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I. परमेश्वर के देहधारण से सम्बंधित सत्य

10. क्यों केवल देहधारी परमेश्वर के कार्य के अनुभव और आज्ञा-पालन करने के द्वारा ही कोई परमेश्वर को जान सकता है?

संदर्भ के लिए बाइबल के पद:

"और वचन देहधारी हुआ; और अनुग्रह और सच्‍चाई से परिपूर्ण होकर हमारे बीच में डेरा किया, और हम ने उसकी ऐसी महिमा देखी, जैसी पिता के एकलौते की महिमा" (यूहन्ना 1:14)।

"मार्ग और सत्य और जीवन मैं ही हूँ; बिना मेरे द्वारा कोई पिता के पास नहीं पहुँच सकता। यदि तुम ने मुझे जाना होता, तो मेरे पिता को भी जानते; और अब उसे जानते हो, और उसे देखा भी है" (यूहन्ना 14:6-7)।

"मैं पिता में हूँ और पिता मुझ में है" (यूहन्ना 14:10)।

"मैं और पिता एक हैं" (यूहन्ना 10:30)।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

जब परमेश्वर देह नहीं बना था, तब जो कुछ वह कहता था लोग उसे काफी हद तक नहीं समझते थे क्योंकि वह पूर्ण दिव्यता से आया था। जो वह कहता था उसका परिप्रेक्ष्य और संदर्भ मनुष्यजाति के लिए अदृश्य और अगम्य था; वह आध्यात्मिक क्षेत्र से प्रकट होता था जिसे लोग देख नहीं सकते थे। जो लोग देह में जीवन बिताते थे, वे आध्यात्मिक क्षेत्र से होकर नहीं गुज़र सकते थे। परन्तु परमेश्वर के देह बनने के बाद, उसने मानवीय परिप्रेक्ष्य से मनुष्‍य जाति से बात की, और वह आध्यात्मिक क्षेत्र के दायरे से बाहर आया और उससे आगे बढ़ गया। मनुष्यजाति को उस अंश तक जिस तक वे समर्थ हैं परमेश्वर को समझने और जानने देने, और उनकी क्षमता के दायरे के भीतर उसके इरादे और उसके अपेक्षित मानकों को बूझने देने के लिए, उन चीज़ों के द्वारा जिनकी कल्पना मनुष्य कर सकते थे और उन चीज़ों के द्वारा जिन्हें उन्होंने अपने जीवन में देखा और सामना किया था, और ऐसी पद्धतियों के उपयोग के द्वारा जिन्हें मनुष्य स्वीकार कर सकते थे, एक ऐसी भाषा में जिसे वे समझ सकते थे, और ऐसे ज्ञान के द्वारा जिसे वे समझ सकते थे, वह अपने दिव्य स्वभाव, इच्छा, और रवैये को व्यक्त कर सकता था। यह मानवता मे परमेश्वर के कार्य की पद्धति और सिद्धांत थे। यद्यपि देह में होकर कार्य करने से परमेश्वर के तरीकों और सिद्धांतों को मुख्यतः उसकी मानवता के द्वारा या माध्यम से प्राप्त किया गया था, फिर भी इसने सचमुच में ऐसे परिणामों को प्राप्त किया जिन्हें सीधे दिव्यता में होकर कार्य करने से प्राप्त नहीं किया जा सकता था। मानवता में परमेश्वर का कार्य ज़्यादा ठोस, प्रामाणिक, और लक्षित था, और पद्धतियाँ कहीं ज़्यादा लचीली थीं, तथा आकार में यह व्यवस्था के युग से बढ़कर था।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III" से उद्धृत

