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प्रश्न 40: सर्वशक्तिमान परमेश्वर, अंतिम दिनों का मसीह, सत्य को व्यक्त करता है और मानवता को शुद्ध करने और बचाने के लिए न्याय का अपना कार्य करता है, और फिर भी वह धार्मिक दुनिया और चीनी कम्युनिस्ट सरकार, दोनों की बेतहाशा निंदा और क्रूर कार्यवाही का मुकाबला करता है, जहां वे मसीह का तिरस्कार करने, उसकी निन्दा करने, उसे पकड़ने और नष्ट करने के लिए उनके सशस्त्र बलों और सभी मीडिया तक को जुटाते हैं। जब प्रभु यीशु का जन्म हुआ, तब हेरोदेस ने सुना कि "इस्राएल का राजा" पैदा हो चुका था और उसने सभी नर बच्चों को जो बेतलेहेम में थे और दो वर्ष से कम उम्र के थे, मरवा डाला था; उसे मसीह को जीवित रहने देने की बजाय दस हजार बच्चों को गलत ढंग से मार डालना बेहतर लगा। परमेश्वर ने मानवजाति को बचाने के लिए देहधारण किया है, तो धार्मिक दुनिया और नास्तिक सरकार क्यों परमेश्वर के प्रकटन और कार्य के खिलाफ अंधाधुंध तिरस्कार और निन्दा करती हैं? क्यों वे पूरे देश की ताकत को झुका देते हैं और मसीह को क्रूस पर कीलों से जड़ने के लिए कोई प्रयास बाक़ी नहीं रखते हैं? मानव जाति इतनी बुरी क्यों है, वह परमेश्वर से इतनी नफरत क्यों करती है और क्यों उसके खिलाफ खुद मोर्चा लेती है?

उत्तर:

यह सवाल बहुत महत्वपूर्ण है, और पूरी मानवजाति में बहुत थोड़े-से लोग इस बात को अच्छी तरह समझ सकते हैं! मानवजाति इतने अंधाधुंध तरीके से परमेश्वर की अवज्ञा क्यों करती है, यह अब सुर्ख़ियों में है, और देहधारी मसीह के सूली पर चढ़ाए जाने की ऐतिहासिक त्रासदी फिर दोहराई जा रही है; क्या यह सच नहीं है? प्रभु यीशु ने कहा था, "और दण्ड की आज्ञा का कारण यह है कि ज्योति जगत में आई है, और मनुष्यों ने अन्धकार को ज्योति से अधिक प्रिय जाना क्योंकि उनके काम बुरे थे। क्योंकि जो कोई बुराई करता है, वह ज्योति से बैर रखता है, और ज्योति के निकट नहीं आता, ऐसा न हो कि उसके कामों पर दोष लगाया जाए" (यूहन्ना 3:19-20)। "यदि संसार तुम से बैर रखता है, तो तुम जानते हो कि उसने तुम से पहले मुझ से बैर रखा" (यूहन्ना 15:18)। "इस युग के लोग बुरे हैं" (लूका 11:29)। बाइबल में कहा गया है, "सारा संसार उस दुष्‍ट के वश में पड़ा है" (1 यूहन्ना 5:19)। बाइबल में पहले ये वचन पढ़ते समय हम ठीक से समझ नहीं पाये थे। जब हम देखते हैं कि परमेश्वर के दोनों देहधारियों ने नास्तिक सरकारों और धार्मिक संसार द्वारा संयुक्त रूप से निंदा, पीछा और दमन सहा है, तभी हम समझ पाते हैं कि बाइबल में निहित ये वचन वास्तव में सत्य हैं। मानवजाति की करनी और मसीह के प्रति उनका रवैया यह साबित करने के लिए काफी है कि संपूर्ण संसार शैतान के कब्जे और उसकी शक्ति में है। आजकल, हममें से ज़्यादातर लोग साफ़ देख सकते हैं कि धार्मिक संसार के अधिकतर पादरी और एल्डर्स मसीह की अवज्ञा, निंदा करने वाले और उनको नकारने वाले लोग हैं, और धार्मिक संसार बहुत समय पहले ही इन पाखंडी फरीसियों और मसीह-विरोधियों के कब्जे में आ गया था। इसलिए, जब देहधारी परमेश्वर प्रकट हो कर कार्य करते हैं, तब धार्मिक संसार के पादरी और एल्डर्स उठ कर निंदा करने और अवज्ञा करने वाले पहले लोग होते हैं—यह अवश्यंभावी है। सीसीपी सरकार एक शैतानी शासन है जो सत्य से सबसे अधिक घृणा करती है और परमेश्वर की अवज्ञा करती है, और यह हमेशा से ईसाइयों को गिरफ्तार कर उनका उत्पीड़न करती रही है। जब अंत के दिनों के मसीह चीन में प्रकट हो कर अपना कार्य करने आये, सीसीपी सरकार ने मसीह का पीछा करने, घेरने और ख़त्म करने का बेशर्मी और बर्बरता से प्रयास किया, जिससे पूरी दुनिया में सनसनी-सी फ़ैल गयी। इस सच ने प्रभु यीशु की भविष्यवाणी को पूरी तरह साकार किया: "क्योंकि जैसे बिजली आकाश के एक छोर से कौंध कर आकाश के दूसरे छोर तक चमकती है, वैसे ही मनुष्य का पुत्र भी अपने दिन में प्रगट होगा। परन्तु पहले अवश्य है कि वह बहुत दु:ख उठाए, और इस युग के लोग उसे तुच्छ ठहराएँ" (लूका 17:24-25)। परमेश्वर मानवजाति को पापमुक्त करने और उसकी रक्षा करने के लिए, मनुष्य के बीच बोलने और कार्य करने के लिए दो बार देहधारी हुए, और दोनों बार धार्मिक नेताओं और सत्तारूढ़ पार्टी द्वारा की गयी संयुक्त तिरस्‍कार, ईश-निंदा, पीछा करने और दमन को सहा; यह तथ्य यह साबित करने के लिए काफी है कि यह दुनिया कितनी दुष्ट और बुरी है और मानवजाति कितनी गहराई से भ्रष्ट हो चुकी है! मानवजाति इस कदर भ्रष्ट और विकृत हो चुकी है कि वे सत्य से ऊब चुके हैं, सत्य से घृणा करते हैं, दुष्टता को ऊंचा स्थान देते हैं, और स्वयं को परमेश्वर के विरुद्ध खड़ा करते हैं, शैतान जैसे और शैतान की संतान बन जाते हैं, परमेश्वर के अस्तित्व को बिल्कुल न सह सकने वाले। इसलिए देहधारी परमेश्वर की अभिव्यक्ति और कार्य को अनिवार्य रूप से उत्पीड़न और त्याग दिये जाने की पीड़ा सहनी होगी। मानवजाति किस कारण से परमेश्वर की अवज्ञा करती है, सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने सत्य के इस पहलू को प्रकाशित किया है, और इस बारे में सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अनेक अंशों को पढ़ने के बाद यह हमारे सामने स्पष्ट हो जाएगा।

सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "आज जहाँ पर मानवजाति है, वहाँ तक पहुँचने के लिए उसे दसियों हज़ार साल लग गए। हालाँकि, मेरी मूल सृजन की मानवजाति बहुत पहले ही अधोगति में डूब गई है। लोग पहले ही वैसे नहीं रहे हैं जैसा मैं चाहता हूँ, और इस प्रकार इंसान, जैसा वे मेरी आँखों में प्रतीत होते हैं, अब और मानव कहलाने योग्य नहीं हैं। बल्कि वे मानवजाति के मैल हैं, जिन्हें शैतान ने बंदी बना लिया है, वे चलती-फिरती सड़ी हुई लाशें हैं जिनमें शैतान रहता है और जिन्हें उसने अपना वस्त्र बना लिया है। लोग मेरे अस्तित्व में थोड़ा सा भी विश्वास नहीं करते हैं, न ही वे मेरे आने का स्वागत करते हैं" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "एक वास्तविक मनुष्य होने का क्या अर्थ है")।

"परमेश्वर के विरुद्ध मनुष्य के विरोध और उसकी विद्रोहशीलता का स्रोत शैतान के द्वारा उसकी भ्रष्टता है। क्योंकि वह शैतान के द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया है, इसलिये मनुष्य की अंतरात्मा सुन्न हो गई है, वह अनैतिक हो गया है, उसके विचार पतित हो गए हैं, और उसका मानसिक दृष्टिकोण पिछड़ा हुआ है। शैतान के द्वारा भ्रष्ट होने से पहले, मनुष्य स्वाभाविक रूप से परमेश्वर का अनुसरण करता था और उसके वचनों को सुनने के बाद उनका पालन करता था। उसमें स्वाभाविक रूप से सही समझ और विवेक था, और सामान्य मानवता थी। शैतान के द्वारा भ्रष्ट होने के बाद, उसकी मूल समझ, विवेक, और मानवता मंद पड़ गई और शैतान के द्वारा दूषित हो गई। इस प्रकार, उसने परमेश्वर के प्रति अपनी आज्ञाकारिता और प्रेम को खो दिया है। मनुष्य की समझ धर्मपथ से हट गई है, उसका स्वभाव एक जानवर के समान हो गया है, और परमेश्वर के प्रति उसकी विद्रोहशीलता और भी अधिक बढ़ गई है और गंभीर हो गई है। लेकिन फिर भी, मनुष्य इसे न तो जानता है और न ही पहचानता है, और केवल आँख बंद करके विरोध और विद्रोह करता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "एक अपरिवर्तित स्वभाव का होना परमेश्वर के साथ शत्रुता में होना है")।

