सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया का ऐप

परमेश्वर की आवाज़ सुनें और प्रभु यीशु की वापसी का स्वागत करें!

सत्य को खोजने वाले सभी लोगों का हम से सम्पर्क करने का स्वागत करते हैं

अंत के दिनों के मसीह के लिए गवाहियाँ

ठोस रंग

विषय-वस्तुएँ

फॉन्ट

फॉन्ट का आकार

लाइन स्पेस

पृष्ठ की चौड़ाई

0 खोज परिणाम

कोई परिणाम नहीं मिला

I. परमेश्वर के देहधारण से सम्बंधित सत्य

8. यह कैसे समझें कि मसीह सत्य, मार्ग और जीवन है?

संदर्भ के लिए बाइबल के पद:

"आदि में वचन था, और वचन परमेश्‍वर के साथ था, और वचन परमेश्‍वर था। यही आदि में परमेश्‍वर के साथ था" (यूहन्ना 1:1-2)।

"और वचन देहधारी हुआ; और अनुग्रह और सच्‍चाई से परिपूर्ण होकर हमारे बीच में डेरा किया" (यूहन्ना 1:14)।

"मार्ग और सत्य और जीवन मैं ही हूँ; बिना मेरे द्वारा कोई पिता के पास नहीं पहुँच सकता" (यूहन्ना 14:6)।

"जो बातें मैं ने तुम से कही हैं वे आत्मा हैं, और जीवन भी हैं" (यूहन्ना 6:63)।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

सत्य मानव के संसार से आता है, फिर भी वह सत्य जो मनुष्य के मध्य है उसे मसीह के द्वारा पहुंचाया गया है। इसका उद्गम मसीह से होता है, अर्थात्, स्वयं परमेश्वर से, और इसे मनुष्य के द्वारा अर्जित नहीं किया जा सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "सफलता या असफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है" से उद्धृत

"आदि में वचन था, और वचन परमेश्वर के साथ था, और वचन परमेश्वर था, और वचन देहधारी हुआ।" यह (वचन के देह में प्रकट होने का कार्य) वह कार्य है, जिसे परमेश्वर अंत के दिनों में संपन्न करेगा, और उसकी संपूर्ण प्रबंधन योजना का अंतिम अध्याय है, और इसलिए परमेश्वर को पृथ्वी पर आकर अपने वचनों को देह में प्रकट करना ही है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर के वचन के द्वारा सब कुछ प्राप्त हो जाता है" से उद्धृत

इस बार, परमेश्वर कार्य करने आत्मिक देह में नहीं, बल्कि एकदम साधारण देह में आया है। यह न केवल परमेश्वर के दूसरी बार देहधारण की देह है, बल्कि यह वही देह है जिसमें वह लौटकर आया है। यह बिलकुल साधारण देह है। इस देह में दूसरों से अलग कुछ भी नहीं है, परंतु तुम उससे वह सत्य ग्रहण कर सकते हो जिसके विषय में तुमने पहले कभी नहीं सुना होगा। यह तुच्छ देह, परमेश्वर के सभी सत्य-वचन का मूर्त रूप है, जो अंत के दिनों में परमेश्वर का काम करती है, और मनुष्यों के जानने के लिये यही परमेश्वर के संपूर्ण स्वभाव की अभिव्यक्ति है। क्या तुमने परमेश्वर को स्वर्ग में देखने की प्रबल अभिलाषा नहीं की? क्या तुमने स्वर्ग में परमेश्वर को समझने की प्रबल अभिलाषा नहीं की? क्या तुमने मनुष्यजाति के गंतव्य को जानने या समझने की प्रबल अभिलाषा नहीं की? वह तुम्हें वो सभी अकल्पनीय रहस्य बतायेगा, जो कभी कोई इंसान नहीं बता सका, और तुम्हें वो सत्य भी बतायेगा जिन्हें तुम नहीं समझते। वह परमेश्वर के राज्य में तुम्हारे लिये द्वार है, नये युग में तुम्हारा मार्गदर्शक है, ऐसा साधारण देह असीम, अथाह रहस्यों को समेटे हुये है। संभव है कि उसके कार्यों को तुम समझ न पाओ, परंतु उसके सभी कामों का लक्ष्य, तुम्हें इतना बताने के लिये पर्याप्त है कि वह कोई साधारण देह नहीं है, जैसा लोग मानते हैं। क्योंकि वह परमेश्वर की इच्छा का प्रतिनिधित्व करता है, साथ ही साथ अंत के दिनों में मानवजाति के प्रति परमेश्वर की परवाह को भी दर्शाता है। यद्यपि तुम उसके द्वारा बोले गये उन वचनों को नहीं सुन सकते, जो आकाश और पृथ्वी को कंपाते से लगते हैं, या उसकी ज्वाला-सी धधकती आंखों को नहीं देख सकते, और यद्यपि तुम उसके लौह दण्ड के अनुशासन का अनुभव नहीं कर सकते, तुम उसके वचनों में परमेश्वर के क्रोध को सुन सकते हो, और जान सकते हो कि परमेश्वर समस्त मानवजाति पर दया दिखाता है; तुम परमेश्वर के धार्मिकतायुक्त स्वभाव और उसकी बुद्धि को समझ सकते हो, और इसके अलावा, समस्त मानवजाति के लिये परमेश्वर की चिंता और परवाह को समझ सकते हो। अंत के दिनों में परमेश्वर के काम का उद्देश्य स्वर्ग के परमेश्वर को मनुष्यों के बीच पृथ्वी पर रहते हुए दिखाना है, और मनुष्यों को इस योग्य बनाना है कि वे परमेश्वर की आज्ञा मानें, आदर करें, और परमेश्वर से प्रेम करना जानें। यही कारण है कि वह देह में लौटकर आया है। ...

