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प्रश्न 36: धार्मिक पादरियों और प्राचीन लोगों की धार्मिक संसार में सत्ता बनी हुई है और ज्यादातर लोग उनका पालन और अनुसरण करते हैं—यह एक सच्चाई है। तुम कहते हो कि धार्मिक पादरी और प्राचीन लोग इस बात को स्वीकार नहीं करते हैं कि परमेश्वर ने देह-धारण किया है, कि वे देह-धारी परमेश्वर द्वारा प्रकट सत्य पर विश्वास नहीं करते और वे फरीसियों के मार्ग पर चल रहे हैं, और हम इस बात से सहमत हैं। लेकिन तुम यह क्यों कहते हो कि सारे धार्मिक पादरी और प्राचीन लोग पाखंडी फरीसी हैं, कि वे सभी मसीह-शत्रु हैं जो अंतिम दिनों में देह-धारी परमेश्वर के कार्य से उघाड़ दिए गए हैं, और वे अंत में विनाश में डूब जाएँगे? हम इस समय इस बात को स्वीकार नहीं कर सकते। तुम अपना यह दावा कि इन लोगों को नहीं बचाया जा सकता है और उन सभी को विनाश में डूबना चाहिए, किस बात पर आधारित करते हो, इस पर कृपया सहभागिता करो।

उत्तर:

धार्मिक मंडलों के लोग परमेश्वर की अवहेलना कैसे करते हैं इसका सार केवल देहधारी मसीह के आगमन के बाद ही प्रकट और विश्लेषित किया जा सकता है। कोई भी भ्रष्ट मनुष्य धार्मिक मंडलों द्वारा परमेश्वर की अवहेलना की सच्चाई और उसके सार को नहीं जान सकता है, क्योंकि भ्रष्ट मनुष्यों में कोई सच्चाई नहीं होती है। वे तो केवल झूठे चरवाहों और मसीह-विरोधी राक्षसों द्वारा बुराई करने में शामिल होने के लिए नियंत्रित, भ्रमित और चालाकी से काम में लाये जा सकते हैं, और परमेश्वर की अवहेलना करने में शैतान के दास और साथी बन सकते हैं। यह स्वाभाविक है। …आओ, हम देखें कि धार्मिक मंडलों की मसीह-विरोधी ताकतों ने हमेशा परमेश्वर की अवहेलना किस तरह की थी, इसके सत्य और सार को प्रभु यीशु ने अनुग्रह के युग के दौरान कैसे प्रकट किया था:

"अरे कपटी धर्मशास्त्रियों! और फरीसियों! तुम्हें धिक्कार है। तुम लोगों के लिए स्वर्ग के राज्य का द्वार बंद करते हो। न तो तुम स्वयं उसमें प्रवेश करते हो और न ही उनको जाने देते हो जो प्रवेश के लिए प्रयत्न कर रहे हैं। हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम विधवाओं के घरों को खा जाते हो, और दिखाने के लिए बड़ी देर तक प्रार्थना करते रहते हो : इसलिये तुम्हें अधिक दण्ड मिलेगा।

अरे कपटी धर्मशास्त्रियों और फरीसियों! तुम्हें धिक्कार है। तुम किसी को अपने पंथ में लाने के लिए धरती और समुद्र पार कर जाते हो। और जब वह तुम्हारे पंथ में आ जाता है तो तुम उसे अपने से भी दुगुना नरक का पात्र बना देते हो!

अरे अंधे रहनुमाओं! तुम्हें धिक्कार है जो कहते हो यदि कोई मन्दिर की सौगंध खाता है तो उसे उस शपथ को रखना आवश्यक नहीं है किन्तु यदि कोई मन्दिर के सोने की शपथ खाता है तो उसे उस शपथ का पालन आवश्यक है। अरे अंधे मूर्खो! बड़ा कौन है? मन्दिर का सोना या वह मन्दिर जिसने उस सोने को पवित्र बनाया। तुम यह भी कहते हो 'यदि कोई वेदी की सौगंध खाता है तो कुछ नहीं,' किन्तु यदि कोई वेदी पर रखे चढ़ावे की सौगंध खाता है तो वह अपनी सौगंध से बँधा है। अरे अंधो! कौन बड़ा है? वेदी पर रखा चढ़ावा या वह वेदी जिससे वह चढ़ावा पवित्र बनता है? इसलिये यदि कोई वेदी की शपथ लेता है तो वह वेदी के साथ वेदी पर जो रखा है, उस सब की भी शपथ लेता है। वह जो मन्दिर है, उसकी भी शपथ लेता है। वह मन्दिर के साथ जो मन्दिर के भीतर है, उसकी भी शपथ लेता है। और वह जो स्वर्ग की शपथ लेता है, वह परमेश्वर के सिंहासन के साथ जो उस सिंहासन पर विराजमान हैं उसकी भी शपथ लेता है।

अरे कपटी यहूदी धर्मशास्त्रियों और फरीसियों! तुम्हारा जो कुछ है, तुम उसका दसवाँ भाग, यहाँ तक कि अपने पुदीने, सौंफ और जीरे तक के दसवें भाग को परमेश्वर को देते हो। फिर भी तुम व्यवस्था की महत्वपूर्ण बातों यानी न्याय, दया और विश्वास का तिरस्कार करते हो। तुम्हें उन बातों की उपेक्षा किये बिना इनका पालन करना चाहिये था। ओ अंधे रहनुमाओं! तुम अपने पानी से मच्छर तो छानते हो पर ऊँट को निगल जाते हो।

अरे कपटी यहूदी धर्मशास्त्रियों! और फरीसियों! तुम्हें धिक्कार है। तुम अपनी कटोरियाँ और थालियाँ बाहर से तो धोकर साफ करते हो पर उनके भीतर जो तुमने छल कपट या अपने लिये रियासत में पाया है, भरा है। अरे अंधे फरीसियों! पहले अपने प्याले को भीतर से माँजो ताकि भीतर के साथ वह बाहर से भी स्वच्छ हो जाये।

अरे कपटी यहूदी धर्मशास्त्रियों! और फरीसियों! तुम्हें धिक्कार है। तुम लिपी-पुती समाधि के समान हो जो बाहर से तो सुंदर दिखती हैं किन्तु भीतर से मरे हुओं की हड्डियों और हर तरह की अपवित्रता से भरी होती हैं। ऐसे ही तुम बाहर से तो धर्मात्मा दिखाई देते हो किन्तु भीतर से छलकपट और बुराई से भरे हुए हो।

अरे कपटी यहूदी धर्मशास्त्रियों! और फरीसियों! तुम नबियों के लिये स्मारक बनाते हो और धर्मात्माओं की कब्रों को सजाते हो। और कहते हो कि 'यदि तुम अपने पूर्वजों के समय में होते तो नबियों को मारने में उनका हाथ नहीं बटाते।' मतलब यह कि तुम मानते हो कि तुम उनकी संतान हो जो नबियों के हत्यारे थे। सो जो तुम्हारे पुरखों ने शुरु किया, उसे पूरा करो। अरे साँपों और नागों की संतानों! तुम कैसे सोचते हो कि तुम नरक भोगने से बच जाओगे। इसलिये मैं तुम्हें बताता हूँ कि मैं तुम्हारे पास नबियों, बुद्धिमानों और गुरुओं को भेज रहा हूँ। तुम उनमें से बहुतों को मार डालोगे और बहुतों को क्रूस पर चढ़ाओगे। कुछ एक को तुम अपनी आराधनालयों में कोड़े लगवाओगे और एक नगर से दूसरे नगर उनका पीछा करते फिरोगे। परिणामस्वरूप निर्दोष हाबील से लेकर बिरिक्याह के बेटे जकरयाह तक जिसे तुमने मन्दिर के गर्भ गृह और वेदी के बीच मार डाला था, हर निरपराध व्यक्ति की हत्या का दण्ड तुम पर होगा। मैं तुम्हें सत्य कहता हूँ इस सब कुछ के लिये इस पीढ़ी के लोगों को दंड भोगना होगा" (मत्ती 23:13-36)।

ये अनुग्रह के युग के दौरान कहे गए प्रभु यीशु के सबसे प्रसिद्ध वचन हैं जो यहूदी धार्मिक मंडलों के मुख्य याजकों, धर्मशास्त्रियों और फरीसियों को उघाड़ते और उनसे न्याय करते हैं।

इस तथ्य से कि परमेश्वर यीशु ने वो "सात भर्त्सनाएं" घोषित कीं जो व्यवस्था के युग के दौरान धार्मिक मंडलों के मुख्य याजकों, धर्मशास्त्रियों और फरीसियों को उघाड़ती और विश्लेषित करती हैं, हम देख सकते हैं कि अधिकांश धार्मिक नेता पाखण्डी फरीसी हैं और वे लंबे समय से, परमेश्वर-विरोधी शैतानी बुरी ताकतें बनकर रहे हैं। यह पहले से ही एक निर्विवाद तथ्य है।

