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सूचीपत्र

एक झूठा नेता या झूठा चरवाहा क्या होता है? एक झूठा नेता या झूठा चरवाहा कैसे पहचाना जा सकता है?

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

जो कार्य मनुष्य के मन में होता है उसे बहुत ही आसानी से मनुष्य के द्वारा प्राप्त किया जाता है। उदाहरण के लिए, धार्मिक संसार के पादरी और अगुवे अपने कार्य को करने के लिए अपनी प्रतिभाओं और पदों पर भरोसा रखते हैं। जो लोग लम्बे समय तक उनका अनुसरण करेंगे वे उनकी प्रतिभाओं के द्वारा संक्रमित हो जाएँगे और जो वे हैं उसमें से कुछ के द्वारा प्रभावित हो जाएँगे। वे लोगों की प्रतिभाओं, योग्यताओं और ज्ञान पर ध्यान केन्द्रित करते हैं, और वे कुछ अलौकिक चीज़ों और अनेक गम्भीर अवास्तविक सिद्धान्तों पर ध्यान देते हैं (निस्संदेह, ये गम्भीर सिद्धान्त अप्राप्य हैं)। वे लोगों के स्वभाव में परिवर्तनों पर ध्यान केन्द्रित नहीं करते हैं, बल्कि इसके बजाए वे लोगों के उपदेश देने और कार्य करने की योग्यताओं को प्रशिक्षित करने, और लोगों के ज्ञान और समृद्ध धार्मिक सिद्धान्तों को बेहतर बनाने के ऊपर ध्यान केन्द्रित करते हैं। वे इस बात पर ध्यान केन्द्रित नहीं करते हैं कि लोगों के स्वभाव में कितना परिवर्तन हुआ है या लोग सत्य को कितना समझते हैं। वे लोगों के सार के साथ अपने आपको नहीं जोड़ते हैं, और वे लोगों की सामान्य और असामान्य दशाओं को जानने की कोशिश तो बिल्कुल भी नहीं करते हैं। वे लोगों की अवधारणाओं का विरोध नहीं करते हैं या अपनी अवधारणाओं को प्रकट नहीं करते हैं, और वे अपनी कमियों या भ्रष्टता में सुधार तो बिल्कुल भी नहीं करते हैं। अनुसरण करने वाले अधिकांश लोग अपनी प्राकृतिक प्रतिभाओं के द्वारा सेवा करते हैं, और जो कुछ वे व्यक्त करते हैं वह ज्ञान और अस्पष्ट धार्मिक सत्य है, जिनका वास्तविकता के साथ कोई नाता नहीं है और वे लोगों को जीवन प्रदान करने में पूरी तरह से असमर्थ हैं। वास्तव में, उनके कार्य का सार प्रतिभाओं का पोषण करना, शून्य वाले किसी व्यक्ति का पोषण करके उसे एक योग्य सेमेनरी स्नातक बनना है जो बाद में कार्य और अगुवाई करने के लिए जाता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य" से उद्धृत