... आज जो कुछ तुम लोगों के पास है वह इसी देह के कारण है। क्योंकि परमेश्वर इस देह में है इसीलिए तुम सब जीवित हो यह उत्तम भविष्य या भाग्य जो तुम सबने पाया है, वह इस साधारण मनुष्य के कारण है। न केवल इतना, बल्कि अंत में समस्त जातियाँ इस साधारण मनुष्य की उपासना करेंगी साथ ही साथ धन्यवाद देंगी और इस मामूली से व्यक्ति की आज्ञा का पालन करेंगी। क्योंकि इसी ने समस्त मानवजाति का उद्धार करने के लिये सत्य, जीवन और मार्ग दिया है, परमेश्वर और मनुष्यों के बीच के संघर्ष को शांत किया है, परमेश्वर और मनुष्यों को निकट ले आया है, और उनके बीच विचारों का संचार किया है। इसी ने परमेश्वर को और अधिक महान महिमा प्रदान की है, क्या ऐसा साधारण व्यक्ति तुम्हारे विश्वास और श्रद्धा के योग्य नहीं है? क्या यह साधारण देह, मसीह कहलाने के उपयुक्त नहीं है? क्या ऐसा साधारण मनुष्य मनुष्यों के बीच परमेश्वर की अभिव्यक्ति नहीं हो सकता? क्या ऐसा व्यक्ति जो संकट में मानवजाति की सहायता करता है, वह तुम लोगों के प्रेम और अवलंबन के योग्य नहीं हो सकता? यदि तुम सब उसके मुख से निकले सत्य को नकारो, और तुम लोग अपने बीच में उसके अस्तित्व को अप्रिय जानो, तब तुम सबकी नियति क्या होगी?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "क्या तुम जानते हो? परमेश्वर ने मनुष्यों के बीच एक बहुत बड़ा काम किया है" से उद्धृत

और तब भी यही वह साधारण मनुष्य है जो लोगों के बीच में छुपा हुआ है, जो हमें बचाने के नये काम को कर रहा है। वह हमें कोई सफाई नहीं देता, और न यह बताता है कि वह क्यों आया है। वह केवल उस काम को करता है जिसे वह नपे-तुले चरणों में, और अपनी योजना के अनुसार, करने का इरादा रखता है। उसके वचन और कथन अब बार-बार सुनाई देते हैं। सांत्वना देने, उत्साह बढ़ाने, स्मरण कराने, चेतावनी देने, से लेकर डाँटने-फटकारने, और अनुशासित करने तक; ऐसे स्वर जो नरम और दयालु हैं से ले कर, ऐसे वचनों तक जो भयंकर और प्रतापी हैं—वे सब मनुष्य में तरस और कँपकँपी दोनों भरते हैं। उसकी हर बात हमारे अंदर गहरे छिपे रहस्यों पर सीधे चोट करती है, उसके वचन हमारे हृदयों में डंक मारते हैं, हमारी आत्माओं पर डंक मारते हैं, हमें लज्जित और अपमानित कर देते हैं, हम सोच नहीं पाते कि कहाँ मुँह छिपाएँ। ...

हमारी जानकारी के बिना, इस महत्वहीन व्यक्ति ने, परमेश्वर के कार्य में हर कदम पर हमारी अगुवाई की है। हम अनगिनत परीक्षणों से गुजरते हैं, अनगिनत ताड़नाएँ सहते हैं और मृत्यु द्वारा हमारी परीक्षा ली जाती है। हम परमेश्वर के धार्मिक और प्रतापी स्वभाव के बारे में समझ हासिल करते हैं, उसके प्रेम और करुणा का आनंद लेते हैं; परमेश्वर के महान सामर्थ्य और विवेक की सराहना करते हैं, परमेश्वर की सुंदरता के गवाह बनते हैं, और मनुष्य को बचाने की परमेश्वर की उत्कट इच्छा को देखते हैं। इस साधारण मनुष्य के वचनों में, हमें परमेश्वर का स्वभाव और सार ज्ञात हो जाता है; परमेश्वर की इच्छा समझ जाते हैं, हमें मनुष्य की प्रकृति और उसका सार ज्ञात हो जाता है, हम उद्धार और पूर्ण होने का मार्ग जान जाते हैं। उसके वचन हमारी मृत्यु का कारण बनते हैं, और हमारे पुनर्जन्म का कारण भी बनते हैं; उसके वचन हमें दिलासा देते हैं, मगर हमें ग्लानि और कृतज्ञता की भावना के साथ बर्बाद भी कर देते हैं; उसके वचन हमें आनंद और शांति देते हैं, परंतु अपार पीड़ा भी देते हैं। कभी-कभी हम उसके हाथों में वध हेतु मेम्नों के समान होते हैं, कभी-कभी उसकी आँख के तारे के समान होते हैं, और उसके प्रेम एवं स्नेह का आनंद उठाते हैं; कभी-कभी हम उसके शत्रु के समान होते हैं, उसकी आँखों के क्रोध से भस्म हो जाते हैं। हम उसके द्वारा बचायी गई मानवजाति हैं, हम उसकी दृष्टि में भुनगे हैं, और हम खोई हुई भेड़ें हैं जिन्हें ढूँढने में वह दिन और रात लगा रहता है। वह हम पर दया करता है, वह हमसे नफ़रत करता है, वह हमें ऊपर उठाता है, वह हमें दिलासा देता है और प्रोत्साहित करता है, वह हमारा मार्गदर्शन करता है, वह हमें प्रबुद्ध करता है, वह हमें ताड़ना देता है और हमें अनुशासित करता है, और वह हमें श्राप भी देता है। वह रात-दिन हमारी चिंता करता है, वह रात-दिन हमारी सुरक्षा और परवाह करता है, वह हमारा साथ कभी नहीं छोड़ता, और वह देखभाल हमारे लिए अपने हृदय का रक्त बहा देता है और कोई भी कीमत चुकाता है। इस छोटी और साधारण-सी देह के वचनों में, हमने परमेश्वर की संपूर्णता का आनंद लिया है, और उस मंजिल को देखा है जो परमेश्वर ने हमें प्रदान की है। ...