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प्रभु यीशु द्वारा फरीसियों के प्रति प्रकट की गईं "सात भर्त्सनाओं" ने पहले ही इसे प्रकट कर दिया था कि धार्मिक मंडलों का अज्ञान और उनकी भ्रष्टता धर्मनिरपेक्ष दुनिया से किसी भी तरह भिन्न नहीं हैं। इसलिए लोग पूरी तरह से देख सकते हैं कि धार्मिक मंडलों के मुख्य याजकों, धर्मशास्त्रियों और फरीसियों के कर्म परमेश्वर की सेवा बिल्कुल ही नहीं कर रहे थे, बल्कि परमेश्वर की अवहेलना और उसका विरोध कर रहे थे। वे परमेश्वर की सेवा करने के पदों में याजकों और नेताओं के रूप में खड़े थे, फिर भी वे सच्चाई और धार्मिकता का पालन नहीं करते थे। बल्कि, उन्होंने हर तरह के भयानक कृत्य किए, और मसीह को भी प्रतिद्वंद्वी के रूप में माना, उसकी निंदा की और उसे सताया, तथा उसे क्रूस पर चढ़ा दिया। इन महान पापों को करने के बाद, वे परमेश्वर के क्रोध को कैसे नहीं पाते? यही कारण है कि परमेश्वर ने उनसे नफरत की और वह उनके प्रति क्रोधित हुआ, और इसीलिए उसने उन्हें बेनक़ाब कर दिया, उनका न्याय किया और उनकी निंदा की। यह पूरी तरह से प्राकृतिक है। इससे पता चलता है कि परमेश्वर किसी को भी अपने धर्मी स्वभाव का अपमान करने की अनुमति नहीं देता है। अनुग्रह के युग के दौरान, परमेश्वर ने पहले ही सत्य और स्वयं के खिलाफ धार्मिक मंडलों के मुख्य याजकों, धर्मशास्त्रियों और फरीसियों के द्वारा निष्पादित विभिन्न बुरे कर्मों से घृणा और नफरत की थी। उनके खिलाफ इस्तेमाल किए गए सख्त खुलासे और न्याय ने इसे स्पष्ट कर दिया था कि परमेश्वर धर्मी और पवित्र है। परमेश्वर ने कभी भी धार्मिक मंडलों के उन लोगों की सराहना नहीं की है, जो परमेश्वर की सेवा तो करते हैं पर फिर भी उसकी अवहेलना करते हैं। मानव जगत में व्यक्तिगत रूप से आकर अपनी भेड़ों को खोजने के लिए, और उन सभी को बचाने के लिए जो सत्य से प्रेम करते हैं तथा परमेश्वर की आवाज़ सुन सकते हैं, परमेश्वर ने देह धारण किया था। परमेश्वर उन सभी को चुनकर उठा लेता है जो दिलोजान से परमेश्वर को चाहते हैं, और सत्य को स्वीकार कर सकते हैं। प्रभु यीशु के प्रचार के समय, धार्मिक मंडलों के सारे मुख्य याजक, धर्मशास्त्री और फरीसी परमेश्वर की निंदा और उसके उन्मूलन के लक्ष्य बन गए थे। यह परमेश्वर की धार्मिकता और पवित्रता को दर्शाता है। केवल परमेश्वर प्रेमयोग्य, प्रिय, सम्माननीय, और विश्वसनीय है, और धार्मिक मंडलों के सारे नेता, धर्मशास्त्री और फरीसी ढोंगी थे और झूठ, धोखा, पाप, और बुराई से भरे हुए थे। वे सभी काले सापों की बिरादरी के लोग थे जो लोगों को भ्रमित और नियंत्रित करते थे और परमेश्वर की अवहेलना करते थे। वे ठीक उस प्रकार के लोग थे जिन्हें छोड़ दिया जाना चाहिए। अनुग्रह के युग के दौरान, जब प्रभु यीशु अपने छुटकारे के कार्य को कर रहा था, तब एक भी यहूदी मुख्य याजक, धर्मशास्त्री या फरीसी कभी प्रभु यीशु के सामने पश्चाताप करते हुए नहीं आया था। न ही प्रभु यीशु को कीलों से क्रूस पर जड़ दिए जाने के, और उसके छुटकारे के कार्य को पूरा कर लेने के, बाद कई फरीसियों ने ईमानदारी से अपने बुरे कर्मों पर चिंतन और पश्चाताप किया था। अगर कोई व्यक्ति ऐसे थे भी, तो वे केवल कुछ ही थे। ये तथ्य इस बात को साबित करने के लिए पर्याप्त हैं कि सारे मुख्य याजक, धर्मशास्त्री या फरीसी राक्षस थे, जो सच्चाई से नफरत करते थे और परमेश्वर की अवहेलना करते थे। चाहे उन्होंने कितनी भी बुराई की, यहां तक कि प्रभु यीशु को कीलों से क्रूस पर जड़ दिया, उन्होंने कभी भी अपने कर्मों पर खेद नहीं किया। यह समस्या वास्तव में चिंतनीय है। यहां यह देखना मुश्किल नहीं है कि धार्मिक मंडलों के ज्यादातर नेता झूठे चरवाहे हैं जो परमेश्वर की सेवा तो करते हैं, पर फिर भी परमेश्वर की अवहेलना करते हैं। वे वास्तव में मसीही-विरोधी दानव—अर्थात शैतान—के प्रतीक हैं। फिर भी बहुत से लोग जो परमेश्वर में विश्वास करते हैं, उनका आदर करते हैं और उनका अनुसरण करते हैं। यह इसे दर्शाने के लिए पर्याप्त है कि मनुष्य पूरी तरह भ्रष्ट हैं, और वे पहले से ही झूठ और पाप से धोखा खा चुके हैं। शैतान ने उनकी आँखें अंधी कर दी हैं। यद्यपि वे राक्षसों द्वारा बर्बाद हो चुके हैं, फिर भी वे अभी भी बदलने से हठपूर्वक इन्कार करते हैं, जैसे कि मानो वे पहले से ही मर चुके हों। इस प्रकार, हम देख सकते हैं कि इन गहराई से भ्रष्ट मनुष्यों को बचाने से सम्बंधित परमेश्वर का कार्य कितना मुश्किल है! यह एक महत्वपूर्ण सवाल है जिस पर सभी भ्रष्ट मनुष्यों को चिंतन करना चाहिए और जिसे पहचानना चाहिए।

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यहूदी मुख्य याजक, धर्मशास्त्री और फरीसी द्वारा परमेश्वर की अवहेलना और निंदा के कई उदाहरणों का बाइबल में आलेख है। यहां लोग देख सकते हैं कि इन यहूदी मुख्य याजकों, धर्मशास्त्रियों और फरीसियों ने केवल धार्मिक संस्कार करने, और लोगों को नियमों का अनुसरण करना और कानूनों का पालन करना सिखाने, पर ही अपना ध्यान केंद्रित किया था। यह इसे दर्शाने के लिए पर्याप्त है कि ये मुख्य याजक, धर्मशास्त्री और फरीसी किसी भी सच्चाई का अभ्यास नहीं करते थे और उनमें वास्तविकता बिल्कुल भी नहीं थी। उन्होंने बाइबल अच्छी तरह से पढ़ रखी थी और कानून का अध्ययन किया था, लेकिन वे परमेश्वर को बिल्कुल ही नहीं जानते थे। सबसे घृणित बात यह है कि वे भविष्यवक्ताओं और धर्मी लोगों को मार भी सकते थे। न केवल उन्होंने मसीह के सामने जो देह बना था और सत्य को व्यक्त करता था, समर्पण किया, बल्कि उन्होंने उसकी निंदा की, उसे पकड़ा, फंसाया और वे उसकी हत्या भी कर सके, और खुद को परमेश्वर का शत्रु बना लिया। तो उनके लिए परमेश्वर की नफरत गहरी जड़ें लिए हुए थी, और उसने उन्हें उघाड़ दिया, उनका विश्लेषण किया और उनकी निंदा की। इससे भी ज्यादा, यह इसे उजागर करता है कि परमेश्वर एक धर्मी और पवित्र परमेश्वर है। वह उन लोगों को पसंद करता है जो न्याय करते हैं, और उनसे नफरत करता है जो बुराई करते हैं। परमेश्वर ने कभी यहूदी धार्मिक मंडलों के मुख्य याजकों, धर्मशास्त्रियों और फरीसियों की सराहना नहीं की। परमेश्वर ने केवल उनको बेनक़ाब किया, उनसे न्याय किया और उन्हें शाप दिये। जो प्रभु यीशु में विश्वास करते हैं, उन सभी लोगों के लिए यह एक सर्व-मान्य सच्चाई है। यदि लोग वास्तव में बाइबल को समझते हैं, तो वे धार्मिक मंडलों के समकालीन पादरियों और प्राचीन लोगों के सचमुच ढोंगी और परमेश्वर-प्रतिकूल चेहरों की पहचान करने के लिए परमेश्वर यीशु के वचनों का उपयोग क्यों नहीं कर सकते? परमेश्वर की सेवा करने वाले फिर भी उसकी अवज्ञा करने वाले काले सापों की उस कृतघ्न जाति को पहचानने और त्यागने के लिए, लोग क्यों प्रभु यीशु के पक्ष में खड़े नहीं हो सकते हैं? यदि लोगों ने वास्तव में बाइबल को समझा होता, तो वे इस और अधिक भयावह तथ्य को देखने में सक्षम होते कि धार्मिक मंडलों के अधिकांश नेता और पादरी आज उन मुख्य याजकों, धर्मशास्त्रियों और फरीसियों की भूमिका निभा रहे हैं, जिन्होंने अनुग्रह के युग में हमारे प्रभु यीशु की अवज्ञा की थी। वे अभी भी सर्वशक्तिमान परमेश्वर की अवज्ञा कर रहे हैं, जिसने अंतिम दिनों में देह्धारण किया है, और उनके पाप उन मुख्य याजकों, धर्मशास्त्रियों और फरीसियों से भी बड़े हैं जो कि प्रभु यीशु की निन्दा करते थे। वे सच्चाई से चरम सीमा तक नफरत करते हैं, और वे गहराई से भयभीत हैं कि वे तब अकेले पड़ जाएँगे जब परमेश्वर के चुने हुए लोग सही मार्ग को और परमेश्वर के कार्य को स्वीकार कर लेंगे, और परमेश्वर द्वारा प्राप्त हो जाएँगे। यहाँ तक कि वे सत्य को तोड़ते-मरोड़ते हैं, झूठे आरोप लगाते और फंसाते हैं, बदनामी और निंदा करते हैं, और मसीह का तिरस्कार तथा पवित्र आत्मा के कार्य और परमेश्वर के वचनों की निंदा करने के लिए निर्लज्जतापूर्वक, जान-बूझकर बाइबल की गलत व्याख्या करते हैं। अपनी स्वयं की स्थिति और आजीविका को बचाने के लिए, वे परमेश्वर का न्याय, परमेश्वर की निंदा और परमेश्वर की अवज्ञा करने में हर तरह के छल-कपट का उपयोग करते हैं। उनकी हरकतें पूरी तरह से उसी तरह की हैं जैसी कि प्रभु यीशु की अवज्ञा करने में यहूदी मुख्य याजकों, धर्मशास्त्रियों और फरीसियों द्वारा इस्तेमाल की गई विभिन्न शैतानी चालें थीं। वे सभी परमेश्वर का प्रतिरोध करने के लिए मसीह-विरोधी के रास्ते पर चलते हैं। अधिकांश नेताओं और धार्मिक मंडलों के पादरियों द्वारा बाहर से विभिन्न रूपों में परमेश्वर की सेवा करने—फिर भी अन्दर से उसका विरोध करने—का अवलोकन कर हम यह देख सकते हैं कि मुख्यतः सात बुरे काम हैं जिन्होंने पहले से ही परमेश्वर को नाराज कर रखा है। वे लोग निश्चित रूप से दंडित किये जाएँगे। धार्मिक मंडलों के अधिकांश पादरियों और नेताओं द्वारा किये गए सात बुरे कृत्यों को यहां सूचीबद्ध किया गया है:

