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5. मानव मात्र के लिए परमेश्वर की सर्वोत्तम सुरक्षा

कुईकुइन रिझाओ शहर, शंडोंग प्रदेश

मेरे लिए मेरे जीवन की मंजिल या ओहदा, कुछ ऐसा था जिसे मैं कभी भी छोडने के लिए तैयार नहीं था और जब परमेश्वर ने मेरे लिए एक ऐसे परिवेश का निर्माण किया जिसने मेरी कलई खोल दी, तब मैं नकारात्मक, शिकायती और हतोत्साहित हो गया था। सिर्फ एक के बाद एक शोधन के बाद ही मैं परमेश्वर के श्रेष्ठ अभिप्राय को समझ सका और मैं यह जान पाया कि उनके द्वारा ली जा रही परीक्षा मुझे यातना देने के लिए नहीं थी; बल्कि यह मेरे अंत:करण को शुद्ध करने और मुझे निर्दोष बनाने के लिए थी, मुझे यह सब यह समझाने के लिए था कि किसी मंजिल को पाने के लिए परमेश्वर मे विश्वास करने से सिर्फ मेरा नाश होगा, और इस प्रकार यह अनुगमन के गलत दृष्टिकोण से मुझे मुक्ति दिलाने और अनुगमन के लिए वांछित लक्ष्य को निर्धारित करने के लिए था।

कलीसिया मेँ कुछ समय तक नेता के रूप मेँ काम करने के बाद मेरी पदोन्नति करके मुझे जनपद के नेताओं का भागीदार बनाया गया। अभी ज्यादा समय नहीं बीता था कि मुझे पुन: पदोन्नत करके जनपद का नेता बना दिया गया। इस क्रमश: "उन्नति" ने मुझे और मेहनत से काम करने के लिए प्रेरित किया, और मैं उस दिन की राह देखने लगा जब मुझे और बड़े दायित्व सौंपे जाएंगे। यह आशा मेरे अनुगमन का प्रोत्साहन बन गई। लेकिन, जिस समय मैं चरण दर चरण अपने "आरोहण" के सपने बुन रहा था, ठीक उसी समय मेरी बदली कर दी गई! उस समय मै टूट गया , और मुझे लगा कि मेरी मंजिल गुम हो चुकी है और परमेश्वर मेँ मेरे विश्वास का मार्ग समाप्त हो चुका है। मैं इस हद तक व्यथित था कि मैंने कलीसिया छोडने के बारे मेँ सोचने लगा। मैं मरने के बारे मेँ भी सोचने लगा था। बाद मेँ परमेश्वर के वचनों से प्राप्त प्रबुद्धता के मार्ग से मैं धीरे-धीरे नकारात्मकता से मुक्त हुआ। उनके वचन थे: "जब पहाड़ सरकते हैं, तो क्या वे तुम्हारे स्थान के वास्ते एक चक्कर लगा सकते हैं? जब समुद्र बहते हैं, तो क्या वे तुम्हारे स्थान के सामने रूक सकते हैं? क्या तुम्हारे स्थान के द्वारा आकाश और पृथ्वी को पलटा जा सकता है?" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "बाईसवाँ कथन" से)। उस समय, यद्यपि मैंने यह महसूस किया कि ओहदे के लिए मेरी भूख अत्यंत प्रबल है और परमेश्वर मेँ विश्वास ओहदे के अनुगमन के लिए नहीं होना चाहिए, फिर भी मुझे अपने व्यक्तित्व की असलियत की कोई पहचान नहीं थी, और मैंने अपने विषय मेँ सोचा: कि अब आगे से मैं ओहदे के पीछे नहीं भागूंगा; भले ही मुझे किसी प्रकार का दायित्व दिया जाए – मैं उसका पालन करूंगा और यही मेरा मंत्र होगा। बाद मेँ, कलीसिया ने मुझे सुसमाचार के प्रवचन और नए विश्वासियों की देख भाल का काम सौंपा। मैंने यह सब स्वीकार किया। और इसलिए मुझे ऐसा लगा कि मैंने ओहदे के लिए अपनी भूख को जीत लिया है।

