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प्रश्न 22: प्रभु यीशु को क्रूस पर मनुष्यों के लिए पाप-बलि के रूप में कीलों से जड़ दिया गया था, जिससे हमें पाप से बचा लिया गया। अगर हम प्रभु यीशु से भटकते हैं और सर्वशक्तिमान परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, तो क्या यह प्रभु यीशु के प्रति विश्वासघात नहीं होगा? क्या यह धर्मत्याग नहीं होगा?

उत्तर:

अंत के दिनों में अब, जब परमेश्वर ने नया कार्य किया और एक नया नाम ग्रहण किया है, तो यीशु के नाम को छोड़ कर और सर्वशक्तिमान परमेश्वर के नाम को अपना कर हम परमेश्वर से धोखा कर रहे हैं या परमेश्वर के कार्य के साथ तालमेल बना रहे हैं? जब परमेश्वर नए कार्य की शुरुआत करते हैं, तो मनुष्य को केवल परमेश्वर के कार्य के साथ तालमेल रखकर बचाया जा सकता है। यह सच है। हम सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन से देख सकते हैं, कि परमेश्वर का "सर्वशक्तिमान परमेश्वर" नाम को अपनाना, अंत के दिनों में किए गए उनके कार्यों और व्यक्त किए गए स्वभाव से संबंधित था। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "इस समय जब परमेश्वर देहधारी हुआ है, तो उसका कार्य, प्राथमिक रूप में ताड़ना और न्याय के द्वारा, अपने स्वभाव को व्यक्त करना है। इसे नींव के रूप में उपयोग करके वह मनुष्य तक अधिक सत्य को पहुँचाता है, अभ्यास करने के और अधिक मार्ग दिखाता है, और इस प्रकार मनुष्य को जीतने और मनुष्य को उसके भ्रष्ट स्वभाव से बचाने के अपने उद्देश्य को प्राप्त करता है। राज्य के युग में परमेश्वर के कार्य के पीछे यही निहित है" ("वचन देह में प्रकट होता है" के लिए प्रस्तावना)। अंत के दिनों में परमेश्वर का कार्य भ्रष्ट मानव जाति का न्याय करना और उसे ताड़ना देना, लोगों को उनके प्रकार के अनुसार छांटना और युग को समाप्त करना है। प्रभु यीशु के छुटकारे के कारण, हमारे पाप क्षमा हुए थे। लेकिन हमने ख़ुद को निर्विवाद रूप से पाप से पूरी तरह से अलग नहीं किया है। हमारे स्वभाव अभी भी घमंडी, स्वार्थी, लालची, कपटी और बुरे हैं। हम दिन में पाप करने और रात में पश्चाताप करने के दुष्चक्र में फंस गये हैं, और उद्धार के लिए अनुग्रह पर भरोसा करते हैं। इसलिए, हमें पूरी तरह से बचाने के लिए, परमेश्वर अंत के दिनों में अपने धार्मिक, प्रतापी और अपमान न किए जा सकने वाले स्वभाव के साथ बोलते हैं, वे अपने न्याय, ताड़ना, विजय और शुद्धिकरण के नए कार्य को करते हुए, हमारे लिए पूरी तरह से एक नया युग—राज्‍य का युग—लाते हैं। अंत के दिनों में परमेश्वर के किए गए कार्य के चरण चमत्कार नहीं दिखाते। सब कुछ वचनों के साथ पूरा किया जाता है। मनुष्य के पाप, विद्रोह और अधर्म का न्याय और उसकी ताड़ना परमेश्वर के वचन से की जाती है, इस प्रकार मनुष्य पूरी तरह शुद्ध और पूर्ण हो जाता है, जिससे हम देख सकते हैं कि परमेश्वर कितने सर्वशक्तिसम्‍पन्‍न और बुद्धिमान हैं। परमेश्वर वाकर्इ सर्वशक्तिमान परमेश्वर हैं। ये परमेश्वर ही थे जिन्‍होंने सभी चीजों को बनाया है और जो सभी पर प्रभुत्‍व रखते हैं! इसलिये लोग परमेश्वर के सामने साष्‍टांग दंडवत करते हैं और परमेश्वर की आराधना करते हैं। साथ ही, "सर्वशक्तिमान परमेश्वर" नाम का प्रयोग शैतान के साथ छः हज़ार साल के युद्ध के प्रयास को पूरा करने के लिए किया जाता है।