1. वे केवल धार्मिक अनुष्ठान करते हैं जो मानव जाति के उत्तराधिकार और सिद्धांतों को बनाए रखते और घोषित करते हैं, लेकिन वे परमेश्वर की आज्ञाओं का परित्याग करते हैं। वे लोगों को कभी भी परमेश्वर के समक्ष समर्पण करना, उसे जानना, या उसके वचनों को सुनना नहीं सिखाते हैं। वे सच्चाई की वास्तविकता की बात बिलकुल नहीं करते हैं, और कभी भी धार्मिक मंडलों में रहे अज्ञान के अंधेरे को प्रकट करने के लिए परमेश्वर के वचनों का इस्तेमाल नहीं करते हैं, ताकि लोगों को बुराई के युग के बारे में पता चल सके।

2. वे परमेश्वर का सम्मान बिलकुल नहीं करते हैं। उनके दिलों में परमेश्वर के लिए कोई स्थान नहीं है, फिर भी वे लालच से और चोरी-छिपे, परमेश्वर को दिए गए चढ़ावे में से खाते हैं। वे दरअसल परमेश्वर की सेवा नहीं कर सकते, लेकिन अपनी आजीविका के रूप में वे परमेश्वर को दिए गए चढ़ावे का उपयोग करते हैं, और वे अक्सर लोगों से दान देने के लिए आग्रह करते हैं और उन पर दबाव डालते हैं ताकि वे अधिक विलासी रूप से जीवित रह सकें, और यह उनको असली पिशाच और परजीवी बनाता है।

3. वे लोगों को अपने चर्च में लुभाने के लिए भूमि और समुद्र का दिशा-निरूपण करते हैं, और एक बार जब लोग आ जाते हैं, उन्हें गुलाम बनने के लिए भ्रमित और नियंत्रित किया जाता है। वे लोगों को स्वतंत्र चुनाव नहीं देते हैं, और लोगों को सच्चे मार्ग की जांच करने की अनुमति नहीं देते हैं, ताकि वे परमेश्वर के प्रकटन और कार्य की खोज कर सकें, और इस तरह वे लोगों को नरक के बच्चे बना देते हैं। यह तो एक अंधे द्वारा दूसरे अंधे को राह दिखाना है, और वे सब गड्ढे में गिर पड़ेंगे।

4. अपने उपदेश में वे अक्सर अपना आडम्बर करने और खुद की गवाही देने के लिए परमेश्वर की महिमा चुराते हैं ताकि लोग उनकी नकल, प्रशंसा और अनुकरण कर सकें, उनको अपना आदर्श मान सकें, जिससे वे उन लोगों को फंसा सकें और नियंत्रित कर सकें। लोग परमेश्वर को समर्पण कर सकें और उसकी उपासना कर सकें, इसकी खातिर वे कभी भी ईमानदारी से परमेश्वर के प्रति न तो गवाही देते हैं और न ही परमेश्वर को महिमा देते हैं।

5. वे सच्चाई से नफरत करते हैं, और विशेष रूप से उन लोगों से ईर्ष्या करते हैं जो सच्चाई का अनुसरण करते हैं और उसे समझते हैं: वे उनका दमन करते हैं, उन्हें अस्वीकार करते हैं और उन्हें दोषी मानते हैं। वे केवल लोगों को उनकी अपनी उपासना करने और उनका अनुसरण करने की अनुमति देते हैं, वे लोगों को मसीह को स्वीकार करने से रोकते हैं, और वे कलीसियाओं को परे रखते हैं क्योंकि वे डरते हैं कि लोग आखिरी दिनों में परमेश्वर के कार्य को न देख लें या उसके गवाह न बनें।

6. अपने स्वयं की स्थिति और आजीविका को बचाने की खातिर, वे अंतिम दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर, की बदनामी, बुराई और निन्दा करने के लिए सभी प्रकार की अफवाहों और भ्रांतियों को भी खोज निकालते हैं। वे हर चीज़ को अपने अज्ञान के अंधेरे से भर देते हैं, और यहाँ तक कि वे अंत तक, परमेश्वर के खिलाफ जीवन और मृत्यु के संघर्ष को पसंद करते हैं। यह स्पष्ट है कि वे परमेश्वर की नहीं बल्कि उनकी अपनी स्थिति और आजीविका की सेवा करते हैं।

7. वे परमेश्वर के देहधारण के तथ्य को स्वीकार नहीं करते हैं, न ही वे अंतिम दिनों में परमेश्वर के वचन और कार्य पर विश्वास करते हैं। यह इसे साबित करने के लिए पर्याप्त है कि उन सभी के पास सच्चाई से नफरत करने वाले मसीह-विरोधियों का स्वभाव और सार हैं। वे परमेश्वर की सेवा लेकिन परमेश्वर का विरोध करने वाले, मसीह-विरोधी की राह पर चलते हैं।

धार्मिक मंडलों में परमेश्वर की अवज्ञा करने वाली मसीह-विरोधी ताकतों द्वारा किये गए ये सात बुरे काम सभी विश्वासियों के द्वारा खुले आम मान्यता-प्राप्त तथ्य हैं। आज धार्मिक मंडलों में किए गए सात बुरे कामों के लगभग वही अभिलक्षण हैं जो उन "सात भर्त्सनाओं" के हैं, जिनके द्वारा हमारे प्रभु यीशु ने फरीसियों को बेनक़ाब किया था और उनसे न्याय किया था। यह इसे साबित करने के लिए पर्याप्त है कि एक लंबे समय से धार्मिक नेता हमेशा परमेश्वर की सेवा करते हुए नज़र आते हैं लेकिन वास्तव में वे परमेश्वर का विरोध करते रहे हैं और मसीह-विरोधियों के मार्ग पर चलते आए हैं। इन तथ्यों ने यह भी खुलासा किया है कि उनके पास सच्चाई से नफरत करने और परमेश्वर का विरोध करने का शैतानी स्वभाव और सार है। यही कारण है कि वे अंतिम दिनों के मसीह के लिए शत्रुतापूर्ण ताकत बन सकते हैं: वे धार्मिक मंडलों को अज्ञान के अंधेरों और बुरे कर्मों की ओर ले जाते हैं। यह पूरी तरह से बाइबल में प्रकाशित वाक्य की पुस्तिका की इस भविष्यवाणी को पूरा करता है कि धार्मिक मंडलियां "महान वेश्या" और "महान बाबिल" हैं। अब, कुछ लोगों ने जो परमेश्वर से प्यार करते हैं और परमेश्वर की उपस्थिति के लिए तरसते हैं, पहले से ही मसीह-विरोधी प्रकृति और आधुनिक फरीसियों के सार को जान लिया है, और उन्होंने परमेश्वर के कार्य के पद-चिन्हों की तलाश में धार्मिक मंडलों को छोड़ना शुरू कर दिया है। यद्यपि धार्मिक मंडलों के ये "फरीसी" स्पष्ट रूप से जानते हैं कि अंतिम दिनों के मसीह द्वारा व्यक्त किए गए सभी वचन भ्रष्ट मनुष्यों के प्रति सच्चाइयाँ, न्याय और ताड़ना हैं, फिर भी उन्होंने सच्चाई से अपनी नफरत की वजह से परमेश्वर के प्रति अवज्ञा, आकलन, निंदा और विरोध का एक दृष्टिकोण चुना है। मुख्यतः, उन्होंने पवित्र आत्मा और परमेश्वर के कार्य की निंदा करने का एक घृणित पाप भी किया है। इस पाप की तीन मुख्य अभिव्यक्तियों को निम्नानुसार सूचीबद्ध किया गया है:

1. वे परमेश्वर के देह को बदनाम करने के लिए झूठ का आविष्कार करते हैं। यह परमेश्वर के खिलाफ एक गंभीर निन्दा है।

2. वे परमेश्वर के वचनों को मानवीय शब्दों के रूप में मानते हैं, और वे कहते हैं कि परमेश्वर के वचनों में बुरी रूहें हैं जो लोगों को तब सम्मोहित कर देती हैं जब वे उन पर ध्यान देते हैं। यह परमेश्वर के खिलाफ एक गंभीर निन्दा है।

3. वे अंतिम दिनों में परमेश्वर के कार्य का बुरी रूहों का काम कहकर वर्णित करते हैं, जो यह कहने के बराबर है कि पवित्र आत्मा का कार्य बुरी रूहों का काम है। यह परमेश्वर की निंदा है।

