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परमेश्वर का स्वभाव उज्जवल और पवित्र है

I

सच्चा है और उज्ज्वल है स्वभाव परमेश्वर का।

जब चीज़ें बदलती हैं, परिवेश बदलता है,

तो परमेश्वर का ख़्याल और नज़रिया बदलता है।

जब वो बदलता है अपने ख़यालों को,

तो परमेश्वर के सार के कितने रूप प्रकट हो जाते हैं।

रोष सिंह का, मां की करुणा।

परमेश्वर कितनी सजीवता से अपने स्वभाव के अलग रूप प्रकट करता है।

रोष और करुणा है, धर्मी स्वभाव ईश्वर का,

ना कोई शंका कर सकता, ना कोई विकृत कर सकता,

ना कोई अपमानित कर सकता, ना इसमें परिवर्तन कर सकता।

ये धर्मी स्वभाव परमेश्वर का, कहीं भी, कभी भी हर चीज़ में दिखता है।

II

कुदरत के कण-कण में दिखता, हर लम्हे, हर पल में दिखता,

समय या स्थान में सीमित नहीं है, परमेश्वर का धर्मी स्वभाव।

परमेश्वर का रोष मुक्त है दोषों से;

परमेश्वर की करुणा नहीं किसी प्राणी में।

उसकी करुणा पावन और शुद्ध है, अनुभव से और भावों से यह सिद्ध है।

परमेश्वर का क्रोध भयंकर है, उत्तर है उस बुराई को जो इंसां करे;

परमेश्वर का क्रोध मगर अति पावन है।

परमेश्वर का दिल पिघले और दिल बदले, जब उसके आगे कोई पश्चाताप करे।

III

ऐसा परिवर्तन, ऐसी करुणा दोषमुक्त है, दोषमुक्त है,

उसका संयम निष्कलंक और पावन है, पावन है।

उसका स्वभाव क्रोध, करुणा, धैर्य प्रकट करेगा,

पर पश्चातापी हृदय, भिन्न आचरण के उत्तर में।

जो कुछ भी वो प्रकट करता है, जो कुछ भी वो प्रकाशित करता है,

वो सबकुछ पावन है और बेदाग़ है।

सार-तत्व अनुपम है उसका सब जीवों से।

परमेश्वर क्या करता है, फ़र्क नहीं पड़ता है, हैं दोषरहित सब काम प्रभु के,

उसका चिंतन, उसके निर्णय पावन हैं ख़ुद उसकी तरह।

तय किया परमेश्वर ने जो, वो उसे करता रहेगा,

और अपनी योजनाओं को पूरा करेगा।

जो भी करता है वो निश्चित है और दोषहीन है,

क्योंकि इसका स्रोत दोषों से रहित और शुद्ध है।

"वचन देह में प्रकट होता है" से

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बुलाए हुए बहुत हैं, परन्तु चुने हुए कुछ ही हैं केवल परमेश्वर के प्रबंधन के मध्य ही मनुष्य बचाया जा सकता है परमेश्वर सम्पूर्ण मानवजाति के भाग्य का नियन्ता है प्रश्न 26: बाइबल ईसाई धर्म का अधिनियम है और जो लोग प्रभु में विश्वास करते हैं, उन्होंने दो हजार वर्षों से बाइबल के अनुसार ऐसा विश्वास किया हैं। इसके अलावा, धार्मिक दुनिया में अधिकांश लोग मानते हैं कि बाइबल प्रभु का प्रतिनिधित्व करती है, कि प्रभु में विश्वास बाइबल में विश्वास है, और बाइबल में विश्वास प्रभु में विश्वास है, और यदि कोई बाइबल से भटक जाता है तो उसे विश्वासी नहीं कहा जा सकता। कृपया बताओ, क्या मैं पूछ सकता हूँ कि इस तरीके से प्रभु पर विश्वास करना प्रभु की इच्छा के अनुरूप है या नहीं?