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I. परमेश्वर के देहधारण से सम्बंधित सत्य

4. अंतिम दिनों में अपने न्याय के कार्य को करने के लिए परमेश्वर मनुष्य का उपयोग क्यों नहीं करता, इसके बजाय उसे देहधारण कर, स्वयं इसे क्यों करना पड़ता है?

संदर्भ के लिए बाइबल के पद:

"पिता किसी का न्याय नहीं करता, परन्तु न्याय करने का सब काम पुत्र को सौंप दिया है...। वरन् उसे न्याय करने का भी अधिकार दिया है, इसलिये कि वह मनुष्य का पुत्र है" (यूहन्ना 5:22-27)।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

न्याय का कार्य परमेश्वर का स्वयं का कार्य है, इसलिए स्वाभाविक रूप से इसे परमेश्वर के द्वारा किया जाना चाहिए; उसकी जगह इसे मनुष्य द्वारा नहीं किया जा सकता है। क्योंकि सत्य के माध्यम से मानवजाति को जीतना न्याय है, इसलिए यह निर्विवाद है कि तब भी परमेश्वर मनुष्यों के बीच इस कार्य को करने के लिए देहधारी छवि के रूप में प्रकट होता है। अर्थात्, अंत के दिनों में, मसीह पृथ्वी के चारों ओर मनुष्यों को सिखाने के लिए और सभी सत्यों को उन्हें बताने के लिए सत्य का उपयोग करेगा। यह परमेश्वर के न्याय का कार्य है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "मसीह न्याय का कार्य सत्य के साथ करता है" से उद्धृत

अंत के दिनों में, मसीह मनुष्य को सिखाने के लिए विभिन्न प्रकार के सत्यों का उपयोग करता है, मनुष्य के सार को उजागर करता है, और उसके वचनों और कर्मों का विश्लेषण करता है। इन वचनों में विभिन्न सत्यों का समावेश है, जैसे कि मनुष्य का कर्तव्य, मनुष्य को किस प्रकार परमेश्वर का आज्ञापालन करना चाहिए, हर व्यक्ति जो परमेश्वर के कार्य को करता है, मनुष्य को किस प्रकार परमेश्वर के प्रति निष्ठावान होना चाहिए, मनुष्य को किस प्रकार सामान्य मानवता से, और साथ ही परमेश्वर की बुद्धि और उसके स्वभाव इत्यादि को जीना चाहिए। ये सभी वचन मनुष्य के सार और उसके भ्रष्ट स्वभाव पर निर्देशित हैं। खासतौर पर, वे वचन जो यह उजागर करते हैं कि मनुष्य किस प्रकार से परमेश्वर का तिरस्कार करता है इस संबंध में बोले गए हैं कि किस प्रकार से मनुष्य शैतान का मूर्त रूप और परमेश्वर के विरुद्ध दुश्मन की शक्ति है। अपने न्याय का कार्य करने में, परमेश्वर केवल कुछ वचनों के माध्यम से मनुष्य की प्रकृति को स्पष्ट नहीं करता है; बल्कि वह लम्बे समय तक इसे उजागर करता है, इससे निपटता है, और इसकी काट-छाँट करता है। उजागर करने की इन विधियों, निपटने, और काट-छाँट को साधारण वचनों से नहीं, बल्कि सत्य से प्रतिस्थापित किया जा सकता है, जिसे मनुष्य बिल्कुल भी धारण नहीं करता है। केवल इस तरीके की विधियाँ ही न्याय समझी जाती हैं; केवल इसी तरह के न्याय के माध्यम से ही मनुष्य को वश में किया जा सकता है और परमेश्वर के प्रति समर्पण में पूरी तरह से आश्वस्त किया जा सकता है, और इसके अलावा मनुष्य परमेश्वर का सच्चा ज्ञान प्राप्त कर सकता है। न्याय का कार्य जिस चीज़ को उत्पन्न करता है वह है परमेश्वर के असली चेहरे और उसकी स्वयं की विद्रोहशीलता के सत्य के बारे में मनुष्य में समझ। न्याय का कार्य मनुष्य को परमेश्वर