सभी धार्मिक मंडलों के लोग उपर्युक्त तीनों तरीकों से परमेश्वर की गंभीर निंदा फैला रहे हैं। यदि वे वास्तव में परमेश्वर का सम्मान करने वाले लोग होते, तो उन्होंने ऐसा कहने की हिम्मत बिल्कुल नहीं की होती। हमारे प्रभु यीशु के प्रचार के दिनों की याद करें तो, उस समय ऐसे धार्मिक लोग थे जिन्होंने कहा कि प्रभु यीशु ने राक्षसों को दूर करने के लिए राक्षसों के राजा, बेलोज़बूब, का इस्तेमाल किया। यह वास्तव में पवित्र आत्मा के खिलाफ निंदा करने का पाप है। प्रभु यीशु ने कहा था, "इसलिए मैं तुमसे कहता हूँ कि सभी की हर निन्दा और पाप क्षमा कर दिये जायेंगे किन्तु आत्मा की निन्दा करने वाले को क्षमा नहीं किया जायेगा" (मत्ती 12:31)। आज के धार्मिक मंडलों में, अधिकांश नेता और पादरी बाहर जाते हैं और पवित्र आत्मा के खिलाफ निन्दा करने वाली अफवाहें और बदनामी फैलाते हैं। चाहे उनके इरादे और लक्ष्य जो भी हों, उन्होंने पहले ही पवित्र आत्मा की निंदा करने का पाप किया है। जो लोग वास्तव में परमेश्वर का समादर करते हैं, वे सच्चे रास्ते की विस्तृत जांच किए बिना लापरवाही से बोलने की हिम्मत नहीं करते, फिर भी वे स्वैच्छिक रूप से निर्णय लेते हैं कि 'पूर्वी बिजली' बुरी आत्माओं का काम है, और जब लोग इसका संदेश सुनते हैं तो वे धोखे में पड़ जाते हैं। यह वास्तव में हास्यास्पद है! ...धार्मिक मंडलों के अधिकांश पादरियों और नेताओं को पहले से ही मसीह-विरोधी के रास्ते पर चलने वालों के रूप में प्रकट किया जा चुका है। अपनी स्थिति और आजीविका को बनाये रखने के लिए वे अंत तक मसीह के विरूद्ध अंधाधुंध संघर्ष करते हैं। उनके दिल कठोर है, उन्हें कोई पछतावा नहीं है, और उन्हें लगता है कि जिस तरह से प्रभु यीशु ने अनुग्रह के युग के दौरान पौलुस के साथ व्यवहार किया था, परमेश्वर भी अंततः उनके साथ समझौता कर लेगा। उन्हें लगता है कि परमेश्वर खुद को प्रकट करेगा और स्वर्ग से उन्हें पुकारेगा। क्रूस पर परमेश्वर को कीलों से जड़ देना और फिर परमेश्वर की दया प्राप्त करने की चाह रखना, यह तो पहले से ही हद दर्जे की बेशर्मी है। धार्मिक वंशों की "वीरता" के विशिष्ट "वीर, अटूट" रवैये को प्रदर्शित करते हुए, वे मौत तक मूर्ख और हठी बने रहते हैं। यह बाइबल में इब्रानियों की पुस्तिका की इस भविष्यवाणी को पूरा करता है: "सत्य का ज्ञान पा लेने के बाद भी यदि हम जानबूझ कर पाप करते ही रहते हैं फिर तो पापों के लिए कोई बलिदान बचा ही नहीं रहता। बल्कि फिर तो न्याय की भयानक प्रतीक्षा और भीषण अग्नि ही शेष रह जाती है जो परमेश्वर के विरोधियों को चट कर जाएगी" (इब्रानियों 10: 26-27)।

… अब राज्य के सुसमाचार को फैलाने के लिए एक महत्वपूर्ण क्षण है। बहुत से लोग जब सच्चे मार्ग का सर्वेक्षण करते हैं, तो धार्मिक मंडलों के मसीह-विरोधी राक्षसों की झूठी बातों और अफवाहों से वे घबरा जाते हैं और भ्रमित हो जाते हैं। वे बड़े लाल अजगर के भुलावे और पाखंडों से भ्रमित हैं जिससे वे सही मार्ग को स्वीकार करने की हिम्मत नहीं जुटा पाते। बहुत से लोग, सच्चे मार्ग का सर्वेक्षण करते समय, धार्मिक मंडलों के नेताओं और पादरियों द्वारा बाधित और भ्रमित हुए हैं, इसलिए वे परमेश्वर के सामने नहीं आ सकते। तब उनके जीवन धार्मिक नेताओं, पादरियों और बड़े लाल अजगर द्वारा बर्बाद हो जाते हैं और वे घुट कर रह जाते हैं। पादरियों और धार्मिक मंडलों के नेताओं के लिए परमेश्वर के साथ उसकी चयनित प्रजा को लेकर लड़ना परमेश्वर के शत्रु होने की हद तक भ्रष्ट हो जाना है। वे परमेश्वर के चुने हुए लोगों को सच्चे मार्ग की तलाश करने या स्वतंत्र रूप से चुनाव करने का अधिकार नहीं देते। यह बुरी बात यह समझाने के लिए पर्याप्त है कि वे, बड़े लाल अजगर की तरह, ऐसे राक्षस हैं जो जीवनों को नष्ट कर देते हैं और मानवीय आत्माओं को हड़प करते हैं। परमेश्वर का अपमान करने के इस घिनौने पाप को वे पहले ही कर चुके हैं। क्या यह तथ्य कि वे लोगों को सच्चे मार्ग को स्वीकार करने और परमेश्वर तक लौट आने से इस तरह बेतहाशा रोक सकते हैं, उन्हें शैतान के सहअपराधियों और सहयोगियों के रूप में बेनकाब नहीं करता? मनुष्यों के प्रति जो खून का क़र्ज़ है, उन्हें उसका पूर्ण रूप से भुगतान करना ही होगा। परमेश्वर उन्हें अपने स्वयं के व्यक्तिगत कार्यों के आधार पर प्रतिफल देगा, और यही मूल कारण है कि परमेश्वर अंतिम दिनों के अपने देहधारण में धार्मिक मंडलों में खुद को प्रकट नहीं करता और न ही कार्य करता है। जिस तरह प्रभु यीशु ने धार्मिक मंडलों के मुख्य याजकों, धर्मशास्त्रियों और फरीसियों से घृणा की, उनको बेनक़ाब किया, उनका न्याय किया और उनकी निंदा की, अंतिम दिनों में सर्वशक्तिमान परमेश्वर उसी तरह वर्तमान धार्मिक मंडलों के पादरियों और पुराने लोगों से जो मसीह-विरोधी मार्ग पर चलते हैं, नफरत करता है, उन्हें उघाड़ता है, उनसे न्याय करता है और उनकी निंदा करता है। तुम देख सकते हो कि जब परमेश्वर फिर से कार्य करने के लिए देह में प्रकट हुआ है, हालांकि उसका नाम बदल गया है, उसका स्वभाव, और उसका सार नहीं बदला है। परमेश्वर हमेशा परमेश्वर है, इंसान हमेशा इंसान हैं, और शैतान हमेशा परमेश्वर का दुश्मन है। ये अपरिवर्तनीय सत्य हैं। लोगों को धार्मिक मंडलों के सार और सच्चाई को स्पष्ट रूप से देखना चाहिए जो कि परमेश्वर की सेवा करते हैं फिर भी उसका विरोध करते हैं, ताकि वे सच्चे मार्ग को स्वीकार कर सकें, अंतिम दिनों में परमेश्वर के कार्य का अनुपालन कर सकें, और परमेश्वर के उद्धार को प्राप्त कर सकें। यह अत्यावश्यक बात है और इसमें देर नहीं की जा सकती, क्योंकि परमेश्वर का दिन आ रहा है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है: "तुम लोगों को जो समझना चाहिए वह है किः परमेश्वर का कार्य ऐसे किसी का भी इंतज़ार नहीं करता है जो उसके साथ तालमेल बनाए नहीं रख सकता है, और परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव किसी भी मनुष्य के प्रति कोई दया नहीं दिखाता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "मसीह न्याय का कार्य सत्य के साथ करता है" से)।