"मानवजाति मेरी शत्रु के अलावा और कुछ नहीं है। मानवजाति ऐसी दुष्ट है जो मेरा विरोध और मेरी अवज्ञा करती है। मानवजाति मेरे द्वारा श्रापित दुष्ट की संतान के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। मानवजाति उस प्रधान दूत के वंशज के अतिरिक्त और कुछ नहीं है जिसने मेरे साथ विश्वासघात किया था। मानवजाति उस शैतान की विरासत के अतिरिक्त और कुछ नहीं है जो बहुत पहले ही मेरे द्वारा ठुकराया गया और हमेशा से मेरा कट्टर विरोधी शत्रु रहा है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "एक वास्तविक मनुष्य होने का क्या अर्थ है")।

"शैतान राष्ट्रीय सरकारों और प्रसिद्ध एवं महान व्यक्तियों की शिक्षा और प्रभाव के माध्यम से लोगों को दूषित करता है। उनके झूठ और बकवास मनुष्य की प्रकृति और जीवन बन गए हैं। 'हर कोई अपने लिए और बाकियों को शैतान ले जाये' एक प्रसिद्ध शैतानी कहावत है जिसे हर किसी में डाल दिया गया है और यह मानव जीवन बन गया है। जीवन दर्शन के कुछ अन्य शब्द भी हैं जो इसी तरह के हैं। शैतान प्रत्येक देश की उत्तम पारंपरिक संस्कृति के माध्यम से लोगों को शिक्षित करता है और मानवता को विनाश की विशाल खाई में गिरने और उसमें निगल लिए जाने पर मजबूर कर देता है, और अंत में परमेश्वर लोगों को नष्ट कर देता है क्योंकि वे शैतान की सेवा करते हैं और परमेश्वर का विरोध करते हैं" ("मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "मनुष्य का स्वभाव कैसे जानें")।

"ऐसी गन्दी जगह में जन्म लेकर, मनुष्य को समाज के द्वारा बुरी तरह हानि पहुँची है, वह सामंती नैतिकता से प्रभावित हो चुका है, और उन्हें 'उच्च शिक्षा के संस्थानों' में सिखाया गया है। पिछड़ी सोच, भ्रष्ट नैतिकता, जीवन पर मतलबी दृष्टिकोण, तिरस्कार-योग्य दर्शन, बिल्कुल बेकार अस्तित्व, भ्रष्ट जीवन शैली और रिवाज—इन सभी चीजों ने मनुष्य के हृदय में गंभीर रूप से घुसपैठ की है, और उसकी अंतरात्मा को बुरी तरह खोखला कर दिया है और उस पर गंभीर प्रहार किया है। फलस्वरूप, मनुष्य परमेश्वर से और अधिक दूर हो गया है, और परमेश्वर का और अधिक विरोधी हो गया है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "एक अपरिवर्तित स्वभाव का होना परमेश्वर के साथ शत्रुता में होना है")।