की इच्छा की, परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य की, और उन रहस्यों की अधिक समझ प्राप्त करने देता है जो उसके लिए समझ से परे हैं। यह मनुष्य को उसके भ्रष्ट सार तथा उसकी भ्रष्टता के मूल को पहचानने और जानने, साथ ही मनुष्य की कुरूपता को खोजने देता है। ये सभी प्रभाव न्याय के कार्य के द्वारा पूरे होते हैं, क्योंकि इस कार्य का सार वास्तव में उन सभी के लिए परमेश्वर के सत्य, मार्ग और जीवन का मार्ग प्रशस्त करने का कार्य है जिनका उस पर विश्वास है। यह कार्य परमेश्वर के द्वारा किया गया न्याय का कार्य है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "मसीह न्याय का कार्य सत्य के साथ करता है" से उद्धृत

आज तुम्हारे बारे में मेरा न्याय तुम्हारी गंदगी की वजह से है; आज तुम्हारे लिए मेरी ताड़ना तुम्हारी भ्रष्टता और विद्रोहशीलता के कारण है। यह तुम लोगों के बीच सामर्थ्य और प्रतिष्ठा दिखाने या जानबूझकर तुम लोगों को धमकाने के लिए नहीं है, बल्कि यह इसलिए है क्योंकि तुम लोग जो गंदगी की भूमि में रहते हो, अत्यधिक गंदगी से कलुषित हो गए हो। तुम लोगों ने अपनी सत्यनिष्ठा, अपनी मानवता को खो दिया है, और तुम लोग उन शूकरों से भिन्न नहीं हो, जो सबसे घिनौनी जगहों में रहते हैं। यह इन्हीं बातों के कारण है कि तुम लोगों का न्याय किया जाता है और तुम लोग उसका कोप भुगतते हैं। यह इन्हीं न्यायों के कारण है कि तुम लोग यह देखने में सक्षम हो कि परमेश्वर धर्मी परमेश्वर है, कि परमेश्वर पवित्र परमेश्वर है। यह उसकी पवित्रता और धार्मिकता की वजह से है कि उसने तुम लोगों का न्याय किया है और तुम लोगों ने उसका कोप भुगता है। क्योंकि मानव जाति की विद्रोहशीलता को देखते समय वह अपने धर्मी स्वभाव को प्रकट कर सकता है, और क्योंकि वह मानवता की गंदगी को देखते समय अपनी पवित्रता को प्रकट कर सकता है, इतना दिखाना पर्याप्त है कि वह परमेश्वर स्वयं है जो पवित्र है और बिना कलंक का है, लेकिन जो गंदगी की भूमि में पैदा हुआ था। यदि वह एक ऐसा व्यक्ति होता जो दूसरों के साथ स्वयं को भी कलुषित कर लेता है और यदि उसमें पवित्रता का कोई तत्व या धर्मी स्वभाव नहीं होता, तो वह मानवजाति की अधार्मिकता का न्याय करने या मानवजाति का न्यायकर्ता होने के योग्य नहीं होता। यदि मनुष्य को मनुष्य का न्याय करना होता, तो क्या यह अपने स्वयं के चेहरे पर थप्पड़ मारने जैसा नहीं होता? किसी व्यक्ति को उसी की तरह के व्यक्ति का न्याय करने का अधिकार कैसे प्राप्त हो सकता है, जो उतना ही गंदा हो जितना वह स्वयं है? केवल एकमात्र जो समस्त गंदी मानवजाति का न्याय कर सकता है वह पवित्र परमेश्वर स्वयं है, और मनुष्य ही मनुष्य के पापों का न्याय कैसे कर सकता है? मनुष्य के पापों को देखने में मनुष्य कैसे सक्षम हो सकता है, और वह मनुष्य की निंदा करने के लिए कैसे योग्य हो सकता है? यदि परमेश्वर को मनुष्य के पापों का न्याय करने का अधिकार नहीं था, तो वह धर्मी परमेश्वर स्वयं कैसे हो सकता था? जब लोगों के भ्रष्ट स्वभाव प्रकट होते हैं, तो वह उनका न्याय करने के लिए स्पष्ट शब्दों में बोलता है और केवल तभी वे देख सकते हैं कि वह पवित्र है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "विजय के कार्य का दूसरा कदम किस प्रकार से फल देता है" से उद्धृत

