सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया का ऐप

परमेश्वर की आवाज़ सुनें और प्रभु यीशु की वापसी का स्वागत करें!

सत्य को खोजने वाले सभी लोगों का हम से सम्पर्क करने का स्वागत करते हैं

अंतिम दिनों के मसीह के लिए गवाहियाँ 

ठोस रंग

विषय-वस्तुएँ

फॉन्ट

फॉन्ट का आकार

लाइन स्पेस

पृष्ठ की चौड़ाई

0 खोज परिणाम

कोई परिणाम नहीं मिला

प्रश्न 22: प्रभु यीशु ने कहा: "परन्तु जो कोई उस जल में से पीएगा जो मैं उसे दूँगा, वह फिर अनन्तकाल तक प्यासा न होगा; वरन् जो जल मैं उसे दूँगा, वह उसमें एक सोता बन जाएगा जो अनन्त जीवन के लिये उमड़ता रहेगा।" (यूहन्ना 4:14)। अधिकांश लोग सोचते हैं कि प्रभु यीशु ने हमें पहले से ही अनन्त जीवन का मार्ग प्रदान किया है, लेकिन मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के इन वचनों को पढ़ा है: "केवल अंतिम दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनन्त जीवन का मार्ग दे सकता है।" यह सब क्या है? यह क्यों कहता है कि आखिरी दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनन्त जीवन का मार्ग दे सकता है?

उत्तर:

अनंत जीवन का मार्ग क्या है वास्तव में इसे जानने के लिए, हमें पहले यह जानना चाहिए कि अनंत जीवन का मार्ग आता कहाँ से है। हम सब जानते हैं कि जब भी परमेश्वर देहधारी बनते हैं वे गवाही देते हैं कि वह सत्य, मार्ग और जीवन हैं। यह सबूत ये साबित करने के लिए पर्याप्त है कि केवल मसीह अनंत जीवन का मार्ग व्यक्त कर सकते हैं। चूँकि मसीह देहधारी परमेश्वर का प्रकटन हैं, चूँकि वह वो देह हैं जिसे परमेश्वर के आत्मा द्वारा धारण किया जाता है, इसका अर्थ है कि मसीह का सार परमेश्वर का सार है, और कि मसीह स्वयं सत्य, मार्ग और जीवन हैं। इसलिए, केवल मसीह सत्य व्यक्त कर सकते हैं, केवल वही छुटकारे और मानवजाति के बचाव के कार्य को अंजाम देने में सक्षम हैं। यह निश्चित है। इससे फ़र्क नहीं पड़ता कि परमेश्वर किस युग में देहधारी बनते हैं, मसीह का सार कभी नहीं बदलेगा। प्रभु यीशु देह में परमेश्वर स्वयं हैं। इसलिए, जब प्रभु यीशु आये, उन्होंने सत्य, जीवन और मार्ग, और जीवन के जीवंत जल के स्त्रोत के रूप में स्वयं की गवाही दी, और वह सत्य को व्यक्त करने और मनुष्य को पश्चाताप का मार्ग प्रदान करने में सक्षम थे। इसलिए, जैसा कि प्रभु यीशु ने कहा था: "जो कोई यह जल पीएगा वह फिर प्यासा होगा, परन्तु जो कोई उस जल में से पीएगा जो मैं उसे दूँगा, वह फिर अनन्तकाल तक प्यासा न होगा; वरन् जो जल मैं उसे दूँगा, वह उसमें एक सोता बन जाएगा जो अनन्त जीवन के लिये उमड़ता रहेगा" (यूहन्ना 4:13-14)। प्रभु यीशु द्वारा बोली जाने वाली हर चीज़ उनके दिव्य सार की एक अभिव्यक्ति है, और यह उस सारे छुटकारे के कार्य के अनुसार भी अभिव्यक्त की जाती है जो वे करते हैं। यह निर्विवाद है! प्रभु यीशु देह में परमेश्वर हैं। सर्वशक्तिमान परमेश्वर प्रभु यीशु की वापसी हैं। वह देह में परमेश्वर भी हैं, सत्य का मूर्तरूप हैं। इसलिए, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के आगमन के बाद, वह भी सत्य, मार्ग और जीवन के रूप में स्वयं की गवाही देते हैं और मानवजाति को शुद्ध करने और बचाने के लिए सभी प्रकार के सत्य को व्यक्त करते हैं, मनुष्य को अनंत जीवन का मार्ग प्रदान किया जाता है। अपने दो देहधारणों के दौरान परमेश्वर सत्य, मार्ग और जीवन के रूप में अपनी स्वयं की गवाही क्यों देते हैं? क्योंकि मसीह के पास दिव्य सार है। इसे साधारण रूप से कहा जाए तो परमेश्वर स्वयं अनंत जीवन का मार्ग हैं। परमेश्वर स्वयं अनंत जीवन हैं। परिणामस्वरूप, देहधारी परमेश्वर सत्य व्यक्त करने में, मनुष्य को अनंत जीवन का मार्ग प्रदान करने में, परमेश्वर के कार्य को परिपूर्ण करने के लिए विभिन्न युगों में प्रकट होने में सक्षम हैं। मानवजाति को बचाने का परमेश्वर का कार्य चरणों में विभाजित है। यह वह कार्य नहीं है जो केवल एक छुटकारे के कार्य के चरण के पूरा होने से परिपूर्ण हो सकता है। अपना छुटकारे का कार्य करने के बाद परमेश्वर को अब भी अंत के दिनों में मानवजाति का न्याय करने, उसे शुद्ध करने और पूरी तरह बचाने की जरूरत है। इसलिए, प्रभु यीशु ने वादा किया था कि वे वापिस आयेंगे, जो यह साबित करता है कि परमेश्वर का कार्य लगातार आगे बढ़ रहा है, और यह कि व्यवस्था के युग या अनुग्रह के युग में ये किसी प्रकार से रुक नहीं सकता था। कुल मिलाकर, परमेश्वर द्वारा मानवजाति को बचाने के कार्य के तीन चरण सम्पन्न किये गये हैं, जो हैं, व्यवस्था के युग में कार्य, अनुग्रह के युग में कार्य और राज्य के युग में कार्य। व्यवस्था के युग से लेकर अनुग्रह के युग तक का समय 2,000 वर्ष था, और व्यवस्था के युग से लेकर राज्य के युग तक की समयावधि भी 2,000 वर्ष है। वापिस लौटे प्रभु यीशु द्वारा पूरा किया गया, परमेश्वर के घर से शुरू होने वाला न्याय का सम्पूर्ण कार्य, मानवजाति को पूरी तरह से शुद्ध करने और बचाने का कार्य है, और यह अन्धकार एवं बुराई के युग का अंत करने और राज्य के युग में मार्गदर्शन का कार्य है, जहाँ मानवजाति को बचाने का परमेश्वर का प्रबंधन कार्य अंत के दिनों में न्याय के कार्य के माध्यम से पूर्ण किया जाता है, और मानवजाति को सही मंजिल की तरफ ले जाया जाएगा। इसलिए, चूँकि अंत के दिनों में परमेश्वर का कार्य इन प्रभावों को प्राप्त करने में समर्थ है, अंत के दिनों में परमेश्वर के कार्य से व्यक्त सभी सत्य अनंत जीवन का मार्ग हैं जो परमेश्वर मानवजाति को प्रदान करते हैं। यदि बहुत से लोग हैं जो अंत के दिनों में परमेश्वर द्वारा व्यक्त सत्यों द्वारा जीते जाते हैं, शुद्ध, और पूर्ण हुए हैं, जिन्होंने परमेश्वर का ज्ञान प्राप्त किया है, जिनके जीवन स्वभाव बदले हैं, जो वास्तिवक मानव की समानता को जीते हैं, तो क्या जो जीवन का मार्ग है उन्हें प्राप्त हुआ है, वो अनंत जीवन का मार्ग है? यदि यही अनंत जीवन का मार्ग है, तो यह निश्चित है कि इसमें वे सत्य शामिल है जो मनुष्य को शुद्ध करेंगे, बचायेंगे और पूर्ण करेंगे, और यह निश्चित है कि परमेश्वर को जानने, परमेश्वर का आज्ञापालन और उनकी आराधना के प्रभाव प्राप्त किये जा सकते हैं। यह सुनिश्चित है। अगर हम इस बात को सच में समझने में सक्षम हैं और फिर सर्वशक्तिमान परमेश्वर द्वारा व्यक्त सारे सत्यों को एक बार पढ़ते हैं, तब हम समझने में सक्षम होंगे कि अनंत जीवन का मार्ग क्या है।