कुछ ही समय बाद, नए विश्वासियों की देखभाल करने के कार्य के बजाय मैं एक बार फिर से कलीसिया का नेता बन गया। उस समय "वापसी करने" की गहरी इच्छा मेरे दिल मे तेज हिलोरे मार रही थी। इस इच्छा के वशीभूत होकर, मैंने इस आशा से, अपना सब कुछ प्रदर्शन करने के हवाले कर दिया था कि हमारे नेता मुझमें हुए "परिवर्तन" पर ध्यान देंगे। कलीसिया के जिलों के प्रबंध का जब समय आया तो उस समय मेरे अंतर मन मेँ यह विचार आया कि इस बार वे मुझे किसी जनपद के नेता का भागीदार बनाएँगे। लेकिन परमेश्वर की योजना ने एक बार फिर से ओहदे के संबंध मेरे सपने को ध्वस्त कर दिया और मुझे किसी दूसरे कलीसिया के छोटे पादरी, संपर्क के पद से ही संतोष करना पड़ा। इस यथार्थ का सामना करते हुए, मैं इसे गलत समझ बैठा, शिकायत की, और अचानक मेरे मन मेँ संघर्ष की स्थिति पैदा हो गई: हे परमेश्वर, दूसरों में भी कमियाँ हैं और वे भी गलतियाँ करते हैं, लेकिन वे फिर भी नेता के रूप मेँ काम कर रहे हैं। मैंने हर मोर्चे पर दूसरों से कम योगदान नहीं दिया है – परमेश्वर मेरा उपयोग क्यों नहीं कर रहे हैं? मैं इतना अभागा क्यों हूँ? एक बार फिर, मुझे शोधन की प्रक्रिया की व्यथा का सामना करना पड़ा। ऐसे अंधकार मेँ, परमेश्वर के इन वचनों ने मेरा पथ प्रदर्शन किया: "तुम झटके के बाद झटका और अनुशासन के बाद अनुशासन को सबसे अच्छे संरक्षण के रूप में नहीं देख रहे हो, बल्कि तुम इन्हें स्वर्ग से मिले अनुचित उकसावे या उपयुक्त प्रतिकार के रूप में देखते हो। तुम बहुत अज्ञानी हो! …इस ताड़ना ने जिस को तुम क्रूर मानते हो, तुम्हारे दिल को नहीं बदला है, न ही इसने तुम्हारे दिल को अधिकृत किया है। इसके बजाय, इसने सिर्फ उसे घायल किया है। तुमने इस 'क्रूर ताड़ना' को इस जीवन में केवल अपने दुश्मन के रूप में देखा है, लेकिन तुमने कुछ भी हासिल नहीं किया। तुम बहुत आत्म-तुष्ट हो! तुम शायद ही कभी मानते हो कि तुम्हें इस तरह के परीक्षण लागू होते हैं क्योंकि तुम बहुत घृणास्पद हो, बल्कि तुम्हें लगता है कि तुम बहुत अभागे हो और इसके अलावा, तुम कहते हो कि मैं हमेशा तुम्हारे साथ छिद्रान्वेषी हूँ" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "क्या वे जो सीखते और जानते नहीं, पशु मात्र नहीं हैं?" से)। परमेश्वर के वचनों ने एक तेज धार तलवार की तरह मेरे हृदय को चीर दिया। यह सत्य था! मैं जब जब लुढ़का – मैंने उनसे कुछ भी नहीं हासिल किया; कुछ भी सबक नहीं लिया। जब जब मेरी मंजिल ओझल हुई – ऐसा लगा मैं जीवन और मृत्यु के बीच डोल रहा हूँ मानो मंजिल के लोप होने से जीवन का अर्थ ही समाप्त हो गया हो। ओहदा, मेरा जानलेवा घाव बन चुका था। लेकिन इन तमाम ताड़नाओं के बावजूद मैं स्वयं की वास्तविकता को नहीं समझ पाया था और परमेश्वर के गंभीर अभिप्राय को भी बहुत कम समझ पा रहा था। मैं यह नहीं समझ पाया था कि परमेश्वर द्वारा ली जा रही परीक्षा मेरे ओहदे की भूख को समाप्त करने के लिए थी ताकि मैं सही लक्ष्य पा सकूँ। इसके बजाय, मैंने परमेश्वर को ही गलत समझा, शिकायत की और यह सोचा कि वे जान बुझ कर मुझे यातना दे रहे हैं, मेरे लिए चीजों को कठिन बनाने का प्रयास कर रहे हैं, और यह मानने लगा कि मैं कितना बड़ा अभागा हूँ। मैं वास्तव मेँ कितना कुतर्की और बेतुका था!