अंत के दिनों में परमेश्वर का न्याय और ताड़ना का कार्य भी लोगों को उनके प्रकार के अनुसार छांटने का कार्य है। यह 1 पतरस 4:17 की भविष्यवाणी को पूरा करता है, "क्योंकि वह समय आ पहुँचा है कि पहले परमेश्‍वर के लोगों का न्याय किया जाए।" यह भेड़ों और बकरियों, गेहूं और जंगली घास, दुष्ट सेवक और अच्छे सेवक में भेद करने की भविष्यवाणी को भी पूरा करता है। ये वे कार्य हैं जो परमेश्वर अंत के दिनों में करते हैं। हम परमेश्वर के वचन के कई अंश पढ़ने के बाद इसे समझेंगे।

"अंत के दिनों का कार्य, सभी को उनके स्वभाव के आधार पर पृथक करना, परमेश्वर की प्रबंधन योजना का समापन करना है, क्योंकि समय निकट है और परमेश्वर का दिन आ गया है। परमेश्वर उन सभी को, जिन्होंने उसके राज्य में प्रवेश कर लिया है अर्थात्, वे सभी लोग जो अंत तक उसके वफादार रहे हैं, स्वयं परमेश्वर के युग में ले जाता है। हालाँकि, जब तक स्वयं परमेश्वर का युग नहीं आ जाता है तब तक परमेश्वर जो कार्य करेगा वह मनुष्य के कर्मों को देखना या मनुष्य जीवन के बारे में पूछताछ करना नहीं, बल्कि उनके विद्रोह का न्याय करना है, क्योंकि परमेश्वर उन सभी को शुद्ध करेगा जो उसके सिंहासन के सामने आते हैं। वे सभी जिन्होंने आज के दिन तक परमेश्वर के पदचिन्हों का अनुसरण किया है वे लोग हैं जो परमेश्वर के सिंहासन के सामने आ गए हैं, इसलिए, ऐसा हर एक व्यक्ति जो परमेश्वर के कार्य को इसके अंतिम चरण में स्वीकार करता है, वह परमेश्वर द्वारा शुद्ध किए जाने लायक है। दूसरे शब्दों में, हर कोई जो परमेश्वर के कार्य को इसके अंतिम चरण में स्वीकार करता है वही परमेश्वर के न्याय का पात्र है।

"पहले कहे गये वचनों में 'न्याय' परमेश्वर के घर से आरम्भ होगा, उस न्याय को संदर्भित करता है जो परमेश्वर आज उन लोगों पर करता है जो अंत के दिनों में उसके सिंहासन के सामने आते हैं" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "मसीह न्याय का कार्य सत्य के साथ करता है")।

