आधारित है। यह अभी भी एक प्रमाणिक विश्वास से दूर है, और आप अभी भी एक सच्चे अनुयायी बनने से दूर हैं। बाइबल की इन कहानियों के उदाहरणों की व्याख्याओं ने मनुष्यों को परमेश्वर के दिल को जानने में मदद की है, कि अपने कार्य के हर कदम पर वह क्या सोच रहा था और उसने इस कार्य को क्यों किया, और जब उसने ऐसा किया तो उसकी मूल इच्छा और योजना क्या थी, उसने अपने विचारों को कैसे प्राप्त किया, और उसने अपनी योजना को कैसे तैयार किया और उसे कैसे विकसित किया।इन कहानियों के द्वारा, हम परमेश्वर के छः हज़ार सालों के प्रबन्धकारणीय कार्य के दौरान उसकी प्रत्येक विशिष्ट इच्छा और प्रत्येक वास्तविक विचार, और विभिन्न समयों और विभिन्न युगों में मनुष्यों के प्रति उस की मनोव्र्तियाँकी एक विस्तृत और विशिष्ट समझ प्राप्त कर सकते हैं। परमेश्वर क्या सोच रहा था, उसकी मनोव्र्तियाँक्या थी, और वह स्वभाव क्या था जिसे उसने प्रकट किया जब उसने हर एक परिस्थिति का सामना किया, इसे समझने से हर एक व्यक्ति को उसके सच्चे अस्तित्व को और गहराई से महसूस करने में मदद मिल सकती है, और वह उस की यथार्थता और प्रमाणिकता का और गहराई से एहसास कर सकता है। इन कहानियों को बताने का मेरा उद्देश्य यह नहीं है कि लोग बाइबल की कहानियों को समझ सकें, और ना ही यह है कि लोगों को बाइबल की पुस्तकों से या उस में दिए गए लोगों से परिचित होने में सहायता मिले, और यह विशिष्ट रूप से इसलिए भी नहीं है कि लोगों को बाइबल की पृष्ठभूमि को समझने में मदद मिल सके कि परमेश्वर ने व्यवस्था के युग के दौरान क्या किया था। यह इसलिए है ताकि परमेश्वर की इच्छा, उसके स्वभाव, और उसके छोटे से छोटे भाग को समझने में लोगों को मदद मिल सके, और परमेश्वर के और अधिक प्रमाणिक और अधिक सटीक समझ और ज्ञान को प्राप्त कर सकें। इस रीति से लोगों का हृदय थोड़ा थोड़ा करके परमेश्वर के लिए खुल जाता है, और वे परमेश्वर के करीब आ जाते हैं और वे बेहतर रीति से उसे, उसके स्वभाव, उसके सार तत्व को समझ सकते हैं, और स्वयं सच्चे परमेश्वर को अच्छे से जान सकते हैं।

परमेश्वर के स्वभाव और जो उसके पास है और जो वह है उसके ज्ञान का मनुष्यों के ऊपर एक सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। इस से उन्हें परमेश्वर पर और अधिक विश्वास करने में मदद मिल सकती है, और उसके प्रति सच्ची आज्ञाकारिता और भय प्राप्त करने में उन की मदद कर सकता है। तब, वे आगे से अन्धे अनुयायीनहीं होंगे, या अँधेपन से उसकी आराधना नहीं करेंगे। परमेश्वर मूर्खों को और उन्हें नहीं चाहता है जो अँधेपन से भीड़ का अनुसरण करते हैं, परन्तु लोगों का एक समूह जिन के हृदय में परमेश्वर के स्वभाव की एक स्पष्ट समझ और ज्ञान है और जो परमेश्वर के गवाह के रूप में कार्य कर सकते हैं, ऐसे लोग जो परमेश्वर के प्रेमीपन के कारण, और जो उसके पास है और जो वह है उसके कारण, और उसके धर्मी स्वभाव के कारण परमेश्वर को कभी भी नहीं त्यागेंगे। परमेश्वर के अनुयायी होते हुए, यदि आप के हृदय में अभी भी स्पष्टता की कमी है, या परमेश्वर के सच्चे अस्तित्व, उसके स्वभाव, जो उसके पास है और जो वह है, और मानव जाति के उद्धार की उसकी योजना के बारे में अनिश्चितता या भ्रम है, तो आप के विश्वास ने परमेश्वर की तारीफ को प्राप्त नहीं किया है। परमेश्वर नहीं चाहता कि इस प्रकार के लोग उसका अनुसरण करें, और परमेश्वर यह भी पसंद नहीं करता है कि इस प्रकार के लोग उसके सामने आएँ। क्योंकि इस प्रकार का व्यक्ति परमेश्वर को नहीं समझता है, वे अपना हृदय परमेश्वर को नहीं दे सकते हैं-उनका हृदय उसके लिए बंद है, इस प्रकार परमेश्वर के प्रति उनका विश्वास अशुद्धता से भरा हुआ है। उनके द्वारा परमेश्वर का अनुसरण किए जाने को केवल अंधापन ही कहा जा सकता है। लोग केवल तभी सच्चा विश्वास प्राप्त कर सकते हैं और सच्चे अनुयायी बन सकते हैं यदि उनके पास परमेश्वर की सच्ची समझ और ज्ञान हो, जो उसकी सच्ची आज्ञाकारिता और उसके भय को उत्पन्न करता है। केवल इसी रीति से वे अपना हृदय परमेश्वर को दे सकते हैं, और उसके लिए अपना दिल खोल सकते हैं। यही है जो परमेश्वर चाहता है, क्योंकि वे जो कुछ करते हैं और सोचते हैं उससे वे परमेश्वर की परीक्षा में खड़े रह सकते हैं, और परमेश्वर के लिए गवाही दे सकते है। परमेश्वर के स्वभाव, या जो उसके पास है और जो वह है, या जो कुछ वह करता है हर चीज़ में उसकी इच्छा और उसके विचारों के सम्बंध में सबकुछ जो मैं ने आप से कहा है,और मैं ने चाहे किसी भी नज़रिए से, या चाहे किसी भी कोण से इस के बारे में बात की है, यह सब कुछ आप की मदद के लिए है ताकि आप परमेश्वर के सच्चे अस्तित्व को लेकर और अधिक निश्चित हो जाएँ, और मानव जाति के लिए उसके प्रेम को सचमुच में और अधिक समझें और सराहें, और मनुष्यों के लिए परमेश्वर की चिन्ता और मानव जाति को बचाने और उसके प्रबन्ध के लिए उस की निश्कपट इच्छा को सचमुच में और अधिक समझें और तारीफ करें।

आज हम सब से पहले परमेश्वर के विचारों, युक्तियों, और मनुष्यों की सृष्टि के समय से लेकर अब तक के प्रत्येक कार्य को संक्षिप्त करने जा रहे हैं, और उसने संसार की रचना से लेकर अनुग्रह के युग के आधिकारिक प्रारम्भ तक क्या कार्य किया था उस पर एक नज़र डालने जा रहे हैं। तब हम परमेश्वर के उन विचारों और युक्तियों की खोज करेंगे जो मनुष्यों के लिए अन्जान हैं, और वहाँ से हम प्रबन्धन के लिए परमेश्वर की योजना के क्रम को स्पष्ट कर सकते हैं, और उस सन्दर्भ को विस्तारपूर्वक समझ सकते हैं जिस के तहत परमेश्वर ने अपने प्रबन्धन के कार्य, उसके स्रोत और विकास की प्रक्रिया को बनाया था, और विस्तारपूर्वक समझ सकते हैं कि वह अपने प्रबन्धकारणीय कार्य से किस प्रकार के परिणामों को चाहता है - अर्थात्, उसके प्रबन्धन के कार्य का केन्द्र एवं उद्देश्य। इन चीज़ों को समझने के लिए हमें सुदूर, खामोश और शांत समय में जाने की आवश्यकता है जब कोई मनुष्य नहीं था...

जब परमेश्वर अपने सेज से उठा, पहला विचार जो उसके मन में आया वह यह थाः एक जीवित, वास्तविक और जीवित मनुष्य को बनाए - ऐसा कोई जिस के साथ वह रहे और उसका निरन्तर साथी बने। वह व्यक्ति उसे सुन सके, और परमेश्वर उस पर भरोसा कर सके और उसके साथ बात कर सके। तब, पहली बार, परमेश्वर ने एक मुट्ठी धूल लिया और सब से पहला जीवित व्यक्ति बनाने के लिए उस का प्रयोग किया जिस की उस ने कल्पना की थी, और तब उस जीवित प्राणी को एक नाम दिया - आदम। एक बार जब परमेश्वर ने इस जीवित और साँस लेते हुए प्राणी को प्राप्त कर लिया था, तो उसने कैसा महसूस किया था? पहली बार, उसे किसी प्रेम करनेवाले, एक साथी को पाने का आनन्द प्राप्त हुआ। उसने पहली बार एक पिता होने काउत्तरदायित्व का भी एहसास किया और उस चिन्ता का भी जो उसके साथ आया था। यह साँस लेता हुआ प्राणी परमेश्वर के लिए प्रसन्नता और आनन्द लेकर आया; उस ने पहली बार सन्तुष्टि का अनुभव किया। यह वह पहली चीज़ थी जिसे परमेश्वर ने बनाया था जिसे परमेश्वर ने अपने विचारों या वचनों से नहीं बनाया था, किन्तु स्वयं अपने दोनों हाथों से बनायाथा। जब इस प्रकार की हस्ती-एक जीवित और साँस लेता व्यक्ति - परमेश्वर के सामने खड़ा हो गया, लहू और माँस से बना हुआ, शरीर और आकार के साथ, और परमेश्वर से बातचीत करने में सक्षम था, उसने एक प्रकार का आनन्द महसूस किया जिसे उसने कभी भी महसूस नहीं किया था। उसने सचमुच में अपनाउत्तरदायित्व का एहसास किया और यह जीवित प्राणी ना केवल उसके हृदय से जुड़ गया था, बल्कि उसकी हर एक छोटी सी हलचल ने उसे छू भी लिया और उसके हृदय को गर्मजोशी से भर दिया था।इस प्रकार जब यह जीवित प्राणी परमेश्वर के सामने खड़ा हुआ तब पहली बार उसने यह विचार किया कि इस तरह के और लोगों को प्राप्त किया जाए।यह घटनाओं का सिलसिला था जो उस पहले विचार के साथ प्रारम्भ हुआ जो परमेश्वर के पास था। परमेश्वर के लिए, यह सभी घटनाएँ पहली बार घटित हो रही थीं, परन्तु इन पहली घटनाओं में, इस से फर्क नहीं पड़ता कि उसने उस समय कैसा महसूस किया था - आनन्द, उत्तरदायित्व, चिन्ता - वहाँ उसके पास कोई नहीं था जिससे वह उन्हें बाँट सके। उस पल के प्रारम्भ से ही, परमेश्वर ने सचमुच में अकेलेपन और उदासी का एहसास किया जिसे उसने पहले कभी भी महसूस नहीं किया था। उसे लगा कि मानव जाति उस के प्रेम और चिन्ता, और मानव जाति के लिए उसकी इच्छा को स्वीकार या समझ नहीं सकते हैं, इसलिए उसने अपने हृदय में दुख और दर्द का अनुभव किया। यद्यपि उसने इन चीज़ों को मनुष्य के लिए बनाया था, फिर भी मनुष्य इस के प्रति जागरूक नहीं था और उसे नहीं समझा। प्रसन्नता के अलावा, वह आनन्द और संतुष्टि जिसे मनुष्य उस के लिए लेकर आया था वह शीघ्रता से उसके लिए उदासी और अकेलेपन के प्रथम एहसास को भी साथ लेकर आया। ये उस समय परमेश्वर के विचार और एहसास थे। जब परमेश्वर यह सब कुछ कर रहा था, वह अपने हृदय में आनन्द से दुख की ओर और दुख से दर्द की ओर चला गया, सब कुछ तनाव में घुल मिल गया। वो बस यही सब चाहता था कि जितना जल्दी हो सके यह व्यक्ति, यह मानव जाति जो कुछ उसके दिल में था उसे जान ले और उसकी इच्छाओं को शीघ्रता से समझ ले। तब, वे उसके अनुयायी बन सकते हैं और उसके साथ एक मेल में हो सकते हैं। वे आगे से परमेश्वर को बोलते हुए नहीं सुनेंगे लेकिन खामोश बने रहेंगे; वे आगे से अनजान नहींहोंगे कि कैसे परमेश्वर के साथ उसके कार्य में जुड़ें; सब से बढ़कर, वे आगे से परमेश्वर की आवश्यकताओं को लेकर उदासीन लोग नहीं होंगे। ये पहली चीज़ें जिन्हें परमेश्वर ने बनाया बहुत ही अर्थपूर्ण हैं और उसके प्रबन्धन की योजना के लिए और आज मनुष्यों के लिए बड़ा मूल्य रखते हैं।

सभी चीज़ों और मनुष्यों की सृष्टि करने के बाद, परमेश्वर ने आराम नहीं किया। अपने प्रबन्धन को पूरा करने के लिए वह इन्तज़ार ना कर सका, और ना ही वह ऐसे लोगों को हासिल करने का इन्तज़ार कर सका जिन्हें उस ने मनुष्यों में से सब से ज़्यादा प्यार किया था।

अगला, परमेश्वर के द्वारा मनुष्यों को रचने के कुछ ही समय बाद, हम बाइबल में देखते हैं कि पूरे संसार में एक बड़ा जल प्रलय आया था। जल प्रलय के लेखे में नूह का जिक्र है, और ऐसा कहा जा सकता है कि नूह वह पहला व्यक्ति था जिस ने परमेश्वर के एक कार्य को पूरा करने हेतु उसके साथ काम करने के लिए परमेश्वर की बुलाहट को ध्यान से सुना था। हाँ वास्तव में, यह पहली बार ही था जब परमेश्वर ने पृथ्वी पर से एक इंसान को अपनी आज्ञानुसार कुछ करने के लिए बुलाया था। जब नूह ने जहाज़ बना लिया था, परमेश्वर ने पहली बार पृथ्वी पर जल प्रलय भेजा। जब परमेश्वर ने पृथ्वी को जल प्रलय से नष्ट कर दिया था, तो यह उनकी सृष्टि के समय से लेकर अब तक पहली बार हुआ था कि उसने अपने आप को मानव जाति के प्रति घृणा से भरा हुआ महसूस किया था; यह वही बात है जिस ने परमेश्वर को इस मानव जाति को जल प्रलय के द्वारा नष्ट करने हेतु दर्दनाक निर्णय लेने के लिए मजबूर किया था। जल प्रलय के द्वारा पृथ्वी को नष्ट करने के बाद, परमेश्वर ने मनुष्यों के साथ अपनी पहली वाचा बाँधी कि वह ऐसा फिर कभी भी नहीं करेगा। उस वाचा का चिन्ह एक मेघधनुष था। यह मानव जाति के साथ परमेश्वर की पहली वाचा थी, इस प्रकार वह मेघधनुष परमेश्वर के द्वारा दी गई वाचा का पहला चिन्ह था; यह मेघधनुष एक वास्तविक, और भौतिक चीज़ है जो अस्तित्व में बना रहता है। यह इस मेघधनुष का ही अस्तित्व है जिस के कारण परमेश्वर पिछली मानव जाति के लिए, जिसे उसने खो दिया था, अक्सर उदास हो जाता है, और निरन्तर उसे स्मरण दिलाने वाली चीज़ के रूप में काम करता है कि उनके साथ क्या हुआ था। ...परमेश्वर अपने पैरों की गति को धीमा नहीं करेगा-वह अपने प्रबन्धन में अगला कदम उठाने का इन्तज़ार नहीं कर सकता है। तत्पश्चात्, परमेश्वर ने सम्पूर्ण इस्राएल में अपने कार्य को करने के लिए अपने प्रथम चुनाव के रूप में इब्राहीम को नियुक्त किया था। यह पहली बार था जब परमेश्वर ने ऐसे एक उम्मीदवार को चुना था। परमेश्वर ने निर्णय लिया कि इस व्यक्ति के द्वारा मानव जाति को बचाने के लिए अपने कार्य को किया जाए, और लगातार उसकी पीढ़ियों के साथ अपने कार्य को करता जाए। हम बाइबल में देख सकते हैं कि यह वही है जो परमेश्वर ने इब्राहीम के साथ किया था। तब सर्वप्रथम परमेश्वर ने इस्राएल को अपनी चुनी हुई भूमि बनाया, और अपने चुने हुए लोगों, इस्राएलियों के द्वारा व्यवस्था के युग के अपने कार्य को प्रारम्भ किया। एक बार फिर, परमेश्वर ने इस्रालियों को पहली बार स्पष्ट नियम और व्यवस्थाएँ प्रदान किया था जिन का अनुसरण मानव जाति को करना था, और उन्हें विस्तार से समझाया था। यह पहली बार था जब परमेश्वर ने मनुष्यों को ऐसे विशिष्ट, ऊँचे स्तर के नियम प्रदान किए थे कि उन्हें किस प्रकार बलिदान करना चाहिए, उन्हें किस प्रकार जीना है, उन्हें क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए, उन्हें किन त्योहारों और दिनों को मानना है, और वह हर चीज़ जो वे करते हैं उस में किन सिद्धांतों का अनुसरण करना है। यह पहली बार था जब परमेश्वर ने मानव जाति को उन के जीवनों के लिए ऐसा विस्तृत, ऊँचे स्तर के विधि विधान और सिद्धांत दिए थे।

जब मैं कहता हूँ "पहली बार," तो इस का मतलब है कि परमेश्वर ने इस तरह का कार्य पहले कभी भी पूरा नहीं किया था। यह कुछ ऐसा है जो पहले अस्तित्व में नहीं था, और यद्यपि परमेश्वर ने मानव जाति को सृजा था और उसने सब प्रकार के जीवों और जीवित प्राणियों को सृजा था, फिर भी उसने उस प्रकार का कार्य कभी भी पूरा नहीं किया था। इन सभी कार्यों में परमेश्वर के द्वारा मनुष्यों का प्रबन्ध शामिल था; इन सभों को मनुष्यों और परमेश्वर के उद्धार और मनुष्यों के प्रबन्धन के साथ व्यवहार करना था। इब्राहीम के बाद, परमेश्वर ने एक बार फिरएक चुनाव किया-उस ने अय्यूब को चुना जो व्यवस्था के आधीन था जो निरन्तर परमेश्वर का भय मानते हुए और बुराई से दूर रहते हुए और खड़े होकर उस की गवाही देते हुए शैतान की परीक्षाओं का सामना कर सकता था। यह पहली बार ही था जब परमेश्वर ने शैतान को एक इंसान की परीक्षा लेने के लिए अनुमति दी थी, और पहली बार उस ने शैतान के साथ शर्त लगाया था। अंत में, पहली बार, परमेश्वर ने किसी ऐसे को प्राप्त किया जो शैतान का सामना करते हुए खड़े रहकर गवाही देने में सक्षम था - एक व्यक्ति जो उसके लिए गवाही दे सके और पूर्णत: शैतान को शर्मिन्दा कर सके। जब से परमेश्वर ने मानव जाति को बनाया था, यह वह पहला व्यक्ति था जिसे उस ने हासिल किया था जो उसके लिए गवाही देने में सक्षम था। एक बार जब उसने उस व्यक्ति को हासिल कर लिया,परमेश्वर अपने प्रबन्धन को आगे बढ़ाने के लिए और भी अधिक उत्सुक हो गया था और अपने अगले चुनाव और उसके कार्य स्थल की तैयारी करते हुए, उसने अपने कार्य में अगला कदम बढ़ाया।

इन सब के बारे में आप को बताने के बाद, क्या आप के पास परमेश्वर की सही समझ है? परमेश्वर मानव जाति के प्रबन्धन, और मनुष्यों के उद्धार की इस घटना को देखता है, जैसे कि यह किसी भी दूसरे चीज़ से कहीं ज़्यादा महत्पूर्ण है। वह इन चीज़ों को केवल अपने मस्तिष्क से नहीं करता है, और ना ही उसे अपने शब्दों से करता है, और विशेष रूप से इन चीज़ों को अकस्मात् ही नहीं करता है - वह यह सब कुछ एक योजना के साथ, एक उद्देश्य के साथ, एक ऊँचे स्तर के साथ, और अपनी इच्छा के साथ करता है। यह साफ है कि मानव जाति को बचाने का यह कार्य परमेश्वर और मनुष्य दोनों के लिए बड़ा महत्व रखता है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह कार्य कितना ही कठिन है, इस से कोई फर्क नहीं पड़ता कि बाधाएँ कितनी ही बड़ी हैं, इस से कोई फर्क नहीं पड़ता कि मनुष्य कितने ही कमज़ोर हैं, या मानव जाति का विद्रोही स्वभाव कितना ही गहरा है, इस में से कुछ भी परमेश्वर के लिए कठिन नहीं हैं। वह कार्य जिसे वह स्वयं करना चाहता है उस के लिए प्रयास और प्रबन्ध करते हुए परमेश्वर अपने आप को व्यस्त रखता है। वह सभी चीज़ों को व्यवस्थित भी कर रहा है, और सभी लोगों और वह कार्य जिसे वह करना चाहता है उस पर अपना नियन्त्रण कर रहा है - इस में से कुछ भी पहले नहीं किया गया था। यह पहली बार था जब परमेश्वर ने इन पद्धतियों को प्रयोग किया था और मानव जाति को बचाने और उस का प्रबन्ध करने की मुख्य परियोजना में एक बड़ी कीमत अदा की थी। जब परमेश्वर इन कार्यों को कर रहा है, वह थोड़ा थोड़ा करके बिना रूके मनुष्यों के सामने अपने कठिन कार्य, जो उसके पास है और जो वह है, उसकी बुद्धि और सर्वसामर्थता, और अपने स्वभाव के हर एक पहलु को प्रदर्शित कर रहा है।उसने अंश अंश करके इन सब को मानव जाति के सामने खुलकर प्रकाशित किया, और उसने इन चीज़ों को ऐसा प्रकाशित और प्रकट किया जैसा कि उसने पहले कभी भी नहीं किया था। अतः, पूरे विश्व में, लोगों के अलावा जिन्हें परमेश्वर बचाने और उन का प्रबन्ध करने का उद्देश्य रखता है,कोई भी ऐसा जीवधारी नहीं था जो परमेश्वर के इतने करीब था, जिस का उस के साथ इतना गहरा रिश्ता हो। अपने हृदय में, वह मानव जाति जिस का वह प्रबन्ध और उद्धार करना चाहता है, सब से महत्वपूर्ण है, और वह सब से बढ़कर इस मानव जाति को मूल्य देता है; और भले ही उसने उनके लिए एक बड़ी कीमत चुकाई है, और भले ही उनके द्वारा उसे लगातार चोट पहुँचाया जाता है और उस की अनाज्ञाकारिता की जाती है, फिर भी वह उन्हें कभी भी नहीं छोड़ता है और लगातार बिना थके बिना कोई शिकवा या शिकायत के अपने कार्य में लगा रहता है। यह इसलिए है क्योंकि वह जानता है कि बहुत जल्द या देर से ही मनुष्य एक ना एक दिन उस की बुलाहट के प्रति जागरूक हो जाएँगे और उस के वचनों से अभिभूत हो जाएँगे, और यह पहचानेंगे कि वह सृष्टि का प्रभु है, और उस की पक्षमें वापस आ जाएँगे...।

आज यह सब कुछ सुनने के बाद, आप को लगेगा कि हर चीज़ जो परमेश्वर करता है वह बिल्कुल सामान्य है। ऐसा प्रतीत होता है कि मनुष्यों ने हमेशा से उनके लिए परमेश्वर के वचनों से, और उसके कार्यों से उसकी इच्छा का कुछ कुछ एहसास किया है, लेकिन उनके एहसासों या उनके ज्ञान और जो परमेश्वर सोच रहा है उन दोनों के बीच हमेशा से एक निश्चित दूरी रही है। इस प्रकार, मैं सोचता हूँ कि सब लोगों के साथ यह वार्तालाप करना जरूरी है कि परमेश्वर ने क्यों मानव जाति को बनाया था, और लोगों को हासिल करने हेतु उस की इच्छा के पीछे की पृष्ठभूमि क्या थी जिन की उसने आशा की थी। इसे हर किसी के साथ बाँटना जरूरी है, ताकि हर एक को अपने हृदय में स्पष्ट हो जाए। क्योंकि परमेश्वर का हर एक विचार और युक्ति, और उसके कार्य का हर एक पहलु और हर एक समयकाल उसके सम्पूर्ण प्रबन्धकीय कार्य से बँधा, और करीब से जुड़ा हुआ है। जब आप परमेश्वर के सोच, विचारों और इच्छा को उसके कार्य के हर कदम पर समझते हैं, उसके प्रबन्धकारणीय योजना के कार्य का स्रोत को समझते हैं। इसी बुनियाद पर परमेश्वर के विषय आप की समझ गहरी होती जाती है। यद्यपि वह सब कुछ जो परमेश्वर ने कियाजब उसने पहली बार संसार को बनाया था जिस का जिक्र मैं ने पहले किया था वह लोगों के लिए अब मात्र कुछ जानकारी है और सच्चाई का अनुसरण करने में असम्बद्ध दिखाई देता है, फिर भी आप के अनुभव के पथक्रम में एक एैसा दिन आएगा जब आप नहीं सोचेंगे कि यह जानकारी के कुछ टुकड़ों के समान इतना साधारण है और ना ही यह कुछ रहस्यों के समान इतना सरल है।जिस प्रकार आप का जीवन प्रगति करता है और जब परमेश्वर को आप के दिल में थोड़ी सी जगह मिल जाती है, या जब आप पूर्णत: या गहराई से उस की इच्छा को समझ जाते हैं, तब आप जिस के विषय में मैं आज कह रहा हूँ उसके महत्व और आवश्यकता को सचमुच में समझ पाएँगे। इस से कोई फर्क नहीं पड़ता है कि आपने किस हद तक इसे स्वीकार किया है; यह जरूरी है कि आप इन चीज़ों को समझें और जानें। जब परमेश्वर कुछ करता है, जब वह अपने कार्य को अन्जाम देता है, इस से कोई फर्क नहीं पड़ता कि यह उसका विचार है या स्वयं उसके हाथ, इस से कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसने इसे पहली बार किया है या अन्तिम बार - अंततः, परमेश्वर के पास एक योजना है, और जो कुछ वह करता है उस में उसका उद्देश्य और उसके विचार हैं। ये उद्देश्य और विचार परमेश्वर के स्वभाव को दर्शाते हैं, और वे जो उसके पास है तथा जो वह है उसे प्रकट करते हैं। ये दोनों चीज़ें-परमेश्वर का स्वभाव और जो उसके पास है तथा जो वह है - इसे प्रत्येक इंसान के द्वारा अवश्य ही समझा जाना चाहिए। एक बार जब एक इंसान उसके स्वभाव और जो उसके पास है तथा जो वह है उसे समझ जाता है, तब वे धीरे धीरे समझते हैं कि परमेश्वर जो करता है वह क्यों करता है और जो वह कहता है क्यों कहता है। उससे, तब उनके पास परमेश्वर का अनुसरण करने के लिए, सच्चाई का पीछा करने के लिए, और स्वभाव में एक परिवर्तन को जारी रखने के लिए और अधिक विश्वास होगा। तो ऐसा कहना चाहिए, कि परमेश्वर के विषय मनुष्य की समझ और परमेश्वर में उसके विश्वास को अलग अलग नहीं किया जा सकता है।

यद्यपि लोग जो सुनते हैं या समझ प्राप्त करते हैं वह परमेश्वर के स्वभाव, और जो उसके पास है तथा जो वह है उस के बारे में है, और जो वे प्राप्त करते हैं वो वह जीवन है जो परमेश्वर से आता है। एक बार जब यह जीवन आप के भीतर डाल दिया जाता है, परमेश्वर के प्रति आपका भय बड़ा और बड़ा होता जाएगा, और इस फसल को काटना बहुत ही स्वाभाविक होता है। यदि आप परमेश्वर के स्वभाव और उस के सार तत्व के बारे में समझना और जानना नहीं चाहते हैं, और यदि आप इन चीज़ों के ऊपर मनन करना और ध्यान केन्द्रित करना भी नहीं चाहते हैं, तो मैं निश्चित रूप से आपको बता सकता हूँ कि जिस तरह से आप वर्तमान में परमेश्वर के प्रति अपने विश्वास का अनुसरण कर रहे हैं यह आपको उसकी इच्छा को संतुश्ट करने और उसकी तारीफ को प्राप्त करने की अनुमति कभी नहीं दे सकता है। उस से अधिक, आप कभी भी सचमुच में उद्धार तक नहीं पहुँचेंगे - ये अन्तिम परिणाम हैं। जब लोग परमेश्वर को नहीं समझते हैं और उसके स्वभाव को नहीं जानते हैं, तो उनका हृदय कभी भी परमेश्वर के लिए नहीं खुलेगा। एक बार जब वे परमेश्वर को समझ जाते हैं, वे रूचि और विश्वास के साथ जो कुछ परमेश्वर के हृदय में है उस को समझना और उसका स्वाद लेना प्रारम्भ कर देंगे। जब आप जो परमेश्वर के दिल में है उसे समझने और उसका स्वाद लेने लग जाते हैं, आपका हृदय धीर धीरे, थोड़ा थोड़ा करके उसके लिए खुलता जाता है। जब आपका हृदय उसके लिए खुल जाता है, तब आप को महसूस होगा कि परमेश्वर के प्रति आपका बर्ताव, परमेश्वर से आपकी माँगें, और आपकी बेकार की अभिलाषाएं कितने शर्मनाक और घृणित थे। जब आपका हृदय सचमुच में परमेश्वर के लिए खुल जाता है, तब आप देखेंगे कि उसका हृदय एक असीमित संसार के जैसा है, और आप एक ऐसे क्षेत्र में प्रवेश करेंगे जिसे आप ने पहले कभी भी अनुभव नहीं किया होगा। इस क्षेत्र में कोई धोखा नहीं है, कोई धूर्तता नहीं है, कोई अँधकार नहीं है, और कोई बुराई भी नहीं है। वहाँ केवल ईमानदारी और विश्वासयोग्यता है; केवल ज्योति और सदाचार है; केवल धार्मिकता और कृपालुता है। यह प्रेम और देखरेख से भरा हुआ है, तरस और सहिष्णुता से भरा हुआ है, और उसके द्वारा आप जिन्दा रहने की प्रसन्नता और आनन्द को महसूस करेंगे। ये वो चीज़ें हैं जिन्हें वह आपके लिए प्रकाशित करेगा जब आप अपने हृदय को उसके लिए खोलेंगे। यह असीमित संसार परमेश्वर की बुद्धि, और उसकी सर्वसामर्थता से भरा हुआ है; वह उसके प्रेम और अधिकार से भी भरा हुआ है। यहाँ आप जो परमेश्वर के पास है तथा जो वह है, और वह किस बात से आनन्दित होता है, वह चिन्ता क्यों करता है और वह उदास क्यों हो जाता है, और वह क्यों क्रोधित हो जाता है उस के हर एक पहलु को देख सकते हैं......। यह वही है जिसे प्रत्येक इंसान देख सकता है जो अपने हृदय को खोलता है और परमेश्वर को भीतर आने की अनुमति देता है। परमेश्वर तभी आप के हृदय के भीतर आ सकता है जब आप उसके लिए उसे खोल देते हैं। यदि वह आप के हृदय के भीतर आ गया है केवल तभी आप जो परमेश्वर के पास है तथा जो वह है उसे देख सकते है, केवल तभी आप अपने लिए उसकी इच्छा को देख सकते हैं। उस समय, आप को यह पता चलेगा कि परमेश्वर के बारे में हर चीज़ कितना बहुमूल्य है, अर्थात् जो उसके पास है तथा जो वह है वह सँभाल कर रखने के कितना योग्य है। उस की तुलना में, वे लोग जो आपको घेरे रहते हैं, आपके जीवन की घटनाएँ और व्यक्ति, और यहाँ तक कि आपके प्रियजन, आपका जीवनसाथी, और ऐसी चीज़ें जिन से आप प्रेम करते हैं, वे मुश्किल से जिक्र करने के योग्य भी नहीं हैं। वे इतने छोटे हैं, और इतने निम्न हैं; आप महसूस करेंगे कि कोई भौतिक पदार्थ फिर से आप को उस में खींचने में कभी भी सक्षम नहीं होगा, और आप को फिर से उनके लिए कोई कीमत चुकानी नहींपड़ेगी। परमेश्वर की दीनता में आप उसकी महानता, और उसकी सर्वोच्चता को देखेंगे; इस के अतिरिक्त, यदि उसने कुछ किया था जिस के विषय में आप यह विश्वास करते थे कि वह काफी छोटा था, तो आप उसकी असीमित बुद्धि और उसकी सहिष्णुता को देखेंगे, और उसके धीरज, उसकी सहनशीलता, और आप के प्रति उसकी समझ को देखेंगे। यह आप में उसके लिए एक प्रेम उत्पन्न करेगा। उस दिन, आप को लगेगा कि मानव जाति कितने दूषित संसार में रह रहा है, यह कि वे लोग जो आप के आस पास रह रहें हैं और वे चीज़ें जो आप के जीवन में घटित हो रही हैं, और यहाँ कि जो आप से प्रेम करते हैं, आप के लिए उनका प्रेम, और उनकी तथाकथित सुरक्षा या आपके लिए उनकी चिन्ता इस योग्य नहीं हैं कि उनका जिक्र भी किया जाए - केवल परमेश्वर की आपका प्रिय है, और आप केवल उसी को सब से ज़्यादा सहेज कर रख सकते हैं। जब वह दिन आता है, मैं विश्वास करता हूँ कि वहाँ कुछ लोग होंगे जो कहेंगेः परमेश्वर का प्रेम कितना महान है, और उसका सार तत्व कितना पवित्र है - परमेश्वर में कोई धूर्तता नहीं है, कोई बुराई नहीं है, कोई इर्ष्या नहीं है, और कोई कलह नहीं है, परन्तु केवल धार्मिकता और प्रमाणिकता है, और मनुष्यों के द्वारा सब कुछ जो परमेश्वर के पास है, और सब कुछ जो वह है उस की लालसा करनी चाहिए। मनुष्यों को उसके लिए प्रयास करना चाहिए और उसकी आकांक्षा करना चाहिए। इसे किस मानवीय योग्यता के आधार पर निर्मित किया जाता है? यह मनुष्यों के द्वारा परमेश्वर के स्वभाव की समझ, और उनके द्वारा परमेश्वर के सार तत्व की समझ के आधार पर निर्मित होता है। इस प्रकार परमेश्वर के स्वभाव और जो उसके पास है तथा जो वह है उसे समझना, प्रत्येक इंसान के लिए जीवन पर्यन्तशिक्षा है, और यह एक जीवन पर्यन्त उद्देश्य है जिस का अनुसरण प्रत्येक इंसान के द्वारा किया जाना है जो अपने स्वभाव को बदलना चाहते हैं, और परमेश्वर को जानने के लिए संघर्ष करते हैं।