जो देह में जीवन बिताते हैं उन सभी के लिए, अपने स्वभाव को परिवर्तित करने के लिए खोज हेतु लक्ष्यों की आवश्यकता होती है, और परमेश्वर को जानना परमेश्वर के वास्तविक कर्मों और वास्तविक चेहरे को देखना आवश्यक बनाता है। दोनों को सिर्फ परमेश्वर के देहधारी देह के द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है, और दोनों को सिर्फ साधारण और वास्तविक देह के द्वारा ही पूरा किया जा सकता है। इसीलिए देहधारण ज़रूरी है, और इसीलिए संपूर्ण भ्रष्ट मनुष्यजाति को इसकी आवश्यकता है। चूँकि लोगों से अपेक्षा की जाती है कि वे परमेश्वर को जानें, इसलिए अस्पष्ट और अलौकिक परमेश्वरों की छवियों को उनके हृदयों से दूर अवश्य हटाया जाना चाहिए, और चूँकि उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे अपने भ्रष्ट स्वभाव को दूर करें, इसलिए उन्हें पहले अपने भ्रष्ट स्वभाव को अवश्य पहचानना चाहिए। यदि केवल मनुष्य लोगों के हृदयों से अस्पष्ट परमेश्वरों की छवियों को हटाने का कार्य करता है, तो वह उपयुक्त प्रभाव प्राप्त करने में असफल हो जाएगा। लोगों के हृदयों से अस्पष्ट परमेश्वर की छवियों को केवल वचनों से उजागर, दूर किया, या पूरी तरह से निकाला नहीं जा सकता है। ऐसा करके, अंततः गहराई से जड़ जमाई हुई इन चीज़ों को लोगों से हटाना तब भी संभव नहीं होगा। केवल व्यावहारिक परमेश्वर और परमेश्वर की सच्ची छवि ही इन अस्पष्ट और अलौकिक चीज़ों का स्थान ले सकती है ताकि लोगों को धीरे-धीरे उन्हें जानने दिया जाए, और केवल इसी तरीके से उस उचित प्रभाव प्राप्त किया जा सकता है। मनुष्य एहसास करता है कि जिस परमेश्वर को वह पिछले समयों में खोजता था वह अस्पष्ट और अलौकिक है। जो इस प्रभाव को प्राप्त कर सकता है वह पवित्रात्मा की प्रत्यक्ष अगुवाई नहीं है, किसी निश्चित व्यक्ति की शिक्षाएँ तो बिलकुल भी नहीं, बल्कि देहधारी परमेश्वर की शिक्षाएँ हैं। मनुष्य की धारणाएँ तब प्रकट हो जाती हैं जब देहधारी परमेश्वर आधिकारिक रूप से अपना कार्य करता है, क्योंकि देहधारी परमेश्वर की साधारणता और वास्तविकता मनुष्य की कल्पना में अस्पष्ट एवं अलौकिक परमेश्वर के विपरीत है। मनुष्य की मूल धारणाओं को केवल देहधारी परमेश्वर से उनके वैषम्य के माध्यम से ही प्रकट किया जा सकता है। देहधारी परमेश्वर से तुलना के बिना, मनुष्य की धारणाओं को प्रकट नहीं किया जा सकता था; दूसरे शब्दों में, वास्तविकता के वैषम्य के बिना अस्पष्ट चीज़ों को प्रकट नहीं किया जा सकता था। इस कार्य को करने के लिए कोई भी वचनों का उपयोग करने में सक्षम नहीं है, और कोई भी वचनों का उपयोग करके इस कार्य को स्पष्टता से व्यक्त करने में सक्षम नहीं है। केवल स्वयं परमेश्वर ही अपना स्वयं का कार्य कर सकता है, और कोई अन्य उसकी ओर से इस कार्य को नहीं कर सकता है। भले ही मनुष्य की भाषा कितनी ही समृद्ध क्यों न हो, वह परमेश्वर की वास्तविकता और साधारणता को स्पष्टता से व्यक्त करने में असमर्थ है। यदि परमेश्वर व्यक्तिगत रूप से मनुष्य के बीच कार्य करे और अपनी छवि और अपने अस्तित्व को पूरी तरह से प्रकट करे, केवल तभी मनुष्य और अधिक व्यावहारिकता से परमेश्वर को जान सकता है, और केवल तभी उसे और अधिक स्पष्टता से देख सकता है। यह प्रभाव किसी भी हाड़-माँस वाले मनुष्य के द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता है। ...