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अनुग्रह का युग: परमेश्वर के कार्य की सामग्री और परिणाम

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परमेश्वर के अति-उत्कृष्ट वचन:

अनुग्रह के युग में, यीशु संपूर्ण पतित मानवजाति (सिर्फ इस्राएलियों को नहीं) को छुटकारा दिलाने के लिए आया। उसने मनुष्य के प्रति दया और करुणा दिखायी। मनुष्य ने अनुग्रह के युग में जिस यीशु को देखा वह करुणा से भरा हुआ और हमेशा ही प्रेममय था, क्योंकि वह मनुष्य को पाप से मुक्त कराने के लिए आया था। जब तक उसके सूली पर चढ़ने ने मानव जाति को वास्तव में पाप से मुक्त नहीं कर दिया तब तक वह मनुष्य के पाप माफ कर सकता था। उस समय के दौरान, परमेश्वर मनुष्य के सामने दया और करुणा के साथ प्रकट हुआ; अर्थात्, वह मनुष्य के लिए एक पापबलि बना और मनुष्य के पापों के लिए सलीब पर चढ़ाया गया ताकि उन्हें हमेशा के लिए माफ कर दिया जाए। वह दयालु, करुणामय, सहनीय और प्रेममय था। और वे सब जिन्होंने अनुग्रह के युग में यीशु का अनुसरण किया था उन्होंने भी सारी चीजों में सहनीय और प्रेममय बनने की इच्छा की। उन्होंने सभी कष्ट सहे, और यहाँ तक कि यदि पीटे गए, शाप दिए गए या पत्थर मारे गए तो भी लड़ाई नहीं की।