परमेश्वर अंत के दिनों में कार्य के एक नए चरण में प्रवेश करता है। वह अपने स्वभाव के बारे में और अधिक प्रकट करेगा, और यह यीशु के समय की करुणा और प्रेम नहीं होगा। चूँकि उसके हाथ में नया कार्य है, इसलिए इस नए कार्य के साथ उसका एक नया स्वभाव होगा। इसलिए, यदि यह कार्य पवित्रात्मा द्वारा किया जाता—यदि परमेश्वर देह नहीं बनता, और इसके बजाय आत्मा ने गड़गड़ाहट के माध्यम से सीधे बात की होती ताकि मनुष्य के पास उससे संपर्क करने का कोई रास्ता नहीं होता—तो क्या मनुष्य उसके स्वभाव को जान पाता? यदि केवल पवित्रात्मा ने कार्य किया होता, तो मनुष्य के पास उसके स्वभाव को जान लेने का कोई तरीका नहीं होता। लोग केवल तभी परमेश्वर के स्वभाव को अपनी आँखों से देख सकते हैं जब वह देह बनता है, जब वचन देह में प्रकट होता है, और वह अपना संपूर्ण स्वभाव देह के माध्यम से व्यक्त करता है। परमेश्वर वास्तव में और सच में मनुष्यों के बीच रहता है। वह मूर्त है; मनुष्य वास्तव में उसके स्वभाव के साथ संलग्न हो सकता है, और उसके स्वरूप के साथ संलग्न हो सकता है; केवल इसी तरह से मनुष्य वास्तव में उसे जान सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)" से उद्धृत