इसलिए, भ्रष्ट मनुष्यजाति को देहधारी परमेश्वर के उद्धार की और अधिक आवश्यकता है, और उसे देहधारी परमेश्वर के प्रत्यक्ष कार्य की और अधिक आवश्यकता है। मनुष्यजाति को आवश्यकता है कि देहधारी परमेश्वर उसकी चरवाही करे, उसका भरण पोषण करे, उसकी सिंचाई करे, उसका पोषण करे, उसका न्याय करे और उसे ताड़ना दे, और उसे देहधारी परमेश्वर से और अधिक अनुग्रह तथा और बड़े छुटकारे की आवश्यकता है। केवल देह में प्रकट परमेश्वर ही मनुष्य का विश्वासपात्र, मनुष्य का चरवाहा, मनुष्य की वास्तविक विद्यमान सहायता बन सकता है, और यह सब आज और बीते समयों में देहधारण की आवश्यकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "भ्रष्ट मनुष्यजाति को देहधारी परमेश्वर के उद्धार की अधिक आवश्यकता है" से उद्धृत

यह निश्चित रूप से इसलिए है क्योंकि शैतान ने मनुष्य की देह को भ्रष्ट कर दिया है, और मनुष्य ही वह प्राणी है जिसे परमेश्वर बचाने का इरादा करता है, यह कि परमेश्वर को शैतान के साथ युद्ध करने और व्यक्तिगत रूप से मनुष्य की चरवाही करने के लिए देह धारण अवश्य करना चाहिए। केवल यही उसके कार्य के लिए फायदेमंद है। शैतान को हराने के लिए परमेश्वर के दो देहधारी देह अस्तित्व में रहे हैं, और मनुष्य को बेहतर ढंग से बचाने के लिए भी अस्तित्व में रहे हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि वह जो शैतान के साथ युद्ध कर रहा है वह केवल परमेश्वर ही हो सकता है, चाहे वह परमेश्वर का आत्मा हो या परमेश्वर का देहधारी देह। संक्षेप में, वह जो शैतान के साथ युद्ध कर रहा है वे स्वर्गदूत नहीं हो सकते हैं, मनुष्य तो बिलकुल नहीं हो सकता है जिसे शैतान के द्वारा भ्रष्ट किया जा चुका है। ऐसा करने में स्वर्गदूत निर्बल हैं, और मनुष्य तो और भी अधिक अशक्त है। वैसे तो, यदि परमेश्वर मनुष्य के जीवन पर कार्य करना चाहता है, यदि वह व्यक्तिगत रूप में पृथ्वी पर आकर मनुष्य पर कार्य करना चाहता है, तो उसे व्यक्तिगत रूप से देह धारण करना होगा, अर्थात्, उसे व्यक्तिगत रूप से देह को पहनना होगा, और अपनी अंतर्निहित पहचान तथा उस कार्य के साथ जिसे उसे अवश्य करना चाहिए, मनुष्य के बीच आना होगा और व्यक्तिगत रूप से मनुष्य को बचाना होगा। यदि नहीं तो, यदि यह परमेश्वर का आत्मा या मनुष्य होता जिसने इस कार्य को किया था, तो यह युद्ध अपने प्रभावों को प्राप्त करने में हमेशा के लिए असफल हो जाता, और कभी समाप्त नहीं होता। जब परमेश्वर मनुष्य के बीच व्यक्तिगत रूप से शैतान के साथ युद्ध करने के लिए देह बनता है केवल तभी मनुष्य के पास उद्धार का एक अवसर होता है। इसके अतिरिक्त, केवल तभी शैतान लज्जित होता है, और निष्पादित करने के लिए उसके पास कोई अवसर या कोई योजना नहीं बचती है। देहधारी परमेश्वर के द्वारा किया गया कार्य परमेश्वर के आत्मा के द्वारा अप्राप्य