"देहधारण के महत्व को दो देहधारण पूरा करते हैं" से

उस समय के लोगों के लिए—सभी लोगों के लिए—यीशु के पास जो था और जो यीशु स्वयं था, वह था दया और करूणामय-प्रेम। उसने कभी लोगों के अपराधों को स्मरण नहीं किया, और उनके प्रति उसका व्यवहार उनके अपराधों के आधार पर नहीं था। क्योंकि वह एक भिन्न युग था, वह प्रायः लोगों को प्रचुर मात्रा में भोजन और पेय पदार्थ प्रदान करता था ताकि वे अपने पेट भर कर खा सकें। उसने अपने सभी अनुयायियों के साथ अनुग्रह के साथ व्यवहार किया, बीमारों को चंगा किया, दुष्टात्माओं को निकाला, और मुर्दों को जिलाया। ताकि लोग उस पर विश्वास कर सकें और देख सकें कि जो कुछ भी उसने किया वह सच्चाई और ईमानदारी से किया, उन्हें यह दिखाते हुए कि उसके हाथों से मृतक भी वापस जीवित हो सकते हैं वह एक सड़ती हुई लाश को पुनः जीवित करने तक चला गया। इस तरह से उसने खामोशी से सहा और बीच में छुटकारे के अपने कार्य को किया। यहाँ तक कि इससे पहले कि उसे सलीब पर चढ़ाया जाता, यीशु ने पहले ही मानवता के पापों को अपने ऊपर धारण कर लिया था और मानवजाति के लिए एक पाप बलि बन गया था।सलीब पर चढ़ाए जाने से पहले, मानवजाति को छुटकारा दिलाने के उद्देश्य से उसने पहले से ही सलीब तक पहुँचने का मार्ग खोल दिया था। अंततः उसे सलीब पर चढ़ा दिया गया, उसने अपने आपको सलीब के वास्ते बलिदान कर दिया, और उसने अपनी सारी दया, करूणामय-प्रेम, और पवित्रता मानवजाति को प्रदान कर दी। वह मानवजाति के लिए हमेशा सहिष्णु था, कभी भी प्रतिशोधी नहीं था, बल्कि उसने उनके पापों को क्षमा किया, उन्हें पश्चाताप करने के लिए उत्साहित किया, उन्हें धैर्य, सहनशीलता और प्रेम रखना, उसके पदचिह्नों का अनुसरण करना और सलीब के वास्ते स्वंय को बलिदान करना सिखाया। अपने भाईयों और बहनों के प्रति उसका प्रेम मरियम के प्रति प्रेम से भी बढ़ कर था। उसने जो कार्य किया उसमें लोगों को चंगा करने और उनके भीतर की दुष्टात्माओं को निकालने को उसके सिद्धांत के रूप में अपनाया था, और यह सब कुछ उसके द्वारा छुटकारे के लिए था। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वह कहाँ गया, उसने उन सभी के साथ अनुग्रह का व्यवहार किया जिन्होंने उसका अनुसरण किया। उसने ग़रीबों को अमीर बनाया, लँगड़ों को चलाया, अंधों को आँख दी, और बहरों को सुनने की शक्ति दी; यहाँ तक कि उसने सबसे अधमों और कंगालों, पापियों को अपने साथ एकही मेज पर बैठने के लिए आमंत्रित किया, उन्हें दूर नहीं किया बल्कि हमेशा धैर्यवान रहा, और यह भी कहा, “जब कोई चरवाहा एक सौ में से एक भेड़ को खो देता है, तो उस एक खोई हुई को ढूँढ़ने के लिए वह निन्यानबे को छोड़ देगा, और जब वह उसे खोज लेगा तो वह बहुत आनन्दित होगा।” वह अपने अनुयायियों से ऐसा ही प्रेम करता था जैसे एक मादा भेड़ अपने मेम्नों से प्रेम करती है। यद्यपि वे मूर्ख और अज्ञानी थे, और उसकी नज़रों में पापी थे, और इसके अलावा समाज के सबसे दीन सदस्य थे, फिर भी उसने इन पापियों को—उन मनुष्यों को जिनका लोग तिरस्कार करते थे—अपनी आँख के तारे के रूप में देखा। चूँकि उसने उनका पक्ष लिया, इसलिए उसने उनके लिए अपना जीवन त्याग दिया, एक मेम्ने के समान जिसे वेदी के ऊपर बलिदान किया गया था। वह, बिना शर्त उनके प्रति समर्पण करते हुए, उन्हें अपने आप का उपयोग और अपनी हत्या करने देते हुए, उनके बीच में ऐसे घूमा-फिरा मानो कि वह उनका दास हो। अपने अनुयायियों के लिए वह प्यारा उद्धारकर्ता यीशु था, परन्तु फरीसियों के लिए, जो ऊँचे मंच से लोगों को उपदेश देते थे, वह कोई दया और करूणामय-प्रेम नहीं, बल्कि घृणा और आक्रोश दिखाता था। उसने फरीसियों के बीच बहुत काम नहीं किया, केवल कभी-कभार ही उन्हें उपदेश देता था और उन्हें डाँटता था; वह उनके बीच छुटकारे का कार्य करते हुए नहीं घूमा-फिरा, न ही चिह्न और अद्भुत काम नहीं किए। उसने अपने अनुयायियों को अपनी समस्त दया और करूणामय-प्रेग प्रदान किया, सलीब पर चढ़ाए जाने के बिल्कुल अंत समय तक वह इन पापियों के वास्ते सहता रहा था, और जब तक उसने पूरी मानवता को छुटकारा न दे दिया, तब तक हर प्रकार के अपमान को भुगतता रहा था। यह उसके कार्य का कुल योग था।

"छुटकारे के युग में कार्य के पीछे की सच्ची कहानी" से

उस समय यीशु का कार्य समस्त मानव जाति का छुटकारा था। उन सभी के पापों को क्षमा कर दिया गया था जो उसमें विश्वास करते थे; जितने समय तक तुम उस पर विश्वास करते थे, उतने समय तक वह तुम्हें छुटकारा देगा; यदि तुम उस पर विश्वास करते थे, तो तुम अब और पापी नहीं थे, तुम अपने पापों से मुक्त हो गए थे। यही है बचाए जाने, और विश्वास द्वारा उचित ठहराए जाने का अर्थ। फिर भी जो विश्वास करते थे उन लोगों के बीच, वह रह गया था जो विद्रोही था और परमेश्वर का विरोधी था, और जिसे अभी भी धीरे-धीरे हटाया जाना था। उद्धार का अर्थ यह नहीं था कि मनुष्य पूरी तरह से यीशु द्वारा प्राप्त कर लिया गया था, लेकिन यह कि मनुष्य अब और पापी नहीं था, कि उसे उसके पापों से क्षमा कर दिया गया था: बशर्ते कि तुम विश्वास करते थे, तुम कभी भी अब और पापी नहीं बनोगे।

"परमेश्वर के कार्य का दर्शन (2)" से

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