दोनों बार जब परमेश्वर देह बनें हैं वह मानवजाति को सत्य, मार्ग और जीवन देने में सक्षम हुए हैं, लेकिन प्रभु यीशु ने जो भी कार्य किया वह छुटकारे का कार्य था, केवल अंत के दिनों के सर्वशक्तिमान परमेश्वर न्याय और शुद्ध करने का कार्य कर सकते हैं, केवल उनके कार्य के माध्यम से मानवजाति को शुद्ध करने और बचाने का प्रभाव प्राप्त किया जा सकता है। इस बिंदु पर हमारी संगति में कुछ लोग हो सकते हैं जो पूछेंगे: "जब प्रभु यीशु अपना कार्य करने के लिए आये, उन्होंने समय से पहले ही आगे होने वाले कार्य और अंत के दिनों में परमेश्वर द्वारा व्यक्त किये जाने वाले सत्यों को व्यक्त क्यों नहीं किया? क्या ऐसा हो सकता है प्रभु यीशु मनुष्य का न्याय करने में और उसे ताड़ित करने में सक्षम नहीं थे? क्या ऐसा हो सकता है कि प्रभु यीशु हमें सत्य और जीवन देने में सक्षम नहीं थे? क्या प्रभु यीशु के वचन के माध्यम से हम जीवन प्राप्त नहीं कर सकते हैं?" निःसंदेह ऐसे कई लोग हैं जो इन प्रश्नों को अच्छी तरह से समझ नहीं पाते हैं, लेकिन हमें समझना चाहिए कि परमेश्वर के कार्य के प्रत्येक चरण में उनका सार और मूल-तत्व शामिल है, और उनके कार्य का प्रत्येक चरण एक प्रभाव प्राप्त करेगा। इसलिए, परमेश्वर के कार्य के प्रत्येक चरण में व्यक्त सभी सत्य, वे सभी वचन जो वे बोलते हैं, सभी महत्वपूर्ण हैं, उन सबका अपना उद्देश्य है, वे सभी एक प्रभाव प्राप्त करने के लिए कार्य करते हैं। परमेश्वर के कार्य के प्रत्येक चरण में व्यक्त किये गए सभी वचन परमेश्वर द्वारा किये गए कार्य के आस-पास घूमते हैं और मनचाहे प्रभाव प्राप्त करने के लिए व्यवस्थित रूप से बोले जाते हैं। परमेश्वर ने कभी भी ऐसा कुछ नहीं कहा होगा जो उनके कार्य से संबन्धित नहीं था, यह उनके कार्य और वचन का सिद्धांत है। प्रभु यीशु ने जो किया वह सारा कार्य छुटकारे का कार्य था, यह अंत के दिनों के परमेश्वर का न्याय का कार्य नहीं था। इसलिए, प्रभु यीशु द्वारा व्यक्त सभी सत्य उनके छुटकारे के कार्य के आस-पास घूमते हैं, वे अंत के दिनों में सर्वशक्तिमान परमेश्वर द्वारा मनुष्य को शुद्ध करने, उसके उद्धार और उसे पूर्ण करने के लिए व्यक्त सत्यों से भिन्न हैं। इसलिए ये सिर्फ अंत के दिनों के सर्वशक्तिमान परमेश्वर द्वारा व्यक्त सारे सत्य हैं जिन्हें अनंत जीवन का मार्ग कहा जा सकता है जो मनुष्य को शुद्ध कर सकता है, बचा सकता है और पूर्ण कर सकता है, जबकि प्रभु यीशु द्वारा व्यक्त सभी सत्य केवल वे सत्य हैं जो मनुष्य को छुटकारा देते हैं। जो उन्होंने व्यक्त किया वह मानवजाति के लिए केवल पश्चाताप का मार्ग है। क्योंकि परमेश्वर के कार्य की एक योजना है और उसके चरण हैं। परमेश्वर प्रत्येक चरण में जो भी कार्य करता है वह पहले से योजनाबद्ध है, परमेश्वर की योजना बदल नहीं सकती, जब परमेश्वर कार्य करते हैं तो वे अपनी स्वयं की योजना को अव्यवस्था में नहीं डालेंगे। उदाहरण के लिए, व्यवस्था के युग में, मानवजाति की जरूरतों और उनके कार्य की योजना के अनुसार, यहोवा परमेश्वर ने केवल मानवजाति के धरती पर रहने के मार्गदर्शन के लिए नियम जारी किये। उनका कार्य केवल मानवजाति का धरती पर रहने के लिए मार्गदर्शन करना था। तब प्रभु यीशु आये, अनुग्रह के युग की शुरुआत की, और उन्होंने प्रायश्चित का मार्ग अभिव्यक्त किया, "मन फिराओ क्योंकि स्वर्ग का राज्य निकट आया है।" और क्रूस पर चढ़कर मानवजाति के छुटकारे का कार्य किया। फिर अंत के दिनों में सर्वशक्तिमान परमेश्वर आये, मानवजाति को शुद्ध करने और बचाने के लिए सभी सत्यों को अभिव्यक्त किया। वे परमेश्वर के घर से शुरू करके न्याय का कार्य करते हैं, पिछले युग का अंत करते हैं और राज्य के युग के प्रवेश कराते हैं। यह हमें देखने देता है कि परमेश्वर जिस भी युग में जो भी कार्य करते हैं, जो भी सत्य वे व्यक्त करते हैं, सभी योजनाबद्ध और सिद्धांतबद्ध हैं। परमेश्वर का कार्य की एक संरचना है, यह कदम दर कदम आगे बढ़ता है, हर कदम एक दूसरे के पूरक है। परमेश्वर के कार्य का प्रत्येक चरण मानवजाति की जरूरतों पर, मानवजाति के वास्तविक स्तर पर, और परमेश्वर की पूर्वनिर्धारित योजनाओं पर आधारित है। उस समय जब प्रभु यीशु अपना छुटकारे का कार्य कर रहे थे, मनुष्य को परमेश्वर या परमेश्वर के कार्य का ज्ञान नहीं था, उसने केवल इतना जाना कि परमेश्वर ने स्वर्ग, धरती और सभी चीजों को बनाया है, वह केवल परमेश्वर के नियमों और आज्ञाओं का पालन करना जानता था। इसलिए, जब प्रभु यीशु ने अनुग्रह के युग में मानवजाति के छुटकारे का अपना कार्य किया, तो उन्होंने केवल पश्चाताप का मार्ग अभिव्यक्त किया: "मन फिराओ क्योंकि स्वर्ग का राज्य निकट आया है।" ताकि वे मनुष्य को परमेश्वर के सामने लाने और अपने पापों की स्वीकृति और पश्चाताप करने, जो पाप उसने किये हैं उन्हें परमेश्वर के आगे स्वीकारने में समर्थ कर सकें, जिससे वह मुक्ति और उद्धार के लिए परमेश्वर से निवेदन कर सके, और परमेश्वर से प्रार्थना कर सके, परमेश्वर का धन्यवाद और उनकी स्तुति भी कर सके, और परमेश्वर की सम्पूर्ण कृपा का आनन्द लेने के काबिल हो। ये वो प्रभाव हैं जो पहले ही परमेश्वर के छुटकारे के कार्य के माध्यम से प्राप्त किये जा चुके हैं। बहुत से लोग कई वर्षों तक प्रभु में विश्वास करने के बाद पहचानने में सक्षम हैं कि उनके द्वारा किये गए सभी पापों के लिए प्रभु द्वारा वास्तव में उन्हें दोषमुक्त किया जा चुका है, लेकिन उनकी आंतरिक पापी प्रकृति पहले की तरह मौजूद है, और न केवल मौजूद है, बल्कि इसकी जड़े गहरी हैं, इस हद तक जहाँ वे अपनी पापी प्रकृति द्वारा नियंत्रित होकर लगातार पाप और परमेश्वर का विरोध कर सकते हैं। वे अभी भी पाप के बंधनों से दूर जाकर पवित्र और शुद्ध बनने में सक्षम नहीं हैं। यह कुछ ऐसा है जिसे हर कोई तथ्य के रूप में स्वीकार करता है। तो फिर, हम जैसे लोगों के लिए जो प्रभु में विश्वास करते हैं और अपने पापों से मुक्त कर दिए गये हैं, क्या हमने वास्तव में अनंत जीवन का मार्ग प्राप्त कर लिया है? क्या हमारे पापों से मुक्ति का मतलब है कि हम पवित्र हैं? क्या इसका मतलब यह है कि हम वास्तव में बचाए गए हैं और हमने परमेश्वर की अनुशंसा प्राप्त की है? यदि इन प्रभावों को हासिल नहीं किया जा सकता, तो हम कैसे कह सकते हैं कि हम प्रभु में हमारी आस्था के माध्यम से पहले ही अनंत जीवन का मार्ग प्राप्त कर चुके हैं? क्या ऐसा कोई है जो यह कहने की हिम्मत करता है? प्रभु यीशु ने जो भी कार्य किया वह छुटकारे का कार्य था, उन्होंने पश्चाताप के मार्ग के बारे में बताया। प्रभु यीशु के सभी कार्यों ने स्पष्ट रूप से अंत के दिनों के न्याय का मार्ग प्रशस्त किया था। इसलिए, प्रभु यीशु को अपनाकर हम सिर्फ हमारे पापों से मुक्त हुए हैं, हमें वास्तव में अनंत जीवन प्राप्त नहीं हुआ है। अगर हम वापिस लौटे प्रभु यीशु द्वारा किये गए न्याय के सभी कार्यों को स्वीकार करने में सक्षम हैं, तब हम शुद्ध किये जायेंगे और परमेश्वर की अनुशंसा प्राप्त करेंगे, और सिर्फ तभी हम वास्तव में वे लोग होंगे जिन्हें अनंत जीवन प्राप्त हुआ है। हमारा प्रभु यीशु में विश्वास हमें केवल हमारे पापों से मुक्त करता है और हमें परमेश्वर की प्रार्थना और उनका अनुग्रह प्राप्त करने के योग्य बनाता है। केवल यही वे प्रभाव हैं जो प्रभु यीशु द्वारा किये गए छुटकारे के कार्य के माध्यम से प्राप्त किये जाते हैं। ऐसे बहुत से लोग हैं जिन्हें प्रभु यीशु के कार्य का कोई ज्ञान नहीं है। वे लोग इस गलतफहमी में हैं कि चूँकि प्रभु यीशु ने छुटकारे का अपना कार्य पूरा कर लिया है और वे प्रभु में अपनी आस्था के कारण अपने पापों से मुक्त हो चुके हैं, परमेश्वर का उद्धार का कार्य पूरी तरह समाप्त हो गया है। वे सोचते हैं कि एक बार कार्य का एक चरण पूर्ण हो गया, तो सबकुछ समाप्त हो गया। यह एक बहुत बड़ी गलती है! यदि यह सच होता तो प्रभु यीशु ने यह क्यों कहा होगा कि वे लौटेंगे? क्या कार्य होगा जो उन्हें अपनी वापसी के बाद करना होगा? बहुत से लोग अनजान हैं, क्योंकि उन्हें परमेश्वर के कार्य का ज्ञान नहीं है, वे प्रभु यीशु के कार्य को देखने के लिए सिर्फ अपनी धारणाओं और कल्पनाओं पर भरोसा करते हैं। वे इस गलतफहमी में हैं कि प्रभु पर विश्वास करके वे अनंत जीवन प्राप्त करते हैं, कि यह उन्हें स्वर्ग के राज्य में प्रवेश की अनुमति देगा। क्या ये मनुष्य की धारणाएँ और कल्पनाएँ नहीं हैं?