हम बाइबल से एक सच्चाई को देख सकते हैं कि अनुग्रह के युग के दौरान, न केवल प्रभु यीशु ने धार्मिक मंडलों के मुख्य याजकों, धर्मशास्त्रियों और फरीसियों को नहीं बुलाया था, बल्कि इसके विपरीत, उसने उनको बेनक़ाब किया और उनका न्याय किया। विशेष रूप से, प्रभु यीशु को क्रूस पर चढ़ाने में शामिल हर व्यक्ति को गंभीर रूप से दंडित किया गया था, और उन सभी को भयानक प्रारब्ध का सामना करना पड़ा। यह सभी के द्वारा मान्यता प्राप्त तथ्य है। क्या किसी को ऐसा लगता है कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर जो साम्राज्य के युग में आता है, वह धार्मिक मंडलों की मसीह-विरोधी शक्तियों के साथ दया और क्षमा का व्यवहार कर सकता है? बिल्कुल नहीं, क्योंकि परमेश्वर धर्मी और पवित्र है, और परमेश्वर किसी को भी अपने स्वभाव का अपमान करने की अनुमति नहीं देता। सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने पहले ही उनके अंत का फैसला कर रखा है, और स्पष्ट रूप से इस पापी तथ्य को उजागर किया है कि धार्मिक मंडलों के अधिकांश पादरी और नेता आज परमेश्वर का विरोध करते हैं। आओ, देखें कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर क्या कहता है: "फरीसियों ने यीशु का विरोध क्यों किया, क्या तुम लोग उसका कारण जानना चाहते हो? क्या तुम फरीसियों के सार को जानना चाहते हो? वे मसीहा के बारे में कल्पनाओं से भरे हुए थे। इससे ज्यादा और क्या, उन्होंने केवल इस बात पर विश्वास किया कि मसीहा आएगा, मगर जीवन के इस सत्य की खोज नहीं की। और इसलिए, वे आज भी मसीहा की प्रतीक्षा करते हैं, क्यों उन्हें जीवन के मार्ग के बारे में कुछ भी ज्ञान नहीं है, और नहीं जानते कि सत्य का मार्ग क्या है? तुम लोग कैसे कहते हो कि ऐसे मूर्ख, हठधर्मी और अज्ञानी लोग परमेश्वर के आशीष प्राप्त करेंगे? वे मसीहा को कैसे देख सकते हैं? वे यीशु का विरोध करते थे क्योंकि वे पवित्र आत्मा के कार्य की दिशा को नहीं जानते थे, क्योंकि वे यीशु के द्धारा कहे गए सत्य के मार्ग को नहीं जानते थे, और, ऊपर से, क्योंकि उन्होंने मसीहा को नहीं समझा था। और क्योंकि उन्होंने मसीहा को कभी नहीं देखा था, और कभी भी मसीहा के साथ नहीं रहे थे, उन्होंने सिर्फ़ मसीहा के नाम को खोखली श्रद्धांजलि देने की गलती की जबकि किसी न किसी ढंग से मसीहा के सार का विरोध करते रहे। ये फरीसी सार रूप से हठधर्मी एवं अभिमानी थे और सत्य का पालन नहीं करते थे। परमेश्वर में उनके विश्वास का सिद्धांत है: इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि तुम्हारा उपदेश कितना गहरा है, इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि तुम्हारा अधिकार कितना ऊँचा है, तुम मसीह नहीं हो जब तक तुम्हें मसीहा नहीं कहा जाता। क्या ये दृष्टिकोण हास्यास्पद और मूर्खतापूर्ण नहीं हैं? मैं तुम लोगों से पुनः पूछता हूँ: मान लीजिए कि तुम लोगों में यीशु के बारे में थोड़ी सी भी समझ नहीं है, तो क्या तुम लोगों के लिए उन गलतियों को करना अत्यंत आसान नहीं है जो बिल्कुल आरंभ के फरीसियों ने की थी? क्या तुम सत्य के मार्ग को जानने के योग्य हो? क्या तुम सचमुच में यह विश्वास दिला सकते हो कि तुम ईसा का विरोध नहीं करोगे? क्या तुम पवित्र आत्मा के कार्य का अनुसरण करने के योग्य हो? यदि तुम नहीं जानते हो कि क्या तुम ईसा का विरोध करोगे, तो मेरा कहना है कि तुम पहले से ही मौत के कगार पर जी रहे हो। जो लोग मसीहा को नहीं जानते थे वे सभी यीशु का विरोध करने में, यीशु को अस्वीकार करने में, उन्हें बदनाम करने में सक्षम थे। जो लोग यीशु को नहीं समझते हैं वे सब उसे अस्वीकार करने एवं उन्हें बुरा भला कहने में सक्षम हैं। इसके अलावा, वे यीशु के लौटने को शैतान के द्वारा दिए जाने वाले धोखे के समान देखने में सक्षम हैं और अधिकांश लोग देह में लौटने की यीशु की निंदा करेंगे। क्या इस सबसे तुम लोगों को डर नहीं लगता है? जिसका तुम लोग सामना करते हो वह पवित्र आत्मा के विरोध में ईशनिंदा होगी, कलीसियाओं के लिए पवित्र आत्मा के वचनों का विनाश होगा और यीशु के द्वारा व्यक्त किए गए समस्त को ठुकराना होगा। यदि तुम लोग इतने संभ्रमित हो तो यीशु से क्या प्राप्त कर सकते हो? यदि तुम लोग हठधर्मिता से अपनी गलतियों को मानने से इनकार करते हो, तो श्वेत बादल पर यीशु के देह में लौटने पर तुम लोग यीशु के कार्य को कैसे समझ सकते हो? यह मैं तुम लोगों को बताता हूँ: जो लोग सत्य को स्वीकार नहीं करते हैं, मगर अंधों की तरह यीशु के श्वेत बादलों पर आगमन का इंतज़ार करते हैं, निश्चित रूप से पवित्र आत्मा के विरोध में ईशनिंदा करेंगे, और ये वे प्रजातियाँ हैं जो नष्ट कर दी जाएँगीं। तुम लोग सिर्फ़ यीशु के अनुग्रह की कामना करते हो, और सिर्फ़ स्वर्ग के सुखद राज्य का आनंद लेना चाहता हो, मगर जब यीशु देह में लौटा, तो तुमने यीशु के द्वारा कहे गए वचनों का कभी भी पालन नहीं किया, और यीशु के द्वारा व्यक्त किये गए सत्य को कभी भी ग्रहण नहीं किया है। यीशु के एक श्वेत बादल पर वापस आने के तथ्य के बदले में तुम लोग क्या थामें रखना चाहोगे? क्या वही ईमानदारी जिसमें तुम लोग बार-बार पाप करते रहते हो, और फिर बार-बार उनकी स्वीकारोक्ति करते हो? एक श्वेत बादल पर वापस आने वाले यीशु के लिए तुम बलिदान में क्या अर्पण करोगे? क्या कार्य के वे वर्ष जिनकी तुम लोग स्वयं सराहना करते हो? लौट कर आये यीशु को तुम लोगों पर विश्वास कराने के लिए तुम लोग किस चीज को थाम कर रखोगे? क्या वह आपका अभिमानी स्वभाव है,जो किसी भी सत्य का पालन नहीं करता है?" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "जब तुम यीशु के आध्यात्मिक शरीर को देख रहे होगे ऐसा तब होगा जब परमेश्वर स्वर्ग और पृथ्वी को नये सिरे से बना चुका होगा" से)।

"कितने सच्चाई की खोज करते हैं और धर्मिकता का पालन करते हैं? वे सभी सूअरों और कुत्तों की तरह जानवर हैं, गोबर के एक ढेर में अपने सिरों को हिलाते हैं और उपद्रव भड़काने[1] के लिए बदबूदार मक्खियों के गिरोह का नेतृत्व करते हैं। उनका मानना है कि नरक का उनका राजा राजाओं में सर्वश्रेष्ठ है, इस बात को समझे बिना कि वे सड़न पर भिनभिनाती मक्खियों से ज्यादा कुछ नहीं हैं। इतना ही नहीं, वे सूअरों और कुत्तों जैसे अपने माता-पिता पर निर्भर करते हुए परमेश्वर के अस्तित्व के विरुद्ध निंदनीय टिप्पणी करते हैं। अति तुच्छ मक्खियों को लगता है कि उनके माता-पिता एक दांतों वाली व्हेल[2] की तरह विशाल हैं। क्या उन्हें एहसास नहीं है कि वे बहुत नन्हीं हैं, फिर भी उनके माता-पिता उनकी तुलना में अरबों गुना बड़े गंदे सूअर और कुत्ते हैं? अपनी नीचता से अनजान होकर, वे उन सूअरों और कुत्तों की दुर्गन्ध के सहारे उच्छृंखल व्यवहार करती हैं और भविष्य की पीढ़ियों को पैदा करने का भ्रामक विचार रखती हैं। वह तो बिल्कुल बेशर्म है! अपनी पीठों पर हरी पंखों के साथ (यह परमेश्वर पर उनके विश्वास करने के दावे को संदर्भित करता है), वे घमंडी हो जाती हैं और हर जगह पर अपनी सुंदरता और आकर्षण का अभिमान करती हैं, मनुष्य पर अपनी अशुद्धताओं को चुपके से डालती हैं। और वे दम्भी भी हैं, मानो कि इंद्रधनुष के रंगों वाले पंखों का एक जोड़ा उनकी अपनी अशुद्धताओं को छिपा सकता है, और इस तरह वे सच्चे परमेश्वर के अस्तित्व को सताती हैं (यह धार्मिक दुनिया की अंदर की कहानी को संदर्भित करता है)। मनुष्य को बहुत कम पता है कि हालांकि मक्खी के पंख खूबसूरत और आकर्षक हैं, यह अंततः केवल एक छोटी मक्खी से बढ़कर कुछ नहीं है जो गंदगी से भरी हुई और रोगाणुओं से ढकी हुई है। अपने माता-पिता के सूअरों और कुत्तों की ताकत पर, वे देश भर में अत्यधिक उग्रता के साथ आतंक मचाती हैं (यह उन धार्मिक अधिकारियों को संदर्भित करता है, जो सच्चे परमेश्वर और सत्य को धोखा देते हुए, देश से मिले मजबूत समर्थन के आधार पर, परमेश्वर को सताते हैं)। ऐसा लगता है कि यहूदी फरीसियों के भूत परमेश्वर के साथ बड़े लाल अजगर के देश में, अपने पुराने घोंसले में, वापस आ गए हैं। उन्होंने अपने हजारों वर्षों के कार्य को जारी रखते हुए फिर से उनके उत्पीड़न का कार्य शुरू कर दिया है,। भ्रष्ट हो चुके इस समूह का अंततः पृथ्वी पर नष्ट हो जाना निश्चित है! ऐसा प्रतीत होता है कि कई सहस्राब्दियों के बाद, अशुद्ध आत्माएँ और भी चालाक और धूर्त हो गई हैं। वे परमेश्वर के काम को चुपके से क्षीण करने के तरीकों के बारे में लगातार सोचती हैं। वे बहुत कुटिल और धूर्त हैं और अपने देश में कई हजार साल पहले की त्रासदी की पुनरावृत्ति करना चाहती हैं। यह बात परमेश्वर को जोर से चीखने की ओर लगभग उकसाती है, और उनको नष्ट करने के लिए वह तीसरे स्वर्ग में लौट जाने से खुद को मुश्किल से रोक पाता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "कार्य और प्रवेश (7)" से)।