परमेश्वर के कथन लगातार चल रहे हैं और वह विभिन्न तरीकों और परिप्रेक्ष्यों का उपयोग करके हमें चेतावनी देता है कि हम क्या करें, साथ ही अपने हृदय की वाणी को भी व्यक्त करता है। उसके वचनों में जीवन की सामर्थ्य है, उसके वचन हमें वह मार्ग दिखाते हैं जिन पर हमें चलना चाहिए, और हमें समझाते हैं कि सत्य क्या है। हम उसके वचनों की ओर खिंचना शुरू कर देते हैं, हम उसके लहजे और तरीके पर ध्यान केंद्रित करने लगते हैं और अवचेतन मन में इस साधारण व्यक्ति के हृदय की वाणी में रुचि लेना आरंभ कर देते हैं। हमारी मंज़िल और उद्धार के लिए, वह हमारे लिए श्रमसाध्य प्रयास करता है, नींद और भोजन गँवा देता है, हमारे लिए रोता है, हमारे लिए आहें भरता है, हमारे लिए बीमारी में कराहता है, अपमान सहता है, और हमारी संवेदनहीनता और विद्रोहीपन के कारण उसका हृदय लहूलुहान होता है और आँसू बहाता है; उसका यह व्यक्तित्व और तरीका एक साधारण मनुष्य से बढ़ कर है, और कोई भी भ्रष्ट मनुष्य उन्हें धारण कर या पा नहीं सकता है। उसमें जो सहनशीलता और धैर्य है, वह किसी साधारण मनुष्य में नहीं हो सकता, और उसके जैसा प्रेम भी किसी सृजित प्राणी में नहीं हो सकता। उसके अलावा अन्य कोई भी हमारे विचारों को नहीं जान सकता, या हमारे स्वभाव और सार को नहीं समझ सकता, या मानवजाति के विद्रोहीपन और भ्रष्टता का न्याय नहीं कर सकता, या इस तरह से स्वर्ग के परमेश्वर की ओर से हमसे बातचीत या हमारे बीच में कार्य नहीं कर सकता। उसके अलावा अन्य किसी में परमेश्वर का अधिकार, विवेक और प्रतिष्ठा नहीं है; उसमें परमेश्वर का स्वभाव और उसके पास क्या है और जो वह है, अपनी संपूर्णता में, प्रवाहित होते हैं। उसके अलावा अन्य कोई हमें मार्ग नहीं दिखा सकता या प्रकाश की ओर नहीं ले जा सकता। उसके अलावा कोई अन्य परमेश्वर के उन रहस्यों को प्रकट नहीं कर सकता जिन्हें परमेश्वर ने सृष्टि के आरंभ से अब तक प्रकट नहीं किया है। उसके अलावा कोई अन्य हमें शैतान के बंधन और हमारे भ्रष्ट स्वभाव से बचा नहीं सकता। वह परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करता है और परमेश्वर के हृदय की वाणी, परमेश्वर के सभी प्रोत्साहनों, और मनुष्यजाति के प्रति परमेश्वर के न्याय के सभी वचनों को व्यक्त करता है। उसने एक नया युग, एक नया काल आरंभ किया है, वह एक नया स्वर्ग और पृथ्वी, नया काम लाया है, वह हमारे लिए नई आशा लाया है, हमारे उस जीवन का अंत किया है जिसे हम अस्पष्टता में जी रहे थे, और हमें उद्धार के मार्ग को पूरी स्पष्टता से दिखाया है। उसने हमारे संपूर्ण व्यक्तित्व को जीता है, हमारे हृदयों को जीता है। उस क्षण से, हमारे मन सचेत हो गए हैं, और हमारी आत्माएँ पुर्नजीवित होती हुई प्रतीत होने लगी हैं: यह साधारण, महत्वहीन व्यक्ति, जो हमारे बीच में रहता है, जिसे हमने लंबे समय तक तिरस्कृत किया है—क्या वह प्रभु यीशु नहीं हैं; जो सोते-जागते हमारे विचारों में रहता है और जिसके लिए हम रात-दिन लालायित रहते हैं? यह वही है! यह वास्तव में वही है! वह हमारा परमेश्वर है! वह सत्य, मार्ग, और जीवन है! उसी ने हमें फिर से जीने और ज्योति देखने लायक बनाया है, हमारे हृदयों को भटकने से रोका है। हम परमेश्वर के घर में लौट आए हैं, हम उसके सिंहासन के सामने लौट आए हैं, हम उसके आमने-सामने हैं, हमने उसका मुखमंडल देखा है, और आगे का मार्ग देखा है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर के प्रकटन को उसके न्याय और ताड़ना में देखना" से उद्धृत

राज्य के युग में, परमेश्वर नए युग की शुरूआत करने, अपने कार्य के साधन बदलने और संपूर्ण युग के लिये काम करने की ख़ातिर अपने वचन का उपयोग करता है। वचन के युग में यही वह सिद्धांत है जिसके द्वारा परमेश्वर कार्य करता है। वह देहधारी हुआ ताकि विभिन्न दृष्टिकोणों से बातचीत कर सके, मनुष्य वास्तव में परमेश्वर को देख सके, जो देह में प्रकट होने वाला वचन है, उसकी बुद्धि और चमत्कार को जान सके। उसने यह कार्य इसलिए किये ताकि वह मनुष्यों को जीतने, उन्हें पूर्ण बनाने और ख़त्म करने के लक्ष्यों को बेहतर ढंग से हासिल कर सके। वचन के युग में वचन को उपयोग करने का यही वास्तविक अर्थ है। वचन के द्वारा परमेश्वर के कार्यों को, परमेश्वर के स्वभाव को मनुष्य के सार और इस राज्य में प्रवेश करने के लिए मनुष्य को क्या करना चाहिए, यह जाना जा सकता है। वचन के युग में परमेश्वर जिन सभी कार्यों को करना चाहता है, वे वचन के द्वारा संपन्न होते हैं। वचन के द्वारा ही मनुष्य की असलियत का पता चलता है, उसे नष्ट किया जाता है और परखा जाता है। मनुष्य ने वचन देखा है, सुना है और वचन के अस्तित्व को जाना है। इसके परिणाम स्वरूप वह परमेश्वर के अस्तित्व पर विश्वास करता है, मनुष्य परमेश्वर के सर्वशक्तिमान होने और उसकी बुद्धि पर, साथ ही साथ मनुष्यों के लिये परमेश्वर के हृदय के प्रेम और मनुष्यों का उद्धार करने की उसकी अभिलाषा पर विश्वास करता है। यद्यपि "वचन" शब्द सरल और साधारण है, देहधारी परमेश्वर के मुख से निकला वचन संपूर्ण ब्रह्माण्ड को कंपाता है; और उसका वचन मनुष्य के हृदय को रूपांतरित करता है, मनुष्य के सभी विचारों और पुराने स्वभाव और समस्त संसार के पुराने स्वरूप में परिवर्तन लाता है। युगों-युगों से केवल आज के दिन का परमेश्वर ही इस प्रकार से कार्य करता है और केवल वही इस प्रकार से बोलता और मनुष्य का उद्धार करता है। इसके बाद मनुष्य वचन के मार्गदर्शन में, उसकी चरवाही में और उससे प्राप्त आपूर्ति में जीवन जीता है। वह वचन के संसार में जीता है, परमेश्वर के वचन के कोप और आशीषों में जीता है और उससे भी अधिक वह परमेश्वर के वचन के न्याय और ताड़ना के अधीन जीता है। ये वचन और यह कार्य सब कुछ मनुष्य के उद्धार, परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने और पुरानी सृष्टि के संसार के मूल रूप रंग को बदलने के लिये है। परमेश्वर ने संसार की सृष्टि वचन से की, वह समस्त ब्रह्माण्ड में मनुष्य की अगुवाई वचन के द्वारा करता है, उन्हें वचन के द्वारा जीतता और उनका उद्धार करता है। अंत में, वह इसी वचन के द्वारा समस्त प्राचीन जगत का अंत कर देगा। तभी उसके प्रबंधन की योजना पूरी होगी।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "राज्य का युग वचन का युग है" से उद्धृत

वचन देह बन गया है और सत्य का आत्मा देह में प्रत्यक्ष हुआ है—समस्त सत्य, मार्ग और जीवन देह में आ गया है, और परमेश्वर का आत्मा का वास्तव में पृथ्वी पर आगमन हो गया है और आत्मा देह में आ गया है। यद्यपि, सतही तौर पर, यह पवित्र आत्मा की सहायता से गर्भधारण से भिन्न प्रतीत होता है, किन्तु इस कार्य से तुम लोग और अधिक स्पष्टता से देखने में सक्षम होते हो कि पवित्रात्मा पहले से ही देह में प्रत्यक्ष हो गया है इसके अतिरिक्त, वचन देह बन गया है, और वचन देह में प्रकट हो गया है, और तुम इन वचनों के वास्तविक अर्थ को समझने में सक्षम हो: आरम्भ में वचन था, और वचन परमेश्वर के साथ था, और वचन परमेश्वर था। इसके अलावा, तुम्हें यह भी अवश्य समझना चाहिए कि आज के वचन परमेश्वर हैं, और तुम्हें अवश्य देखना चाहिए कि वचन देह बनता है। यह सर्वोत्तम गवाही है जो तुम दे सकते हो। यह साबित करता है कि तुम देहधारी परमेश्वर के सच्चे ज्ञान से सम्पन्न हो—तुम न केवल उसे जानने में सक्षम हो, बल्कि यह भी जानते हो कि जिस मार्ग पर तुम आज चलते हो वही जीवन का मार्ग है, और सत्य का मार्ग है। यीशु ने कार्य का एक चरण किया, जिसने केवल "वचन परमेश्वर के साथ था" के सार पूरा किया, सत्य परमेश्वर के साथ था और परमेश्वर का आत्मा देह के साथ था और उससे अभिन्न था, अर्थात, देहधारी परमेश्वर का देह परमेश्वर के आत्मा के साथ था, जो कि एक अधिक बड़ा प्रमाण है कि देहधारी यीशु परमेश्वर का प्रथम देहधारण था। कार्य के इस चरण ने "वचन देह बनता है" के आंतरिक अर्थ को पूरा किया, "वचन परमेश्वर के साथ था, और वचन परमेश्वर था", को और गहन अर्थ प्रदान किया और तुम्हें इन वचनों पर दृढ़ता से विश्वास करने की अनुमति देता है, कि "आरंभ में वचन था"। कहने का अर्थ है, कि सृजन के समय परमेश्वर वचन से सम्पन्न था, उसके वचन उसके साथ थे और उससे अभिन्न थे, और अंतिम युग उसके वचनों की सामर्थ्य और उसके अधिकार को और भी अधिक स्पष्ट करता है, और मनुष्य को परमेश्वर के सभी वचनों को देखने की—उसके सभी वचनों को सुनने की अनुमति देता है। ऐसा है अंतिम युग का कार्य। तुम्हें इन चीजों को हर पहलू से जान लेना चाहिए। यह देह को जानने का नहीं, बल्कि देह और वचन को जानने का प्रश्न है। यह वह है जिसकी तुम्हें गवाही देनी चाहिए, जिसका हर किसी को ज्ञान अवश्य होना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "अभ्यास (4)" से उद्धृत

मेरे वचन सदा-सर्वदा न बदलने वाले सत्‍य हैं। मैं मनुष्य के लिए जीवन की आपूर्ति हूँ और मानवजाति के लिए एकमात्र मार्गदर्शक हूँ। मेरे वचनों की कीमत और उसका अर्थ इसके द्वारा निर्धारित नहीं होता है कि उन्हें मानवजाति के द्वारा पहचाना और स्वीकारा गया है कि नहीं, परन्तु यह स्वयं वचनों के सार-तत्व के द्वारा होता है। भले ही इस पृथ्वी पर एक भी ऐसा इंसान मेरे वचनों को ग्रहण न कर पाए, फिर भी मेरे वचन का मूल्य और मानवजाति के प्रति उसकी सहायता का मूल्यांकन किसी मनुष्य के द्वारा नहीं किया जा सकता है। इसलिए जब बहुत सारे लोगों का सामना मेरे वचनों से होता है जो विद्रोह करते हैं, उनका खण्डन करते हैं, या उनसे पूरी तरह घृणा करते हैं, तो उन सब के प्रति मेरा रवैया यह हैः समय और तथ्यों को मेरी गवाही देने दो और यह दिखाने दो कि मेरे वचन सत्य, मार्ग और जीवन हैं। उन्हें यह दिखाने दो कि जो कुछ मैंने कहा है वह सही है, और वह ऐसा है जिसकी आपूर्ति लोगों को की जानी चाहिए, और इसके अतिरिक्त, जिसे मनुष्य को स्वीकार करना चाहिए। मैं उन सबको जो मेरा अनुसरण करते हैं, यह तथ्य ज्ञात करवाऊँगाः जो लोग पूरी तरह से मेरे वचनों को स्वीकार नहीं कर सकते, जो मेरे वचनों को अभ्यास में नहीं ला सकते, और जो मेरे वचनों के कारण उद्धार प्राप्त नहीं कर पाते, वे हैं जो मेरे वचनों के कारण निंदित हुए हैं और इसके अलावा, जिन्होंने मेरे उद्धार को खो दिया है, मेरी लाठी उन पर से कभी नहीं हटेगी।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "तुम लोगों को अपने कार्यों पर विचार करना चाहिए" से उद्धृत

(परमेश्वर के वचन के चुनिंदा अवतरण)

केवल अंतिम दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनन्त जीवन का मार्ग दे सकता है