"जब सबसे पहले मनुष्य को सामाजिक विज्ञान मिला, तब से मनुष्य का मन विज्ञान और ज्ञान में व्यस्त था। फिर विज्ञान और ज्ञान मानवजाति के शासन के लिए उपकरण बन गए, और अब मनुष्य के पास परमेश्वर की आराधना करने के लिए पर्याप्त अवसर नहीं था, और परमेश्वर की आराधना के लिए अब और अनुकूल परिस्थितियाँ नहीं थीं। मनुष्यों के हृदय में परमेश्वर की स्थिति और भी नीचे हो गई थी। मनुष्य के हृदय का संसार, जिसमें परमेश्वर के लिये जगह न हो, अंधकारमय, और आशारहित है। और इसलिए, मनुष्य के हृदय और मन को भरने के लिए, सामाजिक विज्ञान के सिद्धांत, मानव विकास के सिद्धांत और अन्य कई सिद्धांतों को व्यक्त करने के लिए कई सामाजिक वैज्ञानिक, इतिहासकार और राजनीतिज्ञ उत्पन्न हो गए, जिन्होंने इस सच्चाई की अवहेलना की कि परमेश्वर ने मनुष्य की रचना की है। इस तरह, जो यह विश्वास करते हैं कि परमेश्वर ने सब कुछ बनाया है वे बहुत ही कम रह गए, और वे जो विकास के सिद्धांत पर विश्वास करते हैं उनकी संख्या और भी अधिक बढ़ गई। अधिकाधिक लोग पुराने विधान के युग के दौरान परमेश्वर के कार्य के अभिलेखों और उसके वचनों को मिथकों और पौराणिक कथाओं के रूप में मानते हैं। लोग, अपने हृदयों में, परमेश्वर की गरिमा और महानता के प्रति, और इस सिद्धांत के प्रति कि परमेश्वर का अस्तित्व है और सभी चीज़ों पर प्रभुत्व धारण करता है, उदासीन बन जाते हैं। मानवजाति का अस्तित्व और देशों एवं राष्ट्रों का भाग्य उनके लिए अब और महत्वपूर्ण नहीं रह जाते हैं। मनुष्य केवल खाने-पीने और भोग-विलासिता की खोज में चिंतित, एक खोखले संसार में रहता है। ...कुछ लोग स्वयं इस बात की खोज करने का उत्तरदायित्व ले लेते हैं कि आज परमेश्वर अपना कार्य कहाँ करता है, या यह तलाशने का उत्तरदायित्व ले लेते हैं कि वह किस प्रकार मनुष्य के गंतव्य पर नियंत्रण करता और उसे सँवारता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर सम्पूर्ण मानवजाति के भाग्य का नियन्ता है")।

"कोई भी सक्रिय रूप से परमेश्वर के पदचिह्नों को या उस प्रकटन को नहीं खोजता है जिसे परमेश्वर अभिव्यक्त करता है, और कोई भी परमेश्वर की देखभाल और सुरक्षा में रहने के लिए तैयार नहीं है। इसके बजाय, वे इस दुनिया के और अस्तित्व के उन नियमों के प्रति अनुकूल होने के लिए जिनका दुष्ट मनुष्यजाति अनुसरण करती है, उस दुष्ट, शैतान के क्षय पर भरोसा करने के लिए तैयार हैं। इस बिंदु पर, मनुष्य के हृदय और आत्मा को शैतान को श्रद्धांजलि के रूप में अर्पित किया जाता है और वे शैतान का जीवनाधार बन जाते हैं। इससे भी अधिक, मानव हृदय और आत्मा एक ऐसा स्थान बन गये हैं जिसमें शैतान निवास कर सकता है और शैतान का खेल का अनुकूल मैदान बन गया है। इस तरह, मनुष्य अनजाने में मानव होने के सिद्धांतों और मानव अस्तित्व के मूल्य और अर्थ के बारे में अपनी समझ को खो देता है। परमेश्वर के नियम और परमेश्वर और मनुष्य के बीच की वाचा धीरे-धीरे मनुष्य के हृदय में धुँधली होती जाती है, और वह परमेश्वर की तलाश करना या उस पर ध्यान देना बंद कर देता है। समय बीतने के साथ, मनुष्य की समझ चली जाती है कि परमेश्वर ने उसे क्यों बनाया है, न ही वह उन वचनों को जो परमेश्वर के मुख से आते हैं और वह सब जो परमेश्वर से आता है, उसे समझता है। मनुष्य फिर परमेश्वर के नियमों और आदेशों का विरोध करने लगता है, और उसका हृदय और आत्मा शिथिल हो जाते हैं...। परमेश्वर उस मनुष्य को खो देता है जिसे उसने मूल रूप से बनाया था, और मनुष्य अपनी शुरुआत का मूल खो देता है: यही इस मानव जाति का दुःख है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर मनुष्य के जीवन का स्रोत है")।

