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परमेश्वर की आवाज़ सुनें और प्रभु यीशु की वापसी का स्वागत करें!

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अंत के दिनों के मसीह के लिए गवाहियाँ

(परमेश्वर की गवाही देने के बीस सत्य)

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भाग दो

परमेश्वर के कार्य के संग तालमेल बिठाने के लिए किसी को परमेश्वर में अपनी आस्था में किन धार्मिक धारणाओं का समाधान करना चाहिए

प्रश्न 1: हमारा मानना है कि परमेश्वर की वापसी का अर्थ है कि विश्वासियों को सीधे स्वर्ग के राज्य में उठा लिया जाता है, क्योंकि यह बाइबल में लिखा हुआ है: "तब हम जो जीवित और बचे रहेंगे उनके साथ बादलों पर उठा लिये जाएँगे कि हवा में प्रभु से मिलें; और इस रीति से हम सदा प्रभु के साथ रहेंगे" (1 थिस्सलुनीकियों 4:17)। तुम प्रमाणित कर रहे हो कि प्रभु यीशु वापस आ गया है, तो हम अब पृथ्वी पर क्यों हैं और अभी तक स्वर्गारोहित क्यों नहीं हुए हैं?
प्रश्न 2: तुम यह प्रमाणित करते हो कि परमेश्वर ने देहधारण किया है और अंतिम दिनों में न्याय का कार्य करने के लिए मनुष्य का पुत्र बन चुका है, और फिर भी अधिकांश धार्मिक पादरी और प्राचीन लोग इस बात की पुष्टि करते हैं कि परमेश्वर बादलों के साथ लौटेगा, और वे इसका आधार मुख्यतः बाइबल की इन पंक्तियों पर रखते हैं: "यही यीशु ... जो तुम्हारे पास से स्वर्ग पर उठा लिया गया है, जिस रीति से तुम ने उसे स्वर्ग को जाते देखा है उसी रीति से वह फिर आएगा" (प्रेरितों 1:11)। "देखो, वह बादलों के साथ आनेवाला है, और हर एक आँख उसे देखेगी" (प्रकाशितवाक्य 1:7)। और इसके अलावा, धार्मिक पादरियों और प्राचीन लोगों ने हमें यह भी निर्देश दिया है कि कोई भी प्रभु यीशु जो बादलों के साथ नहीं आता है, वह झूठा है और उसे छोड़ दिया जाना चाहिए। इसलिए हम निश्चित नहीं हो पा रहे हैं कि यह नज़रिया बाइबल के अनुरूप है या नहीं; इसे सच मान लेना उचित है या नहीं?
प्रश्न 3: तुम कहते हो कि प्रभु यीशु वापस आ गया है, तो हमने उसे देखा क्यों नहीं है? देखकर ही विश्वास किया जा सकता है। अगर हमने उसे नहीं देखा है, तो इसका मतलब यही होना चाहिए कि वह अभी तक लौटा नहीं है; हम तभी विश्वास करेंगे जब उसे देख लेंगे। तुम कहते हो कि प्रभु यीशु वापस आ गया है, तो वह इस समय कहाँ है? वह क्या काम कर रहा है? प्रभु ने क्या वचन कहे हैं? हम तभी विश्वास करेंगे जब तुम इन बातों की स्पष्ट रूप से गवाही दोगे।
प्रश्न 4: धार्मिक पादरी और प्राचीन लोग अक्सर विश्वासियों के लिए ऐसा प्रचार करते हैं कि कोई भी उपदेश जो कहता है कि प्रभु देह में आ गया है, वह झूठा है। वे बाइबल की इन पंक्तियों को इसका आधार बनाते हैं: "उस समय यदि कोई तुम से कहे, 'देखो, मसीह यहाँ है!' या 'वहाँ है।' तो विश्‍वास न करना। क्योंकि झूठे मसीह और झूठे भविष्यद्वक्‍ता उठ खड़े होंगे, और बड़े चिह्न, और अद्भुत काम दिखाएँगे कि यदि हो सके तो चुने हुओं को भी भरमा दें" (मत्ती 24:23-24)। अब हमें कुछ पता नहीं है कि हमें सच्चे मसीह को झूठों से कैसे पहचानना चाहिए, इसलिए कृपया इस प्रश्न का उत्तर दो।