उस कार्य के क्षेत्र के भीतर जिसे प्रभु यीशु ने अनुग्रह के युग में पूर्ण किया था, तुम परमेश्वर के स्वरूप के अन्य पहलू को देख सकते हो। यह उसकी देह के द्वारा व्यक्त किया गया था, और उसकी मानवता के माध्यम से लोगों के लिए देखना और सराहना करना संभव बनाया गया था। मनुष्य के पुत्र में, लोगों ने देखा कि किस प्रकार देह में परमेश्वर ने अपनी मानवता में जीवन बिताया था, और उन्होंने देह के माध्यम से व्यक्त परमेश्वर की दिव्यता को देखा था। इन दो प्रकार की अभिव्यक्तियों ने लोगों को एक बिल्कुल सच्चे परमेश्वर को देखने दिया, और उन्हें परमेश्वर के बारे में एक भिन्न अवधारणा बनाने दी। हालाँकि, संसार के सृजन और व्यवस्था के युग के अन्त के बीच की समयावधि में, अर्थात्, अनुग्रह के युग से पहले, लोगों के द्वारा जो देखा, सुना, और अनुभव किया जाता था वह केवल परमेश्वर का दिव्य पहलू था। यह वह था जो परमेश्वर ने अमूर्त क्षेत्र में किया और कहा था, और वे चीज़े थीं जिन्हें उसने अपने सच्चे व्यक्तित्व से व्यक्त किया था जिन्हें देखा और छुआ नहीं जा सकता है। प्रायः, ये चीज़े लोगों को यह महसूस कराती थीं कि परमेश्वर बहुत महान है, और यह कि वे उसके नज़दीक नहीं जा सकते हैं। वह प्रभाव जो परमेश्वर सामान्यतः लोगों के ऊपर डालता था वह था कि वह भीतर और बाहर जगमगाता था, और लोग यहाँ तक महसूस करते थे कि उसके हर एक विचार और मत इतने रहस्यमयी और इतने मायावी थे कि उन तक पहुँचने का कोई तरीका नहीं था, और वे उनको समझने और उनकी सराहना करने का प्रयास तो बिल्कुल भी नहीं करते थे। लोगों के लिए, परमेश्वर के बारे में सब कुछ बहुत दूर था—इतना दूर कि लोग उसे देख नहीं सकते थे, और उसे छू नहीं सकते थे। ऐसा लगता था कि वह ऊपर आकाश में है, और ऐसा प्रतीत होता था कि वह बिल्कुल भी अस्तित्व में नहीं है। इसलिए लोगों के लिए, परमेश्वर के हृदय और मन को या उसकी किसी सोच को समझना भी पहुँच के बाहर था, और यहाँ तक कि अगम्य था। ...जिस समयावधि में प्रभु यीशु काम कर रहा था, उस समय लोग यह देख सकते थे कि परमेश्वर की अनेक मानवीय अभिव्यक्तियाँ थीं। उदाहरण के लिए, वह नृत्य कर सकता था, वह विवाहों में शामिल हो सकता था, वह लोगों के साथ संगति कर सकता था, उनसे बात कर सकता था, और चीज़ों की उनके साथ चर्चा कर सकता था। इसके अतिरिक्त, प्रभु यीशु ने बहुत से कार्यों को भी पूर्ण किया था जो उसकी दिव्यता को दर्शाते थे, और निस्संदेह यह समस्त कार्य परमेश्वर के स्वभाव की एक अभिव्यक्ति और प्रकाशन थे। इस समय के दौरान, जब परमेश्वर की दिव्यता एक साधारण सी देह में साकार हुई थी जिसे लोग देख और छू सकते थे, वे अब और यह महसूस नहीं करते थे कि वह भीतर और बाहर जगमगा रहा है, जिसके करीब वे नहीं जा सकते थे। इसके विपरीत, वे मनुष्य के पुत्र की हरकत, उसके वचनों, और कार्य के माध्यम से परमेश्वर की इच्छा को ग्रहण करने या उसकी दिव्यता को समझने की कोशिश कर सकते थे। देहधारी मनुष्य के पुत्र ने अपनी मानवता के माध्यम से परमेश्वर की दिव्यता को व्यक्त किया था और परमेश्वर की इच्छा को मनुष्यजाति तक पहुँचाया था। और परमेश्वर की इच्छा और स्वभाव की अभिव्यक्ति के माध्यम से, उसने लोगों के सामने उस परमेश्वर को प्रकट किया जिसे आध्यात्मिक क्षेत्र में देखा और छुआ नहीं जा सकता है। जो लोगों ने देखा वह, मूर्त और हड्डियों तथा माँस वाला, स्वयं परमेश्वर था। तो देहधारी मनुष्य के पुत्र ने परमेश्वर की स्वयं की पहचान, हैसियत, छवि, स्वभाव, और उसके स्वरूप जैसी चीज़ों को ठोस और मानवीय बना दिया। यद्यपि परमेश्वर की छवि के बारे में मनुष्य के पुत्र के बाहरी रूप-रंग की कुछ सीमाएँ थीं, फिर भी उसका सार और स्वरूप पूर्णत: परमेश्वर की स्वयं की पहचान और हैसियत को दर्शाने में पूर्णतः समर्थ थे—अभिव्यक्ति के रूप में मात्र कुछ भिन्नताएँ थीं। चाहे यह मनुष्य के पुत्र की मानवता हो या उसकी दिव्यता, हम नकार नहीं सकते कि वह स्वयं परमेश्वर की पहचान और उसकी हैसियत को दर्शाता था। हालाँकि इस समय के दौरान, परमेश्वर ने देह के माध्यम से कार्य किया, देह के परिप्रेक्ष्य से बात की, और मनुष्य-जाति के सामने मनुष्य के पुत्र की पहचान और हैसियत के साथ खड़ा हुआ, और उसने लोगों को मनुष्यजाति के बीच परमेश्वर के सच्चे वचनों और कार्य का सामना और अनुभव करने का अवसर दिया। उसने लोगों को विनम्रता के बीच उसकी दिव्यता और उसकी महानता में अंतर्दृष्टि, और साथ ही परमेश्वर की प्रामाणिकता और वास्तविकता की एक प्रारम्भिक समझ और एक प्रारम्भिक परिभाषा भी प्राप्त करने दी।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III" से उद्धृत