है, और किसी दैहिक मनुष्य के द्वारा परमेश्वर की ओर से इसे किया जाना तो और भी अधिक असमर्थ है, क्योंकि जिस कार्य को वह करता है वह मनुष्य के जीवन के वास्ते है, और मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव को बदलने के लिए है। यदि मनुष्य इस युद्ध में भाग लेता, तो वह खस्ताहाल अवस्था में भाग जाता, और मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव को बदलने में बस असमर्थ होता। वह सलीब से मनुष्य को बचाने में, या संपूर्ण विद्रोही मनुष्यजाति पर विजय प्राप्त करने में असमर्थ होता, लेकिन सिद्धान्त के अनुसार थोड़ा सा पुराना कार्य करने में सक्षम होता, या कोई और कार्य करने में सक्षम होता जो शैतान की पराजय से असम्बद्ध हो। तो क्यों परेशान होना? उस कार्य का क्या महत्व है जो मनुष्यजाति को प्राप्त न कर सकता हो, और शैतान को तो बिलकुल पराजित न कर सकता हो? और इसलिए, शैतान के साथ युद्ध केवल स्वयं परमेश्वर के द्वारा ही कार्यान्वित किया जा सकता है, और इसे मनुष्य के द्वारा किया जाना पूरी तरह से असंभव है। मनुष्य का कर्तव्य-आज्ञा पालन करना और अनुसरण करना है, क्योंकि मनुष्य नए युग की शुरुआत करने का कार्य करने में असमर्थ है, इसके अतिरिक्त, न ही वह शैतान के साथ युद्ध करने का कार्य कार्यान्वित कर सकता है। मनुष्य केवल स्वयं परमेश्वर की अगुआई के तहत ही सृजनकर्ता को संतुष्ट कर सकता है, जिसके माध्यम से शैतान पराजित होता है; केवल यही वह एकमात्र कार्य है जो मनुष्य कर सकता है। और इसलिए, हर बार जब एक नया युद्ध आरम्भ होता है, कहने का तात्पर्य है कि, हर बार जब नए युग का कार्य शुरू होता है, तो इस कार्य को स्वयं परमेश्वर के द्वारा व्यक्तिगत रूप से किया जाता है, जिसके माध्यम से वह सम्पूर्ण युग की अगुवाई करता है, और सम्पूर्ण मनुष्यजाति के लिए एक नया मार्ग प्रशस्त करता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "मनुष्य के सामान्य जीवन को पुनःस्थापित करना और उसे एक अद्भुत मंज़िल पर ले जाना" से उद्धृत

परमेश्वर की सम्पूर्ण प्रबंधन योजना के कार्य को व्यक्तिगत रूप से स्वयं परमेश्वर के द्वारा किया जाता है। प्रथम चरण—संसार के सृजन के बाद व्यवस्था के युग का कार्य—परमेश्वर के द्वारा व्यक्तिगत रूप से किया गया था। व्यवस्था की घोषणा करने के लिए परमेश्वर ने मूसा का उपयोग किया था। सम्पूर्ण मनुष्यजाति के छुटकारे का दूसरा चरण भी देहधारी परमेश्वर के द्वारा कार्यान्वित किया गया था; परमेश्वर के देह बनने के अलावा, कोई भी ऐसा करने के योग्य नहीं होगा। तीसरा चरण स्पष्ट है: परमेश्वर के सम्पूर्ण कार्य के अन्त को स्वयं परमेश्वर के द्वारा किये जाने की और भी अधिक आवश्यकता है। सम्पूर्ण मनुष्यजाति के छुटकारे, उस पर विजय पाने, उसे प्राप्त करने, और सिद्ध बनाने के समस्त कार्य को स्वयं परमेश्वर के द्वारा व्यक्तिगत रूप से कार्यान्वित किया जाता है। यदि वह व्यक्तिगत रूप से इस कार्य को नहीं करता, तो उसकी पहचान को मनुष्य के द्वारा दर्शाया नहीं जा सकता था, या उसके कार्य को मनुष्य के द्वारा नहीं किया जा सकता था। शैतान को हराने, मनुष्यजाति को प्राप्त करने, और मनुष्य को पृथ्वी