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प्रश्न 12: तुमने गवाही दी है कि परमेश्वर वापस आया है और अंतिम दिनों में परमेश्वर के घर से शुरू होने वाले न्याय के कार्य को करता है। यह प्रकाशित वाक्य में लिखित महान श्वेत सिंहासन के न्याय से अलग लगता है। धर्म में ज्यादातर लोग यह सोचते हैंकि महान श्वेत सिंहासन का न्याय उन गैर-विश्वासियों पर लक्षित होता है जो शैतान के लोग होते हैं। जब प्रभु आएगा, तो विश्वासियों को स्वर्ग में उठा लिया जाएगा, और फिर वह गैर-विश्वासियों को नष्ट करने के लिए विपत्ति को भेजेगा। यह महान श्वेत सिंहासन के सामने होने वाला न्याय है। तुम अंतिम दिनों में परमेश्वर के न्याय की शुरुआत की गवाही देते हो, लेकिन हमने परमेश्वर को गैर-विश्वासियों को नष्ट करने के लिए विपत्ति लाते हुए नहीं देखा है। तो फिर यह कैसे महान श्वेत सिंहासन का न्याय हो सकता है?

उत्तर:

बाइबल को सच में समझने वाले सभी लोग जानते हैं, कि प्रकाशितवाक्‍य की पुस्तक में महान श्वेत सिंहासन के न्याय की जो भविष्यवाणी की गई है वह अंत के दिनों के परमेश्‍वर के न्याय के कार्य का दर्शन है। देहधारी सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर सत्य व्यक्त करने और अंत के दिनों में अपना न्याय कार्य करने के लिए और, भ्रष्ट मानवजाति को स्वच्छ करने एवं बचाने के लिए आए। इसका अर्थ है कि महान श्वेत सिंहासन का न्याय पहले ही आरंभ हो चुका है। न्याय परमेश्‍वर के आवास से आरंभ होता है। परमेश्‍वर आपदा से पहले सर्वप्रथम विजेताओं का एक समूह बनाएंगे। उसके बाद, परमेश्‍वर विशाल आपदाएं लाएंगे और जब तक यह शैतानी युग ख़त्म न हो जाए, अच्छों को पुरस्कृत और दुष्टों को दंडित करेंगे। तब जाकर अंत के दिनों का परमेश्‍वर का महान श्वेत सिंहासन का न्याय पूरी तरह से पूर्ण हो जाएगा। तब परमेश्‍वर एक नए युग के आरंभ के लिए खुल कर प्रकट होंगे। हम सभी अब इसे बेहद साफ़ तरीके से देख सकते हैं। विशाल आपदाओं के लक्षण—लगातार चार रक्तिमचंद्रमा—पहले ही दिख चुके हैं। विशाल आपदाएं निकट हैं। जब विशाल आपदाएं आएंगी, तो कोई भी जो परमेश्‍वर का प्रतिरोध, उनका आकलन या विरोध करता हो, और दुष्ट शैतान के नस्ल के लोग, आपदाओं में नष्ट हो जाएंगे। क्या यही ठीक-ठीक महान श्वेत सिंहासन का न्याय नहीं है? हम बाइबल की भविष्यवाणियों से देख सकते हैं कि प्रभु की वापसी दो चरणों में विभक्त है, गुप्त आगमन एवं प्रकट आगमन। सबसे पहले, प्रभु किसी चोर की तरह आते हैं, यानी देहधारी परमेश्‍वर सत्य व्यक्त करने एवं अंत के दिनों में अपना न्याय कार्य करने के लिए गुप्त रूप से आते हैं। जिसका मुख्य उद्देश्य विजेताओं के एक समूह को बनाना है। इससे "पहले परमेश्‍वर के लोगों का न्याय किया जाए" की भविष्यवाणी पूरी होती है। अंत के दिनों में परमेश्‍वर का न्याय कार्य तभी आरंभ हो गया था जब देहधारी परमेश्‍वर सत्य व्यक्त करने और संपूर्ण