बाद मेँ, मैंने परमेश्वर के साहचर्य मेँ से निम्न को देखा: "मानव प्रकृति के भीतर भ्रष्टाचार का हल परीक्षण के माध्यम से किया जाना चाहिए। जिन-जिन पहलुओं में आप उत्तीर्ण नहीं होते हैं, इन पहलुओं में आपको परिष्कृत किया जाना चाहिए-यह परमेश्वर की व्यवस्था है। परमेश्वर आपके लिए एक वातावरण बनाते है, जिससे आप अपने खुद के भ्रष्टाचार को जानने के लिए, परिष्कृत होने के लिए बाध्य हों। … जिन पहलुओं में आप अभी भी शैतान के बंधन के अधीन हैं, जिन पहलुओं में आप अभी भी आपकी अपनी इच्छाएं रखते हैं, आपकी अपनी मांगें हैं-उन पहलुओं में ही आपको कष्ट उठाना होगा" ("मसीह की बातचीतों के अभिलेख" से "कसौटियों के बीच परमेश्वर को कैसे संतुष्ट करें" से)। परमेश्वर के वचनों का अवलोकन करते हुए, और मुझ पर आ रही एक के बाद एक शोधन की प्रक्रिया को याद करते हुए, अंतत: मैंने परमेश्वर के दयालु अभिप्राय को समझा और परमेश्वर के दिव्य प्रेम और उद्धार का परमानंद प्राप्त कर सका। यद्यपि कि मैं अहंकारी और अज्ञानी था और परमेश्वर के हृदय से अनभिज्ञ था, तथापि उन्होने बार-बार मेरी परीक्षा लेने के लिए, एक परिवेश का सृजन किया, ताड़ना के मध्य मेँ उन्होने मुझे मेरी कमजोरियों, अहंकार और कुतर्क को समझने के लिए बाध्य किया और बताया कि ओहदे के लिए मेरी मनोकामना कितनी विकराल है। उन्होने मंजिल की महत्वाकांक्षा से शासित होने वाली बेड़ियों को तोड़ा, उन्होने ओहदे के अनुगमन करने वाले मार्ग से मुझे हटाया। परमेश्वर के प्रेम की थाह पाने की मैंने जितनी अधिक कोशिश की मैंने यही अनुभव किया कि मेरे लिए उनका प्रेम कितना गहरा था; जबकि मैं दिशाहीन और अज्ञानी था। मैंने परमेश्वर को गलत समझा और उन पर दोषारोपण किया और उनके हृदय को चोट पहुंचाई। उस क्षण, मैं पश्चाताप के अपने आंसुओं को नहीं रोक पाया और परमेश्वर के सम्मुख नतमस्तक होकर प्रार्थना किया: हे परमेश्वर! आपको आपके प्रेम के लिए और मेरा उद्धार करने के लिए धन्यवाद। यदि मुझे ये ताड़नाएँ और आपका न्याय नहीं मिला होता तो मैं ओहदे की अपनी भूख के कारण, अपने स्वयं के नाश के मार्ग पर होता। मेरे लिए आपकी परीक्षाओं और ताड़नाओं से मुझे अविश्वसनीय सुरक्षा मिली है और मेरा उद्धार हुआ है। हे परमेश्वर! मैंने अपने लिए आपके महान अभिप्राय को समझ लिया है और सत्य के अनुगमन मेँ आने वाली इन बाधाओं से मुक्त होने के लिए प्रस्तुत हूँ, आपके द्वारा सृजित परिवेश मेँ व्याप्त आपकी अन्य आकांक्षाओं का अनुसरण करना चाहता हूँ, मैं सत्य का अनुगमन करना चाहता हूँ, मैं अपने स्वभाव मेँ परिवर्तन के लिए अनुगमन करना चाहता हूँ, मैं एक कर्तव्यनिष्ठ, सुविवेकी आत्मा बनाना चाहता हूँ ताकि आपकी दिव्य रचना मुझमें यूं ही नष्ट न हो जाए।

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