हम ने बस अभी अभी उन सब कार्यों के बारे में बात की है जिन्हें परमेश्वर के द्वारा पूरा किया गया था, ऐसी चीज़ों का क्रम जिसे उसने पहली बार किया था। इन चीज़ों में से प्रत्येक परमेश्वर के प्रबन्धकीय योजना, और परमेश्वर की इच्छा से सम्बन्धित है। वे स्वयं परमेश्वर के स्वभाव और उसके सार तत्व से सम्बन्धित हैं। यदि हम और अच्छे से जो परमेश्वर के पास है तथा जो परमेश्वर है उसे समझना चाहते हैं, तो हम पुराने नियमया व्यवस्था के युग तक नहीं रूकेंगे, किन्तु हमें उन कदमों के साथ आगे बढ़ने की आवश्यकता है जिन्हें परमेश्वर ने अपने कार्य के दौरान उठाया था। इस प्रकार, जब परमेश्वर ने व्यवस्था के युग का अन्त किया और अनुग्रह के युग का शुभारम्भ किया है, तो हमारे स्वयं के कदम अनुग्रह के युग में पधार चुके हैं-एक ऐसा युग जो अनुग्रह और छुटकारे से भरपूर है। इस युग में, परमेश्वर ने एक बार फिर कुछ ऐसा किया जो पहली बार था। इस नए युग का कार्यपरमेश्वर और मानव जाति दोनों के लिए एक शुरूआती बिन्दु था। यह नया शुरूआती बिन्दु एक बार फिर से एक नया कार्य था जिसे परमेश्वर ने पहली बार किया था। यह नया कार्य पहले से पूर्वानुमानित नहीं था जिसे परमेश्वर ने किया था जिस की कल्पना मनुष्यों, एवं सभी जीवधारियों के द्वारा नहीं की जा सकती थी। यह कुछ ऐसा है जिसे अब सभी लोग जानते हैं - यह पहली बार हुआ जब परमेश्वर एक मानव बन गया, पहली बार उस ने मानव के रूप, और एक मानव की पहचान के साथ अपना कार्य प्रारम्भ किया था। इस नए कार्य ने यह सूचित किया कि परमेश्वर ने अनुग्रह के युग में अपने कार्य को पूरा किया था, और यह कि वह आगे से व्यवस्था के आधीन कुछ नहीं करेगा और कुछ नहीं बोलेगा। ना ही वह व्यवस्था के रूप में या व्यवस्था के नियमों और सिद्धांतों के अनुसार कुछ बोलेगा या करेगा। अर्थात्, व्यवस्था पर आधारित उसके सभी कार्य हमेशा हमेशा के लिए रूक गए और जारी नहीं रहेंगें, क्योंकि परमेश्वर नया कार्य और नई चीज़ों को प्रारम्भ करना चाहता था, और एक बार फिर उसकी योजनाओं का एक नया शुरूआती बिन्दु था। इस प्रकार, परमेश्वर को मानव जाति की अगुवाई एक नए युग में करना था।

चाहे यह मनुष्य के लिए एक आनन्ददायक समाचार हो या अशुभ समाचार यह इस पर निर्भर है कि उनका सार तत्व क्या था। ऐसा कहा जा सकता है कि यह एक आनन्ददायक समाचार नहीं था, किन्तु यह कुछ लोगों के लिए एक अशुभ समाचार था, क्योंकि जब परमेश्वर ने अपना नया कार्य शुरू किया, तो वे लोग जिन्हों ने बस व्यवस्थाओं और नियमों का अनुसरण किया था, और जिन्हों ने बस सिद्धांतों का अनुसरण किया था लेकिन परमेश्वर का भय नहींमाना था वे परमेश्वर के नए कार्य पर दोष लगाने के लिएउसके पुराने कार्य के प्रयोग की ओर झुकने लगे। इन लोगों के लिए, यह एक अशुभ समाचार था; परन्तु प्रत्येक व्यक्ति जो निर्दाश और खुले हृदय का था, जो परमेश्वर के प्रति ईमानदार और विश्वासयोग्य था और उसके छुटकारे को पाने की इच्छा करता था, उसके लिए परमेश्वर का देहधारण एक आनन्ददायक समाचार था। जब से मनुष्य अस्तित्व में आए हैं, यह पहली बार था जब परमेश्वर एक ऐसे रूप में जो आत्मा नहीं था मानव जाति के बीच प्रगट हुआ और जीया था, उस के बजाए, वह मनुष्य से जन्मा और मनुष्य के पुत्र के रूप में लोगों के बीच प्रगट हुआ और जीया, और उनके बीच काम किया था। इस "पहली बार" ने लोगों की धारणाओं को तोड़ डाला और जो सभी कल्पनाओं से परे था। इस के अतिरिक्त, परमेश्वर के सभी अनुयायियों को एक स्पर्शयोग्य लाभ मिला। परमेश्वर ने ना केवल पुराने युग को खत्म कर दिया, परन्तु उसने काम करने की पुरानी पद्धतियों, और कार्य षैली को भी समाप्त कर दिया था। उसने आगे से अपने सन्देशवाहकों को अपने वचन के अर्थ को ले जाने की अनुमति नहीं दी, और वह आगे से बादलों पर छिपा हुआ नहीं था, और वह आगे से मनुष्यों के सामने "बादलों की गर्जन" के द्वारा आज्ञा देते हुए उनसे बात नहीं की या प्रकट नहीं हुआ। पहले की किसी भी चीज़ से अलग, एक ऐसी रीति के द्वारा जो मनुष्यों के लिए अकल्पनीय है और जो उनके लिए समझना और स्वीकार करना कठिन था - देहधारण करना - उस युग के कार्य को विकसित करने के लिए वह मनुष्य का पुत्र बन गया था। इस कदम से मानव जाति भौंचक्का हो गया, और यह उन के लिए बहुत असुविधाजनक था, क्योंकि परमेश्वर ने एक बार फिर एक नया कार्य शुरू किया था जिसे उसने पहले कभी नहीं किया था। आज, हम एक नज़र देखेंगे कि परमेश्वर ने इस नए युग में कौन सा नया कार्य शुरू किया था, और इस पूरे नए कार्य में, क्या हम परमेश्वर के स्वभाव और जो उसके पास है तथा जो वह है उसे समझ सकते हैं?

निम्नलिखित वचन बाइबल के नए नियम में दर्ज़ हैं

1.(मत्ती 12:1) उस समय यीशु सब्त के दिन खेतों में से हो कर जा रहा था, और उस के चेलों को भूख लगी, सो वे बालें तोड़ तोड़कर खाने लगे।

2.(मत्ती12:6-8) पर मैं तुम से कहता हूँ, कि यहाँ वह है, जो मन्दिर से भी बड़ा है। यदि तुम इस का अर्थ जानते कि मैं दया से प्रसन्न हूँ, बलिदान से नहीं, तो तुम निर्दोष को दोशी ना ठहराते। मनुष्य का पुत्र तो सब्त के दिन का भी प्रभु है।

आइए पहले हम इस अंश को देखें: "उस समय यीशु सब्त के दिन खेतों में से हो कर जा रहा था, और उस के चेलों को भूख लगी, सो वे बालें तोड़ तोड़कर खाने लगे।"

हम ने इस अंश को क्यो चुना है? इस का परमेश्वर के स्वभाव से क्या सम्बन्ध है? इस पाठ में, पहली चीज़ जो हम जानते हैं वह यह है कि वह सब्त का दिन था, परन्तु प्रभु यीशु बाहर गया और अपने चेलों को अनाज के खेतों में ले गया। इस से ज्यादा "उग्र" क्या हो सकता है कि वे "बाले तोड़ तोड़कर खाने लगे।" व्यवस्था के युग में, यहोवा परमेश्वर की व्यवस्था थी कि वे सब्त के दिन यों ही बाहर नहीं जा सकते थे और किसी गतिविधि में भाग नहीं ले सकते थे - बहुत सी ऐसी चीज़ें थीं जिन्हें सब्त के दिन नहीं किया जा सकता था। प्रभु यीशु की तरफ से यह कार्य उनके लिए पेचीदा था जो एक लम्बे समय से व्यवस्था के आधीन जीवन बिता रहे थे, और इस ने आलोचना को भी भड़काया था। उनके भ्रम और जो यीशु ने किया था उस पर उन्हों ने किस प्रकार बात की उस के विषय में, हम फिलहाल उसे दर किनार करेंगे और पहले यह चर्चा करते हैं कि प्रभु यीशु ने, सभी दिनों को छोड़कर, सिर्फ सब्त के दिन ही ऐसा करने का चुनाव क्यों किया था, और वह इस कार्य के द्वारा लोगों से क्या कहना चाहता था जो व्यवस्था के आधीन रहते थे। यह इस अंश और परमेश्वर के स्वभाव के बीच एक मेल है जिस के बारे में मैं आप से बात करना चाहता हूँ।

जब प्रभु यीशु मसीह आया, तो उसने लोगों से बात करने के लिए अपने व्यावहारिक कार्यों का प्रयोग कियाः परमेश्वर ने व्यवस्था के युग को अलविदा किया और नए कार्य का प्रारम्भ किया, और इस नए कार्य को सब्त का पालन करने की जरूरत नहीं थी; जब परमेश्वर सब्त के दिन की सीमाओं से बाहर आ गया, तो यह उसके नए कार्य का बस एक पूर्वानुभव था, और सचमुच में उसका महान कार्य लगातार जारी रहनेवाला था। जब प्रभु यीशु ने अपना कार्य प्रारम्भ किया था, तो उसने पहले से ही व्यवस्था की जंज़ीरों को पीछे छोड़ दिया था, और उस युग से विधियों और सिद्धांतों को तोड़ दिया था। उस में, व्यवस्था से जुड़ी किसी भी चीज़ का निशान नहीं था; उसने उसे पूर्णत: उतार कर फेंक दिया था और आगे से उसका अनुसरण नहीं किया था, और उसने आगे से मानव जाति से उस का अनुसरण करने की अपेक्षा नहीं की थी। इस प्रकार आप यहाँ देखते हैं कि प्रभु यीशु सब्त के दिन अनाज के खेतों से होकर गुज़रा, और प्रभु ने आराम नहीं किया, किन्तु बाहर काम कर रहा था। उसका यह कार्य लोगों की धारणाओं के लिए एक आघात था और उन्हें यह सन्देश दिया कि वह आगे से व्यवस्था के आधीन जीवन नहीं बिताएगा, और यह कि उसने सब्त की सीमाओं को छोड़ दिया है और उसने मानव जाति के सामने और उनके मध्य एक नई तस्वीर को, एक नए कार्यशैली के साथ प्रकट किया है। उसके इस कार्य ने लोगों को यह बताया कि वह अपने साथ एक नया कार्य लेकर आया है जो व्यवस्था से दूर जाने और सब्त से बाहर जाने से प्रारम्भ हुआ था। जब परमेश्वर ने अपना नया कार्य प्रारम्भ किया, तो वह आगे से भूतकाल से चिपका नहीं रहा, और वह आगे से व्यवस्था के युग की विधियों के विषय में चिन्तित नहीं था। ना ही वह पिछले युग के अपने कार्य से प्रभावित हुआ था, परन्तु उसने सब्त के दिन में भी सामान्य रूप से कार्य किया था और जब उसके चेले भूखे थे, वे अनाज की बालें तोड़कर खा सकते थे। यह सब कुछ परमेश्वर की निगाहों में बिल्कुल सामान्य था। परमेश्वर के पास बहुत सारे कार्यों के लिए जिन्हें वह करना चाहता है और बहुत सारी चीज़ों के लिए जिन्हें वह कहना चाहता है एक नई शुरूआत हो सकती है। एक बार जब उसने एक नई शुरूआत कर दी, वह ना तो फिर से अपने पिछले कार्य का जिक्र करता है और ना ही उसे जारी रखता है। क्योंकि परमेश्वर के पास उसके कार्य के लिए स्वयं के सिद्धांत हैं। जब वह नया कार्य शुरू करना चाहता है, तो यह तब होता है जब वह मानव जाति को अपने कार्य के एक नए स्तर में पहुँचाना चाहता है, और जब उसका कार्य सब से ऊँचे मुकाम में प्रवेश कर लेता है। यदि लोग लगातार पुरानी कहावत या विधियों के अनुसार काम करते रहेंगे या उन्हें निरन्तर मज़बूती से पकड़ें रहेंगे, तो वह इस का उत्सव नहीं मनाएगा और इस की प्रशंसा नहीं करेगा। यह इसलिए है क्योंकि वह पहले से ही एक नए कार्य को लेकर आ चुका है, और अपने कार्य में एक नए मुकाम में पहुँच चुका है। जब वह एक नए कार्य को प्रारम्भ करता है, वह मानव जाति को बिल्कुल ही नए रूप में दिखाई देता है, बिल्कुल नए कोण से, और बिल्कुल नए तरीके से ताकि लोग उसके स्वभाव के भिन्न भिन्न पहलुओं और जो उसके पास है तथा जो वह है उस को देख सकें। यह उसके नए कार्य में उसके अनेक लक्ष्यों में से एक लक्ष्य है। परमेश्वर पुराने को थामे नहीं रहता है या जर्जर मार्ग को नहीं लेता है; जब वह कार्य करता है और बोलता है तो यह उतना निषेधात्मक नहीं होता है जितना लोग कल्पना करते हैं। परमेश्वर में, सभी आज़ाद और छुड़ाए गए हैं, और कुछ भी मनाही, या विवशता नहीं है - जो वह मानव जाति के लिए लेकर आता है वह सम्पूर्ण आज़ादी और छुटकारा है। वह एक जीवित परमेश्वर है, एक ऐसा परमेश्वर जो विशुद्ध रूप से, और सचमुच में अस्तित्व में है। वह एक कठपुतली या मिट्टी की कारीगरी नहीं है, और वह उन मुर्तियों से बिल्कुल भिन्न है जिन्हें लोग पवित्र मानते हैं और उन की पूजा करते हैं। वह जीवित और जीवन्त है और उसके कार्य और वचन मनुष्यों के लिए जो लेकर आते हैं वे हैं सम्पूर्ण जीवन और ज्योति, सम्पूर्ण स्वतन्त्रता और छुटकारा, क्योंकि वह उस सच्चाई, जीवन, और मार्ग को थामे रहता है - और उसके किसी भी कार्य में उसे किसी भी चीज़ के द्वारा विवश नहीं किया जा सकता है। इस से कोई फर्क नहीं पड़ता है कि लोग क्या कहते हैं और इस से भी कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे उसके नए कार्य को किस प्रकार देखते हैं या किस प्रकार उस का आँकलन करते हैं, वह बिना किसी पछतावे के अपने कार्य को पूरा करेगा। वह किसी की विचार धारणा या उसके कार्य और वचनों की ओर उठती हुई ऊँगलियों, या अपने नए कार्य के लिए उनके कठोर विरोध और प्रतिरोध की भी चिन्ता नहीं करेगा। समूची सृष्टि में कोई भी नहीं है जो उसके कार्य को कलंकित करने, या छिन्न भिन्न या तोड़फोड़ करने के लिए या जो परमेश्वर करता है उसे नापने या उसे परिभाषित करने के लिए मानवीय तर्क, या मानवीय कल्पनाओं, ज्ञान, या नैतिकता का प्रयोग कर सके। उसके कार्य में और जो वह करता है उस में कोई मनाही नहीं है, और किसी मनुष्य, चीज़ या पदार्थ के द्वारा उसे बाध्य नहीं किया जाएगा, और उसे किसी प्रचण्ड शक्ति के द्वारा छिन्न भिन्न नहीं किया जाएगा।अपने इस नए काम में, वह सर्वदा के लिए एक विजयी राजा है, और किसी भी प्रकार की प्रचण्ड ताकतों और झूठी शिक्षाओं और मानव की अशुद्धियों को उस के चरणों की चैकी के नीचे कुचल दिया गया है। इस से कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वह अपने कार्य के किस नए स्तर पर काम कर रहा है, इसे मानव जाति के बीच में विकसित एवं विस्तारित करना होगा, उसे समूचे विश्व में तब तक बिना किसी बाधा के पूरा करना होगा जब तक उसका महान कार्य पूरा ना हो जाए। यह परमेश्वर की सर्वसामर्थता और बुद्धिमत्ती है, और उस का अधिकार और सामर्थ है। इस प्रकार, प्रभु यीशु मसीह खुलकर बाहर जा सकता था और सब्त के दिन कार्य कर सकता था क्योंकि उसके हृदय में कोई नियम नहीं थे, और वहाँ मानव जाति से उत्पन्न कोई ज्ञान और सिद्धांत नहीं था। जो उसके पास था वह परमेश्वर का नया कार्य और उस का मार्ग था, और उस का कार्य मानव जाति को स्वतन्त्र करना था, उसे मुक्त करना था, उन्हें ज्योति में बने रहने की अनुमति देना था, और उन्हें जीने की अनुमति देना था। और वे जो मूर्तियों या झूठे ईश्वरों की पूजा करते हैं हर दिन शैतान के बन्धनों में जीते हैं, सभी प्रकार के नियमों और समाज से बहिष्कृत जीवनशैलियों के द्वारा बन्धे हुए हैं - आज एक चीज़ प्रतिबन्धित है, कल कोई दूसरी चीज़ होगी-उन के जीवन में कोई स्वतन्त्रता नहीं है। वे जंज़ीरों में जकड़े हुए कैदियों के समान हैं जिन के पास बोलने की कोई आज़ादी नहीं है। "निषेध" किसे दर्शाता है? यह विवशता, बन्धनों, और बुराई को दर्शाता है। जैसे ही एक व्यक्ति एक मूर्ति की पूजा करता है, वे एक झूठे ईश्वर की पूजा कर रहे हैं, वे एक बुरे आत्मा की पूजा कर रहे हैं। प्रतिबन्ध इस के साथ आता है। आप इसे या उसे नहीं खा सकते हैं, आज आप बाहर नहीं जा सकते हैं, कल आप अपना चूल्हा नहीं जला सकते हैं, अगले दिन आप नए घर में नहीं जा सकते हैं, शादी ब्याह तथा अन्तिम क्रिया, और यहाँ तक कि बच्चे को जन्म देने के लिए भी कुछ निश्चित दिनों को ही चुनना होगा। इसे क्या कहते हैं? इसे ही प्रतिबन्ध कहते हैं; और ये शैतान की जंज़ीरें हैं और दुष्ट आत्माएँ इन्हें नियन्त्रित करते हैं, और उनके हृदयों और शरीरों को बन्धनों में बाँधते हैं। क्या से प्रतिबन्ध परमेश्वर के साथ साथ बने रहते हैं? जब परमेश्वर की पवित्रता की बात करते हैं, तो आप को पहले यह सोचना चाहिएः कि परमेश्वर के साथ कुछ भी प्रतिबन्धित नहीं है। परमेश्वर के पास उसके वचनों और कार्य के लिए सिद्धांत हैं, परन्तु कुछ भी प्रतिबन्ध नहीं है, क्योंकि परमेश्वर स्वयं सत्य, मार्ग, और जीवन है।

आइए हम निम्नलिखित अंश को देखें: पर मैं तुम से कहता हूँ, कि यहाँ वह है, जो मन्दिर से भी बड़ा है। यदि तुम इस का अर्थ जानते कि मैं दया से प्रसन्न हूँ, बलिदान से नहीं, तो तुम निर्दोष को दोषी ना ठहराते। मनुष्य का पुत्र तो सब्त के दिन का भी प्रभु है (मत्ती12:6-8)। यहाँ "मन्दिर" किस को दर्शाता है? सरल रीति से कहें, "मन्दिर" एक शोभायमान, ऊँची ईमारत को दर्शाता है, और व्यवस्था के युग में, मन्दिर वह जगह थी जहाँ याजक परमेश्वर की आराधना करते थे। जब प्रभु यीशु ने कहा, "कि यहाँ वह है, जो मन्दिर से भी बड़ा है," यहाँ "वह" किस की ओर संकेत करता है? स्पष्ट रूप से "वह" प्रभु यीशु है जो देह में है, क्योंकि केवल वह ही मन्दिर से बड़ा था। उन शब्दों ने लोगों से क्या कहा? उन्हों ने लोगों से मन्दिर से बाहर आने को कहा-परमेश्वर पहले ही बाहर आ चुका है और आगे से उस में काम नहीं कर रहा है, इस प्रकार लोगों को मन्दिर के बाहर परमेश्वर के कदमों के निशानों को ढूँढ़ना चाहिए और उसके नए कार्य में उसके कदमों का अनुसरण करना चाहिए। प्रभु यीशु मसीह के इस कथन की पृष्ठभूमि यह थी कि व्यवस्था के अधीन, लोग मन्दिर को देखने के लिए आए हैं, मानो वह कुछ ऐसा है जो स्वयं परमेश्वर से भी बड़ा है। अर्थात्, लोग परमेश्वर की आराधना करने के बजाए मन्दिर की आराधना कर रहे थे, इसलिए प्रभु यीशु मसीह ने उन्हें सावधान किया कि वे मूरतों की आराधना ना करें, परन्तु परमेश्वर की आराधना करें क्योंकि वह सर्वोच्च है। इस प्रकार उसने कहाः "मैं दया से प्रसन्न हूँ, बलिदान से नहीं।" यह प्रकट है कि प्रभु यीशु की नज़रों में, व्यवस्था के आधीन बहुत से लोग अब यहोवा की आराधना नही करते थे, और बस यों ही बलिदान की प्रक्रिया से होकर जाते थे, और प्रभु यीशु ने यह बताया कि यह "मूर्ति पूजा" की एक प्रक्रिया है। इन मूर्ति पूजकों ने मन्दिर को परमेश्वर से भी महान और बड़ी चीज़ के रूप में देखा था। उनके हृदय में केवल मन्दिर था, ना कि परमेश्वर, और यदि वे मन्दिर को खो देंगे, तो वे अपने निवास स्थान को भी खो देंगे। मन्दिर के बिना उनके पास आराधना के लिए कोई जगह नहीं थी और वे बलिदानों को नहीं चढ़ा सकते थे। उनका तथाकथित निवास स्थान वहाँ है जहाँ से वे यहोवा परमेश्वर की आराधना के झण्डे तले संचालन करते थे, जिस ने उन्हें मन्दिर के टिके रहने और अपने क्रियाकलापों को करने की अनुमति दी थी। उनके तथाकथित बलिदानों का चढ़ाना जाना मन्दिर के प्रति उनकी सेवा के आयोजन के बहाने उनके स्वयं के शर्मनाक कार्यों को पूरा करने के लिए था। यही वह कारण है कि उस समय लोग मन्दिर को परमेश्वर से भी बढ़कर देखते थे। क्योंकि वे मन्दिर को एक छत्रछाया के रूप में, और बलिदानों को लोगों को धोखा देने और परमेश्वर को धोखो देने के लिए एक बहाने के रूप में प्रयोग करते थे, प्रभु यीशु ने लोगों को चेतावनी देने के लिए ऐसा कहा था। यदि आप इन शब्दों को वर्तमान में लागू करते हैं, तब भी वे उतने ही प्रमाणिक और उतने ही उचित हैं। यद्यपि आज लोगों ने व्यवस्था के युग के लोगों के अनुभव से अलग परमेश्वर के कार्य का अनुभव किया है, फिर भी उनके स्वभाव का सार तत्व एक समान है। आज के कार्य के सन्दर्भ में, लोग फिर भी उसी प्रकार के कार्य करेंगे "मन्दिर परमेश्वर से बड़ा है।" उदाहरण के लिए, लोग अपने कर्तव्यों के निर्वहन को अपनी नौकरी के रूप मे देखते हैं; वे परमेश्वर के लिए गवाही देने और मानवाधिकार के बचाव में एक राजनैतिक आन्दोलन के रूप में लाल अजगर से युद्ध करने को गणतन्त्र और स्वतन्त्रता के रूप में देखते हैं; उन्होंने अपने कर्तव्योंको अपनी कुशलताओं का उपयोग करके अपनी जीवंवृत्यों के निमार्ण की ओर मोड़ दिया है, परन्तु वे परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने को और कुछ नहीं बल्कि धार्मिक सिद्धांत के पालन के एक टुकड़े के रूप में लेते हैं; और इत्यादि। क्या मनुष्यों की ओर से ये प्रकटीकरण मुख्य रूप से इस के समान नहीं हैं "मन्दिर परमेश्वर से बढ़कर है?" इस बात को छोड़कर कि दो हज़ार साल पहले, लोग भौतिक मन्दिर में अपने व्यक्तिगत व्यवसाय को कर रहे थे, परन्तु आज, लोग अस्पृश्य मन्दिरों में अपने व्यक्तिगत व्यवसाय कर रहे हैं। वे लोग जो नियमों को सहेज कर रखते हैं इन नियमों को परमेश्वर से बढ़कर देखते हैं, वे लोग जो ऊँचे दर्जे से प्रेम करते हैं वे ऊँचे दर्जे को परमेश्वर से बढ़कर मानते हैं, वे लोग जो अपने जीवनवृत्ती से प्रेम करते हैं वे जीवनवृत्ती को परमेश्वर से बढ़कर मानते हैं, और इत्यादि - उन के सभी प्रकटीकरण मुझे यह कहने में अगुवाई देते हैंरू "लोग अपने शब्दों से सब से बढ़कर परमेश्वर की स्तुति करते हैं, किन्तु उन की नज़रों में हर चीज़ परमेश्वर से बढ़कर है।" यह इसलिए है क्योंकि जैसे ही लोगों को परमेश्वर का अनुसरण करने के उनके मार्ग के साथ साथ अपने वरदानों, या अपने व्यवसाय या अपनी स्वयं की जीवनवृत्ती के प्रदर्शन का अवसर मिलता है, तो वे अपने आप को परमेश्वर से दूर कर देते हैं और अपने आप को उस जीवंवृत्यों में झोंक देते हैं जिन से वे प्रेम करते हैं। जो कुछ परमेश्वर ने उन्हें सौंपा है, और उसकी इच्छा के विषय में यह कहा जा सकता है कि,उन चीज़ों को बहुत पहले ही फेंक दिया गया है। इस दृश्यलेख में, इन लोगों के विषय में और जो मन्दिर में दो हज़ार साल पहले अपने स्वयं का व्यवसाय कर रहे थेक्या अन्तर है?

आगे, आइए हम पवित्र शास्त्र के इस अंश के इस अन्तिम वाक्य पर एक नज़र डालें:"मनुष्य का पुत्र तो सब्त के दिन का भी प्रभु है।" क्या इस वाक्य का एक व्यावहारिक पहलु है? क्या आप इस के व्यावहारिक पहलु को देख सकते हैं? हर एक बात जो परमेश्वर कहता है उसके हृदय से आता है, तो उसने ऐसा क्यों कहा? आप इसे कैसे समझते हैं? आप शायद इस वाक्य का अर्थ अब समझते हैं, परन्तु उस समय बहुत से लोग नही समझते थे क्योंकि मनुष्य जाति बस उसी समय व्यवस्था के युग से बाहर निकला था। उनके लिए, सब्त से बाहर निकलना एक कठिन बात थी, और सच्चे सब्त को समझने का तो जिक्र भी नहीं कर सकते थे।

यह वाक्य "मनुष्य का पुत्र तो सब्त के दिन का भी प्रभु है" लोगों को बताता है कि परमेश्वर का सबकुछ आत्मिक है, और यद्यपि परमेश्वर आप की सारी भौतिक जरूरतों को पूरा कर सकता है, और जब एक बार आप की भौतिक आवश्यकताएँ पूरी कर दी जाती हैं, तो क्या इन चीज़ों की सन्तुष्टि आप को सत्य की खोज के बदले हो सकती हैं? यह बिल्कुल भी संभव नहीं है! परमेश्वर का स्वभाव और जो उसके पास है तथा जो वह है जिस के बारे में हम ने सभाओं में विचार विमर्श किया है दोनों सत्य हैं। इसे भारी कीमत के भौतिक पदार्थों के द्वारा तौला नहीं जा सकता है और ना ही उसके मूल्य को पैसे में गिना जा सकता है, क्योंकि वह एक भौतिक पदार्थ नहीं है, और यह प्रत्येक व्यक्ति के हृदय की आवश्यकताओं को प्रदान करता है। प्रत्येक मनुष्य के लिए, इन अस्पृश्य सच्चाईयों का मूल्य किसी भी भौतिक चीज़ से जिन्हें आप अच्छा, और सही समझते हैं बढ़कर होना चाहिए, सही है न? यह कथन ऐसा है जिस पर आप को लम्बे समय तक बने रहने की आवश्यकता है। जो कुछ मैं ने कहा था उसका मुख्य बिन्दु यह है कि जो परमेश्वर के पास है तथा जो वह है और परमेश्वर का सब कुछ हर एक व्यक्ति के लिए अति महत्वपूर्ण है और यह किसी भौतिक पदार्थ के द्वारा बदला नहीं जा सकता है। मैं आपको एक उदाहरण दूँगाः जब आपको भूख लगती है, तो आपको भोजन की आवश्यकता होती है। यह भोजन आपके लिए अच्छा हो सकता है या इस में आपके लिए आभाव हो सकता है, किन्तु जब तक यह आपको तृप्त करता है, भूखे होने का वह अप्रिय एहसास वहां नहीं होगा - वह चला जाएगा। आप वहां आराम से बैठ सकते हैं, और आपका शरीर आराम से रहेगा। लोगों की भूख का भोजन से समाधान किया जा सकता है, किन्तु जब आप परमेश्वर का अनुसरण करते हैं, और आपको यह एहसास होता है कि आपके पास उसकी कोई समझ नहीं है, तो आप अपने हृदय के खालीपन का समाधान कैसे करेंगे। क्या इस का समाधान भोजन से किया जा सकता है? या जब आप परमेश्वर का अनुसरण कर रहे हैं और उसकी इच्छा को नहीं समझते हैं, तो आप अपने हृदय की उस भूख को मिटाने के लिए किस चीज़ का प्रयोग कर सकते हैं? परमेश्वर के द्वारा उद्धार के आपके अनुभव की प्रक्रिया में, जब आप अपने स्वभाव में एक परिवर्तन का अनुसरण कर रहे हैं,यदि आप उसकी इच्छा को नहीं समझेंगे या यह नहीं जानेंगे कि सच्चाई क्या है, और यदि आप परमेश्वर के स्वभाव को नहीं समझेंगे, तो क्या आप अति व्याकुलता का एहसास नहीं करेंगे? क्या आप अपने हृदय में एक बड़ी भूख और प्यास का एहसास नहीं करते हैं? क्या इन एहसासों ने आपको आपके हृदय में शांति का एहसास करने से रोक नहीं दिया है? तो आप अपने हृदय की भूख के लिए क्या कर सकते हैं-क्या इस का समाधान करने के लिए कोई तरीका है।कुछ लोग खरीद फरोख्त के लिए बाज़ार जाते हैं, कुछ लोग भरोसा करने के लिए मित्रों को ढूँढ़ लेते हैं, कुछ लोग जी भरकर सोते हैं, कुछ अन्य लोग और ज़्यादा परमेश्वर के वचनों को पढ़ते हैं, या अपने कर्तव्योंको निभाने के लिए कठिन मेहनत और अधिक कोशिश करते हैं। क्या ये चीज़ें आपकी वास्तविक कठिनाईयों को सुलझा सकते हैं?आप में से हर कोई इस प्रकार की रीतियों को पूर्णत: समझ ले। जब आप निर्बलता का एहसास करते हैं, जब आप परमेश्वर से ज्योति पाने के लिए एक दृढ़ इच्छा का एहसास करते हैं ताकि वह आपको उसकी सच्चाई और उसकी इच्छा की वास्तविकता को जानने की अनुमति दे सके, तो आपको सब से ज़्यादा किस की आवश्यकता होगी। जो आपको जरूरत है वह एक भरपेट आहार नहीं है, और वह कुछ भले शब्द नहीं हैं। उस से बढ़कर, यह कुछ पल का आराम और देह की सन्तुष्टि नहीं है - जो आपको आवश्यक है वह यह है कि परमेश्वर आपको सीधे और साफ साफ बताए कि आपको क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए, और आपको साफ साफ बताए कि सत्य क्या है। आपके द्वारा इसे समझने के बाद, भले ही यह थोड़ा सा ही क्यों ना हो, क्या आप एक अच्छा भोजन करने की तुलना में अपने हृदय में अधिक सन्तुष्टि का एहसास नहीं करते हैं? जब आपका हृदय सन्तुष्ट हो जाता है, तो क्या आपका हृदय, आपका सम्पूर्ण व्यक्तित्व सच्ची शांति को प्राप्त नहीं करता है। इस सादृश्यता और विश्लेशण के द्वारा, क्या आपको अब समझ में आया कि मैं आपके साथ यह वाक्य क्यों बाँट रहा था कि, "मनुष्य का पुत्र तो सब्त के दिन का भी प्रभु है?" इस का अर्थ वह है जो परमेश्वर से आता है, जो उसके पास है तथा जो वह है, और उसका सब कुछ किसी भी अन्य चीज़ से बढ़कर है, जिस में वह चीज़ या वह व्यक्ति भी शामिल है जिस पर आपने किसी समय विश्वास किया था और जिस को आपने सब से बढ़कर सहेज कर रखा था। ऐसा कहना चाहिए, यदि एक मनुष्य के पास परमेश्वर के मुँह के वचन नहीं होते हैं या वे उसकी इच्छा को नहीं समझते हैं, तो वे शांति हासिल नहीं कर सकते हैं। अपने भविष्य के अनुभवों में, आप समझेंगे कि मैं क्यों चाहता था कि आज आप इस अंश को देंखें-यह बहुत महत्वपूर्ण है। सब कुछ जो परमेश्वर करता है वह सत्य और जीवन है। मानव जाति के लिए सत्य एक ऐसी चीज़ है जिस की कमी उन के जीवन में नहीं हो सकती है, जिस के बिना वे कभी कुछ नहीं कर सकते हैं; आप यह भी कह सकते हैं कि यह सब से बड़ी चीज़ है। यद्यपि आप उसे नहीं देख सकते हैं या उसे नहीं छू सकते हैं, फिर भी आपके लिए उसकी उपयोगिता की उपेक्षा नहीं की जा सकती है; यह ही वह एकमात्र चीज़ है जो आपके हृदय में शांति ला सकती है।