पर एक सामान्य जीवन प्रदान करने के लिए, वह व्यक्तिगत रूप से मनुष्य की अगुवाई करता है और मनुष्यों के बीच कार्य करता है; अपनी सम्पूर्ण प्रबधंकीय योजना के वास्ते, और अपने सम्पूर्ण कार्य के लिए, उसे व्यक्तिगत रूप से इस कार्य को अवश्य करना चाहिए। यदि मनुष्य केवल यह विश्वास करता है कि परमेश्वर उसके द्वारा देखे जाने और उसे खुश करने के लिए आया था, तो ऐसे विश्वास का कोई मूल्य नहीं है, और उनका कोई महत्व नहीं है। मनुष्य का ज्ञान बहुत ही सतही है! केवल इसे स्वयं कार्यान्वित करने के द्वारा ही परमेश्वर इस कार्य को अच्छी तरह से और पूरी तरह से कर सकता है। मनुष्य इसे परमेश्वर की ओर से करने में असमर्थ है। चूँकि उसके पास परमेश्वर की पहचान या उसका सार नहीं है, इसलिए वह उसके कार्य को करने में असमर्थ है, और भले ही मनुष्य इसे करता, तब भी इसका कोई प्रभाव नहीं होता। पहली बार जब परमेश्वर ने देहधारण किया था तो वह छुटकारे के वास्ते था, संपूर्ण मनुष्यजाति को पाप से छुटकारा देने के लिए था, मनुष्य को शुद्ध किये जाने और उसे उसके पापों से क्षमा किये जाने में सक्षम बनाने के लिए था। विजय का कार्य भी परमेश्वर के द्वारा व्यक्तिगत रूप से मनुष्य के बीच किया जाता है। इस चरण के दौरान, यदि परमेश्वर को केवल भविष्यवाणी ही करनी होती, तो किसी भविष्यवक्ता या किसी प्रतिभाशाली व्यक्ति को उसका स्थान लेने के लिए ढूँढा जा सकता था; यदि केवल भविष्यवाणी ही कही जाती, तो मनुष्य परमेश्वर की जगह ले सकता था। फिर भी यदि स्वयं परमेश्वर के कार्य को मनुष्य को व्यक्तिगत रूप से करना होता और मनुष्य के जीवन का कार्य करना होता, तो उसके लिए इस कार्य को करना असंभव होता। इसे व्यक्तिगत रूप से स्वयं परमेश्वर के द्वारा अवश्य किया जाना चाहिए: इस कार्य को करने के लिए परमेश्वर को व्यक्तिगत रूप से देह अवश्य बनना चाहिए। वचन के युग में, यदि केवल भविष्यवाणी ही कही जाती, तो इस कार्य को करने के लिए यशायाह या एलिय्याह भविष्यद्वक्ता को ढूँढा जा सकता था, और इसे व्यक्तिगत रूप से करने के लिए स्वयं परमेश्वर की कोई आवश्यकता नहीं होती। क्योंकि इस चरण में किया गया कार्य मात्र भविष्यवाणी कहना नहीं है, और क्योंकि इस बात का अत्यधिक महत्व है कि वचनों के कार्य का उपयोग मनुष्य पर विजय पाने और शैतान को पराजित करने के लिए किया जाता है, इसलिए इस कार्य को मनुष्य के द्वारा नहीं किया जा सकता है, और इसे स्वयं परमेश्वर के द्वारा व्यक्तिगत रूप से अवश्य किया जाना चाहिए। व्यवस्था के युग में यहोवा ने परमेश्वर के कार्य के एक भाग को किया था, जिसके पश्चात् उसने कुछ वचनों को कहा और भविष्यवक्ताओं के जरिए कुछ कार्य किया। ऐसा इसलिए है क्योंकि मनुष्य यहोवा के कार्य के लिए उसके बदले में स्थान ले सकता था, और भविष्यद्रष्टा उसकी ओर से चीज़ों को पहले ही बता सकते थे और कुछ स्वप्नों की व्याख्या कर सकते थे। आरम्भ में किया गया कार्य सीधे तौर पर मनुष्य के स्वभाव को परिवर्तित करने का कार्य नहीं था, और मनुष्य के पाप से सम्बन्धित नहीं था, और मनुष्य से सिर्फ व्यवस्था का पालन करने की अपेक्षा की गई थी। अतः यहोवा देह नहीं बना और उसने स्वयं को