प्रश्न 5: प्रभु यीशु देहधारी परमेश्वर था और कोई भी इस से इन्कार नहीं कर सकता। अब तुम यह गवाही दे रहे हो कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर ही देह में लौटा हुआ प्रभु यीशु है, परन्तु धार्मिक पादरियों और प्राचीन लोगों का कहना है कि तुम जिसमें विश्वास करते हो वह सिर्फ एक व्यक्ति है, वे कहते हैं कि तुम लोगों को धोखा दिया गया है, और हम इसका भेद समझ नहीं पाते हैं। उस समय जब प्रभु यीशु देह बना और छुटकारे का कार्य करने के लिए आया, यहूदी फरीसियों ने भी कहा कि प्रभु यीशु केवल एक व्यक्ति था, कि जो कोई भी उस पर विश्वास करता है, वह धोखा खा रहा है। इसलिए, हम देहधारण के बारे में सत्य के इस पहलू का अनुसरण करना चाहते हैं। वास्तव में देहधारण क्या होता है? और देहधारण का सार क्या है? कृपया हमारे लिए इस बारे में सहभागिता करो।
प्रश्न 6: हम सब जानते हैं कि प्रभु यीशु परमेश्वर का देहधारण थे। अपना कार्य पूरा करने के बाद, उन्हें सूली पर लटका दिया गया और तब वे फिर से जीवित हो उठे और अपने सभी शिष्यों के समक्ष प्रकट हुए और वे अपने तेजस्वी आध्यात्मिक शरीर के साथ स्वर्ग में पहुँच गए। जैसा कि बाइबल में कहा गया है: "हे गलीली पुरुषो, तुम क्यों खड़े आकाश की ओर देख रहे हो? यही यीशु, जो तुम्हारे पास से स्वर्ग पर उठा लिया गया है, जिस रीति से तुम ने उसे स्वर्ग को जाते देखा है उसी रीति से वह फिर आएगा" (प्रेरितों 1:11)। इस प्रकार, बाइबल-संबंधी शास्‍त्र इस बात की पुष्टि करते हैं कि जब प्रभु फिर से आएंगे, तो उनका पुनर्जीवित आध्यात्मिक शरीर हमारे सामने दिखाई देगा। अंत के दिनों में, परमेश्वर ने न्याय का कार्य करने के लिए मनुष्य के पुत्र के रूप में देहधारण क्यों किया है? प्रभु यीशु के पुनर्जीवित आध्यात्मिक शरीर और मनुष्य के पुत्र के रूप में उनके देहधारण के बीच क्या अंतर है?
प्रश्न 7: कल रात मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के इन वचनों को पढ़ा, "भ्रष्ट मनुष्यजाति को देहधारी परमेश्वर के उद्धार की अधिक आवश्यकता है" मुझे लगता है यह परमेश्वर के वचन का बेहतरीन, बहुत ही व्यावहारिक अंश है, और बहुत ही महत्वपूर्ण है। इस संदर्भ में कि भ्रष्ट मानवजाति को परमेश्वर के देहधारण का उद्धार क्यों मिलना चाहिए, यह सत्य का एक ऐसा पहलू है जिसे मनुष्य को अतिशीघ्र समझना चाहिए। कृपया इस पर हमारे साथ थोड़ा और संवाद करें ताकि हम सब सत्य के इस पहलू को समझ सकें।
प्रश्न 8: व्यवस्था के युग का कार्य करने के लिए परमेश्वर ने मूसा का उपयोग किया, तो अंतिम दिनों में परमेश्वर अपने न्याय के कार्य को करने के लिए लोगों का इस्तेमाल क्यों नहीं करता है, बल्कि इस कार्य को उसे खुद करने के लिए देह बनने की ज़रूरत क्यों है? और देहधारी परमेश्वर और परमेश्वर जिन लोगों का उपयोग करते हैं, उनमें क्या ख़ास अंतर है?
प्रश्न 9: अनुग्रह के युग में, परमेश्वर मानवजाति की पाप-बलि के रूप में सेवा करने के लिए देह बना, और पापों से उन्हें बचा लिया। अंतिम दिनों में परमेश्वर सत्य को प्रकट करने और न्याय के अपने कार्य को करने के लिए फिर से देह बन गया है, ताकि मनुष्य को पूरी तरह से शुद्ध किया जा सके और बचाया जा सके। तो मानव जाति को बचाने का कार्य करने के लिए परमेश्वर को दो बार देहधारण की आवश्यकता क्यों पड़ती है? और परमेश्वर का दो बार देहधारण करने का वास्तविक महत्व क्या है?
प्रश्न 10: यह स्पष्ट रूप से बाइबल में लिखा है कि प्रभु यीशु मसीह है, परमेश्वर का पुत्र है, और वे सभी लोग जो प्रभु में विश्वास करते हैं, वे भी मानते हैं कि प्रभु यीशु मसीह है और वह परमेश्वर का पुत्र है। और फिर भी तुम यह गवाही दे रहे हो कि देहधारी मसीह परमेश्वर का प्रकटन है, कि वह खुद परमेश्वर है। तुम कृपया हमें यह बताओगे कि क्या देहधारी मसीह, वास्तव में परमेश्वर का पुत्र है या स्वयं परमेश्वर है?
प्रश्न 11: तुम इसका प्रमाण प्रस्तुत करते हो कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर सत्य को अभिव्यक्त करता है और अंतिम दिनों में न्याय का अपना कार्य करता है। मुझे लगता है कि प्रभु यीशु में हमारा विश्वास और पवित्र आत्मा के कार्य की स्वीकृति का मतलब है कि हमने पहले से ही परमेश्वर के न्याय का अनुभव किया है। सबूत के तौर पर यहाँ प्रभु यीशु के वचन दिए गए हैं: "क्योंकि यदि मैं न जाऊँ तो वह सहायक तुम्हारे पास न आएगा; परन्तु यदि मैं जाऊँगा, तो उसे तुम्हारे पास भेजूँगा। वह आकर संसार को पाप और धार्मिकता और न्याय के विषय में निरुत्तर करेगा" (यूहन्ना 16:7-8)। हमारा मानना है कि, हालांकि प्रभु यीशु का कार्य छुटकारे का कार्य था, जब वह स्वर्ग तक पहुंच गया तो पेन्तेकोस्त के दिन, पवित्र आत्मा उतर आया और उसने मनुष्यों पर काम किया: "... संसार को पाप और धार्मिकता और न्याय के विषय में निरुत्तर करेगा।" यह आखिरी दिनों में परमेश्वर के न्याय का कार्य होना चाहिए, इसलिए मैं जिस बात का अनुसरण करना चाहता/चाहती हूँ, वो यह है कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर द्वारा अंतिम दिनों में किए गए न्याय के कार्य और प्रभु यीशु के कार्य के बीच वास्तव में क्या भिन्नताएँ हैं?
प्रश्न 12: तुमने गवाही दी है कि परमेश्वर वापस आया है और अंतिम दिनों में परमेश्वर के घर से शुरू होने वाले न्याय के कार्य को करता है। यह प्रकाशित वाक्य में लिखित महान श्वेत सिंहासन के न्याय से अलग लगता है। धर्म में ज्यादातर लोग यह सोचते हैंकि महान श्वेत सिंहासन का न्याय उन गैर-विश्वासियों पर लक्षित होता है जो शैतान के लोग होते हैं। जब प्रभु आएगा, तो विश्वासियों को स्वर्ग में उठा लिया जाएगा, और फिर वह गैर-विश्वासियों को नष्ट करने के लिए विपत्ति को भेजेगा। यह महान श्वेत सिंहासन के सामने होने वाला न्याय है। तुम अंतिम दिनों में परमेश्वर के न्याय की शुरुआत की गवाही देते हो, लेकिन हमने परमेश्वर को गैर-विश्वासियों को नष्ट करने के लिए विपत्ति लाते हुए नहीं देखा है। तो फिर यह कैसे महान श्वेत सिंहासन का न्याय हो सकता है?
प्रश्न 13: धार्मिक दुनिया में अधिकांश लोग मानते हैं कि क्रूस पर प्रभु यीशु का यह कहना कि "पूरा हुआ" (यूहन्ना 19:30) सबूत है कि परमेश्वर का उद्धार का कार्य पहले ही पूरी तरह से समाप्त हो चुका है। और फिर भी तुम यह गवाही देते हो कि परमेश्वर सत्य को व्यक्त करने के लिए और लोगों को पूरी तरह से बचाने के लिए परमेश्वर के घर से शुरू होने वाले न्याय के कार्य को करने के लिए देह में लौटा है। तो मनुष्य को बचाने के लिए परमेश्वर के कार्य को वास्तव में कैसे समझना चाहिए? हम सत्य के इस पहलू पर स्पष्ट नहीं हैं, इसलिए कृपया हमारे लिए इस पर सहभागिता करो।
प्रश्न 14: बाइबल कहती है: "क्योंकि धार्मिकता के लिये मन से विश्‍वास किया जाता है, और उद्धार के लिये मुँह से अंगीकार किया जाता है" (रोमियों 10:10)। हम मानते हैं कि प्रभु यीशु ने हमारे पापों को क्षमा कर दिया है और विश्वास के द्वारा हमें धर्मी बना दिया है। इसके अलावा, हम मानते हैं कि अगर किसी को एक बार बचाया जाता है, तो वे हमेशा के लिए बचा लिए जाते हैं, और जब परमेश्वर वापस आएगा तो हम तुरंत स्वर्गारोहित हो जाएँगे और स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करेंगे। तो तुम क्यों गवाही दे रहे हो कि बचाए जाने और स्वर्ग के राज्य में लाये जाने से पहले हमें आखिरी दिनों के परमेश्वर के न्याय को स्वीकार करना चाहिए?
प्रश्न 15: हम पौलुस के उदाहरण का अनुसरण करते हैं और हम प्रभु के लिए कड़ी मेहनत करते हैं, सुसमाचार फैलाते हैं और प्रभु के लिए गवाही देते हैं, और पौलुस की तरह प्रभु की कलिसियाओं की चरवाही करते हैं: "मैं अच्छी कुश्ती लड़ चुका हूँ, मैं ने अपनी दौड़ पूरी कर ली है, मैं ने विश्‍वास की रखवाली की है" (2 तीमुथियुस 4:7)। क्या यह परमेश्वर की इच्छा का अनुसरण करना नहीं है? इस तरह से अभ्यास करने का अर्थ यह होना चाहिए कि हम स्वर्गारोहित होने और स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने के योग्य हैं, तो हमें स्वर्ग के राज्य में लाये जाने से पहले परमेश्वर के अंतिम दिनों के न्याय और शुद्धि के कार्य को क्यों स्वीकार करना चाहिए?
प्रश्न 16: तुम कहते हो कि जो लोग परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, उन्हें परमेश्वर के अंतिम दिनों के न्याय के कार्य को स्वीकार करना चाहिए और उसके बाद ही उनके भ्रष्ट स्वभाव शुद्ध हो सकते हैं और स्वयं वे परमेश्वर द्वारा बचाए जा सकते हैं। परन्तु हम, परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार, नम्रता और धैर्य का अभ्यास करते हैं, हमारे दुश्मनों से प्रेम करते हैं, हमारे क्रूसों को उठाते हैं, संसार की चीजों को त्याग देते हैं, और हम परमेश्वर के लिए काम करते हैं और प्रचार करते हैं, इत्यादि। तो क्या ये सभी हमारे बदलाव नहीं हैं? हमने हमेशा इस तरह से चाह की है, तो क्या हम भी शुद्धि तथा स्वर्गारोहण को प्राप्त नहीं कर सकते और स्वर्ग के राज्य में प्रवेश नहीं कर सकते?
प्रश्न 17: तुम यह गवाही देते हो कि परमेश्वर ने सत्य को व्यक्त करने के लिए और आखिरी दिनों में मनुष्य के न्याय और शुद्धि के कार्य को करने के लिए वापस देहधारण किया है, लेकिन धार्मिक पादरियों और प्राचीन लोगों का विश्वास है कि परमेश्वर बादलों के साथ वापस लौटेगा, और जो लोग प्रभु में विश्वास करते हैं, वे एक पल में रूपांतरित हो जाएँगे और बादलों में परमेश्वर के साथ मिलने के लिए स्वर्गारोहित होंगे, जैसा कि पौलुस ने कहा था: "पर हमारा स्वदेश स्वर्ग पर है; और हम एक उद्धारकर्ता प्रभु यीशु मसीह के वहाँ से आने की बाट जोह रहे हैं। वह अपनी शक्‍ति के उस प्रभाव के अनुसार जिसके द्वारा वह सब वस्तुओं को अपने वश में कर सकता है, हमारी दीन-हीन देह का रूप बदलकर, अपनी महिमा की देह के अनुकूल बना देगा" (फिलिप्पियों 3:20-21)। परमेश्वर सर्वशक्तिमान है और ऐसा कुछ भी नहीं है जो वह नहीं कर सकता है। परमेश्वर हमें बदल देगा और हमें पवित्र बना देगा, वह सिर्फ एक ही वचन के साथ इसे प्राप्त कर लेगा। तो फिर उसे सत्य व्यक्त करने और मनुष्य के न्याय और शुद्धि के कार्य के एक चरण को पूरा करने के लिए अब भी देह बनने की आवश्यकता क्यों है?
प्रश्न 18: तुम गवाही देते हो कि अंतिम दिनों में परमेश्वर सत्य को व्यक्त करता है और मनुष्य को पहचानने और शुद्ध करने का कार्य करता है, तो परमेश्वर कैसे न्याय करता है, शुद्ध करता है और मनुष्य को बचाता है?
प्रश्न 19: तुम इसकी गवाही देते हो कि अंतिम दिनों में परमेश्वर मनुष्य को पूरी तरह से शुद्ध करने और बचाने के लिए न्याय के अपने कार्य को करता है, परन्तु सर्वशक्तिमान परमेश्वर द्वारा व्यक्त वचनों को पढ़ने के बाद, मुझे लगता है कि उनमें से कुछ मनुष्य की निंदा करते और उसे शाप देते हैं। यदि परमेश्वर मनुष्य को निन्दित और शापित करता है, तो क्या मनुष्य को सजा भुगतनी नहीं होगी? और तुम यह कैसे कह सकते हो कि इस तरह का न्याय मानव जाति को शुद्ध करता और बचाता है?
प्रश्न 20: प्रभु यीशु के छुटकारे के कार्य का एक पहलू हमारे पापों को क्षमा और निरस्त करना था, जबकि दूसरा पहलू हमें शांति, आनन्द और भरपूर अनुग्रह प्रदान करना था। इससे हम यह देख पाते हैं कि परमेश्वर एक दयालु और प्रेमी परमेश्वर है। परन्तु तुम यह गवाही देते हो कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर अंतिम दिनों में न्याय का कार्य करता है, कि वह सत्य को अभिव्यक्त करता है और मनुष्य को न्याय और ताड़ना देता है, मनुष्य को काटता-छाँटता और उससे निपटता है, मनुष्य को उजागर करता है और सभी प्रकार के बुरे लोगों, बुरी आत्माओं और मसीह-विरोधियों को हटा देता है, जिससे लोगों को यह देखने का अवसर मिलता है कि परमेश्वर का धर्मी स्वभाव किसी भी अपराध को सहन नहीं करता है। प्रभु यीशु के कार्य में प्रकट होने वाला स्वभाव सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कार्य में प्रकट होने वाले स्वभाव से बिलकुल अलग क्यों है? हमें परमेश्वर के स्वभाव को यथार्थतः किस प्रकार समझना चाहिए?
प्रश्न 21: बाइबल में यह लिखा गया है: "यीशु मसीह कल और आज और युगानुयुग एक–सा है" (इब्रानियों 13:8)। तो परमेश्वर का नाम कभी नहीं बदलता है! लेकिन तुम कहते हो कि जब परमेश्वर अंतिम दिनों में फिर से आएगा तो वह एक नया नाम लेगा और उसे सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहा जाएगा। तुम इसे कैसे समझा सकते हो?
प्रश्न 22: प्रभु यीशु को क्रूस पर मनुष्यों के लिए पाप-बलि के रूप में कीलों से जड़ दिया गया था, जिससे हमें पाप से बचा लिया गया। अगर हम प्रभु यीशु से भटकते हैं और सर्वशक्तिमान परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, तो क्या यह प्रभु यीशु के प्रति विश्वासघात नहीं होगा? क्या यह धर्मत्याग नहीं होगा?
प्रश्न 23: प्रभु यीशु ने कहा: "परन्तु जो कोई उस जल में से पीएगा जो मैं उसे दूँगा, वह फिर अनन्तकाल तक प्यासा न होगा; वरन् जो जल मैं उसे दूँगा, वह उसमें एक सोता बन जाएगा जो अनन्त जीवन के लिये उमड़ता रहेगा" (यूहन्ना 4:14)। अधिकांश लोग सोचते हैं कि प्रभु यीशु ने हमें पहले से ही अनन्त जीवन का मार्ग प्रदान किया है, लेकिन मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के इन वचनों को पढ़ा है: "केवल अंतिम दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनन्त जीवन का मार्ग दे सकता है।" यह सब क्या है? यह क्यों कहता है कि आखिरी दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनन्त जीवन का मार्ग दे सकता है?
प्रश्न 24: तुम यह प्रमाण देते हो कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर देहधारी परमेश्वर है, जो अभी अंतिम दिनों में अपने न्याय के कार्य को कर रहा है। लेकिन धार्मिक पादरियों और प्राचीन लोगों का कहना है कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर का कार्य वास्तव में मनुष्य का काम है, और बहुत से लोग जो प्रभु यीशु पर विश्वास नहीं करते, वे कहते हैं कि ईसाई धर्म एक मनुष्य में विश्वास है। हम अभी भी यह नहीं समझ पाए हैं कि परमेश्वर के कार्य और मनुष्य के काम के बीच में क्या अंतर है, इसलिए कृपया हमारे लिए यह सहभागिता करो।
प्रश्न 25: तुम यह गवाही देते हो कि प्रभु यीशु पहले से ही सर्वशक्तिमान परमेश्वर के रूप में वापस आ चुका है, कि वह पूरी सत्य को अभिव्यक्त करता है जिससे कि लोग शुद्धिकरण प्राप्त कर सकें और बचाए जा सकें, और वर्तमान में वह परमेश्वर के घर से शुरू होने वाले न्याय के कार्य को कर रहा है, लेकिन हम इसे स्वीकार करने की हिम्मत नहीं करते। यह इसलिए है क्योंकि धार्मिक पादरियों और प्राचीन लोगों का हमें बहुधा यह निर्देश है कि परमेश्वर के सभी वचन और कार्य बाइबल में अभिलेखित हैं और बाइबल के बाहर परमेश्वर का कोई और वचन या कार्य नहीं हो सकता है, और बाइबल के विरुद्ध या उससे परे जाने वाली हर बात विधर्म है। हम इस समस्या को समझ नहीं सकते हैं, तो तुम कृपया इसे हमें समझा दो।
प्रश्न 26: धार्मिक पादरी और प्राचीन लोग बाइबल में पौलुस के इन शब्दों को थामे रहते हैं: "सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र परमेश्‍वर की प्रेरणा से रचा गया है" (2 तीमुथियुस 3:16), वे ऐसा विश्वास करते हैं कि बाइबल की हर बात परमेश्वर का ही वचन है, लेकिन तुम कहते हो कि बाइबल के शब्द पूरी तरह से परमेश्वर के वचन नहीं हैं, तो यह सब क्या है?
प्रश्न 27: बाइबल ईसाई धर्म का अधिनियम है और जो लोग प्रभु में विश्वास करते हैं, उन्होंने दो हजार वर्षों से बाइबल के अनुसार ऐसा विश्वास किया हैं। इसके अलावा, धार्मिक दुनिया में अधिकांश लोग मानते हैं कि बाइबल प्रभु का प्रतिनिधित्व करती है, कि प्रभु में विश्वास बाइबल में विश्वास है, और बाइबल में विश्वास प्रभु में विश्वास है, और यदि कोई बाइबल से भटक जाता है तो उसे विश्वासी नहीं कहा जा सकता। क्या मैं पूछ सकता हूँ कि इस तरीके से प्रभु पर विश्वास करना प्रभु की इच्छा के अनुरूप है या नहीं?
प्रश्न 28: बाइबल परमेश्वर के कार्य का प्रमाण है; केवल बाइबल पढ़ने के द्वारा ही प्रभु पर विश्वास करने वाले लोग यह जान सकते हैं कि परमेश्वर ने आकाश और पृथ्वी और सभी चीजों को बनाया और इसी से वे परमेश्वर के अद्भुत कार्यों, उसकी महानता और सर्वशक्तिमानता को देख सकते हैं। बाइबल में परमेश्वर के बहुत सारे वचन और मनुष्य के अनुभवों की बहुत सारी गवाहियाँ हैं; यह मनुष्य के जीवन के लिए प्रावधान कर सकती है और मनुष्य के लिए बहुत लाभदायक हो सकती है, इसलिए मुझे जिसकी खोज करनी है वह यह है कि क्या हम वास्तव में बाइबल पढ़ने के द्वारा अनन्त जीवन को प्राप्त कर सकते हैं? क्या बाइबल के भीतर वास्तव में अनन्त जीवन का कोई मार्ग नहीं है?
प्रश्न 29: दो हजार वर्षों से, परमेश्वर में मनुष्य का विश्वास बाइबल पर आधारित रहा है, और प्रभु यीशु के आगमन ने बाइबल के पुराने नियम को नकारा नहीं है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने जब अंतिम दिनों में न्याय के अपने कार्य को कर लिया होगा, तो हर कोई जो सर्वशक्तिमान परमेश्वर को स्वीकार करता है, वह सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने पर ध्यान केन्द्रित करेगा और शायद ही कभी बाइबल को पढ़ेगा। मुझे जिसकी जानकारी लेनी है वह यह है कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अंतिम दिनों के कार्य को स्वीकार करने के बाद, बाइबल के प्रति सही दृष्टिकोण क्या है, और इसका इस्तेमाल कैसे करना चाहिए? किसी व्यक्ति के लिए परमेश्वर पर विश्वास करने का आधार क्या होना चाहिए, ताकि वह परमेश्वर पर विश्वास करने के मार्ग पर चल सके और परमेश्वर के उद्धार को हासिल कर सके?
प्रश्न 30: तुम यह गवाही देते हो कि प्रभु यीशु पहले से ही सर्वशक्तिमान परमेश्वर के रूप में लौट चुका है, वह उस संपूर्ण सत्य को अभिव्यक्त करता है जो मानवता को शुद्ध बनाता और उसे बचाता है और वह परमेश्वर के परिवार से शुरू होने वाले न्याय के कार्य को करता है, तो हमें परमेश्वर की आवाज़ को कैसे पहचाननी चाहिए और हमें कैसे इस बात की पुष्टि करनी चाहिए कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर वास्तव में लौटा हुआ प्रभु यीशु ही है?
प्रश्न 31: तुम इस बात की गवाही देते हो कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर जिन वचनों को "वचन देह में प्रकट होता है" में व्यक्त करता है, वे स्वयं परमेश्वर के ही वचन हैं, लेकिन हम मानते हैं कि वे किसी ऐसे व्यक्ति के शब्द हैं जो पवित्र आत्मा द्वारा प्रबुद्ध हुआ है। इसलिए, जिसकी मुझे खोज करनी है वह यह है कि देहधारी परमेश्वर द्वारा व्यक्त किए गए वचनों और पवित्र आत्मा के द्वारा प्रबुद्ध किये गये व्यक्ति के शब्दों के बीच यथार्थतः क्या अंतर है?
प्रश्न 32: फरीसियों ने अक्सर धार्मिक और करुणाशील रूप धारण कर सभाओं में लोगों से बाइबल की व्याख्या की, और वे जाहिर तौर पर कुछ भी गैरकानूनी करते हुए दिखाई नहीं देते थे। तो क्यों प्रभु यीशु ने फरीसियों को शाप दिया था? उनका ढोंग कैसे प्रकट हुआ था? ऐसा क्यों कहा जाता है कि धार्मिक पादरी और प्राचीन लोग ढोंगी फरीसियों के मार्ग पर ही चलते हैं?
प्रश्न 33: उस समय, जब प्रभु यीशु अपने कार्य को करने के लिए आया था, यहूदी फरीसियों ने उसका अंधाधुंध विरोध किया, उसकी निंदा की और उसे क्रूस पर कीलों से जड़ दिया। जब अंतिम दिनों का सर्वशक्तिमान परमेश्वर अपना कार्य करने के लिए आता है, तो धार्मिक पादरी और प्राचीन लोग उसकी भी अवहेलना और निंदा करते हैं, परमेश्वर को फिर एक बार क्रूस पर चढ़ाते हैं। यहूदी फरीसी, धार्मिक पादरी और प्राचीन लोग इस तरह सत्य से नफरत क्यों करते हैं और क्यों इस तरह मसीह के विरुद्ध खुद को खड़ा कर देते हैं? वास्तव में उनका निहित सार क्या है?
प्रश्न 34: धार्मिक पादरियों और प्राचीन लोगों को बाइबल का सशक्त ज्ञान है, वे प्रायः लोगों के समक्ष बाइबल का विस्तार करते हैं और उन्हें बाइबल का सहारा बनाये रखने के लिए कहते हैं, इसलिए बाइबल की व्याख्या करना और उसकी प्रशंसा करना क्या वास्तव में परमेश्वर की गवाही देना और प्रशंसा करना है? ऐसा क्यों कहा जाता है कि धार्मिक पादरी और प्राचीन लोग ढोंगी फरीसी हैं? हम अभी भी इसको समझ नहीं सकते हैं, तो क्या तुम हमारे लिए इसका जवाब दे सकते हो?
प्रश्न 35: धार्मिक दुनिया के अधिकांश लोग मानते हैं कि पादरियों और प्राचीन लोगों को परमेश्वर के द्वारा चुना और प्रतिष्ठित किया गया है, और यह कि वे सभी धार्मिक कलीसियाओं में परमेश्वर की सेवा करते हैं; अगर हम पादरियों और प्राचीन लोगों का अनुसरण और आज्ञा-पालन करते हैं, तो हम वास्तव में परमेश्वर का ही अनुसरण और आज्ञा-पालन करते हैं। यथार्थतः मनुष्य का अनुसरण और आज्ञा-पालन करने का क्या मतलब है, और वास्तव में परमेश्वर का अनुसरण और आज्ञा-पालन करने का क्या अर्थ है, ज्यादातर लोग सत्य के इस पहलू को नहीं समझते हैं, तो कृपया हमारे लिए यह सहभागिता करो।
प्रश्न 36: धार्मिक पादरियों और प्राचीन लोगों की धार्मिक संसार में सत्ता बनी हुई है और ज्यादातर लोग उनका पालन और अनुसरण करते हैं—यह एक सच्चाई है। तुम कहते हो कि धार्मिक पादरी और प्राचीन लोग इस बात को स्वीकार नहीं करते हैं कि परमेश्वर ने देहधारण किया है, कि वे देहधारी परमेश्वर द्वारा प्रकट सत्य पर विश्वास नहीं करते और वे फरीसियों के मार्ग पर चल रहे हैं, और हम इस बात से सहमत हैं। लेकिन तुम यह क्यों कहते हो कि सारे धार्मिक पादरी और प्राचीन लोग पाखंडी फरीसी हैं, कि वे सभी मसीह-विरोधी हैं जो अंतिम दिनों में देहधारी परमेश्वर के कार्य से उघाड़ दिए गए हैं, और वे अंत में विनाश में डूब जाएँगे? हम इस समय इस बात को स्वीकार नहीं कर सकते। तुम अपना यह दावा कि इन लोगों को नहीं बचाया जा सकता है और उन सभी को विनाश में डूबना चाहिए, किस बात पर आधारित करते हो, इस पर कृपया सहभागिता करो।
प्रश्न 37: यद्यपि पादरी और प्राचीन लोग धार्मिक दुनिया में सत्ता रखते हैं और वे ढोंगी फरीसियों के मार्ग पर चलते हैं, हम तो प्रभु यीशु में विश्वास करते हैं, पादरी और प्राचीन लोगों में नहीं, तो तुम यह कैसे कह सकते हो कि हम भी फरीसियों के रास्ते पर चलते हैं? क्या हम वास्तव में धर्म के भीतर रहकर परमेश्वर में विश्वास करने के द्वारा बचाए नहीं जा सकते हैं?
प्रश्न 38: हाल के वर्षों में, धार्मिक संसार में विभिन्न मत और संप्रदाय अधिक से अधिक निराशाजनक हो गए हैं, लोगों ने अपना मूल विश्वास और प्यार खो दिया है और वे अधिक से अधिक नकारात्मक और कमज़ोर बन गए हैं। हम उत्साह का मुरझाना भी देखते हैं और हमें लगता है कि हमारे पास प्रचार करने के लिए कुछ नहीं है और हम सभी ने पवित्र आत्मा के कार्य को खो दिया है। कृपया हमें बताओ, पूरी धार्मिक दुनिया इतनी निराशाजनक क्यों है? क्या परमेश्वर वास्तव में इस दुनिया से नफरत करता है और क्या उसने इसे त्याग दिया है? हमें "प्रकाशितवाक्य" पुस्तक में धार्मिक दुनिया के प्रति परमेश्वर के शाप को कैसे समझना चाहिए?
प्रश्न 39: दो हजार वर्षों से, पूरी धार्मिक दुनिया का मानना है कि परमेश्वर एक ट्रिनिटी या रित्व है, और त्रित्व पूरे ईसाई सिद्धांत का एक उत्कृष्ट मत है। तो क्या "त्रित्व" की विवेचना सचमुच टिक पाती है? क्या त्रित्व वास्तव में मौजूद है? तुम यह क्यों कहते हो कि त्रित्व धार्मिक दुनिया का सबसे बड़ा भ्रम है?
प्रश्न 40: सर्वशक्तिमान परमेश्वर, अंतिम दिनों का मसीह, सत्य को व्यक्त करता है और मानवता को शुद्ध करने और बचाने के लिए न्याय का अपना कार्य करता है, और फिर भी वह धार्मिक दुनिया और चीनी कम्युनिस्ट सरकार, दोनों की बेतहाशा निंदा और क्रूर कार्यवाही का मुकाबला करता है, जहां वे मसीह का तिरस्कार करने, उसकी निन्दा करने, उसे पकड़ने और नष्ट करने के लिए उनके सशस्त्र बलों और सभी मीडिया तक को जुटाते हैं। जब प्रभु यीशु का जन्म हुआ, तब हेरोदेस ने सुना कि "इस्राएल का राजा" पैदा हो चुका था और उसने सभी नर बच्चों को जो बेतलेहेम में थे और दो वर्ष से कम उम्र के थे, मरवा डाला था; उसे मसीह को जीवित रहने देने की बजाय दस हजार बच्चों को गलत ढंग से मार डालना बेहतर लगा। परमेश्वर ने मानवजाति को बचाने के लिए देहधारण किया है, तो धार्मिक दुनिया और नास्तिक सरकार क्यों परमेश्वर के प्रकटन और कार्य के खिलाफ अंधाधुंध तिरस्कार और निन्दा करती हैं? क्यों वे पूरे देश की ताकत को झुका देते हैं और मसीह को क्रूस पर कीलों से जड़ने के लिए कोई प्रयास बाक़ी नहीं रखते हैं? मानव जाति इतनी बुरी क्यों है, वह परमेश्वर से इतनी नफरत क्यों करती है और क्यों उसके खिलाफ खुद मोर्चा लेती है?
प्रश्न 41: हमने चीनी कम्युनिस्ट सरकार और धार्मिक दुनिया के कई भाषण ऑनलाइन देखे हैं जो सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया की बदनामी और झूठी निंदा करते हैं, उन पर आक्षेप और कलंक लगाते हैं (जैसे कि झाओयुआन, शेडोंग प्रांत की "28 मई" वाली घटना)। हम यह भी जानते हैं कि सीसीपी लोगों से झूठ और गलत बातें कहने में, और तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर लोगों को धोखा देने में माहिर है, साथ ही साथ उन देशों का जिनके यह विरोध में है, उनका अपमान करने, उन पर हमला करने और उन की आलोचना करने में भी माहिर है, इसलिए सीसीपी के कहे गए किसी भी शब्द पर बिल्कुल विश्वास नहीं किया जाना चाहिए। लेकिन धार्मिक पादरियों और प्राचीन लोगों के द्वारा कही गई कई बातें सीसीपी के शब्दों से मेल खाती हैं, तो फिर हमें सीसीपी और धार्मिक दुनिया से आने वाले निन्दापूर्ण, अपमानजनक शब्दों को कैसे परखना चाहिए?
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