क्या सत्य के प्रति आपकी समझ स्वयं की स्थितियों से जुड़ जाती है? वास्तविक जीवन में, आपको पहले यह सोचना है कि कौन सी सच्चाईयाँ लोगों, चीज़ों, और पदार्थों से सम्बन्ध रखती हैं जिन का आप ने सामना किया है; इन ही सच्चाईयों के मध्य आप परमेश्वर की इच्छा कोढूँढ़ सकते हैं और जिस का आपने सामना किया है उसे उसकी इच्छा से जोड़ सकते हैं। यदि आप नहीं जानते हैं कि सच्चाई का कौन सा पहलु उन चीज़ों से सम्बन्ध रखता है जिन का आपने सामना किया है परन्तु आप सीधे जाकर परमेश्वर की इच्छा को खोजते हैं, तो ऐसी पहुँच बिल्कुल अँधकारमय है और परिणामों को प्राप्त नहीं कर सकती है। यदि आप सत्य की खोज करना और परमेश्वर की इच्छा को जानना चाहते हैं, तो पहले आप को देखने की जरूरत है कि किस प्रकार की चीज़ें आपके ऊपर आई हैं, वे सत्य के किस पहलु से सम्बन्ध रखते हैं, और परमेश्वर के वचनों में सत्य को देखना है जो उस से सम्बन्ध रखता है जिस का आपने अनुभव किया है। तब आप उस सच्चाई में अभ्यास के उस मार्ग को खोजें जो आपके लिए सही है; इस तरह से आप परमेश्वर की इच्छा की अप्रत्यक्ष समझ प्राप्त कर सकते हैं। सत्य की खोज करना और उसका अभ्यास करना तकनीकी रूप से एक सिद्धांत को लागू करना या एक सूत्र का अनुसरण करना नहीं है। सत्य अनिच्छुक औपचारिक शब्दावली से सम्बन्धित नहीं है, ना ही वह व्यवस्था है। यह मरा हुआ नहीं है - यह जीवन है, यह एक जीवित चीज़ है, और यह एक नियम है जिस का अनुसरण एक जीवधारी को पृथ्वी पर उनके द्वारा गुज़ारे गए वर्शों के दौरान अवश्य करना चाहिए और यह एक नियम है जिसे एक मनुष्य के जीवन में अवश्य होना चाहिए।यह कुछ ऐसा है जिसे आपको अपने अनुभव से और अधिक समझना होगा। इस से कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप अपने अनुभव के किस पड़ाव पर आ चुके हैं, आप परमेश्वर के वचनों और सच्चाई से अलग नहीं हो सकते हैं, और आप जो कुछ परमेश्वर के स्वभाव के बारे में समझते हैं और आप जो परमेश्वर के पास है तथा जो वह है उसके बारे में समझते हैं वे सब परमेश्वर के वचनों में प्रकट है; और वे सत्य से अटूट रूप से जुड़े हुए हैं। परमेश्वर का स्वभाव और जो उसके पास है तथा जो वह है ये सभी अपने आप में सत्य हैं; सत्य परमेश्वर के स्वभाव और जो उसके पास है तथा जो वह है उस का एक प्रमाणिक प्रकटीकरण है। यह जो परमेश्वर के पास है तथा जो वह है उसे ठोस करता है और खुलकर उनके बारे में बताता है; यह सीधे सीधे आपको बताता है कि परमेश्वर को क्या पसंद है, और क्या पसंद नहीं है, वह आपसे क्या कराना चाहता है और वह आपको क्या करने की अनुमति नहीं देना चाहता है, वह किस प्रकार के लोगों से घृणा करता है और वह किस प्रकार के लोगों से प्रसन्न होता है। उन सच्चाईयों के पीछे जो परमेश्वर प्रकट करता है लोग उसके आनन्द, क्रोध, दुख, और प्रसन्नता, साथ ही साथ उसके सार तत्व को देख सकते हैं - यह उसके स्वभाव का प्रकाशन है। जो परमेश्वर के पास है तथा जो वह है उसे जानने, और उसके वचन से उसके स्वभाव को समझने के अलावा, जो बात सब से ज़्यादा महत्वपूर्ण है वह है व्यावहारिक अनुभव के द्वारा इस समझ तक पहुँचने की आवश्यकता। यदि एक व्यक्ति परमेश्वर को जानने के लिए अपने आपको वास्तविक जीवन से अलग कर दे, तो वे उसे हासिल नहीं कर पाएँगे। भले ही कुछ लोग हों जो परमेश्वर के वचन से कुछ समझ प्राप्त कर लें, फिर भी यह सिद्धांतोंऔर वचनों तक ही सीमित रहता है, और वास्तव में परमेश्वर जैसा है यह उसके समान नहीं है।

हम जिस के बारे में बातचीत कर रहे हैं वे सब बाइबल में दर्ज कहानियों के दायरे में हैं। इन कहानियों के द्वारा, और इन चीज़ों के विश्लेशण के द्वारा जो घटित हुए थे, लोग उसके स्वभाव और जो उसके पास है तथा जो वह है और जो कुछ उसने प्रकट किया है उसे समझ सकते हैं, उन्हें यह अनुमति देते हुए कि और अधिक विस्तार, अधिक गहराई, अधिक व्यापकता, और अधिक पूर्णता से परमेश्वर के हर पहलु को समझें। इस प्रकार, क्या ये कहानियाँ ही परमेश्वर के स्वभाव के हर पहलु को जानने का एकमात्र तरीका है? नहीं, यह एकमात्र तरीका नहीं है! क्योंकि जो परमेश्वर कहता है और वह कार्य जो वह राज्य के युगमें करता है उस से परमेश्वर के स्वभाव को जानने, और उसे पूर्णत: जानने में लोगों की और अधिक सहायता हो सकती है। फिर भी, मैं सोचता हूँ कि परमेश्वर के स्वभाव को जानना और जो परमेश्वर के पास है तथा जो वह है उसे कुछ उदाहरणों और बाइबल में दर्ज कहानियों के द्वारा जिन से लोग परिचित हैं समझना थोड़ा आसान है। यदि मैं न्याय और ताड़ना और उन सच्चाईयों के वचनों को लेता हूँ जिन्हें आज परमेश्वर ने प्रकट किया है ताकि आप उसे वचन के अनुसार जान सकें, आप महसूस करेंगे कि यह बहुत मन्द और बहुत थका देनेवाला है, और कुछ लोग यह भी महसूस करेंगे कि परमेश्वर के वचन अनिच्छुक औपचारिक शब्दावली के समान दिखाई देते हैं। परन्तु यदि हम बाइबल की इन कहानियों को उदाहरणों के रूप में लेते हैं ताकि परमेश्वर के स्वभाव को जानने में लोगों को मदद मिल सके, तो वे इस में बोरियत महसूस नहीं करेंगे। आप कह सकते हैं कि इन उदाहरणों की व्याख्या करते समय, उस समय जो परमेश्वर के दिल में था उसका विवरण-उसकी मनःस्थिति या भावना, या उसके विचार और युक्तियाँ-लोगों को मानवीय भाषा में बताया गया था, और इन सब का उद्देश्य उन्हें प्रशंसा करने की मंजूरी देना, और यह एहसास कराना है कि जो परमेश्वर के पास है तथा जो वह है वह एक नुस्खा नहीं है। यह एक पौराणिक गाथा नहीं है, या ऐसा कुछ नहीं है जिसे लोग देख और छू नहीं सकते हैं। यह कुछ ऐसा है जो सचमुच में अस्तित्व में है जिस का लोग एहसास कर सकते हैं, और उसकी तारीफ कर सकते हैं। यह चरम लक्ष्य है। आप कह सकते हैं कि वे लोग जो इस युग में रह रहे हैं धन्य हैं। वे परमेश्वर के पिछले कार्यों की व्यापक समझ को प्राप्त करने के लिए बाइबल की कहानियों का उपयोग कर सकते हैं; वे उस कार्य के द्वारा जो उसने किया है उसके स्वभाव को देख सकते हैं। और वे इन स्वभावों के द्वारा जिन्हें उसने प्रकट किया है मानव जाति के लिए परमेश्वर की इच्छा को समझ सकते हैं, और अपनी पवित्रता के ठोस प्रकटीकरण और मनुष्यों के लिए उसके लालन पालन को समझ सकते हैं ताकि परमेश्वर के स्वभाव के एक अधिक विस्तृत और गहरे ज्ञान तक पहुँच सकें। मैं विश्वास करता हूँ कि आप सभी इसे महसूस कर सकते हैं!

उस कार्य के क्षेत्र के भीतर जिसे प्रभु यीशु ने अनुग्रह के युग में पूरा किया था, आप जो परमेश्वर के पास है तथा जो वह है उसका दूसरा पहलु भी देख सकते हैं।यह उसके शरीर के द्वारा प्रकट हुआ था, और उसे लोगों के लिए संभव किया गया था ताकि वे देखें और उसकी मानवता में होकर तारीफ करें। मनुष्य के पुत्र में, लोगों ने देखा कि किस प्रकार देहधारी परमेश्वर ने अपनी मानवता में जीवन बिताया था, और उन्होंने परमेश्वर की ईश्वरीयता को देखा जो उसकी देह के द्वारा प्रगट हुआ था। इन दो प्रकार के प्रकटीकरण ने लोगों को अनुमति दी कि वे एक सच्चे परमेश्वर को देख सकें, और उन्हें यह भी अनुमति दी कि वे परमेश्वर के बारे में एक अलग विचार बनाएँ। फिर भी, संसार की सृष्टि और व्यवस्था के युग के अन्त के मध्य के समयकाल में, अर्थात्, अनुग्रह के युग से पहले, लोगों के द्वारा जो कुछ देखा, सुना, और अनुभव किया जाता था वह केवल परमेश्वर का ईश्वरीय पहलु था।यह वह था जो परमेश्वर ने अस्पृश्य आयाम में किया था और कहा था, और वे चीज़ें जिन्हें उसने अपने सच्चे व्यक्तित्व से प्रकट किया था उसे देखा और छुआ नहीं जा सकता है। अक्सर, ये चीज़ें लोगों को यह एहसास कराती थीं कि परमेश्वर कितना महान था, और यह कि वे उसके नज़दीक नहीं जा सकते हैं। वह प्रभाव जो परमेश्वर सामान्यतः लोगों के ऊपर डालता था यह था कि वह ज्योति के समान एकदम से प्रगट होता था फिर ग़ायब हो जाता था, और लोगों ने यहाँ तक महसूस किया कि उसके हर एक विचार और युक्ति इतने रहस्यमयी और इतना मायावी थे कि उन तक पहुँचने का कोई मार्ग नहीं था, और वे उनको समझने एवं उनकी तारीफ करने की कोशिश कदापि नहीं करते थे। लोगों के लिए, परमेश्वर के बारे में सब कुछ बहुत दूर था-इतना दूर कि लोग उसे देख नहीं सकते थे, और उसे छू भी नहीं सकते थे। ऐसा लगता था कि वह ऊपर आकाश में है, और ऐसा प्रतीत होता था कि वह बिल्कुल अस्तित्व में ही नहीं है। इस प्रकार लोगों के लिए, परमेश्वर के दिल और मस्तिष्क या उस की किसी सोच को समझना नामुमकिन था, और यहाँ तक कि अगम्य था। यद्यपि परमेश्वर ने व्यवस्था के युग में कुछ ठोस कार्य किए, और कुछ विशेष शब्द प्रकाशित किए और कुछ विशेष स्वभाव को प्रकट किया ताकि लोग उसकी प्रशंसा करें और उसके बारे में कुछ सच्चे ज्ञान को देखें, जो कि अंत में, जो एक अस्पृश्य क्षेत्र में परमेश्वर का प्रकटीकरण है, जो उससे संबंधित है जो उसके पास है और जो वह है, और जो लोगों ने समझा, जो उन्होंने उस परमेश्वरीय पहलू को जाना जिसमें वह विषय है जो उसके पास है और जो वह है।जो परमेश्वर के पास है तथा जो वह है उसकी इस अभिव्यक्ति से मानव ठोस विचार प्राप्त नहीं कर सका, और परमेश्वर के विषय में उनकी पहली छवि अभी भी इसी दायरे के भीतर अटकी हई थी कि वह "एक आत्मा है जिस के करीब जाना कठिन है, जो ज्योति के समानआता है और फिर चला जाता है।" क्योंकि परमेश्वर ने भौतिक आयाम में लोगों को दिखाई देने के लिए एक विशिष्ट तत्व या एक स्वरूप का प्रयोग नहीं किया था, इसलिए वे अभी भी मानवीय भाषा में उसे परिभाषित नहीं कर सकते थे। लोग अपने हृदय और मस्तिष्क में, परमेश्वर के लिए एक ऊँचा स्तर स्थापित करने के लिए, और उसे स्पृश्य और मानवीय बनाने के लिए हमेशा से अपनी स्वयं की भाषा का प्रयोग करना चाहते थे, जैसे कि वह कितना लम्बा है, वह कितना बड़ा है, वह कैसा दिखाई देता है, वह विशेष रूप से क्या पसंद करता है और उसका विशेष व्यक्तित्व क्या है। वास्तव में, परमेश्वर अपने हृदय में जानता था कि लोग इस तरह से सोचते थे।वह लोगों की आवश्यकताओं के विषय में बिल्कुल स्पष्ट था, और हाँ वह यह भी जानता था कि उसे क्या करना चाहिए, इसलिए उसने अनुग्रह के युग में एक अलग तरीके से अपने कार्य को अन्जाम दिया था। यह तरीका ईश्वरीय और मानवीय दोनों था। समय के अन्तराल में प्रभु यीशु काम कर रहा था, लोग यह देख सकते हैं कि परमेश्वर के पास अनेक मानवीय प्रकटीकरण थे। उदाहरण के लिए, वह नृत्य कर सकता था, वह शादी ब्याह में शामिल हो सकता था, वह लोगों से सहभागिता रख सकता था, उनसे बात कर सकता था, और विभिन्न चीज़ों के विषय में उनसे बात कर सकता था। उसके अतिरिक्त, प्रभु यीशु ने बहुत सारे काम को भी पूरा किया था जो उसकी ईश्वरीयता को दर्शाते थे, और हाँ ये सभी कार्य परमेश्वर के स्वभाव का एक प्रकटीकरण और प्रकाशन थे। इस समय के दौरान, जब परमेश्वर की ईश्वरीयता को एक सामान्य देह में एहसास किया गया था जिसे लोग देख और छू सकते थे, और वे आगे से यह महसूस नहीं करते थे कि वह प्रकाश के समान अचानक प्रकट होता है और फिर गायब हो जाता है, जिस के करीब वे नहीं जा सकते थे। इस के विपरीत, वे परमेश्वर की इच्छा का आभास करने की कोशिश कर सकते थे या हरपल, उसके वचनों, और मनुष्य के पुत्र के कार्य के द्वारा उसकी ईश्वरीयता का एहसास कर सकते थे। मनुष्य के पुत्र के देहधारण ने परमेश्वर की मानवीयता के द्वारा उसकी ईश्वरीयता को प्रकट किया था और परमेश्वर की इच्छा को मानव जाति तक पहुँचाया था। और परमेश्वर की इच्छा और स्वभाव के प्रकटीकरण के द्वारा, उसने लोगों के सामने उस परमेश्वर को प्रकाशित किया जिसे आत्मिक आयाम क्षेत्र में देखा और छुआ नहीं जा सकता था। जो लोगों ने देखा वह स्वयं परमेश्वर था, स्पृश्य और हड्डी एवं माँस के साथ।इस प्रकार मनुष्य के पुत्र के देहधारण ने ऐसी चीज़ों को बनाया जैसे परमेश्वर की स्वयं की पहचान, स्तर, स्वरूप, स्वभाव, और जो उसके पास है तथा जो वह है उसे ठोस और मानवीय किया। यद्यपि परमेश्वर के स्वरूप सम्बन्ध में मनुष्य के पुत्र के बाहरी रूप में कुछ सीमाएँ थीं, फिर भी उसका सार तत्व और जो उसके पास है तथा जो वह है वे पूर्णत: परमेश्वर की स्वयं की पहचान और स्थितिको दर्शाने में सक्षम हैं-प्रकटीकरण के रूप में वहाँ केवल कुछ भिन्नताएँ थीं। इस से कोई फर्क नहीं पड़ता है कि ये मनुष्य के पुत्र की मानवीयता है या उसकी ईश्वरीयता, हम इन्कार नहीं कर सकते हैं कि यह स्वयं परमेश्वर की पहचान और उसकी स्थिति को दर्शाता है। फिर भी इस समय के दौरान, परमेश्वर ने देह में होकर कार्य किया, और देह के दृष्टिकोण से बात किया, और मानव जाति के सामने मनुष्य के पुत्र की पहचान और स्थिति के साथ खड़ा हुआ, और इस ने लोगों को मानव जाति के बीच में परमेश्वर के सच्चे वचनों और कार्य का सामना और अनुभव करने का अवसर दिया। इस ने लोगों को यह भी अनुमति दी कि वे विनम्रता के मध्य उसकी ईश्वरीयता और उसकी महानता की अंतःदृष्टि प्राप्त कर सकें, साथ ही साथ परमेश्वर की प्रमाणिकता और वास्तविकता की एक प्रारम्भिक समझ और एक प्रारम्भिक परिभाषा को भी प्राप्त कर सकें। भले ही प्रभु यीशु के द्वारा कार्य पूरा कर लिया गया था, फिर भी कार्य करने के उसके तरीके, और वह दृष्टिकोण जिस के तहत उसने कहा वह आत्मिक संसार में परमेश्वर के सच्चे व्यक्तित्व से अलग था, उसके बारे में हर चीज़ सचमुच में स्वयं परमेश्वर को दर्शाता था जिसे मनुष्यों ने कभी भी नहीं देखा था - इस का इन्कार नहीं किया जा सकता है! ऐसा कहना होगा कि, इस से कोई फर्क नहीं पड़ता है कि परमेश्वर किस रूप में प्रकट होता है, इस से कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वह किस दृष्टिकोण से बात करता है, या वह किस स्वरूप में मानव जाति के सामने आता है, परमेश्वर और किसी को नहीं परन्तु स्वयं अपने आपको दर्शाता है।वह किसी मनुष्य को दर्शा नहीं सकता है-वह किसी भ्रष्ट मनुष्य को दर्शा नहीं सकता है। परमेश्वर अपने आप में स्वयं परमेश्वर है, और इस का इनकार नहीं किया जा सकता है।

आगे हम अनुग्रह के युग में प्रभु यीशु के द्वारा बोले गए दृष्टान्त पर नज़र डालेंगे।

3.खोई हुई भेड़ का दृष्टान्त

(मत्ती18:12-14) क्या तुम समझते हो? यदि किसी मनुष्य की सौ भेड़ें हों, और उन में से एक भटक जाए, तो क्या निन्नयानवे को छोड़कर, और पहाड़ों पर जाकर, उस भटकी हुई को ना ढूंढ़गा? और यदि ऐसा हो कि उसे पाए, तो मैं तुम से सच कहता हूँ, कि वह उन निन्नयानवे भेडों के लिए जो भटकी हुई नहीं थी इतना आनन्द नहीं करेगा, जितना कि इस भेड़ के लिए करेगा। ऐसे ही तुम्हारे पिता की जो स्वर्ग में है यह इच्छा नहीं, कि इन छोटों में से एक भी नाश हो।

यह एक अलंकार है - इस अंश से आप किस प्रकार का एहसास प्राप्त करते हैं? जिस तरह से इस अलंकार को प्रदर्शित किया गया है वह मानवीय भाषा में वाक्य अलंकार का उपयोग करता है; यह कुछ ऐसा है जो मनुष्य के ज्ञान के दायरे के भीतर है। यदि परमेश्वर ने व्यवस्था के युग में ऐसा कुछ कहा होता, तो लोगों ने महसूस किया होता किवास्तव में जो परमेश्वरहै यह उस के अनुरूप नहीं था, लेकिन जब मनुष्य के पुत्र ने अनुग्रह के युग में इस अंश को प्रदान किया, तब इस से लोगों को सुकून, उत्साह, और घनिष्ठता मिली।जब परमेश्वर देहधारी हुआ, जब वह एक मनुष्य के रूप में प्रकट हुआ, तो उसने मानवता पर अपनी आवाज़ को प्रकट करने के लिए बिल्कुल उचित अलंकार का उपयोग किया। यह आवाज़ परमेश्वर के स्वयं की आवाज़ का और उस कार्य का प्रतिनिधित्व करता है जो वह उस युग में करना चाहता था। लोगों के प्रति परमेश्वर की मनोव्र्तियाँके नज़रिए से देखने से पता चलता है कि, उसने हर व्यक्ति की तुलना एक भेड़ से की है। यदि एक भेड़ खो जाती है, तो उसे खोजने के लिए जो कुछ हो सकता है वह करेगा।यह इस समय मनुष्यों के बीच परमेश्वर के कार्य के सिद्धांत को देह में दर्शाता है। परमेश्वर ने इस कार्य में अपनी दृढ़ता औरमनोवृत्ति की व्याख्या करने के लिए इस दृष्टान्त को प्रयोग किया था। यह परमेश्वर के देहधारण का लाभ थाः वह मानव जाति के ज्ञान का लाभ उठा सकता था और लोगों से बात करने, और अपनी इच्छा को प्रकट करने के लिए मानवीय भाषा का उपयोग कर सकता था। उसने मनुष्यों के लिए अपनी गहरी, और ईश्वरीय भाषा की व्याख्या की एवं अनुवाद किया जिसे मानवीय भाषा, और मानवीय तरीके से समझने में लोगों को संघर्ष करना पड़ता था। इस से लोगों को उस की इच्छा को समझने में और यह जानने में सहायता मिली कि वह क्या करना चाहता था। वह मानवीय भाषा का प्रयोग करके, मानवीय दृष्टिकोण से लोगों के साथ वार्तालाप कर सकता था, और साथ ही वह उस तरीके से लोगों से बातचीत कर सकता था जिसे वे समझ सकते थे। वह मानवीय भाषा और ज्ञान का उपयोग कर के बातचीत और काम कर सकता था जिस से लोग परमेश्वर की करूणा और नज़दीकी का एहसास कर सकते थे, जिस से वे उस के हृदय को देख सकते थे। आप इस में क्या देखते हैं? यह कि परमेश्वर के वचनों और क्रियाओं में कोई प्रतिबन्ध नहीं था। जिस तरह से लोग इसे देखते हैं, हो ही नहीं सकता था कि वह बात जो परमेश्वर स्वयं कहना चाहता था, और वह कार्य जो वह करना चाहता था उसके बारे में बात करने के लिए, या अपनी स्वयं की इच्छा को प्रकट करने के लिए परमेश्वर मनुष्यों के ज्ञान, भाषा, या बोलने के तरीकों का प्रयोग कर सकता था; यह एक त्रुटिपूर्ण सोच है। परमेश्वर ने इस प्रकार के अलंकार का प्रयोग किया जिस से लोग परमेश्वर की वास्तविकता और ईमानदारी का एहसास कर सकते हैं, और उस समय काल के दौरान लोगों के प्रति उसकी मनोवृत्तियोंको देख सकते हैं। इस दृष्टान्त ने उन लोगों को नींद से जगा दिया था जो लम्बे समय से व्यवस्था के आधीन जीवन व्यतीत कर रहे थे, और इस ने अनुग्रह के युग में रहनेवाले लोगों को भी पीढ़ी दर पीढ़ी प्रेरित किया था। इस दृष्टान्त के अंश को पढ़ने से, लोग मानव जाति को बचाने हेतु परमेश्वर की सत्यनिष्ठा और उसके दिल में मानव जाति के लिए जो बोझ है उसे जान सकते हैं।

आइए हम इस अंश के अन्तिम वाक्य पर एक नज़र डालें: "ऐसे ही तुम्हारे पिता की जो स्वर्ग में है यह इच्छा नहीं, कि इन छोटों में से एक भी नाश हो।" क्या ये प्रभु यीशु के स्वयं के शब्द थे, या उसके स्वर्गीय पिता के शब्द थे? सतही तौर पर, ऐसा लगता है कि वह जो बात कर रहा है वह प्रभु यीशु है, परन्तु उसकी इच्छा प्रभु यीशु की इच्छा को प्रगट कर रहा है। इसी लिए उसने कहा थाः "ऐसे ही तुम्हारे पिता की जो स्वर्ग में है यह इच्छा नहीं, कि इन छोटों में से एक भी नाश हो।" उस समय लोग केवल स्वर्गीय पिता को ही परमेश्वर के रूप में पहचानते थे, और इस व्यक्ति को जिसे वे अपनी आँखों के सामने देखते थे उसे बस उसके द्वारा भेजा हुआ समझते थे, और यह कि वह स्वर्गीय पिता का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता था। इसी लिए प्रभु यीशु को साथ ही साथ ऐसा कहना पड़ा था, ताकि वे सचमुच में मानव जाति के लिए परमेश्वर की इच्छा को अनुभव कर सकें, और जो कुछ उसने कहा था उसकी प्रमाणिकता और सटीकता का एहसास कर सकें। भले ही यह कहने में एक साधारण बात थी, परन्तु यह बहुत ही ज़्यादा परवाह करने वाली बात थी और इस ने प्रभु यीशु की दीनता और रहस्य को प्रकाशित किया था। इस से कोई फर्क नहीं पड़ता कि चाहे परमेश्वर ने देहधारण किया या उसने आत्मिक क्षेत्र में काम किया, वह मनुष्य के हृदय को सब से बढ़कर जानता था, और सब से बढ़कर यह समझता था कि लोगों की जरूरतें क्या थीं, और जानता था कि लोगों को कौन सी चिंता सताती थी, और क्या उन्हें भ्रम में डालता था, इसलिए उसने इस पंक्ति को जोड़ दिया था। इस पंक्ति ने एक समस्या को उजागर किया जो मानव जाति में छिपी हुई थी। मनुष्य के पुत्र ने जो कुछ भी कहा था उसको लेकर लोग सन्देह में थे, ऐसा कहना चाहिए, जब प्रभु यीशु कह रहा था उसे यह जोड़ना पड़ा थाः "ऐसे ही तुम्हारे पिता की जो स्वर्ग में है यह इच्छा नहीं, कि इन छोटों में से एक भी नाश हो।" केवल इस पूर्वकथन पर ही उसके वचन फलवन्त हो सकते थे, ताकि उनकी सटीकता तथा उनकी विश्वसनीयता पर लोगों को विश्वास दिलाया जा सके। यह दिखाता है कि जब परमेश्वर मनुष्य का एक साधारण पुत्र बन गया, तब परमेश्वर और मनुष्य जाति का सम्बन्ध बड़ा अजीब सा था, और मनुष्य के पुत्र की स्थिति बहुत व्याकुल करनेवाली थी। इस से यह भी दिखता था कि उस समय मनुष्यों के बीच में प्रभु की स्थिति कितनी महत्वहीन थी। जब उसने ऐसा कहा, तो यह वास्तव में लोगों को बताने के लिए थाः आप भरोसा कर सकते हैं-यह उसे नहीं दर्शाता है जो स्वयं मेरे दिल में है, परन्तु यह परमेश्वर की वह इच्छा है जो आपके दिल में है। मानव जाति के लिए, क्या यह एक हास्यास्पद बात नहीं थी? भले ही परमेश्वर देह में होकर काम कर रहा था और उसके पास अनेक फायदे थे जो उसके व्यक्तित्व में नहीं थे, फिर भी उसे उनके सन्देहों और तिरस्कार का सामना करना पड़ा था साथ ही उनकी स्तब्धता और मूढ़़ता का भी। ऐसा कहा जा सकता है कि मनुष्य के पुत्र के कार्य की प्रक्रिया मानव जाति के द्वारा तिरस्कृत किए जाने के अनुभव की प्रक्रिया, और मानव जाति के द्वारा उसके विरूद्ध प्रतिस्पर्धा किए जाने के अनुभव की प्रक्रिया थी। उस से बढ़कर, यह मानव जाति के भरोसे को निरन्तर जीतने और जो उस के पास है तथा जो वह है उसके द्वारा, और अपने स्वयं के सार तत्व के द्वारामानव जाति पर विजय पाने के लिए काम करने की प्रक्रिया थी। वह इतना नहीं था कि देहधारी परमेश्वर ज़मीन पर शैतान के विरूद्ध युद्ध कर रहा था; यह उस से अधिक था कि परमेश्वर एक सामान्य मनुष्य बन गया और उनसे संघर्ष करना प्रारम्भ कर दिया जो उस का अनुसरण करते थे, और अपने संघर्ष में मनुष्य के पुत्र ने अपनी दीनता के साथ, जो उसके पास है तथा जो वह है उसके साथ, और अपने प्रेम और बुद्धि के साथ अपना कार्य पूरा किया था। उसने उन लोगों को हासिल किया जिन्हें वह चाहता था, उस पहचान और स्थिति को हासिल किया जिस के वह योग्य था, और अपने सिंहासन की ओर लौट गया।

आगे, आइए हम पवित्र शास्त्र के निम्नलिखित दो अंशों को देखें।

4.सात बार के सत्तरगुने तक क्षमा करो।

(मत्ती18:21-22) तब पतरस ने आकर, उससे कहा, हे प्रभु, यदि मेरा भाई अपराध करता रहे, तो मैं कितनी बार उसे क्षमा करूँ, क्या सात बार तक? यीशु ने उस से कहा, मैं तुझ से यह नहीं कहता, कि सात बार, वरन सात बार के सत्तर गुने तक।

5.प्रभु का प्रेम

(मत्ती22:37-39) उसने उस से कहा, तू परमेश्वर अपने प्रभु से अपने सारे मन और अपने सारे प्राण और अपने सारे बुद्धि के साथ प्रेम रख। बड़ी और मुख्य आज्ञा तो यही है। और उसी के समान यह दूसरा भी है, कि तू अपने पड़ौसी से अपने समान प्रेम रख।

इन दोनों अंशों में, एक क्षमा के बारे में बात करता है और दूसरा प्रेम के बारे में बात करता है। ये दोनों कार्य वास्तव में प्रभु यीशु के कार्यों को उजागर करते हैं जिन्हें यीशु अनुग्रह के युग में पूरा करना चाहता है।

जब परमेश्वर देहधारी हो गया, वह उसके साथ अपने कार्य का एक स्तर भी लेकर आया-वह उसके साथ इस युग का विशिष्ट कार्य और वह स्वभाव भी लेकर आया जिसे वह प्रदर्शित करना चाहता था। उस समयकाल में, वह सब कुछ जो मनुष्य के पुत्र ने किया था वह उस कार्य के चारों ओर घूमने लगा था जिसे परमेश्वर इस युग में करना चाहता था। इस के बावजूद कि उसने इसे मानवीय तरीके से मानवीय भाषा में प्रदर्शित किया या ईश्वरीय भाषा में-इस से कोई फर्क नहीं पड़ता है कि कौन सा तरीका था, या किस दृष्टिकोण से था-उसका उद्देश्य था कि जो वह करना चाहता था, जो उसकी इच्छा थी, और लोगों सेजो उसकी अपेक्षाएँ थीं उन्हें समझने में उनकी सहायता कर सके। वह विभिन्न दृष्टिकोण से विभिन्न माध्यमों का उपयोग कर सकता था ताकि लोगों को उसकी इच्छा को समझने और जानने में मदद मिल सके, और वे मानव जाति को बचाने के उसके कार्य को समझ सकें। इस प्रकार हम अनुग्रह के युग में देखते हैं कि प्रभु यीशु जो मानव जाति को बताना चाहता था उसे प्रदर्शित करने के लिए बार बार मानवीय भाषा का प्रयोग करता है। उस से भी बढ़कर, हम उसे एक सामान्य मार्गदर्शक के दृष्टिकोण से भी देखते हैं जो लोगों के साथ बात कर रहा है, उन की जरूरतों को पूरा कर रहा है, और जिस के लिए उन्होंने विनती की है उस में उनकी सहायता कर रहा है। इस प्रकार का कार्य व्यवस्था के युग में देखने में नहीं आता था जो अनुग्रह के युग के पहले आया था। वह मानव जाति के साथ और ज़्यादा घनिष्ठ हो गया और उनके प्रति और अधिक तरस से भर गया था, साथ ही साथ दोनों रूपों और तरीकों में व्यावहारिक परिणामों को प्राप्त करने में और अधिक सक्षम हो गया था। "सात बार के सत्तर गुने तक" लोगों के पापों को क्षमा करने का उद्गार वास्तव में इस बिन्दु को स्पष्ट करता है। इस प्रकटीकरण के प्राप्त संख्या का उद्देश्य यह था कि लोगों को प्रभु यीशु के ईरादे को समझने की अनुमति मिल सके जब उसने उस समय ऐसा कहा था। उसका इरादा था कि लोग एक दूसरे को क्षमा कर सकें-ना केवन एक या दो बार, और ना ही सात बार, पर सात बार के सत्तर गुने तक। "सात बार के सत्तर गुने तक" यह किस प्रकार का विचार है? यह इसलिए था कि लोग जान सकें कि क्षमा करना उन की जिम्मेदारी है, ऐसा कुछ जिसे उन्हें सीखना ही होगा, और एक ऐसा मार्ग जिस पर उनको चलना ही होगा।भले ही यह मात्र एक अभिव्यक्ति थी, किन्तु इस ने एक निर्णायक बिन्दु की भूमिका निभाई थी। इस ने लोगों की सहायता की कि जो वह कहना चाहता था वे उसकी गहराई से तारीफ करें और अभ्यास के उचित तरीकों और अभ्यास में सिद्धांतों और ऊँचे स्तर की खोज करें। इस अभिव्यक्ति ने साफ साफ समझने में लोगों की सहायता की और उन्हें एक बिल्कुल सही विचार दिया कि उन्हें क्षमाकरना सीखना होगा-बिना किसी शर्त और बिना किसी सीमाओं के क्षमा करना, किन्तु सहिष्णुता की मानसिकता और दूसरों को समझते हुए। जब प्रभु यीशु ने ऐसा कहा, तब उसके हृदय में क्या था? क्या वह वास्तव में सात बार के सत्तर गुने तक के बारे में सोच रहा था? वह नहीं सोच रहा था। क्या उन समयों की संख्या की गिनती हो सकती है जितनी बार परमेश्वर मनुष्य को क्षमा करेगा। ऐसे बहुत से लोग हैं जो "समयों की संख्या की गिनती" में रूचि रखते हैं जिस का जिक्र हुआ है, जो वास्तव में इस संख्या के उद्गम और अर्थ के बारे में समझना चाहते हैं। वे समझना चाहते हैं कि यह संख्या प्रभु यीशु के मुँह से क्यों निकला था; वे विश्वास करते हैं कि इस संख्या में कहीं गहरा अर्थ निहित है। वास्तव में, यह सिर्फ मानवीयता में परमेश्वर का बोला गया कथन है। किसी भी अभिप्राय या अर्थ को मानव जाति के प्रति प्रभु यीशु की आकांक्षाओंके साथ साथ लेना होगा।जब परमेश्वर ने देहधारण नहीं किया था, तब जो कुछ वह कहता था लोग उसे काफी हद तक नहीं समझते थे क्योंकि वह सम्पूर्ण ईश्वरत्व से आता था। वह दृष्टिकोण और सन्दर्भ जिन के बारे में वह कहता था वह मानव जाति के लिए अदृश्य और अगम्य था; वह आत्मिक आयाम से प्रकट होता था जिसे लोग समझ नहीं सकते थे। ऐसे लोग जिन्हों ने देह में जीवन बिताया था, वे आत्मिक आयाम से होकर गुज़र नहीं सकते थे। परन्तु परमेश्वर के देहधारण के बाद, उसने मनुष्यों से मानवीय दृष्टिकोण से बात की, और यह संवाद आत्मिक आयाम के दायरे से बाहर आया और उस से आगे बढ़ गया था।वह अपने ईश्वरीय स्वभाव, इच्छा, और मनोवृत्तियाँको प्रगट कर सकता था, उन चीज़ों के द्वारा जिस की कल्पना मनुष्य कर सकते थे और उन चीज़ों के द्वारा जो उन्होंने अपने जीवनों में देखाऔर सामना किया था, और ऐसी पद्धतियों के प्रयोग के द्वारा जिन्हें मनुष्य स्वीकार कर सकते थे, एक ऐसी भाषा में जिसे वे समझ सकते थे, और ऐसे ज्ञान के द्वारा जिस का वे आभास कर सकते थे, ताकि मानव जाति को उस मात्रा तक जितना वे सह सकते थे परमेश्वर को समझने और जानने, और उनकी क्षमता के दायरे के भीतरउसके अर्थ और उसके अपेक्षित ऊँचे स्तर को बूझने की अनुमति दे सके।यह मानवता मे परमेश्वर के कार्य की पद्धति और सिद्धांत थे। यद्यपि देह में होकर कार्य करने से परमेश्वर के तरीकों और सिद्धांतोंको मुख्यतः उसकी मानवता के द्वारा या उस में होकर हासिल किया गया था, फिर भी इस ने सचमुच में ऐसे परिणामों को हासिल किया जिन्हें सीधे ईश्वरीयता में होकर कार्य करने से हासिल नहीं किया जा सकता था। मानवता में परमेश्वर के कार्य ज़्यादा ठोस, प्रमाणिक, और लक्ष्य पर आधारित थे, और पद्धतियाँ कहीं ज़्यादा लचीली थीं, तथा आकार में यह व्यवस्था के युग से बढ़कर हो गया था।