यीशु का अनुसरण करने के दौरान, उसके बारे में उसके कई अभिमत थे और वह अपने परिप्रेक्ष्य से आँकलन करता था। यद्यपि पवित्रात्मा के बारे में उसकी एक निश्चित अंश में समझ थी, तब भी पतरस बहुत प्रबुद्ध नहीं था, इसलिए वह अपनी बातों में कहता हैः "मुझे उसका अवश्य अनुसरण करना चाहिए जिसे स्वर्गिक पिता द्वारा भेजा जाता है। मुझे उसे अवश्य अभिस्वीकृत करना चाहिए जो पवित्र आत्मा के द्वारा चुना जाता है। मैं तेरा अनुसरण करूँगा।" उसने यीशु के द्वारा किये गए कामों को नहीं समझा और कोई प्रबुद्धता प्राप्त नहीं की। कुछ समय तक उसका अनुसरण करने के बाद उसकी उसके द्वारा किये गए कामों और उसके द्वारा कही गई बातों में और यीशु में रुचि बढ़ी। उसे महसूस होने लगा कि यीशु ने अनुराग और सम्मान दोनों प्रेरित किए; वह उसके साथ सम्बद्ध होना और उसके साथ ठहरना पसंद करता था, और यीशु के वचनों को सुनना उसे आपूर्ति और सहायता प्रदान करते थे। यीशु का अनुसरण करने के दौरान, पतरस ने उसके जीवन के बारे में हर चीज़ का अवलोकन किया और उसे हृदय से लगाया: उसके कार्यों को, वचनों को, गतिविधियों को, और अभिव्यक्तियों को। उसने एक गहरी समझ प्राप्त की कि यीशु साधारण मनुष्य जैसा नहीं है। यद्यपि उसका मानवीय प्रकटन अत्यधिक साधारण था, वह मनुष्यों के लिए प्रेम, अनुकम्पा और सहिष्णुता से भरा हुआ था। उसने जो कुछ भी किया या कहा वह दूसरों के लिए बहुत मददगार था, और उसके साथ रहते हुए पतरस ने उन चीज़ों को देखा और सीखा जिन्हें उसने पहले कभी देखा या सीखा नहीं था। उसने देखा कि यद्यपि यीशु की न तो कोई भव्य कद-काठी है न ही असाधारण मानवता है, किन्तु उसका हाव-भाव सच में असाधारण और असामान्य था। यद्यपि पतरस इसे पूरी तरह से नहीं समझ सका था, लेकिन वह देख सकता था कि यीशु बाकी सब से भिन्न कार्य करता है, क्योंकि उसके काम करने का तरीका किसी साधारण मनुष्य द्वारा किए गए कामों के तरीकों से कहीं अधिक भिन्न था। यीशु के साथ सम्पर्क के दौरान, पतरस ने यह भी महसूस किया कि उसका चरित्र किसी भी साधारण मनुष्य से भिन्न था। उसने हमेशा स्थिरता से कार्य किया, और कभी भी जल्दबाजी नहीं की, किसी भी विषय को बढ़ा-चढ़ा कर नहीं बताया, न ही कम करके आँका, और अपने जीवन को इस तरह से संचालित किया जो सामान्य और सराहनीय दोनों था। बातचीत में, यीशु शिष्ट, आकर्षक, स्पष्ट और हँसमुख मगर शान्त था, और अपने कार्य के निष्पादन में कभी भी गरिमा नहीं खोता था। पतरस ने देखा कि यीशु कभी-कभी अल्प-भाषी रहता था, जबकि किसी अन्य समय में लगातार बात करता था। कई बार वह इतना प्रसन्न होता था कि वह कबूतर की तरह चुस्त और जीवंत बन जाता था, और कभी-कभी इतना दुःखी होता था कि वह बिल्कुल भी बात नहीं करता था, मानो कोई दुखियारी माँ हो। कई बार वह क्रोध से भरा होता था, जैसे कि कोई बहादुर सैनिक शत्रुओं को मारने के लिए मुस्तैद हो, और कई बार तो एक गरजने वाले सिंह की तरह होता था। कभी-कभी वह हँसता था; फिर कभी वह प्रार्थना करता और रोता था। इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि यीशु का आचरण कैसा था, पतरस का उसके प्रति प्रेम और आदर असीमित रूप से बढ़ता गया। यीशु की हँसी उसे खुशी से भर देती थी, उसका दुःख उसे दुःख में डुबा देता था, उसका क्रोध उसे डरा देता था, जबकि उसकी दया, क्षमा, और सख़्ती, उसके भीतर एक सच्ची श्रद्धा और लालसा को बढ़ाते हुए, उसे यीशु से सच्चा प्यार करवाने लगते थे। निस्संदेह, पतरस को इस सब का एहसास धीरे-धीरे तब हुआ जब एक बार वह कुछ वर्षों तक यीशु के साथ रह लिया था।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "पतरस ने यीशु को कैसे जाना" से उद्धृत