अब हर कोई इस बात से अवगत हो सकता है कि केवल अंत के दिनों में लौटे प्रभु यीशु द्वारा किये गए कार्यों के माध्यम से ही मनुष्य अनंत जीवन प्राप्त करने में समर्थ है। यह बिलकुल सत्य है। तो ऐसा क्यों है कि केवल अंत के दिनों का मसीह मनुष्य को अनंत जीवन का मार्ग प्रदान कर सकता है? क्या ऐसा हो सकता है कि प्रभु यीशु मनुष्य को अनंत जीवन देने में असमर्थ हैं? आप इसे ऐसे नहीं कह सकते हैं। हमें इस बारे में स्पष्ट होना चाहिए: प्रभु यीशु परमेश्वर का देहधारण हैं, वह स्वयं सत्य, मार्ग और जीवन हैं, वह स्वयं अनंत जीवन के मार्ग से सम्पन्न हैं। तो फिर, ऐसा क्यों है कि हम पूरी तरह प्रभु यीशु पर विश्वास करके भी अनंत जीवन का मार्ग प्राप्त नहीं कर सकते? ऐसा क्यों है कि केवल अंत के दिनों के मसीह मनुष्य को अनंत जीवन का मार्ग प्रदान कर सकते हैं? यह मुख्य रूप से परमेश्वर के कार्य के माध्यम से प्राप्त प्रभावों पर आधारित है। हम सभी जानते हैं कि अनुग्रह के युग में प्रभु यीशु ने केवल छुटकारे का कार्य किया था, इसलिए, यद्दपि हमने एक बार प्रभु पर विश्वास किया है, हमें हमारे पापों से मुक्त कर दिया गया है, लेकिन हम अभी भी हमारी पापी प्रकृति से प्रेरित हैं और अनजाने में अक्सर पाप और परमेश्वर का विरोध करेंगे। हम पाप के बंधनों को तोड़कर पवित्र बनने में सक्षम नहीं हैं, न ही हम परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करने के योग्य हैं। यह ये साबित करने के लिए काफी है कि प्रभु यीशु ने मानवजाति के छुटकारे के लिए जो भी कार्य किया यह वो कार्य नहीं था जो पूरी तरह से मानवजाति को शुद्ध कर सके और बचा सके, केवल अंत के दिनों में वापिस लौटे प्रभु यीशु द्वारा किया गया न्याय का कार्य ही मनुष्य को शुद्ध कर सकता है और बचा सकता है। इसलिए प्रभु यीशु ने भविष्यवाणी की कि वे लौटेंगे, जैसा कि प्रभु यीशु ने कहा था: "अभी भी मेरे पास कहने के लिए बहुत सी बातें हैं, लेकिन अभी तुम उन्हें सहन नहीं कर सकते हो। हालाँकि, जब वह, सत्य का आत्मा आएगी, तो वह सच्चाई की ओर तुम्हारा मार्गदर्शन करेगी: क्योंकि वह स्वयं कुछ नहीं बोलेगी; बल्कि वह जो कुछ भी सुनेगी, उसके बारे में वह तुम्हें बताएगी: वह तुम्हें होने वाली घटनाओं के बारे में बताएगी" (यूहन्ना 16:12-13)। "जो मुझे तुच्छ जानता है और मेरी बातें ग्रहण नहीं करता है उसको दोषी ठहरानेवाला तो एक है: अर्थात् जो वचन मैं ने कहा है, वही पिछले दिन में उसे दोषी ठहराएगा" (यूहन्ना 12:48)। प्रभु यीशु की भविष्यवाणी पहले ही सच हो चुकी है। अर्थात, सर्वशक्तिमान परमेश्वर अंत के दिनों में परमेश्वर के घर से शुरू करके न्याय कार्य का करते हैं, और उन्होंने मानवजाति को शुद्ध करने और बचाने के लिए सभी सत्यों को व्यक्त किया है, ये सत्य अनंत जीवन का मार्ग हैं जो अंत केदिनों में परमेश्वर द्वारा मनुष्य को प्रदान किये जाते हैं। न्याय के माध्यम से, सर्वशक्तिमान परमेश्वर मनुष्यों पर व्यक्त सभी सत्यों को ढालते हैं ताकि वे मनुष्य का जीवन बन सकें। परमेश्वर बिना किसी अच्छी वजह के सत्य व्यक्त नहीं करते हैं, परमेश्वर मनुष्य की विभिन्न धारणाओं और कल्पनाओं को लक्षित करते हैं, मनुष्य का न्याय और मनुष्य को प्रकट करने के लिए वह सत्य की अपनी अभिव्यक्ति में परमेश्वर को धोखा देने और विरोध करने की मनुष्य की प्रकृति और सार और मनुष्य के विभिन्न शैतानी स्वभावों को लक्षित करते हैं। परमेश्वर के चुने हुए लोगों द्वारा सत्य प्राप्त करने की प्रक्रिया से होकर गुजरने में, वे न्याय और ताड़ना की प्राप्ति की प्रक्रिया से भी होकर गुजरते हैं और शोधन की कठिनाईयों को सहन करते हैं, साथ ही साथ शुद्ध किये और बचाये जाने की प्रक्रिया से भी गुजरते हैं। इसलिए, हर एक व्यक्ति जो अंत के दिनों में परमेश्वर के न्याय और ताड़ना का अनुभव करता है बहुत से सत्यों को समझता है, वे वास्तव में अपने उस भ्रष्ट सार को जानते हैं जो परमेश्वर का विरोध करता है और उन्हें धोखा देता है, और उन्हें परमेश्वर के पवित्र सार और उनके धार्मिक और अपमान बर्दाश्त न करने वाले स्वभाव का भी ज्ञान है। उनमें परमेश्वर के लिए सच्चा आदर और आज्ञाकारिता है। उन सभी को परमेश्वर से सत्य और जीवन प्राप्त हुआ है। वे सभी परमेश्वर द्वारा विजेता बनाये गए हैं। इस समूह के लोग वे हैं जिनकी प्रकाशितवाक्य में विजेताओं के रूप में भविष्यवाणी की गई थी जो बड़ी आपदा में से बाहर निकलेंगे। यह दर्शाता है कि जब तक परमेश्वर के चुने हुए लोग पूरी तरह शुद्ध और पवित्र नहीं बन जाते उन्हें परमेश्वर के न्याय और ताड़ना का अनुभव करते हुए निश्चित ही बहुत सी कठिनाइयाँ सहन करनी पड़ेंगी। क्या यह एक साधारण मामला है? क्या सत्य को अपने जीवन के रूप में स्वीकार करना आसान है? उन्हें बहुत सी कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा और इन सभी कठिनाइयाँ परमेश्वर के न्याय और ताड़ना के दौर से गुजरते हुए सहीं जातीं हैं, वे सभी सत्य को अपने जीवन के रूप में प्राप्त करने के खातिर सहीं जातीं हैं। हम कह सकते हैं कि यह मृत्यु को करीब से देखने के अनुभव की तरह है, और हम यह भी कह सकते हैं पूर्ण परिवर्तन से गुजरने की तरह है। जब ये लोग बड़े कष्ट से बाहर निकलकर विजेता बनते हैं, वे असल में कौन सा जीवन प्राप्त करेंगे? यह अंत के दिनों के मसीह द्वारा किये गए न्याय के सभी कार्यों से लाया गया अनंत जीवन का मार्ग होगा।

