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22. परमेश्वर के वचनों ने मुझे जगा दिया है

माओ ज़ाओ जिनान सिटी, शैंडॉन्ग प्रदेश

पूर्व में, मैं उस बारे में हमेशा सोचा करती थी जब परमेश्वर ने कहा था “एक कठपुतली और ग़द्दार हो जो श्वेत सिंहासन से दूर भाग रहा है” वह उन लोगों को संदर्भित कर रहा था जो कार्य के इस चरण को स्वीकार कर लेते हें लेकिन अंत में इसे छोड़ देते हैं क्योंकि वे उसकी ताड़ना और न्याय सहने के ​इच्छुक नहीं होते हैं। इसलिए, जब भी मैं भाइयों और बहनों को किसी भी कारण से इस मार्ग को छोड़ते हुए देखती थी, तो मेरा दिल उनके लिए तिरस्कार से भरा जाया करता था: बड़े सफेद सिंहासन से एक और कठपुतली और कपटी भाग गया जो परमेश्वर का दंड प्राप्त करेगा। इसी के साथ, मुझे यह लगता था कि मैं परमेश्वर के न्याय को स्वीकार में उचित रूप से व्यवहार कर रही थी और परमेश्वर का उद्धार पाने से बहुत दूर नहीं थी।

एक दिन, जब मैं आध्यात्मिक उपासना कर रही थी, तो मैंने “मसीह न्याय का कार्य सत्य के साथ करता है” पाठ में परमेश्वर के निम्न वचन पढ़ने को मिले: “क्योंकि इस तरह के कार्य का सार ही उन सभी के लिए वास्तव में परमेश्वर के सत्य, मार्ग और जीवन का मार्ग प्रशस्त करने का कार्य है जिनका उस पर विश्वास है। यह कार्य परमेश्वर के द्वारा किया गया न्याय का कार्य है। यदि तुम इन सत्यों को महत्व नहीं देते हो और इनसे बचने के बारे में या इनसे अलग बच निकलने का कोई नया तरीका निरंतर विचार करते रहते हो, तो मैं कहूँगा कि तुम एक दारुण पापी हो। यदि तुम्हें परमेश्वर में विश्वास है, मगर सत्य या परमेश्वर की इच्छा को नहीं खोजते हो, न ही परमेश्वर के निकट लाने वाले मार्ग को प्यार करते हो, तो मैं कहता हूँ कि तुम एक ऐसा व्यक्ति हो जो न्याय से बचने की कोशिश कर रहा है। तुम एक कठपुतली और ग़द्दार हो जो श्वेत सिंहासन से दूर भाग रहा है, और परमेश्वर अपनी दृष्टि के नीचे से बचकर भागने वाले किसी भी विद्रोही को कभी नहीं छोड़ेगा। इस प्रकार के लोग और भी अधिक कठोर दण्ड प्राप्त करेंगे। जो न्याय किए जाने के लिए परमेश्वर के सम्मुख आते हैं और शुद्ध किए जा चुके हैं वे हमेशा के लिए परमेश्वर के राज्य में रहेंगे।” इन विचारों पर चिंतन करने के बाद ही, मुझे अंतत: अहसास हुआ: ऐसा लगता है कि वे कठपुतलियां और कपटी जो बड़े सफेद सिंहासन से भाग गए, उन्हें बस उन लोगों में नहीं गिना जाता है जो इस मार्ग को छोड़ देते हैं। ज्यादा महत्वपूर्ण रूप से, यह उन लोगों को संदर्भित कर रहा है जो परमेश्वर का पालन करते हैं लेकिन इन सत्यों को महत्व नहीं देते हैं, वे लोग हमेशा से ही इन सत्यों से भाग रहे होते हैं, इन सत्यों के बाहर के नए तरीकों को देख रहे होते हैं, और परमेश्वर की ताड़ना और न्याय के समक्ष खुद को प्रस्तुत करने और परमेश्वर द्वारा शुद्ध किए जाने की इच्छा नहीं रखते हैं। परमेश्वर की प्रबुद्धता और मार्गदर्शन के तहत, मैंने अपने खुद के व्यवहार पर विचार करना शुरू किया: परमेश्वर अब मनुष्य का न्याय करने के लिए अपने वचनों को व्यक्त कर रहा है, और यातना और शुद्धिकरण के माध्यम से मनुष्यों से उन चीजों की शुद्धि कर रहा है जो उसके अनुकूल नहीं है। लेकिन परमेश्वर की ताड़ना और न्याय, यातना और शुद्धिकरण के समक्ष, मैंने हमेशा ही भागने की कोशिश की है, इस उम्मीद से कि परमेश्वर जल्द ही इन परिस्थितियों को दूर कर देगा। क्या यह सत्य से भागना और सत्य से बाहर के रास्ते खोजना नहीं है? जब परमेश्वर द्वारा लाए गए लोग या चीजें मेरे निजी दृष्टिकोण से मेल नहीं खाती हैं या जब मैं नकारात्मक परिस्थिति में फंस जाती हूं, तो भले ही भाइयों और बहनों से संचार करने मेरी समस्याएं हल हो सकती हैं, परमेश्वर की मेरी गलतफहमी साफ हो सकती है, और परमेश्वर के एक सामान्य संबंध फिर स्थापित करने में मदद मिल सकती है, फिर भी मैं प्रतिरोध और सुनने से मना करती हूं। जैसा कि परमेश्वर करता है, क्या यह सत्य को न खोजना और मुझे परमेश्वर के निकट लाने वाले मार्ग को प्रेम न करना नहीं है? जब से मैं अपना काम पूरा करने के लापरवाह तरीके से निपटने और उसे दूर करने में लग गई हूं, मैं हमेशा ही खुद को समझाने के लिए बहाने खोजने लगी हूं। क्या वह ऐसा सार नहीं है जो सत्य को स्वीकार करने से मना करता है? असल जिंदगी में मैं अक्सर ही खुद को समायोजित करती हूं। भले ही जब मैं जानती हूं कि यह सत्य है, मैं उसका अभ्यास करने के लिए अपने शरीर को त्यागने से मना कर देती हूं। क्या वह केवल न्याय को स्वीकार करना लेकिन शुद्धिकरण कराने की कोशिश न करना नहीं है?... अब जब मैं इस बारे में सोचती हूं, मैं और भी स्पष्ट रूप से इसे समझ जाती हूं: परमेश्वर बड़े सफेद सिंहासन से भागने वाले लोगों में सिर्फ उन्हें ही संदर्भित नहीं करता है, जो कलीसिया छोड़ देते हैं। ज्यादा महत्वपूर्ण रूप से, यह सत्व स्वीकार करने से मना करने वाले और परमेश्वर के न्याय के समक्ष प्रस्तुत होने में अनिच्छुक हमारे दिलों को संदर्भित करता है। तब तुरंत ही मैंने डर और थरथराहट महसूस करनी शुरू कर दी। भले ही मैंने कलीसिया नहीं छोड़ा था, लेकिन मेरा दिल परमेश्वर के न्याय से भागने की कोशिश करने लगा था। मैं निश्चित रूप से वह कठपुतली और कपटी नहीं हूं जो परमेश्वर के न्याय की कुर्सी से भागती है? फिर भी मैंने यह विश्वास किया था कि केवल वे लोग ही जो कलीसिया छोड़ देते हैं, वे परमेश्वर के सिंहासन से भागने वाली कठपुतलियां और कपटी हैं, जबकि मैं परमेश्वर का उद्धार पाने के बहुत निकट थी। मैं देखती हूं कि परमेश्वर के वचन को लेकर मेरी समझ काफी एक पक्षी और उथली थी, और परमेश्वर के कार्य का मेरा ज्ञान भी बहुत कम था। अब, केवल वे ही जो ईमानदारी से परमेश्वर की ताड़ना और न्याय को स्वीकार करते हैं और जिनके स्वभाव ने परिवर्तन हासिल कर लिया है, वे ही सच में परमेश्वर का उद्धार हासिल करेंगे। इसके विपरीत, मैं अपनी खुद की कल्पना में जी रही थी, सत्य की भूख पैदा नहीं कर रही थी, अपनी खुद की जिंदगी के लिए जिम्मेदारी नहीं उठा रही थी, और मुझमें खतरे या आग्रह की चेतना बिल्कुल भी नहीं थी। अगर मैंने इसे जारी रखती हूं, तो क्या मैं निस्संदेह परमेश्वर के दंड की पात्र नहीं बनूंगी?

परमेश्वर के वचनों की प्रबु​द्धता का आभार, कि मैं अपने खुद के दृष्टिकोण और कल्पना से जाग गई हूं, यह समझ गई कि मैं वह व्यक्ति नहीं हूं जो परमेश्वर की ताड़ना और न्याय को स्वीकार करने की इच्छुक है। इससे मैंने यह भी देखा कि मैं खतरे की कगार पर हूं। अब से, मैं अपना दिल पूरी तरह से परमेश्वर को दे दूंगी, उसकी ताड़ना और न्याय के समक्ष प्रस्तुत रहूंगी, और सत्‍य एवं स्वभाव में परिवर्तन हासिल करने की पूरी कोशिश करूंगी, ताकि मैं जल्द ही परमेश्वर द्वारा शुद्ध और पूर्ण की जा सकूं।

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