परमेश्वर की सुन्दरता उसके कार्यों में व्यक्त होती हैः केवल जब वे उसके कार्य का अनुभव करते हैं तभी वे उसकी सुन्दरता को खोज सकते हैं, वे केवल अपने वास्तविक अनुभव में ही परमेश्वर की सुन्दरता की सराहना कर सकते हैं और बिना उसे वास्तविक जीवन में महसूस किए, कोई भी परमेश्वर की सुन्दरता को नहीं खोज सकता है। परमेश्वर के बारे में प्रेम करने को बहुत कुछ है, परन्तु बिना उसके साथ जुड़े लोग उसे खोजने में अक्षम हैं। ऐसा कह सकते हैं कि यदि परमेश्वर देहधारी नहीं हुआ होता, तो लोग वास्तव में उसके साथ जुड़ने के काबिल नहीं हो पाते, और यदि वे वास्तव में उसके साथ जुड़ नहीं पाते, वे उसके कार्यों को भी अनुभव नहीं कर पाते—और इसलिए परमेश्वर के प्रति उनका प्रेम अत्यधिक असत्यता और कल्पना के साथ खराब हो गया होता। स्वर्ग में परमेश्वर का प्रेम पृथ्वी पर परमेश्वर के प्रेम के समान वास्तविक नहीं है, क्योंकि लोगों का स्वर्ग के परमेश्वर के प्रति ज्ञान उनकी कल्पनाओं पर आधारित है, बजाए इसके कि उन्होंने जो अपनी आंखों से देखा है, और वह जो उन्होंने वास्तव में व्यक्तिगत तौर पर अनुभव किया है। जब परमेश्वर पृथ्वी पर आता है, लोग उसके वास्तविक कार्यों और उसकी सुन्दरता को देख पाते हैं वे उसके व्यवहारिक और सामान्य स्वभाव की सभी बातों को देख सकते हैं, वह सब कुछ जो स्वर्ग के परमेश्वर के ज्ञान के मुकाबले हज़ारों गुना अधिक वास्तविक है। इससे निरपेक्ष कि स्वर्ग के परमेश्वर से लोग कितना प्रेम करते हैं, इस प्रेम के बारे में कुछ भी वास्तविक नहीं है और यह पूरी तरह से मानवीय विचारों से भरा हुआ है। उनके पास पृथ्वी पर परमेश्वर के लिए चाहे कितना भी कम प्रेम क्यों न हो, यह प्रेम वास्तविक है; यहां तक कि उसमें बहुत ही कम प्रेम हो, पर यह वास्तविक है। परमेश्वर लोगों को खुद को अपने वास्तविक कार्य के माध्यम से जानने देता है और उसके ज्ञान के द्वारा वह उनके प्रेम को प्राप्त करता है। यह पतरस के समान हैः यदि वह यीशु के साथ नहीं रहा होता, तो उसके लिए यीशु की आराधना करना असम्भव होता। इसी तरह यीशु से जुड़ने के बाद ही उसकी वफादारी मज़बूत हुई। मनुष्य परमेश्वर से प्रेम करे, इसीलिये परमेश्वर मनुष्यों के मध्य में आया और उनके साथ रहता है, और जो कुछ वह मनुष्य को दिखाता और अनुभव कराता है वह परमेश्वर की वास्तविकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर से प्रेम करने वाले लोग हमेशा के लिए उसके प्रकाश में रहेंगे" से उद्धृत