जीवन का मार्ग कोई साधारण चीज़ नहीं है जो चाहे कोई भी प्राप्त कर ले, न ही इसे सभी के द्वारा आसानी से प्राप्त किया जा सकता है। यह इसलिए कि जीवन केवल परमेश्वर से ही आता है, कहने का अर्थ है कि केवल स्वयं परमेश्वर ही जीवन के तत्व का अधिकारी है, स्वयं परमेश्वर के बिना जीवन का मार्ग नहीं है, और इसलिए केवल परमेश्वर ही जीवन का स्रोत है, और जीवन के जल का सदा बहने वाला सोता है। जब से उसने संसार को रचा है, परमेश्वर ने जीवन की प्राणशक्ति से जुड़े बहुत से कार्य किये हैं, बहुत सारा कार्य मनुष्य को जीवन प्रदान करने के लिए किया है और बहुत अधिक मूल्य चुकाया है ताकि मनुष्य जीवन को प्राप्त करे, क्योंकि परमेश्वर स्वयं ही अनन्त जीवन है, और वह स्वयं ही वह मार्ग है जिससे मनुष्य नया जन्म लेता है। परमेश्वर मनुष्य के हृदय से कभी भी दूर नहीं रहा है और हर समय उनके मध्य में रहता है। वह मनुष्यों के जीवन यापन की असली ताकत है, मनुष्य के अस्तित्व का आधार है, जन्म के बाद मनुष्य के अस्तित्व के लिए उर्वर संचय है। वह मनुष्य को नया जन्म लेने देता है, और प्रत्येक भूमिका में दृढ़तापूर्वक जीने के लिये सक्षम बनाता है। उसकी सामर्थ्य के लिए और उसकी सदा जीवित रहने वाली जीवन की शक्ति के लिए धन्यवाद, मनुष्य पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रहता है, जिसके द्वारा परमेश्वर के जीवन की सामर्थ्य मनुष्य के अस्तित्व के लिए मुख्य आधार बनती है और जिसके लिए परमेश्वर ने कीमत चुकाई है जिसे कोई भी साधारण मनुष्य कभी भी नहीं चुका सकता। परमेश्वर की जीवन शक्ति किसी भी शक्ति पर प्रभुत्व कर सकती है; इसके अलावा, वह किसी भी शक्ति से अधिक है। उसका जीवन अनन्त काल का है, उसकी सामर्थ्य असाधारण है, और उसके जीवन की शक्ति आसानी से किसी भी प्राणी या शत्रु की शक्ति से पराजित नहीं हो सकती। परमेश्वर की जीवन-शक्ति का अस्तित्व है, और अपनी शानदार चमक से चमकती है, चाहे वह कोई भी समय या स्थान क्यों न हो। परमेश्वर का जीवन सम्पूर्ण स्वर्ग और पृथ्वी की उथल-पुथल के मध्य हमेशा के लिए अपरिवर्तित रहता है। हर चीज़ का अस्तित्व समाप्त हो जायेगा, परन्तु परमेश्वर का जीवन फिर भी अस्तित्व में रहेगा। क्योंकि परमेश्वर ही सभी चीजों के अस्तित्व का स्रोत है, और उनके अस्तित्व का मूल है। मनुष्य का जीवन परमेश्वर से निकलता है, स्वर्ग का अस्तित्व परमेश्वर के कारण है, और पृथ्वी का अस्तित्व भी परमेश्वर की जीवन शक्ति से ही उद्भूत होता है। कोई वस्तु कितनी भी महत्वपूर्ण हो, परमेश्वर के प्रभुत्व से बढ़कर श्रेष्ठ नहीं हो सकती, और कोई भी वस्तु शक्ति के साथ परमेश्वर के अधिकार की सीमा को तोड़ नहीं सकती है। इस प्रकार से, चाहे वे कोई भी क्यों न हों, सभी को परमेश्वर के अधिकार के अधीन ही समर्पित होना होगा, प्रत्येक को परमेश्वर की आज्ञा में रहना होगा, और कोई भी उसके नियंत्रण से बच कर नहीं जा सकता है।

हो सकता है कि अब तुम जीवन को प्राप्त करना चाहते हो या हो सकता है कि सत्य को प्राप्त करना चाहते हो। चाहे मामले कुछ भी क्यों न हो, तुम परमेश्वर को खोजना चाहते हो, परमेश्वर को खोजने का अर्थ है कि तुम उस पर भरोसा रख सकते हो, और वही तुमको अनन्त जीवन प्रदान कर सकता है। यदि तुम अनन्त जीवन को प्राप्त करने की इच्छा करते हो, तो तुम्हें सबसे पहले अनन्त जीवन के स्रोत को समझने की आवश्यकता है, और यह जानने की आवश्यकता है कि परमेश्वर कहां है। मैं पहले ही कह चुका हूं कि केवल परमेश्वर का जीवन अपरिवर्तनीय है, और केवल परमेश्वर ही जीवन का मार्ग जानता है। चूंकि उसका जीवन ही अपरिवर्तनीय है, इसलिए वह अनन्त है; चूंकि केवल परमेश्वर के ही पास जीवन का मार्ग है, इसलिए परमेश्वर स्वयं ही अनन्त जीवन का मार्ग है। अत: सबसे पहले तुम्हें जानने की आवश्यकता है कि परमेश्वर कहां है, और अनन्त जीवन के इस मार्ग को कैसे प्राप्त किया जा सकता है। आओ, हम इन दोनों मामलों को अलग अलग तौर पर देखें।

