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अंतिम दिनों के मसीह के लिए गवाहियाँ 

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प्रश्न 16: तुम यह प्रमाण देते हो कि परमेश्वर ने सच्चाई को व्यक्त करने के लिए और आखिरी दिनों में मनुष्य के न्याय और शुद्धि के कार्य को करने के लिए वापस देह-धारण किया है, लेकिन धार्मिक पादरियों और प्राचीन लोगों का विश्वास है कि परमेश्वर बादलों के साथ वापस लौटेगा, और जो लोग प्रभु में विश्वास करते हैं, वे एक पल में रूपांतरित हो जाएँगे और बादलों में परमेश्वर के साथ मिलने के लिए स्वर्गारोहित होंगे, जैसा कि पौलुस ने कहा था: "पर हमारा स्वदेश स्वर्ग पर है; और हम एक उद्धारकर्ता प्रभु यीशु मसीह के वहाँ से आने की बाट जोह रहे हैं। वह अपनी शक्‍ति के उस प्रभाव के अनुसार जिसके द्वारा वह सब वस्तुओं को अपने वश में कर सकता है, हमारी दीन-हीन देह का रूप बदलकर, अपनी महिमा की देह के अनुकूल बना देगा" (फिली 3:20-21)। परमेश्वर सर्वशक्तिमान है और ऐसा कुछ भी नहीं है जो वह नहीं कर सकता है। परमेश्वर हमें बदल देगा और हमें पवित्र बना देगा, वह सिर्फ एक ही वचन के साथ इसे प्राप्त कर लेगा। तो फिर उसे सच्चाई व्यक्त करने और मनुष्य के न्याय और शुद्धि के कार्य के एक चरण को पूरा करने के लिए अब भी देह बनने की आवश्यकता क्यों है?

उत्तर:

परमेश्वर का कार्य सदा अथाह होता है। परमेश्वर की भविष्यवाणियों को कोई भी स्पष्टता से नहीं समझा सकता। मनुष्य साकार होने पर ही किसी भविष्यवाणी को समझ सकता है। इसका क्या अर्थ है? इसका अर्थ है कि कोई भी परमेश्वर की बुद्धिमत्ता और सर्वशक्तिमत्ता की थाह नहीं पा सकता। जब अनुग्रह के युग में कार्य करने के लिए प्रभु यीशु प्रकट हुए, कोई भी उनकी थाह नहीं पा सका। जब राज्य के युग में, सर्वशक्तिमान परमेश्वर अंत के दिनों का न्याय कार्य करते हैं, तो कोई भी पहले से उसको भी नहीं जान सकता। इसलिए, मानवजाति, परमेश्वर द्वारा अंत के दिनों में सत्य व्यक्त करने और न्याय कार्य के लिए देहधारण कर लेने की बात की कदापि कल्पना नहीं कर सकती।परंतु परमेश्वर का कार्य पूरा हो जाने पर महाविपत्ति आयेगी। उस समय, अनेक लोग अनुभव करेंगे कि परमेश्वर का वचन साकार हो गया है। परन्तु पछतावे के लिए बहुत देर हो चुकी होगी। वे महाविपत्ति में केवल रोते-चीखते अपने दांत पीस सकेंगे। यह कि परमेश्वर अंत के दिनों में मनुष्य को शुद्ध करने और बचाने के लिए न्याय का कार्य कैसे करते हैं, विजयी लोगों का एक समूह यानी प्रथम फल कैसे बनाते हैं, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन के कुछ अंशों को पढ़ने के बाद यह और अधिक स्पष्ट हो जाएगा।