"केवल ताड़ना और न्याय के माध्यम से ही सभी सृजनों का अंत प्रकट हो सकता है। मनुष्य केवल तभी अपने वास्तविक रंगों को दिखाता है जब उसे ताड़ना दी जाती है और उसका न्याय किया जाता है। दुष्ट को दुष्ट के साथ, भले को भले के साथ रखा जाएगा, और समस्त मानव जाति को उनके प्रकार के अनुसार वर्गीकृत किया जाएगा। ताड़ना और न्याय के माध्यम से, सभी सृजनों का अंत प्रकट किया जाएगा, ताकि दुष्ट को दंडित किया जा सके और अच्छे को पुरस्कृत किया जा सके, और सभी लोग परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन हो जाएँगे। यह समस्त कार्य धार्मिक ताड़ना और न्याय के माध्यम से अवश्य प्राप्त किया जाना चाहिए। क्योंकि मनुष्य की भ्रष्टता अपने चरम पर पहुँच गई है और उसकी अवज्ञा अत्यंत गंभीर हो गई है, इसलिए केवल परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव ही, जो मुख्यत: ताड़ना और न्याय से संयुक्त है और जो अंत के दिनों में प्रकट होता है, मनुष्य को रूपान्तरित और पूर्ण बना सकता है। केवल यह स्वभाव ही दुष्टता को उजागर कर सकता है और इस तरह सभी अधार्मिकों को गंभीर रूप से दण्डित कर सकता है। इसलिए, इस तरह का स्वभाव युग के महत्व से सम्पन्न होता है, और उसके स्वभाव का प्रकटन और प्रदर्शन प्रत्येक नए युग के कार्य के वास्ते अभिव्यक्त किया जाता है। ऐसा नहीं है कि परमेश्वर अपने स्वभाव को मनमाने ढंग से और महत्व के बिना प्रकट करता है। माना कि, जब अंत के दिनों के दौरान मनुष्य का परिणाम प्रकट करने में, मनुष्य को धार्मिक न्याय के अधीन नहीं करके, बल्कि इसके बजाय उसके प्रति सहिष्णुता, धैर्य और क्षमा दर्शाते हुए, और चाहे मनुष्य का पाप कितना ही गंभीर क्यों न हो उसे माफ़ करते हुए, रत्ती भर भी धार्मिक न्याय के बिना, परमेश्वर अभी भी मनुष्य पर अनन्त करुणा और प्रेम प्रदान करता और उसके प्रति प्रेममय रहना जारी रखता: तब परमेश्वर के समस्त प्रबंधन का कभी भी कब अंत किया जाता? इस तरह का कोई स्वभाव कब मानव जाति की उचित मंज़िल में अगुआई करने में सक्षम होगा? उदाहरण के लिए, ऐसे न्यायाधीश को लें जो हमेशा प्रेममय है, ऐसा न्यायाधीश जिसका उदार चेहरा और सौम्य हृदय हो। वह लोगों को उनके द्वारा किए गए अपराधों के बावजूद प्यार करता हो, और चाहे कोई भी हो वह उसके प्रति प्रेममय और सहिष्णु रहता हो। ऐसी स्थिति में, वह कब न्यायोचित निर्णय तक पहुँचने में समर्थ होगा? अंत के दिनों के दौरान, केवल धार्मिक न्याय ही मनुष्य का उसके प्रकार के अनुसार वर्गीकरण कर सकता है और मनुष्य को एक नए राज्य में ला सकता है। इस तरह, परमेश्वर के न्याय और ताड़ना के धार्मिक स्वभाव के माध्यम से समस्त युग का अंत किया जाता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)")। परमेश्वर के वचन साफ तौर पर हमें बताते हैं कि अंत के दिनों में परमेश्वर का प्राथमिक कार्य, सभी चीजों को उनके प्रकार के अनुसार छांटना है। ये वचन से मनुष्य का न्याय और उसकी ताड़ना कर, उसके पाप का न्‍याय और उसके विद्रोह और अधर्म के लिए उसकी ताड़ना कर, उसे पूरी तरह से बदलने और पूर्ण करने का भी कार्य है। जो लोग अंत के दिनों में परमेश्वर के कार्य को स्वीकार करते हैं और उसका पालन करते हैं, वे परमेश्वर के न्‍याय और शुद्धिकरण की विषयवस्‍तु हैं। केवल परमेश्वर का धार्मिक न्याय मनुष्य को बचा सकता है, उसे पूर्ण कर सकता है और उसे एक नए क्षेत्र में ला सकता है। प्रेमपूर्ण और दयालु उद्धारकर्ता यीशु ने केवल मनुष्यों के पाप को क्षमा करने का कार्य किया। उन्‍हें मनुष्यों को शुद्ध करने और बदलने का कार्य नहीं करना था, और लोगों को उनके प्रकार के हिसाब से छांटने का काम तो दूर की बात रही। इसलिए, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन से न्याय और ताड़ना के कार्य को स्वीकार करके, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के नाम को महान मान कर महिमामंडित करके ही मनुष्य को परमेश्वर का पूर्ण उद्धार प्राप्त हो सकता है। अगर हम प्रभु यीशु के नाम पर विश्वास कायम रखते हैं लेकिन सर्वशक्तिमान परमेश्वर के नाम को अस्वीकार करते हैं, तो हमें अंत के दिनों में सर्वशक्तिमान परमेश्वर से मानव जाति के लिए सत्य और उद्धार प्राप्त नहीं होगा।