नीचे, आइए हम प्रभु से प्रेम करने और अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम करने के बारे में बात करें।क्या यह कुछ ऐसा है जो सीधे तौर पर ईश्वरीयता में प्रगट है? कदापि नहीं! यह सब वे चीज़ें थीं जिन्हें मनुष्य के पुत्र ने मानवता में कहा था; केवल लोग ही कुछ ऐसा कहेंगे "अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम कर। दूसरों से प्रेम करना अपने स्वयं के जीवन का लालन पालन करने के समान है," और केवल लोग ही ऐसी रीति से बात कर सकते हैं। परमेश्वर ने कभी भी इस तरह बात नहीं की थी। और कम से कम, परमेश्वर के पास अपनी ईश्वरीयता में इस प्रकार की भाषा नहीं थी क्योंकि उसे मानव जाति के प्रति अपने प्रेम को व्यवस्थित करने के लिए इस प्रकार के सिद्धांत की आवश्यकता नहीं थी कि "अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम कर," क्योंकि मानव जाति के लिए परमेश्वर का प्रेम जो उसके पास है तथा जो वह है उसका स्वाभाविक प्रकाशन है। क्या आप ने कभी सुना है कि परमेश्वर ने कुछ ऐसा कहा "मैं मनुष्य से ऐसा प्रेम करता हूँ जैसा मैं अपने आप से प्रेम करता हूँ?" क्योंकि प्रेम परमेश्वर के सार तत्व में, और जो उसके पास है तथा जो वह है उस में है। मानव जाति के लिए परमेश्वर का प्रेम और वह जिस रीति से लोगों से व्यवहार करता है और उसकी मनोवृत्तियाँउसके स्वभाव का स्वाभाविक प्रकटीकरण और प्रकाशन है। उसे किसी निश्चित तरीके से जानबूझकर ऐसा करने की कोई आवश्यकता नहीं है, या अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम करने के लिए जानबूझकर कर किसी निश्चित तरीके या एक नैतिक नियम का अनुसरण करने की कोई आवश्यकता नहीं है-उसके पास पहले से ही इस प्रकार का सार तत्व है। आप इस में क्या देखते हैं? जब परमेश्वर ने मानवता में होकर काम किया, तो उसकी बहुत सारी पद्धतियाँ, कार्य, और सच्चाईयाँ सब कुछ मानवीय तरीके से प्रगट हो गए थे। परन्तु उस समय परमेश्वर का स्वभाव, और जो उसके पास है तथा जो वह है वह सब लोगों के लिए प्रगट हुआ ताकि उन्हें जाना और समझा जा सके। जो कुछ उन्होंने जाना और समझा था वहवास्तव मेंजो उसके पास है तथा जो वह है और उसका सार तत्व था, जो स्वयं परमेश्वर की स्वाभाविक पहचान और स्थिति को दर्शाता था। ऐसा कहना चाहिए, कि मनुष्य के पुत्र के देहधारण ने स्वयं परमेश्वर के अंतर्निहित स्वभाव और सार तत्व को संभावित सब से बड़े पैमाने तक और जहाँ तक हो सके उतने सटीकरूप में प्रगट किया था। ना केवल मनुष्य के पुत्र की मानवीयता स्वर्गीय परमेश्वर के साथ मनुष्य के संवाद और परस्पर व्यवहार में एक रूकावट या एक बाधा नहीं थी, किन्तु वह मनुष्य जाति के लिए सृष्टि के प्रभु से जुड़ने का एकमात्र माध्यम और एकमात्र पुल था। इस बिन्दु पर, क्या आप यह महसूस नहीं करते हैं कि अनुग्रह के युग में प्रभु यीशु के द्वारा किए गए कार्य के स्वभाव और पद्धतियों और कार्य की वर्तमान स्थिति के मध्य बहुत सारी समानताएँ हैं? कार्य की यह वर्तमान स्थिति परमेश्वर के स्वभाव को प्रगट करने के लिए ढेर सारी मानवीय भाषाओं का उपयोग करती है, और यह परमेश्वर की स्वयं की इच्छा को प्रगट करने के लिए मानव जाति के दैनिक जीवन और मानवीय ज्ञान से ढेर सारी भाषाओं और पद्धतियों का भी प्रयोग करती है।एक बार जब परमेश्वर देहधारी हो गया, तो इस से कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वह मानवीय दृष्टिकोण से बात कर रहा है या ईश्वरीय दृष्टिकोण से, क्योंकि प्रकटीकरण की उसकी अधिकांश भाषा और पद्धतियाँ वे सभी मानवीय भाषा एवं पद्धतियों के माध्यम से होती थीं। अर्थात्, जब परमेश्वर देहधारी हुआ, तो यह आपके लिए उसकी सर्वसामर्थता और उसकी बुद्धिमत्ती को देखने और परमेश्वर के प्रत्येक सच्चे पहलु को जानने के लिएबेहतरीन अवसर था।जब परमेश्वर देहधारी हुआ, जैसे जैसे वह बढ़ रहा था, उसने मनुष्य के ज्ञान, व्यावहारिक ज्ञान, भाषा, और मानवीयता में प्रकटीकरण की पद्धतियों को समझा, सीखा, और आभास किया। परमेश्वर के देहधारण में यह सब चीज़ें थीं जो मनुष्यों से आए थे जिन्हें उसने सृजा था। वे देह में उसके स्वभाव और उसकी ईश्वरीयता को प्रगट करने के लिए परमेश्वर के औज़ार बन गए थे, और जब वह मानवीय दृष्टिकोण से और मानवीय भाषा का प्रयोग करते हुए मनुष्यों के बीच कार्य कर रहा था, तब उन्होंने उसे अपने कार्य को अधिक उचित, अधिक प्रमाणिक, और अधिक सटीक बनाने के लिए स्वीकृति प्रदान की। इस ने लोगों के लिए इसे अधिक सुगम और आसानी से समझने योग्य बनाया, इस प्रकार ऐसे परिणामों को प्राप्त किया जिन्हें परमेश्वर चाहता था। क्या इस तरह देह में बात करना परमेश्वर के लिए अधिक व्यावहारिक नहीं था? क्या यह परमेश्वर की बुद्धि नहीं है? जब परमेश्वर देहधारी हुआ, और जब परमेश्वर का देहधारण उस कार्य को लेने में सक्षम हुआ जिसे वह करना चाहता था, यह तब हुआ जब उसने अपने स्वभाव और अपने कार्य को ज़मीन पर प्रगट किया होगा, और यह वह समय भी था जब वह मनुष्य के पुत्र के रूप में आधिकारिक रूप से अपनी सेवकाई की शुरूआत कर सकता था। इस का मतलब था कि अब आगे से परमेश्वर और मनुष्यों के बीच कोई खाई नहीं होगी, और यह कि परमेश्वर जल्द ही सन्देशवाहकों के द्वारा संवाद के अपने कार्य को रोक देगा, और स्वयं परमेश्वर व्यक्तिगत रूप से सभी वचनों को प्रकट करेगा और देह में होकर काम करेगा जिसे वह करना चाहता था। इस का अर्थ यह भी था कि वे लोग जिन्हें परमेश्वर ने बचाया था उसके बेहद करीब थे, और उसके प्रबन्धकीय कार्य ने एक नए सीमाक्षेत्र में कदम रखा था, और पूरी मानव जाति का आमना सामना एक नए युग से होनेवाला था।

प्रत्येक जिस ने बाइबल पढ़ा है जानता है कि बहुत सी चीज़ें घटित हुई थीं जब यीशु का जन्म हुआ था। उन में से सब से बड़ा था शैतान के द्वारा मार गिराया जाना, यहाँ तक कि उस बिन्दु तक जहाँ सारे बच्चों को जो दो वर्ष या उस से नीचे के थे उन्हें मारा जा रहा था। यह प्रकट है कि मनुष्यों के बीच देहधारी होकर परमेश्वर ने बड़े जोखिम का अनुमान लगा लिया था; और यह भी प्रकट है कि मानव जाति को बचाने के उसके प्रबन्ध को पूरा करने के लिए उसने एक बड़ी कीमत चुकाई है। वे बड़ी आशाएँ जो परमेश्वर को अपने कार्य के ऊपर था जिसे उसने देह में होकर मानव जाति के मध्य किया था वे भी प्रगट थे। जब परमेश्वर की देह मानव जाति के मध्य अपने कार्य को लेने में सक्षम हुआ, तो वह कैसा महसूस कर रहा था? लोगों को उसे थोड़ा बहुत समझना चाहिए, सही है? कम से कम परमेश्वर प्रसन्न था क्योंकि वह मानव जाति के मध्य अपने नए कार्य के विकास को प्रारम्भ कर सकता था। जब प्रभु यीशु ने बपतिस्मा लिया था और अपनी सेवकाई को पूरा करने के लिए आधिकारिक रूप से अपने कार्य को प्रारम्भ किया, तो परमेश्वर का हृदय आनन्द से भर गया क्योंकि इतने सालों के इन्तज़ार और तैयारी के बाद वह अंततः एक औसत इन्सान की देह को पहन सकता था और लहू और माँस के एक मनुष्य के रूप में अपने नए कार्य को प्रारम्भ कर सकता था जिसे लोग देख और छू सकते थे। वह अंततः मनुष्य की पहचान के द्वारा लोगों के साथ आमने सामने और दिल से दिल मिला कर बात कर सकता था। परमेश्वर मानवीय भाषा में, मानवीय तरीके से मानव जाति के साथ रूबरू हो सकता था; वह मानव जाति की जरूरतों को पूरा कर सकता था, उन्हें प्रकाशमान कर सकता था, और मानवीय भाषा का उपयोग कर उनकी सहायता कर सकता था; वह एक ही मेज़ पर बैठ कर भोजन कर सकता था और उसी जगह पर उनके साथ रह सकता था। वह मनुष्यों को भी देख सकता था, चीज़ों को देख सकता था, और जैसा मनुष्य देखते हैं उस तरह हर चीज़ को देख सकता था और वो भी स्वयं अपनी आँखों से। परमेश्वर के लिए, यह पहले से ही देह में उसके कार्य की उसकी पहली विजय थी। ऐसा भी कहा जा सकता है कि यह एक महान कार्य की पूर्णता थी-यह वास्तव में वह था जिस के बार में परमेश्वर सब से अधिक प्रसन्न था। तब से यह पहली बार था जब परमेश्वर ने मानव जाति के मध्य अपने कार्य में एक प्रकार का सुकून महसूस किया। यह सभी घटनाएँ बहुत व्यावहारिक और बहुत स्वाभाविक थे, और वह सुकून जो परमेश्वर ने महसूस किया था वह बहुत ही सच्चा था। मानव जाति के लिए, जब भी परमेश्वर के कार्य का एक स्तर पूरा होता था, और जब भी परमेश्वर संतुष्टि का एहसास करता था, वह तब होता था जब मानव जाति परमेश्वर के करीब आता था, और जब लोग उद्धार के निकट आते थे।परमेश्वर के लिए, यह उस के नए कार्य की शुरूआत है, जब उसकी प्रबन्धकीय योजना ने एक कदम आगे बढा़या है, और इस के अतिरिक्त, जब उस की इच्छा पूर्णत: सिद्धता तक पहुँचेगी। मानव जाति के लिए, इस प्रकार के अवसर का आगमन सौभाग्यशाली, और बहुत अच्छा है; उन सब के लिए जो परमेश्वर के उद्धार की बाट जोहते हैं, यह एक महत्वपूर्ण समाचार है। जब परमेश्वर कार्य के एक नए स्तर को करता है, तब वह एक नई शुरूआत करता है, और जब मानव जाति के मध्य इस नए कार्य और नई शुरूआत का आरम्भ और परिचय हो जाता है, यह तब होता है जब पहले से ही इस कार्य के स्तर के परिणाम को निर्धारित कर लिया जाता है, और इसे पूर्ण कर लिया जाता है, और परमेश्वर पहले से ही उसके प्रभावों और फलों को देख लेता है। यह तब भी होता है जब ये प्रभाव परमेश्वर को सन्तुष्टि का एहसास दिलाते हैं, और तब वास्तव में उसका हृदय प्रसन्न होताहै। क्योंकि, परमेश्वर की नज़रों में उसने पहले से ही उन लोगों को निर्धारित कर दिया है जिन्हें वह ढूँढ़ रहा है, और पहले से ही इस समूह को प्राप्त कर लिया है, एक ऐसा समूह जो उसके कार्य को करने में सक्षम है और उसे सन्तुष्टि प्रदान कर सकता है, परमेश्वर पुनः आश्वासन का एहसास करता है, वह अपनी चिन्ताओं को दरकिनार करता है, और वह प्रसन्नता का एहसास करता है। दूसरे शब्दों में, जब परमेश्वर की देह मनुष्य के मध्य एक नए कार्य की साहसिक यात्रा पर जाने को सक्षम हो जाता है, और वह उस कार्य को करना प्रारम्भ कर देता है जिसे उसे बिना किसी अड़चन के करना होगा, और जब उस को यह एहसास होता है कि सब कुछ पूर्ण किया जा चुका है, तोउसने उसके अन्त को पहले से ही देख लिया है। और इस अन्त के कारण वह सन्तुष्ट है, प्रसन्न दिल है। परमेश्वर की प्रसन्नता किस प्रकार प्रकट होती है? क्या आप उसकी कल्पना कर सकते हैं? क्या परमेश्वर रोया था? क्या परमेश्वर रो सकता है? क्या परमेश्वर ताली बजा सकता है? क्या परमेश्वर नृत्य कर सकता है? क्या परमेश्वर गाना गा सकता है? वह गीत कैसा होगा? हाँ वास्तव में परमेश्वर एक सुन्दर और पिघला देनेवाला गीत गा सकता है, एक गीत जो उसके हृदय के आनन्द और प्रसन्नता को प्रदर्शित कर सकता है। वह उसे मानव जाति के लिए गा सकता है, अपने आप के लिए गा सकता है, और सभी चीज़ों के लिए गा सकता है। परमेश्वर की प्रसन्नता को किसी भी तरीके से व्यक्त किया जा सकता है-यह सब कुछ सामान्य है क्योंकि परमेश्वर के पास आनन्द और दुख दोनों हैं, और उसके विभिन्न एहसासों को विभिन्न तरीकों से प्रदर्शित किया जा सकता है। यह उसका अधिकार है और यह बिल्कुल सामान्य चीज़ है। आपको इस के बारे में कुछ और नहीं सोचना चाहिए, और आपको अपनी अड़चनों को परमेश्वर पर थोपना नहीं चाहिए, और आप उसकी प्रसन्नता या उसके किसी एहसास को सीमित करने के लिए उस से कहते हैं कि उसे यह नहीं करना चाहिए या वह नहीं करना चाहिए, उसे इस तरह काम नहीं करना चाहिए या उस तरह काम नहीं करना चाहिए। लोगों के हृदयों में परमेश्वर प्रसन्न नहीं हो सकता है, वह आँसू नहीं बहा सकता है, वह विलाप नहीं कर सकता है-वह किसी भावना को व्यक्त नहीं कर सकता है। जिन बातों के द्वारा हम ने दो बार बातचीत की, उस से मैं यह विश्वास करता हूँ कि आप परमेश्वर को आगे से इस तरह नहीं देखेंगे, परन्तु परमेश्वर को अनुमति देंगे कि उसके पास कुछ स्वतन्त्रता और राहत हो। यह बहुत ही अच्छी बात है। भविष्य में यदि आप सचमुच में परमेश्वर की उदासी को महसूस करने में सक्षम हो जाते हैं जब आप उस की उदासी के बारे में सुनते हैं, और आप सचमुच में उसकी प्रसन्नता को महसूस करने में सक्षम हो जाते हैं जब आप उसकी प्रसन्नता के बारे में सुनते हैं-कम से कम, स्पष्ट रीति से आप यह जानने के योग्य हो गए हैं कि क्या परमेश्वर को प्रसन्न करता है और क्या उसे दुखी करता है-जब आप यह महसूस करने में सक्षम हो जाते हैं कि आप उदास हैं क्योंकि परमेश्वर उदास है, आप प्रसन्न हैं क्योंकि परमेश्वर प्रसन्न है, तो उसने आप के हृदय को पूर्णत: प्राप्त कर लिया होगा और आगे से उसके साथ कोई अड़चन नहीं होगी। आप आगे से मानवीय कल्पनाओं, विचार धारणाओं, और ज्ञान के द्वारा परमेश्वर को विवश करने की कोशिश नहीं करेंगे। उस समय, परमेश्वर आप के हृदय में जीवित और सजीव होगा। वह आपके जीवन का परमेश्वर होगा और आपकी हर चीज़ का स्वामी होगा। क्या आपके पास इस प्रकार की आकांक्षाएँ हैं। क्या आपके पास भरोसा है कि आप इसे हासिल कर सकते हैं?

आगे, आइए इन निम्नलिखित अंशों को पढ़ें।

6.पहाड़ी उपदेश

1) धन्य वचन (मत्ती5:3-12)

2) नमक और ज्योति (मत्ती5:13-16)

3) व्यवस्था (मत्ती5:17-20)

4) क्रोध (मत्ती5:21-26)

5) व्यभिचार (मत्ती5:27-30)

6)तलाक (मत्ती5:31-32)

7) मन्नतें (मत्ती5:33-37)

8) आँख के बदले आँख (मत्ती5:38-42)

9)अपने शत्रुओं से प्रेम करो (मत्ती5:43-48)

10) देने के विषय निर्देश (मत्ती6:1-4)

11) प्रार्थना (मत्ती6:5-8)

7. प्रभु यीशु के दृष्टान्त

1) बीज बोनेवाले का दृष्टान्त (मत्ती13:1-9)

2) जंगली पौधों का दृष्टान्त (मत्ती13:24-30)

3) राई के दाने का दृष्टान्त (मत्ती13:31-32)

4) खमीर का दृष्टान्त (मत्ती13:33)

5) जंगली बीजों के दृष्टान्त की व्याख्या (मत्ती13:36-43)

6) अनमोल धन का दृष्टान्त (मत्ती13:44)

7) अनमोल मोती का दृष्टान्त (मत्ती13:45-46)

8) जाल का दृष्टान्त (मत्ती13:47-50)

8.आज्ञाएँ

(मत्ती22:37-39) उस ने उस से कहा, तू परमेश्वर अपने प्रभु से अपने सारे मन और अपने सारे प्राण और अपने सारे बुद्धि के साथ प्रेम रख। बड़ी और मुख्य आज्ञा तो यही है। और उसी के समान यह दूसरा भी है, कि तू अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रख।

आइए सब से पहले "पहाड़ी उपदेश" के प्रत्येक भाग को देखें। यह सब किस से सम्बन्धित हैं? ऐसा निश्चितता के साथ कहा जा सकता है कि ये सभी व्यवस्था के युग की रीति विधियों से अधिक उन्नत, अधिक ठोस, और लोगों के जीवन के अत्यंत निकट हैं। आधुनिक शब्दावलियों में कहा जाए, तो यह लोगों के व्यावहारिक अभ्यास से ज़्यादा सम्बद्ध है।

आइए हम निम्नलिखित के विशिष्ट सन्दर्भ को पढ़ें: आप को धन्य वचनों को किस प्रकार समझना चाहिए? आपको व्यवस्था के बारे में क्या जानना चाहिए? क्रोध को किस प्रकार परिभाषित करना चाहिए? व्याभिचारियों से कैसे निपटना चाहिए? तलाक के विषय में क्या कहा गया है, और उसके विषय में किस प्रकार के नियम हैं, और किसे तलाक दिया जा सकता है और किसे तलाक नहीं दिया जा सकता है? मन्नतों, आँख के बदले आँख, अपने शत्रुओं से प्रेम करो, देने के लिए निर्देश, और इत्यादि के विषय में क्या कहा जा सकता है।यह सब कुछ मानव जाति के द्वारा परमेश्वर पर विश्वास करने और परमेश्वर का अनुसरण करने के अभ्यास के प्रत्येक पहलु से सम्बन्धित है। इन में से कुछ रीतियाँ आज भी कायम हैं, परन्तु वे लोगों की वर्तमान जरूरतों के अपेक्षा मूल सिद्धांतों से ज़्यादा जुड़ी हुई हैं। वे बिल्कुल प्रारम्भिक सच्चाईयाँ हैं जिन का सामना लोग परमेश्वर पर विश्वास करते हुए करते हैं। उस समय से प्रभु यीशु ने काम करना प्रारम्भ कर दिया था, वह पहले से ही मनुष्यों के जीवन स्वभाव पर काम शुरू करनेवाला था, परन्तु वह व्यवस्था की नींव पर आधारित था। क्या इन विषयों के ऊपर आधारित नियमों और कथनों का इस सच के साथ कुछ लेना देना था? हाँ, वास्तव में था? पिछली सभी रीति विधियाँ, सिद्धांत, और अनुग्रह के युग के सन्देश परमेश्वर के स्वभाव और जो उसके पास है तथा जो वह है उस से, और हाँ सत्य से भी सम्बन्धित थे। इस से कोई फर्क नहीं पड़ता कि परमेश्वर ने क्या प्रकट किया, किस रीति से प्रकट किया, या किस प्रकार की भाषा का प्रयोग किया, क्योंकि उसकी नींव, उसका उद्गम, और उसका प्रारम्भिक बिन्दु सभी उसके स्वभाव के सिद्धांतों और जो उसके पास है तथा जो वह है उस पर आधारित हैं। इस में कोई त्रुटि नहीं है। इस प्रकार यद्यपि जिन चीज़ों को उसने कहा था अब थोड़ी हल्की दिखाई देती हैं,फिर भी आप नहीं कह सकते कि वे सत्य नहीं हैं, क्योंकि वे परमेश्वर की इच्छा को सन्तुष्ट करने और उन के जीवन स्वभाव में एक परिवर्तन लाने के लिए ऐसी चीज़ें थीं जो अनुग्रह के युग में लोगों के लिए अतिमहत्वपूर्ण था। क्या आप ऐसा कह सकते हैं कि पहाड़ी उपदेश की कोई भी बात सत्य के समानान्तर नहीं है? आप नहीं कह सकते हैं! इन में से प्रत्येक एक सच्चाई है क्योंकि वे सभी मानव जाति से परमेश्वर की अपेक्षाएँ हैं; वे सभी परमेश्वर के द्वारा दिए गए सिद्धांत और अवसर हैं कि एक व्यक्ति को किस प्रकार व्यवहार करना है, और वे परमेश्वर के स्वभाव को दर्शाते हैं। फिर भी, उस समय उनके जीवन की बढ़ौतरी के स्तर के आधार पर, वे केवल इन चीज़ों को ही स्वीकार करने और समझने के काबिल थे। क्योंकि अभी तक मानव जाति के पापों का समाधान नहीं किया गया था, प्रभु यीशु केवल इस प्रकार के दायरे के भीतर इन वचनों को जारी कर सकता था, और वह केवल ऐसी साधारण शिक्षाओं का उपयोग कर सकता थाजिस सेलोगों को उस समय के बारे में बताए कि उन्हें किस प्रकार कार्य करना चाहिए, उन्हें क्या करना चाहिए, उन्हें किन सिद्धांतों और दायरे के भीतर चीज़ों को करना चाहिए, और उन्हें किस प्रकार परमेश्वर पर विश्वास करना है और उसकी अपेक्षाओं में खरा उतरना है। इन सब को उस समय मानव जाति की स्थिति के आधार पर निर्धारित किया गया था। व्यवस्था के आधीन जीवन जीनेवाले लोगों के लिए इन शिक्षाओं को ग्रहण करना आसान नहीं था, इस प्रकार जो प्रभु यीशु ने शिक्षा दी थी उसे इसी क्षेत्र के भीतर बने रहना था।

आगे, आइए "प्रभु यीशु के दृष्टान्तों" पर एक नज़र देखें

पहला बीज बोने वाले का दृष्टान्त है। यह वास्तव में एक रूचिकर दृष्टान्त हैः बीज बोना लोगों के जीवनों में एक सामान्य घटना है। दूसरा जंगली बीजों का दृष्टान्त है। जहाँ तक जंगली बीजों की बात है, जिस किसी ने भी फसल लगाई है जब वह बढ़ती है तो वह जान जाएगा। तीसरा राई के दाने का दृष्टान्त है। आप सभी जानते हैं कि राई का दाना क्या होता है, सही है? यदि आप नहीं जानते हैं, तो आप बाइबल में एक दृष्टि डाल सकते हैं। चौथा, खमीर का दृष्टान्त, अधिकतर लोग जानते हैं कि खमीर को किण्वन के लिए प्रयोग किया जाता है; यह कुछ ऐसा है जिसे लोग अपने दैनिक जीवन में प्रयोग करते हैं। नीचे दिए गए सभी दृष्टान्त, जिस में छठा अनमोल धन का दृष्टान्त, सातवाँ अनमोल मोती का दृष्टान्त, और आठवाँ जाल का दृष्टान्त भी शामिल है, उन सभी को लोगों के जीवन से लिया गया है; वे सभी लोगों के वास्तविक जीवनों से लिए गए हैं। ये दृष्टान्त किस प्रकार की तस्वीर चित्रित करते हैं? यह एक तस्वीर है जिस में परमेश्वर एक सामान्य व्यक्ति बन गया और सामान्य जीवन की भाषा का उपयोग करते हुए, मनुष्यों से बात करने के लिए मानवीय भाषा का प्रयोग करते हुए और जो कुछ उन्हें जरूरत है उन्हें प्रदान करने के लिए मनुष्य के साथ साथ रहने लग गया। जब परमेश्वर देहधारी हुआ और लम्बे समय तक मनुष्यों के बीच रहा, तो लोगों की विभिन्न जीवन शैलियों का अनुभव करने और उनका साक्ष्य बनने के बाद, ये अनुभव उसकी ईश्वरीय भाषा को मानवीय भाषा में रूपान्तरित करने के लिए उसकी पाठ्य पुस्तकें बन गईं। हाँ वास्तव में, ये चीज़ें जो उसने जीवन में देखा और सुना उसने मनुष्य के पुत्र के मानवीय अनुभव में संवृद्धि की। जब वह चाहता था कि लोग कुछ सच्चाइयों को समझें, तो उन्हें परमेश्वर की कुछ सच्चाइयों को समझाने के लिए और लोगों को परमेश्वर की इच्छा और मानव जाति के प्रति उसकी अपेक्षाओं को बताने के लिए वह ऊपर दी गईं चीज़ों के समान दृष्टान्त का उपयोग कर सकता था। ये दृष्टान्त लोगों के ज़िन्दगियों से सम्बन्धित थे; और ऐसा एक भी दृष्टान्त नहीं था जो मनुष्य के जीवनों से अछूता था। जब प्रभु यीशु मानव जाति के साथ रहता था, उसने किसानों को अपने खेतों में देखरेख करते हुए देखा था, वह जानता था कि जंगली पौधे क्या है और खमीर उठना क्या है; वह समझ गया कि मनुष्य अनमोल धन को पसंद करते हैं, इस प्रकार उसने अनमोल धन और अनमोल मोती के अलंकार का प्रयोग किया; और उसने मछुवारों को लगातार जाल फैलाते हुए भी देखा था; और इत्यादि। प्रभु यीशु ने मानव जाति की ज़िन्दगियों में इन गतिविधियों को देखा था; और उसने उस प्रकार के जीवन का अनुभव भी किया था। वह किसी अन्य मनुष्य के समान एक साधारण व्यक्ति था, जो मनुष्यों के तीन वक्त के भोजन और दिनचर्या का अनुभव कर रहा था। उसने व्यक्तिगत रूप से एक औसत इंसान के जीवन का अनुभव किया था, और उसने दूसरों की ज़िन्दगियों को भी देखा था। जब उसने यह सब कुछ देखा और व्यक्तिगत रूप से इन का अनुभव किया, तब उसने यह नहीं सोचा कि किस प्रकार एक अच्छा जीवन पाया जाए या वह किस प्रकार और अधिक स्वतन्त्रता, तथा अधिक आराम से जीवन बिता सकता है। जब वह सच्चे मानवीय जीवन का अनुभव ले रहा था, प्रभु यीशु ने लोगों के जीवन में कठिन शारीरिक दुख देखा, और उसने शैतान की भ्रष्टता के अधीन लोगों के कठिन शारीरिक क्लेश, अभागेपन, और उनकी उदासी को देखा, कि वे शैतान की अधीनता में जी रहे थे, और पाप में जी रहे थे। वह व्यक्तिगत रूप से मानवीय जीवन का अनुभव ले रहा था, उसने यह भी महसूस किया कि जो लोग भ्रष्टता के बीच जीवन बिता रहे थे वे लोग कितने असहाय थे, उसने उन लोगों की दुर्दशा को देखा और अनुभव किया जो पाप में जीवन बिताते थे, जो शैतान के द्वारा, अर्थात् बुराई के द्वारा लाए गए अत्याचार में कहीं खो गए थे। जब प्रभु यीशु ने इन चीज़ों को देखा, तो क्या उसने उन्हें अपनी ईश्वरीयता में देखा था या अपनी मानवीयता में? उसकी मानवीयता सचमुच में अस्तित्व में थी-यह बिल्कुल जीवन्त था-वह यह सब कुछ अनुभव कर सकता था और देख सकता था, और वास्तव में उस के सार तत्व, और उसकी ईश्वरीयता ने भी साथ ही साथ इसे देखा था। स्वयं मसीह अर्थात् मनुष्य प्रभु यीशु ने इसे देखा, और वह सब कुछ जो उसने देखा था उस से उसने उस कार्य के महत्व और आवश्यकता का एहसास किया जिसे उसने इस समय अपनी देह में शुरू किया था। यद्यपि वह स्वयं जानता था कि वह उत्तरदायित्व जिसे उसे लेने की जरूरत थी कितना विशाल है, और वह दर्द जिस का वह सामना करेगा कितना बेरहम होगा, और जब उसने पाप में जी रहे मानव जाति की असहाय स्थिति को देखा, जब उसने उनकी ज़िन्दगियों में अभागेपन और व्यवस्था के अधीन उनके कमज़ोर संघर्ष को देखा, तो उसने और अधिक दर्द का अनुभव किया, और मानव जाति को पाप से बचाने के लिए और भी ज़्यादा चिन्तित हो गया था। इस से कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वह किस प्रकार की कठिनाइयों का सामना करेगा या किस प्रकार का दर्द सहेगा, क्योंकि वह पाप में जी रहे मानव जाति को बचाने के लिए और अधिक दृढ़ निश्चयी हो गया था। इस प्रक्रिया के दौरान, क्या आप कह सकते हैं कि प्रभु यीशु ने उस कार्य को और अधिक स्पष्टता से समझना प्रारम्भ कर दिया था जिसे उसे करने की आवश्यकता थी और जो उसे सौंपा गया था। और वह उस कार्य को पूरा करने के लिए और भी अधिक उत्सुक हो गया जिसे उसे लेना था-मानव जाति के सभी पापों को लेने के लिए, मानव जाति के लिए प्रायश्चित करने के लिए ताकि वे आगे से पाप में ना जीएँ और परमेश्वर पापबलि के कारण मनुष्य के पापों को भुला देगा, और इस से उसे स्वीकृति मिलेगी कि वह मानव जाति को बचाने के लिए अपने कार्य को आगे बढ़ा सके। ऐसा कहा जा सकता है कि प्रभु यीशु अपने हृदय में, मानव जाति के लिए अपने आप को न्यौछावर करने, और अपने आप को बलिदान करने का इच्छुक था। वह एक पापबलि के रूप में कार्य करने और सूली पर चढ़ने के लिए भी इच्छुक था, और वह इस कार्य को पूरा करने के लिए उत्सुक था। जब उसने मनुष्यों के जीवन की दयनीय दशा को देखा, तो वह जितना जल्दी हो सके अपने लक्ष्य को पूरा करना चाहता था, वह भी बिना किसी मिनट और सेकण्ड की देरी के। जब उसे ऐसी अति शीघ्रता का एहसास हुआ, तब वह यह नहीं सोच रहा था कि उसका दर्द कितना भयानक होगा, और ना ही उसने तनिक भी यह सोचा कि उसे कितना अपमान सहना होगा-उसने बस अपने हृदय में इस दृढ़ इच्छा शक्ति को थामे रखाः जब तक वह अपने को भेंट चढ़ाए रहेगा, जब तक उसे पापबलि के रूप में सूली पर लटकाकर रखा जाएगा, परमेश्वर की इच्छा की इच्छा का पालन किया जाएगा और वह अपने नए कार्य की शुरूआत कर पाएगा। पाप में गुज़र रही मानवजाति की ज़िन्दगियाँ, और पाप में बने रहने की उसकी स्थिति पूर्णत: बदल जाएगी। उसकी दृढ़ता और जो उसने करने का निर्णय लिया था वे मानव जाति को बचाने से सम्बन्धित थे, और उसके पास केवल एक उद्देश्य थाः परमेश्वर की इच्छा को पूरा करना, ताकि वह अपने कार्य के अगले कदम की सफलतापूर्वक शुरूआत कर सके। यह सब कुछ उस समय प्रभु यीशु के मन में था।