परमेश्वर की सेवा करना कोई सरल कार्य नहीं है। जिनका भ्रष्ट स्वभाव अपरिवर्तित रहता है वे परमेश्वर की सेवा कभी नहीं कर सकते हैं। यदि परमेश्वर के वचनों के द्वारा तुम्हारे स्वभाव का न्याय और उसे ताड़ित नहीं किया गया है, तो तुम्हारा स्वभाव अभी भी शैतान का प्रतिनिधित्व करता है। यह इस बात को प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त है कि परमेश्वर की तुम्हारी सेवा, तुम्हारी स्वयं की भलाई के अभिप्राय से है। यह सेवा तुम्हारे शैतानी स्वभाव पर आधारित है। तुम परमेश्वर की सेवा अपने प्राकृतिक स्वभाव से और अपनी व्यक्तिगत प्राथमिकताओं के अनुसार करते हो; इसके अलावा, तुम सोचते रहते हो कि जो कुछ भी तुम करना चाहते हो, उसे परमेश्वर पसंद करता है, और जो कुछ भी तुम नहीं करना चाहते हो उससे परमेश्वर घृणा करता है, और अपने कार्य में तुम पूर्णतः अपनी प्राथमिकताओं द्वारा मार्गदर्शित होते हो। क्या इसे परमेश्वर की सेवा करना कह सकते हैं? अंततः तुम्हारे जीवन स्वभाव में रत्ती भर भी सुधार नहीं आएगा; तुम और भी अधिक ज़िद्दी बन जाओगे क्योंकि तुम परमेश्वर की सेवा कर रहे हो, और इससे तुम्हारा भ्रष्ट स्वभाव गहराई तक समा जाएगा। इस तरह, तुम मन में परमेश्वर की सेवा के बारे में ऐसे सिद्धान्त विकसित कर लोगे जो मुख्यतः तुम्हारे स्वयं के चरित्र पर आधारित होते हैं, और तुम्हारे सेवा करने से तुम्हारे स्वयं के स्वभाव के अनुसार अनुभव प्राप्त होता है। यह मानवीय अनुभव का सबक है। यह मनुष्य के जीवन का दर्शन है। इस तरह के लोग फरीसियों और धार्मिक अधिकारियों से संबंधित होते हैं। यदि वे कभी भी जागते और पश्चताप नहीं करते हैं, तो अतंतः वे झूठे मसीह बन जाएँगे जो अंत के दिनों में दिखाई देंगे, और मनुष्यों को धोखा देने वाले होंगे। झूठे मसीह और धोखेबाज़, जिनके बारे में कहा गया था, इसी प्रकार के लोगों में से ही उठ खड़े होंगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "धार्मिक सेवाओं को अवश्य शुद्ध करना चाहिए" से उद्धृत

ऐसा क्यों है कि अधिकांश लोगों ने परमेश्वर के वचनों को पढ़ने में काफी मेहनत की है लेकिन उनके पास केवल ज्ञान है और बाद में किसी वास्तविक पथ के बारे में कुछ नहीं कह सकते हैं? क्या तुझे लगता है कि ज्ञान होने का अर्थ सत्य का होना है? क्या यह एक उलझा हुआ दृष्टिकोण नहीं है? तू उतना ज्ञान बोलने में सक्षम हो जाता है जितना कि समुद्र तट पर रेत है, फिर भी इसमें कोई भी वास्तविक पथ से युक्त नहीं होता है। इस में, क्या तू लोगों को मूर्ख नहीं बना रहे है? क्या तू एक खोखला प्रदर्शन नहीं कर रहा है जिसके समर्थन में कोई सार नहीं है? इस तरह का समस्त व्यवहार लोगों के लिए हानिकारक है! जितना ऊँचा सिद्धांत होता है, उतना ही यह वास्तविकता से रहित होता है, और उतना ही अधिक लोगों को वास्तविकता में ले जाने में असमर्थ होता है; जितना ऊँचा सिद्धांत होता है, उतना ही अधिक तुझसे परमेश्वर की उपेक्षा और उसका विरोध करवाता है। उत्कृष्टतम सिद्धांतों को अनमोल खजाने न समझ; वे घातक हैं, और किसी काम के नहीं है! शायद कुछ लोग उत्कृष्टतम सिद्धांतों की बात करने में सक्षम हों—लेकिन इनमें वास्तविकता का कुछ भी नहीं होता है, क्योंकि इन लोगों ने उन्हें व्यक्तिगत रूप से अनुभव नहीं किया है, और इसलिए उनके पास अभ्यास करने का कोई मार्ग नहीं है। ऐसे लोग मनुष्य को सही मार्ग पर ले जाने में असमर्थ हैं, और केवल लोगों को पथभ्रष्ट करेंगे। क्या यह लोगों के लिए हानिकारक नहीं है? कम से कम, तुझे उनकी वर्तमान परेशानियों को हल करने और उन्हें प्रवेश प्राप्त करने देने में सक्षम अवश्य होना चाहिए; केवल यही समर्पण के रूप में गिना जाता है, और तभी तू परमेश्वर के लिए कार्य करने के योग्य होगा। हमेशा आडंबरपूर्ण, काल्पनिक शब्दों में बात मत कर, और लोगों को तेरी आज्ञापालन करने पर बाध्य करने के लिए अनुपयुक्त प्रथाओं के समूहों का उपयोग मत कर। ऐसा करने का कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा, और यह केवल उनके भ्रम को बढ़ा सकता है। लोगों की इस तरह से अगुवाई करने के परिणामस्वरूप कई तरह के नियम पैदा हो जायेंगे, जिससे लोग तुझसे घृणा करेंगे। यह मनुष्य की कमी है, और यह वास्तव में अपमानजनक है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "वास्तविकता पर अधिक ध्यान केन्द्रित करो" से उद्धृत