अनुग्रह के युग में प्रभु यीशु ने छुटकारे का कार्य किया, जिसने लोगों को केवल पश्चाताप का मार्ग दिया, "मन फिराओ क्योंकि स्वर्ग का राज्य निकट आया है।" अंत के दिनों में सर्वशक्तिमान परमेश्वर आये हैं और, प्रभु यीशु द्वारा किये गए छुटकारे के कार्य के आधार पर, वे मानवजाति को शुद्ध करने और बचाने के लिए सभी सत्यों को व्यक्त करते हैं, और मनुष्यों की भ्रष्ट जाति शैतान के प्रभाव में जाने से पूरी तरह से बचाई जायेगी, वे अपने पापों और अपनी गंदगी और भ्रष्टाचार से मुक्त हो जायेंगे, और अपनी मूल पवित्रता में वापिस लौट आयेंगे, मानवजाति को परमेश्वर के समीप रहने की अनुमति मिल जायेगी, जहाँ वे परमेश्वर की आज्ञा मानने वाले और आराधना करने वाले लोग बन सकते हैं, वे परमेश्वर की मानवजाति को बचाने की प्रबंधन योजना का समापन करते हैं। इसलिए, केवल अगर हम अंत के दिनों में सर्वशक्तिमान परमेश्वर के न्याय के कार्य को स्वीकार करते हैं, तभी हम शुद्ध किये जाने और बचाए जाने और स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने में सक्षम होंगे। अब जबकि हमने यहाँ तक संगति कर ली है, तो सभी को यह पता हो जाना चाहिए कि ऐसा क्यों है कि केवल अंत के दिनों के मसीह मनुष्य को अनंत जीवन का मार्ग देने में सक्षम हैं।