मानवजाति का न्याय करने के लिए गुप्त रूप से आये थे। कार्य का पहला भाग परमेश्‍वर के आवास से न्याय आरंभ करना है। इससे, जो उनकी वाणी सुनते हैं और उनके सामने लाए जाते हैं, परमेश्‍वर उन्हें शुद्ध करते और बचाते हैं, और वे उन्हें विजेता बनाते हैं। इस प्रकार परमेश्‍वर का महान कार्य पूर्ण होता है। तब विशाल आपदाएं आरंभ हो जाती हैं। इस पुराने विश्व को दंडित और नष्ट करने के लिए परमेश्‍वर आपदाओं का उपयोग करेंगे। और इस प्रकार अंत के दिनों में परमेश्‍वर का न्याय कार्य अपने चरम पर पहुँचता है। जब परमेश्‍वर ख़ुले तौर पर बादलों पर प्रकट होंगे, तो उनका न्याय कार्य पूरी तरह से पूर्ण हो चुका होगा। उसके बाद परमेश्‍वर का राज्य प्रकट होगा। इस प्रकार नए यरुशलेम के स्वर्ग से उतरने की भविष्यवाणी पूरी होगी। जैसा कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "परमेश्वर के कार्य का एक पहलू समस्त मानवजाति पर विजय प्राप्त करना और चुने हुए लोगों को अपने वचनों के माध्यम से प्राप्त करना है। एक अन्य पहलू है विभिन्न आपदाओं के माध्यम से विद्रोह के सभी पुत्रों को जीतना। यह परमेश्वर के बड़े-पैमाने के कार्य का एक हिस्सा है। केवल इसी तरीके से पृथ्वी पर वह राज्य जिसे परमेश्वर चाहता है, पूरी तरह से प्राप्त किया जा सकता है, और यह परमेश्वर के कार्य का हिस्सा है जो कि शुद्ध सोने की तरह है" (वचन देह में प्रकट होता है में संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचनों के रहस्यों की व्याख्या के "अध्याय 17")। सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के वचन अंत के दिनों के उसके न्याय के कार्य का सटीकता से खुलासा करते हैं। हम उसे बहुत आसानी से समझ सकते हैं। सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर का अंत के दिनों का न्याय प्रकाशितवाक्य की पुस्तक में जिसकी भविष्‍यवाणी की गई थी वह महान श्वेत सिंहासन का न्याय है। सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के अंत के दिनों के न्याय कार्य के तथ्यों के अनुसार, मृतक के न्याय के लिए पुस्तकों को खोलने और जीवन की पुस्तक खोलने के बारे में प्रकाशितवाक्य की भविष्‍यवाणी क्या है, हम यह भी समझ सकते हैं। वस्तुतः, मृतक के न्याय के लिए पुस्तकों को खोला जाना परमेश्‍वर द्वारा उन सभी का न्याय है जो उनका इनकार और विरोध करते हैं और जो अविश्वासी हैं। यह न्याय उनकी निंदा, उनका दंड और उनका विनाश है। और जीवन की पुस्तक का खोला जाना उस न्याय को दर्शाता है जो परमेश्‍वर के आवास से आरंभ होता है, यानी, अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर, उन सभी का न्याय करने और उन्हें शुद्ध करने के लिए सत्य व्यक्त करते हैं जो उनके सिंहासन के समक्ष लाए जाते हैं। परमेश्‍वर के ये सभी चुने हुए लोग जो अंत के दिनों में सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के न्याय को स्वीकार