— पटकथा प्रश्नों के उत्तर से उद्धृत

सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर यहोवा हैं, जिन्होंने लोगों के जीवन का मार्गदर्शन करने के लिए व्यवस्था जारी की, और वे प्रभु यीशु हैं, जिन्हें मानवजाति को छुटकारा दिलाने के लिए सूली पर चढ़ा दिया गया। सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर द्वारा किया गया न्याय का कार्य, प्रभु यीशु द्वारा किया गया छुटकारे का कार्य, और यहोवा परमेश्‍वर द्वारा किया गया व्यवस्था का कार्य—ये सारे कार्य एक ही परमेश्‍वर द्वारा किये गये थे। परमेश्‍वर, अपनी खुद की योजना और मानवजाति की ज़रूरत के अनुसार, एक बार में एक चरण पूरा करके मानवजाति को बचा रहे हैं।

अब सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के नाम को स्वीकार करना प्रभु यीशु के प्रति अकृतज्ञ होना या उनको धोखा देना नहीं है, बल्कि यह मेमने के कदमों की निशानियों पर चलना है, परमेश्‍वर के मार्ग का मान रखना है, और निष्ठा के साथ उनका अनुसरण करना है। परमेश्‍वर इसको मंजूर करते हैं, बिल्कुल जैसा कि प्रकाशितवाक्य 14:4 में लिखा है: "ये वे ही हैं कि जहाँ कहीं मेम्ना जाता है, वे उसके पीछे हो लेते हैं; ये तो परमेश्‍वर के निमित्त पहले फल होने के लिये मनुष्यों में से मोल लिए गए हैं।" वे सभी जो यीशु के नाम को थामे हुए हैं, और सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर को स्वीकार करने से इनकार करते हैं दरअसल परमेश्‍वर के साथ गद्दारी कर रहे होंगे, और उनके द्वारा नष्ट कर दिये जाएंगे। बिल्कुल वैसे ही जब परमेश्‍वर, यीशु नाम अपनाकर कार्य करने आये, तब वे सभी अनुयायी, जिन्होंने परमेश्‍वर के नये कार्य को स्वीकार किया और प्रभु यीशु का अनुसरण किया, वे सच्चे मार्ग से नहीं भटक रहे थे या यहोवा परमेश्‍वर को धोखा नहीं दे रहे थे। इसके बजाय, वे परमेश्‍वर के पदचिह्नों पर चल रहे थे, और सिर्फ वे ही परमेश्‍वर के प्रति निष्ठावान थे। फरीसी जो यह मान कर चल रहे थे कि वे यहोवा परमेश्‍वर के प्रति निष्ठावान हैं, वे उनके नाम को पकड़े रहे, और प्रभु यीशु को नकारते रहे। नतीजा ये हुआ कि न केवल वे यहोवा परमेश्‍वर की प्रशंसा प्राप्त करने में असफल रहे, बल्कि वे परमेश्‍वर के श्राप और दंड का निशाना बन गये। इसलिए हमें फरीसियों की नाकामी से सबक लेनी चाहिए, सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के नाम को स्वीकार करना चाहिए और परमेश्‍वर के पदचिह्नों पर चलना चाहिए। परमेश्‍वर से उद्धार प्राप्त करने का सिर्फ यही एक रास्ता है।

— पटकथा प्रश्नों के उत्तर से उद्धृत

पिछला:प्रश्न 21: बाइबल में यह लिखा गया है: "यीशु मसीह कल और आज और युगानुयुग एक–सा है" (इब्रानियों 13:8)। तो परमेश्वर का नाम कभी नहीं बदलता है! लेकिन तुम कहते हो कि जब परमेश्वर अंतिम दिनों में फिर से आएगा तो वह एक नया नाम लेगा और उसे सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहा जाएगा। तुम इसे कैसे समझा सकते हो?

अगला:प्रश्न 23: प्रभु यीशु ने कहा: "परन्तु जो कोई उस जल में से पीएगा जो मैं उसे दूँगा, वह फिर अनन्तकाल तक प्यासा न होगा; वरन् जो जल मैं उसे दूँगा, वह उसमें एक सोता बन जाएगा जो अनन्त जीवन के लिये उमड़ता रहेगा" (यूहन्ना 4:14)। अधिकांश लोग सोचते हैं कि प्रभु यीशु ने हमें पहले से ही अनन्त जीवन का मार्ग प्रदान किया है, लेकिन मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के इन वचनों को पढ़ा है: "केवल अंतिम दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनन्त जीवन का मार्ग दे सकता है।" यह सब क्या है? यह क्यों कहता है कि आखिरी दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनन्त जीवन का मार्ग दे सकता है?

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