देह में जीवन बिताते हुए, देहधारी परमेश्वर ने सामान्य मानवीयता को धारण किया; उसके अंदर एक सामान्य व्यक्ति की भावनाएँ और तर्क शक्ति थी। वह जानता था कि पाप क्या है, और दर्द क्या है, और जब उसने मानवजाति को इस प्रकार के जीवन में देखा, तो उसने गहराई से महसूस किया कि लोगों को मात्र कुछ शिक्षाएँ देने से, और उन्हें कुछ प्रदान करने या उन्हें कुछ सिखाने से उन्हें पाप से बाहर आने में अगुवाई नही मिल सकती है। और ना ही उनसे कुछ आज्ञाओं का पालन करवाने से उन्हें पापों से छुटकारा दिया जा सकता था-केवल मनुष्यों के पापों को लेकर और पापमय देह की समानता में आकर ही वह इसे मानव-जाति की स्वतन्त्रता में बदल सकता था, और इसे मनुष्यों के लिए परमेश्वर की क्षमा में बदल सकता था। जब प्रभु यीशु ने मनुष्यों के ज़िन्दगियों में पाप का अनुभव किया और उसके बाद उसने देखा, कि उसके हृदय में एक प्रबल इच्छा प्रकट हुई है-कि मनुष्यों को अनुमति दी जाए कि वे अपनी ज़िन्दगियों को पाप के संघर्ष से छुड़ा सकें। इस इच्छा से उसने और भी अधिक यह महसूस किया कि उसे सूली पर चढ़ना होगा और जितना जल्दी हो सके उनके पापों को लेना होगा। लोगों के साथ रहने और पाप में उनके जीवन की दुर्दशा को देखने, सुनने और महसूस करने के बाद, उस समय ये प्रभु यीशु के विचार थे। यह कि देहधारी परमेश्वर के पास मानव जाति के लिए इस प्रकार की इच्छा हो सकती थी, कि वह इस प्रकार के स्वभाव को प्रगट और प्रदर्शित कर सकता था-क्या यह कुछ ऐसा है जो एक औसत इंसान के पास हो सकता है? इस प्रकार के वातावरण में रहते हुए एक औसत इंसान क्या देखेगा? वे क्या सोचेंगे? यदि एक औसत इंसान ने इन सब का सामना किया होता, तो क्या वे समस्याओं को ऊँचे दृष्टिकोण से देख पाते? बिल्कुल नहीं! यद्यपि देहधारी परमेश्वर का रूप बिल्कुल मनुष्य के समान है, फिर भी वह मानवीय ज्ञान को सीखता है और मानवीय भाषा में बोलता है और कई बार अपनी युक्तियों को मानव जाति के माध्यमों या प्रकटीकरण के द्वारा प्रकट भी करता है, और जिस तरह से वह मनुष्यों, एवं चीज़ों के सार तत्व को देखता है, और जिस तरह भ्रष्ट लोग मानव जाति और चीज़ों के सार तत्व को देखते हैं वे बिल्कुल एक समान नहीं हैं। उस का दृष्टिकोण और वह ऊँचाई जिस पर वह खड़ा रहता है वह कुछ ऐसा है जिसे एक भ्रष्ट व्यक्ति के द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता है। यह इसलिए है क्योंकि परमेश्वर सत्य है, और वह देह जो वह पहने हुए है वह परमेश्वर के सार तत्व को धारण किए हुए है, और उसके विचार और जो उसकी मानवता के द्वारा प्रगट किया गया है वे भी सत्य हैं। भ्रष्ट लोगों के लिए, जो कुछ वह देह में प्रगट करता है वे सभी सत्य, और जीवन के प्रावधान हैं। ये प्रावधान केवल एक व्यक्ति के लिए नहीं हैं, परन्तु पूरी मानव जाति के लिए है। किसी भी भ्रष्ट व्यक्ति के लिए, उसके हृदय में केवल थोड़े से ही लोग हैं जो उस से जुड़े होते हैं। केवल कुछ ही ऐसे लोग हैं जिन के बारे में वह चिन्ता करता है, या जिन की वह परवाह करता है। जब विपत्ति सामने पर होती है, तो वह सब से पहले अपने बच्चों, जीवन साथी, या माता पिता के बारे में सोचता है, और वह व्यक्ति जो मानव जाति से थोड़ा और प्रेम करता है, कम से कम कुछ रिश्तेदारों या एक अच्छे मित्र के बारे में सोचता है; क्या वह इस से अधिक सोचता है? कभी भी नहीं ! क्योंकि सभी घटनाओं के बावजूद मनुष्य मनुष्य है, और वह एक इंसान के दृष्टिकोण और ऊँचाई से ही सभी चीज़ों को देख सकता है। मगर देहधारी परमेश्वर भ्रष्ट व्यक्ति से पूर्णत: अलग है। इस से कोई फर्क नहीं पड़ता है कि परमेश्वर का देहधारी शरीर कितना सामान्य, कितना साधारण, कितना दीन है, या लोग उसे कितनी नीची दृष्टि से देखते हैं, मानवजाति के प्रति उसके विचार और उसकी मनोवृत्तियाँ ऐसी चीज़ें है जिन्हें कोई भी मनुष्य धारण नहीं कर सकता है, और ना ही उसका अनुकरण कर सकता है। वह हमेशा ईश्वरीय दृष्टिकोण, और सृष्टिकर्ता के रूप में अपने पद की ऊँचाई से मानव जाति का अवलोकन करता रहेगा। वह हमेशा परमेश्वर के सार तत्व और मनःस्थिति से मानव जाति को देखता रहेगा। वह एक औसतइंसान की ऊँचाई, और एक भ्रष्ट इंसान के दृष्टिकोण से मानव जाति को बिल्कुल नहीं देख सकता है। जब लोग मानव जाति को देखते हैं, तो वे मानवीय दृष्टि से देखते हैं, और वे मानवीय ज्ञान और मानवीय नियमों और सिद्धांतों जैसी चीज़ों को एक पैमाने की तरह प्रयोग करते हैं। यह उस दायरे के भीतर है जिसे लोग अपनी आँखों से देख सकते हैं; यह उस दायरे के भीतर है जिसे भ्रष्ट लोग प्राप्त कर सकते हैं। जब परमेश्वर मानव जाति को देखता है, वह ईश्वरीय दर्शन के साथ देखता है, और अपने सार तत्व और जो उसके पास है तथा जो वह है उसे नाप के रूप में लेता है। इस दायरे में वे चीज़ें शामिल हैं जिन्हें लोग नहीं देख सकते हैं, और यहीं पर देहधारी परमेश्वर और दूषित मनुष्य बिल्कुल अलग हैं। इस अन्तर को मनुष्यों और परमेश्वर के भिन्न भिन्न सार तत्वों के द्वारा निर्धारित किया जाता है, और ये भिन्न भिन्न सार तत्व ही हैं जो उन की पहचानों और पदस्थितियों को निर्धारित करते हैं साथ ही साथ उस दृष्टिकोण और ऊँचाई को भी जिस से वे चीज़ों को देखते हैं। क्या आप प्रभु यीशु में स्वयं परमेश्वर के प्रकटीकरण और प्रकाशन को देखते हैं? आप कह सकते हैं कि जो प्रभु यीशु ने किया और कहा था वह परमेश्वर के स्वयं के प्रबन्धकीय कार्य और उस की सेवाकाई से जुड़ा हुआ था, और यह सब परमेश्वर के सार तत्व के प्रकटीकरण और प्रकाशन से जुड़ा हुआ था। यद्यपि वह मानवीय रूप में प्रगट हुआ था, किन्तु उसके ईश्वरीय सार तत्व और उसकी ईश्वरीयता के प्रकाशन को नकारा नहीं जा सकता है। यह मानवीय प्रकटीकरण क्या वास्तव में मानवता का प्रकटीकरण था? यह मानवीय प्रकटीकरण अपने खास सार तत्व के कारण दूषित लोगों के मानवीय प्रकटीकरण से बिल्कुल अलग था। प्रभु यीशु परमेश्वर का देहधारण था, यदि वह सचमुच में एक सामान्य मनुष्य के समान भ्रष्ट होता, तो क्या वह ईश्वरीय दृष्टिकोण से पाप में सराबोर मानव जाति के जीवन को देख सकता था? बिल्कुल भी नहीं! मनुष्य के पुत्र और एक सामान्य मनुष्य के बीच यही अन्तर है। सभी दूषित लोग पाप में जीते हैं, और जो कोई पाप को देखता है, तो उन्हें उसके सम्बन्ध में कोई विशेष एहसास नहीं होता है; वे सभी एक समान हैं, एक सूअर के समान जो कीचड़ में रहता है और उसे बिल्कुल भी किसी असुविधा और गन्दगी का एहसास नहीं होता है - वह अच्छे से खाता है, और आराम से सोता है। यदि कोई सूअर के बाड़े को साफ कर देता है, तो सूअर को वास्तव में अच्छा नहीं लगता है, और वह साफ सुथरा नहीं रह सकता है। जल्द ही, वह एक बार फिर बिल्कुल आराम से कीचड़ में लोट रहा होगा, क्योंकि वह एक गन्दा जीव है। जब मनुष्य सूअर को देखते हैं, वे सोचते हैं कि वह गन्दा है, और यदि आप उसे साफ कर देते हैं, तो सूअर को अच्छा नहीं लगता है - इसीलिए कोई भी सूअर को अपने घर में नहीं रखता है। जिस तरह से मनुष्य सूअरों को देखते हैं वह हमेशा उस से अलग होगा जैसा सूअर अपने आप के लिए महसूस करते हैं, क्योंकि मनुष्य और सूअर एक प्रजाति के नहीं हैं। और क्योंकि देहधारी परमेश्वर भ्रष्ट मनुष्यों के समान एक ही प्रजाति का नहीं है, इसलिए केवल देहधारी परमेश्वर ही ईश्वरीय दृष्टिकोण से खड़ा हो सकता है, और मानव जाति, और सब कुछ को देखने के लिए परमेश्वर की ऊँचाई पर खड़ा हो सकता है।

जब परमेश्वर देहधारी हुआ और मानव जाति के बीच रहने लगा, तो उसने अपनी देह में किस प्रकार के दुख का अनुभव किया? क्या कोई सचमुच में समझ सकता है? कुछ लोग कहते हैं कि परमेश्वर ने बड़ा दुख सहा, और यद्यपि वहस्वयं परमेश्वर है, लोगों ने उसके सार तत्व को नहीं समझा और हमेशा उसके साथ एक मनुष्य के समान व्यवहार किया, जिस से वह दुखित और चोटिल महसूस करता है - वे कहते हैं कि परमेश्वर का दुख भोग सचमुच बहुत बड़ा था। कुछ अन्य लोग कहते हैं कि परमेश्वर निर्दोष और निष्पाप है, परन्तु उसने मनुष्य के समान दुख उठाया और मनुष्य के साथ साथ सताव, निंदा, और अपमान सहता है; वे कहते हैं कि वह अपने अनुयायियों की ग़लतफहमियों और अनाज्ञाकारिता को भी सहता है - परमेश्वर के दुख भोग को सचमुच में नापा नहीं जा सकता है। ऐसा दिखाई देता है कि आप सचमुच में परमेश्वर को नहीं समझते हैं। वास्तव में, वह दुख जिस के बारे में आप बात करते हैं उसे परमेश्वर सच्चे दुख के रूप में नहीं लेता है, क्योंकि एक ऐसा दुख है जो इस से कहीं बढ़कर है। तो स्वयं परमेश्वर के लिए सच्चा दुख भोग क्या है? परमेश्वर के देहधारी शरीर के लिए सच्चा दुख भोग क्या है? जहाँ तक परमेश्वर की बात है, जब मानव जाति उसे नहीं समझता है तो वह उसे दुख भोग के रूप में नहीं लेता है, और जब लोगों को परमेश्वर को लेकर कुछ ग़लतफहमियाँ होती हैं और वे उसे परमेश्वर के रूप में नहीं देखते हैं तब भी वह इसे दुख भोग के रूप में नहीं लेता है। फिर भी, लोग अक्सर महसूस करते हैं कि परमेश्वर ने जरूर एक बहुत बड़ा अन्याय सहा होगा, यह कि जिस समय जब वह देह में है वह अपने व्यक्तित्व को मानव जाति को नहीं दिखा सकता है और उन्हें अपनी महानता को देखने की अनुमति नहीं दे सकता है, और परमेश्वर दीनता से एक सामान्य देह में छिपा हुआ है, इस प्रकार यह उसके लिए जरूर कष्टदायी रहा होगा। लोग जो कुछ परमेश्वर के दुख भोग के बारे में समझते हैं और जो कुछ देख सकते हैं उसे दिल से लगा लेते हैं, और परमेश्वर के लिए हर प्रकार की सहानुभूति दिखाते हैं और अक्सर उसके लिए एक छोटी सी स्तुति भी करते हैं। वास्तव में, यहाँ एक अन्तर है, जो कुछ लोग परमेश्वर के दुख भोग के बारे में समझते हैं और जो वह सचमुच में महसूस करता है उनके बीच एक खाई है। मैं आप से सच कहता हूँ- परमेश्वर के लिए, इस से कोई फर्क नहीं पड़ता है कि यह परमेश्वर का आत्मा है या परमेश्वर का देहधारी शरीर, वह दुख वास्तविक दुख नहीं है। तो यह क्या है कि परमेश्वर ने सचमुच में दुख उठाया? आइए हम केवल परमेश्वर के देहधारण के दृष्टिकोण से परमेश्वर के पीडा के बारे में बात करें।

जब परमेश्वर देहधारी हो गया, वह एक औसत, सामान्य व्यक्ति बन गया, और मानव जाति के मध्य और लोगों के आस पास रहने लगा, तो क्या वह लोगों के जीने के तरीकों, व्यवस्थाओं, और दर्शन शास्त्र को देख नहीं सकता था और उन्हें महसूस नहीं कर सकता था? जीने के इन तरीकों और व्यवस्थाओं से उसे कैसा महसूस होता है? क्या वह अपने हृदय में घृणा का एहसास करता था? वह क्यों घृणा का एहसास करेगा? जीने के लिए मानव जाति के क्या तरीके और नियम थे? वे किन सिद्धांतों में जड़ पकड़े हुए थे? वे किस पर आधारित थे? मानव जाति के तरीकों, नियमों इत्यादि पर। जीने के लिए-यह सब कुछ शैतान की तर्क शक्ति, ज्ञान, और दर्शन शास्त्र पर सृजा गया है। मनुष्य जो इस प्रकार के नियमों के आधीन जीते हैं उनके पास कोई मानवीयता नहीं है, और कोई सच्चाई भी नहीं है-वे सभी सत्य को दूषित करते हैं, और परमेश्वर के बैरी हैं। यदि हम परमेश्वर के सार तत्व पर एक नज़र डालें, हम देखेंगे कि उसका सार तत्व बिल्कुल शैतान की तर्क शक्ति, ज्ञान, और दर्शन शास्त्र के विपरीत है। उसका सार तत्व धार्मिकता, सत्य, और पवित्रता, और सभी सकारात्मक चीज़ों की वास्तविकताओं से भरा हुआ है। परमेश्वर जो इस सार तत्व को धारण किए हुए है और एक ऐसी मानव जाति के मध्य रहता है-वह अपने हृदय में क्या सोचता है? क्या वह दर्द से भरा हुआ नहीं है? उसका हृदय तकलीफ में है, और यह दर्द कुछ ऐसा है जिसे कोई इंसान समझ या महसूस नहीं कर सकता है।क्योंकि सब कुछ जिस का वह सामना करता है, मुकाबला करता है, तथा देखता, सुनता, और अनुभव करता है वह सब कुछ मानव जाति की भ्रष्टता, बुराई, और सत्य के विरोध और अवरोध में उनका विद्रोह है। जो कुछ मनुष्यों से आता है वह उसके दुख भोग का स्रोत है। ऐसा कहना चाहिए, क्योंकि उसका सार तत्व भ्रष्ट मनुष्यों के समान नहीं है, किन्तु मनुष्यों की भ्रष्टता उसके सब से बड़े दुख भोग का स्रोत बन गया है। जब परमेश्वर देहधारी हो जाता है, क्या वह किसी को ढूँढ़ सकता है जो उसके साथ एक सामान्य भाषा में बात कर सकता है? इसे मानव जाति में पाया नहीं जा सकता है। किसी को भी ढूँढ़ा नहीं जा सकता है जो परमेश्वर के साथ बातचीत कर सके, इस प्रकार विचारों का अदान प्रदान कर सके-तो आप क्या कहेंगे कि परमेश्वर को कैसा लगता है? वे चीज़ें जिन के विषय में लोग आपस में बातचीत करते हैं, वे उनसे प्रेम करते हैं, यह कि वे जिन के पीछे भागते हैं और जिन्हें पाना चाहते हैं वे सभी पाप से, और बुरी प्रवृतियों से जुडे़ हुए हैं। परमेश्वर इन सब का सामना करता है, क्या यह उसके हृदय में एक कटार के समान नहीं है? इन चीज़ों का सामना करके, क्या उसके हृदय में आनन्द हो सकता है? क्या वह सान्त्वना पा सकता है? वे जो उसके साथ रह रहें हैं वे ऐसे मनुष्य हैं जो उपद्रव और बुराई से भरे हुए हैं-तो उसका दिल क्यों नहीं दुखेगा? यह दुख भोग वास्तव में कितना बड़ा है, और कौन इस की परवाह करता है? कौन ध्यान देता है? और कौन इस की तारीफ कर सकता है? लोगों के पास परमेश्वर के हृदय को समझने का कोई तरीका नहीं है? उस का दुख भोग कुछ ऐसा है जिस की तारीफ लोग विशेष रूप से नहीं कर सकते हैं, और मानवता की उदासीनता और चेतना शून्यता ने परमेश्वर के दुख भोग को और अधिक गहरा कर दिया है।

कुछ ऐसे भी लोग हैं जो मसीह की दुर्दशा से अक्सर सहानुभूति दिखाते हैं क्योंकि बाइबल में एक वचन है जो कहता हैः "लोमड़ियों की माँदें हैं, और आकाश के पक्षियों के बसेरे हैं, परन्तु मनुष्य के पुत्र के लिए तो सिर धरने की भी जगह नहीं है।" जब लोग इसे सुनते हैं, तो वे इसे दिल में ले लेते हैं और विश्वास करते हैं कि यह सब से बड़ा दुख भोग है जिसे परमेश्वर ने सहा, और सब से बड़ा दुख भोग है जिसे मसीह ने सहा। अब, प्रमाणित तथ्यों के दृष्टिकोण से इसे देखने से, क्या मामला ऐसा ही है?परमेश्वर यह विश्वास नहीं करता है कि ये कठिनाईयाँ कष्टकारी हैं। उसने कभी देह की कठिनाईयों के लिए अन्याय के विरूद्ध आवाज़ नहीं उठाई है, और उसने कभी भी मनुष्यों से उनका बदला या उनसे अपने लिए किसी चीज़ का प्रतिफल नहीं लिया है। फिर भी, जब वह मनुष्य जाति की हर चीज़ को देख लेता है, उसके भ्रष्ट जीवन और भ्रष्ट मनुष्यों की बुराई को, और जब वह यह देखता है कि मानव जाति शैतान की चंगुल में है और शैतान के द्वारा कैद है और बचकर निकल नहीं सकते हैं, तो पाप में रहनेवाले नहीं जानते हैं कि सच्चाई क्या है-वह इन सब पापों को सहन नहीं सकता है। मानव जाति के प्रति उसकी घृणा दिन ब दिन बढ़ती जा रही है, परन्तु उसे इन सब को सहना ही है। यह परमेश्वर का सब से बड़ा दुख भोग है। यहाँ तक कि परमेश्वर अपने अनुयायियों के बीच खुलकर अपनी आवाज़ या अपनी भावनाओं को प्रकट भी नहीं कर पा रहा है, और उसके अनुयायियों में से कोई भी उसके दुख दर्द को समझ नहीं पा रहा है।कोई भी उसके हृदय को समझने या दिलासा देने की कोशिश नहीं कर रहा है-उसका हृदय दिन ब दिन, साल दर साल, और बार बार इस दुख दर्द को सहता रहता है। आप इन सब में क्या देखते हैं?परमेश्वर ने जो कुछ दिया है उस के बदले में वह मनुष्यों से कुछ भी नहीं माँगता है, परन्तु परमेश्वर के सार तत्व के कारण, वह बिल्कुल भी मानव जाति की बुराई, भ्रष्टता, और पाप को सहन नहीं कर सकता है, परन्तु वह बहुत ही ज़्यादा घृणा और नफरत का एहसास करता है, जो परमेश्वर के हृदय और उसकी देह को कभी ना खत्म होनेवाले दुख दर्द की ओर धकेल देता है। क्या आप यह सब कुछ देख सकते हैं?ज़्यादा संभावना है, कि आप में से कोई इसे देख नहीं सकता है, क्योंकि आप में से कोई भी सचमुच में परमेश्वर को नहीं समझता है। समय के अन्तराल के साथ धीर धीरे आप इसे अपने आप में समझ सकते हैं।

आगे, आइए हम पवित्र शास्त्र के निम्नलिखित अंश को देखें।

9.यीशु आश्चर्य कर्म करता है।

1) यीशु पाँच हज़ार को भोजन कराता है

(यूहन्ना 6:8-13) उस के चेलों में से शमौन पतरस के भाई अन्द्रियास ने उस से कहा। यहाँ एक लड़का है जिस के पास जव की पाँच रोटी और दो मछलियाँ हैं परन्तु इतने लोगों के लिए वे क्या हैं। यीशु ने कहा, कि लोगों को बैठा दो। उस जगह बहुत घास थीः तब वे लोग जो गिनती में लगभग पाँच हज़ार के थे, बैठ गएः तब यीशु ने रोटियाँ लीं, और धन्यवाद करके बैठनेवालों को बाँट दीः और मछलियों में से जितनी वे चाहते थे बाँट दिया। जब वे खाकर तृप्त हो गए तो उस ने अपने चेलों से कहा, कि बचे हुए टुकड़े बटोर लो, कि कुछ फेंका ना जाए। सो उन्हों ने बटोरा, और जव की पाँच रोटियों के टुकड़े जो खानेवालों से बच रहे थे उन की बारह टोकरियाँ भरीं।

2) लाजर का पुनरूत्थान परमेश्वर की महिमा करता है

(यूहन्ना 11:43-44) यह कहकर उस ने बड़े शब्द से पुकारा, कि हे लाजर, निकल आ। जो मर गया था, वह कफन से हाथ पाँव बन्धे हुए निकल आया, और उस का मुँह अंगोछे से लिपटा हुआ थाः यीशु ने उस से कहा, उसे खोलकर जाने दो।

प्रभु यीशु के द्वारा किए गए आश्चर्य कर्मों में से, हम ने सिर्फ दो को ही चुना है क्योंकि जिस के बारे में मैं यहाँ बात करना चाहता हूँ उन्हें प्रदर्शित करने के लिए वे पर्याप्त हैं। ये दोनों आश्चर्य कर्म वास्तव में बहुत ही आश्चर्यजनक हैं, और अनुग्रह के युग में वे प्रभु यीशु के आश्चर्य कर्मों के सच्चे प्रतिनिधि हैं।

पहले, आइए प्रथम अंश पर एक नज़र डालें: यीशु पाँच हज़ार को भोजन कराता है।

"पाँच रोटियाँ और दो मछलियाँ" किस प्रकार का विचार है? पाँच रोटियाँ और दो मछलियाँ सामान्यतः कितने लोगों के लिए काफी होंगे। यदि आप का नापतौल एक औसत इंसान के भूख के आधार पर है, तो यह केवल दो व्यक्तियों के लिए ही काफी होगा। यह ही पाँच रोटियों और दो मछलियों का मुख्य विचार है। फिर भी, यह इस अंश में लिखा है कि पाँच रोटियों और दो मछलियों ने कितने लोगों को भोजन कराया? यह पवित्र शास्त्र में इस प्रकार दर्ज हैः "उस जगह बहुत घास थीः तब वे लोग जो गिनती में लगभग पाँच हज़ार के थे, बैठ गए।" पाँच रोटियों और दो मछलियों की तुलना में, क्या पाँच हज़ार एक बड़ी संख्या है? इस का क्या मतलब है कि यह संख्या इतनी बड़ी थी? मानवीय दृष्टिकोण से, पाँच हज़ार लोगों के बीच पाँच रोटियों और दो मछलियों को बाँटना असंभव होगा, क्योंकि उनके बीच का अन्तर बहुत बड़ा है। भले ही प्रत्येक व्यक्ति बस एक छोटा सा टुकड़ा खाए, फिर भी यह पाँच हज़ार लोगों के लिए काफी नहीं होगा। परन्तु यहाँ, प्रभु यीशु ने एक आश्चर्य कर्म किया-उसने ना केवल पाँच हज़ार लोगों को भरपेट भोजन कराया, बल्कि वहाँ कुछ बच भी गया था। पवित्र शास्त्र कहता हैः "जब वे खाकर तृप्त हो गए तो उस ने अपने चेलों से कहा, कि बचे हुए टुकड़े बटोर लो, कि कुछ फेंका ना जाए। सो उन्हों ने बटोरा, और जव की पाँच रोटियों के टुकड़े जो खानेवालों से बच रहे थे उन की बारह टोकरियाँ भरीं।" इस आश्चर्य कर्म ने लोगों को प्रभु यीशु की पहचान और स्थिति को देखने की अनुमति दी, और इस ने उन्हें यह देखने की भी अनुमति दी कि परमेश्वर के लिए कुछ भी असंभव नहीं है-उन्होंने परमेश्वर की सर्वसामर्थता की सच्चाई को देखा। पाँच रोटियाँ और दो मछलियाँ पाँच हज़ार को भोजन कराने के लिए पर्याप्त था, परन्तु यदि कोई भोजन ही नहीं होता तो क्या परमेश्वर पाँच हज़ार लोगों को भोजन करा सकता था? हाँ वास्तव में वह करा सकता था! यह एक चमत्कार था, लोगों ने आवश्यक रूप से महसूस किया कि यह उनके समझ से बाहर है और यह भी महसूस किया कि यह अविश्वसनीय और रहस्यमयी है, परन्तु परमेश्वर के लिए, ऐसा कार्य करना कोई बड़ी बात नहीं थी। जब कि यह परमेश्वर के लिए एक सामान्य चीज़ थी, तो इसे अनुवाद के लिए अलग क्यों किया गया होगा? क्योंकि इस आश्चर्य कर्म के पीछे प्रभु यीशु की इच्छा छिपी हुई थी, जिसे मानव जाति के द्वारा कभी भी खोजा नहीं गया था।

पहले, आइए ये समझने का प्रयास करें कि ये पाँच हज़ार लोग किस प्रकार के इंसान थे। क्या वे प्रभु यीशु के अनुयायी थे? पवित्र शास्त्र से हम जानते हैं कि वे प्रभु यीशु के अनुयायी नहीं थे। क्या वे जानते थे कि प्रभु यीशु कौन है? बिल्कुल भी नहीं! सब से कम, वे जानते ही नहीं थे कि वह व्यक्ति जो उनके सामने खड़ा है वह प्रभु यीशु था, या हो सकता है कि कुछ लोग जानते हों कि उसका नाम क्या था, और उन चीज़ों को जो उसने किया था उसके बारे में कुछजानते हों या कुछ सुना हो। वे मात्र कहानियों के द्वारा प्रभु यीशु के विषय में उत्सुक थे, परन्तु आप निश्चित तौर पर यह नहीं कह सकते हैं कि वे उसका अनुसरण करते थे, और उसे बिल्कुल नहीं समझते थे। जब प्रभु यीशु ने इन पाँच हज़ार लोगों को देखा, वे भूखे थे और भरपेट भोजन करने के सिवाए कुछ भी नहीं सोच सकते थे, इस प्रकार इस सन्दर्भ में प्रभु यीशु ने उनकी इच्छाओं को तृप्त किया था। जब उसने उनकी इच्छाओं को तृप्त किया, तो उसके हृदय में क्या था? इन लोगों के प्रति उस की मनोवृत्तियाँ क्या थी जो केवल भर पेट भोजन करना चाहते थे? इस समय, प्रभु यीशु के विचार और उसकी मनोवृत्तियाँको परमेश्वर के स्वभाव और सार तत्व के साथ कार्य करना था। इन पाँच हज़ार लोगों का सामना करते हुए जो खाली पेट थे जो केवल एक बार का पूरा भोजन खाना चाहते थे, और ऐसे लोगों का सामना करते हुए जो उसके प्रति उत्सुकता और आशाओं से भरे हुए थे, प्रभु यीशु ने केवल इस आश्चर्य कर्म का प्रयोग कर उन पर अनुग्रह करने के बारे में सोचा था। फिर भी, उसे यह आशा प्राप्त नहीं हुई कि वे उसके अनुयायी बन जाएँगे, क्योंकि वह जानता था कि वे मौज मस्ती करना और पेट भरकर खाना चाहते थे, इसलिए वहाँ जो कुछ उसके पास था उसने उस से अपना बेहतरीन कार्य किया, और पाँच हज़ार को भोजन कराने के लिए पाँच रोटियों और दो मछलियों का उपयोग किया। उसने उन लोगों की आँखों को खोल दिया जो मनोरंजन का आनन्द ले रहे थे, और जो आश्चर्य कर्म देखना चाहते थे, और उन्हों ने अपनी आँखों से उन चीज़ों को देखा जिन्हें देहधारी परमेश्वर पूरा कर सकता था। यद्यपि प्रभु यीशु ने उनकी उत्सुकता को सन्तुष्ट करने के लिए कुछ स्पर्शगम्य चीज़ों का प्रयोग किया, क्योंकि वह पहले से ही अपने हृदय में जानता था कि ये पाँच हज़ार बस एक बढ़िया भोजन करना चाहते थे, इसलिए उसने उन्हें कुछ भी नहीं कहा या उन्हें बिल्कुल भी प्रचार नहीं किया-उसने बस उन्हें उस चमत्कार को घटित होते हुए देखने दिया। उसने इन लोगों से बिल्कुल वैसा बर्ताव नहीं किया जैसा वह अपने चेलों के साथ करता था जो सचमुच में उसका अनुसरण करते थे, परन्तु परमेश्वर के हृदय में, सभी जीवधारी उसके शासन के आधीन थे, और वह अपनी दृष्टि में सभी जीवधारियों को जब जरूरी हो परमेश्वर के अनुग्रह का आनन्द उठाने की अनुमति देता था। भले ही ये लोग नहीं जानते थे कि वह कौन था या वे उसे समझते नहीं थे, या रोटियों और मछलियों को खाने के बाद उनके ऊपर उसका कोई विशेष प्रभाव नहीं था या परमेश्वर के प्रति उनके पास कोई धन्यवाद नहीं था, फिर भी यह कुछ ऐसा नहीं था जिस से परमेश्वर को परेशानी हो-उसने उन्हें परमेश्वर के अनुग्रह का आनन्द उठाने के लिए एक बढ़िया अवसर दिया था। कुछ लोग कहते हैं कि परमेश्वर जो भी करता है उसके प्रति वह सैद्धांतिक होता है, और वह अविश्वासियों की निगरानी या उनकी सुरक्षा नहीं करता है, और वह विशेष रूप से उन्हें अपने अनुग्रह का आनन्द उठाने की अनुमति नहीं देता है। क्या मामला वास्तव में ऐसा ही है? परमेश्वर की नज़रों में, जब तक वे एक जीवित प्राणी हैं जिन्हें स्वयं उसने ही बनाया है, वह उनके लिए प्रबन्ध करता रहेगा और उनकी परवाह करता रहेगा; वह उनसे व्यवहार करेगा, उनके लिए योजना बनाएगा, और विभिन्न तरीकों से उन पर शासन करेगा। ये सभी चीज़ों के प्रति परमेश्वर के विचार और उस की मनोवृत्तियाँहैं।

यद्यपि पाँच हज़ार लोग जिन्हों ने रोटियों और मछलियों को खाया था उन्हों नेप्रभु यीशु का अनुसरण करने की योजना नहीं बनाई थी, फिर भी वह उनके प्रति कठोर नहीं था; एक बार जब उन्हों ने भर पेट खा लिया, तो आप जानते हैं कि प्रभु यीशु ने क्या किया था? क्या उसने उनको कुछ प्रचार किया? इसे करने के बाद वह कहाँ गया था? पवित्र शास्त्र मे ऐसा कुछ भी नहीं लिखा है कि प्रभु यीशु ने उनसे कुछ कहा था; जब उसने यह आश्चर्य कर्म किया उसके बाद वह चुपके से चला गया। तो क्या उसने इन लोगों से कुछ अपेक्षाएँ कीं? क्या वहाँ कोई नफरत थी? वहाँ ऐसा कुछ भी नहीं था-वह बस इन लोगों पर जो उसका अनुसरण नहीं कर सकते थे आगे से कोई ध्यान देना नहीं चाहता था, और इस समय उसका हृदय दर्द में था। क्योंकि उसने मानव जाति की कलुशता को देखा था और उसने मानव जाति के द्वारा ठुकराए जाने का एहसास किया था, और जब उसने इन लोगों को देखा या जब वह उनके साथ था, तो मनुष्य की मूढ़ता और अज्ञानता ने उसे बहुत ही दुखी कर दिया और उसके दिल को दर्द में छोड़ दिया था, इसलिए वह इन लोगों को जितना जल्दी हो सके छोड़कर चला जाना चाहता था। प्रभु को अपने हृदय में इन से कोई अपेक्षाएँ नहीं थीं, वह उन पर कोई ध्यान देना नहीं चाहता था, विशेषकर वह उन पर अपनी ऊर्जा को खर्च करना नहीं चाहता था, और वह जानता था कि वे उसके पीछे पीछे नहीं आएँगे-इन सभी के बावजूद भी, तब भी उनके प्रति उसकी मनोवृत्तियाँ बिल्कुल साफ थी। वह बस उनके साथ अच्छा बर्ताव करना चाहता था, उन्हें अनुग्रह देना चाहता था-अपने शासन के आधीन प्रत्येक जीवधारी के प्रति यह परमेश्वर की मनोवृत्तियाँ थीः प्रत्येक जीवधारी के साथ अच्छा बर्ताव करना, उनके लिए प्रयोजन करना, उनका पालन पोषण करना। वह मुख्य कारण जिस के लिए प्रभु यीशु ने देहधारण किया था, उसने बहुत ही प्राकृतिक ढंग से स्वयं परमेश्वर के सार तत्व को प्रकाशित किया था और इन लोगों के साथ अच्छा बर्ताव किया था। उसने उनसे दया और सहिष्णुता के हृदय के साथ अच्छा व्यवहार किया था। इस से कोई फर्क नहीं पड़ता है कि इन लोगों ने प्रभु यीशु को किस प्रकार देखा, इस से कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वहाँ किस प्रकार का परिणाम होगा, उसने बस सारी सृष्टि के प्रभु के अपने पद के आधार पर हर एक जीवधारी से व्यवहार किया। उसने बिना किसी अपवाद के जो परमेश्वर के पास है तथा जो वह है और परमेश्वर के स्वभाव को प्रकाशित किया था। इस प्रकार प्रभु यीशु ने खामोशी से कुछ किया था, फिर वह खामोशी से चला गया-यह परमेश्वर के स्वभाव का कौन सा पहलु है? क्या आप कह सकते हैं कि यह परमेश्वर की करूणा है? क्या आप कह सकते हैं कि परमेश्वर स्वार्थी है? क्या एक औसत इंसान ऐसा कर सकता है? बिल्कुल भी नहीं! सार तत्व में, ये पाँच हज़ार लोग कौन थे जिन्हें प्रभु यीशु ने पाँच रोटियाँ और दो मछलियों से खिलाया था? क्या आप कह सकते हैं कि वे ऐसे लोग थे जो उसके अनुरूप थे? क्या आप कह सकते हैं कि वे सभी परमेश्वर के बैरी थे? ऐसा निश्चितता के साथ कहा जा सकता है कि वे वास्तव में प्रभु यीशु के अनुरूप नहीं थे, और उनका सार तत्व बिल्कुल परमेश्वर के विरूद्ध था। परन्तु परमेश्वर ने उनसे कैसा बर्ताव किया था? उसने परमेश्वर के प्रति लोगों केविरोध को थोड़ा कम करने के लिए एक तरीके का प्रयोग किया था-इस तरीके को कहते हैं "कृपालुता।" अर्थात्, यद्यपि प्रभु यीशु ने उन्हें पापियों के रूप में देखा था, फिर भी परमेश्वर की नज़रों में वे तब भी उसकी रचना थे, इस प्रकार उसने इन पापियों से कृपा के साथ व्यवहार किया था। यह परमेश्वर की सहनशक्ति है, और इस सहनशक्ति का निर्धारण स्वयं परमेश्वर की पहचान और सार तत्व से किया जाता है। इस प्रकार, यह कुछ ऐसा है जिसे परमेश्वर के द्वारा सृजे गए किसी भी मनुष्य के द्वारा नहीं किया जा सकता है-केवल परमेश्वर ही इसे कर सकता है।