"तुम सबों को देखना चाहिये कि परमेश्वर की इच्छा और कार्यआकाश और पृथ्वी के सृजन और अन्य सब वस्तुओं के सृजन के समान आसान नहीं हैं। आज का कार्य उन लोगों का रूपांतरण करना है जो भ्रष्ट हो चुके हैं, और अत्यधिक सुन्न हो चुके हैं, और उन्हें शुद्ध करना है जो सृजे जाने के बाद शैतान के अनुसार चले हैं, आदम और हव्वा के सृजन करना नहीं, ज्योति की सृष्टि या अन्य सभी पेड़ पौधों और पशुओं के सृजन की तो बात ही दूर है। अब उसका काम उन सबको शुद्ध करना है जिन्हें शैतान ने भ्रष्ट कर दिया है ताकि उनको फिर से हासिल किया जा सकेऔर वे उसकी संपत्ति और उसकी महिमा बनें। यह कार्य उतना आसान नहीं जितना मनुष्य आकाश और पृथ्वी के सृजन और अन्य वस्तुओं के सृजन के संबंध में कल्पना करता है, और न ही यह शैतान को शाप देकर अथाह कुंड में डालने के समान है जैसा मनुष्य कल्पना करता है। बल्कि, यह तो मनुष्य को रूपांतरित करने के लिए है, वह जो नकारात्मक है उसे सकारात्मक बनाने के लिए है और उन सबको अपने अधिकार में लाने के लिए जो परमेश्वर के नहीं है। परमेश्वर के कार्य के इस चरण की यह भीतरी कहानी है। तुम को यह एहसास होना चाहिये, और मामलों को अतिसरल नहीं समझना चाहिये। परमेश्वर का कार्य किसी साधारण कार्य के समान नहीं है, मनुष्य का मन उसके अद्भुत स्वरूप को आत्मसात नहीं कर सकता, और न उसमें निहित बुद्धि को प्राप्त कर सकता है। परमेश्वर सब चीजों का सृजन नहीं कर रहा, और न ही विनाश कर रहा है। बल्कि, वह अपनी समस्त सृष्टि को बदल रहा है और शैतान के द्वारा अशुद्ध की गई सब चीजों को शुद्ध कर रहा है। इसलिये, परमेश्वर महान परिमाण का काम शुरू करेगा, और यह परमेश्वर के कार्य का कुल महत्व है। इन वचनों से, क्या तुम विश्वास करते हो कि परमेश्वर का कार्य बहुत आसान है?" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "क्या परमेश्वर का कार्य इतना सरल है, जितना मनुष्य कल्पना करता है?" से)।

"मनुष्य की देह को शैतान के द्वारा भष्ट किया गया है, और बिलकुल अन्धा कर दिया गया है, और गंभीर रूप से नुकसान पहुंचाया गया है। परमेश्वर किस लिए व्यक्तिगत रूप से देह में कार्य करता है उसका अत्यंत मौलिक कारण हैक्योंकि उसके उद्धार का विषय है मनुष्य, जो देह से है, और क्योंकि शैतान भी परमेश्वर के कार्य को बिगाड़ने के लिए मनुष्य की देह का उपयोग करता है। शैतान के साथ युद्ध वास्तव में मनुष्य पर विजय पाने का कार्य है, और ठीक उसी समय, मनुष्य भी परमेश्वर के उद्धार का विषय है। इस रीति से, देहधारी परमेश्वर का कार्य परम आवश्यक है। शैतान ने मनुष्य की देह को भ्रष्ट कर दिया है, और मनुष्य शैतान का मूर्त रूप बन गया है, और ऐसा विषय बन गया है जिसे परमेश्वर के द्वारा हराया जाना है। इस रीति से, शैतान से युद्ध करने और मनुष्य को बचाने का कार्य पृथ्वी पर घटित होता है, और शैतान से युद्ध करने के लिए परमेश्वर को अवश्य मनुष्य बनना होगा। यह अत्यंत व्यावहारिकता का कार्य है" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "भ्रष्ट मानवजाति को देह धारण किए हुए परमेश्वर के उद्धार की अत्यधिक आवश्यकता है" से)।

"प्राचीनतम मानवजाति परमेश्वर के हाथों में थी, परन्तु शैतान के प्रलोभन एवं भ्रष्टता की वजह से, मनुष्य को शैतान के द्वारा बांधा गया था और वह उस दुष्ट जन के हाथों में पड़ गया था।इस प्रकार, शैतान वह विषय बन गया था जिसे परमेश्वर के प्रबधंन के कार्य में पराजित किया जाना था। क्योंकि शैतान ने मनुष्य पर कब्ज़ा कर लिया था, और क्योंकि मनुष्य परमेश्वर के सम्पूर्ण प्रबंधन की पूंजी (सम्पदा) है, यदि मनुष्य का उद्धार करना है, तो उसे शैतान के हाथों से वापस छीनना होगा, कहने का तात्पर्य है कि मनुष्य को शैतान के द्वारा बन्दी बना लिए जाने के बाद उसे वापस लेना होगा। मनुष्य के पुराने स्वभाव में बदलावों के माध्यम से शैतान को पराजित किया जाता है जो उसके मूल एहसास को पुनः स्थापित करता है, और इस रीति से मनुष्य को, जिसे बन्दी बना लिया गया था, शैतान के हाथों से वापस छीना जा सकता है।यदि मनुष्य को शैतान के प्रभाव एवं दासता से स्वतन्त्र किया जाता है, तो शैतान शर्मिन्दा होगा, मनुष्य को अंततः वापस ले लिया जाएगा, और शैतान को हरा दिया जाएगा। और क्योंकि मनुष्य को शैतान के अंधकारमय प्रभाव से स्वतन्त्र किया गया है, इसलिए मनुष्य इस सम्पूर्ण युद्ध का लूट का सामान बन जाएगा, और जब एक बार यह युद्ध समाप्त हो जाता है तो शैतान वह विषय बन जाएगा जिसे दण्डित किया जाएगा, जिसके पश्चात् मनुष्य के उद्धार के सम्पूर्ण कार्य को पूरा कर लिया जाएगा" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "मनुष्य के सामान्य जीवन को पुनःस्थापित करना और उसे एक बेहतरीन मंज़िल पर ले चलना" से)।

"अंत के दिनों के कार्य में, वचन चिन्हों एवं अद्भुत कामों के प्रकटीकरण की अपेक्षा कहीं अधिक शक्तिमान है, और वचन का अधिकार चिन्हों एवं अद्भुत कामों से कहीं बढ़कर है। वचन मनुष्य के हृदय के सभी भ्रष्ट स्वभावों को प्रकट करता है। तुम अपने स्वयं के बल पर इन्हें पहचानने में असमर्थ हो। जब उन्हें वचन के माध्यम से तुम पर प्रकट किया जाता है, तब तुम्हें स्वाभाविक रुप से ही एहसास हो जाएगा; तुम उन्हें इनकार करने में समर्थ नहीं होगे, और तुम्हें पूरी तरह से यक़ीन हो जाएगा। क्या यह वचन का अधिकार नहीं है? यह वह परिणाम है जिसे वचन के वर्तमान कार्य के द्वारा प्राप्त किया गया है। इसलिए, बीमारियों की चंगाई और दुष्टात्माओं को निकालने के द्वारा मनुष्य को उसके पापों से पूरी तरह से बचाया नहीं जा सकता है और चिन्हों और अद्भुत कामों के प्रदर्शन के द्वारा उसे पूरी तरह से पूर्ण नहीं किया जा सकता है। चंगाई करने और दुष्टात्माओं को निकालने का अधिकार मनुष्य को केवल अनुग्रह प्रदान करता है, परन्तु मनुष्य का देह तब भी शैतान से सम्बन्धित होता है और भ्रष्ट शैतानी स्वभाव तब भी मनुष्य के भीतर बना रहता है। दूसरे शब्दों में, वह जिसे शुद्ध नहीं किया गया है अभी भी पाप और गन्दगी से सम्बन्धित है। जब वचनों के माध्यम से मनुष्य को स्वच्छ कर दिया जाता है केवल उसके पश्चात ही उसे परमेश्वर के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है और वह पवित्र बनता है। … न्याय और ताड़ना के इस कार्य के माध्यम से, मनुष्य अपने भीतर के गन्दे और भ्रष्ट सार को पूरी तरह से जान जाएगा, और वह पूरी तरह से बदलने और स्वच्छ होने में समर्थ हो जाएगा। केवल इसी तरीके से मनुष्य परमेश्वर के सिंहासन के सामने वापस लौटने में समर्थ हो सकता है। वह सब कार्य जिसे आज किया गया है वह इसलिए है ताकि मनुष्य को स्वच्छऔर परिवर्तित किया जा सके; वचन के द्वारा न्याय और ताड़ना के और साथ ही शुद्धिकरण के माध्यम से, मनुष्य अपनी भ्रष्टता को दूर फेंक सकता है और उसे शुद्ध किया जा सकता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "देहधारण का रहस्य (4)" से)।

क्या आप सबने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों में अभी-अभी कोई बात समझी है? जिस तरीके से परमेश्वर अंत के दिनों में अपने न्याय कार्य के द्वारा मनुष्य का शुद्धिकरण कर उसे परिपूर्ण बनाते हैं, वह बिलकुल उतना सरल नहीं है, जितनी हम कल्पना करते हैं। केवल एक वचन से, प्रभु यीशु ने लाज़र को मृत से जीवित कर दिया। परंतु परमेश्वर के लिए उस मानवजाति का, जिसे शैतान ने परमेश्वर का विरोध करने और उसके विरुद्ध कार्य करने के लिए बुरी तरह भ्रष्ट कर दिया है, शुद्धिकरण और बदलाव कर, परमेश्वर को समझने, उनकी आज्ञा का पालन करने और आराधना करने वाली मानवजाति बनाना, हज़ारों वर्षों तक जीवित राक्षसों के रूप में भ्रष्ट हो चुकी मानवजाति को, बीस-तीस वर्ष में, सत्य और मानवता वाली मानवजाति में बदलना, शैतान से युद्ध करने की प्रक्रिया है। क्या यह एक सरल मामला है? यदि परमेश्वर एक ही वचन से मरे हुओं को उठा देते हैं और हमारे शरीर को बदल देते हैं, तो क्या यह शैतान को अपमानित कर सकेगा? अंत के दिनों में, शैतान ने मानवजाति को हजारों वर्षों तक भ्रष्ट किया है। शैतान की प्रकृति और स्वभाव मनुष्य में गहरे पैठ गयी है। मानवजाति घमंडी, स्वार्थी, कपटी, बुरी और लालची हो गई है। मानवजाति सत्य से घृणा करती है। वह बहुत पहले से परमेश्वर की शत्रु बन चुकी है।वे शैतान जैसे हैं, जो परमेश्वर का विरोध कर उसको धोखा देते हैं। परमेश्वर द्वारा मनुष्य का उद्धार वास्तव में शैतान से युद्ध करना है। जैसा कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "मनुष्य की देह को बहुत ज़्यादा भ्रष्ट किया जा चुका है, और यह कुछ ऐसा बन गया है जो परमेश्वर का विरोध करता है, जो यहाँ तक कि खुले तौर पर परमेश्वर का विरोध करता है और उसके अस्तित्व को भी नकारता है। इस भ्रष्ट देह का उपचार करना बहुत ही मुश्किल है, और देह के भ्रष्ट स्वभाव की अपेक्षा किसी और चीज़ के साथ निपटना या उसे बदलना ज़्यादा कठिन नहीं है। शैतान परेशानियां खड़ी करने के लिए मनुष्य की देह के भीतर आता है, और परमेश्वर के कार्य में गड़बड़ी डालने के लिए मनुष्य की देह का उपयोग करता है, और परमेश्वर की योजना को बाधित करता है, और इस प्रकार मनुष्य शैतान, एवं परमेश्वर का शत्रु बन चुका है। मनुष्य को बचाए जाने के लिए, पहले उस पर विजय पाना होगा।यही कारण हैकि परमेश्वर चुनौती के लिए उठता है, और देह में होकर आता है कि वह कार्य करे जिसे उसने करने का इरादा किया है, और शैतान के साथ लड़ता है। उसका उद्देश्य मनुष्य का उद्धार है, जिसे भ्रष्ट किया जा चुका है, और शैतान की पराजय एवं उसका सम्पूर्ण विनाश है, जो उसके विरुद्ध विद्रोह करता है। वह मनुष्य पर विजय पाने के अपने कार्य के जरिए शैतान को पराजित करता है, और ठीक उसी समय भ्रष्ट मानवजाति का उद्धार करता है। इस प्रकार, परमेश्वर एक बार में ही दो समस्याओं का हल करता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "भ्रष्ट मानवजाति को देह धारण किए हुए परमेश्वर के उद्धार की अत्यधिक आवश्यकता है" से)।

परमेश्वर शैतान द्वारा परमेश्वर के विरुद्ध कार्य करने के लिए भ्रष्ट की गयी मानवजाति को एक ऐसी मानवजाति में बदलना चाहते हैं, जो सच में परमेश्वर की आज्ञा मानती है और परमेश्वर के अनुरूप है। यह कार्य अत्यंत कठिन है। यह परमेश्वर द्वारा स्वर्ग, पृथ्वी और हर चीज़ के सृजन से कहीं अधिक कठिन है। शून्य से स्वर्ग, पृथ्वी तथा हर चीज़ का सृजन, परमेश्वर के एक वचन से संपन्न हुआ। परन्तु बुरी तरह से भ्रष्ट मानवजाति का शुद्धिकरण कर उसे बदलने के लिए, मनुष्य के साथ न्याय कर उसका शुद्धिकरण करने के लिए, परमेश्वर को देहधारी बनकर अनेक सत्य अभिव्यक्त करने होंगे। हमारे लिए परमेश्वर का न्याय और ताड़ना अनुभव करने, भ्रष्टाचार को दूर करने और शुद्धिकरण प्राप्त करने के लिए, एक लंबे समय की प्रक्रिया की जरूरत है। यह परमेश्वर की शैतान से युद्ध की प्रक्रिया भी है। शैतान के मूल इरादे के अनुसार, मनुष्य जीवित राक्षसों के रूप में भ्रष्ट हो चुके हैं। यदि परमेश्वर इन जीवित राक्षसों को मनुष्यों में बदल सकें, तो शैतान को विश्वास हो जाएगा, इसलिए परमेश्वर शैतान जैसों से युद्ध करने के लिए, अपनी मूल योजना के अनुरूप देहधारी बनते हैं। पहले मनुष्य पर विजय प्राप्त करने के लिए सत्य व्यक्त करके, और फिर उसका शुद्धिकरण कर उसे सत्य के साथ परिपूर्ण करके। जब हम सत्य को समझ कर परमेश्वर को जान लेते हैं, तब हम शैतान द्वारा अपने भ्रष्ट होने के सच को स्पष्ट देख सकेंगे और शैतान से घृणा करना शुरू करेंगे, शैतान को त्याग देंगे, और शैतान को श्राप देंगे। अंतत:, हम शैतान के विरुद्ध जबरदस्त विद्रोह करेंगे और पूर्ण रूप से परमेश्वर की ओर हो जायेंगे। ताकि परमेश्वर मानवजाति को शैतान के चंगुल से वापस छीन सकें। ये लोग जिनकी रक्षा हुई है, वे परमेश्वर द्वारा शैतान को हरा कर हथियाये हुए लोग हैं। इस प्रकार कार्य करके ही परमेश्वर वास्तव में शैतान को हरा कर उसका अपमान कर सकते हैं। यही परमेश्वर के अंत के दिनों के न्याय कार्य की अंदर की कहानी भी है। क्या हर कोई परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य के तथ्य को स्पष्ट रूप से समझ पा रहा है? हालांकि परमेश्वर के अंत के दिनों का कार्य बीस-तीस वर्ष तक ही चलता है, फिर भी उन्होंने विजयी लोगों का एक समूह बनाया, ये विजयी परमेश्वर के कमाए और इस्तेमाल किये प्रथमफल हैं। मानवजाति के इतिहास की तुलना में, ये बीस-तीस वर्ष क्या पलक झपकने जैसे नहीं हैं? बाइबल कहती है, "प्रभु के यहाँ एक दिन हज़ार वर्ष के बराबर है, और हज़ार वर्ष एक दिन के बराबर है" (2 पतरस 3:8)। यदि इसमें कहा गया है कि जब प्रभु अंत के दिनों में लौटेंगे, तो वे एक ही क्षण में, पलक झपकते ही हमारे शरीर को बदल देंगे, यह परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य द्वारा हासिल प्रभावों के लिए भी उतना ही उपयुक्त है। इसको इस रूप में भी ग्रहण किया जा सकता है। परंतु पौलुस ने कहा, "पर हमारा स्वदेश स्वर्ग पर है; और हम एक उद्धारकर्ता प्रभु यीशु मसीह के वहाँ से आने की बाट जोह रहे हैं। वह अपनी शक्‍ति के उस प्रभाव के अनुसार जिसके द्वारा वह सब वस्तुओं को अपने वश में कर सकता है, हमारी दीन-हीन देह का रूप बदलकर, अपनी महिमा की देह के अनुकूल बना देगा" (फिली 3:20-21)। हम पौलुस के कथनों का सरलता से यह अर्थ निकाल सकते हैंकि जो प्रभु में विश्वास करते हैं, वे प्रभु के लौटने पर उनसे मिलने के लिए उसी क्षण बदल दिए जायेंगे और हवा में उठा लिए जायेंगे। इसलिए, हम आल सी होकर, हमें परिवर्तित और स्वर्गारोहित किये जाने के लिए, प्रभु के बादलों पर अवरोहित होने की प्रतीक्षा करते रहे। क्या पौलुस का कथन भ्रमित करने वाला नहीं है? परमेश्वर के कार्य को लेकर हम धारणाओं और कल्पनाओं से भरे नहीं हो सकते।परमेश्वर का कार्य हर कदम पर व्यावहारिक, ठोस और सुस्पष्ट है। देहधारी सर्वशाक्तिमान परमेश्वर व्यावहारिक परमेश्वर हैं। जो सत्य व्यक्त कर मनुष्य की रक्षा करने के लिए संसार में आते हैं। यदि हम इसे स्वीकार नहीं करते हैं, तो क्या हम परमेश्वर का विरोध कर उनके विरुद्ध विद्रोह नहीं कर रहे? हम परमेश्वर से प्रशंसा और आशीष कैसे प्राप्त कर सकते हैं? आप सब स्वीकार करते हैं न?

"स्क्रीनप्ले प्रश्नों के उत्तर" से

पिछला:प्रश्न 15: तुम कहते हो कि जो लोग परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, उन्हें परमेश्वर के अंतिम दिनों के न्याय के कार्य को स्वीकार करना चाहिए और उसके बाद ही उनके भ्रष्ट स्वभाव शुद्ध हो सकते हैं और स्वयं वे परमेश्वर द्वारा बचाए जा सकते हैं। परन्तु हम, परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार, नम्रता और धैर्य का अभ्यास करते हैं, हमारे दुश्मनों से प्रेम करते हैं, हमारे क्रूसों को उठाते हैं, संसार की चीजों को त्याग देते हैं, और हम परमेश्वर के लिए काम करते हैं और प्रचार करते हैं, इत्यादि। तो क्या ये सभी हमारे बदलाव नहीं हैं? हमने हमेशा इस तरह से चाह की है, तो क्या हम भी शुद्धि तथा स्वर्गारोहण को प्राप्त नहीं कर सकते और स्वर्ग के राज्य में प्रवेश नहीं कर सकते?

अगला:प्रश्न 20: बाइबल में यह लिखा गया है: "यीशु मसीह कल और आज और युगानुयुग एक–सा है" (इब्रा 13:8)। तो परमेश्वर का नाम कभी नहीं बदलता है! लेकिन तुम कहते हो कि जब परमेश्वर अंतिम दिनों में फिर से आएगा तो वह एक नया नाम लेगा और उसे सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहा जाएगा। तुम इसे कैसे समझा सकते हो?

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प्रश्न 10: तुम इसका प्रमाण प्रस्तुत करते हो कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर सत्य को अभिव्यक्त करता है और अंतिम दिनों में न्याय का अपना कार्य करता है। मुझे लगता है कि प्रभु यीशु में हमारा विश्वास और पवित्र आत्मा के कार्य की स्वीकृति का मतलब है कि हमने पहले से ही परमेश्वर के न्याय का अनुभव किया है। सबूत के तौर पर यहाँ प्रभु यीशु के वचन दिए गए हैं: "क्योंकि यदि मैं न जाऊँ तो वह सहायक तुम्हारे पास न आएगा; परन्तु यदि मैं जाऊँगा, तो उसे तुम्हारे पास भेजूँगा। वह आकर संसार को पाप और धार्मिकता और न्याय के विषय में निरुत्तर या कायल करेगा" (योहन 16:7-8)। हमारा मानना है कि, हालांकि प्रभु यीशु का कार्य छुटकारे का कार्य था, जब वह स्वर्ग तक पहुंच गया तो पेन्तेकोस्त के दिन, पवित्र आत्मा उतर आया और उसने मनुष्यों पर काम किया: "पाप और धार्मिकता और न्याय के विषय में निरुत्तर या कायल करेगा"। यह आखिरी दिनों में परमेश्वर के न्याय का कार्य होना चाहिए, इसलिए मैं जिस बात का अनुसरण करना चाहता हूँ, वो यह है कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर द्वारा अंतिम दिनों में किए गए न्याय के कार्य और प्रभु यीशु के कार्य के बीच वास्तव में क्या भिन्नताएँ हैं? बुरे कर्म क्या हैं? बुरे कर्मों की अभिव्यक्तियाँ क्या हैं? "सब कुछ पीछे छोड़कर परमेश्वर का अनुसरण करो" इसका क्या मतलब है? परमेश्वर का अनुसरण करना किसे कहते हैं?