मनुष्य पर प्रकट नहीं किया; इसके बजाय उसने मूसा और अन्य लोगों से सीधे बातचीत की, तथा उनसे बुलवाया और अपने स्थान पर कार्य करवाया, और उनसे मनुष्यजाति के बीच सीधे तौर पर कार्य करवाया। परमेश्वर के कार्य का पहला चरण मनुष्य की अगुआई का था। यह शैतान के साथ युद्ध का आरम्भ था, किन्तु यह युद्ध अभी तक आधिकारिक रूप से शुरू नहीं हुआ था। परमेश्वर के प्रथम देहधारण के साथ ही शैतान के साथ आधिकारिक युद्ध का आरम्भ हुआ, और यह आज के दिन तक निरन्तर जारी है। इस युद्ध का पहला उदाहरण तब था जब देहधारी परमेश्वर को सलीब पर कीलों से जड़ दिया गया था। देहधारी परमेश्वर के सलीब पर चढ़ाये जाने ने शैतान को पराजित कर दिया, और यह युद्ध में प्रथम सफल चरण था। जब देहधारी परमेश्वर ने मनुष्य के जीवन का कार्य करना आरम्भ किया, तो यह मनुष्य को पुनः प्राप्त करने के कार्य की आधिकारिक शुरुआत थी, और क्योंकि यह मनुष्य के पुराने स्वभाव को परिवर्तित करने का कार्य है, इसलिए यह शैतान के साथ युद्ध करने का कार्य है। आरम्भ में यहोवा के द्वारा किये गये कार्य का यह चरण मात्र पृथ्वी पर मनुष्य के जीवन की अगुआई था। यह परमेश्वर के कार्य का आरम्भ था, और हालाँकि इसमें अब तक किसी युद्ध, या किसी बड़े कार्य को शामिल नहीं गया था, फिर भी इसने उस आने वाले युद्ध के कार्य की नींव डाली थी। बाद में, अनुग्रह के युग के दौरान दूसरे चरण के कार्य में मनुष्य के पुराने स्वभाव को परिवर्तित करना शामिल था, जिसका अर्थ है कि स्वयं परमेश्वर ने मनुष्य के जीवन को गढ़ा था। इसे परमेश्वर के द्वारा व्यक्तिगत रूप से किया जाना था: इसमें अपेक्षित था कि परमेश्वर व्यक्तिगत रूप से देह बन जाए, और यदि वह देह नहीं बनता, तो कार्य के इस चरण में कोई अन्य उसका स्थान नहीं ले सकता था, क्योंकि यह शैतान के साथ सीधी लड़ाई के कार्य को दर्शाता था। यदि मनुष्य ने परमेश्वर की ओर से यह कार्य किया होता, तो जब मनुष्य शैतान के सामने खड़ा होता, तो शैतान ने समर्पण नहीं किया होता और उसे हराना असंभव हो गया होता। देहधारी परमेश्वर को ही उसे हराने के लिए आना था, क्योंकि देहधारी परमेश्वर का सार तब भी परमेश्वर है, वह तब भी मानव का जीवन है, और तब भी सृजनकर्ता है; जो भी हो, उसकी पहचान और सार नहीं बदलेगा। और इसलिए, उसने शैतान से सम्पूर्ण समर्पण करवाने के लिए देह को पहना और कार्य किया। अंत के दिनों के कार्य के चरण के दौरान, यदि मनुष्य को यह कार्य करना होता और उससे सीधे तौर पर वचनों को बुलवाया जाता, तो वह उन्हें बोलने में असमर्थ होता, और यदि भविष्यवाणी कही जाती, तो यह मनुष्य पर विजय पाने में असमर्थ होती। देह ग्रहण करने के द्वारा, परमेश्वर शैतान को हराने और उससे सम्पूर्ण समर्पण करवाने के लिए आता है। जब वह शैतान को पूरी तरह से पराजित कर लेगा, पूरी तरह से मनुष्य पर विजय पा लेगा, और मनुष्य को पूरी तरह से प्राप्त कर लेगा, तो कार्य का यह चरण पूरा हो जाएगा, और सफलता प्राप्त कर ली जाएगी। परमेश्वर के प्रबधंन में, मनुष्य परमेश्वर का स्थान नहीं ले सकता है। विशेष रूप से, युग की अगुवाई करने और नए कार्य को आरम्भ करने के कार्य को स्वयं परमेश्वर के द्वारा व्यक्तिगत