जब आप परमेश्वर के विचारों और मानव जाति के प्रति उसकी मनोवृत्तियाँकी सचमुच में प्रशंसा करते हैं, और जब आप सचमुच में प्रत्येक जीवधारी के प्रति परमेश्वर की भावनाओं और चिंता को समझ सकते हैं, तो आप सृष्टिकर्ता सृष्टिकर्ताके द्वारा सृजे गए मनुष्यों में सेप्रत्येक के ऊपर खर्च किए जा रहे उस लगन और प्रेम को समझने में भी सक्षम हो सकते हैं। जब ऐसा होता है, आप दो शब्दों को देखेंगे जो परमेश्वर के प्रेम को दर्शाते हैं-और वे दो शब्द क्या हैं?कुछ लोग कहते हैं "निःस्वार्थ," और कुछ लोग कहते हैं "मानव प्रेम।" इन दोनों में "मानव प्रेम" वह शब्द है जो परमेश्वर के प्रेम की व्याख्या करने के लिए सब से कम उपयुक्त है। यह एक शब्द है जिसे लोग एक व्यक्ति के व्यापक-मस्तिष्क के विचारों और भावनाओं की व्याख्या करने के लिए प्रयोग करते हैं। मैं सचमुच में इस शब्द से घृणा करता हूँ, क्योंकि यह बिना समझे बूझे, अव्यवस्थित रूप से, और सिद्धांतों की परवाह किए बगैर उदारता प्रदान करने की ओर संकेत करता है। यह मूर्ख और भ्रमित लोगों काअत्याधिक भावनात्मक प्रकटीकरण है। जब इस शब्द का प्रयोग परमेश्वर के प्रेम को प्रदर्शित करने के लिए किया जाता है, तो वहाँ पर ईश्वर की निदा करने का एक इरादा अवश्य होता है। मेरे पास दो शब्द हैं जो और अच्छे से परमेश्वर के प्रेम को दर्शाते हैं-वे दो शब्द क्या हैं? पहला है "बहुत ज़्यादा" क्या यह शब्द पूर्णत: बुलाहट से भरा हुआ नहीं है? दूसरा है "अति विशाल।" इन दोनों शब्दों के पीछे वास्तविक अर्थ है जिन्हें मैं ने परमेश्वर के प्रेम को दर्शाने के लिए प्रयोग किया है। शब्दशः लेते हुए, "बहुत ज़्यादा" किसी चीज़ के घनफल और क्षमता की व्याख्या करता है, पर इस से फर्क नहीं पड़ता है कि वह चीज़ कितना बड़ा है-यह कुछ ऐसा है जिसे लोग छू और देख सकते हैं। यह इसलिए है क्योंकि वह अस्तित्व में है, वह एक अदृश्य पदार्थ नहीं है, और यह लोगों को आभास देता है कि यह अपेक्षाकृत यथार्थ और व्यावहारिक है। इस से फर्क नहीं पड़ता है कि आप इसे एक समतल या त्रिआयामी कोण से देख रहे हैं; आपको इस की मौजूदगी की कल्पना करने की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वह एक ऐसी चीज़ है जो वास्तव में अस्तित्व में है। यद्यपि "बहुत ज़्यादा" शब्द का प्रयोग करते हुए परमेश्वर के प्रेम की व्याख्या करने से ऐसा महसूस होता है कि उसके प्रेम को तौला जा रहा है, फिर भी, यह हमें यह एहसास भी देता है कि उसके प्रेम को तौला नहीं जा सकता है। मैं कहता हूँ कि परमेश्वर के प्रेम को तौला जा सकता है क्योंकि उसका प्रेम एक प्रकार से अस्तित्वहीन नहीं है, और ना ही वह किसी पौराणिक कथा से आया है। उसके बजाए,यह कुछ ऐसा है जिसे परमेश्वर की आधीनता में सभी जीवधारियों के द्वारा आपस में बाँटा जाता है, और यह कुछ ऐसा है जिस का आनन्द सभी जीवधारियों के द्वारा विभिन्न मात्राओं और विभिन्न दृष्टिकोणों के तहत लिया जाता है। यद्यपि लोग इसे देख या छू नहीं सकते हैं, फिर भी यह प्रेम सभी चीज़ों के लिए जीवन और आवश्यक सामग्रियाँ लेकर आता है जैसा कि यह थोड़ा थोड़ा करके उनकी जिन्दगियों में प्रकाशित होता रहता है, और वे उन प्रत्येक पलों को गिनते हैं और उनकी गवाही देते हैं जिन्हें वे परमेश्वर के प्रेम की रोशनी में बिताते हैं। मैं कहता हूँ परमेश्वर के प्रेम को नापा तौला नहीं जा सकता है क्योंकि परमेश्वर का भेद कुछ ऐसा है जिस की गहराई को मनुष्य नहीं नाप सकते हैं जो सभी चीज़ों के लिए प्रबन्ध करता है और उनका पालन पोषण करता है, सभी चीज़ों के लिए, और विशेषकर उस मानव जाति के लिए परमेश्वर के विचार ऐसे ही हैं। ऐसा कहना चाहिए, कोई नहीं जानता है उस लहू और आसूँओं को जिसे परमेश्वर ने मानव जाति के लिए बहाया है। मानव जाति के लिए सृष्टिकर्ता के प्रेम की गहराई और बोझ को कोई भी नहीं बूझ सकता है, और कोई समझ नहीं सकता है, जिन्हें उसने अपने हाथों से बनाया था। परमेश्वर के प्रेम को "बहुत ज़्यादा" के रूप में दर्शाना लोगों की सहायता करना है ताकि वे उसकी व्यापकता और उसके अस्तित्व की सत्यता की तारीफ कर सकें और उसे समझ सकें। यह इसलिए भी है जिस से लोग अधिक गहराई से "सृष्टिकर्ता" शब्द के वास्तविक अर्थ को समझ सकें, और जिस से लोग "सृष्टि" के विशेष नाम के सच्चे अर्थ की एक गहरी समझ को प्राप्त कर सकें। "अति विशाल" शब्द सामान्यतः क्या प्रदर्शित करता है? यह साधारणतः महासागरों या विश्व के लिए प्रयुक्त होता है, जैसे अति विशालविश्व, या अति विशाल महासागर। विश्व की व्यापकता और शांत गहराई मनुष्य की समझ से कहीं परे है, और यह कुछ ऐसा है जो मनुष्य की कल्पनाओं को ऐसा आकर्षित करता है, कि वे उसके प्रति प्रशंसा से भर जाते हैं। उसका रहस्य और गंभीरता उनकी दृष्टि में तो हैं किन्तु उन की पहुँच से बाहर हैं। जब आप महासागर के बारे में सोचते हैं, आप उसकी व्यापकता के बारे में सोचते हैं - वह असीमित दिखाई देता है, और आप उसकी रहस्यमयता और उसके महासंयोग को देखते हैं। इसी लिए मैं ने परमेश्वर के प्रेम को दर्शाने के लिए "अति विशाल" शब्द का प्रयोग किया है। यह लोगों को यह महसूस करने में सहायता करता है कि वह कितना बहुमूल्य है, और वे उसके प्रेम की अत्यंत सुन्दरता का एहसास कर सकें, और यह कि परमेश्वर का प्रेम असीमित एवं अति विस्तृत है। यह उनके प्रेम की पवित्रता, और परमेश्वर की प्रतिश्ठा और उसके उल्लंघन ना किए जा सकनेवाले गुण का एहसास करने में उनकी सहायता करता है जो उसके प्रेम के जरिए प्रकाशित हुआ है। अब क्या आप सोचते हैं कि "अति विशाल"परमेश्वर को दर्शाने के लिए उपयुक्त शब्द है? क्या परमेश्वर का प्रेम इन दो शब्दों "बहुत ज़्यादा" और "अति विशाल" के अनुसार खरा उतरता है? बिल्कुल खरा उतरता है! मानवीय भाषा में, केवल ये दो शब्द ही अपेक्षाकृत उपयुक्त हैं, और परमेश्वर के प्रेम को दर्शाने के लिए अपेक्षाकृत करीब हैं। क्या आप ऐसा नहीं सोचते हैं? यदि आप मुझे परमेश्वर के प्रेम के बारे में विवरण देते, तो क्या आप इन दो शब्दों का प्रयोग करते? बहुत संभव है कि आप नहीं कर सकते थे, क्योंकि परमेश्वर का प्रेमआप की समझएवं मूल्यांकनकी एक समतल दृष्टिकोण तक सीमित है, और अभी तक त्रिआयामी स्तर की ऊँचाई तक नहीं पहुँचा है। यदि मैं आप से परमेश्वर के प्रेम का वर्णन करवाऊँ, आप महसूस करेंगे कि आपके पास शब्द कम हैं; और आप निःशब्द भी हो जाएँगे। आज जिन दो शब्दों के बारे में मैं ने आपसे बात की है शायद आपके लिए समझना कठिन हो, या हो सकता है कि आप बस यूँ ही उस से सहमत ना हों। यह बस उस सच्चाई को बता सकती है कि परमेश्वर के प्रेम के विषय में आपका मूल्यांकन और आपकी समझ सतही और एक संकरे दायरे के भीतर है। मैं ने पहले भी कहा है कि परमेश्वर निःस्वार्थ है-क्या आपको निःस्वार्थ शब्द स्मरण है। क्या ऐसा कहा जा सकता है कि परमेश्वर के प्रेम को केवल निःस्वार्थ रूप में दर्शाया जा सकता है? क्या यह एक संकुचित क्षेत्र नहीं है? इस से कुछ प्राप्त करने के लिए आप को इस मामले पर और मनन करना होगा।

ऊपर वह प्रथम आश्चर्य कर्म है जिस में हम ने परमेश्वर के स्वभाव और उसके सार तत्व को देखा था। भले ही यह एक कहानी है जिसे लोगों ने कई हज़ार सालों से पढ़ा है, इस की एक सामान्य सी पटकथा है, और यह लोगों को एक सामान्य प्राकृतिक घटना को देखने की स्वीकृति देता है, फिर भी इस सामान्य घटना में हम कुछ देख सकते हैं जो अधिक बहुमूल्य है, और वह है परमेश्वर का स्वभाव एवं जो उसके पास है तथा जो वह है। ये चीज़ें जो उसके पास हैं तथा जो वह है स्वयं परमेश्वर को दर्शाते हैं, और स्वयं परमेश्वर के विचारों का एक प्रकटीकरण है। जब परमेश्वर अपने विचारों को प्रकट करता है, तो यह स्वयं उसकी आवाज़ का प्रकटीकरण है। वह आशा करता है कि ऐसे लोग होंगे जो उसे समझेंगे, उसे जानेंगे, और उसकी इच्छा को बूझेंगे, और वह आशा करता है कि ऐसे लोग होंगे जो उसकी आवाज़ को सुनेंगे और उसकी इच्छा को सन्तुष्ट करने के लिए सक्रियता से सहयोग कर सकेंगे। और ये चीज़ें जिन्हें प्रभु यीशु ने किया था वे परमेश्वर का खामोश प्रकटीकरण था।

आगे, आइए इस अंश को देखें: लाजर के पुनरूत्थान ने परमेश्वर की महिमा की।

इस अंश को पढ़ने के बाद इस का आपके ऊपर क्या प्रभाव पड़ा? प्रभु यीशु के द्वारा किए गए इस आश्चर्य कर्म का महत्व पहले से कहीं ज़्यादा था क्योंकि कोई भी आश्चर्य कर्म किसी मरे हुए इंसान को क़ब्र से बाहर लाने से बढ़कर आश्यचर्यजनक नहीं हो सकता है। प्रभु यीशु का ऐसा कुछ करना उस युग में बहुत ही ज़्यादा महत्वपूर्ण था। क्योंकि परमेश्वर देहधारी हो गया था, लोग केवल उसके शारीरिक रूप, उसके व्यावहारिक पक्ष, और उसके महत्वहीन पक्ष को ही देख पाते थे। यदि किसी ने उसके कुछ गुणों या कुछ सामर्थ को देखा और समझा जैसा उस में दिखाई देता था, फिर भी कोई नहीं जानता था कि प्रभु यीशु कहाँ से आया है, उसका सार तत्व क्या है, और वह वास्तव में इस से ज़्यादा क्या कर सकता था। यह सब कुछ मानव जाति के लिए अनजान था। बहुत से लोग इन चीज़ों का प्रमाण माँगते थे, और सत्य को जानना चाहते थे। अपनी पहचान को साबित करने के लिए क्या परमेश्वर कुछ कर सकता है? परमेश्वर के लिए, यह ठण्डी हवा का एक झोंका था-यह एक केक के टुकड़े के समान था। वह कहीं पर भी, किसी भी समय अपनी पहचान और सार तत्व को साबित करने के लिए कुछ भी कर सकता था, परन्तु परमेश्वर ने चीज़ों को एक योजना के साथ, और चरणों में किया था। उसने चीज़ों को बिना सोच विचार के नहीं किया; उसने सही समय, और कुछ ऐसा करने के लिए जो मानव जाति के देखने में अर्थपूर्ण हो सही अवसर का इन्तज़ार किया। इस ने उसके अधिकार और उसकी पहचान को साबित किया। इस प्रकार तब, क्या लाजर के पुनरूत्थान ने प्रभु यीशु की पहचान को प्रमाणित किया? आइए पवित्र शास्त्र को देखें: "और यह कहकर, उस ने बड़े शब्द से पुकारा, कि हे लाजर, निकल आ। जो मर गया था, वह निकल आया।" जब प्रभु यीशु ने ऐसा किया, उसने बस एक चीज़ कहीः "लाजर बाहर निकल आ।" तब लाजर क़ब्र से बाहर निकल आया-यह प्रभु के द्वारा बोले गए एक पंक्ति के कारण पूरा हुआ था। इस समय के दौरान, प्रभु यीशु ने कोई वेदी स्थापित नहीं की थी, और उसने कोई और गतिविधियाँ नहीं की थी। उसने बस एक बात कही। क्या इसे एक आश्चर्य कर्म कहा जाएगा या एक आज्ञा? या यह किसी प्रकार का जादू था? सतही तौर पर, ऐसा दिखाई देता है कि इसे एक आश्चर्य कर्म कहा जा सकता है, और यदि आप इसे आधुनिक दृष्टिकोण से देखें तो, हाँ वास्तव में आप इसे अभी भी आश्चर्य कर्म कह सकते हैं। फिर भी, एक आत्मा को मुर्दों में से बाहर लाने के लिए इसे जादू मंत्र कदापि नहीं कह सकते हैं, और जादू टोना तो बिल्कुल भी नहीं। ऐसा कहना सही है कि यह आश्चर्य कर्म अत्याधिक सामान्य था, जो सृष्टिकर्ता के अधिकार का एक छोटा सा प्रदर्शन था। यह परमेश्वर का अधिकार, और परमेश्वर की योग्यता है। परमेश्वर के पास अधिकार है कि वह एक व्यक्ति से उसका प्राण ले सकता है, और उसके आत्मा को उसके शरीर से जुदा कर के अधोलोक में,या जहाँ कहीं भी उसे जाना चाहिए, भेज सकता है। जब कोई मरता है, तो मृत्यु के बाद वे कहाँ जाते हैं - ये सब परमेश्वर के द्वारा निर्धारित किया जाता है। वह इसे किसी भी समय और कहीं भी कर सकता है। उसे मनुष्यों, घटनाओं, पदार्थों, समय के अन्तराल, या स्थान के द्वाराविवश नहीं किया जा सकता है। यदि वह इसे करना चाहता है तो वह इसे कर सकता है, क्योंकि सभी चीज़ें और जीवित प्राणी उसके शासन के आधीन हैं, और सभी चीज़ें उसके वचन, और उसके अधिकार के द्वारा जीवित रहते हैं और मृत हो जाते हैं। वह एक मृत व्यक्ति को पुनरूत्थित कर सकता है - यह भी कुछ ऐसा है जिसे वह किसी भी समय, और किसी भी स्थान पर कर सकता है। यह वह अधिकार है जो केवल सृष्टिकर्ता के पास है।

जब प्रभु यीशु ने कुछ ऐसा किया जैसे लाजर को मुर्दों में से वापस लाना, तब उसका उद्देश्य था कि मनुष्यों और शैतान को दिखाने के लिए प्रमाण दे, ताकि मनुष्य और शैतान जान सकें कि मनुष्यों की सभी चीज़ों, और मनुष्यों का जीवन और उनकी मृत्यु परमेश्वर के द्वारा निर्धारित होती है, और यह कि भले ही वह देहधारी हो गया था, फिर भी उसने हमेशा की तरह भौतिक संसार को अपनीआधीनता मेंबनाए रखाथा जिसे मनुष्य देख सकते हैं साथ ही साथ आत्मिक संसार को भी जिसे देख नहीं सकते हैं। यह इसलिए था कि मनुष्य और शैतान जानें कि मानव जाति का सब कुछ शैतान की आधीनता में नहीं है। यह परमेश्वर के अधिकार का प्रकाशन और प्रदर्शन था, और यह सभी चीज़ों को सन्देश देने हेतु परमेश्वर का एक तरीका भी था कि मानव जाति का जीवन और उनकी मृत्यु उसके हाथों में है। प्रभु यीशु के द्वारा लाजर का पुनरूत्थान-इस प्रकार की पहुँच मानव जाति को शिक्षा और निर्देश देने के लिए सृष्टिकर्ताका एक तरीका था। यह एक ठोस कार्य था जिस में उसने मानव जाति को निर्देश देने, और उनके लिए प्रबन्ध करने के लिए अपनी योग्यता और अधिकार का प्रयोग किया था। मानव जाति को उस सत्य को देखने की अनुमति देने के लिए कि वह सभी चीज़ों को अपनी आधीनता में रखता है, यह सृष्टिकर्ता का एक ऐसा मार्ग था जिसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता था।यह उसका एक मार्ग था ताकि वह मानव जाति को व्यावहारिक कार्यों के जरिएयह बता सके कि उसके बगैर कोई उद्धार नहीं है। मानव जाति को इस प्रकार के निर्देश देने के उसके खामोश माध्यम सर्वदा बने रहते हैं - यह अक्षय है, और इस ने मनुष्य के हृदय को एक आघात और प्रकाश रूपी ज्ञान दिया है जो कभी धूमिल नहीं हो सकते हैं। लाजर के पुनरूत्थान ने परमेश्वर की महिमा की-इस का परमेश्वर के प्रत्येक अनुयायी पर एक गहरा प्रभाव पड़ा है। यह प्रत्येक व्यक्ति की समझ में मज़बूती से जड़ जाता है जो गहराई से इस घटना, और उस दर्शन को समझता है कि "केवल परमेश्वर ही मानव जाति के जीवन और मृत्यु पर शासन कर सकता है।" यद्यपि परमेश्वर के पास इस प्रकार का अधिकार है, और यद्यपि उसने मानव जाति के जीवन और मृत्यु के ऊपर अपनी सर्वोच्चता के बारे में लाजर के पुनरूत्थान के जरिए एक सन्देश भेजा है, फिर भी यह उसका प्राथमिक कार्य नहीं था। परमेश्वर कोई कार्य बिना किसी आशय के कभी नहीं करता है। हर एक चीज़ जो वह करता है उसका बड़ा महत्व है; यह सब एक अति उन्नत ख़ज़ाना है। वह एक व्यक्ति के क़ब्र से बाहर आने को अपने कार्य का प्राथमिक या एकमात्र उद्देश्य या चीज़ बिल्कुल भी नहीं बनाएगा। परमेश्वर ऐसा कुछ भी नहीं करता है जिस का कोई आशय ना हो। लाजर का एक पुनरूत्थान परमेश्वर के अधिकार को प्रदर्शित करने के लिए काफी था। यह प्रभु यीशु की पहचान को साबित करने के लिए पर्याप्त था। इसीलिए प्रभु यीशु ने इस प्रकार के चमत्कार को फिर से नहीं दोहराया था। परमेश्वर अपने स्वयं के सिद्धांतों के अनुसार कार्यों को करता है। मानवीय भाषा में, यह इस प्रकार होगा "परमेश्वर गंभीर कार्य को लेकर सचेत है।" अर्थात्, जब परमेश्वर चीज़ों को करता है तब वह अपने कार्य के उद्देश्य से भटकता नहीं है। वह जानता है कि इस स्तर पर उसे कौन सा कार्य करना चाहिए, वह क्या पूरा करना चाहता है, और वह अपनी योजना के अनुसार कड़ाई से कार्य करेगा। यदि एक भ्रष्ट व्यक्ति के पास इस प्रकार की काबिलियत होती, तो वह बस अपनी योग्यता को प्रदर्शित करने के तरीकों के बारे में ही सोचता रहेगा ताकि लोगों को पता चल सके कि वह कितना भयंकर था, इस प्रकार वे उसके सामने झुक जाते, इस प्रकार वह उन्हें नियन्त्रित कर सकता था और उन्हें निगल सकता था। यह वह बुराई है जो शैतान से आती है-इसे भ्रष्टता कहते हैं। परमेश्वर के पास इस प्रकार का स्वभाव नहीं है, और उसके पास इस प्रकार का सार तत्व भी नहीं है। इन चीज़ों को करने में उसका उद्देश्य अपने आप को बड़ा दिखाना नहीं है, परन्तु मानव जाति को और अधिक प्रकाशन और मार्गदर्शन प्रदान करना है, इस प्रकार लोग बाइबल में इस तरह की चीज़ों के बहुत कम ही उदाहरणों को देखते हैं। इस का मतलब यह नहीं है कि प्रभु यीशु की योग्यताएँ सीमित थीं, या वह इस प्रकार की चीज़ को नहीं कर सकता था। यह सरल है कि परमेश्वर ऐसा नहीं करना चाहता था, क्योंकि प्रभु यीशु के द्वारा लाजर के पुनरूत्थान का बहुत ही व्यावहारिक महत्व था, और साथ ही क्योंकि देहधारी परमेश्वर के कार्य की प्राथमिकता आश्चर्य कर्मों को करना नहीं था, यह लोगों को मुर्दों में से वापस लाना नहीं था, किन्तु यह मानव जाति के छुटकारे के कार्य को करना था। इस प्रकार, प्रभु यीशु के द्वारा पूर्ण किए गए कार्य का अधिकांश भाग था लोगों को शिक्षा देना, उनके लिए प्रबन्ध करना, एवं उनकी सहायता करना, और ऐसी चीज़ें जैसे लाजर को जिलाना उसकी सेवकाई का मात्र एक छोटा सा अंश था जिसे प्रभु यीशु ने किया था। उस से भी अधिक, आप कह सकते हैं कि "अपनी बड़ाई करना" परमेश्वर के सार तत्व का एक भाग नहीं था, इस प्रकार अधिक चमत्कारों को नहीं दिखाना जानबूझकर किया गया प्रतिरोध नहीं था, और ना ही यह वातावरण की सीमाओं के कारण था, और योग्यता की कमी तो बिल्कुल भी नहीं थी।

जब प्रभु यीशु ने लाजर को मृतकों में से वापस जीवित किया, उसने एक पंक्ति का उपयोग किया थाः "लाजर बाहर निकल आ।" उसने इस से अलग कुछ भी नहीं कहा था-ये शब्द क्या दर्शाते हैं? ये दर्शाते हैं कि परमेश्वर बोलने के द्वारा कुछ भी पूरा कर सकता है, जिस में एक मरे हुए इंसान को जीवित करना भी शामिल है। जब परमेश्वर ने सभी चीज़ों की सृष्टि की, जब उसने जगत को बनाया, उसने ऐसा अपने वचनों के द्वारा किया था। उसने बोले गए आज्ञाओं, एवं अधिकार के वचनों का प्रयोग किया था, और बस इस प्रकार सभी चीज़ों की सृष्टि हो गई थी।यह इसी प्रकार पूरा हुआ था।यह एक मात्र पंक्ति जो प्रभु यीशु के द्वारा कहा गया वह परमेश्वर के द्वारा कहे गए उस वचन के समान था जब उसने आकाश और पृथ्वी और सभी चीज़ों की सृष्टि की थी; उस में परमेश्वर का अधिकार, और सृष्टिकर्ताकी योग्यता एक समान थी। परमेश्वर के मुँह के वचनों के कारण सभी चीज़ों को बनाया गया और वे स्थिर हुए, और बिल्कुल वैसे ही प्रभु यीशु के मुँह से बोले गए वचन के कारण लाजर अपनी क़ब्र से बाहर आ गया। यह परमेश्वर का अधिकार था, जो उस के देहधारी शरीर में प्रदर्शित और सिद्ध हुआ था। इस प्रकार का अधिकार और योग्यता सृष्टिकर्ताका था, और मनुष्य के पुत्र का था जिस में सृष्टिकर्तासिद्ध हुआ था। या वह समझ है जिसे परमेश्वर के द्वारा लाजर को मृतकों में से वापस जिलाकर मानव जाति को सिखाया जाता है। इस शीर्षक पर बस इतना ही। आगे, आइए पवित्र शास्त्र को पढ़ें।

10. फरीसियों के द्वारा यीशु पर दोष लगाया जाना

(मरकुस 3:21-22) जब उस के कुटुम्बियों ने यह सुना, तो उसे पकड़ने के लिए निकले; क्योंकि वे कहते थे, कि उस का चित्त ठिकाने नहीं है। और शास्त्री जो यरूशलेम से आए थे, यह कहते थे, कि उस में शैतान है, और यह भी, कि वह दुष्टात्माओं के सरदार की सहायता से दुष्टात्माओं को निकालता है।

11. यीशु फरीसियों को डाँटता है

(मत्ती12:31-32) इसलिए मैं तुम से कहता हूँ, कि मनुष्य का सब प्रकार का पाप और निन्दा क्षमा की जाएगी, पर आत्मा की निन्दा क्षमा ना की जाएगी। जो कोई मनुष्य के पुत्र के विरोध में कोई बात कहेगा, उस का यह अपराध क्षमा किया जाएगा,परन्तु जो कोई पवित्र आत्मा के विरोध में कुछ कहेगा, उस का अपराध ना तो इस लोक में और ना परलोक में क्षमा किया जाएगा।

(मत्ती23:13-15) हे कपटी शास्त्रियों और फरीसियों तुम पर हाय! तुम मनुष्यों के विरोध में स्वर्ग के राज्य का द्वार बन्द करते हो, ना तो आप ही उस में प्रवेश करते हो और ना उस में प्रवेश करनेवालों को प्रवेश करने देते हो। हे कपटी शास्त्रियों और फरीसियों तुम पर हाय ! तुम एक जन को अपने मत में मिलाने के लिए सारे जल और थल में फिरते हो, और जब वह मत में आ जाता है, तो उसे अपने से दूना नारकीय बना देते हो।

ऊपर दो अलग अलग अंश हैं - आइए पहले प्रथम पर एक नज़र डालें: फरीसियों के द्वारा यीशु पर दोष लगाया जाना।

बाइबल में, फरीसियों के द्वारा स्वयं यीशु का मूल्याँकन और वे चीज़ें जो उसने किया था वे थेः क्योंकि वे कहते थे, कि उस का चित्त ठिकाने नहीं है। और शास्त्री जो यरूशलेम से आए थे, यह कहते थे, कि उस में शैतान है, और यह भी, कि वह दुष्टात्माओं के सरदार की सहायता से दुष्टात्माओं को निकालता है (मरकुस 3:21-22)। शास्त्रियों और फरीसियों के द्वारा यीशु पर दोष लगाना रट्टू तोते की तरह बोलना या हवा के हल्के बयार में कल्पना करना नहीं था-जो कुछ उन्होंने देखा और उसके कार्यों के विषय में सुना था उसके आधार पर यह प्रभु यीशु के लिए उनका निष्कर्ष था। यद्यपि उनका निष्कर्ष व्यर्थ दिखावे के रूप में न्याय के नाम पर लिया गया था और लोगों को ऐसा दिखता था मानो उन्हें अच्छे प्रमाणों से स्थापित किया गया है, फिर भी वह अहंकार जिस के तहत उन्होंने प्रभु यीशु पर दोष लगाया था उस पर काबू पाना स्वयं उनके लिए भी कठिन था। प्रभु यीशु के लिए उनकी नफरत की आवेग से भरी हुई ऊर्जा ने स्वयं उनकी खतरनाक महत्वाकांक्षा और उन के बुरे शैतानी चेहरे, साथ ही साथ परमेश्वर का विरोध करने के उनके द्रोही स्वभाव का भी का खुलासा कर दिया था। ये बातें उन्होंने प्रभु यीशु पर दोष लगाते हुए कहा था जो उनके खतरनाक महत्वाकांक्षाओं, ईर्ष्या, और परमेश्वर एवं सच्चाई के प्रति उनकी शत्रुता के गन्दे और द्रोही स्वभाव से प्रेरित था। उन्होंने प्रभु यीशु के कार्यों के स्रोत की खोज नहीं की, और ना ही उन्होंने जो कुछ उसने कहा था या किया था उसके सार तत्व की खोज की। परन्तु उन्होंने असावधानी, अधीरता, सनक और जानबूझकर की गई ईर्ष्या के साथ जो कुछ उसने किया था उस पर आक्रमण किया और उस पर विश्वास नहीं किया। यह इस बिन्दु तक था कि उन्होंने बिना सोचे विचारे उसके आत्मा पर, अर्थात् पवित्र आत्मा, परमेश्वर के आत्मा पर कलंक लगाया। यही उनका मतलब था जब उन्होंने कहा था "वह अपने आपे में नहीं है," "बालजबूल और दुष्टात्माओं का सरदार।" ऐसा कहना चाहिए, उन्होंने कहा कि परमेश्वर का आत्मा बालजबूल और दुष्टात्माओं का सरदार है। उन्होंने उस देहधारी शरीर के कार्य को पागलपन कहा जिसे परमेश्वर के आत्मा ने धारण किया था। उन्होंने ना केवल बालजबूल और दुष्टात्माओं का सरदार कहकर परमेश्वर के आत्मा की निन्दा की, परन्तु उन्होंने परमेश्वर के कार्य पर दोष भी लगाया था। उन्होंने प्रभु यीशु मसीह पर दोष लगाया और उसकी निन्दा की। उनके प्रतिरोध और परमेश्वर की निन्दा का सार तत्व बिल्कुल शैतान और परमेश्वर के प्रति दुष्टात्माओं के प्रतिरोध और ईश निन्दा के सार तत्व के समान ही था। वे ना केवल भ्रष्ट मनुष्यों को दर्शाते हैं, बल्कि इस से कहीं ज़्यादा वे शैतान के मूर्त रूप है। वे मानव जाति के मध्य एक माध्यम थे, और वे शैतान के सहअपराधी और सन्देशवाहक थे। उनकी ईश निन्दा का निचोड़ और उनके द्वारा प्रभु यीशु मसीह के चरित्र को दूषित किया जाना यह सब परमेश्वर के साथ पद को लेकर उनका संघर्ष, परमेश्वर के साथ उनकी प्रतिस्पर्धा, और परमेश्वर को परखने की उनकी कभी ना खत्म होनेवाली इच्छा थी। परमेश्वर के प्रति उनके प्रतिरोध का निचोड़ और उसके प्रति उनकी शत्रुता की मनोवृत्तियाँ,साथ ही साथ उनके शब्द और उनके विचारों ने सीधे सीधे परमेश्वर के आत्मा की निन्दा की और उसे क्रोधित किया था। इस प्रकार, परमेश्वर ने जो कुछ उन्होंने कहा था और किया था उसके लिए एक उचित दण्ड का निर्धारण किया, और उन के कार्यो को पवित्र आत्मा के विरूद्ध पाप के रूप में निर्धारित किया था। यह पाप इस संसार और आनेवाले संसार में भी क्षमा करने योग्य नहीं है, बिल्कुल वैसा ही जैसा निम्नलिखित अंश कहता हैः "मनुष्य का सब प्रकार का पाप और निन्दा क्षमा की जाएगी, पर आत्मा की निन्दा क्षमा ना की जाएगी" और "परन्तु जो कोई पवित्र आत्मा के विरोध में कुछ कहेगा, उस का अपराध ना तो इस लोक में और ना परलोक में क्षमा किया जाएगा।" आज, आइए हम परमेश्वर से इन शब्दों के सच्चे अर्थ के बारे में बातें करें "उस का अपराध ना तो इस लोक में और ना परलोक में क्षमा किया जाएगा। यह सरल रीति से समझना है कि परमेश्वर किस प्रकार वचनों को पूरा करता है "उस का अपराध ना तो इस लोक में और ना परलोक में क्षमा किया जाएगा।"