कुछ लोग कार्य और प्रचार करते हैं, हालाँकि वे सतही तौर पर परमेश्वर के वचनों पर सहभागिता करते नज़र आते हैं, मगर वे परमेश्वर के वचनों पर मात्र शाब्दिक चर्चा कर रहे होते हैं, उनकी बातों में सार्थक कुछ नहीं होता। उनके उपदेश किसी भाषा की पाठ्य-पुस्तक की शिक्षा की तरह होते हैं; परमेश्वर के वचनों को मद-दर-मद, पहलू-दर-पहलू क्रम-बद्ध किया जाता है, और जब वे ऐसा कर लेते हैं, तो यह कहकर हर कोई उनकी स्तुति गान करता है: "इस व्यक्ति में वास्तविकता है। उसने इतने अच्छे ढंग से और इतने विस्तार से समझाया।" जब उनका उपदेश देना समाप्त हो जाता है, तो ये लोग दूसरे लोगों से इन सारी चीज़ों को इकट्ठा करके सभी को भेज देने के लिये कहते हैं। उनके कृत्य दूसरों का कपट बन जाते हैं और वे लोग जिन बातों का प्रचार करते हैं, वे सब भ्राँतियाँ होती हैं। देखने में ऐसा लगता है, जैसे ये लोग मात्र परमेश्वर के वचनों का प्रचार कर रहे हैं और यह सत्य के अनुरूप दिखता है। लेकिन अगर अधिक गौर से समझेंगे तो आप देखेंगे कि यह शब्दों और सिद्धांतों के अलावा कुछ नहीं है। यह सब इंसानी कल्पनाओं और धारणाओं के साथ झूठी विवेक-बुद्धि है, साथ ही कुछ हिस्सा ऐसा है जो परमेश्वर को सामांकित करता है। क्या इस तरह का उपदेश परमेश्वर के कार्य में बाधा नहीं है? यह एक ऐसी सेवा है जो परमेश्वर का विरोध करती है।

— "मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "सत्य के बिना परमेश्वर को अपमानित करना आसान है" से उद्धृत