उन लोगों का समूह जिन्हें देहधारी परमेश्वर आज प्राप्त करना चाहता है वे लोग हैं जो उसकी इच्छा के अनुरूप हैं। लोगों को केवल उसके कार्य का पालन करने की, न कि हमेशा स्वर्ग के परमेश्वर के विचारों से स्वयं को चिंतित करने, अस्पष्टता के भीतर रहने, या देहधारी परमेश्वर के लिए चीजें मुश्किल बनाने की आवश्यकता है। जो लोग उसकी आज्ञा का पालन करने में सक्षम हैं, वे ऐसे लोग हैं जो पूर्णतः उसके वचनों को सुनते हैं और उसकी व्यवस्थाओं का पालन करते हैं। ये लोग इस बात पर बिल्कुल भी ध्यान नहीं देते हैं कि स्वर्ग का परमेश्वर वास्तव में किस तरह का है या स्वर्ग का परमेश्वर वर्तमान में मानवजाति में किस प्रकार का कार्य कर रहा है, लेकिन पृथ्वी के परमात्मा को पूर्णतः अपना हृदय दे देते हैं और वे उसके सामने अपना समस्त अस्तित्व रख देते हैं। वे अपनी स्वयं की सुरक्षा का कभी विचार नहीं करते, और वे देहधारी परमेश्वर की सामान्य स्थिति और व्यावहारिकता पर कभी भी उपद्रव नहीं करते हैं। जो लोग देहधारी परमेश्वर की आज्ञा का पालन करते हैं वे उसके द्वारा पूर्ण बनाए जा सकते हैं। जो लोग स्वर्ग के परमेश्वर पर विश्वास करते हैं वे कुछ भी प्राप्त नहीं करेंगे। ऐसा इसलिए है क्योंकि यह स्वर्ग का परमेश्वर नहीं, बल्कि पृथ्वी का परमेश्वर है जो लोगों को वादे और आशीषें प्रदान करता है। लोगों को स्वर्ग के परमेश्वर की ही हमेशा प्रशंसा नहीं करनी चाहिए और पृथ्वी के परमेश्वर को एक औसत व्यक्ति के रूप में नहीं देखना चाहिए। यह अनुचित है। स्वर्ग का परमेश्वर आश्चर्यजनक बुद्धि के साथ महान और अद्भुत है, किंतु इसका कोई अस्तित्व ही नहीं है। पृथ्वी का परमेश्वर बहुत ही औसत और नगण्य है; वह अति सामान्य भी है। उसका एक असाधारण मन या बहुत आश्चर्यचकित करने वाला कार्य नहीं है। वह सिर्फ एक बहुत ही सामान्य और व्यावहारिक तरीके से बोलता और कार्य करता है। यद्यपि वह गड़गड़ाहट के माध्यम से बात नहीं करता है या हवा और बारिश को नहीं बुलाता है, तब भी वह वास्तव में स्वर्ग के परमेश्वर का अवतरण है, और वह वास्तव में मनुष्यों के बीच रहने वाला परमेश्वर है। लोगों को उसका अतिशय वर्णन नहीं करना चाहिए जिसे वह समझने में सक्षम हैं और जो परमेश्वर के रूप में उनकी अपनी कल्पनाओं के अनुरूप है, या उसको नहीं देखना चाहिए जिसे वे स्वीकार नहीं कर सकते हैं और अधम के रूप में तो नितान्त कल्पना भी नहीं कर सकते हैं। यह सब लोगों की विद्रोहशीलता है; यह परमेश्वर के प्रति मानवजाति के विरोध का समस्त स्रोत है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "जो लोग परमेश्वर की व्यावहारिकता के प्रति पूर्णतः आज्ञाकारी हो सकते हैं ये वे लोग हैं जो परमेश्वर से सचमुच प्यार करते हैं" से उद्धृत

पिछला:न्याय के कार्य को करने के लिए परमेश्वर का देहधारण करना, किस तरह मानव जाति के अस्पष्ट परमेश्वर में विश्वास को और शैतान के प्रभुत्व के अंधेरे युग को समाप्त करता है?

अगला:मानव जाति के प्रबंधन से सम्बंधित परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों के उद्देश्य को जानो।

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