प्रत्येक चीज़ जिस के बारे में हम बात कर चुके हैं वह परमेश्वर के स्वभाव, और लोगों, प्रकरणों, और चीज़ों के प्रति उसकी मनोवृत्तियाँ से जुड़ा हुआ है। स्वाभाविक रीति से, ऊपर दिए गए दोनों अंश अपवाद नहीं हैं। क्या आपने पवित्र शास्त्र के इन दोनों अंशों में कुछ ध्यान दिया था? कुछ लोग कहते हैं कि वे परमेश्वर के क्रोध को देखते हैं। कुछ लोग कहते हैं कि वे परमेश्वर के स्वभाव के उस पक्ष को देखते हैं जो मानव जाति के अपराध को सहन नहीं कर सकता है, और यह कि यदि लोग कुछ ऐसा करें जिस से परमेश्वर की निन्दा हो, तो वे उसकी क्षमा को प्राप्त नहीं करेंगे। इस सच्चाई के अतिरिक्त कि लोग इन दोनों अंशों में परमेश्वर के क्रोध और असहिष्णुता को देखते हैं और महसूस करते हैं, फिर भी वे अभी तक उसकी मनोवृत्तियाँ को सचमुच में समझ नहीं पाए हैं। ये दोनों अंश उनके प्रति जो उसकी निन्दा करते हैं और उसे क्रोधित करते है परमेश्वर की सच्ची मनोवृत्तियाँ और पहुँच के अर्थ को धारण किए हुए है। पवित्र शास्त्र का यह अंश उसकी सच्ची मनोवृत्तियाँऔर पहुँच के अर्थ को थामे हुए हैः "परन्तु जो कोई पवित्र आत्मा के विरोध में कुछ कहेगा, उस का अपराध ना तो इस लोक में और ना परलोक में क्षमा किया जाएगा।" जब लोग परमेश्वर की निन्दा करते हैं, जब वे उसे रिस दिलाते हैं, वह एक आदेश जारी करता है, और उसका आदेश उसका अन्तिम परिणाम होता है। इसे बाइबल मे इस प्रकार से वर्णित किया गया हैः "इसलिए मैं तुम से कहता हूँ, कि मनुष्य का सब प्रकार का पाप और निन्दा क्षमा की जाएगी, पर आत्मा की निन्दा क्षमा ना की जाएगी" (मत्ती12:31-32), और "हे कपटी शास्त्रियों और फरीसियों तुम पर हाय!" (मत्ती23:13-15)। फिर भी, यह बाइबल में दर्ज है कि शास्त्रियों और फरीसियों का, साथ ही साथ उन लोगों का क्या परिणाम हुआ था जिन्हों ने प्रभु यीशु के द्वारा इन बातों को कहने के बाद कहा था कि वह पागल है? यदि उन्होंने किसी प्रकार का दण्ड सहा तोक्या यह पवित्र शास्त्र में दर्ज है? यह निश्चित है कि यह दर्ज नहीं था। यहाँ यह कहना कि "दर्ज नहीं था" यह नहीं है कि इसे दर्ज नहीं किया गया था, किन्तु वास्तव मे वहाँ कोई परिणाम नहीं था जिसे मनुष्य की आँखों से देखा जा सकता था। यह "दर्ज नहीं था" एक मसलेकी व्याख्या करता है, अर्थात् कुछ चीज़ों को सँभालने के लिए परमेश्वर की मनोवृत्तियाँ एवं सिद्धांत। जो परमेश्वर की निन्दा करते हैं या उसे कोसते हैं उन लोगों के प्रति उसका उपचार, या वे जो उस पर कलंक लगाते हैं-लोग जो जानबूझकर उस पर हमला करते हैं, कलंक लगाते हैं, और उसे कोसते हैं-वह उनकी आँखोंको अँधा और उन के कान को बहरा नहीं करता है। उनके प्रति उसके पास एक साफ मनोवृत्ति है। वह इन लोगों से घृणा करता है, अपने हृदय में उनकी भ्रत्सना करता है। वह खुलकर उनके लिए परिणामों की घोषणा भी करता है, ताकि लोग जान सकें कि जो उसकी निन्दा करते हैं उनके प्रति उसके पास एक स्पष्ट मनोवृत्ति है, और ताकि वे यह भी जान सकें कि वह किस प्रकार उनके नतीजों को निर्धारित करता है। फिर भी, परमेश्वर के ऐसा कहने के बाद, बहुत मुश्किल से ही लोग उस सच्चाई को देख पाते हैं कि परमेश्वर किस प्रकार ऐसे लोगों से निपटता है, और वे परमेश्वर के नतीजों के पीछे के सिद्धांतों, और उनके लिए उसकी आज्ञा को समझ नहीं सकते हैं। ऐसा कहना चाहिए, मानव जाति उस विशेष मनोवृत्ति और पद्धति को देख नहीं सकते हैं जो उनसे निपटने के लिए परमेश्वर के पास है। कुछ चीज़ो को करने के लिए इसे परमेश्वर के सिद्धांतों से ताल्लुक रखना है। कुछ लोगों के बुरे व्यवहार से निपटने के लिए परमेश्वर कुछ प्रमाणित तथ्यों की खोज का प्रयोग करता है। अर्थात्, वह उन के पापों की घोषणा नहीं करता है और उन के परिणामों को निर्धारित नहीं करता है, परन्तु वह प्रत्यक्ष रूप से प्रमाणित तथ्यों की खोज का प्रयोग करता है जिस से उन्हें दण्डित करने, और उनका उचित बदला देने की अनुमति दे सके। जब ये प्रमाणित तथ्य घटित होते हैं, इस से लोगों को शरीर में कष्ट उठाना पड़ता है; यह सब कुछ ऐसा है जिसे मनुष्य की आँखों से देखा जा सकता है। कुछ लोगों के बुरे व्यवहार से निपटते समय, परमेश्वर बस वचनों से षाप देता है, परन्तु उसी समय, परमेश्वर का क्रोध उनके ऊपर आ जाता है, और वह दण्ड जिसे वे प्राप्त करते हैं वह शायद कुछ ऐसा होता है जिसे लोग देख नहीं सकते हैं, परन्तु इस प्रकार के नतीजे शायद उन नतीज़ों से कहीं ज़्यादा गंभीर हो सकते हैं जब लोग देख सकते हैं कि उन्हें दण्डित किया या मारा जा रहा है। यह इसलिए है क्योंकि उस परिस्थिति के अन्तर्गत जिस में परमेश्वर ने यह निर्धारित किया है कि इस प्रकार के व्यक्ति को बचाना नहीं है, और आगे से उनके लिए कोई दया और सहनशीलता नहीं दिखाना है, और उन्हें कोई और अवसर नहीं देना है, तो उनके लिए उस की मनोवृत्तियाँ होती है कि उन्हें अलग कर दिया जाए। "अलग कर दिया जाए" का अर्थ क्या होता है?अपने आप में इस शब्दावली का अर्थ होता है किसी चीज़ को एक तरफ रख दिया जाए, और आगे से उस पर कोई ध्यान ना दिया जाए।यहाँ, जब परमेश्वर "अलग कर देता है" तो उस के अर्थ की दो अलग अलग व्याख्याएँ होती हैं: पहली व्याख्या है कि उसने उस व्यक्ति के जीवन, और उस व्यक्ति की हर चीज़ को शैतान को दे दिया गया है ताकि वह उस के साथ निपटे। परमेश्वर अब आगे से उत्तरदायित्व नहीं लेगा और आगे से उसका प्रबन्ध भी नहीं करेगा। भले ही वह व्यक्ति पागलया मूर्ख हो जाए, और चाहे जीवित रहे या मर जाए, या भले ही वे अपने दण्ड के लिए नरक में नीचे चले जाएँ, फिर भी इस से परमेश्वर का कोई लेना देना नहीं होगा। इस का यह मतलब होगा कि उस जीवधारी का परमेश्वर के साथ कोई रिश्ता नहीं होगा। दूसरी व्याख्या यह है कि परमेश्वर ने यह निर्धारित किया है कि वह स्वयं इस व्यक्ति के साथ, अपने हाथों से कुछ करना चाहता है। यह संभव है कि वह इस प्रकार के व्यक्ति के प्रयासों का उपयोग करेगा, या यह कि वह इस व्यक्ति को एक महीन परत के रूप में उपयोग करेगा। यह संभव है कि इस प्रकार के इंसान से निपटने, और उस का उपचार करने के लिए परमेश्वर के पास एक विशेष तरीका होगा-बिल्कुल पौलुस के समान।यह परमेश्वर के हृदय का सिद्धांत और मनोवृत्ति है कि उसने किस तरह इस प्रकार के व्यक्ति से निपटने का निर्णय लिया है। इस प्रकार जब लोग परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं, और उस पर दोश और कलंक लगाते हैं, और यदि वे उसके स्वभाव को रिस दिलाते हैं, या यदि वे परमेश्वर के निर्णायक बिन्दु तक पहुँच जाते हैं, तो परिणाम अकल्पनीय हो जाते हैं। सब से कठोर परिणाम यह है कि परमेश्वर हमेशा हमेशा के लिए उनकी ज़िन्दगियों और उन की हर चीज़ को शैतान को सौंप देता है। वे पूरी अनन्तता के लिए क्षमा नहीं किए जाएँगे। इस का यह मतलब है कि यह व्यक्ति शैतान के मुँह का निवाला, और उसके हाथ का खिलौना बन चुका है, और उस समय के बाद से परमेश्वर का उनके साथ कुछ लेना देना नहीं है। क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि जब शैतान ने अय्यूब की परीक्षा ली थी तो वह किस प्रकार की दुर्दशा थी? उस शर्त के अंतर्गत जिस में शैतान को अय्यूब के प्राण को नुकसान पहुँचाने की अनुमति नहीं दी गई थी, फिर भी, अय्यूब ने बड़ा कठिन दुख सहा था। और क्या शैतान की क्रूरता की कल्पना करना और ज़्यादा कठिन नहीं है जिस के आधीन एक व्यक्ति को कर दिया जाएगा, जिसे पूर्णत: शैतान को सौंपा जा चुका है, जो पूर्णत: शैतान के चंगुल में है, जिस ने परमेश्वर की देखरेख और दया को पूर्णत: खो दिया है, जो आगे से सृष्टिकर्ता के शासन के आधीन नहीं है, जिस से परमेश्वर की आराधना करने का अधिकार, और परमेश्वर के शासन के आधीन एक जीवधारी होने का अधिकार छिना जा चुका है, जिस का रिश्ता सृष्टि के प्रभु के साथ पूर्णत: अलग कर दिया गया है? शैतान के द्वारा अय्यूब को दुख देना कुछ ऐसा था जिसे मनुष्य की आँखों से देखा जा सकता था, परन्तु यदि परमेश्वर एक व्यक्ति के जीवन को शैतान को सौंप देता है, तो इस का नतीजा ऐसा होगा जिस के बारे में किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी। यह ऐसा है मानो कुछ लोग एक गाय, या एक गधे के रूप में फिर से जन्म लें, या कुछ लोगों पर अशुद्ध, और बुरी आत्माओं के द्वारा कब्जा कर लिया जाए, या वे उन में समा जाएँ, इत्यादि। यह वह परिणाम है, और उन लोगों का अन्त है जिन्हें परमेश्वर के द्वारा शैतान को सौंपा जा चुका है। बाहरी तौर पर, ऐसा दिखाई देता है कि वे लोग जिन्होंने प्रभु यीशु का उपहास किया था, उस पर दोश लगाया था, और उसकी निन्दा की थी उन्होंने कोई परिणाम नहीं सहा। फिर भी, सच्चाई यह है कि हर एक चीज़ से निपटने के लिए परमेश्वर के पास एक मनोवृत्ति है। वह जिस प्रकार हर तरह के लोगों से निपटता है उसके परिणामको लोगों को बताने के लिए शायद परमेश्वर स्पष्ट भाषा का प्रयोग ना करे। कई बार वह प्रत्यक्ष रीति बात नहीं करता है, परन्तु वह प्रत्यक्ष रीति से कार्यों को करता है। वह इसके बारे में बात नहीं करता है,तो इसका मतलब यह नहीं है कि वहाँ एक परिणाम नहीं है-यह भी संभव है कि परिणाम बहुत ही ज़्यादा गंभीर हो। प्रकट रूप से देख ने से, ऐसा लगता है कि परमेश्वर अपनी मनोवृत्ति को प्रकाशित करने के लिए कुछ लोगों से बात नहीं करता है; वस्तुतः, परमेश्वर लम्बे समय तक उन पर कोई ध्यान देना नहीं चाहता है। वह उनको अब और देखना नहीं चाहता है। उन चीज़ों, तथा उनके व्यवहार के कारण जो उन्होंने किया है, और उनके स्वभाव और उनके सार तत्व के कारण, परमेश्वर केवल इतना चाहता है कि वे उस की नज़रों से ओझल हो जाएँ, और वह उन्हें सीधे शैतान को सौंप देना चाहता है, ताकि उन के आत्मा, प्राण, और देह को शैतान के दे दे, ताकि शैतान को अनुमति मिले कि वह जो चाहे वह करे। यह स्पष्ट हो गया कि वह किस हद तक उनसे नफरत करता है, वह किस हद तक उन से उकता गया है। यदि एक इंसान इस हद तक उसे क्रोधित करता है कि परमेश्वर उसे दुबारा देखना भी नहीं चाहता है, तो वह उन्हें पूर्णत: छोड़ देगा, उस बिन्दु तक कि परमेश्वर स्वयं उनसे कोई व्यवहार करना नहीं चाहेगा-यदि यह उस बिन्दु तक पहुँच जाता है तो वह उन्हें शैतान को सौंप देगा ताकि वह जैसा चाहे वैसा करे, और वहशैतान को अनुमति देगा कि उन पर नियन्त्रण करे, उन्हें भस्म करे, और जैसा चाहे उनसे वैसा व्यवहार करे-इस इंसान का पूर्णत: खात्मा हो गया। मनुष्य होने का उनका अधिकार पूरी रीति से रद्द कर दिया गया है, और एक जीवधारी होने के नाते उनका अधिकार समाप्त हो गया। क्या यह अति गंभीर परिणाम नहीं है?

ऊपर दी गई सभी बातें इन वचनों की सम्पूर्ण व्याख्या हैः "उस का अपराध ना तो इस लोक में और ना परलोक में क्षमा किया जाएगा," और यह पवित्र शास्त्र के इन अंशों के ऊपर एक छोटी सी टीका भी है। मैं सोचता हूँ अब आपके पास इन बातों की समझ है!

अब आइए हम नीचे दिए पवित्र शास्त्र के अंश को पढ़ें

12. अपने पुनरूत्थान के बाद अपने चेलों के लिए यीशु के वचन

(यूहन्ना 20:26-29) आठ दिन के बाद उस के चेले फिर घर में थे, और थोमा उनके साथ था, और द्वार बन्द थे, तब यीशु ने आकर और बीच में खड़ा होकर कहा, तुम्हें शांति मिले। तब उसने थोमा से कहा, अपनी ऊंगली यहाँ लाकर मेरे हाथों को देख और अपना हाथ लाकर मेरे पंजर में डाल और अविश्वासी नहीं परन्तु विश्वासी हो। यह सुन थोमा ने उत्तर दिया, हे मेरेप्रभु, हे मेरे परमेश्वर ! यीशु ने उस से कहा, तू ने तो मुझे देखकर विश्वास किया है, धन्य वे हैं जिन्होंने बिना देखे विश्वास किया है।

(यूहन्ना 21:16-17) उसने दूसरी बार उस से कहा, हे शमौन यूहन्ना के पुत्र, क्या तू मुझ से प्रेम रखता है? उसने उस से कहा, हाँ, प्रभु तू जानता है, कि मैं तुझ से प्रीति रखता हूँ: उसने उस से कहा मेरी भेड़ों की रखवाली कर। उसने तीसरी बार उस से कहा, हे शमौन यूहन्ना के पुत्र, क्या तू मुझ से प्रीति रखता है? पतरस उदास हुआ, कि उसने तीसरी बार ऐसा कहा; कि क्या तू मुझ से प्रीति रखता है? और उस से कहा, हे प्रभु तू तो सब कुछ जानता हैः तू यह जानता है कि मैं तुझसे प्रीति रखता हूँ: यीशु ने उस से कहा, मेरी भेड़ों को चरा।

ये अंश जिसे फिर से बताते हैं वे कुछ ऐसी चीज़ें हैं जिन्हें प्रभु यीशु ने अपने पुनरूत्थान के बाद किया था और अपने चेलों से कहा था। पहले, आइए हम पुनरूत्थान से पहले के प्रभु यीशु और उसके बाद के प्रभु यीशु के मध्य किसी भी प्रकार केअन्तर पर एक नज़र डालें। क्या वह अभी भी पिछले दिनों के प्रभु यीशु के समान ही था? पवित्र शास्त्र में निम्नलिखित पंक्ति है जो पुनरूत्थान के बाद के प्रभु यीशु की चित्रण करती हैः "और द्वार बन्द थे, तब यीशु ने आकर और बीच में खड़ा होकर कहा, तुम्हें शांति मिले।" यह बिल्कुल स्पष्ट है कि उस समय प्रभु यीशु देह में नहीं था, परन्तु एक आत्मिक देह था। यह इसलिए था क्योंकि उसने देह की सीमाओं को पार कर दिया था, और जब द्वार बन्द ही थे फिर भी वह लोगों के बीच में भीतर आ गया और उन्हें अपने आप को दिखाया। यह पुनरूत्थान के बाद के प्रभु यीशु और पुनरूत्थान के पहले के प्रभु यीशु जो देह में रह रहा था उन के मध्य सब से बड़ा अन्तर है। यद्यपि उस समय आत्मिक देह के रूप और उस से पहले के प्रभु यीशु के रूप के बीच में कोई अन्तर नहीं था, फिर भी उस पल यीशु एक ऐसा यीशु बन गया था जो लोगों को एक अजनबी के समान लगता था, क्योंकि मुर्दों में से जी उठने के बाद वह एक आत्मिक देह बन गया था, और अपनी पिछली देह की तुलना में, यह आत्मिक देह लोगों के लिए कहीं ज़्यादा व्याकुल करनेवाला और भ्रमित करनेवाला था। इस ने प्रभु यीशु और लोगों के मध्य दूरियों को और अधिक बढ़ाया, और लोगों ने अपने हृदयों में महसूस किया कि उस समय प्रभु यीशु कहीं ज़्यादा रहस्यमयी बन गया था। लोगों की ऐसी समझ और भावनाओं ने उन्हें अचानक वापस एक ऐसे युग में पहुँचा दिया था जिस में वे एक ऐसे परमेश्वर पर विश्वास करते थे जिसे देखा और छुआ नहीं जा सकता था। इस प्रकार, वह पहली चीज़ जो प्रभु यीशु ने अपने पुनरूत्थान के बाद किया वह यह था कि उसने अपने अस्तित्व को प्रमाणित करने के लिए, और अपने पुनरूत्थान को साबित करने के लिए हर एक को उसे देखने की अनुमति दी। इस के अतिरिक्त, उसने लोगों के साथ अपने रिश्ते को फिर से उस तरह सुधारा जैसा उनके साथ था जब वह देह में कार्य कर रहा था, और वह उनका मसीहा था जिसे वे देख और छू सकते थे।इस रीति से, एक परिणाम यह हुआ कि लोगों में कोई सन्देह नहीं था कि प्रभु यीशु को क्रूस पर कीलों से ठोके जाने के बाद उसे मृत्यु से जिलाया गया था, और मानव जाति को छुड़ाने के प्रभु यीशु के कार्य में कोई सन्देह नहीं था। और दूसरा परिणाम वह प्रमाणित तथ्य है कि पुनरूत्थान के बाद प्रभु यीशु ने लोगों के सामने अपने आप को प्रगट किया और लोगों को उसे देखने और छूने की अनुमति दी जिस ने अनुग्रह के युग में मानव जाति को दृढ़ता से सुरक्षित किया। इस समय के बाद से, प्रभु यीशु की "अनुपस्थिति" या "छोड़कर चले जाने" के कारण लोग वापस पिछले युग, अर्थात् व्यवस्था के युग में नहीं जा सकते थे, लेकिन वे प्रभु यीशु की शिक्षाओं और उस कार्य का अनुसरण करते हुए जो उसने किया था लगातार आगे बढ़ते जाएँगे। इस प्रकार, अनुग्रह के युग के कार्य में औपचारिक रूप से एक नया दौर खुल चुका था, और वे लोग जो लम्बे समय से व्यवस्था के आधीन थे, उसके बाद औपचारिक रूप से व्यवस्था से बाहर आ गए, औरएक नए युग में, एक नई शुरूआत के साथ प्रवेश किया।पुनरूत्थान के बाद मानव जाति के सामने प्रभु यीशु के दिखाई देने के ये ढेर सारे अर्थ हैं।

जबकि वह एक आत्मिक देह था, तो लोग उसे कैसे छू सकते थे, और उसे कैसे देख सकते थे? यह मानव जाति के लिए प्रभु यीशु के प्रकटीकरण के महत्व से ताल्लुक रखता है। क्या आपने पवित्र शास्त्र के इन अंशों में किसी चीज़ पर ध्यान दिया? सामान्यतः आत्मिक देहों को देखा या छुआ नहीं जा सकता है, और पुनरूत्थान के बाद जो कार्य प्रभु यीशु ने किया था वह पूरा हो चुका था। तो सैद्धांतिक रीति से, उसे उनसे मिलने के लिए लोगों के बीच में अपने मूल रूप में वापस आने की बिल्कुल आवश्यकता नहीं थी, परन्तु जब थोमा जैसे लोगों के सामने प्रभु यीशु की आत्मिक देह प्रकट हुई तो इस ने उस के महत्व को और भी ज़्यादा दृढ़ कर दिया, और इस ने लोगों के हृदयों को और गहराई से आर पार कर दिया था। जब वह थोमा के पास आया, उसने सन्देह करनेवाले थोमा को अपने हाथों को छूने दिया, और उस से कहाः "अपनी ऊंगली यहाँ लाकर मेरे हाथों को देख और अपना हाथ लाकर मेरे पंजर में डाल और अविश्वासी नहीं परन्तु विश्वासी हो।" ये वचन, और ये कार्य वे चीज़ें नहीं थीं जिन्हें प्रभु यीशु केवल अपने पुनरूत्थान के बाद कहना या करना चाहता था, परन्तु ये वे चीज़ें थीं जिन्हें वह क्रूस पर कीलों से ठोके जाने से पहले करना चाहता था। यह प्रकट है कि जब प्रभु यीशु को क्रूस पर कीलों से ठोका भी नहीं गया था तब से उसके पास थोमा जैसे लोगों की पहले से ही समझ थी। अतः हम इस से क्या देख सकते हैं? पुनरूत्थान के बाद भी वह वही प्रभु यीशु था। उसका सार तत्व नहीं बदला था। थोमा के सन्देह बस अभी शुरू नहीं हुए थे परन्तु जब से वह प्रभु यीशु का अनुसरण कर रहा था तब से हर समय उसके साथ थे, परन्तु प्रभु यीशु जो मुर्दों में से जी उठा था और आत्मिक संसार से अपने मूल रूप के साथ, अपने मूल स्वभाव के साथ, और अपने देह में रहने के अपने समय से मानव जाति की अपनी समझ के साथ वापस आ चुका था, अतः थोमा को उसके पांजर पर हाथ रखने, पुनरूत्थान के बाद उसे अपनी आत्मिक देह दिखाने, अपने आत्मिक देह के अस्तित्व का स्पर्श और एहसास कराने, और पूर्णत: उसके सन्देहों को हटाने के लिए प्रभु यीशु पहले थोमा को ढूँढ़ने गया था। प्रभु यीशु के क्रूस पर ठोके जाने से पहले, थोमा ने हमेशा से सन्देह किया था कि वहमसीहा है कि नहीं, और उस पर विश्वास ना कर सका था। जो कुछ वह अपनी आँखों से देख सकता था, जो कुछ वह अपने हाथों से छू सकता था उसके आधार पर ही परमेश्वर के प्रति उसका विश्वास स्थापित हुआ था। इस प्रकार के व्यक्ति के विश्वास के विषय में प्रभु यीशु के पास एक अच्छी समझ थी। वे मात्र स्वर्गीय परमेश्वर पर विश्वास करते थे, और जिसे परमेश्वर ने भेजा है,या मसीह जो देह में था उस पर बिलकुल भी विश्वास नहीं करते थे, और उसे स्वीकार करना नहीं चाहते थे। उसे प्रभु यीशु के अस्तित्व कीपहचान कराने औरयह विश्वास दिलाने कि वही सचमुच में देहधारी परमेश्वर था, उसने थोमा को अपना हाथ बढ़ाकर अपने पांजर को छूने की अनुमति दी। क्या प्रभु यीशु के पुनरूत्थान के पहले और बाद मेंथोमा के सन्देह में कुछ अन्तर था? वह हमेशा से सन्देह करता था, और उसके सामने प्रभु यीशु के आत्मिक देह के व्यक्तिगत रूप से प्रकट होने, और उसे अपनी देह में कीलों के निशानों को छूने देने के अलावा, कोई उसके सन्देहों का समाधान नहीं कर सकता था, और कोई उन्हें उस से दूर नहीं कर सकता था। अतः उस समय से जब प्रभु यीशु ने उसे अपने पांजर को छूने की अनुमति दी और उसे कीलों के निशानों का एहसास कराया, थोमा के सन्देह गायब हो गए थे, और उसने सचमुच में जाना कि प्रभु यीशु मुर्दों में से जी उठा था और उसने स्वीकार किया और विश्वास किया कि प्रभु यीशु ही सच्चा मसीहा था, और यह कि वह देहधारी परमेश्वर था।यद्यपि इस समय थोमा नेआगे से सन्देह नहीं किया, फिर भी उसने मसीह से मिलने का अवसर हमेशा के लिए खो दिया था। उसके साथ इकट्ठे होने, उसका अनुसरण करने, और उसे जानने का अवसर उसने हमेशा के लिए खो दिया था। प्रभु यीशुके द्वारा उसे सिद्ध किए जाने का अवसर उसने खो दिया था। प्रभु यीशु के प्रकटीकरण और उसके वचनों ने उन लोगों के विश्वास पर एक निष्कर्ष, और एक आदेश प्रदान किया जो सन्देशों से भरे हुए थे। उसने सन्देह करनेवालों को बताने के लिए, और उन्हें बताने के लिए जो केवल स्वर्गीय परमेश्वर पर विश्वास करते थे किन्तु मसीह पर विश्वास नहीं करते थे अपने मूल वचनों और कार्यों का उपयोग किया था: परमेश्वर ने उनके विश्वास की भर्त्सना नहीं की, ना ही उसने उसकी तारीफ की जिनका वे अनुसरण करते थे जो सन्देहों से भरा हुआ था। जिस दिन उन्होंने परमेश्वर और मसीह पर पूर्णत: विश्वास किया था यह वह दिन था जब परमेश्वर ने अपने महान कार्य को पूर्ण किया था। हाँ वास्तव में, यह वह दिन भी था जब उनके सन्देहों ने एक आदेश प्राप्त किया था। मसीह के प्रति उनकी मनोवृत्तियों ने उनकी नियति का निर्धारण किया था, उनके ढीठ सन्देह का अभिप्राय था कि उनके विश्वास से उन्हें कोई परिणाम प्राप्त नहीं हुआ था, और उनकी कठोरता का अभिप्राय था कि उनकी आशाएँ व्यर्थ थीं। क्योंकि स्वर्गीय परमेश्वर पर उनका विश्वास भ्रान्तियों में पला बढ़ा था, और मसीह के प्रति उनका सन्देह वास्तव में परमेश्वर के प्रति उनकी वास्तविक मनोवृत्तिथी, भले ही उन्होंने प्रभु यीशु के देह के कीलों के निशानों को छुआ था, फिर भी उनका विश्वास बेकार ही था और उनके परिणाम को हवा में मुक्केबाजी करने के रूप में दर्शाया जा सकता था-व्यर्थ। जो कुछ प्रभु यीशु ने थोमा से कहा वह हर एक व्यक्ति को भी साफ साफ कह गया थाः पुनरूत्थित प्रभु यीशु ही वह प्रभु यीशु है जिसने प्रारम्भिक रूप से साढ़े तैंतीस साल मानव जाति के मध्य काम करते हुए बिताया था। यद्यपि उसे क्रूस पर कीलों से ठोंक दिया गया था और उसने मृत्यु की तराई का अनुभव किया था, और उसने पुनरूत्थान का अनुभव किया था, फिर भी उसके हर एक पहलु में कोई बदलाव नहीं हुआ था। यद्यपि अब भी उसके शरीर में कीलों के निशान थे, और यद्यपि वह पुनरूत्थित हो चुका था और क़ब्र से बाहर आ गया था, फिर भी उसका स्वभाव, मानव जाति की उसकी समझ, और मानव जाति के प्रति उसकी इच्छा थोड़ी सी भी नहीं बदली थी। साथ ही, वह लोगों से कह रहा था कि वह क्रूस से नीचे आ गया था, उसने पाप पर विजय पाई थी, कठिनाईयों पर विजय पाई थी, और मुत्यु पर जयवंत हुआ था। कीलों के निशान शैतान पर उसके विजय के बस प्रमाण थे, जो पूरे मानव जाति को सफलतापूर्वक छुड़ाने के लिए एकपाप बलि का प्रमाण दे रहे थे। वह लोगों से कह रहा था कि उसने पहले से ही उनके पापों को ले लिया है और उसने छुटकारे का कार्य पूरा कर लिया है। जब वह अपने चेलों को देखने वापस आया, उसने अपनी उपस्थिति से उनसे कहाः "मैं अभी जीवित हूँ, मैं अभी भी अस्तित्व में हूँ ; आज मैं सचमुच में आपके सामने खड़ा हूँ ताकि आप मुझे देख और छू सकते हो। मैं हमेशा आपके साथ रहूँगा।" प्रभु यीशु भविष्य में लोगों को चेतावनी देने के लिए थोमा के उदाहरण प्रयोग करना चाहता था: यद्यपि आप प्रभु यीशु में विश्वास करते हैं, फिर भी ना तो आप उसे देख सकते हैं ना ही उसे छू सकते हैं, तौभी, आप अपने सच्चे विश्वास के द्वारा आशीषित हो सकते हैं, और आप अपने सच्चे विश्वास के जरिए प्रभु यीशु को देख सकते हैं: इस प्रकार का व्यक्ति धन्य है।

ये वचन बाइबल में लिखित हैं जिन्हें प्रभु यीशु ने तब कहा था जब वह थोमा के सामने प्रकट हुआ था और यह अनुग्रह के युग में लोगों के लिए एक बड़ी मदद है। थोमा के सामने उसकी उपस्थिति और उसके वचन का भविष्य की पीढ़ियों के ऊपर एक गहरा प्रभाव था, और उनमें सदाकाल का महत्व है। थोमा एक ऐसे व्यक्ति का प्रतिनिधित्व करता है जो परमेश्वर पर विश्वास तो करता है फिर भी उस पर सन्देह करता है। वे शंकालु प्रवृति के हैं, उनके पास खौफनाक मन है, वे धोखेबाज हैं, और ऐसी चीज़ों पर विश्वास नहीं करते हैं जिन्हें परमेश्वर पूरा कर सकता है। वे परमेश्वर की सर्वसामर्थता और उसके शासन पर विश्वास नहीं करते हैं, और वे देहधारी परमेश्वर पर विश्वास नहीं करते हैं। फिर भी, प्रभु यीशु का पुनरूत्थान उनके चेहरों पर एक तमाचा था, उसने उन्हें अपने सन्देह की खोज करने,अपने सन्देह को पहचानने, और अपने स्वयं के धोखे को स्वीकार करने के लिए एक अवसर भी प्रदान किया था, इस प्रकार वे प्रभु यीशु के अस्तित्व और पुनरूत्थान पर सचमुच विश्वास कर सकते थे। जो कुछ थोमा के साथ हुआ था वह आनेवाली पीढ़ियों के लिए एक चेतावनी थी ताकि अधिक से अधिक लोग अपने आप को सावधान कर सकें कि वे थोमा के समान सन्देह ना करें, और यदि वे सन्देह करें, तो वे अँधकार में डूब जाएँगे। यदि आप परमेश्वर का अनुसरण करते हैं, किन्तु थोमा के समान, आप हमेशा प्रभु के पांजर को छूना चाहते हैं और सुनिश्चित करने, प्रमाणित करने, और यह अन्दाज़ा लगाने के लिए कि परमेश्वर है कि नहीं उसके कीलों के निशानों को छूना चाहते हैं, तो परमेश्वर आपको छोड़ देगा। अतः, प्रभु यीशु लोगों से माँग करता है कि वे थोमा के समान ना बनें, जो केवल उसी पर विश्वास करते हैं जिसे वे अपनी आँखों से देखते हैं, परन्तु परमेश्वर के प्रति सन्देहों को आश्रय ना देते हुए एक शुद्ध, और ईमानदार इंसान बनें, और केवल उस पर विश्वास करें और उसका अनुसरण करें। इस प्रकार का व्यक्ति धन्य है। यह लोगों के लिए प्रभु यीशु की एक छोटी सी माँग है, और यह उसके अनुयायियों के लिए एक चेतावनी भी है।

वे लोग जो सन्देहों से भरे हुए हैं उनके प्रति यह प्रभु यीशु की मनोदृष्टियाँहै। अतः प्रभु यीशु ने उन्हें क्या कहा, और उनके लिए क्या किया जो ईमानदारी से उस पर विश्वास करते हैं और उसका अनुसरण करने में समर्थ हैं? जो कुछ प्रभु यीशु ने पतरस से कहा उसके सम्बन्ध में हम आगे देखने जा रहे हैं।

इस वार्तालाप में, प्रभु यीशु ने लगातार पतरस से एक बात पूछीः "हे पतरस, क्या तू मुझ से प्रेम करता है?" यह वह ऊँचा स्तर है जिसकी माँग प्रभु यीशु अपने पुनरूत्थान के बाद पतरस के समान ही लोगों से करता है, जो सचमुच में मसीह पर विश्वास करते हैं और प्रभु से प्रेम करने के लिए संघर्ष करते हैं। यह प्रश्न एक प्रकार की खोजबीन थी, एक प्रकार की पूछताछ था, परन्तु इसके अतिरिक्त, यह पतरस के समान लोगों से की गई माँग और अपेक्षा थी। उसने प्रश्न पूछने के इस तरीके का प्रयोग किया ताकि लोग स्वयं पर विचार करें और स्वयं के भीतर झाँकें: लोगों से प्रभु यीशु की अपेक्षाएँ क्या हैं? क्या मैं प्रभु से प्रेम करता हूँ? क्या मैं ऐसा व्यक्ति हूँ जो प्रभु से प्रेम करता है? मुझे किस प्रकार प्रभु से प्रेम करना चाहिए? भले ही प्रभु यीशु ने यह प्रश्न केवल पतरस से पूछा था, परन्तु सच्चाई यह है कि अपने हृदय में, वह इस अवसर का लाभ उठाना चाहता था ताकि पतरस से कह सके कि वह अधिक से अधिक लोगों से इस प्रकार का प्रश्न पूछे जो परमेश्वर से प्रेम करने की खोज में थे। यह सिर्फ पतरस ही है जो इस प्रकार के व्यक्ति के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करने, और स्वयं प्रभु यीशु के मुँह से प्रश्न को प्राप्त करने के लिए आशीषित था।

तुलना कीजिए, "अपनी ऊंगली यहाँ लाकर मेरे हाथों को देख और अपना हाथ लाकर मेरे पंजर में डाल और अविश्वासी नहीं परन्तु, विश्वासी हो," जिसे प्रभु यीशु ने अपने पुनरूत्थान के बाद थोमा से कहा था, उसने पतरस से तीन बार प्रश्न पूछा थाः "हे शमौन यूहन्ना के पुत्र, क्या तू मुझ से प्रीति रखता है? " इसने लोगों को अनुमति दी कि वे प्रभु यीशु की मनोवृत्तियों की कड़ाई, और उस तीव्र इच्छा का भली भांति एहसास करें जो उसने प्रश्न पूछने के समय महसूस किया था। जहाँ तक सन्देह करनेवाले थोमा और उसके चतुर स्वभाव की बात है, प्रभु यीशु नेउसे अनुमति दी कि वह अपना हाथ बढ़ाए और उसके कीलों के निशान को छूए, जिसने उसे विश्वास दिलाया कि प्रभु यीशु ही पुनरूत्थित मनुष्य का पुत्र है और उसने मसीह के रूप में प्रभु यीशु की पहचान को स्वीकार किया। और यद्यपि प्रभु यीशु ने थोमा को सख्ती से नहीं डाँटा था, ना ही उसने मौखिक रूप से उस पर साफ साफ दण्ड की आज्ञा दी थी, परन्तु जब वह उस प्रकार के व्यक्ति के प्रति अपनी मनोवृत्ति और दृढ़ता को प्रदर्शित कर रहा था, तो उसने जाहिर किया कि वह उसे व्यावहारिक कार्यों के द्वारा समझ चुका था। इस प्रकार के व्यक्ति से प्रभु यीशु की माँगों और अपेक्षाओं को जो कुछ उसने कहा था उसके आधार पर देखा नहीं जा सकता है। क्योंकि थोमा जैसे लोगों के पास सामान्यतः सच्चे विश्वास की डोर नहीं होती है। उनके लिए प्रभु यीशु की माँगें बस यही थीं, लेकिन वह मनोवृत्तियाँजो उसने पतरस जैसे लोगों के लिए प्रकट किया था वह बिल्कुल भिन्न था। उसने यह माँग नहीं की थी कि पतरस अपना हाथ बढ़ाए और उसके कीलों के निशानों को छुए, ना ही उसने पतरस से कहाः "अविश्वासी नहीं परन्तु, विश्वासी हो।" उसके बजाए, उसने लगातार उससे वही प्रश्न पूछा। यह विचारों को उकसानेवाला, एवं अर्थपूर्ण प्रश्न था जो कोई मदद नहीं कर सकता था किन्तु मसीह के प्रत्येक अनुयायी को दुखी, और भयभीत करता है, लेकिन साथ ही प्रभु यीशु की चिन्ता, एवं दुखित स्वभाव का भी एहसास कराता है। और जब वे बड़े दर्द और कष्ट में होते हैं, तब वे प्रभु यीशु की चिन्ता और उसकी देखरेख को और अधिक अच्छे से समझ पाते है; वे शुद्ध, और ईमानदार लोगों के लिए उसकी सच्ची शिक्षाओं और कठिन माँगों को समझते हैं। प्रभु यीशु का प्रश्न लोगों को यह एहसास कराता है कि लोगों से प्रभु की माँगें इन सामान्य वचनों में प्रकट हैं जो मात्र उन में विश्वास करने और उसका अनुसरण करने के लिए नहीं हैं, लेकिन प्रेम को पाने, अपने प्रभु से प्रेम करने, और अपने परमेश्वर से प्रेम करने के लिए है। इस प्रकार का प्रेम देखरेख करनेवाला और आज्ञाकारी है। यह मनुष्यों के लिए परमेश्वर के लिए जीना, परमेश्वर के लिए मरना, परमेश्वर को सब कुछ समर्पित करना है, और परमेश्वर के लिए सब कुछ को खर्च करना एवं उसके लिए सब कुछ दे देना है। इस प्रकार का प्रेम परमेश्वर को सुख देना, गवाही पर उसे आनन्दित होने देना, और उसे विश्राम से रहने देना भी है। उनका उत्तरदायित्व, आभार और कर्त्तव्य है यह मानव जाति की तरफ से परमेश्वर को किया गया पुनःभुगतान है, और यह एक मार्ग है जिसका अनुसरण मानव जाति को जीवन भर करना चाहिए।ये तीनों प्रश्न एक माँग और प्रोत्साहन थे जिन्हें प्रभु यीशु ने पतरस और उन सभी लोगों से किया था जिन्हें सिद्ध किया जाएगा। ये वो तीन प्रश्न थे जिन्होंने पतरस को जीवन में अपनी यात्रा को पूरा करने के लिए अगुवाई और प्रेरणा दी, और प्रभु यीशु के जाने के बादभी ये वे प्रश्न थे जिन्होंने सिद्ध होने की उसकी यात्रा को शुरू करने में पतरस की अगुवाई की, जिन्होंने प्रभु के प्रति उसके प्रेम के कारण उसकी अगुवाई की किवे प्रभु के हृदय का ख़्याल रखें, प्रभु की आज्ञाओं का पालन करें, प्रभु का सुख दें, और इस प्रेम के कारण अपने सम्पूर्ण जीवन और अपने सम्पूर्ण अस्तित्व को भेंट चढ़ा दें।