तुम लोगों का ज्ञान केवल कुछ समय के लिए लोगों को पोषित कर सकता है। जैसे-जैसे समय बीतता है, यदि तुम वही एक बात कहते रहे, तो कुछ लोग इसे जान लेंगे; वे कहेंगे कि तुम अत्यधिक सतही हो, तुममें गहराई की कमी है। तुम्हारे पास सिद्धांतों की बात कहकर लोगों को धोखा देने की कोशिश करने के अलावा कोई विकल्प नहीं होगा। अगर तुम इसे हमेशा इस तरह से जारी रखोगे, तो तुम्हारे नीचे के लोग तुम्हारे तरीकों, कदमों, और परमेश्वर में विश्वास करने और अनुभव करने के तुम्हारे प्रतिमान का अनुसरण करेंगे, वे उन शब्दों और सिद्धांतों को व्यवहार में रखेंगे। अंततः, तुम जिस तरह उपदेश पर उपदेश देते चले जाते हो, वे तुम्हारा एक प्रतिमान के रूप में इस्तेमाल करेंगे। तुम सिद्धांतों की बात करने के लिए लोगों की अगुवाई करते हो, इसलिए तुम्हारे नीचे के लोग तुम से सिद्धांतों को सीखेंगे, और जैसे-जैसे बात आगे बढ़ेगी, तुम एक गलत रास्ता अपना चुके होगे। तुम्हारे नीचे के सभी लोग तुम्हारा अनुसरण करते हैं, इसलिए तुम महसूस करते हो: "मैं अब शक्तिशाली हूँ; इतने सारे लोग मेरी बात सुनते हैं, और कलीसिया मेरे इशारे पर चलती है।" मनुष्य के अंदर का यह विश्वासघात अचेतन रूप से तुम्हारे द्वारा परमेश्वर को एक नाम मात्र में बदल देता है, और तब तुम स्वयं कोई एक पंथ, कोई संप्रदाय बना लेते हो। पंथ और संप्रदाय कैसे उत्पन्न होते हैं? वे इसी तरह से बनते हैं। हर पंथ और संप्रदाय के अगुवाओं को देखो। वे सभी अभिमानी और आत्म-तुष्ट हैं, और वे बाइबल की व्याख्या संदर्भ के बाहर और उनकी अपनी कल्पना के अनुसार करते हैं। वे सभी अपना काम करने के लिए प्रतिभा और पांडित्य पर भरोसा करते हैं। यदि वे कुछ भी उपदेश करने में असमर्थ होते, तो क्या वे लोग उनका अनुसरण करते? कुछ भी हो, उनके पास कुछ ज्ञान तो है ही, और वे सिद्धांत के बारे में थोड़ा-बहुत बोल सकते हैं, या वे जानते हैं कि दूसरों को कैसे जीता जाए, और कुछ चालाकियों का उपयोग कैसे करें, जिनके माध्यम से वे लोगों को अपने सामने ले आए हैं और उन्हें धोखा दे चुके हैं। नाम मात्र के लिए, वे लोग परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, लेकिन वास्तव में वे अपने अगुवाओं का अनुसरण करते हैं। अगर वे उन लोगों का सामना करते हैं जो सच्चे मार्ग का प्रचार करते हैं, तो उनमें से कुछ कहेंगे, "हमें परमेश्वर में अपने विश्वास के बारे में हमारे अगुवा से परामर्श करना है।" देखिये, परमेश्वर में विश्वास करने के लिए कैसे उन्हें किसी की सहमति की आवश्यकता है; क्या यह एक समस्या नहीं है? तो फिर, वे सब अगुवा क्या बन गए हैं? क्या वे फरीसी, झूठे चरवाहे, मसीह-विरोधी, और लोगों के सही मार्ग को स्वीकार करने में अवरोध नहीं बन चुके हैं?

— "मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "केवल सत्य का अनुसरण ही परमेश्वर में सच्चा विश्वास है" से उद्धृत

संदर्भ के लिए धर्मोपदेश और संगति के उद्धरण:

धार्मिक तरीके से सेवा करने का अर्थ है पूरी तरह से सेवा की धार्मिक परम्परागत पद्धतियों और अभ्यासों के अनुसार सब कुछ करना, विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों का कठोरतापूर्वक पालन करना, और केवल बाइबल के ज्ञान के अनुसार लोगों की अगुवाई करना। देखने में, यह जोरदार और प्रभावकारी लगता है, इसमें धर्म की झलक आती है, यह पूर्ण रूप में लोगों की अवधारणाओं के अनुकूल है, और उन्हें इसमें कोई आपत्ति नहीं है। फिर भी यह पवित्रात्मा के कार्य से रहित है। जो लोग इस तरीके से काम करते हैं उनके द्वारा दिया जाने वाला उपदेश धार्मिक सिद्धांत और बाइबल के ज्ञान से बढ़कर कुछ नहीं है, यह धार्मिक अवधारणाओं से भरा है, इसमें पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता के बारे में कुछ नहीं है। उनके द्वारा आयोजित की जाने वाली सभाएं गतिहीन एवं निर्जीव हैं। इस तरह की सेवा के साथ, जैसे-जैसे वर्ष बीतते हैं, परमेश्वर के चुने हुए लोग तब भी सत्य से वंचित रहते हैं, उन्हे परमेश्वर का या परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता का कोई ज्ञान नहीं होता है, और उन्होंने परमेश्वर पर विश्वास के सही मार्ग में प्रवेश नहीं किया है। क्योंकि लोग जिसकी खोज करते हैं वह उद्धार नहीं बल्कि अनुग्रह और आशीषें हैं, इस सीमा तक कि उनके जीवन स्वभाव में परिवर्तनों का कोई संकेत नहीं मिलता है। अनेक वर्षों तक सेवा करके, ये लोग अभी भी खाली हाथ हैं। धार्मिक पद्धतियों के अनुसार सेवा करने का यही परिणाम होता है। स्पष्ट रूप से, इस तरह के लोग जो परमेश्वर की सेवा करते हैं वे वाकई परमेश्वर के कार्य को नहीं जानते हैं, वे परमेश्वर की इच्छा को नहीं समझते हैं। वे नहीं जानते हैं कि पवित्र आत्मा के कार्य के साथ सहयोग करने का क्या अर्थ है। यह शुद्ध रूप से अंधे की अंधे के द्वारा अगुवाई करने का मामला है। वे परमेश्वर के चुने हुए लोगों को पथभ्रष्ट कर देते हैं। वे परमेश्वर पर विश्वास तो करते हैं और फिर भी परमेश्वर का विरोध करते हैं, वे परमेश्वर को नहीं जानते हैं। फरीसियों की तरह ही, उन्हें भी बचाया नहीं जा सकता है।

सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया की कार्य-व्यवस्था के चयनित वार्षिकवृतांत में "पहले परमेश्वर में विश्वास के सही मार्ग में प्रवेश करके ही कोई व्यक्ति परमेश्वर की सेवा करने के सही मार्ग पर चल सकता है" से उद्धृत

धार्मिक दुनिया में पादरियों और अगुवाओं सभी को सेमिनरियों के भीतर प्रशिक्षित किया गया है, और वे सिर्फ पादरी होने के लिए प्रमाणित हैं। उनके पास पवित्र आत्मा के कार्य या परमेश्वर की अनुमति का प्रमाण तो बिल्कुल नहीं है। यह तथ्य है। बाइबल के बारे में कुछ समझ होना आवश्यक है, लेकिन जो बात सबसे महत्वपूर्ण है वह है कि कलीसिया की चरवाही के कार्य को करने हेतु योग्य होने के लिए किसी को भी परमेश्वर के कार्य को अवश्य जानना चाहिए। बाइबल परमेश्वर के कार्य के पहले दो चरणों का अभिलेख है, इसलिए बाइबल को पढ़े बिना, परमेश्वर के प्रकटन और उसके कार्य के ऐतिहासिक तथ्यों को समझना असंभव है। यह जानना भी असंभव है कि परमेश्वर ने अपने पिछले दो चरणों में किस सत्य को व्यक्त किया था, और सच्चाई के उन कई रहस्यों के बारे में स्पष्ट उत्तर प्राप्त करने का कोई तरीका नहीं है जिन्हें लोगों को अवश्य समझना चाहिए। यही कारण है कि परमेश्वर में विश्वास के लिए बाइबल को पढ़ना अपरिहार्य है, लेकिन बाइबल के ज्ञान से अधिक किसी और चीज़ पर भरोसा नहीं करना हमें परमेश्वर के ज्ञान को प्राप्त नहीं करवा सकता है। परमेश्वर के वचनों और सच्चाई को वास्तव में समझने और परमेश्वर का ज्ञान प्राप्त करने के लिए पवित्र आत्मा के कार्य की प्रबुद्धता, रोशनी, मार्गदर्शन, प्रशिक्षण और सिद्धता से अवश्य पूर्णता से गुज़रना चाहिए। सत्य की समझ प्राप्त करना परमेश्वर के कार्य और पवित्र आत्मा द्वारा प्रबुद्धता और रोशनी का अनुभव करने पर निर्भर करता है। यह सिर्फ बाइबिल के ज्ञान पर शोध और महारत हासिल करने के आधार पर प्राप्त नहीं होता है। धार्मिक मंडलियों में कई पादरी बाइबल की बहुत अच्छी समझ रखते हैं, किन्तु उन्हें परमेश्वर के कार्य के बारे में बिल्कुल भी समझ नहीं है। ऐसा मुख्य रूप से इसलिए है क्योंकि उनके पास पवित्र आत्मा का कार्य नहीं होता है। ऐसा क्यों है कि जब कुछ लोग परमेश्वर के वचनों को पढ़ते हैं, तो वे पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता के साथ निकलते हैं, लेकिन जब अन्य लोग परमेश्वर के वचनों को पढ़ते हैं, तो उनके पास उसका कोई भी कार्य नहीं होता है। यह उजागर करता है कि लोगों का विश्वास सच्चा है या नहीं, और वे सत्य से प्रेम करते हैं या नहीं। बहुत से लोग पादरी होने के लिए सेमिनरी में जाते हैं, और चाहे उनका सही मकसद है या नहीं, जो सबसे महत्वपूर्ण है वह है कि उन्हें अवश्य सत्य से प्रेम करना और सत्य की खोज करनी चाहिए। पवित्र आत्मा के कार्य को प्राप्त करने का यही एकमात्र तरीका है। पवित्र आत्मा के कार्य के कई वर्षों से गुज़रने के बाद ही कोई व्यक्ति वास्तव में सत्य को समझ सकता है और सत्य की वास्तविकता में प्रवेश करने में सक्षम हो सकता है। परमेश्वर के चुने हुए लोगों की अगुवाई और चरवाही करने योग्य होने का यही एकमात्र तरीका है। परमेश्वर के चुने हुए लोगों की अगुवाई करने के लिए एक पादरी के रूप में प्रमाणन पर निर्भर करना एक पूरी तरह से मानवीय धारणा है और यह परमेश्वर की स्वयं की आवश्यकताओं से एकदम अलग है। उदाहरण के लिए, जब प्रभु यीशु आया तो वह मंदिर क्यों नहीं गया और उसने यहूदी मुख्य याजकों, शास्त्रियों, और फरीसियों को क्यों नहीं बुलाया, बल्कि इसके बजाय उन लोगों की तलाश करने के लिए लोगों के बीच में गया जो प्रेरितों का पता लगाने के लिए सत्य से प्रेम करते थे और उसकी खोज करते थे? इसके भीतर से परमेश्वर की इच्छा को समझा जा सकता है। जो लोग सत्य से प्रेम नहीं करते हैं, वे सत्य को पाने में पूरी तरह से असमर्थ होते हैं, इसलिए वे परमेश्वर के चुने हुए लोगों की चरवाही करने में भी असमर्थ होते हैं। इसी तरह से स्पष्ट यह हो जाता है कि परमेश्वर किन लोगों को वास्तव में पसंद करता है, किन्हें वह वास्तव में बचाएगा, वह वास्तव में किसका उपयोग करेगा, और वह वास्तव में किससे नफ़रत करता है। धार्मिक मंडलियों में अधिकांश पादरियों में पवित्र आत्मा के कार्य का अभाव है, जो दर्शाता है कि ये वे नहीं हैं जो सत्य से प्रेम करते हैं या उसकी खोज करते हैं, और उनके पास पवित्र आत्मा के कार्य को प्राप्त करने का कोई तरीका नहीं है। यह भी प्रमुख कारणों में से एक है कि धार्मिक दुनिया में पवित्र आत्मा के कार्य का अभाव है।

— ऊपर से संगति से उद्धृत

अब मैं इस बारे में पाँच सिद्धांतों पर संगति दूँगा कि झूठे अगुवाओं को कैसे पहचाना जाए: पहला सिद्धांत है कि अधिकांश झूठे अगुआ सत्य को पसंद नहीं करते हैं और वे सत्य की खोज नहीं करते हैं, और इसलिए वे पवित्र आत्मा के कार्य से रहित हैं। उनमें से, अच्छी मानवता वाले, अल्पसंख्यक, या कुछ लोग पवित्र आत्मा के कार्य से रहित हो सकते हैं क्योंकि वे उन्होंने बस थोड़े समय तक ही परमेश्वर में विश्वास किया है, क्योंकि वे नहीं जानते कि सत्य की खोज कैसे करनी है या वे सामान्य ढंग से सत्य की खोज करने में असमर्थ होते हैं क्योंकि वे कुछ चीजों से विवश होते हैं। जिस किसी ने भी तीन से पाँच साल तक एक अगुवा के रूप में कार्य किया हो और जिसके पास अभी भी पवित्र आत्मा का कार्य नहीं हो, वह बिल्कुल ऐसा नहीं है जो सत्य से प्रेम करता है या सत्य की खोज करता है, और वह निश्चित रूप से एक झूठा अगुवा है। दूसरा सिद्धांत है कि झूठे अगुवा केवल सिद्धांतों और पत्रों का उपदेश देते हैं, वे पूरी तरह से सत्य की वास्तविकता से रहित हैं, वे समस्याओं को हल करने के लिए सत्य का उपयोग करने में बिल्कुल असमर्थ हैं, और वे लोगों को हृदय और वचन से मनवाने में असमर्थ हैं। तीसरा सिद्धांत है कि, क्योंकि वे सत्य की वास्तविकता से रहित हैं, इसलिए झूठे अगुवा किसी भी वास्तविक कार्य को करने में असमर्थ हैं और परमेश्वर के चुने हुए लोगों को सत्य की वास्तविकता में ले जाने में असमर्थ हैं। वे हमेशा अपने कार्य को लापरवाह ढंग से करते हैं और, यदि उन्हें कुछ करने के लिए बाध्य किया जाता है, तो वे दूसरों को वह करने के लिए विवश करते हैं जो उनके अधिकार-क्षेत्र से परे है, और वे दूसरों को यूँ ही फटकार लगाते हैं और उनसे निपटते हैं। क्योंकि वे सत्य से रहित हैं, वे सत्य को रख कर दूसरों को आश्वस्त नहीं सकते हैं, और इसलिए झूठे अगुवा काट-छाँट और निपटने की विधियों का उपयोग करते हैं। वे दूसरों के दोषों को पकड़ लेते हैं और लगातार उनका दमन करते हैं, एक अगुवा के रूप में अपने अधिकार को दर्शाने के लिए फटकार और दंड के माध्यम से उन्हें वश में करना चाहते हैं—यह एक झूठा अगुवा है। एक सच्चा अगुवा लोगों को समझाने के लिए सत्य का उपयोग करता है, समस्याओं को हल करने के लिए सत्य का उपयोग करता है और दूसरों द्वारा उसकी प्रशंसा की जाती है; एक झूठा अगुवा दूसरों का दमन करता है, दूसरों के दोषों को पकड़ता है और उन्हें लगातार डाँटता रहता है और परमेश्वर के वचन के खिलाफ उनसे उनकी जाँच करवाता है, और उन्हें ऐसा करने के लिए विवश महसूस करवाता है जो उनकी क्षमता से परे है। अंत में, झूठा अगुवा उन्हें अपने नियंत्रण में ले आता है और उनसे विचार करवाता है, "मेरे पास वास्तव में सत्य की वास्तविकता नहीं है। मुझमें बहुत कमी है, और मैं सत्य की खोज नहीं करता हूँ। मेरा अगुवा जो कहता है वह सही है।" वे अपने हृदय में और झूठे अगुवा की बातों से आश्वस्त हो जाते हैं, लेकिन वे वास्तव में इसलिए आश्वस्त नहीं होते हैं क्योंकि झूठे अगुवा के पास सत्य है, बल्कि इसलिए आश्वस्त हो जाते हैं क्योंकि झूठा अगुवा उनसे निपटा है और उसने उन्हें पीड़ा दी है। यह झूठे अगुवाओं द्वारा, पाखंड का उपयोग करने और झूठ को सच का आवरण देने के लिए नियोजित एक विशिष्ट साधन है। क्योंकि वे सत्य को ले कर लोगों को आश्वस्त नहीं कर सकते हैं, इसलिए उन्हें एक और तरीका अपनाना है, यह सोचकर कि, "मैं यूँ ही तुम्हारी समस्याओं को पकड़ लूँगा और तुमसे निपटूँगा, तुम्हें आश्वस्त करूँगा और मैं तुम्हें यह दर्शाने के लिए कि मेरे पास सत्य है, मैं अपने व्यवहार का उपयोग करूँगा। मैं तुम्हारे साथ इतना निपटूँगा कि तुम्हें पीटा जाएगा, और मैं तुम्हें ग़लत तरीके से विश्वास दिलाऊँगा कि मेरे पास सत्य है और तुम्हारे पास सत्य नहीं है, और तब तुम आश्वस्त हो जाओगे।" जब कोई सत्य से रहित होता है तो झूठे अगुवाओं द्वारा उसे धोखा दिया जाएगा, और सोचेगा, "वह मेरे साथ इस तरह से निपट सकता है तो निश्चित रूप से वह सत्य को मुझसे बेहतर समझता होगा, और उसके पास निश्चित रूप से सच्चाई की वास्तविकता होनी चाहिए।" और इस तरह, ऐसेलोगों को झूठे अगुवा द्वारा धोखा दिया और नियंत्रित किया जाता है। चौथा सिद्धांत है कि झूठे अगुवा परमेश्वर के चुने हुए लोगों के प्रति प्रेमपूर्ण हृदय से रहित होते हैं और वे स्वयं को सच में जानने में असमर्थ होते हैं, समस्याओं को हल करने या लोगों को वास्तविकता में ले जाने के लिए सत्य की तलाश करने में तो बिल्कुल ही असमर्थ होते हैं। वे सिर्फ लोगों के साथ निपटते हैं और आँख मूँद कर उनका दमन करते हैं, वे दूसरों की काट-छाँट करने और उनसे निपटने के साधनों का उपयोग करके दूसरों से अपने प्रति समर्पण करवाते हैं, वे अपनी हैसियत दिखाते हैं और दिखाते हैं कि वे अगुवा हैं—यह एक झूठा मुखौटा है। पाँचवाँ सिद्धांत है कि सभी झूठे अगुवा हैसियत और प्रतिष्ठा के पीछे भागते हैं, वे हैसियत के आशीषों का लालच करते हैं और वे घमंड का लालच करते हैं। वे कोई वास्तविक कार्य नहीं करते हैं, फिर भी वे मानते हैं कि उनके पास परमेश्वर के चढ़ावों का आनंद लेने की योग्यता है, और इससे वे बिल्कुल बेशर्म बन जाते हैं। जब वे कोई वास्तविक कार्य नहीं करते हैं तो क्या वे परमेश्वर के चढ़ावों का आनंद लेने के योग्य हैं? कुछ लोग रहने के लिए सबसे अमीर मेजबान परिवार ढूँढकर, उनके साथ रहते हैं, और हर दिन वे भुना हुआ चिकन और तली हुई मछली माँगते हैं—क्या वे इसके योग्य हैं? उन्होंने परमेश्वर के चुने हुए लोगों के जीवन के लिए क्या प्रावधान दिया है, और उन्होंने क्या कार्य किया है? उन्हें हर दिन खाने के लिए माँस और मछली अवश्य मिलनी चाहिए, लेकिन क्या तब वे परजीवी नहीं बन जाते हैं? क्या जो हैसियत और सुख का लालच करते हैं बेशर्म नहीं हैं? क्या इस तरह के लोगों के पास विवेक और तर्क है?

— जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति (IX) में "उद्धार पाने के लिए, एक व्यक्ति को दूसरे लोगों का अनुसरण करने और उनकी आराधना करने की समस्या का हल करना होगा" से उद्धृत

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