"क्यों धार्मिक दुनिया ने हमेशा परमेश्वर की सेवा करते समय उसका विरोध किया है" उपदेश संग्रह—जीवन के लिए आपूर्ति में

अनुग्रह के युग के बारे में सोचो, जब गहराई से भ्रष्ट हुई मानव जाति ने यीशु मसीह को कीलों से क्रूस पर जड़ दिया। उनकी कार्रवाई की वास्तविक प्रकृति क्या थी? जिसने स्वर्ग के राज्य के मार्ग को फैलाया ऐसे प्रभु यीशु को शैतान को सौंप देना, और ऊपर से यह भी कहना कि प्रभु यीशु को क्रूस पर जड़ देना आवश्यक था, और एक डाकू को स्वतंत्र करना और प्रभु यीशु को क्रूस पर चढ़ाना उनके लिए बेहतर होगा: क्या इतनी भ्रष्ट मानव जाति राक्षसी नहीं थी? केवल राक्षस ही परमेश्वर से इतनी घृणा कर सकते हैं कि वे परमेश्वर के साथ घातक विवाद में हों। मुख्य याजकगण, धर्म-शास्त्री और इतने सारे अनुयायी—जो उस समय एकजुट होकर चीख रहे थे कि प्रभु यीशु को क्रूस पर चढ़ाया जाना चाहिए—केवल ऐसे राक्षसों की एक भीड़ ही हो सकती थी जो परमेश्वर से नफरत करते थे, क्या ऐसा नहीं है? अब क्या धार्मिक समुदाय के अधिकांश पादरी और नेतागण भी, अनेक विश्वासियों के साथ, एक आवाज़ में सर्वशक्तिमान परमेश्वर की निंदा नहीं करते हैं? क्या ये लोग राक्षस नहीं हैं जो परमेश्वर का विरोध कर रहे हैं? खासकर अब, जब बड़ा लाल अजगर परमेश्वर के कार्य की निंदा और उसका विरोध करता है, धार्मिक समुदाय भी बड़े लाल अजगर का पक्ष लेता है, और परमेश्वर का विरोध और निंदा करने में और परमेश्वर पर दोष लगाने में भी वह उसके साथ हो लेता है। इस प्रकार मानव जाति इस बात की साक्षी है कि धार्मिक समुदाय और बड़ा लाल अजगर शैतान के शिविर में एकजुट हो गए हैं। धार्मिक समुदाय एक लम्बे समय से शैतान का एक सह-अपराधी बन गया है, जो अच्छी तरह से दर्शाता है कि धार्मिक समुदाय द्वारा "परमेश्वर की सेवा" का सार वास्तव में परमेश्वर का विरोध है, और यह प्रभु यीशु के उन वचनों को पूरी तरह से सच साबित करता है जो फरीसियों को बेनक़ाब कर उनसे न्याय करते हैं। यह सटीक रूप में आज के धार्मिक समुदाय की भ्रष्टता और बुराई का सार है। आज धार्मिक समुदाय का परमेश्वर के प्रति प्रतिरोध प्रभु यीशु के समय में धार्मिक समुदाय के विरोध के बराबर, या उससे भी बढ़कर है। वे एक मसीह- विरोधी राक्षसी समूह है जिसे परमेश्वर ने तिरस्कृत और निन्दित किया है, और वे पूरी तरह से शैतान की बुरी ताकतों से जुड़े हुए हैं। इससे यह स्पष्ट है कि मानव जाति की भ्रष्टता एक पराकाष्ठा पर पहुंच गई है, जहां यह वास्तव में एक बार फिर मसीह को, जो आखिरी दिनों में सच्चाई को पेश कर रहा है और न्याय दे रहा है, क्रूस पर चढ़ा सकती है। यह इसे दिखाने के लिए पर्याप्त है कि मानव जाति शैतान से इतनी भ्रष्ट हो गई है कि वह राक्षसों में बदल गई है। ... अंतिम दिनों में परमेश्वर का न्याय और उसकी ताड़ना शैतान के भाग्य को समाप्त करने का कार्य है। क्या यह संभव है कि परमेश्वर धार्मिक समुदाय के इन राक्षसी मसीह-विरोधियों के प्रति जो अंतिम दिनों के असली देहधारी परमेश्वर के साथ घातक झगड़े में हैं, कोई नर्मी दिखाएगा? हर कोई प्रतीक्षा कर सकता है इसे देखने के लिए कि जिस समय दुनिया के राष्ट्र और लोग परमेश्वर की सार्वजनिक उपस्थिति को देखेंगे, तो यह एक कैसा नज़ारा होगा। लोग क्यों विलाप करेंगे? तब सच्चाई को दिन के प्रकाश में उजागर कर दिया जाएगा!

"अंतिम दिनों में परमेश्वर के न्याय और ताड़ना को कैसे जानें" उपदेश संग्रह—जीवन के लिए आपूर्ति में

10. फरीसियों के द्वारा यीशु पर दोष लगाया जाना

(मरकुस 3:21-22) जब उसके कुटुम्बियों ने यह सुना, तो उसे पकड़ने के लिए निकले; क्योंकि वे कहते थे कि उस का चित ठिकाने नहीं है। शास्त्री भी जो यरूशलेम से आए थे, यह कहते थे, कि "उस में शैतान है," और "वह दुष्टात्माओं के सरदार की सहायता से दुष्टात्माओं को निकालता है।"

11. यीशु फरीसियों को डाँटता है

(मत्ती12:31-32) इसलिये मैं तुम से कहता हूँ कि मनुष्य का सब प्रकार का पाप और निन्दा क्षमा की जाएगी, पर पवित्र आत्मा की निन्दा क्षमा न की जाएगी। जो कोई मनुष्य के पुत्र के विरोध में कोई बात कहेगा, उसका यह अपराध क्षमा किया जाएगा, परन्तु जो कोई पवित्र आत्मा के विरोध में कुछ कहेगा, उसका अपराध न तो इस लोक में और न परलोक में क्षमा किया जाएगा।

(मत्ती23:13-15) हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम मनुष्यों के लिए स्वर्ग के राज्य का द्वार बन्द करते हो, न तो तुम स्वयं ही उसमें प्रवेश करते हो और न उस में प्रवेश करनेवालों को प्रवेश करने देते हो। [हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो तुम पर हाय! तुम विधवाओं के घरों को खा जाते हो, और दिखाने के लिए बड़ी देर तक प्रार्थना करते रहते हो: इसलिये तुम्हें अधिक दण्ड मिलेगा।] हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम एक जन को अपने मत में लाने के लिए सारे जल और थल में फिरते हो, और जब वह मत में आ जाता है तो उसे अपने से दूना नारकीय बना देते हो।

ऊपर दो अलग अलग अंश हैं—आओ पहले प्रथम पर एक नज़र डालें: फरीसियों के द्वारा यीशु पर दोष लगाया जाना।

बाइबल में, फरीसियों के द्वारा स्वयं यीशु का मूल्याँकन और वे चीज़ें जो उसने की थी वे थेः क्योंकि वे कहते थे, कि उस का चित्त ठिकाने नहीं है। …"उस में शैतान है," और "वह दुष्टात्माओं के सरदार की सहायता से दुष्टात्माओं को निकालता है" (मरकुस 3:21-22)। शास्त्रियों और फरीसियों के द्वारा यीशु पर दोष लगाना रट्टू तोते की तरह बोलना या हवा के हल्के बयार में कल्पना करना नहीं था—जो कुछ उन्होंने देखा और उसके कार्यों के विषय में सुना था उसके आधार पर यह प्रभु यीशु के लिए उनका निष्कर्ष था। यद्यपि उनका निष्कर्ष व्यर्थ दिखावे के रूप में न्याय के नाम पर लिया गया था और लोगों को ऐसा दिखता था मानो उन्हें अच्छे प्रमाणों से स्थापित किया गया है, फिर भी वह अहंकार जिसके तहत उन्होंने प्रभु यीशु पर दोष लगाया था उस पर काबू पाना स्वयं उनके लिए भी कठिन था। प्रभु यीशु के लिए उनकी नफरत की आवेग से भरी हुई ऊर्जा ने स्वयं उनकी खतरनाक महत्वाकांक्षा और उन के बुरे शैतानी चेहरे, साथ ही साथ परमेश्वर का विरोध करने के उनके द्रोही स्वभाव का भी का खुलासा कर दिया था। ये बातें उन्होंने प्रभु यीशु पर दोष लगाते हुए कहा था जो उनके खतरनाक महत्वाकांक्षाओं, ईर्ष्या, और परमेश्वर एवं सच्चाई के प्रति उनकी शत्रुता के गन्दे और द्रोही स्वभाव से प्रेरित था। उन्होंने प्रभु यीशु के कार्यों के स्रोत की खोज नहीं की, और ना ही उन्होंने जो कुछ उसने कहा था या किया था उसके सार की खोज की। परन्तु उन्होंने असावधानी, अधीरता, सनक और जानबूझकर की गई ईर्ष्या के साथ जो कुछ उसने किया था उस पर आक्रमण किया और उस पर विश्वास नहीं किया। यह इस बिन्दु तक था कि उन्होंने बिना सोचे विचारे उसके आत्मा पर, अर्थात् पवित्र आत्मा, परमेश्वर के आत्मा पर कलंक लगाया। यही उनका मतलब था जब उन्होंने कहा था "उसका चित ठिकाने नहीं है," "बील्ज़ेबूब और दुष्टात्माओं का सरदार।" ऐसा कहना चाहिए, उन्होंने कहा कि परमेश्वर का आत्मा बालजबूल और दुष्टात्माओं का सरदार है। उन्होंने उस देहधारी शरीर के कार्य को पागलपन कहा जिसे परमेश्वर के आत्मा ने धारण किया था। उन्होंने ना केवल बालजबूल और दुष्टात्माओं का सरदार कहकर परमेश्वर के आत्मा की निन्दा की, परन्तु उन्होंने परमेश्वर के कार्य पर दोष भी लगाया था। उन्होंने प्रभु यीशु मसीह पर दोष लगाया और उसकी निन्दा की। उनके प्रतिरोध और परमेश्वर की निन्दा का सार बिल्कुल शैतान और परमेश्वर के प्रति दुष्टात्माओं के प्रतिरोध और ईश निन्दा के सार के समान ही था। वे ना केवल भ्रष्ट मनुष्यों को दर्शाते हैं, बल्कि इस से कहीं ज़्यादा वे शैतान के मूर्त रूप है। वे मानव जाति के मध्य एक माध्यम थे, और वे शैतान के सहअपराधी और सन्देशवाहक थे। उनकी ईश निन्दा का निचोड़ और उनके द्वारा प्रभु यीशु मसीह के चरित्र को दूषित किया जाना यह सब परमेश्वर के साथ पद को लेकर उनका संघर्ष, परमेश्वर के साथ उनकी प्रतिस्पर्धा, और परमेश्वर को परखने की उनकी कभी ना खत्म होनेवाली इच्छा थी। परमेश्वर के प्रति उनके प्रतिरोध का निचोड़ और उसके प्रति उनकी शत्रुता की मनोवृत्तियाँ, साथ ही साथ उनके शब्द और उनके विचारों ने सीधे सीधे परमेश्वर के आत्मा की निन्दा की और उसे क्रोधित किया था। इस प्रकार, परमेश्वर ने जो कुछ उन्होंने कहा था और किया था उसके लिए एक उचित दण्ड का निर्धारण किया, और उन के कार्यो को पवित्र आत्मा के विरूद्ध पाप के रूप में निर्धारित किया था। यह पाप इस संसार और आनेवाले संसार में भी क्षमा करने योग्य नहीं है, बिल्कुल वैसा ही जैसा निम्नलिखित अंश कहता हैः "मनुष्य का सब प्रकार का पाप और निन्दा क्षमा की जाएगी, परन्तु पवित्र आत्मा की निन्दा क्षमा न की जाएगी" और "परन्तु जो कोई पवित्र आत्मा के विरोध में कुछ कहेगा, उसका अपराध न तो इस लोक में और न परलोक में क्षमा किया जाएगा।" आज, आओ हम परमेश्वर से इन शब्दों के सच्चे अर्थ के बारे में बातें करें "उसका अपराध न तो इस लोक में और न परलोक में क्षमा किया जाएगा।" यह सरल रीति से समझना है कि परमेश्वर किस प्रकार वचनों को पूरा करता है "उस का अपराध न तो इस लोक में और न परलोक में क्षमा किया जाएगा।"