अनुग्रह के युग के दौरान, परमेश्वर का कार्य प्राथमिक रूप से दो प्रकार के लोगों के लिए था। पहला उस प्रकार के लोगों के लिए था जो उस पर विश्वास करते थे और उसका अनुसरण करते थे, जो उसकी आज्ञाओं को मान सकते थे, जो क्रूस को उठा सकते थे और अनुग्रह के युग के मार्ग को थामे रह सकते थे। इस प्रकार का व्यक्ति परमेश्वर की आशीषों को प्राप्त करेगा और परमेश्वर के अनुग्रह का आनन्द उठाएगा। दूसरे प्रकार का व्यक्ति पतरस के समान है, एक ऐसा व्यक्ति जिसे सिद्ध किया जाएगा। अतः पुनरूत्थान के बाद, प्रभु यीशु ने पहले इन दो अर्थपूर्ण चीज़ों को पूरा किया था। एक थोमा के साथ, और दूसरा पतरस के साथ। ये दोनों चीज़ें किसे दर्शाते हैं? क्या ये मानव जाति को बचाने के लिए परमेश्वर के सच्चे इरादों को दर्शाते हैं? क्या ये मानव जाति के प्रति परमेश्वर की निष्कपटता को दर्शाते हैं? वह कार्य जो उसने थोमा के साथ किया था वह लोगों की चेतावनी के लिए था कि वे सन्देह ना करें, बस विश्वास करें। वह कार्य जो उसने पतरस के साथ किया था वह पतरस जैसे लोगों के विश्वास को बलवन्त करने, और इस प्रकार के लोगों से स्पष्ट अपेक्षा करने, और यह दिखाने के लिए था कि उन्हें किन उद्देश्यों का अनुसरण करना चाहिए।

प्रभु यीशु पुनरूत्थित होने के बाद, उन लोगों के सामने प्रगट हुआ जिन्हें वह जरूरी समझता था, और उनसे बातें की, उनसे आकांक्षाएँ कीं, और लोगों के लिए अपनी इच्छाओं, और अपनी अपेक्षाओं को छोड़ कर चला गया। ऐसा कहना होगा, कि देहधारी परमेश्वर के रूप में, इससे फर्क नहीं पड़ता है कि यह उसके देह में रहने के समय के दौरान था, या क्रूस पर ठोके जाने और मुर्दों में से जी उठने के बाद अपनी आत्मिक देह में रहने के समय था-मानव जाति के लिए उसकी चिन्ता और लोगों से उसकी आकांक्षाएँ नहीं बदली थीं। क्रूस के ऊपर चढ़ाए जाने से पहले वह इन चेलों को लेकर चिन्तित था; वह अपने हृदय में प्रत्येक व्यक्ति की स्थिति को लेकर स्पष्ट था, उसने प्रत्येक व्यक्ति की घटी को समझा, और वास्तव में उसकी मृत्यु एवं पुनरूत्थान के बाद भी प्रत्येक मनुष्य के प्रति उसकी समझ वही थी, और जैसा पहले वह शरीर में था उसके समान वह एक आत्मिक देह बन गया। वह जानता था कि लोग मसीह के रूप में उसकी पहचान को लेकर पूर्णत: निश्चित नहीं थे, परन्तु देह में रहने के दौरान उसने लोगों से कठोर अपेक्षाएँ नहीं कीं। परन्तु मुर्दों में से जिलाए जाने के बाद प्रभु यीशु उनके सामने प्रगट हुआ, और उसने उन्हें पूर्णत: निश्चित कराया कि वह परमेश्वर से आया है, यह कि वह देहधारी परमेश्वर है, और उसने मानव जाति के द्वारा जीवन भर अनुसरण करने हेतु सब से बड़े दर्शन और अभिप्रेरणा के रूप में अपने प्रकटीकरण और अपने पुनरूत्थान के प्रमाणित तथ्य का उपयोग किया। मृतकों में से उसके पुनरूत्थान ने ना केवल उन सभों को बलवंत किया जो उसका अनुसरण करते थे, बल्कि अनुग्रह के युग के उसके कार्य को पूर्णत: मानव जाति के मध्य प्रभावशील कर दिया था, और इस तरह प्रभु यीशु के उद्धार का सुसाचार अनुग्रह के युग में धीरे धीरे मानवता के हर छोर तक पहुँच गया। क्या आप कहेंगे कि पुनरूत्थान के बाद प्रभु यीशु के प्रकटीकरण का कोई महत्व था? उस समय यदि आप थोमा या पतरस होते, और आपने अपने जीवन में इस एक चीज़ का सामना किया होता जो इतना अर्थपूर्ण था, तो इसका आपके ऊपर किस प्रकार का प्रभाव पड़ता? क्या आप परमेश्वर पर विश्वास करने के लिए इसे अपने जीवन के सब से बेहतरीन और सब से बड़े दर्शन के रूप में देखेंगे? क्या आप इसे परमेश्वर का अनुसरण करने के लिए एक प्रेरक शक्ति के रूप में देखेंगे, उसे सन्तुष्ट करने के लिए संघर्ष करेंगे, और अपने जीवन में उसके प्रेम का अनुसरण करेंगे? सभी दर्शनों में से सब से बड़े दर्शन को फैलाने के लिए क्या आप जीवन भर का प्रयास करेंगे? क्या आप प्रभु यीशु के उद्धार के सुसमाचार को फैलाने की आज्ञा कोपरमेश्वर से प्राप्त एक महान आदेश के रूप में लेंगे? भले ही आपने इसका अनुभव नहीं किया है, फिर भी आधुनिक लोगों के लिए परमेश्वर की इच्छा और परमेश्वर को स्पष्ट रीति से समझने के लिए थोमा और पतरस के दो मामले काफी हैं। ऐसा कहा जा सकता है कि परमेश्वर के देहधारी होने के बाद, उसके द्वारा मानव जाति के मध्य जीवन और एक मानवीय जीवन का व्यक्तिगत रीति से अनुभव करने के बाद, और उसके द्वारा मानव जाति की भ्रष्टता और मानवीय जीवन को देखने के बाद, देहधारी परमेश्वर ने मानव जाति की असहायता, उदासी, और दयनीयता का एहसास किया था।देह में रहते हुए अपनी मानवता के कारण, और देह में अपने अंतःज्ञान की वजह सेपरमेश्वर मनुष्यों की स्थिति के लिए और अधिक तरस से भर गया। इससे वह अपने अनुयायियों को लेकर और अधिक चिन्तित हो गया। शायद ये ऐसी चीज़ें हैं जिन्हें आप नहीं समझ सकते हैं, परन्तु मैं इस वाक्यांश से उसके हर एक अनुयायी के लिए देहधारी परमेश्वर की चिन्ता और देखरेख का चित्रण कर सकता हूँ:अत्याधिकचिन्ता। भले ही यह शब्द मानवीय भाषा से आता है, और यद्यपि यह बिल्कुल मानवीय कहावत है, फिर भी यह अपने अनुयायियों के लिए परमेश्वर के एहसासों को सचमुच में प्रकट और चित्रित करता है।जहाँ तक मनुष्यों के लिए परमेश्वर की अत्याधिक चिन्ता की बात है, अपने अनुभवों के क्रम में आप धीरे धीरे इसका एहसास करेंगे और इसका स्वाद चखेंगे। फिर भी, अपने स्वभाव में परिवर्तन का अनुसरण करके परमेश्वर के स्वभाव को धीरे धीरे समझने के द्वारा इसे प्राप्त किया जा सकता है। प्रभु यीशु की उपस्थिति ने मानवता में अपने अनुयायियों के लिए उसकी अत्यधिक चिन्ता को क्रियान्वित किया और उसे उसके आत्मिक देह को सौंप दिया या आप यह कह सकते हैं कि उसकी ईश्वरीयता को सौंप दिया था। जब वह सामर्थी ढंग से यह प्रमाणित कर रहा था कि परमेश्वर ही है जो एक युग को प्रारम्भ करता है, उस युग को आगे बढ़ाता है, और वह ही है जो एक युग को समाप्त भी करता है तब उसकी उपस्थिति ने लोगों को परमेश्वर की चिन्ता और देखरेख को एक अलग प्रकार से अनुभव और एहसास करने की अनुमति दी। अपने प्रकटीकरण के द्वारा उसने लोगों के विश्वास को बलवंत किया था, और अपनी उपस्थिति के द्वारा उसने संसार के सामने उस सच को साबित किया कि वह स्वयं परमेश्वर है। उसने अपने अनुयायियों को अनंत दृढ़ता प्रदान की, और साथ ही अपने प्रकटीकरण के जरिए उसने एक नए युग में अपने कार्य के एक दौर की शुरूआत की।

13. अपने पुनरूत्थान के बाद यीशु रोटी खाता है और पवित्र शास्त्र को समझाता है

(लूका 24:30-32) जब वह उनके साथ भोजन करने बैठा, तो उसने रोटी लेकर धन्यवाद किया, और उसे तोड़कर उन्हें देने लगा। तब उनकी आँखें खुल गईं; और उन्होंने उसे पहचान लिया, और वह उनकी आँखों से छिप गया। उन्होंने आपस में कहा; जब वह मार्ग में हमसे बातें करता था, और पवित्र शास्त्र का अर्थ हमें समझाता था, तो क्या हमारे मन में उत्पन्न ना हई?

14. चेलों ने यीशु को खाने के लिए भूनी हुई मछली दी

(लूका 24:36-43) वे ये बातें कह ही रहे थे, कि वह आप ही उनके बीच में आ खड़ा हुआ; और उन से कहा, तुम्हें शांति मिले। परन्तु वे घबरा गए, और डर गए, और समझे, कि हम किसी भूत को देखते हैं। उसने उनसे कहा; क्यों घबराते हो? और तुम्हारे मन में क्यों सन्देह उठते हैं? मेरे हाथ और मेरे पांव को देखो, कि मैं वही हूँ; मुझे छूकर देखो; क्योंकि आत्मा के हड्डी और माँस नहीं होता जैसा मुझ में देखते हो। यह कहकर उसने उन्हें अपने हाथ पांव दिखाए। जब आनन्द के मारे उनको प्रतीति ना हुई, और आश्चर्य करते थे, तो उसने उनसे पूछा; क्या यहाँ तुम्हारे पास कुछ भोजन है? उन्होंने उसे भूनी मछली का टुकड़ा दिया। उसने लेकर उनके सामने खाया।

अब हम ऊपर दिए गए पवित्र शास्त्र के अंशों पर एक नज़र डालेंगे। पहला अंश पुनरूत्थान के बाद प्रभु यीशु के रोटी खाने और पवित्र शास्त्र को समझाने की पुनर्गणना है, और दूसरा अंश प्रभु यीशु के भूनी हुई मछली खाने की पुनर्गणना है। ये दोनों अंश परमेश्वर के स्वभाव को समझने के लिए किस प्रकार की सहायता प्रदान करते हैं? प्रभु यीशु के रोटी और भूनी हुई मछली खाने के इन विवरणों में आप जिसप्रकार के तस्वीरों को प्राप्त करते हैं क्या आप इसकी कल्पना कर सकते हैं? क्या आप कल्पना कर सकते हैं, यदि प्रभु यीशु आपके सामने खड़ा हो जाए और रोटी खाए, तो आपको कैसा महसूस होगा? या यदि वह आपके साथ एक ही मेज पर भोजन कर रहा हो, और लोगों के साथ मछली और रोटी खा रहा हो, तो उस समय आपको कैसा महसूस होगा? यदि आप महसूस करते हैं तो आप प्रभु के बेहद करीब होंगे, क्योंकि वह लोगों के बेहद नज़दीक है, और तब यह एहसास सही है। यह बिल्कुल वही फल है जिसे पुनरूत्थान के बाद प्रभु यीशु रोटी और मछली खाने के द्वारा भीड़ के सामने उत्पन्न करना चाहता था। यदि प्रभु यीशु पुनरूत्थान के बाद सिर्फ लोगों से बात करता, यदि उन्होंने उसके शरीर और हड्डियों को महसूस नहीं किया होता, परन्तुयह एहसास करते कि उस आत्मा तक नहीं पहुँच सकते हैं, तो वे कैसा महसूस करेंगे? क्या वे निराश नहीं हो जाएँगे? जब लोग निराश हो जाते हैं, तो क्या वे परित्याग किये हुए महसूस नहीं करेंगे? क्या वे प्रभु यीशु से एक दूरी का एहसास नहीं करेंगे? परमेश्वर के साथ लोगों के रिश्ते में यह दूरी किस प्रकार का नकारात्मक प्रभाव उत्पन्न करेगा? लोग निश्चित तौर पर भयभीत हो जाऐंगे, और यह कि वे उसके करीब आने की हिम्मत नहीं करेंगे, और उन में उसे एक सम्मानित दूरी पर रखने की मनोवृत्ति होगी। उसके बाद, वे प्रभु यीशु मसीह के साथ अपने घनिष्ठ रिश्ते से दूर हो जाएँगे, और मानव जाति और ऊपर स्वर्ग के परमेश्वर के बीच रिश्ते की ओर वापस लौट जाएँगे, जैसा अनुग्रह के युग के पहले था। वह आत्मिक देह जिसे लोग छू और एहसास नहीं कर सकते थे उस से आगे चलकर परमेश्वर के साथ उनका घनिष्ठ रिश्ता जड़ से खत्म हो जाएगा, और यह उनके घनिष्ठ रिश्ते को-जो प्रभु यीशु के देह में रहने के दौरान बना था, जिस में मानव जाति और उसके मध्य कोई दूरी नहीं थी-खत्म कर देगा। आत्मिक देह के प्रति लोगों के एहसास मात्र भय, टाल मटोल, और टकटकी लगाकर देखना है। वे करीब आने या उस से बात करने, अकेले उसका अनुसरण करने, उस पर भरोसा करने, या उस पर आशा करने की हिम्मत नहीं करते हैं। परमेश्वर इस प्रकार के एहसास को देखनेमें अनिच्छुक था जो मनुष्यों के मन में उसके लिए था।वह यह नहीं देखना चाहता था कि लोग उसे नज़रअंदाज़ करें या अपने आप को उस से दूर हटा दें; वह केवल इतना चाहता था कि लोग उसे समझें, उसके करीब आएँ, और उसका परिवार बन जाएँ। यदि आपके स्वयं के परिवार ने, आपके बच्चों ने आपको देखा परन्तु आपको नहीं पहचाना, और आपके करीब आने की हिम्मत नहीं की, पर हमेशा आपको नज़रअंदाज़ किया, और जो कुछ भी आपने उनके लिए किया उनके द्वारा आप उनकी समझ को प्राप्त नहीं कर सकते थे, तो इस से आपको कैसा लगेगा? क्या यह दर्दनाक नहीं होगा? क्या आपका हृदय चकनाचूर नहीं हो जाएगा?यह बिल्कुल वैसा है जैसा परमेश्वर महसूस करता है जब लोग उसे नज़रअंदाज करते हैं। अतः, अपने पुनरूत्थान के बाद, प्रभु यीशु तब भी लोगों के सामने देह और लहू के अपने रूप में प्रगट हुआ, और उनके साथ खाया और पीया। परमेश्वर लोगों को एक परिवार के रूप में देखता है और वह चाहता है कि मानव जाति भी उसे इसी तरह से देखे; केवल इसी तरह से परमेश्वर सचमुच में लोगों को हासिल कर सकता है, और लोग भी सचमुच में उस से प्रेम और उसकी आराधना कर सकते हैं। अब क्या आप पवित्र शास्त्र के इन दो अंशों से सार निकालने के लिए मेरे इरादे को समझ सकते हैं जहाँ प्रभु यीशु रोटी खाता है और पवित्र शास्त्र को समझाता है, और उसके पुनरूत्थान के बाद चेलेे उसे खाने के लिए भूनी हुई मछली देते हैं?

ऐसा कहा जा सकता है कि चीज़ों की श्रृंखलाएँ जिन्हें प्रभु यीशु ने पुनरूत्थान के बाद कहा और किया वे विचारशील थे, और उन्हें भली मनसा से किया गया था।वे कृपा और स्नेह से भरे हुए थे जिसे परमेश्वर मानवता के लिए महसूस करता था, और वे प्रशंसा और अत्याधिकदेखरेख से भरे हुए थे जोउस घनिष्ठ सम्बन्ध के लिए था जिसे उसने देह में रहने के दौरान स्थापित किया था। उस से भी अधिक, वे उस जीवन की याद में उदासी और उस आशा से भरे हुए थेजो उसके पास था जब उसनेदेह में रहने के समय के दौरान अपने अनुयायियों के साथ भोजन किया था और जीवन बिताया था। अतः, परमेश्वर नहीं चाहता था कि लोग परमेश्वर और मनुष्य के बीच दूरी का एहसास करें, और ना ही वह यह चाहता था कि मानव जाति अपने आप को परमेश्वर से दूर कर दे। उस से भी बढ़कर, वह यह नहीं चाहता था कि लोग यह एहसास करें कि प्रभु यीशु पुनरूत्थान के बाद आगे से वह प्रभु नहीं रहा जो लोगों से इतना घनिष्ट था, यह कि वह आगे से मानव जाति के साथ नहीं है क्योंकि वह आत्मिक संसार में वापस लौट चुका है, और उस पिता के पास वापस लौट चुका है जिसे लोग कभी देख नहीं सकते थे और उस तक पहुँच नहीं सकते थे। वह नहीं चाहता था कि लोग यह महसूस करें कि उसके और मानव जाति के बीच पदस्थिति को लेकर कोई अन्तर था। जब परमेश्वर उन लोगों को देखता है जो उसका अनुसरण करना चाहते हैं परन्तु उसे एक सम्मानित दूरी पर रखते हैं, तो उसका हृदय दर्द से भर जाता है क्योंकि इसका मतलब है कि उनका हृदय उस से बहुत दूर है, इसका मतलब है कि उसके लिए उनके हृदयों को पाना बहुत ही कठिन होगा। इस प्रकार यदि वह लोगों के सामने एक आत्मिक देह में प्रगट हो जाता जिसे वे छू और देख नहीं सकते थे, तो इस ने एक बार फिर मनुष्य को परमेश्वर से दूर कर दिया होता, और इस ने उसके पुनरूत्थान के बाद ग़लती सेमसीह को अभिमानी, या मनुष्यों से अलग प्रकार का,और एक ऐसे व्यक्ति के रूप में देखने में मानव जाति को अग्रसर किया होता,जो मनुष्य के साथ मेज पर बैठ नहीं सकता था और उनके साथ भोजन नहीं कर सकता है क्योंकि मनुष्य पापी एवं गन्दे हैं, और कभी भी परमेश्वर के करीब नहीं आ सकते हैं। मानव जाति की इस ग़लतफहमी को दूर करने के लिए, प्रभु यीशु ने असंख्य चीज़ों को किया जिन्हें वह देह में लगातार करता था, जैसा कि बाइबल में लिखित है, "उसने रोटी लेकर धन्यवाद किया, और उसे तोड़कर उन्हें देने लगा।" साथ ही उसने उन्हें पवित्र शास्त्र भी समझाया, जैसा वह किया करता था। यह सब कुछ जो प्रभु यीशु ने किया इसने प्रत्येक व्यक्ति को जिसने उसे देखा था उसे यह एहसास दिलाया कि प्रभु नहीं बदला था, और यह कि वह अभी भी वही प्रभु यीशु था। भले ही उसे क्रूस पर ठोंक दिया गया था और उसने मृत्यु का अनुभव किया था, फिर भी वह मुर्दों में से जी उठा था, और उसने मानव जाति को कभी नही छोड़ा था। वह मनुष्यों के मध्य रहने के लिए वापस आ गया था, और उसमें कुछ भी नहीं बदला था। मनुष्य का पुत्र जो लोगों के सामने खड़ा था वह वही प्रभु यीशु था। लोगों के साथ उसका व्यवहार और उसकी बातचीत बिल्कुल चिर परिचित लगता था। वह तब भी करूणा, अनुग्रह और सहिष्णुता से इतना भरपूर था-वह तब भी वही प्रभु यीशु था जो लोगों से वैसा ही प्रेम करता था जैसा वह अपने आप से प्रेम करता था, जो मनुष्य को सात गुणे के सत्तर बार तक क्षमा कर सकता था। हमेशा की तरह, उसने लोगों के साथ भोजन किया, उनके साथ पवित्र शास्त्र से विचार विमर्श किया, और उससे भी अधिक महत्वपूर्ण, वह पहले के समान ही था, जब उसे माँस और लहू से बनाया गया था और जिसे देखा और छुआ जा सकता था।इस प्रकार मनुष्य के पुत्र ने लोगों को अनुमति दी कि उस घनिष्ठता का एहसास करें, और उस सुकून का एहसास करें, और जो कुछ खो गया था उसके सम्बन्ध में आनन्द महसूस करें, और उन्होंने इतने सुकून का एहसास किया कि हिम्मत और दृढ़ विश्वास के साथ इस मनुष्य के पुत्र के ऊपर भरोसा करना और उस पर दृष्टि करना प्रारम्भ किया जो मनुष्यों को उनके पापों के लिए क्षमा कर सकता था। और साथ ही उन्होंने निःसंकोच प्रभु यीशु से प्रार्थना करना प्रारम्भ कर दिया था, वे उसके अनुग्रह, एवं उसकी आशीषों को प्राप्त करने के लिए, और उससे शांति एवं आनन्द पाने के लिए, और उससे देखरेख एवं सुरक्षा हासिल करने के लिए प्रार्थना करने लगे, तथा प्रभु यीशु के नाम से चंगाई करना और दुष्टात्माओं को निकाला शुरू कर दिया था।

उस समय के दौरान जब प्रभु यीशु देह में होकर काम करता था, उसके अधिकतर अनुयायी उसकी पहचान और उन चीज़ों को जो वह कहता था उनकी जाँच सम्पूर्ण रीति से नहीं कर सकते थे। जब वह क्रूस पर चढ़ गया, उनके चेलों की मानसिकता अपेक्षाकृत थी; जब उसे क्रूस पर कीलों से ठोंक दिया गया था उस समय से लेकर क़ब्र में डाले जाने तक, उसके प्रति लोगों की मनोवृत्तियाँ निराशाजनक थी। इस समय के दौरान, लोगों ने पहले से ही अपने हृदय में उन चीज़ों को लेकर सन्देह से इन्कार की ओर जाना प्रारम्भ कर दिया था जिन्हें प्रभु यीशु ने अपने देह में रहने के दिनों के दौरान कहा था। और जब वह क़ब्र से बाहर आया, और एक एक करके लोगों के सामने प्रगट हुआ, तो वे अधिकांश लोग जिन्होंने उसे अपनी आँखों से देखा था या उसके पुनरूत्थान के समाचार को सुना था धीरे धीरे इन्कार से संशयवाद की ओर आने लगे थे। और पुनरूत्थान के बाद उस समय तक जब प्रभु यीशु ने थोमा से अपने हाथ को उसके पंजर में डालने को कहा, उस समय तक जब प्रभु यीशु ने भीड़ के सामने रोटी तोड़ी और खाया, और उसके बाद उनके सामने भूनी हुई मछली खाया, तब ही उन्होंने सचमुच में उस सत्य को समझा कि प्रभु यीशु ही देहधारी मसीहा है। आप ऐसा कह सकते हैं कि यह आत्मिक देह मानो माँस और लहू के साथ उन लोगों के सामने आ खड़ा हुआ था जिसने तुरन्त ही उन्हें एक स्वप्न से जगा दिया थाः वह मनुष्य का पुत्र जो उनके सामने खड़ा था उस समय से अस्तित्व में था जिसका अंदाज़ा भी नहीं लगाया जा सकता था। उसका एक आकार, और माँस और हड्डी था, और वह पहले से ही मानव जाति के साथ लम्बे समय तक रह चुका था........। इस समय, लोगों ने यह महसूस किया कि उसका अस्तित्व इतना अधिक यथार्थ, और इतना अधिक अद्भुत है; वे बहुत ज़्यादा आनन्दित और प्रसन्न थे, और उसी समय भावनाओं से भी भरपूर थे। और उसकी पुनःउपस्थिति ने सचमुच में लोगों को उसकी विनम्रता को देखने, और उसकी नज़दीकी, एवं उसकी चाहत, और मानव जाति के प्रति उसके लगाव का एहसास करने की अनुमति दी। इस संक्षिप्त पुनर्मिलन ने उन लोगों को जिन्होंने प्रभु यीशु को देखा था यह एहसास कराया कि मानो एक पूरा जीवन गुज़र चुका था। उनके खोए हुए, भ्रमित, भयभीत, चिन्तित, लालायित और स्तब्ध हृदय को सुकून मिला। वे आगे से सन्देहास्पद या निराश नहीं रहे क्योंकि उन्होंने महसूस किया कि अब उनके पास आशा थी और कुछ ऐसा था जिस पर वे भरोसा कर सकते थे। मनुष्य का पुत्र जो उनके सामने खड़ा था पूरी अनन्तता के लिए उनके संग रहेगा, वह उनका दृढ़ गढ़, और हमेशा के लिए उनका शरणस्थान होगा।

यद्यपि प्रभु यीशु पुनरूत्थित हो चुका था, फिर भी उसके हृदय और उसके कार्य ने मानव जाति को नहीं छोड़ा था। उसने अपने प्रकटीकरण से लोगों को बताया कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह किस रूप में है, वह हर समय और हर जगह लोगों का साथ देगा, उनके साथ चलेगा, और उनके साथ रहेगा। और वह हर समय और हर जगह मानव जाति के लिए प्रबन्ध करेगा और उनकी चरवाही करेगा, उन्हें अपने आपको देखने और छूने की अनुमति देगा, और यह निश्चित करेगा कि वे कभी असहाय महसूस ना करें। साथ ही प्रभु यीशु यह भी चाहता है कि लोग यह जानें: वे इस संसार में अकेले नहीं हैं। मानव जाति के पास परमेश्वर की देखरेख है, परमेश्वर उनके साथ है; लोग हमेशा परमेश्वर पर आसरा रख सकते हैं; वह अपने प्रत्येक अनुयायी का परिवार है। परमेश्वर पर आसरा रखने के लिए, मानव जाति आगे से अकेला या असहाय नहीं होगा, और जो उसे अपने पापबलि के रूप में स्वीकार करते हैं वे आगे से पाप के बन्धन में नहीं रहेंगे। मनुष्य की नज़रों में, उसके कार्य के ये भाग जिन्हें प्रभु यीशु ने अपने पुनरूत्थान के बाद किया था बहुत ही छोटी चीज़ें थीं, परन्तु जिस रीति से मैं उन्हें देखता हूँ, प्रत्येक छोटी से छोटी चीज़ भी बहुत अधिक अर्थपूर्ण थी, एवं बहुत अधिक मूल्यवान थी, और वे बहुत अधिक महत्वपूर्ण और वज़नदार थे।

यद्यपि देह में काम करने का प्रभु यीशु का समय कठिनाईयों और दुख से भरा हुआ था, फिर भी माँस और लहू के अपने आत्मिक देह के प्रकटीकरण के जरिए, उसने मानव जाति को छुड़ाने के लिए उस समय देह में अपने कार्य को पूर्णता और सिद्धता से पूरा किया था। उसने देहधारी होकर अपनी सेवकाई की शुरूआत की थी, और मनुष्यों के सामने अपने शारीरिक रूप में उपस्थित होकर उसने अपनी सेवकाई की समाप्ति की थी। उसने अनुग्रह के युग की घोषणा की, उसने मसीह के रूप में अपनी पहचान के जरिए अनुग्रह के युग की शुरूआत की थी। मसीह के रूप में अपनी पहचान के जरिए, उसने अनुग्रह के युग में अपने कार्य को पूरा किया और उसने अनुग्रह के युग में अपने सभी अनुयायियों को बलवंत किया था और उनकी अगुवाई की थी। परमेश्वर के विषय में यह कहा जा सकता है कि जब वह किसी कार्य कोप्रारम्भ करता है तो वास्तव में उसे पूरा भी करता है।एक योजना है और उसके अनेकचरण हैं, जो परमेश्वर की बुद्धि, उसकी सर्वसामर्थता, और उसके अद्भुत कार्यों से भरपूर हैं। यह परमेश्वर के प्रेम और दया से भरपूर हैं। हाँ वास्तव में, परमेश्वर के सम्पूर्ण कार्य की मुख्य डोर है मानव जाति के लिए उसकी देखभाल; यह उसकी चिन्ता केएहसासों से सराबोर है जिसे वह कभी अलग नहीं रख सकता है। बाइबल के इन वचनों में, अपने पुनरूत्थान के बाद हर एक चीज़ में जिसे प्रभु यीशु ने किया था, जो प्रकट हुआ था वह मानव जाति के लिए परमेश्वर का ना बदलनेवाला प्रेम और चिन्ता थी, साथ ही मनुष्यों के लिए परमेश्वर का अत्याधिक प्रेम और उनका पालन पोषण था। अब तक, इस में से कुछ भी नहीं बदला है-क्या आप इसे देख सकते हैं? जब आप इसे देखते हैं, तो क्या आपका हृदय स्वतः ही परमेश्वर के करीब नहीं आ जाता है? यदि आप उस युग में रहते और प्रभु यीशु पुनरूत्थान के बाद आपके सामने प्रगट होता, दृश्य रूप में ताकि आप देख सकें, और यदि वह आपके सामने बैठ जाता, रोटी और मछली खाता और पवित्र शास्त्र से आपको समझाता, और आप से बातचीत करता, तो आप कैसा महसूस करते? क्या आप खुशी महसूस करते? दोश भावना के विषय में क्या? परमेश्वर के प्रति पिछली ग़लतफहमियाँ और उसकी अवहेलना, परमेश्वर से टकराव और उसके प्रति सन्देह-क्या वे सब ग़ायब नहीं हो जाते? क्या परमेश्वर और मनुष्य के बीच रिश्ता और अधिक उचित नहीं हो जाता?

बाइबल के इन सीमित अध्यायों की विवेचना के द्वारा, क्या आपने परमेश्वर के स्वभाव में किसी खोट का पता लगाया है? क्या आपने परमेश्वर के प्रेम में मिलावट की खोज की है! क्या आप परमेश्वर की सर्वसामर्थता और बुद्धि में कोई धूर्तता या बुराई देखते हैं? कदापि नहीं? अब क्या आप निश्चित तौर पर कह सकते हैं कि परमेश्वर पवित्र है? क्या आप निश्चित तौर पर कह सकते हैं कि परमेश्वर की भावनाएँ उसके सार तत्व और उसके स्वभाव का प्रकाशन हैं। मैं आशा करता हूँ कि इन वचनों को पढ़ने के बाद, जो कुछ आपने इस से समझा है उस से आपकी सहायता होगी और स्वभाव में परिवर्तन और परमेश्वर के स्वभाव का अनुसरण करने में लाभ पहुँचाएगा। मैं यह भी आशा करता हूँ कि ये वचन आपके लिए फल उत्पन्न करेंगे जो दिन ब दिन बढ़ता ही जाएगा, इस प्रकार अनुसरण की यह प्रक्रिया आपको परमेश्वर के और करीब ले आएगी, और उस ऊँचे स्तर के और करीब ले आएगी जिसकी आकांक्षा परमेश्वर करता है, ताकि आप आगे से सत्य के पीछे पीछे चलने में बोरियत महसूस ना करें और आप आगे से यह महसूस ना करें कि सत्य और स्वभाव में परिवर्तन का अनुसरण करना एक दुखदायी या बेकार की चीज़ नहीं है। उसके बजाए, यह परमेश्वर के सच्चे स्वभाव और परमेश्वर के पवित्र सार तत्व की अभिव्यक्ति है जो आपको ज्योति की लालसा करने, और न्याय की लालसा करने के लिए अभिप्रेरित करता है, और सत्य का अनुसरण करने, परमेश्वर की इच्छा की सन्तुष्टि का अनुसरण करने, और परमेश्वर के द्वारा ग्रहणयोग्य मनुष्य बनने, और एक वास्तविक मनुष्य बनने के लिए आकांक्षा करता है।

आज हमने कुछ चीज़ों के बारे में बातें की हैंजिन्हें परमेश्वर ने अनुग्रह के युग में किया था जब उसने पहली बार देहधारण किया था। इन चीज़ों से, हमने उस स्वभाव को जिसे उसने देह में प्रकट और प्रकाशित किया था, साथ ही साथ जो उसके पास है तथा जो वह है उसके प्रत्येक पहलु को देखा है। जो उसके पास है तथा जो वह है उसके सभी पहलु बहुत ही मानवीय दिखाई देते हैं, परन्तु सच्चाई यह है कि उसकेसार तत्व, और वह सब कुछ जो उसने प्रकाशित और प्रकट किया था उसे उसकेस्वभाव से अलग नहीं किया जा सकता है। देहधारी परमेश्वर का हर एक तरीका और उसका प्रत्येक पहलु मानवीयता में उसके स्वभाव कोप्रकट करता है जो उसके सार तत्व से जटिल रूप से जुड़ा हुआ है। अतः, यह अति महत्वपूर्ण है कि परमेश्वर मनुष्य के पास देहधारण कर के आया था और वह कार्य जो उसने देह में किया था वह भी अति महत्वपूर्ण है। और, वह स्वभाव जो उसने प्रकाशित किया था और वह इच्छा जिसे उसने अभिव्यक्त किया था वे देह में रहनेवाले प्रत्येक इंसान, और भ्रष्टता में रहनेवाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण हैं। क्या यह कुछ ऐसा है जिसे आप समझने में समर्थ हैं? परमेश्वर के स्वभाव और जो उसके पास है तथा जो वह है उसे समझने के बाद, क्या आपने कोई निर्णय लिया है कि आप परमेश्वर के साथ कैसा बर्ताव करेंगे? इस प्रश्न के प्रत्युत्तर में, निश्कर्श के रूप में मैं आपको तीन चेतावनी देना चाहूँगाः पहला, परमेश्वर की परीक्षा मत करो। इस से कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप परमेश्वर के बारे में कितना समझते हैं, इस से कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप उसके स्वभाव के विषय में कितना जानते हैं, उसकी परीक्षा बिल्कुल नहीं कीजिए। दूसरा, पदस्थिति के लिए परमेश्वर से संघर्ष मत कीजिए। इस से कोई फर्क नहीं पड़ता कि परमेश्वर आपको किस प्रकार की पदस्थिति देता है या किस प्रकार का कार्य आपको सौंपता है, इस से कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह आपको किस प्रकार के कर्त्तव्य को करने के लिए बड़ा करता है, इस से कोई फर्क नहीं पड़ता कि आपने परमेश्वर के लिए कितना खर्च और कितना बलिदान किया है, इसलिए पदस्थिति के लिए परमेश्वर से संघर्ष बिल्कुल मत कीजिए। तीसरा, परमेश्वर से संघर्ष मत कीजिए? जो परमेश्वर आपके साथ करता है, जो वह आपके लिए व्यवस्थित करता है, और वे चीज़ें जो वह आप पर लेकर आता हैआप उसे समझते या उसका पालन करते हैं कि नहीं इस से कोई फर्क नहीं पड़ता है, किन्तु आप बिल्कुल भी परमेश्वर से संघर्ष मत कीजिए। यदि आप इन तीन चेतावनी को लेकर चलेंगे, तो आप अपेक्षाकृत सुरक्षित होंगे, और आप आसानी से परमेश्वर को क्रोधित नहीं करेंगे। कहने के लिए आज बस इतना ही है!

23 जुलाई, 2014

फुटनोटः

1. मूल पाठ में "इसकी अभिव्यक्ति"को छोड़ दिया गया है।

मूल आयतें बी. एस. आई. हिन्दी बाइबल संस्करण से ली गई है।