"हज़ारों सालों से यह गंदगी की भूमि रही है, यह असहनीय रूप से मैली है, दुःख से भरी हुई है, प्रेत यहाँ हर कोने में घूमते हैं, चालें चलते हुए और धोखा देते हुए, निराधार आरोप लगाते हुए,[1] क्रूर और भयावह बनते हुए, इस भूतिया शहर को कुचलते हुए और मृत शरीरों से भरते हुए; क्षय की बदबू ज़मीन को ढक चुकी है और हवा में शामिल हो गई है, और इसे बेहद संरक्षित[2] रखा जाता है। आसमान से परे की दुनिया को कौन देख सकता है? सभी मनुष्यों के शरीर को शैतान कसकर बांध देता है, उसकी दोनों आँखें निकाल देता है, और उसके होंठों को मज़बूती से बंद कर देता है। शैतानों के राजा ने हज़ारों वर्षों तक तबाही मचाई है, और आज भी वह तबाही मचा रहा है और इस भूतिया शहर पर करीब से नज़र रखे हुए है, मानो यह राक्षसों का एक अभेद्य महल हो; नज़र रखने वाले प्रहरी इस दौरान चमकती हुई आँखों से घूरते हैं, इस बात से अत्यंत भयभीत कि परमेश्वर उन्हें अचानक पकड़ लेगा और उन सभी को मिटा कर रख देगा, और उन्हें शांति और ख़ुशी के स्थान से वंचित कर देगा। ऐसे भूतिया शहर के लोग कैसे कभी परमेश्वर को देख सकते हैं? क्या उन्होंने कभी परमेश्वर की प्रियता और सुंदरता का आनंद लिया है? मानवीय दुनिया के मामलों की क्या कद्र है उन्हें? उनमें से कौन परमेश्वर की उत्सुक इच्छा को समझ सकता है? यह कोई आश्चर्य की बात नहीं कि देहधारी परमेश्वर पूरी तरह से छिपा हुआ है: इस तरह के अंधियारे समाज में, जहां राक्षस बेरहम और अमानवीय हैं, शैतानों का राजा, जो पलक झपकते ही लोगों को मार डालता है, वो ऐसे परमेश्वर के अस्तित्व को कैसे सहन कर सकता है जो प्यारा, दयालु और पवित्र भी है? वह परमेशवर के आगमन की वाहवाही और जयकार कैसे कर सकता है? ये दास! ये दयालुता का बदला घृणा से चुकाते हैं, उन्होंने लंबे समय से परमेश्वर की निंदा की है, वे परमेश्वर को अपशब्द बोलते हैं, वे चरमसीमा तक क्रूर हैं, उनमें परमेश्वर के प्रति थोड़ा-सा भी सम्मान नहीं है, वे लूटते हैं और डाका डालते हैं, वे सभी विवेक खो चुके हैं, और उनमें दयालुता का कोई निशान नहीं बचा, और वे निर्दोषों को अचेतावस्था की ओर मुग्ध करते हैं। प्राचीनों के पूर्वज? प्रिय नेता? वे सभी परमेश्वर का विरोध करते हैं! उनके हस्तक्षेप ने स्वर्ग के नीचे के सभी लोगों को अंधेरे और अराजकता की स्थिति में छोड़ दिया है! धार्मिक स्वतंत्रता? नागरिकों के वैध अधिकार और हित? ये सब पाप को छिपाने के तरीके हैं! ...परमेश्वर के कार्य के सामने ऐसी अभेद्य बाधा क्यों डालना? परमेश्वर के लोगों को धोखा देने के लिए विभिन्न चालों को क्यों आज़माना? वास्तविक स्वतंत्रता और वैध अधिकार और हित कहां हैं? निष्पक्षता कहां है? आराम कहाँ है? स्नेह कहाँ है? धोखेबाज़ योजनाओं का उपयोग करके परमेश्वर के लोगों को क्यों छलना? परमेश्वर के आगमन को दबाने के लिए बल का उपयोग क्यों? क्यों नहीं परमेश्वर को उस धरती पर स्वतंत्रता से घूमने दिया जाए जिसे उसने बनाया? क्यों परमेश्वर को तब तक परेशान किया जाए जब तक उसके पास आराम से सिर रखने के लिए जगह न रहे? मनुष्यों के बीच का स्नेह कहाँ है? लोगों के बीच स्वागत की भावना कहां है? परमेश्वर में इस तरह की हताश तड़प क्यों पैदा करना? परमेवर को क्यों बार-बार पुकारने पर मजबूर करना? परमेश्वर को अपने प्रिय पुत्र के लिए चिंता करने के लिए क्यों मजबूर करना? यह अंधकारमय समाज और उसके शत्रुओं के संरक्षक कुत्ते, क्यों परमेश्वर को स्वतंत्रता से इस दुनिया में आने और जाने से रोकते हैं जिसे उसने बनाया?" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "कार्य और प्रवेश (8)")।

सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने मानवजाति के भ्रष्टाचार के स्रोतों और मौजूदा स्थिति पर विस्तार से बोला है। जब हम सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों को पढ़ते हैं, तो ऐसे मसलों का हमारा ज्ञान बढ़ता है, जैसे कि दुनिया में इतना अंधेरा और बुराई क्यों है, मानवजाति इतनी कट्टरता से परमेश्वर का विरोध क्यों करती है, और शैतान द्वारा मानवजाति के भ्रष्टाचार का सत्य और सार क्या है, ठीक? इस काल की बुराई और अंधकार यह साबित करते हैं कि शैतान के हाथों मानवजाति का भ्रष्टाचार बहुत गहरा है, तो मानवजाति में ऐसे कितने लोग हैं, जिनमें परमेश्वर के प्रकटन की लालसा है और जो उनके आने का स्वागत करते हैं? ऐसे कितने लोग हैं, जो परमेश्वर के वचन को सुनना और सत्य को स्वीकार करना पसंद करते हैं? ऐसे कितने लोग हैं, जो परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य को खोज कर उसका अध्ययन करते हैं? अधिकतर लोग न केवल इन चीज़ों को नज़रअंदाज़ करते हैं, इसके विपरीत वे शैतानी सीसीपी सरकार की अफवाहों और झूठी बातों को सुनते हैं और वे सर्वशक्तिमान परमेश्वर का विरोध और निंदा करने में शैतान की ताकतों के साथ मिल कर काम करते हैं। ये ऐसे तथ्य हैं, जिनको हर कोई साफ़ तौर पर समझता है। हालांकि परमेश्वर में विश्वास करने वाले बहुत-से लोग हैं, पर ऐसे लोग कितने हैं, जो सत्य को स्वीकार कर उसकी खोज कर सकते हैं और पूरे मन से परमेश्वर को समर्पित हो सकते हैं? अगर हम उस समय को याद करें जब प्रभु यीशु अपना कार्य करने प्रकट हुए थे, सारे यहूदी लोगों ने प्रभु यीशु का विरोध और निंदा करने के लिए प्रधान पादरियों, धर्मशास्त्रियों और फरीसियों का अनुसरण किया। अंत के दिनों में जब सर्वशक्तिमान परमेश्वर अपना कार्य करने प्रकट हुए, तो धार्मिक संसार के अधिकतर पादरी और एल्डर्स अब सर्वशक्तिमान परमेश्वर का विरोध और निंदा कर रहे हैं; वे उनकी कलीसियाओं को सीलबंद करने तक का काम कर रहे हैं, और विश्वासियों को सच्चे मार्ग का अध्ययन नहीं करने दे रहे हैं। इस समय विश्व कितना अंधकारमय और बुरा है, यह दर्शाने के लिए यह काफी है। मानवजाति सत्य से ऊब, चुकी है, मनुष्य सत्य से घृणा करता है और उसने परमेश्वर को त्याग दिया है और उसके विरोध में खड़ा होना चुन लिया है। विश्व के इस अंधकार और बुराई की जड़ है मानवजाति पर शैतान का कब्जा और यह कि पूरी दुनिया उस दुष्ट के अधिकारक्षेत्र में है। पिछले कई हज़ार वर्षों में, शैतान ने मानवजाति को धोखा देने और भ्रष्ट करने के लिए, नास्तिकता, विकासवाद के सिद्धांत, और भौतिकवाद और दूसरी हानिकारक शिक्षाओं और भ्रांतियों का उपयोग किया। इस कारण से मानवजाति उन शैतानों के राजाओं और "महान विभूतियों" की आराधना और उनकी तरह-तरह की झूठी बातों और भ्रांतियों में अंधा विश्वास करने लगी है, जिन्होंने ऐसी बातें कही हैं जैसे: "कोई परमेश्वर या उद्धारकर्ता नहीं है;" "मनुष्य प्रकृति पर विजय प्राप्त कर सकता है तथा स्वर्ग और पृथ्वी के विरुद्ध लड़ाई कर सकता है" "किसी व्यक्‍ति की नियति उसी के ही हाथ में होती है।" "बुद्धिमान लोग मजबूत देह वालों पर शासन करते हैं;" "दूसरे का गला काटे बिना सफलता नहीं मिलती।" "दुनिया पैसों के इशारों पर नाचती है"; "जैसे एक छोटे मन से कोई सज्जन व्यक्ति नहीं बनता है, वैसे ही वास्तविक मनुष्य विष के बिना नहीं होता है," आदि-इत्‍यादि। इन बुरी शिक्षाओं और भ्रांतियों से मानवजाति ने धोखा खाया है और व‍ह भ्रष्ट हो गयी है, जिसने उसे अहंकारी, कपटी, स्वार्थी, लालची और धूर्त बना दिया है; ऐसा कोई मनुष्य नहीं है, जो मानवता और नैतिकता की बात करता हो, कोई नहीं जो अंतरात्मा और तर्क की बात करता हो, और कोई नहीं, जो ईमानदार होने की बात करता हो। नाम और पद की खोज में, मनुष्य आपस में कुत्तों की तरह लड़ते हैं, और वे एक-दूसरे के साथ षड्यंत्र और धोखा करते हैं; वे एक-दूसरे की हत्या तक कर देते हैं। राष्ट्र विभिन्न स्वार्थों के लिए निरंतर युद्ध लड़ते हैं। क्या यह शैतान द्वारा मानवजाति के भ्रष्टाचार का नतीजा नहीं है? ये तथ्य यह दिखाते हैं कि मानवजाति को शैतान ने बहुत गहराई तक भ्रष्ट कर दिया है और मानवजाति शैतान जैसी हो गयी है, शैतान की वंशज। मानवजाति एक दुष्ट शक्ति हो गयी है, जो परमेश्वर के विरोध में शत्रुता से खड़ी है। इस कारण से, जब परमेश्वर बोलने और मनुष्यों के बीच अपना कार्य करने के लिए दो बार देहधारी हुए, तो भ्रष्ट मानवजाति ने उनका विरोध किया, निंदा की, और दोनों मौकों पर उनको त्याग दिया, यहाँ तक कि उन्होंने उनको सूली पर चढ़ा दिया। मानवजाति के परमेश्वर का विरोध करने के पीछे ये कुछ तथ्य हैं।