करते हैं और उनके समक्ष लाए जाते हैं सभी परमेश्‍वर के न्याय, शुद्धि व उद्धार की विषय हैं। परमेश्‍वर के आवास पर जो न्याय आरंभ होता है वह लोगों के इस समूह को विपत्ति से पहले पूर्ण करने के लिए है। सिर्फ इसी समूह के लोग बुद्धिमान कुंवारियां हैं, ऐसे लोग हैं जिनके नाम जीवन की पुस्तक में दर्ज हैं, वे 144,000 विजेता जिनके बारे में प्रकाशितवाक्‍य की पुस्‍तक में भविष्‍यवाणी की गई थी, वे ऐसे लोग हैं जो अंततः शाश्वत जीवन का उत्तराधिकारी बनने के लिए स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करेंगे। इससे प्रकाशितवाक्य का भविष्यत्कथन पूर्ण होता हैः "फिर मैं ने दृष्‍टि की, और देखो, वह मेम्ना सिय्योन पहाड़ पर खड़ा है, और उसके साथ एक लाख चौवालीस हज़ार जन हैं, जिनके माथे पर उसका और उसके पिता का नाम लिखा हुआ है। और स्वर्ग से मुझे एक ऐसा शब्द सुनाई दिया जो जल की बहुत धाराओं और बड़े गर्जन का सा शब्द था, और जो शब्द मैं ने सुना वह ऐसा था मानो वीणा बजानेवाले वीणा बजा रहे हों। वे सिंहासन के सामने और चारों प्राणियों और प्राचीनों के सामने एक नया गीत गा रहे थे। उन एक लाख चौवालीस हज़ार जनों को छोड़, जो पृथ्वी पर से मोल लिये गए थे, कोई वह गीत न सीख सकता था। ये वे हैं जो स्त्रियों के साथ अशुद्ध नहीं हुए, पर कुँवारे हैं; ये वे ही हैं कि जहाँ कहीं मेम्ना जाता है, वे उसके पीछे हो लेते हैं; ये तो परमेश्‍वर के निमित्त पहले फल होने के लिये मनुष्यों में से मोल लिए गए हैं। उनके मुँह से कभी झूठ न निकला था, वे निर्दोष हैं" (प्रकाशितवाक्य 14:1-5)।

सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के अंत के दिनों का न्याय कार्य प्रकाशितवाक्य की पुस्तक में भविष्यत्कथन किए गए महान श्वेत सिंहासन के न्याय के दर्शन को पूरी तरह से पूर्ण करता है। महान श्वेत सिंहासन परमेश्‍वर की पवित्रता और साथ ही उनके अधिकार का प्रतीक है। तो फिर हम किस तरह से परमेश्‍वर के अधिकार को जान सकते हैं? यह हम सब जानते हैं कि परमेश्‍वर ने स्वर्ग व पृथ्वी व समस्त वस्तुओं की अपने वचन से रचना की। वे मनुष्यजाति का मार्गदर्शन करने, उसे शुद्ध करने और बचाने, सब कुछ सम्पादित करने के लिए, अपने वचन का उपयोग करते हैं। परमेश्वर का वचन उनके अधिकार का प्रतिनिधित्व करता है। जैसा कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "अगर मैं कहता हूं, तो यह होगा। अगर मैं आदेश देता हूं, तो यह दृढ़ रहेगा" (वचन देह में प्रकट होता है में आरम्भ में मसीह के कथन के "अध्याय 21")। "मैंने जो कहा है, उसका ख्याल करना चाहिए, जिसका ख्याल किया जाता है वह पूरा किया जाना चाहिए, और यह किसी के द्वारा बदला नहीं जा सकता है; यह परम सत्य है" (वचन देह में प्रकट होता है में संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन के "अध्याय 1")। सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के अंत के दिनों का कार्य, वचन का कार्य है। परमेश्‍वर संपूर्ण विश्व को नियंत्रित करने, समस्त मानवजाति को नियंत्रित करने के लिए अपने वचन का उपयोग करते हैं। वे मनुष्य जाति का मार्गदर्शन करने, आपूर्ति करने के लिए अपने वचनों का उपयोग करते हैं, और अब मनुष्यजाति का न्याय करने तथा उसे शुद्ध करने के लिए अपने वचनों का उपयोग कर रहे हैं। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "मैं पूरी पृथ्वी के लोगों को कनान की धरती पर लाना चाहता हूँ, और इसलिए मैं कनान की धरती में लगातार वचन बोल रहा हूँ, ताकि पूरे ब्रह्मांड को नियंत्रित कर सकूं। इस समय, कनान के अलावा पूरी पृथ्वी पर अंधकार छाया है, सभी लोग भूख और ठंड के कारण संकट में हैं" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "सात गर्जनाएँ—भविष्यवाणी करती हैं कि राज्य के सुसमाचार पूरे ब्रह्माण्ड में फैल जाएंगे")। "अंत में दिनों में जब परमेश्वर देहधारी होता है, तो सब कुछ सम्पन्न करने, और सब कुछ स्पष्ट करने के लिए वह मुख्य रूप से वचन का उपयोग करता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर के वचन के द्वारा सब कुछ प्राप्त हो जाता है")। "परमेश्वर के मुँह के वचनों से सभी दुष्ट लोगों को ताड़ित किया जाएगा, और सभी धर्मी लोग उसके मुँह के वचनों से धन्य हो जाएँगे, और उसके मुँह के वचनों द्वारा स्थापित और पूर्ण किए जाएँगे। वह कोई चिह्न या चमत्कार नहीं दिखाएगा; सब कुछ उसके वचनों के द्वारा पूर्ण हो जाएगा, और उसके वचन तथ्यों को उत्पन्न करेंगे। पृथ्वी पर हर कोई परमेश्वर के वचनों का उत्सव मनाएगा, चाहे वे वयस्क हों या बच्चे, पुरुष, स्त्री, वृद्ध या युवा हों, सभी लोग परमेश्वर के वचनों के नीचे झुक जाएँगे" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "सहस्राब्दि राज्य आ चुका है")।

सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के वचन की अभिव्यक्ति उस चमकती बिजली की तरह है जो पूर्व से सीधे पश्चिम को जाती है। यह उन सभी को शुद्ध और पूर्ण करती है जो परमेश्‍वर के सिंहासन के सम्मुख वापस आते हैं, व उन पाखंडी फरीसियों को उजागर करती है जो सत्य से घृणा करते हैं। और साथ ही उन सभी दुष्ट लोगों को भी जो परमेश्‍वर का इनकार और विरोध करते हैं। साथ ही, यह सभी अवज्ञाकारी पुत्रों को नष्ट कर देती है। अंत के दिनों में पृथ्वी पर सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर का न्याय कार्य दर्शाता है कि परमेश्‍वर पहले से अपने सिंहासन पर बैठ कर शासन कर रहे हैं। हालांकि बुराई व अंधकार की यह पुरानी दुनिया फिलहाल अभी भी अस्तित्व में है, किन्तु ऐसी बड़ी विपत्तियाँ शीघ्र ही पड़ेंगी जो दुनिया को नष्ट कर देंगी। पृथ्वी पर ऐसी कोई भी शक्ति नहीं है जो परमेश्‍वर के राज्य को नष्ट कर सके, और ऐसी कोई भी शक्ति नहीं है जो परमेश्‍वर के कार्य को मिटा सके या उनके कार्य को आगे बढ़ने से रोक