यदि तुम वास्तव में अनन्त जीवन के मार्ग को प्राप्त करने की इच्छा रखते हो, और यदि तुम इसको खोजने के लिए भूखे हो, तो पहले इस प्रश्न का उत्तर दो: आज परमेश्वर कहां है? हो सकता है कि तुम कहो कि परमेश्वर स्वर्ग में रहता है, बिल्कुल—वह तुम्हारे घर में तो रहेगा नहीं, हो सकता है कि तुम कहो कि परमेश्वर हर चीज़ में बसता है। या तुम कह सकते हो कि परमेश्वर प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में रहता है, या वह आत्मिक संसार में है। मैं इनमें से किसी से भी इन्कार नहीं करता हूं, परन्तु मैं इस मामले को स्पष्ट करना चाहता हूं। ऐसा कहना पूरी तरह से उचित नहीं होगा कि परमेश्वर मनुष्यों के हृदयों में रहता है, परन्तु न ही यह पूरी तरह से गलत है। इसका कारण यह है कि परमेश्वर में विश्वासियों के मध्य, कुछ लोग ऐसे हैं जिनका विश्वास सत्य है और कुछ ऐसे हैं जिनका विश्वास गलत है, कुछ ऐसे हैं जिन्हें परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त है और कुछ ऐसे हैं जिन्हें परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त नहीं है। कुछ ऐसे हैं जो उसको प्रसन्न करते हैं कुछ ऐसे हैं जो उससे घृणा करते हैं, और कुछ ऐसे हैं जिन्हें वह पूर्ण बनाता है और कुछ ऐसे हैं जिन्हें वह मिटा देता है। इसलिए मैं कहना चाहूंगा कि परमेश्वर रहता है परन्तु कुछ ही लोगों के हृदयों में रहता है, और ये कुछ लोग निस्संदेह सच्चाई से परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, वे जिन्हें परमेश्वर अनुमोदन प्रदान करता है, जिनसे वह प्रसन्न है और जिन्हें वह पूर्ण बनाता है। ये वे लोग हैं जो परमेश्वर के द्वारा अगुवाई प्राप्त करते हैं। चूंकि ये परमेश्वर के द्वारा अगुवाई प्राप्त करते हैं, इसलिए ये वे लोग हैं जिन्होंने पहले से ही परमेश्वर के अनन्त जीवन के मार्ग के बारे में सुन लिया है और उस मार्ग को देख लिया है। जो परमेश्वर पर विश्वास करते हैं कि वह गलत है, वे परमेश्वर के द्वारा अनुमति प्राप्त किए हुए नहीं हैं, वे परमेश्वर के द्वारा तुच्छ जाने जाते हैं, वे परमेश्वर के द्वारा मिटा दिए जाते हैं—वे परमेश्वर के द्वारा अस्वीकार किए जाने के लिए बाध्य हैं, और बिना जीवन के मार्ग के रहने के लिए भी बाध्य हैं, और परमेश्वर के रहने के स्थान से भी अनभिज्ञ हैं। इसके विपरीत, जिनके हृदयों में परमेश्वर रहता है वे जानते हैं कि वह कहां रहता है। ये ही वे लोग हैं जिन्हें परमेश्वर ने जीवन का मार्ग प्रदान किया है, और ये ही परमेश्वर का अनुसरण करते हैं। अब, क्या तुम जानते हो कि परमेश्वर कहां है? परमेश्वर मनुष्यों के हृदय में और मनुष्यों के पक्ष में रहता है। वह न केवल आत्मिक संसार में है, और सभी चीज़ों के ऊपर है, बल्कि उस पृथ्वी पर भी उसका वास है जहां मनुष्य का अस्तित्व है। अत: अंत के दिनों के आगमन ने परमेश्वर के कार्य के चरणों को नये प्रदेश में अग्रसर किया है। परमेश्वर ब्रह्माण्ड की सभी चीज़ों पर प्रभुता रखता है, और वह मनुष्यों के हृदयों का मुख्य आधार है, और इसके अलावा, वह मनुष्यों के मध्य में रहता है। केवल इसी तरह से वह मानवजाति में जीवन का मार्ग ला सकता है और मनुष्य को जीवन के मार्ग में लेकर आता है, परमेश्वर धरती पर आकर मनुष्यों के बीच इसलिये रहता है ताकि मनुष्य जीवन का मार्ग प्राप्त कर सके और मनुष्य का अस्तित्व बना रह सके। इसी के साथ-साथ, परमेश्वर ब्रह्माण्ड की सभी चीज़ों पर अधिकार रखता है, ताकि वे मनुष्यों के मध्य में उसके प्रबंधकारणीय कार्य में सहयोग प्रदान करें। इसलिए, यदि तुम केवल इस सिद्धांत को मानते हो कि परमेश्वर स्वर्ग में है और मनुष्यों के हृदय में है, लेकिन मनुष्यों के मध्य परमेश्वर के अस्तित्व के सत्य को नहीं मानते, तो तुम कभी भी जीवन को प्राप्त नहीं कर सकते, और सत्य का मार्ग कभी भी प्राप्त नहीं करोगे।

परमेश्वर स्वयं ही जीवन है, सत्य है, और उसका जीवन और सत्य साथ ही साथ रहते हैं। जो सत्य को प्राप्त करने में असफल रहते हैं वे कभी भी जीवन को प्राप्त नहीं कर सकते। बिना मार्गदर्शन, सहायता और सत्य के प्रावधान के तुम केवल पत्र, सिद्धांत और मृत्यु को ही प्राप्त करोगे। परमेश्वर का जीवन सतत विद्यमान है, और उसका सत्य और जीवन एक साथ उपस्थित रहते हैं। यदि तुम सत्य के स्रोत को नहीं प्राप्त कर पाते, तो तुम जीवन के पोषण को प्राप्त नहीं कर पाओगे; यदि तुम जीवन के प्रावधान को प्राप्त नहीं कर सकते तो तुम्हारे जीवन में निश्चय ही सत्य नहीं होगा, और इसलिए कल्पनाओं और धारणाओं के अलावा, तुम्हारी सम्पूर्ण देह केवल देह होगी, तुम्हारी घिनौनी देह। ध्यान रखो कि किताबों की बातें जीवन के तौर पर नहीं गिनी जाती हैं, इतिहास के लेखों को सत्य के रूप में चित्रित नहीं किया जा सकता, और अतीत के सिद्धांत आज के समय में परमेश्वर के द्वारा कहे गए वचनों का लेखा-जोखा नहीं माने जा सकते। केवल वही बात जो परमेश्वर ने पृथ्वी पर आकर और लोगों के बीच रहकर कही है, सत्य, जीवन, परमेश्वर की इच्छा और कार्य करने का असली तरीका है। यदि तुम अतीत के युगों में परमेश्वर के द्वारा कहे गए वचनों को आज के संदर्भ में लागू करते हो, तो तुम एक पुरातत्ववेत्ता हो, और तुम्हें सबसे बेहतर ढंग से चित्रित करने के लिए ऐतिहासिक विरासत का विशेषज्ञ कहा जा सकता है। क्योंकि तुम हमेशा उन कार्यों के सुरागों के बारे में विश्वास करते हो जो परमेश्वर ने अतीत में किए हैं, केवल उन पदचिन्हों पर विश्वास करते हो जो तब के हैं जब परमेश्वर लोगों के बीच रह कर कार्य किया करता था। और तुम केवल उसी मार्ग पर विश्वास करते हो जो परमेश्वर ने पुराने समय में अपने अनुयायियों को दिया था। आज के समय में तुम परमेश्वर के कार्य के मार्गदर्शन के बारे में विश्वास नहीं करते, महिमामय मुखाकृति में विश्वास नहीं करते, और परमेश्वर के द्वारा आज के समय में व्यक्त किये गये सत्य के मार्ग पर विश्वास नहीं करते। अत: तुम एक ऐसे दिवास्वप्न दर्शी हो जो सच्चाई से कोसों दूर है। यदि तुम अभी भी उन वचनों से चिपके रहोगे जो जीवन प्रदान करने में असमर्थ हैं, तो तुम आशाहीन और एक निर्जीव काष्ठ[क] के समान हो। क्योंकि तुम बहुत ही रूढ़िवादी, असभ्य हो जो चीजों को तर्क की कसौटी पर नहीं कसते हो।