रूप से किये जाने की और भी अधिक आवश्यकता है। मनुष्य को प्रकाशन देना और उसे भविष्यवाणी प्रदान करना मनुष्य के द्वारा किया जा सकता है, किन्तु यदि यह ऐसा कार्य है जिसे व्यक्तिगत रूप से परमेश्वर के द्वारा अवश्य किया जाना चाहिए, अर्थात् स्वयं परमेश्वर और शैतान के बीच युद्ध का कार्य, तो इस कार्य को मनुष्य के द्वारा नहीं किया जा सकता है। कार्य के प्रथम चरण के दौरान, जब शैतान के साथ कोई युद्ध नहीं था, तब यहोवा ने भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा बोली गई भविष्यवाणियों का उपयोग करके व्यक्तिगत रूप से इस्राएल के लोगों की अगुवाई की थी। उसके बाद, कार्य का दूसरा चरण शैतान के साथ युद्ध था, और स्वयं परमेश्वर व्यक्तिगत रूप से देह बन गया, और इस कार्य को करने के लिए देह में आया था। कोई भी चीज़ जो शैतान के साथ युद्ध को शामिल करती है वह परमेश्वर के देहधारण को भी शामिल करती है, जिसका अर्थ है कि इस युद्ध को मनुष्य के द्वारा नहीं लड़ा जा सकता है। यदि मनुष्य को युद्ध करना पड़ता, तो वह शैतान को पराजित करने में असमर्थ होता। उसके पास उसके विरुद्ध लड़ने की ताक़त कैसे हो सकती है जबकि वह अभी भी उसके अधिकार क्षेत्र के अधीन है? मनुष्य बीच में है: यदि तुम शैतान की ओर झुकते हो तो तुम शैतान से संबंधित हो, किन्तु यदि तुम परमेश्वर को संतुष्ट करते हैं तो तुम परमेश्वर से संबंधित हो। यदि इस युद्ध के कार्य में मनुष्य को परमेश्वर का स्थान लेना होता, तो क्या वह युद्ध कर पाता? यदि वह युद्ध करता, तो क्या वह बहुत पहले ही नष्ट नहीं हो गया होता? क्या वह बहुत पहले ही नरक में नहीं समा गया होता? और इसलिए, परमेश्वर के कार्य में मनुष्य उसका स्थान लेने में अक्षम है, कहने का तात्पर्य है कि मनुष्य के पास परमेश्वर का सार नहीं है, और यदि तुम शैतान के साथ युद्ध करते तो तुम उसे पराजित करने में अक्षम होते। मनुष्य केवल कुछ कार्य ही कर सकता है; वह कुछ लोगों को जीत सकता है, किन्तु वह स्वयं परमेश्वर के कार्य में परमेश्वर का स्थान नहीं ले सकता है। मनुष्य शैतान के साथ युद्ध कैसे कर सकता है? इससे पहले कि तुम शुरुआत करते शैतान तुम्हें बन्दी बना लेता। केवल जब स्वयं परमेश्वर ही शैतान के साथ युद्ध करता है और मनुष्य परमेश्वर का अनुसरण और आज्ञापालन करता है तो इस आधार पर मनुष्य को परमेश्वर के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है और वह शैतान के बन्धनों से बचकर निकल सकता है। जो कुछ मनुष्य अपनी स्वयं की बुद्धि और योग्यताओं से प्राप्त कर सकता है वह बहुत ही सीमित होता है; वह मनुष्य को पूर्ण बनाने, उसकी अगुवाई करने, और, इसके अतिरिक्त, शैतान को हराने में असमर्थ है। मनुष्य की प्रतिभा और बुद्धि शैतान की युक्तियों को नाकाम करने में असमर्थ हैं, इसलिए मनुष्य किस प्रकार उसके साथ युद्ध कर सकता है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "मनुष्य के सामान्य जीवन को पुनःस्थापित करना और उसे एक अद्भुत मंज़िल पर ले जाना" से उद्धृत

पिछला:देहधारी परमेश्वर के कार्य और आत्मा के कार्य के बीच क्या अंतर है?

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