"स्क्रीनप्ले प्रश्नों के उत्तर" से

देहधारी बने परमेश्वर ही प्रभु यीशु हैं, परमेश्‍वर का प्रकटन हैं। प्रभु यीशु ने कहा, "और जो कोई भी मुझमें जीता और विश्वास करता है, वह कभी नहीं मरता है।" "परंतु जो पानी मैं उसे दूँगा वह उसमें एक कुएं का निर्माण करेगी जिससे उसे चिरस्थायी जीवन प्राप्त होगा।" बाइबल कहती है, "वह जो पुत्र पर विश्वास करता है, वह शाश्वत जीवन प्राप्त करता है।" ये सभी वचन सत्य हैं, वे सभी तथ्य हैं! क्योंकि देहधारी बने परमेश्वर ही प्रभु यीशु हैं, उनमें परमेश्‍वर का सार और पहचान है। वे स्‍वयं चिरस्थायी जीवन का मार्ग हैं। वे जो कुछ भी कहते हैं और करते हैं वह परमेश्वर के जीवन की एक स्वाभाविक अभिव्यक्ति है। वह जो कुछ व्यक्त करते हैं वह सत्‍य है और वह है जो परमेश्‍वर के पास है और जो परमेश्‍वर है। तो प्रभु यीशु स्‍वयं अनन्त जीवन हैं, और शाश्‍वत जीवन का मार्ग प्रदान कर सकते हैं। वह मृतक को में वापस जीवित कर सकते हैं। प्रभु यीशु में विश्वास करके, हम एकमात्र सच्चे परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, और इस तरह शाश्‍वत जीवन प्राप्त कर सकते हैं। इस पर तो सवाल ही नहीं है। प्रभु यीशु का लाज़रस का पुनस्र्ज्जीवन एक अच्छा प्रमाण है। कि प्रभु यीशु हमें शाश्‍वत जीवन का मार्ग प्रदान कर सकते हैं, उनके पास यह अधिकार है। फिर, ऐसा क्यों है कि प्रभु यीशु ने अनुग्रह के युग के दौरान शाश्‍वत जीवन का मार्ग प्रदान नहीं किया? ऐसा इसलिए है क्योंकि, मानवजाति के छुटकारे के लिए प्रभु यीशु सूली पर चढ़ने आये, अंतिम दिनों की तरह शुद्धिकरण और उद्धार का कार्य करने के लिये नहीं। प्रभु यीशु का छुटकारे का कार्य केवल मनुष्यों के पापों को क्षमा करने से संबंधित था, परन्तु इसने मनुष्य को उसकी शैतानी प्रकृति और स्वभाव से छुटकारा नहीं दिलाया। इसलिए, प्रभु पर विश्वास करके, हमें हमारे पापों के लिए माफ़ किया गया था, लेकिन हमारे शैतानी स्वभाव को किसी भी तरह से शुद्ध नहीं किया गया था। हम अभी भी स्वयं के बावजूद पाप करते हैं, परमेश्‍वर का विरोध करते हैं और उनसे विश्वासघात करते हैं। क्‍या यह सच नहीं है? यह सब स्थापित करने के बाद, हमें कुछ किसी चीज पर स्पष्ट होना चाहिए। अनुग्रह के युग के दौरान प्रभु यीशु के छुटकारे के कार्य ने अंतिम दिनों में न्‍याय कार्य के लिये मार्ग प्रशस्त किया, इसलिए, जब प्रभु यीशु ने छुटकारे का कार्य पूरा कर लिया, तो उन्‍होने यह भी वादा किया कि वे फिर से आएँगे। प्रभु यीशु ने कहा था, "अभी भी मेरे पास कहने के लिए बहुत सी बातें हैं, लेकिन अभी तुम उन्हें सहन नहीं कर सकते हो। हालाँकि, जब वह, सत्य का आत्मा आएगी, तो वह सच्चाई की ओर तुम्हारा मार्गदर्शन करेगी: क्योंकि वह स्वयं कुछ नहीं बोलेगी; बल्कि वह जो कुछ भी सुनेगी, उसके बारे में वह तुम्हें बताएगी: वह तुम्हें होने वाली घटनाओं के बारे में बताएगी" (यूहन्ना 16:12-13)। प्रभु यीशु के शब्दों से हम देख सकते हैं कि जब परमेश्‍वर अंतिम दिनों में वापस आते हैं केवल तभी वह समस्त सत्य व्यक्त करेंगे जो मनुष्य को शुद्ध करता और बचाता है। यहाँ, "सत्य का आत्मा आएगी, तो वह सच्चाई की ओर तुम्हारा मार्गदर्शन करेगी।" ये सत्य वास्तव में वे सत्य हैं जो अंतिम दिनों के सर्वशक्तिमान परमेश्वर मानवजाति को शुद्ध करने और बचाने में व्यक्त करते हैं। ये वे शब्द हैं जो पवित्र आत्मा कलीसियों से कहती है, और वे शाश्‍वत जीवन के मार्ग हैं जो परमेश्‍वर ने अंतिम दिनों में मानवजाति को प्रदान किये हैं। यही कारण है कि अनुग्रह के युग में प्रभु के अनुयायी शाश्‍वत जीवन का मार्ग प्राप्त करने में असमर्थ थे। प्रभु यीशु ने कहा था, "और जो कोई भी मुझमें जीता और विश्वास करता है, वह कभी नहीं मरता है।" और बाइबल भी कहती है, "वह जो पुत्र पर विश्वास करता है, वह शाश्वत जीवन प्राप्त करता है।" परन्तु वास्तव में, परमेश्‍वर ने यह कहा ताकि वे इस तथ्य को प्रमाणित कर सकें कि वे स्‍वयं परमेश्‍वर का प्रकटन हैं। और केवल वे ही मनुष्य को शाश्‍वत जीवन प्रदान कर सकते हैं। प्रभु यीशु का वादा कि जो लोग उन पर विश्वास करते हैं वे कभी नहीं मरेंगे, परमेश्वर के अधिकार की गवाही है। परमेश्‍वर स्‍वयं शाश्‍वत जीवन का मार्ग हैं, परमेश्‍वर मनुष्य को शाश्‍वत जीवन प्रदान करने में सक्षम है। कहने का यह मतलब नहीं है कि प्रभु यीशु के कार्य को स्वीकार करने पर मनुष्‍य ने शाश्‍वत जीवन प्राप्त किया। मुझे विश्वास है कि हर कोई इस बात को समझता है। लेकिन धार्मिक मंडलियों में, बहुत से लोग मानते हैं कि जब तक तक उनके पापों को माफ किया जाता है, तब तक लोग स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकते हैं और शाश्‍वत जीवन प्राप्त कर सकते हैं। क्या परमेश्वर के वचनों में इस परिप्रेक्ष्य के लिये कोई आधार है? प्रभु यीशु ने कभी ऐसा कुछ नहीं कहा है। इसके बारे में सोचें: हमारी कल्पना और अवधारणा के अनुसार, जब तक तक हमारे पापों को माफ कर दिया जाता है, तब तक हम स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकते हैं और शाश्‍वत जीवन प्राप्त कर सकते हैं, लेकिन प्रभु यीशु ने कई बार भविष्यवाणी क्यों की कि वे फिर से आएँगे? और उन्होंने अपने शिष्‍यों को इतनी भविष्यवाणियाँ और नीतिकथाएं क्यों बताईं? वे भविष्यवाणियाँ और नीतिकथाएँ वह चीजें हैं जिन्हें वे वापस आने पर पूरा करेंगे। क्या ऐसा हो सकता है कि लोग कई सालों तक परमेश्‍वर पर विश्वास करें लेकिन फिर भी इन चीजों को स्पष्ट रूप से ना देखें? अगर लोग केवल प्रभु को स्‍वीकार करते हैं लेकिन उनकी वापसी को स्वीकार नहीं करते हैं, तो यह किस प्रकार की समस्या है? क्या यह प्रभु से विश्वासघात नहीं है? कोई आश्चर्य नहीं कि प्रभु यीशु ने कहा: "जिन लोगों ने मुझसे कहा, हे प्रभु, हे प्रभु, उसमें से प्रत्येक स्वर्ग के राज्य में प्रवेश नहीं करेगा; परन्तु केवल वे स्वर्ग में प्रवेश करेंगे, जो मेरे पिता की इच्छा का पालन करते हैं। उस दिन बहुत से लोग मुझसे कहेंगे, हे प्रभु, हे प्रभु, क्या हमने आपके नाम की भविष्यवाणी नहीं की है? और क्या आपके नाम पर हमने शैतानों को नहीं निकाल दिया है? और क्या आपके नाम पर कई आश्चर्यजनक काम नहीं किए हैं? और फिर मैं उन्हें खुलकर कहूँगा, मैं तुम लोगों को कभी नहीं जानता था: तुम अधर्मियों, मुझसे दूर चले जाओ" (मैथ्यू 7:21-23)। परमेश्‍वर के वचन अब पूरी तरह से सत्य हो गए हैं। अगर कोई केवल प्रभु यीशु को स्वीकार करता है लेकिन उसकी वापसी को स्वीकार नहीं करता है, तो क्या यह वह व्यक्ति है जो वास्तव में पुत्र पर विश्वास करता है? यह वह है जो प्रभु को धोखा देता है! पुत्र में सच्चे विश्वासी उनको कहते हैं जो न केवल प्रभु में विश्वास करते हैं बल्कि उनकी वापसी को भी स्वीकार करते हैं, जो अंत तक मसीह का अनुसरण करते हैं। केवल इस प्रकार का व्यक्ति ही शाश्‍वत जीवन प्राप्त कर सकता है। परन्‍तु जो लोग केवल प्रभु यीशु में विश्वास करते हैं, लेकिन सर्वशक्तिमान परमेश्वर को स्वीकार नहीं करते हैं, वे सब लोग हैं जो प्रभु यीशु को धोखा देते हैं। वे परमेश्‍वर में विश्वास करते हैं परन्तु क्योंकि वे अंत तक परमेश्‍वर का पालन नहीं करते हैं, इसलिए उनका विश्वास शून्य हो जाता है - वे सड़क के किनारे से गिरते हैं। प्रभु यीशु यह निर्धारित करते हैं कि वे दुष्टता के कर्म करने वाले हैं क्योंकि वे केवल उनका (प्रभु का) नाम स्वीकार करते हैं लेकिन उनकी वापसी को स्वीकार नहीं करते हैं। और उन्‍होनें कहा: "मैं तुम लोगों को कभी नहीं जानता था: तुम अधर्मियों, मुझसे दूर चले जाओ।" तो, जो लोग इस प्रकार परमेश्वर द्वारा निंदित किए और त्याग दिए जाते हैं, जो केवल उसका नाम बनाए रखते हैं, क्‍या वे शाश्‍वत जीवन प्राप्त कर सकते हैं? यह निश्चित है कि उन्हें कुछ प्राप्त नहीं होगा। इससे ज्यादा और क्या, कि वे नरक में गिरेंगे और दंडित किये जाएँगे! यह पूरी तरह से परमेश्‍वर की धार्मिकता और पवित्र स्वभाव को प्रकट करता है। क्या आप लोग ऐसा नहीं कहेंगे?