सीसीपी द्वारा चमकती पूर्वी बिजली के विरुद्ध पागल दमन और हमलों ने पूरी दुनिया में हलचल मचा दी है। बहुत-से लोगों को यह समझ ही नहीं आता कि वे परमेश्वर का विरोध और खिलाफत करने के पीछे इतने दीवाने क्यों हैं। निश्चित रूप से इसलिए क्योंकि देहधारी सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने वचन देह में प्रकट हुआ में अनेक सत्य व्यक्त किये हैं और यही वह किताब है, जिसने हर धार्मिक वर्ग को हिला कर रख दिया है। प्रभु में विश्‍वास करने वाले कई लोगों ने सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के कथन सुने हैं और उन्‍हें परमेश्‍वर की वाणी और कार्य के रूप में स्‍वीकार कर, उनकी ओर मुड़ गये हैं। सर्वशक्तिमान परमेश्वर का प्रचार और उनकी गवाही देने वालों की निरंतर बढ़ती संख्या को देख कर सीसीपी डर गयी है। सुसमाचार का प्रचार करते हुए परमेश्वर की गवाही देने वाले अनगिनत लोगों को सीसीपी ने गिरफ्तार कर लिया है, और वचन देह में प्रकट हुआ की अनेक प्रतियां ज़ब्त कर ली हैं। दिन-ब-दिन वे इस किताब पर शोध करते हैं, और अधिक-से-अधिक महसूस करते हैं कि यह कितनी अजेय है। इसमें सब पर विजय पाने की क्षमता है। सीसीपी सर्वशक्तिमान परमेश्वर को चाहे जिस तरह बदनाम करने की कोशिश करे, उन पर राय थोप कर उनको बेकार कहने की कोशिश करे, वे वचन देह में प्रकट हुआ को लोगों की जानकारी में लाने की हिम्मत नहीं कर सकते। वे इस बात का ज़रा भी उल्लेख नहीं करते कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने क्या कहा। वचन देह में प्रकट हुआ की प्रतिक्रया में वे इतने शांत क्यों रहते हैं? उन्हें डर है कि पूरी दुनिया देखेगी कि परमेश्वर पूरब में अभिव्यक्त हो कर अपना कार्य कर रहे हैं, कि मानवजाति के उद्धारक पूरब में प्रकट हुए हैं, और वहीं है मानवजाति के लिए आशा की किरण। मानवजाति के वचन देह में प्रकट हुआ पढ़ने से सीसीपी क्यों डर रही है? क्योंकि यह किताब परमेश्वर की वाणी है, यह सत्य का वचन है, और यह वह सच्ची रोशनी है, जो पूरब में प्रकट हुई है! सीसीपी शैतान का शासन है, जो सबसे अधिक दुष्ट है और सत्य से सबसे अधिक घृणा करती है। उसे सबसे अधिक यह डर है कि सत्य मनुष्य की दुनिया में आ जाएगा, और यह कि मानवजाति सत्य को स्वीकार कर लेगी, कि परमेश्वर मनुष्य की दुनिया पर शासन करने के लिए सत्ता हासिल कर लेंगे, और मसीह का राज्य पृथ्वी पर प्रकट हो जाएगा। इस प्रकार, सीसीपी इतने पागलपन से मसीह का पीछा करके उनको खदेड़ती है, और सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया को अंधाधुंध तरीके से फंसाने, उस पर झूठे आरोप लगाने और बदनाम करने के लिए मीडिया नेटवर्क का उपयोग करती है वह परमेश्वर के चुनिंदा लोगों का जबरदस्त दमन, गिरफ्तारी और उत्पीड़न करने के लिए राष्ट्र के सशक्त पुलिस बल को लामबंद करने से भी नहीं चूकती। सीसीपी के उत्पीड़न के कारण, छिपने की कोई जगह न पा कर, परमेश्वर के चुने हुए लोग जबरन निर्वासित हो गए हैं, और सीसीपी के अधीन चीन की सरकार ने बाहर के हर देश में अपने दुष्ट पाँव पसार दिये हैं, और राजनीतिक, आर्थिक और कूटनीतिक साधनों का उपयोग करके कुछ पर दबाव डाला है कि वे विदेश भाग गये ईसाइयों को वापस चीन भेज दें, ताकि उनको यातना दी जा सके और उत्पीड़ित किया जा सके। इससे भी अधिक घृणित यह है कि सीसीपी, विदेश जा चुके ईसाइयों के रिश्तेदारों को गिरफ्तार कर उनका उत्पीड़न करती है और उनसे बंधकों जैसा व्यवहार करती है, जिनसे सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया को धमकाया जा सके। यह उन्‍हें अपने पासपोर्ट निकाल कर विदेश जाकर हर देश में सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर की कलीसिया को अस्‍त व्‍यस्‍त करने के लिए विवश करती है, और कूटनीतिक मार्गों से कोशिश करती है कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया पर झूठे आरोप लगा कर बदनाम किया जाए, करने की, अफवाहों से लोगों को गुमराह कर, लोकमत में हेरफेर करके उसको कलंकित किया जाए। सीसीपी दूसरे देशों की सरकारों और लोगों, दोनों को उकसाती है कि वे सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया का विरोध कर उसको नकारें, और कलीसिया के विदेशी सदस्यों को देशनिकाला दें; उसका कुटिल उद्देश्य, सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया और विदेशों में उसके सुसमाचार कार्य के प्रसार को बाधित करने, रोकने और दमन करने में सफल होना है। क्या आप सब नहीं कहेंगे कि सीसीपी राक्षसी शैतान है, जो सत्य से घृणा और परमेश्वर से नफ़रत करती है? सीसीपी लोगों से क्रूर व्यवहार और आत्माओं को निगल जाने में महारथी है; यह ऐसी राक्षसी है, जो लोगों को उनकी अस्थियों समेत खा जाती है। अब आप सब यहाँ वह सच्ची तस्वीर देख रहे हैं कि सीसीपी के अधीन चीन की सरकार इतने पागलपन के साथ सर्वशक्तिमान परमेश्वर का विरोध और निंदा करती है, ठीक?

— "राज्य के सुसमाचार पर विशिष्ट प्रश्न और उत्तर संकलन" से उद्धृत

फुटनोट:

1. "निराधार आरोप लगाते हुए" का अर्थ है वे तरीके जिनके द्वारा शैतान लोगों को नुकसान पहुँचाता है।

2. "बेहद संरक्षित" उन विधियों को दर्शाता है जिनका उपयोग करके शैतान लोगों को यातना पहुँचाता है, वे बहुत ही दुष्ट होते हैं, और लोगों को इतना नियंत्रित करते हैं कि उन्हें हिलने की जगह नहीं मिलती।

पिछला:प्रश्न 39: दो हजार वर्षों से, पूरी धार्मिक दुनिया का मानना है कि परमेश्वर एक ट्रिनिटी या रित्व है, और त्रित्व पूरे ईसाई सिद्धांत का एक उत्कृष्ट मत है। तो क्या "त्रित्व" की विवेचना सचमुच टिक पाती है? क्या त्रित्व वास्तव में मौजूद है? तुम यह क्यों कहते हो कि त्रित्व धार्मिक दुनिया का सबसे बड़ा भ्रम है?

अगला:प्रश्न 41: हमने चीनी कम्युनिस्ट सरकार और धार्मिक दुनिया के कई भाषण ऑनलाइन देखे हैं जो सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया की बदनामी और झूठी निंदा करते हैं, उन पर आक्षेप और कलंक लगाते हैं (जैसे कि झाओयुआन, शेडोंग प्रांत की "28 मई" वाली घटना)। हम यह भी जानते हैं कि सीसीपी लोगों से झूठ और गलत बातें कहने में, और तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर लोगों को धोखा देने में माहिर है, साथ ही साथ उन देशों का जिनके यह विरोध में है, उनका अपमान करने, उन पर हमला करने और उन की आलोचना करने में भी माहिर है, इसलिए सीसीपी के कहे गए किसी भी शब्द पर बिल्कुल विश्वास नहीं किया जाना चाहिए। लेकिन धार्मिक पादरियों और प्राचीन लोगों के द्वारा कही गई कई बातें सीसीपी के शब्दों से मेल खाती हैं, तो फिर हमें सीसीपी और धार्मिक दुनिया से आने वाले निन्दापूर्ण, अपमानजनक शब्दों को कैसे परखना चाहिए?

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