परमेश्वर देहधारी हुआ और मसीह कहलाया, और इसलिए वह मसीह, जो लोगों को सत्य दे सकता है, परमेश्वर कहलाता है। इसमें कुछ भी अतिशयोक्ति नहीं है, क्योंकि वह परमेश्वर के तत्व को स्वयं में धारण किए रहता है, और अपने कार्य में परमेश्वर के स्वभाव और बुद्धि को धारण करता है, और ये चीजें मनुष्य के लिये अप्राप्य हैं। जो अपने आप को मसीह कहते हैं, फिर भी परमेश्वर का कार्य नहीं कर सकते, वे सभी धोखेबाज़ हैं। मसीह पृथ्वी पर केवल परमेश्वर की अभिव्यक्ति नहीं है, बल्कि वह विशेष देह भी है जिसे धारण करके परमेश्वर लोगों के बीच रहकर अपना कार्य पूर्ण करता है। यह वह देह नहीं है जो किसी भी मनुष्य के द्वारा प्रतिस्थापित किया जा सके, बल्कि वह देह है, जो परमेश्वर के कार्य को पृथ्वी पर अच्छी तरह से करता है और परमेश्वर के स्वभाव को अभिव्यक्त करता है, और अच्छी प्रकार से परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करता है, और मनुष्य को जीवन प्रदान करता है। देर-सवेर, मसीह का भेष धारण करने वालों का पतन होगा, क्योंकि वे भले ही मसीह होने का दावा करते हैं, किंतु उनमें किंचितमात्र भी मसीह का सार-तत्व नहीं होता। इसलिए मैं कहता हूं कि मसीह की प्रामाणिकता मनुष्य के द्वारा परिभाषित नहीं की जा सकती है, परन्तु स्वयं परमेश्वर के द्वारा उत्तर दिया और निर्णय लिया जा सकता है। इस प्रकार, यदि तुम वास्तव में जीवन का मार्ग खोजने के इच्छुक हो, तो पहले तुम्हें यह मानना होगा कि वह पृथ्वी पर आकर ही मनुष्यों को जीवन प्रदान करता है, और अंत के दिनों में वह पृथ्वी पर आकर मनुष्यों में जीवन का मार्ग प्रदान करता है। यह अतीत नहीं है; यह आज हो रहा है।

अंत के दिनों का मसीह जीवन लेकर आता है, और सत्य का स्थायी एवं अनन्त मार्ग प्रदान करता है। इसी सत्य के मार्ग के द्वारा मनुष्य जीवन को प्राप्त करेगा, और एक मात्र इसी मार्ग से मनुष्य परमेश्वर को जानेगा और परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त करेगा। यदि तुम अंत के दिनों के मसीह के द्वारा प्रदान किए गए जीवन के मार्ग को नहीं खोजते हो, तो तुम कभी भी यीशु के अनुमोदन को प्राप्त नहीं कर पाओगे और कभी भी स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने के योग्य नहीं बन पाओगे क्योंकि तुम इतिहास के कठपुतली और कैदी दोनों हो। जो लोग नियमों, लिखे गये पत्रों के नियंत्रण में हैं और इतिहास की ज़ंजीरों में जकड़े हुए हैं वे कभी भी जीवन को प्राप्त नहीं कर सकते हैं, और कभी भी सतत जीवन के मार्ग को प्राप्त करने के योग्य नहीं बन सकते हैं। क्योंकि सिंहासन से प्रवाहित होने वाले जीवन जल की अपेक्षा, उनके पास मैला पानी है जिससे वे हज़ारों सालों से चिपके हुए हैं। जिनके पास जीवन का जल नहीं है वे हमेशा के लिए एक लाश, शैतान के खेलने की वस्तु और नरक की संतान बने रहेंगे। फिर वे परमेश्वर को कैसे देख सकते हैं? यदि तुम केवल अतीत को पकड़े रहने की कोशिश करोगे, केवल ठहरी हुई चीज़ों को पकड़ने की कोशिश में लगे रहोगे, और यथास्थिति को बदलने और इतिहास को तिलांजलि देने की कोशिश नहीं करोगे, तो क्या तुम हमेशा परमेश्वर के विरोध में नहीं रहोगे? परमेश्वर के कार्य के चरण बहुत ही विशाल और सामर्थी हैं, जैसे कि हिलोरे मारती हुई लहरें और गरजता हुआ तूफान—फिर भी तुम बैठकर निष्क्रियता से विनाश का इंतजार करते हो, अपनी ही मूर्खता से चिपके रहते हो और कुछ भी नहीं करते। इस प्रकार से, तुम्हें मेमने का अनुसरण करने वाले के रूप में कैसे देखा जा सकता है? और तुम जिस परमेश्वर पर निर्भर रहते हो उसे उस परमेश्वर के रूप में न्यायोचित कैसे ठहरा सकते हो जो हमेशा नया है और कभी पुराना नहीं होता? तुम्हारी पीली पड़ चुकी किताब के वचन तुम्हें नए युग में कैसे ले जा सकते हैं? वे कैसे तुम्हें परमेश्वर के चरणबद्ध तरीके से चलने वाले कार्यों तक लेकर जायेंगे? वे तुम्हें कैसे स्वर्ग लेकर जायेंगे? तुम्हारे हाथों में जो पत्र हैं वे तुम्हें केवल अस्थायी सांत्वना ही दे सकते हैं, वह सत्य नहीं दे सकते जो जीवन देने में सक्षम है। जो शास्त्र तुम पढ़ते हो वे तुम्हारी जिव्हा को सम्पन्न बना सकते हैं लेकिन ये वे विवेकपूर्ण वचन नहीं हैं जो तुम्हें मानव जीवन का बोध करने में मदद कर सकते हैं, ये वह मार्ग तो बिल्कुल ही नहीं हैं जो तुम्हें पूर्णता की ओर ले जायें। क्या यह भिन्नता तुम्हें विचार-मंथन का कारण नहीं देती? क्या यह तुम्हें अपने भीतर समाहित रहस्यों को समझने के लिए अनुमति नहीं देता है? क्या तुम अपने आप को परमेश्वर से मिलने के लिए स्वर्ग में ले जाने के योग्य हो? परमेश्वर के आये बिना, क्या तुम अपने आप को परमेश्वर के साथ पारिवारिक आनन्द मनाने के लिए स्वर्ग में ले जा सकते हो? क्या तुम अभी भी स्वप्न देख रहे हो? मैं तुम्हें सुझाव देता हूँ, कि तुम स्वप्न देखना बंद कर दो, और उसकी ओर देखो जो अभी कार्य कर रहा है, उसकी ओर जो अंत के दिनों में मनुष्यों को बचाने के लिए कार्य कर रहा है। यदि तुम ऐसा नहीं करते हो, तो तुम कभी भी सत्य को नहीं प्राप्त कर सकते, और कभी भी जीवन प्राप्त नहीं कर सकते हो।

जो मसीह के द्वारा कहे गए सत्य पर भरोसा किए बिना जीवन प्राप्त करने की अभिलाषा करते हैं, वे पृथ्वी पर सबसे हास्यास्पद मनुष्य हैं और जो मसीह के द्वारा लाए गए जीवन के मार्ग को स्वीकार नहीं करते हैं वे कल्पना में ही खोए हुए हैं। इसलिए मैं यह कहता हूँ कि लोग जो अंत के दिनों में मसीह को स्वीकार नहीं करते हैं वे हमेशा के लिए परमेश्वर के द्वारा तुच्छ समझे जाएंगे। अंत के दिनों में मसीह मनुष्यों के लिए परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करने का माध्यम है, जिसकी अवहेलना कोई भी नहीं कर सकता। मसीह के माध्यम बिना कोई भी परमेश्वर के द्वारा पूर्णता को प्राप्त नहीं कर सकता। परमेश्वर में तुम्हारा विश्वास है, और इसलिए तुम उसके वचनों को स्वीकार करो और उसके मार्ग का पालन करो। बिना सत्य को प्राप्त किए या बिना जीवन के प्रावधान को स्वीकार किए तुमको सिर्फ़ अनुग्रह प्राप्त करने के बारे में सोचना नहीं है। मसीह अंत के दिनों में आता है ताकि वे सभी जो सच्चाई से उस पर विश्वास करते हैं उन्हें जीवन प्रदान किया जाए। उसका कार्य पुराने युग को समाप्त करने और नए युग में प्रवेश करने के लिए है और यही वह मार्ग है जिसे नए युग में प्रवेश करने वालों को अपनाना चाहिए। यदि तुम उसे पहचानने में असमर्थ हो, और उसकी भर्त्सना करते हो, निंदा करते हो और यहां तक कि उसे पीड़ा पहुंचाते हो, तो तुम अनन्त समय तक जलाए जाते रहने के लिए निर्धारित कर दिये गए हो और तुम कभी भी परमेश्वर के राज्य में प्रवेश नहीं कर पाओगे। इसी कारण से मसीह ही स्वयं पवित्र आत्मा और परमेश्वर की अभिव्यक्ति है, जिसे परमेश्वर ने पृथ्वी पर अपना कार्य सौंपा है। इसलिए मैं कहता हूँ कि अंत के दिनों में जो मसीह के द्वारा कार्य किया गया है उसे तुम स्वीकार नहीं करते हो तो तुम पवित्र आत्मा की निंदा करते हो। और उसका प्रतिकार पवित्र आत्मा की निंदा करने वालों को सहना होगा वह सभी के लिए स्वत:-स्पष्ट है। मैं यह भी कहता हूँ कि यदि तुम अंत के दिनों में मसीह का विरोध करोगे और उसे नकारोगे, तो ऐसा कोई भी नहीं है जो तुम्हारे लिए इसका नतीजा भुगत ले। इसके अलावा, आज के बाद से फिर कभी तुम्हें परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त करने का अवसर नहीं मिलेगा; यदि तुम अपने उद्धार की कोशिश भी करते हो, तो तुम कभी भी परमेश्वर का चेहरा नहीं देख पाओगे। क्योंकि तुम जिसका विरोध करते हो वह मनुष्य नहीं है, जिसको नकार रहे हो वह नन्हा-सा प्राणी नहीं है, बल्कि मसीह है। क्या तुम परिणामों के बारे में जानते हो? तुमने कोई छोटी-मोटी गलती नहीं की है, बल्कि एक बहुत ही जघन्य अपराध किया है। इसलिए मैं प्रत्येक को सलाह देता हूं कि सत्य के सामने अपने ज़हरीले दांत मत दिखाओ, या लापरवाही से आलोचना मत करो, क्योंकि केवल सत्य ही तुमको जीवन दिला सकता है और सत्य के अलावा कुछ भी तुमको नया जन्म देने के लिए या परमेश्वर का चेहरा देखने के लिए अनुमति नहीं दे सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" से उद्धृत

फुटनोट:

क. ए पीस ऑफ़ डेडवुड: एक चीनी मुहावरा, जिसका अर्थ है—"सहायता से परे"।

पिछला:यह क्यों कहा जाता है कि परमेश्वर का दो बार देहधारी होना देहधारण की महत्ता को पूरा करता है?

अगला:न्याय के कार्य को करने के लिए परमेश्वर का देहधारण करना, किस तरह मानव जाति के अस्पष्ट परमेश्वर में विश्वास को और शैतान के प्रभुत्व के अंधेरे युग को समाप्त करता है?

सम्बंधित मीडिया

शायद आपको पसंद आये

वचन देह में प्रकट होता है अंत के दिनों के मसीह के कथन (संकलन) मेमने ने पुस्तक को खोला न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है सर्वशक्तिमान परमेश्वर, अंतिम दिनों के मसीह, के उत्कृष्ट वचन राज्य के सुसमाचार पर सर्वशक्तिमान परमेश्वर के उत्कृष्ट वचन -संकलन मेमने का अनुसरण करना और नए गीत गाना अंत के दिनों के मसीह के लिए गवाहियाँ राज्य के सुसमाचार पर उत्कृष्ट प्रश्न और उत्तर (संकलन) परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं (नये विश्वासियों के लिए अनिवार्य चीजें) विजेताओं की गवाहियाँ मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवों की गवाहियाँ मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया जीवन में प्रवेश पर उपदेश और वार्तालाप