जैसा कि हम सभी जानते हैं, इस तथ्य के बावजूद कि जब मनुष्य ने अनुग्रह के युग में प्रभु यीशु द्वारा छुटकारे को स्वीकार किया, तो उनके पापों को माफ कर दिया गया और उन्हें परमेश्‍वर की प्रार्थना करने और उनके अनुग्रह और आशीषों का आनंद लेने का अधिकार दिया गया, इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि इस समय, मनुष्य अभी भी अपनी पापी प्रकृति से विवश है, वे अभी भी पाप में असहायपूर्वक रहते हैं, वे प्रभु के वचनों का पालन करने में पूरी तरह से असमर्थ हैं और उनमें परमेश्‍वर के प्रति कोई वास्तविक श्रद्धा और आज्ञाकारिता नहीं है। इस समय, मनुष्य अक्सर अभी भी झूठ बोल सकता है और परमेश्‍वर को धोखा दे सकता है, वे प्रसिद्धि और भाग्य, पैसे की लालसा के पीछे पड़े रहते हैं, और दुनिया की प्रवृत्ति का पालन करने में लगे रहते हैं। विशेषकर जब परमेश्वर का कार्य मनुष्यों के मतों के अनुरूप नहीं होता है, तो मनुष्य परमेश्‍वर को दोष देता है, उनकी आलोचना करता है और यहाँ तक कि परमेश्‍वर का विरोध भी करता है। ऐसे लोग वास्‍तव में पश्चाताप तक नहीं कर सकते, क्या ऐसे लोग परमेश्‍वर की स्वीकृति प्राप्त कर सकते हैं? यद्यपि बहुत से लोग अनुसरण करने, गवाही देने, यहाँ तक कि प्रभु के लिए अपने जीवन तक बलिदान करने में सक्षम होते हैं, और वास्तव में पश्चाताप करते हैं, वास्तव में, क्या उनके भ्रष्ट स्वभाव को शुद्ध किया गया है ताकि वे पवित्रता प्राप्‍त कर सकें? क्या वे सचमुच प्रभु को जानते हैं? क्या उन्होंने वास्तव में शैतान के प्रभाव से खुद को मुक्‍त कर लिया है परमेश्वर द्वारा प्राप्त कर लिये गए हैं? बिल्कुल नहीं, यह आमतौर पर स्वीकार्य तथ्य है। यह इस बात को साबित करने के लिए पर्याप्त है कि अनुग्रह के युग दौरान प्रभु यीशु का कार्य केवल छुटकारा दिलाने का कार्य था। यह निश्चित रूप से अंतिम दिनों का उद्धार और सिद्धि का कार्य नहीं था। अनुग्रह के युग के दौरान प्रभु यीशु के वचनों ने केवल लोगों को पश्चाताप का तरीका दिया, शाश्‍वत जीवन का मार्ग नहीं। इसलिए यही कारण है कि प्रभु यीशु ने कहा कि वे फिर से आएँगे। प्रभु यीशु की वापसी सत्य को व्यक्त करने के कार्य करने और मनुष्य को शाश्‍वत जीवन का मार्ग प्रदान करने के लिए है, ताकि वे खुद को शैतान के प्रभाव से छुड़ा सकें और जीवन के रूप में सत्य को प्राप्त कर सकें ऐसे मनुष्य बन सकें जो परमेश्वर को जानते हैं, परमेश्वर की आज्ञापालन करते हैं, परमेश्‍वर का आदर करते हैं और परमेश्वर के साथ अनुकूल हो सकें, ताकि वे स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकें और शाश्‍वत जीवन प्राप्त कर सकें। प्रभु यीशु द्वारा छुटकारे के कार्य की नींव पर, अंतिम दिनों में सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने परमेश्वर के घर से शुरूआत करके न्‍याय का कार्य आरंभ कर दिया है और मानवता को शुद्ध करने और बचाने के लिए समस्त सत्‍य व्यक्त कर दिया है। उसने मानवजाति को परमेश्‍वर के धार्मिक, प्रतापी, और अपमान न किए जाने योग्य स्वभाव को प्रकट कर दिया है, शैतान द्वारा मनुष्य को भ्रष्ट करने के सार और तथ्य को ऊजागर और न्‍याय किया है। उन्होंने परमेश्‍वर के प्रति मनुष्य के विद्रोह और प्रतिरोध के मूल को उघाड़ दिया है, और मनुष्‍य को परमेश्‍वर के सभी इरादों और अपेक्षाओं के बारे में बता दिया है। इसी समय, उन्‍होनें मानवजाति को स्पष्ट शब्दों में उन सभी सत्‍यों के बारे में समझाया है जिनकी उद्धार प्राप्त करने के लिए मुनष्‍य को आवश्यकता है, जैसे कि परमेश्‍वर के उद्धार के कार्य के सभी तीन चरणों की अंदर की कहानी और उनका सार और साथ ही इन तीन चरणों के बीच संबंध, परमेश्वर के कार्य और मनुष्य के कार्य के बीच का अंतर, बाइबल के अंदर की कहानी और सत्य, अंतिम दिनों में न्‍याय का रहस्य, बुद्धिमान कुँवारियों को स्वर्गारोहण किए जाने का रहस्य और आपदाओं से पहले लोगों को विजेताओं में सिद्ध बनाने का रहस्य, देहधारी बने परमेश्वर का रहस्य, और परमेश्वर में वास्तव में विश्‍वास करने, उनकी आज्ञापालन करने और उनसे प्रेम करने का मतलब है, कैसे परमेश्‍वर का आदर करें और मसीह के अनुकूल बनने के लिए कैसे बुराई को दूर रखें, कैसे अर्थपूर्ण जीवन जीयें, और इत्‍यादि। ये सत्‍य, शाश्‍वत जीवन के मार्ग हैं जो अंतिम दिनों में परमेश्‍वर द्वारा मानवजाति को प्रदान किये गए हैं। इसलिए, अगर हम सत्य और जीवन को प्राप्त करना चाहते हैं, उद्धार, शुद्धिकरण को प्राप्त करना और सिद्ध किया जाना चाहते हैं, तो हमें सर्वशक्तिमान परमेश्वर, अंतिम दिनों के मसीह के वचनों और कार्य को स्वीकार और उनका आज्ञापालन अवश्य करना चाहिए। यही एकमात्र तरीका है जिससे हम सत्य और जीवन को प्राप्त कर सकते हैं। आइए सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों पर एक नज़र डालें। "परमेश्वर स्वयं ही जीवन है, सत्य है, और उसका जीवन और सत्य साथ ही साथ रहते हैं। जो सत्य को प्राप्त करने में असफल रहते हैं वे कभी भी जीवन को प्राप्त नहीं कर सकते| बिना मार्गदर्शन, सहायता और सत्य के प्रावधान के, आप केवल संदेश, सिद्धांत और मृत्यु को ही प्राप्त करोगे। परमेश्वर का जीवन सतत विद्यमान है, और उसका सत्य और जीवन एक साथ उपस्थित रहते हैं। यदि आप सत्य के स्रोत को नहीं प्राप्त कर पाते, तो आप जीवन के पोषण को प्राप्त नहीं कर पाओगे; यदि आप जीवन के प्रावधान को प्राप्त नहीं कर सकते तो आपके जीवन में निश्चय ही सत्य नहीं होगा, और इसलिए कल्पनाओं और धारणाओं से दूरी होगी, आपकी सम्पूर्ण देह केवल देह होगी, आपकी घिनौनी देह। ध्यान रखिये कि किताबों की बातें जीवन के तौर पर नहीं गिनी जाती हैं, इतिहास के लेखों को सत्य के रूप में चित्रित नहीं किया जा सकता, और अतीत के सिद्धांत आज के समय में परमेश्वर के द्वारा कहे गए वचनों का लेखा-जोखा नहीं माने जा सकते। केवल वही बात जो परमेश्वर ने पृथ्वी पर आकर और लोगों के बीच रहकर कही है, सत्य, जीवन, परमेश्वर की इच्छाजीवन,परमेश्वर की इच्छा है और कार्य करने का असली तरीका है। यदि आप अतीत के युगों में परमेश्वर के द्वारा कहे गए वचनों को आज के संदर्भ में लागू करते हैं, आप ऐतिहासिक विरासत का विशेषज्ञ है। और यदि आपको और बेहतर ढंग से व्यक्त करना हो आप ऐतिहासिक विरासत का एक विशेषज्ञ कहा जा सकता है। क्योंकि आप हमेशा उन कार्यों के सुरागों के बारे में विश्वास करते हैं जो परमेश्वर ने अतीत में किए हैं, केवल उन पदचिन्हों पर विश्वास करते हैं जो तब के हैं जब परमेश्वर लोगों के बीच रह कर कार्य किया करते थे। और आप केवल उसी मार्ग पर विश्वास करते हैं जो परमेश्वर ने पुराने समय में अपने अनुयायियों को दिया था। आज के समय में आप परमेश्वर के कार्य के मार्गदर्शन के बारे में विश्वास नहीं करते, महिमामय मुखाकृति में विश्वास नहीं करते, और परमेश्वर के द्वारा आज के समय में व्यक्त किये गये सत्य के मार्ग पर विश्वास नहीं करते। अत: आप एक ऐसे दिवास्वप्न दर्शी हैं जो सच्चाई से कोसों दूर है। यदि आप अभी भी उन वचनों से चिपके रहेंगे जो जीवन प्रदान करने में असमर्थ हैं, तो आप आशाहीन और एक निर्जीव काष्ठ[क] के समान हैं, क्योंकि आप बहुत ही रूढ़िवादी, असभ्य हैं जो चीजों को तर्क की कसौटी पर नहीं कसते हैं!" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "केवल अंतिम दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनन्त जीवन का मार्ग दे सकता है")।