प्रत्येक चीज़ जिसके बारे में हम बात कर चुके हैं वह परमेश्वर के स्वभाव, और लोगों, प्रकरणों, और चीज़ों के प्रति उसकी मनोवृत्तियाँ से जुड़ा हुआ है। स्वाभाविक रीति से, ऊपर दिए गए दोनों अंश अपवाद नहीं हैं। क्या तुम लोगों ने पवित्र शास्त्र के इन दोनों अंशों में कुछ ध्यान दिया था? कुछ लोग कहते हैं कि वे परमेश्वर के क्रोध को देखते हैं। कुछ लोग कहते हैं कि वे परमेश्वर के स्वभाव के उस पक्ष को देखते हैं जो मानव जाति के अपराध को सहन नहीं कर सकता है, और यह कि यदि लोग कुछ ऐसा करें जिस से परमेश्वर की निन्दा हो, तो वे उसकी क्षमा को प्राप्त नहीं करेंगे। इस सच्चाई के अतिरिक्त कि लोग इन दोनों अंशों में परमेश्वर के क्रोध और असहिष्णुता को देखते हैं और महसूस करते हैं, फिर भी वे अभी तक उसकी प्रवृत्ति को सचमुच में समझ नहीं पाए हैं। ये दोनों अंश उनके प्रति जो उसकी निन्दा करते हैं और उसे क्रोधित करते है परमेश्वर की सच्ची प्रवृत्ति और पहुँच के अर्थ को धारण किए हुए है। पवित्र शास्त्र का यह अंश उसकी सच्ची प्रवृत्ति और पहुँच के अर्थ को थामे हुए हैः "परन्तु जो कोई पवित्र आत्मा के विरोध में कुछ कहेगा, उस का अपराध न तो इस लोक में और न परलोक में क्षमा किया जाएगा।" जब लोग परमेश्वर की निन्दा करते हैं, जब वे उसे रिस दिलाते हैं, वह एक आदेश जारी करता है, और उसका आदेश उसका अन्तिम परिणाम होता है। इसे बाइबल मे इस प्रकार से वर्णित किया गया हैः "इसलिये मैं तुम से कहता हूँ कि मनुष्य का सब प्रकार का पाप और निन्दा क्षमा की जाएगी, परन्तु आत्मा की निन्दा क्षमा न की जाएगी" (मत्ती 12:31-32), और "हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो तुम पर हाय!" (मत्ती 23:13)। फिर भी, यह बाइबल में दर्ज है कि शास्त्रियों और फरीसियों का, साथ ही साथ उन लोगों का क्या परिणाम हुआ था जिन्हों ने प्रभु यीशु के द्वारा इन बातों को कहने के बाद कहा था कि वह पागल है? यदि उन्होंने किसी प्रकार का दण्ड सहा तोक्या यह पवित्र शास्त्र में दर्ज है? यह निश्चित है कि यह दर्ज नहीं था। यहाँ यह कहना कि "दर्ज नहीं था" यह नहीं है कि इसे दर्ज नहीं किया गया था, किन्तु वास्तव मे वहाँ कोई परिणाम नहीं था जिसे मनुष्य की आँखों से देखा जा सकता था। यह "दर्ज नहीं था" एक मसलेकी व्याख्या करता है, अर्थात् कुछ चीज़ों को सँभालने के लिए परमेश्वर की मनोवृत्तियाँ एवं सिद्धांत। जो परमेश्वर की निन्दा करते हैं या उसे कोसते हैं उन लोगों के प्रति उसका उपचार, या वे जो उस पर कलंक लगाते हैं—लोग जो जानबूझकर उस पर हमला करते हैं, कलंक लगाते हैं, और उसे कोसते हैं—वह उनकी आँखोंको अँधा और उन के कान को बहरा नहीं करता है। उनके प्रति उसके पास एक साफ मनोवृत्ति है। वह इन लोगों से घृणा करता है, अपने हृदय में उनकी भ्रत्सना करता है। वह खुलकर उनके लिए परिणामों की घोषणा भी करता है, ताकि लोग जान सकें कि जो उसकी निन्दा करते हैं उनके प्रति उसके पास एक स्पष्ट मनोवृत्ति है, और ताकि वे यह भी जान सकें कि वह किस प्रकार उनके नतीजों को निर्धारित करता है। फिर भी, परमेश्वर के ऐसा कहने के बाद, बहुत मुश्किल से ही लोग उस सच्चाई को देख पाते हैं कि परमेश्वर किस प्रकार ऐसे लोगों से निपटता है, और वे परमेश्वर के नतीजों के पीछे के सिद्धांतों, और उनके लिए उसकी आज्ञा को समझ नहीं सकते हैं। ऐसा कहना चाहिए, मानव जाति उस विशेष मनोवृत्ति और पद्धति को देख नहीं सकते हैं जो उनसे निपटने के लिए परमेश्वर के पास है। कुछ चीज़ो को करने के लिए इसे परमेश्वर के सिद्धांतों से ताल्लुक रखना है। कुछ लोगों के बुरे व्यवहार से निपटने के लिए परमेश्वर कुछ प्रमाणित तथ्यों की खोज का प्रयोग करता है। अर्थात्, वह उन के पापों की घोषणा नहीं करता है और उन के परिणामों को निर्धारित नहीं करता है, परन्तु वह प्रत्यक्ष रूप से प्रमाणित तथ्यों की खोज का प्रयोग करता है जिस से उन्हें दण्डित करने, और उनका उचित बदला देने की अनुमति दे सके। जब ये प्रमाणित तथ्य घटित होते हैं, इस से लोगों को शरीर में कष्ट उठाना पड़ता है; यह सब कुछ ऐसा है जिसे मनुष्य की आँखों से देखा जा सकता है। कुछ लोगों के बुरे व्यवहार से निपटते समय, परमेश्वर बस वचनों से षाप देता है, परन्तु उसी समय, परमेश्वर का क्रोध उनके ऊपर आ जाता है, और वह दण्ड जिसे वे प्राप्त करते हैं वह शायद कुछ ऐसा होता है जिसे लोग देख नहीं सकते हैं, परन्तु इस प्रकार के नतीजे शायद उन नतीज़ों से कहीं ज़्यादा गंभीर हो सकते हैं जब लोग देख सकते हैं कि उन्हें दण्डित किया या मारा जा रहा है। यह इसलिए है क्योंकि उस परिस्थिति के अन्तर्गत जिस में परमेश्वर ने यह निर्धारित किया है कि इस प्रकार के व्यक्ति को बचाना नहीं है, और आगे से उनके लिए कोई दया और सहनशीलता नहीं दिखाना है, और उन्हें कोई और अवसर नहीं देना है, तो उनके लिए उस की मनोवृत्तियाँ होती है कि उन्हें अलग कर दिया जाए। "अलग कर दिया जाए" का अर्थ क्या होता है? अपने आप में इस शब्दावली का अर्थ होता है किसी चीज़ को एक तरफ रख दिया जाए, और आगे से उस पर कोई ध्यान ना दिया जाए।यहाँ, जब परमेश्वर "अलग कर देता है" तो उस के अर्थ की दो अलग अलग व्याख्याएँ होती हैं: पहली व्याख्या है कि उसने उस व्यक्ति के जीवन, और उस व्यक्ति की हर चीज़ को शैतान को दे दिया गया है ताकि वह उस के साथ निपटे। परमेश्वर अब आगे से उत्तरदायित्व नहीं लेगा और आगे से उसका प्रबन्ध भी नहीं करेगा। भले ही वह व्यक्ति पागलया मूर्ख हो जाए, और चाहे जीवित रहे या मर जाए, या भले ही वे अपने दण्ड के लिए नरक में नीचे चले जाएँ, फिर भी इस से परमेश्वर का कोई लेना देना नहीं होगा। इसका यह मतलब होगा कि उस जीवधारी का परमेश्वर के साथ कोई रिश्ता नहीं होगा। दूसरी व्याख्या यह है कि परमेश्वर ने यह निर्धारित किया है कि वह स्वयं इस व्यक्ति के साथ, अपने हाथों से कुछ करना चाहता है। यह संभव है कि वह इस प्रकार के व्यक्ति की सेवा का उपयोग करेगा, या यह कि वह इस व्यक्ति को एक विषमता के रूप में उपयोग करेगा। यह संभव है कि इस प्रकार के इंसान से निपटने, और उस का उपचार करने के लिए परमेश्वर के पास एक विशेष तरीका होगा—बिल्कुल पौलुस के समान। यह परमेश्वर के हृदय का सिद्धांत और मनोवृत्ति है कि उसने किस तरह इस प्रकार के व्यक्ति से निपटने का निर्णय लिया है। इस प्रकार जब लोग परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं, और उस पर दोश और कलंक लगाते हैं, और यदि वे उसके स्वभाव को रिस दिलाते हैं, या यदि वे परमेश्वर के निर्णायक बिन्दु तक पहुँच जाते हैं, तो परिणाम अकल्पनीय हो जाते हैं। सब से कठोर परिणाम यह है कि परमेश्वर हमेशा हमेशा के लिए उनकी ज़िन्दगियों और उन की हर चीज़ को शैतान को सौंप देता है। वे पूरी अनन्तता के लिए क्षमा नहीं किए जाएँगे। इसका यह मतलब है कि यह व्यक्ति शैतान के मुँह का निवाला, और उसके हाथ का खिलौना बन चुका है, और उस समय के बाद से परमेश्वर का उनके साथ कुछ लेना देना नहीं है। क्या तुम लोग कल्पना कर सकते हो कि जब शैतान ने अय्यूब की परीक्षा ली थी तो वह किस प्रकार की दुर्दशा थी? उस शर्त के अंतर्गत जिसमें शैतान को अय्यूब के प्राण को नुकसान पहुँचाने की अनुमति नहीं दी गई थी, अय्यूब ने तब भी बड़ा कठिन दुःख सहा था। और क्या शैतान की क्रूरता की कल्पना करना और ज़्यादा कठिन नहीं है जिसके अधीन एक व्यक्ति को कर दिया जाएगा, जिसे पूर्णत: शैतान को सौंपा जा चुका है, जो पूर्णत: शैतान के चंगुल में है, जिस ने परमेश्वर की देखरेख और दया को पूर्णत: खो दिया है, जो आगे से सृष्टिकर्ता के शासन के अधीन नहीं है, जिस से परमेश्वर की आराधना करने का अधिकार, और परमेश्वर के शासन के अधीन एक जीवधारी होने का अधिकार छिना जा चुका है, जिसका रिश्ता सृष्टि के प्रभु के साथ पूर्णत: अलग कर दिया गया है? शैतान के द्वारा अय्यूब को दुःख देना कुछ ऐसा था जिसे मनुष्य की आँखों से देखा जा सकता था, परन्तु यदि परमेश्वर एक व्यक्ति के जीवन को शैतान को सौंप देता है, तो इसका नतीजा ऐसा होगा जिसके बारे में किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी। यह ऐसा है मानो कुछ लोग एक गाय, या एक गधे के रूप में फिर से जन्म लें, या कुछ लोगों पर अशुद्ध, और बुरी आत्माओं के द्वारा कब्जा कर लिया जाए, या वे उन में समा जाएँ, इत्यादि। यह वह परिणाम है, और उन लोगों का अन्त है जिन्हें परमेश्वर के द्वारा शैतान को सौंपा जा चुका है। बाहरी तौर पर, ऐसा दिखाई देता है कि वे लोग जिन्होंने प्रभु यीशु का उपहास किया था, उस पर दोश लगाया था, और उसकी निन्दा की थी उन्होंने कोई परिणाम नहीं सहा। फिर भी, सच्चाई यह है कि हर एक चीज़ से निपटने के लिए परमेश्वर के पास एक मनोवृत्ति है। वह जिस प्रकार हर तरह के लोगों से निपटता है उसके परिणामको लोगों को बताने के लिए शायद परमेश्वर स्पष्ट भाषा का प्रयोग ना करे। कई बार वह प्रत्यक्ष रीति बात नहीं करता है, परन्तु वह प्रत्यक्ष रीति से कार्यों को करता है। वह इसके बारे में बात नहीं करता है,तो इसका मतलब यह नहीं है कि वहाँ एक परिणाम नहीं है—यह भी संभव है कि परिणाम बहुत ही ज़्यादा गंभीर हो। प्रकट रूप से देख ने से, ऐसा लगता है कि परमेश्वर अपनी मनोवृत्ति को प्रकाशित करने के लिए कुछ लोगों से बात नहीं करता है; वस्तुतः, परमेश्वर लम्बे समय तक उन पर कोई ध्यान देना नहीं चाहता है। वह उनको अब और देखना नहीं चाहता है। उन चीज़ों, तथा उनके व्यवहार के कारण जो उन्होंने किया है, और उनके स्वभाव और उनके सार के कारण, परमेश्वर केवल इतना चाहता है कि वे उस की नज़रों से ओझल हो जाएँ, और वह उन्हें सीधे शैतान को सौंप देना चाहता है, ताकि उन के आत्मा, प्राण, और देह को शैतान के दे दे, ताकि शैतान को अनुमति मिले कि वह जो चाहे वह करे। यह स्पष्ट हो गया कि वह किस हद तक उनसे नफरत करता है, वह किस हद तक उन से उकता गया है। यदि एक इंसान इस हद तक उसे क्रोधित करता है कि परमेश्वर उसे दुबारा देखना भी नहीं चाहता है, तो वह उन्हें पूर्णत: छोड़ देगा, उस बिन्दु तक कि परमेश्वर स्वयं उनसे कोई व्यवहार करना नहीं चाहेगा—यदि यह उस बिन्दु तक पहुँच जाता है तो वह उन्हें शैतान को सौंप देगा ताकि वह जैसा चाहे वैसा करे, और वहशैतान को अनुमति देगा कि उन पर नियन्त्रण करे, उन्हें भस्म करे, और जैसा चाहे उनसे वैसा व्यवहार करे—इस इंसान का पूर्णत: खात्मा हो गया। मनुष्य होने का उनका अधिकार पूरी रीति से रद्द कर दिया गया है, और एक जीवधारी होने के नाते उनका अधिकार समाप्त हो गया। क्या यह अति गंभीर परिणाम नहीं है?

ऊपरोक्त सभी बातें इन वचनों की पूर्ण व्याख्या हैः "उसका अपराध न तो इस लोक में और न परलोक में क्षमा किया जाएगा," और यह पवित्र शास्त्र के इन अंशों के ऊपर एक छोटी सी टीका भी है। मैं सोचता हूँ अब तुम लोगों के पास इन बातों की समझ है!

"वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी" से "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III" से

फुटनोट:

1. "उपद्रव भड़काने" का मतलब है कि कैसे वे लोग जो राक्षसी हैं आतंक फैलाते हैं, परमेश्वर के कार्य को बाधित और प्रतिरोधित करते हुए।

2. "दांतों वाली व्हेल" का उपयोग उपहासपूर्ण ढंग से किया गुया है। यह एक रूपक है कि कैसे मक्खियां इतनी छोटी होती हैं कि सूअर और कुत्ते उन्हें व्हेल की तरह विशाल नज़र आते हैं।

पिछला:प्रश्न 35: धार्मिक दुनिया के अधिकांश लोग मानते हैं कि पादरियों और प्राचीन लोगों को परमेश्वर के द्वारा चुना और प्रतिष्ठित किया गया है, और यह कि वे सभी धार्मिक कलीसियाओं में परमेश्वर की सेवा करते हैं; अगर हम पादरियों और प्राचीन लोगों का अनुसरण और आज्ञा-पालन करते हैं, तो हम वास्तव में परमेश्वर का ही अनुसरण और आज्ञा-पालन करते हैं। यथार्थतः मनुष्य का अनुसरण और आज्ञा-पालन करने का क्या मतलब है, और वास्तव में परमेश्वर का अनुसरण और आज्ञा-पालन करने का क्या अर्थ है, ज्यादातर लोग सच्चाई के इस पहलू को नहीं समझते हैं, तो कृपया हमारे लिए यह सहभागिता करो।

अगला:प्रश्न 37: यद्यपि पादरी और प्राचीन लोग धार्मिक दुनिया में सत्ता रखते हैं और वे ढोंगी फरीसियों के मार्ग पर चलते हैं, हम तो प्रभु यीशु में विश्वास करते हैं, पादरी और प्राचीन लोगों में नहीं, तो तुम यह कैसे कह सकते हो कि हम भी फरीसियों के रास्ते पर चलते हैं? क्या हम वास्तव में धर्म के भीतर रहकर परमेश्वर में विश्वास करने के द्वारा बचाए नहीं जा सकते हैं?

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