सके। परमेश्‍वर द्वारा पृथ्वी पर अपने न्याय का कार्य करने के लिए अपने अधिकार का उपयोग करना स्वर्ग में अपने सिंहासन के लिए उपयोग करने जैसा ही हैः यह ऐसा कुछ है जिसे कोई हिला नहीं सकता और कोई बदल नहीं सकता, यह एक तथ्य है। जैसा कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "राज्य मनुष्यों के मध्य विस्तार पा रहा है, यह मनुष्यों के मध्य बन रहा है, यह मनुष्यों के मध्य खड़ा हो रहा है; ऐसी कोई भी शक्ति नहीं है जो मेरे राज्य को नष्ट कर सके" (वचन देह में प्रकट होता है में संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन के "अध्याय 19")। यही परमेश्‍वर के वचन द्वारा प्रदर्शित अधिकार और शक्ति है। परमेश्‍वर के वचन का पृथ्वी पर अधिकार का उपयोग करना मसीह द्वारा पृथ्वी पर शासन करना है। यह परमेश्‍वर का पृथ्वी के अपने सिंहासन पर पहले से ही शासन करना है। यह इस बात को दर्शाने के लिए काफ़ी है कि परमेश्‍वर का राज्य पहले ही पृथ्वी पर अवतरित हो चुका है। यह ऐसा तथ्य है जिसे कोई इनकार नहीं कर सकता है। हम देखते हैं कि परमेश्‍वर की इच्छा उसी तरह पूरी तरह से पृथ्वी पर पहले ही हो जाती है जैसी यह स्वर्ग में होती है। प्रभु यीशु ने कहा था, "तेरा राज्य आए। तेरी इच्छा जैसी स्वर्ग में पूरी होती है, वैसे पृथ्वी पर भी हो" (मत्ती 6:10)। प्रकाशितवाक्य में भी ये भविष्यत्कथन हैः "जब सातवें दूत ने तुरही फूँकी, तो स्वर्ग में इस विषय के बड़े बड़े शब्द होने लगे: 'जगत का राज्य हमारे प्रभु का और उसके मसीह का हो गया, और वह युगानुयुग राज्य करेगा।' तब चौबीसों प्राचीन जो परमेश्‍वर के सामने अपने अपने सिंहासन पर बैठे थे, मुँह के बल गिरकर परमेश्‍वर को दण्डवत् करके यह कहने लगे, 'हे सर्वशक्‍तिमान प्रभु परमेश्‍वर, जो है और जो था, हम तेरा धन्यवाद करते हैं कि तू ने अपनी बड़ी सामर्थ्य को काम में लाकर राज्य किया है'" (प्रकाशितवाक्य 11:15-17)। ये वचन पहले ही वास्तविकता बन चुके हैं। ये सब सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के अंत के दिनों के न्याय के कार्य के द्वारा सम्पादित सत्य हैं।

— "राज्य के सुसमाचार पर विशिष्ट प्रश्न और उत्तर संकलन" से उद्धृत

"मेरी धार्मिकता, प्रताप और न्याय शैतान के प्रति कोई दया नहीं दिखाते हैं। लेकिन तुम लोगों के लिए, वे तुम लोगों को बचाने के लिए हैं, फिर भी तुम लोग मेरे स्वभाव को समझने में अक्षम हो, न ही तुम लोग मेरे कार्यों के पीछे के सिद्धांतों को जानते हो" (वचन देह में प्रकट होता है में आरम्भ में मसीह के कथन के "अध्याय 90")। परमेश्वर के वचनों की ये पंक्तियाँ लोगों पर प्राप्त परमेश्वर की धार्मिकता, महिमा और न्याय के प्रभाव की बात करती हैं। परिणाम क्या हैं? कुछ लोग समझने में असफल रहते हैं। "मेरी धार्मिकता, प्रताप और न्याय शैतान के प्रति कोई दया नहीं दिखाते हैं।" इन वचनों का क्या अर्थ है? कुछ लोग कहते हैं, "इन वचनों का अर्थ है कि परमेश्वर की धार्मिकता, महिमा और न्याय शैतान की ओर निर्देशित होते हैं, न कि लोगों की ओर।" क्या यह व्याख्या सही है या ग़लत है? यह व्याख्या त्रुटिपूर्ण है, यहाँ तक कि बेतुकी है। यहाँ यह भी कहा गया है, "लेकिन तुम लोगों के लिए, वे तुम लोगों को बचाने के लिए हैं।" इसका क्या अर्थ है? यहाँ "तुम" शब्द परमेश्वर के चुने हुए लोगों को दर्शाता है। परमेश्वर के चुने हुए लोगों के लिए और उन सभी के लिए जो परमेश्वर में सचमुच विश्वास करते हैं, परमेश्वर की धार्मिकता, महिमा और न्याय उनके उद्धार के लिए हैं। कुछ लोगों को महसूस होता है कि यह विरोधाभासी है, उनका कहना है, "वे शैतान के प्रति कोई दया नहीं दिखाते हैं, बल्कि वे लोगों को बचाने के लिए हैं, तो क्या परमेश्वर की धार्मिकता, महिमा और न्याय शैतान की और निर्देशित हैं अथवा मनुष्य की ओर।" क्या इस समस्या को हल करना आसान है? कुछ लोग इस तरह से सोच सकते हैं: "सभी लोगों में से, कुछ लोगों का संबंध दुष्ट शैतान से है, और कुछ परमेश्वर के चुने हुए लोग, उद्धार की वस्तुएँ हैं। तो, परमेश्वर की धार्मिकता, महिमा और न्याय, शैतान के लिए, उजागर, उन्मूलन या दंड हैं। परमेश्वर के चुने हुए लोगों के लिए, उन लोगों के लिए जो वास्तव में परमेश्वर में विश्वास करते हैं, वे पूरी तरह उद्धार के लिए, शुद्ध करने के लिए, और सिद्ध बनाने के लिए हैं।" तो क्या यह व्याख्या सही है, या नहीं? यह व्याख्या सही है। ऐसे लोगों को मार्ग मिल गया है। तो अब, ये परमेश्वर के चुने हुए लोग हैं या शैतान है जो परमेश्वर के धार्मिक, महिमामय और कोपपूर्ण न्याय से गुजरेगा। सभी को इसे स्वीकार करना होगा। किसी के लिए भी इसे स्वीकार न करना ठीक नहीं है। दूसरे शब्दों में, कोई भी इससे बच कर निकल नहीं सकता है; यह सच है। कुछ लोग कह सकते हैं, "परमेश्वर अपने वचन बोलता है, लेकिन अविश्वासी लोगों ने, धार्मिक लोगों ने, और शैतान से संबंधित लोगों ने न तो उन्हें सुना है और ना ही पढ़ा है!" अगर वे उन्हें सुनते या पढ़ते नहीं हैं, तो क्या वे परमेश्वर के न्याय और उनकी ताड़ना से बच कर निकल सकते हैं? वे परमेश्वर के वचनों के न्याय और ताड़ना से बच कर निकल सकते हैं, लेकिन क्या वे परमेश्वर के कोप और उसके द्वारा भेजी गई आपदाओं से बच कर निकल सकते हैं? क्या वे वास्तविक तथ्यों के न्याय और ताड़ना से बच कर निकल सकते हैं? इससे कोई बच कर नहीं निकल सकता है। यदि तुम परमेश्वर के वचनों के न्याय और उनकी ताड़ना को स्वीकार नहीं करते हो, तो तुम्हें वास्तविक तथ्यों के न्याय और ताड़ना को स्वीकार करना होगा। तो वास्तविक तथ्यों का न्याय और उनकी ताड़ना क्या है? आपदा! इसलिए, अंत के दिनों में महान सफेद सिंहासन का परमेश्वर न्याय पहले ही शुरू हो चुका है।

परमेश्वर के वचनों का न्याय परमेश्वर के चुने हुए लोगों पर निर्देशित होता है। वास्तविक तथ्यों का न्याय, आपदाओं का न्याय और दण्ड, अविश्वासियों पर निर्देशित होता है। इसलिए, न्याय के कार्य के दो पहलू हैं, जो साथ-साथ कार्यान्वित होते हैं। इस बिन्दु की उपेक्षा नहीं की जा सकती है। कुछ लोग कहते हैं, "परमेश्वर के परिवार के चुने हुए लोग परमेश्वर के न्याय और उसकी ताड़ना से गुजर रहे हैं, लेकिन अविश्वासी लोग तो खा-पी रहे हैं और सुख भोग रहे हैं, उन्होंने परमेश्वर के न्याय और उसकी ताड़ना को स्वीकार नहीं किया है!" वास्तविक तथ्यों का न्याय और ताड़ना, वचनों के न्याय और उनकी ताड़ना से भिन्न है। वचनों का न्याय और उनकी ताड़ना लंबे समय के दौरान होती है, लेकिन वास्तविक तथ्यों का न्याय और उनकी ताड़ना थोड़ी देर में आ जाएगी, एक पल भर। एक बड़े भूकंप की तरह होती है। जब लोग खा-पी रहे होते हैं और सुख भोग कर रहे होते हैं, तो अचानक, जमीन हिलती है, और बड़ा भूकंप आता है। हर कोई भागना चाहता है लेकिन वह भाग नहीं पाता है, और उन सबका कुचल कर मर कर अंत हो जाता है। वास्तविक तथ्यों का न्याय और उनकी ताड़ना बड़ी तेजी से, क्षणिक, अचानक होती है और उसे रोकना असंभव होता है। वचनों का न्याय और उनकी ताड़ना इससे भिन्न होती है। इसमें कुछ समय लगता है। इसके अलावा, कुछ लोगों ने परमेश्वर के वचनों को खाया और पीया नहीं होता है, और कुछ लोगों ने उन्हें खाया-पिया तो होता है लेकिन उन्हें हृदय से ग्रहण नहीं किया होता है। कुछ लोगों ने उन्हें दिल से ग्रहण किया होता है लेकिन उनके न्याय का अनुभव नहीं किया होता है। इसका अनुभव न करना अस्वीकार्य है। पहली बार जब वे इसका अनुभव करते हैं, वे आज्ञापालन करने में समर्थ नहीं हो सकते हैं, उन्हें कोई ज्ञान या समझ नहीं होती है, लेकिन कुछ समयावधि के बाद, समझ आ जाती है और कुछ और समय के बाद, उन्हें थोड़ा और समझ आ जाती है। थोड़ा और अनुभव करने के बाद, वे अधिक अच्छी तरह से समझ सकते हैं, और फिर वास्तविक पश्चाताप और वास्तविक परिवर्तन उत्पन्न हो सकता है। यह सत्य को खोजने की प्रक्रिया है। न समझने से लेकर समझने तक, समझ के परिणामस्वरूप आयी आज्ञाकारिता और आज्ञाकारिता के परिणामस्वरूप आया ज्ञान—इस प्रक्रिया में लंबा समय लगता है। परिणाम प्राप्त करने के लिए, कुछ लोगों को इसे दस या बीस साल तक, और कुछ को तो बीस से तीस साल तक अनुभव करना होगा। और जब हम परमेश्वर के वचनों के न्याय और उनकी ताड़ना का अनुभव कर रहे होते हैं, तो अविश्वासी लोग क्या करते हैं? वे खाते-पीते हैं, मौज-मस्ती करते हैं, सोते हैं और सपने देखते है! जब हम पर्याप्त न्याय और ताड़ना से गुजर कर शुद्ध हो चुके होंगे, जब हम परमेश्वर के लिए आनंदित होना और उसकी स्तुति करना शुरू करेंगे, जब परमेश्वर के लोग परमेश्वर द्वारा सिद्ध बना लिए जाएँगे, तब अविश्वासियों के लिए आपदा आएगी। और जब आपदाएँ आएँगी, तो यह उनकी मृत्यु का समय होगा! अधिकांश लोग अब समझ चुके हैं, "यही महान सफेद सिंहासन का न्याय है! वचनों का न्याय और उनकी ताड़ना आंतरिक होती है और आपदाओं का आना और उनका दण्ड बाहरी होता है। जो लोग परमेश्वर पर विश्वास नहीं करते हैं और जो लोग परमेश्वर का विरोध करते हैं, उन सभी को आपदा में मरना होगा।" वचनों के आंतरिक न्याय और ताड़ना तथा आपदाओं के बाहरी दण्ड के बीच का लौकिक संबंध क्या है? वे समकालिक होते हैं। अविश्वासियों पर भी सभी प्रकार की आपदाएँ आती हैं, लेकिन वे इतनी बड़ी नहीं होती हैं, न ही उन्हें विनाशकारी आपदाओं की श्रेणी में रखा जाता है। एक बार जब परमेश्वर के चुने हुए लोगों को पूर्ण कर दिया जाता है, जब विजेताओं का एक समूह दिखाई देगा, तो "हूश" की आवाज़ के साथ, तुरंत बड़ी आपदाएँ उतर आएँगी। यही आपदाओं का न्याय और उनकी ताड़ना है जो अविश्वासियों से निपटने के लिए इस्तेमाल की जाती है। यह न्याय और ताड़ना कोप और महिमा से भरपूर है!

— जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति, खंड 121 से उद्धृत

पिछला:प्रश्न 11: आप इसका प्रमाण प्रस्तुत करते हैं कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर सत्य को अभिव्यक्त करते हैं और अंतिम दिनों में न्याय का अपना कार्य करते हैं। मुझे लगता है कि प्रभु यीशु में हमारा विश्वास और पवित्र आत्मा के कार्य की स्वीकृति का मतलब है कि हमने पहले से ही परमेश्वर के न्याय का अनुभव किया है। सबूत के तौर पर यहाँ प्रभु यीशु के वचन दिए गए हैं: "क्योंकि यदि मैं न जाऊँ तो वह सहायक तुम्हारे पास न आएगा; परन्तु यदि मैं जाऊँगा, तो उसे तुम्हारे पास भेजूँगा। वह आकर संसार को पाप और धार्मिकता और न्याय के विषय में निरुत्तर करेगा" (यूहन्ना 16:7-8)। हमारा मानना है कि, हालांकि प्रभु यीशु का कार्य छुटकारे का कार्य था, जब वे स्वर्ग तक पहुंच गए तो पेन्तेकोस्त के दिन, पवित्र आत्मा उतर आया और उसने मनुष्यों पर काम किया: "... संसार को पाप और धार्मिकता और न्याय के विषय में निरुत्तर करेगा।" यह आखिरी दिनों में परमेश्वर के न्याय का कार्य होना चाहिए, इसलिए हम जिस बात को जानना चाहते हैं, वो यह है कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर द्वारा अंतिम दिनों में किए गए न्याय के कार्य और प्रभु यीशु के कार्य के बीच वास्तव में क्या भिन्नताएँ हैं?

अगला:प्रश्न 13: धार्मिक दुनिया में अधिकांश लोग मानते हैं कि क्रूस पर प्रभु यीशु का यह कहना कि "पूरा हुआ" (यूहन्ना 19:30) सबूत है कि परमेश्वर का उद्धार का कार्य पहले ही पूरी तरह से समाप्त हो चुका है। और फिर भी तुम यह गवाही देते हो कि परमेश्वर सत्य को व्यक्त करने के लिए और लोगों को पूरी तरह से बचाने के लिए परमेश्वर के घर से शुरू होने वाले न्याय के कार्य को करने के लिए देह में लौटा है। तो मनुष्य को बचाने के लिए परमेश्वर के कार्य को वास्तव में कैसे समझना चाहिए? हम सत्य के इस पहलू पर स्पष्ट नहीं हैं, इसलिए कृपया हमारे लिए इस पर सहभागिता करो।

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