"अंतिम दिनों के मसीह जीवन लेकर आए, और सत्य का स्थायी एवं अनन्त मार्ग प्रदान किया। इसी सत्य के मार्ग के द्वारा मनुष्य जीवन को प्राप्त करेगा, और एकमात्र इसी मार्ग से मनुष्य परमेश्वर को जानेगा और परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त करेगा। यदि आप अंतिम दिनों के मसीह के द्वारा प्रदान किए गए जीवन के मार्ग को नहीं खोजते हैं, तो आप कभी भी यीशु के अनुमोदन को प्राप्त नहीं कर पायेंगे और कभी भी स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने के योग्य नहीं बन पायेंगे क्योंकि आप इतिहास के कठपुतली और कैदी हैं। जो लोग नियमों, संदेशों के नियंत्रण में हैं और इतिहास की ज़ंजीरों में जकड़े हुए हैं, वे कभी भी जीवन को प्राप्त नहीं कर सकते हैं, और कभी भी सतत जीवन के मार्ग को प्राप्त करने के योग्य नहीं बन सकते हैं। क्योंकि सिंहासन से प्रवाहित जीवन जल की अपेक्षा, उनके भीतर मैला पानी भरा है जो हज़ारों सालों से वहीं ठहरा हुआ है, जिनके पास जीवन का जल नहीं है वे हमेशा के लिए एक लाश, शैतान के खेलने की वस्तु और नरक की संतान बन जाएंगे। फिर वे परमेश्वर को कैसे देख सकते हैं? यदि आप केवल अतीत को पकड़े रहने की कोशिश करेंगे, केवल ठहरी हुई चीज़ों को पकड़ने की कोशिश में लगे रहेंगे, और यथास्थिति को बदलने और इतिहास को तिलांजलि देने की कोशिश नहीं करेंगे, तो क्या आप हमेशा परमेश्वर के विरोध में नहीं रहेंगे? परमेश्वर के कार्य के चरण बहुत ही विशाल और सामर्थी हैं, जैसे कि हिलोरे मारती हुई लहरें और गरजता हुआ तूफान - फिर भी आप बैठकर निष्क्रियता से विनाश का इंतजार करते हैं, अपनी ही मूर्खता से चिपके रहते हैं और कुछ भी नहीं करते। इस प्रकार से, आपकोआंख मूंद्कर अनुसरण करने वाले के रूप में कैसे देखा जा सकता है? आप परमेश्वर को कैसे न्यायोचित ठहरा सकते हो कि आप उस परमेश्वर पर निर्भर रहोगे जो हमेशा नया है और कभी पुराना नहीं होता? और आपकी पीली पड़ चुकी किताब के वचन आपको नए युग में कैसे ले जा सकते हैं? वे कैसे आपको परमेश्वर के चरणबद्ध तरीके से चलने वाले कार्यों तक कैसे लेकर जायेंगे? वे आपको कैसे स्वर्ग लेकर जायेंगे? आपके हाथों में जो संदेश हैं वे आपको केवल अस्थायी सांत्वना ही दे सकते हैं, वह सत्य नहीं दे सकते जो जीवन देने में सक्षम है। जो शास्त्र आप पढ़ते हैं वे आपकी जिव्हा को आनंदित तो कर सकते हैं लेकिन ये वे विवेकपूर्ण वचन नहीं हैं जो आपको मानव जीवन का बोध करा सकें। ये वह मार्ग तो दिखा ही नहीं सकते जो आपको पूर्णता की ओर ले जायें। क्या यह भिन्नता आपके विचार-मंथन का कारण नहीं है? क्या यह आपको अपने भीतर समाहित रहस्यों को समझने के लिए अनुमति नहीं देता है? क्या आप अपने आप को परमेश्वर से मिलने के लिए स्वर्ग में ले जाने के योग्य हैं? परमेश्वर के आये बिना, क्या आप अपने आपको परमेश्वर के साथ पारिवारिक आनन्द मानने के लिए स्वर्ग में ले जा सकते हैं? क्या आप अभी भी स्वप्न देख रहे हैं? आपको सुझाव देता हूं, कि आप स्वप्न देखना बंद कर दो, और उनकी ओर देखो जो अभी कार्य कर रहे हैं, इन अंतिम दिनों में कौन मनुष्यों को बचाने के लिए कार्य कर रहा है। यदि आप ऐसा नहीं करते हैं, तो आप कभी भी सत्य को नहीं प्राप्त कर सकते, और कभी भी जीवन प्राप्त नहीं कर सकते हो" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "केवल अंतिम दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनन्त जीवन का मार्ग दे सकता है")।

"जो मसीह के द्वारा कहे गए सत्य पर भरोसा किए बिना जीवन प्राप्त करने की अभिलाषा करते हैं, वे पृथ्वी पर सबसे हास्यपद मनुष्य हैं और जो मसीह के द्वारा लाए गए जीवन के मार्ग को स्वीकार नहीं करते हैं वे कल्पना में ही खोए हुए हैं। इसलिए मैं यह कहता हूं कि लोग जो अंतिम दिनों में मसीह को स्वीकार नहीं करते हैं वे हमेशा के लिए परमेश्वर के द्वारा तुच्छ समझे जाएंगे। इन अंतिम दिनों में मसीह मनुष्यों के लिए परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करने का माध्यम है, जिसकी अवहेलना कोई भी नहीं कर सकता। मसीह के माध्यम बने बिना कोई भी परमेश्वर के द्वारा पूर्णता को प्राप्त नहीं कर सकता। परमेश्वर में आपका विश्वास है, और इसलिए आप उसके वचनों को स्वीकार करें और उसके मार्गों का पालन करें। बिना सत्य को प्राप्त किए या बिना जीवन के प्रावधान को स्वीकार किए आपको सिर्फ़ अनुग्रह प्राप्त करने के बारे में सोचना नहीं है। मसीह अंतिम दिनों में आता है ताकि वे सभी जो सच्चाई से उस पर विश्वास करते हैं उन्हें जीवन प्रदान किया जाए। उसका कार्य पुराने युग को समाप्त करने और नए युग में प्रवेश करने के लिए है और यही वह मार्ग है जिससे नए युग में प्रवेश करने वालों को अपनाना चाहिए। यदि आप उसे पहचानने में असमर्थ हैं, और उसकी भर्त्सना करते हैं, निंदा करते हैं और यहां तक कि उसे पीडा पहुंचाते हैं, तो आप अनन्त समय तक जलाए जाते रहने के लिए निर्धारित कर दिये गए हैं और आप कभी भी परमेश्वर के राज्य में प्रवेश नहीं कर पायेंगे" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "केवल अंतिम दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनन्त जीवन का मार्ग दे सकता है")।

सर्वशक्तिमान परमेश्वर, अंतिम दिनों के मसीह ने सभी सत्यों को व्यक्त किया है जो मानवता को शुद्ध करेंगे और बचाएँगे। ये वचन प्रचुर मात्रा में हैं, व्यापक हैं और इनमें वे सभी जीवनाधार हैं जो परमेश्वर प्रदान करते हैं। वे हमारी आँखें खोलते हैं और हमारे ज्ञान को समृद्ध करते हैं, हमें यह देखने की इजाजत देते हैं कि मसीह ही सत्‍य है, मार्ग है, और जीवन है। मसीह शाश्‍वत जीवन का मार्ग है। ये वचन जो परमेश्वर ने राज्‍य के युग में व्यक्त किये व्‍यवस्‍था के युग और अनुग्रह के युग के दौरान जो कुछ कहा गया उन सबसे परे जाते हैं। विशेष रूप से, जैसा कि "परमेश्‍वर का संपूर्ण ब्रह्माण्ड को कथन" में है वचन देह में प्रकट हुआ में परमेश्‍वर स्‍वयं को समस्त मानवता के लिए पहली बार ज्ञात करवाते हैं। यह भी पहली बार है कि मानवजाति सभी मनुष्यों के लिये सृष्टिकर्ता के कथनों को सुनती है। इसने संपूर्ण ब्रह्माण्ड को आश्चर्यचकित करके मनुष्यों की आँखें खोल दी। यह अंतिम दिनों में महान श्वेत सिंहासन के समक्ष न्याय का काम है। राज्य का युग वह युग है जिसमें परमेश्वर न्याय का कार्य करते हैं, और वह युग है जहाँ परमेश्वर का धर्मी स्‍वभाव समस्त मानव जाति के लिए अभिव्यक्त होता है। इसलिए, राज्य के युग में, परमेश्वर मनुष्य का न्याय करते हुए, उसे शुद्ध और सिद्ध करते हुए अपना वचन व्यक्त करते हैं। वे मनुष्य पर सभी प्रकार की आपदाएँ भेजते हैं, अच्‍छों को पुरस्कृत करते हैं और बुरों को दंड देते हैं। वे परमेश्वर की धार्मिकता, प्रताप और क्रोध को मानव जाति को प्रकट करते हैं। वे सभी सत्यों जो सर्वशक्तिमान परमेश्वर मनुष्‍य को शुद्ध करने, बचाने और सिद्ध करने के लिये व्‍यक्‍त करते हैं शाश्‍वत जीवन के वे मार्ग हैं जिन्हें परमेश्वर अंतिम दिनों में मनुष्य को प्रदान करते हैं। ये सत्य जीवन की नदी का जल है जो सिंहासन से बहता है। इसलिए, हमारे परमेश्वर पर विश्वास में अगर हम शाश्‍वत जीवन का मार्ग हासिल करना चाहते हैं, और स्वर्गारोहण प्राप्त करके स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करना चाहते हैं, तो हमें अंतिम दिनों में सर्वशक्तिमान परमेश्वर, मसीह के न्याय के कार्य को स्वीकार अवश्य करना चाहिए, और साथ ही उनके वचनों के न्‍याय और ताड़ना को भी स्वीकार अवश्य करना चाहिए। केवल इसी तरह से हम पवित्र आत्मा के कार्य को हासिल कर सकते हैं, सत्‍य को समझ और हासिल कर सकते हैं, शुद्धि प्राप्त कर सकते हैं, और बचाए जा सकते हैं। केवल जो लोग अंतिम दिनों में सर्वशक्तिमान परमेश्वर के न्‍याय और ताड़ना से गुज़रते हैं, वे ही परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करने के हकदार हैं। यह एक परम तथ्य है! यदि हम अपने धार्मिक मतों का अनुसरण करते रहें, तो अंत में हमें ही नुकसान सहना होगा। बुद्धिमान कुँवारियाँ केवल सत्य की खोज और परमेश्‍वर के वचनों को सुनने पर ध्यान केंद्रित करती हैं, लेकिन मूर्ख कुँवारियाँ केवल बाइबल के अक्षरों और अपनी अवधारणाओं और कल्पनाओं का पालन करती हैं, और सत्य की तलाश नहीं करती हैं या परमेश्‍वर की वाणी को नहीं सुनती हैं। फिर एक दिन, वे अचानक विपत्ति में पड़ जाएँगी और विलाप करेंगी और दाँत पीसेंगी। और तब पश्चाताप भी बेकार होगा। इसलिए, वे सभी जो सर्वशक्तिमान परमेश्वर को स्वीकार नहीं करते हैं, वे विपत्ति में पड़ेंगे और दंडित किए जाएँगे। यही है वह जिसका परमेश्वर ने आदेश दिया है और कोई भी इसे बदल नहीं सकता है। विशेष रूप से वे जो अंतिम दिनों में सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कार्य की बेतहाशा निंदा करते हैं पहले से ही परमेश्वर के द्वारा प्रकट कर दिये गए हैं कि वे अंतिम दिनों के ईसा-विरोधी हैं - वे लोग शाश्‍वत दंड भुगतेंगे और उन्‍हें परमेश्‍वर से मिलने का अब और अवसर नहीं मिलेगा। यह स्पष्ट है कि अंतिम दिनों में सर्वशक्तिमान परमेश्वर का कार्य, लोगों के परिणामों का निर्धारण करने और युग का समापन करने के लिए, मनुष्य को प्रकारों के अनुसार वर्गीकृत करना है। आज हम अंतिम दिनों में सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कार्य को स्वीकार करने में सक्षम हैं, इसमें हमने वास्तव में उनका अनुग्रह और उनकी दया प्राप्त की है। यह परमेश्‍वर के द्वारा परम उत्थान है! हम सभी को सर्वशक्तिमान परमेश्वर को धन्‍यवाद देना चाहिए!

"स्क्रीनप्ले प्रश्नों के उत्तर" से

फुट नोटः

क. मृतक लकड़ी का एक टुकड़ाः एक चीनी मुहावरा है, जिसका अर्थ "मदद से परे" है।

पिछला:प्रश्न 20: बाइबल में यह लिखा गया है: "यीशु मसीह कल और आज और युगानुयुग एक–सा है" (इब्रा 13:8)। तो परमेश्वर का नाम कभी नहीं बदलता है! लेकिन तुम कहते हो कि जब परमेश्वर अंतिम दिनों में फिर से आएगा तो वह एक नया नाम लेगा और उसे सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहा जाएगा। तुम इसे कैसे समझा सकते हो?

अगला:प्रश्न 23: तुम यह प्रमाण देते हो कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर देहधारी परमेश्वर है, जो अभी अंतिम दिनों में अपने न्याय के कार्य को कर रहा है। लेकिन धार्मिक पादरियों और प्राचीन लोगों का कहना है कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर का कार्य वास्तव में मनुष्य का काम है, और बहुत से लोग जो प्रभु यीशु पर विश्वास नहीं करते, वे कहते हैं कि ईसाई धर्म एक मनुष्य में विश्वास है। हम अभी भी यह नहीं समझ पाए हैं कि परमेश्वर के कार्य और मनुष्य के काम के बीच में क्या अंतर है, इसलिए कृपया हमारे लिए यह सहभागिता करो।

शायद आपको पसंद आये

परमेश्वर की इच्छा का पालन करने वाला कोई व्यक्ति वास्तव में कैसा होता है? और परमेश्वर पर विश्वास की सच्ची गवाही क्या है? प्रश्न 35: धार्मिक दुनिया के अधिकांश लोग मानते हैं कि पादरियों और प्राचीन लोगों को परमेश्वर के द्वारा चुना और प्रतिष्ठित किया गया है, और यह कि वे सभी धार्मिक कलीसियाओं में परमेश्वर की सेवा करते हैं; अगर हम पादरियों और प्राचीन लोगों का अनुसरण और आज्ञा-पालन करते हैं, तो हम वास्तव में परमेश्वर का ही अनुसरण और आज्ञा-पालन करते हैं। यथार्थतः मनुष्य का अनुसरण और आज्ञा-पालन करने का क्या मतलब है, और वास्तव में परमेश्वर का अनुसरण और आज्ञा-पालन करने का क्या अर्थ है, ज्यादातर लोग सच्चाई के इस पहलू को नहीं समझते हैं, तो कृपया हमारे लिए यह सहभागिता करो। आज तक परमेश्वर ने कैसे मानव जाति का नेतृत्व और भरण-पोषण किया है? परमेश्वर द्वारा विभिन्न युगों के दौरान उपयोग में लाये गए लोगों के शब्दों, जो सत्य से मेल खाते हैं, और परमेश्वर के वचनों में क्या अंतर है?
वचन देह में प्रकट होता है अंतिम दिनों के मसीह के कथन - संकलन मेमने ने पुस्तक को खोला न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है मसीह की बातचीतों के अभिलेख राज्य के सुसमाचार पर सर्वशक्तिमान परमेश्वर के उत्कृष्ट वचन -संकलन परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं (नये विश्वासियों के लिए अनिवार्य चीजें) मेमने का अनुसरण करना और नए गीत गाना अंतिम दिनों के मसीह के लिए गवाहियाँ सच्चे मार्ग की खोजबीन पर एक सौ प्रश्न और उत्तर विजेताओं की गवाहियाँ मसीह के न्याय के अनुभव की गवाहियाँ जीवन में प्रवेश पर उपदेश और वार्तालाप राज्य के सुसमाचार पर उत्कृष्ट प्रश्न और उत्तर (संकलन) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया