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सूचीपत्र

बाइबल कहती है कि पूरी बाइबल परमेश्वर की प्रेरणा से दी गयी है, फिर आप क्यों कहते हैं कि बाइबल में पूरी तरह से परमेश्वर के वचन नहीं हैं?

परमेश्वर के वचन से जवाब:

बाइबल की हर चीज़ परमेश्वर के द्वारा व्यक्तिगत रूप से बोले गए वचनों का लिखित दस्तावेज़ नहीं है। बाइबल सामान्यतः परमेश्वर के कार्य की पिछली दो अवस्थाओं का आलेख करती है, उसमें से एक भाग है जो पैग़म्बरों की भविष्यवाणियों का लिखित दस्तावेज़ है, और एक भाग वह अनुभव और ज्ञान है जिन्हें युगों के दौरान उन लोगों के द्वारा लिखा गया था जिन्हें परमेश्वर के द्वारा इस्तेमाल किया गया था। मानवीय अनुभवों को मानवीय अनुमानों और ज्ञान के साथ दूषित किया गया है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। बाइबल की बहुत सी पुस्तकों में मानवीय धारणाएँ, मानवीय पक्षपात, और मनुष्यों के बेतुके अनुवाद हैं। हाँ वास्तव में, बहुत सारे वचन पवित्र आत्मा के प्रकाशन और अलौकिक ज्ञान का परिणाम हैं और वे सही अनुवाद हैं - फिर भी यह अभी नहीं कहा जा सकता है कि वे पूरी तरह सत्य की सही अभिव्यक्ति हैं। कुछ निश्चित चीज़ों पर उनका दृष्टिकोण व्यक्तिगत अनुभव के ज्ञान, या पवित्र आत्मा के प्रकाशन से बढ़कर और कुछ भी नहीं है। पैग़म्बरों के पूर्वकथनों को परमेश्वर के द्वारा व्यक्तिगत रीति से निर्देशित किया गया थाः यशायाह, दानिय्येल, एज्रा, यिर्मयाह और यहेजकेल की भविष्यवाणियाँ पवित्र आत्मा के सीधे निर्देशन से आई थीं। ये लोग दर्शी थे, उन्होंने भविष्यवाणी की आत्मा को प्राप्त किया था, और वे सभी पुराने नियम के पैग़म्बर थे। व्यवस्था के युग के दौरान इन लोगों ने, जिन्होंने यहोवा की अभिप्रेरणाओं को प्राप्त किया था, अनेक भविष्यवाणियाँ की थीं, जिन्हें सीधे यहोवा के द्वारा निर्देशित किया गया था। …

…आज, लोग यह विश्वास करते हैं कि बाइबल परमेश्वर है, और परमेश्वर बाइबल है। इस प्रकार वे यह भी विश्वास करते हैं कि बाइबल के सारे वचन सिर्फ वे वचन हैं जिन्हें परमेश्वर ने कहा था, और उन सभी को परमेश्वर के द्वारा बोला गया था। वे जो परमेश्वर में विश्वास करते हैं वे यह भी मानते हैं कि यद्यपि पुराने और नए नियम की छियासठ पुस्तकों को लोगों के द्वारा लिखा गया था, फिर भी उन सभी को परमेश्वर की अभिप्रेरणा के द्वारा दिया गया था, और वे पवित्र आत्मा के कथनों के लिखित दस्तावेज़ हैं। यह लोगों का त्रुटिपूर्ण अनुवाद है, और यह तथ्यों से पूरी तरह मेल नहीं खाता है। वास्तव में, भविष्यवाणियों की पुस्तकों को छोड़कर, पुराने नियम का अधिकांश भाग ऐतिहासिक अभिलेख है। नए नियम के कुछ धर्मपत्र लोगों के व्यक्तिगत अनुभवों से आए हैं, और कुछ पवित्र आत्मा के प्रकाशन से आए हैं; उदाहरण के लिए, पौलुस के धर्मपत्र एक मनुष्य के कार्य से उदय हुए थे, वे सभी पवित्र आत्मा के प्रकाशन के परिणामस्वरूप थे, और वे कलीसिया के लिए लिखे गए थे, और वे कलीसिया के भाइयों एवं बहनों के लिए प्रोत्साहन और उत्साह के वचन हैं। वे पवित्र आत्मा के द्वारा बोले गए वचन नहीं थे - पौलुस पवित्र आत्मा के स्थान पर बोल नहीं सकता था, और न ही वह कोई पैग़म्बर था, और उसमें दिव्यदृष्टि तो बिलकुल नहीं थी। उसके धर्मपत्र इफिसुस, फिलेदिलफिया, गलातिया और अन्य कलीसियाओं के लिए लेखे गये थे। और इस प्रकार, नए नियम के पौलुस के धर्मपत्र वे धर्मपत्र हैं जिन्हें पौलुस ने कलीसियाओं के लिए लिखा था, और वे पवित्र आत्मा की अभिप्रेरणाएं नहीं हैं, न ही वे सीधे तौर पर पवित्र आत्मा के कथन हैं। वे महज प्रोत्साहन, दिलासा और उत्साह के वचन हैं जिन्हें उसने अपने कार्य की श्रृंखला के दौरान कलीसियाओं के लिए लिखा था। इस प्रकार वे उस समय पौलुस के अधिकतर कार्य के लिखित दस्तावेज़ हैं। वे प्रभु में सभी भाइयों और बहनों के लिए लिखे गए थे, और वे उस समय सभी कलीसियाओं के भाइयों एवं बहनों को उसकी सलाह को मानने और प्रभु यीशु के सभी मार्गों में बने रहने के लिए लिखे गए थे। किसी भी सूरत में पौलुस ने यह नहीं कहा कि, वे उस समय की या भविष्य की कलीसियाओं के लिए थे, और सभी को उसकी चीज़ों को खाना और पीना होगा, न ही उसने कहा कि उसके सभी वचन परमेश्वर की ओर से आए थे। उस समय की कलीसियाओं की परिस्थितियों के अनुसार, उसने साधारण तौर पर भाइयों एवं बहनों से संवाद किया था, और उनको प्रोत्साहित किया था, और उनके विश्वास को प्रेरित किया था; और उसने बस सामान्य तौर पर प्रचार किया या उन्हें स्मरण दिलाया था और उन्हें प्रोत्साहित किया था। उसके वचन उसके स्वयं के बोझ पर आधारित थे, और उसने इन वचनों के जरिए लोगों को संभाला था। उसने उस समय की कलीसियाओं के लिए प्रेरित का कार्य किया था, वह एक कर्मचारी था जिसे प्रभु यीशु के द्वारा इस्तेमाल किया गया, और इस प्रकार उसे कलीसियाओं की जिम्मेदारी दी गई थी, उसे कलीसियाओं के कार्य को करने का कार्य भार दिया गया था, उसे भाइयों एवं बहनों की परिस्थितियों के बारे में जानना था—और इसी कारण, उसने प्रभु में सभी भाइयों एवं बहनों के लिए धर्मपत्रों को लिखा था। जो कुछ भी उसने कहा था वह हितकारी था और लोगों के लिए लाभदायक एवं सही था, किन्तु यह पवित्र आत्मा के कथनों को दर्शाता नहीं था, और वह परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता था। यह एक विचित्र समझ थी, और एक भयंकर ईश्वरीय निन्दा थी, क्योंकि लोग मनुष्य के अनुभवों के लिखित दस्तावेज़ को और मनुष्य की पत्रियों को पवित्र आत्मा के द्वारा कलीसियाओं को बोले गए वचनों के रूप में ले रहे थे! जब उन धर्मपत्रों की बात आती है जिन्हें पौलुस ने कलीसियाओं के लिए लिखा था। तब यह विशेष रूप से सच है, क्योंकि उसके धर्मपत्र उस समय प्रत्येक कलीसिया की परिस्थितियों और उनकी स्थिति के आधार पर भाइयों एवं बहनों के लिए लिखे गये थे, और वे भाइयों एवं बहनों को प्रभु में प्रोत्साहित करने के लिए थे, ताकि वे प्रभु यीशु के अनुग्रह को प्राप्त कर सकें। उस समय उसके धर्मपत्र भाइयों एवं बहनों को जागृत करने के लिए थे। ऐसा कहा जा सकता है कि यह उसका स्वयं का बोझ था, और साथ ही यह वह बोझ था जिसे पवित्र आत्मा के द्वारा उसे दिया गया था; कुल मिलाकर, वह एक प्रेरित था जिसने उस समय की कलीसियाओं की अगुवाई की थी, जिसने कलीसियाओं के लिए धर्मपत्रों को लिखा था और उन्हें प्रोत्साहन दिया था - यह उसकी जिम्मेदारी थी। उसकी पहचान मात्र कलीसिया के लिए काम करने वाले की थी, वह मात्र एक प्रेरित था जिसे परमेश्वर के द्वारा भेजा गया था; वह एक पैग़म्बर नहीं था, और न ही एक पूर्वकथन कहने वाला था। अतः उसके लिए, स्वयं उसका कार्य और भाइयों एवं बहनों का जीवन सब से अधिक महत्वपूर्ण था। इस प्रकार, वह पवित्र आत्मा के स्थान पर बोल नहीं सकता था। उसके वचन पवित्र आत्मा के वचन नहीं थे, और उन्हें परमेश्वर के वचन तो बिलकुल भी नहीं कहा जा सकता था, क्योंकि पौलुस परमेश्वर के एक जीवधारी से बढ़कर और कुछ नहीं था, और वह निश्चित तौर पर परमेश्वर का देहधारी नहीं था। उसकी पहचान यीशु के समान नहीं थी। यीशु के वचन पवित्र आत्मा के वचन थे, वे परमेश्वर के वचन थे, क्योंकि उसकी पहचान मसीह-परमेश्वर के पुत्र की थी। पौलुस उसके बराबर कैसे हो सकता है? यदि लोग धर्मपत्रों या पौलुस के वचनों को पवित्र आत्मा के कथनों के रूप में देखते हैं, और परमेश्वर के रूप में उसकी आराधना करते हैं, तो सिर्फ यह कहा जा सकता है कि वे बहुत ही अधिक अविवेकी हैं। और अधिक कड़े शब्दों में कहा जाए, तो यह ईश निन्दा नहीं है तो और क्या है? एक मनुष्य परमेश्वर के बदले में कैसे बात कर सकता है? और लोग उसके धर्मपत्रों के लिखित दस्तावेज़ों और उसकी कही बातों के सामने कैसे झुक सकते हैं जैसे मानो वह कोई "पवित्र पुस्तक" या "स्वर्गीय पुस्तक" हो। क्या परमेश्वर के वचनों को एक मनुष्य के द्वारा सामान्य ढंग से बोला जा सकता है? एक मनुष्य परमेश्वर के बदले में कैसे बोल सकता है? और इस प्रकार, तुम क्या कहते हो—क्या वे धर्मपत्र जिन्हें उसने कलीसियाओं के लिए लिखा था उसके स्वयं के विचारों से दूषित नहीं हो गये होंगे? उन्हें मानवीय विचारों के द्वारा दूषित क्यों नहीं किया जा सकता है? उसने अपने व्यक्तिगत अनुभवों और अपने स्वयं के जीवन की व्यापकता के आधार पर कलीसियाओं के लिए इन धर्मपत्रों को लिखा था। उदाहरण के लिए, पौलुस ने गलातियों की कलीसिया को एक धर्मपत्र लिखा था जिस में एक निश्चित विचार था, और पतरस ने दूसरा धर्मपत्रलिखा, जिसमें एक अन्य दृष्टिकोण था। उन में से कौन पवित्र आत्मा के द्वारा आया था? कोई भी निश्चित तौर पर नहीं कह सकता है। इस प्रकार, सिर्फ इतना कहा जा सकता है कि उन दोनों के पास कलीसियाओं के लिए भार था, फिर भी उनके धर्मपत्र उनकी स्थिति को दर्शाते हैं, वे भाइयों एवं बहनों के लिए उनके नियोजन एवं सहयोग, और कलीसियाओं के प्रति उनके भार को दर्शाती हैं, और वे सिर्फ मानवीय कार्य को दर्शाती हैं; वे पूरी तरह पवित्र आत्मा की ओर से नहीं हैं। यदि तुम कहते हो कि उसके धर्मपत्र पवित्र आत्मा के वचन हैं, तो तुम बेतुके हो, और तुम ईश निन्दा कर रहे हो! पौलुस के धर्मपत्र और नए नियम के अन्य धर्मपत्र हाल ही के अधिकतर आत्मिक हस्तियों के संस्मरणों के समरूप हैं। वे वाचमैन नी की पुस्तकों या लॉरेन्स इत्यादि के अनुभवों के समतुल्य हैं। सीधी-सी बात है कि हाल ही के आत्मिक हस्तियों की पुस्तकों को नए नियम में संकलित नहीं किया गया है, फिर भी इन लोगों का सार-तत्व एक समान हैः वे ऐसे लोग थे जिन्हें एक निश्चित अवधि के दौरान पवित्र आत्मा के द्वारा इस्तेमाल किया गया था, और वे सीधे तौर पर परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकते हैं।

नए नियम में मत्ती का सुसमाचार यीशु की वंशावली को दर्ज करता है। प्रारम्भ में यह कहता है कि यीशु, दाऊद की सन्तान इब्राहीम का वंशज, और यूसुफ का पुत्र था; आगे यह कहता है कि वह पवित्र आत्मा के द्वारा गर्भ में आया था, और कुंवारी से जन्मा था-जिसका अर्थ है कि वह यूसुफ का पुत्र या इब्राहीम का वंशज नहीं था, और वह दाऊद की सन्तान नहीं था। यद्यपि वंशावली यूसुफ के साथ यीशु के संबंध पर जोर देती है। आगे, वंशावली उस प्रक्रिया को दर्ज करना प्रारम्भ करती है जिसके तहत यीशु का जन्म हुआ था। यह कहती है कि यीशु पवित्र आत्मा के द्वारा गर्भ में आया था, उसका जन्म कुंवारी से हुआ था, और वह यूसुफ का पुत्र नहीं था। फिर भी वंशावली में यह साफ साफ लिखा हुआ है कि यीशु यूसुफ का पुत्र था, और क्योंकि वंशावली यीशु के लिए लिखी गई थी, यह बयालीस पीढ़ियों को दर्ज करती है। जब यह यूसुफ की वंशावली की बात करती है, तो यह शीघ्रता से कहता है कि यूसुफ मरियम का पति था, ये शब्द यह साबित करने के लिए हैं कि यीशु इब्राहीम का वंशज था। क्या यह विरोधाभास नहीं है? वंशावली साफ साफ यूसुफ के पूर्वजों के लेखे को दर्ज करता है, यह स्पष्ट रूप से यूसुफ की वंशावली है, किन्तु मत्ती जोर देता है कि यह यीशु की वंशावली है। क्या यह उस तथ्य को नकारता नहीं है कि यीशु पवित्र आत्मा के द्वारा गर्भ में आया था? इस प्रकार, क्या मत्ती के द्वारा दी गई वंशावली मानवीय युक्ति नहीं है? यह हास्यास्पद है! इस रीति से, तुम जान गए हो कि यह पुस्तक पूरी तरह से पवित्र आत्मा के द्वारा नहीं आई थी। कदाचित्, ऐसे कुछ लोग हों जो यह सोचते है कि परमेश्वर के पास जरूर पृथ्वी पर एक वंशावली होगी, जिसके परिणामस्वरूप वे यीशु को इब्राहिम की बयालीसवीं पीढी़ के रूप में निर्दिष्ट करते हैं। यह वास्तव में हास्यास्पद है! पृथ्वी पर आने के बाद, परमेश्वर की वंशावली कैसे हो सकती है? यदि तुम कहते हो कि परमेश्वर की वंशावली है, तो क्या तुम उसे परमेश्वर के जीवधारियों के बीच में श्रेणीबद्ध नहीं करते हो? क्योंकि परमेश्वर पृथ्वी का नहीं है, वह सृष्टि का प्रभु है, और यद्यपि वह देह में आ गया है, फिर भी वह मनुष्य के सार तत्व के समान नहीं है। तुम परमेश्वर को परमेश्वर के जीवधारियों के समान ही श्रेणीबद्ध कैसे कर सकते हो? इब्राहीम परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता है; वह उस समय यहोवा के कार्य का माध्यम था, वह मात्र एक विश्वासयोग्य सेवक था जिसे परमेश्वर के द्वारा मंजूर किया गया था, और वह इस्राएल के लोगों में से एक था। वह यीशु का एक पूर्वज कैसे हो सकता है?

यीशु की वंशावली को किसने लिखा था? क्या यीशु ने स्वयं इसे लिखा था? क्या यीशु ने व्यक्तिगत रूप से उन से कहा था, "मेरी वंशावली लिखो?" यीशु को क्रूस पर कीलों से ठोंक दिए जाने के बाद इसे मत्ती के द्वारा दर्ज किया गया था। उस समय, यीशु ने बहुत सारा काम किया था जो उसके चेलों की समझ से परे था, और उसने कोई व्याख्या प्रदान नहीं की थी। उसके जाने के बाद, चेलों ने हर जगह प्रचार करना और काम करना प्रारम्भ किया, और कार्य की उस अवस्था के लिए, उन्होंने धर्मपत्रों और सुसमाचार को लिखना प्रारम्भ किया। यीशु को क्रूस पर चढ़ाए जाने के बीस से लेकर तीस साल के बाद नए नियम के सुसमाचार की पुस्तकों को दर्ज किया या लिखा गया था। उस से पहले, इस्राएल के लोग केवल पुराना नियम ही पढ़ते थे। दूसरे शब्दों में, अनुग्रह के युग में लोग पुराना नियम पढ़ते थे। नया नियम केवल अनुग्रह के युग के दौरान ही प्रकट हुआ था। जब यीशु काम करता था तब नया नियम मौजूद नहीं था; उसके पुनरूत्थान और स्वर्गारोहण के बाद ही लोगों ने उसके कार्य को दर्ज किया या लिखा था। केवल तब ही सुसमाचार की चार पुस्तकें, और उसके अतिरिक्त पौलुस और पतरस की धर्मपत्र, साथ ही साथ प्रकाशित वाक्य की पुस्तक आई थी। प्रभु यीशु के स्वर्ग जाने के केवल तीन सौ साल बाद, जब उसके बाद की पीढ़ियों ने उनके लेखों का मिलान किया था, तब नया नियम अस्तित्व में आया। जब यह कार्य पूरा हो गया केवल तभी नया नियम अस्तित्व में आया था; यह पहले मौजूद नहीं था। परमेश्वर ने वह सब कार्य किया था, प्रेरित पौलुस ने वह सब कार्य किया था, उसके बाद पौलुस और पतरस के धर्मपत्रों को एक साथ मिलाया गया था, और पतमुस के टापू में यूहन्ना के द्वारा दर्ज किए गए सबसे बड़े दर्शन को अंत में रखा गया था, क्योंकि वह अंतिम दिनों के कार्य के विषय में भविष्यवाणी करता है। ये सब बाद में आनेवाली पीढ़ियों के समायोजन थे, और वे आज के कथनों से अलग हैं। जो कुछ आज लिखाया दर्ज किया गया है वह परमेश्वर के कार्य के विभिन्न चरणों के अनुसार है; लोग आज जिसमें शामिल हैं वह ऐसा कार्य है जिसे परमेश्वर के द्वारा व्यक्तिगत रूप से किया गया है, और वे ऐसे वचन हैं जिन्हें परमेश्वर के द्वारा व्यक्तिगत रूप से कहा गया है। तुम्हें हस्तक्षेप करने की कोई आवश्यकता नहीं है-वचनों को, जो सीधे तौर पर आत्मा के द्वारा आए हैं, कदम दर कदम क्रमबद्ध किया गया है, और वे मनुष्य के लिखित दस्तावेज़ों के अभिलेखों से अलग हैं। जो कुछ उन्होंने दर्ज किया है, ऐसा कहा जा सकता है, वह उनकी शिक्षा और उनकी मानवीय योग्यता के स्तर के अनुसार था। जो कुछ उन्होंने दर्ज किया था वे मनुष्यों के अनुभव थे, और प्रत्येक के पास दर्ज करने या लिखने और जानने के लिए अपने स्वयं के माध्यम थे, और प्रत्येक का लिखित दस्तावेज़ अलग था। इस प्रकार, यदि तुम ईश्वर के रूप में बाइबल की आराधना करते हो तो तुम बहुत ही ज़्यादा नासमझ और मूर्ख हो।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "बाइबल के विषय में (3)" से

आज, आप लोगों में से कौन यह कहने की हिम्मत कर सकता है कि सभी वचन जिन्हें उन लोगों के द्वारा कहा गया था जिन्हें पवित्र आत्मा के द्वारा उपयोग किया था वे पवित्र आत्मा से आये थे? क्या किसी में ऐसी चीज़ें कहने की हिम्मत है? यदि आप ऐसी चीज़ें कहते हैं, तो फिर क्यों एज्रा की भविष्यवाणी की पुस्तक को अलग छोड़ दिया गया था, और क्यों यही चीज़ उन प्राचीन संतों एवं भविष्यवक्ताओं की पुस्तकों के साथ किया गया था? यदि वे सब पवित्र आत्मा से आये थे, तो आप लोगों ने क्यों ऐसे मनमाने ढंग से चुनाव करने की हिम्मत की है? क्या आप पवित्र आत्मा के कार्य को चुनने के योग्य हैं? इस्राएल की बहुत सारी कहानियों को भी अलग छोड़ दिया गया था। और यदि आप मानते हैं कि भूतकाल के ये लेख सब पवित्र आत्मा ही से आये थे, तो फिर क्यों कुछ पुस्तकों को अलग छोड़ दिया गया था? यदि वे सब पवित्र आत्मा से आये थे, तो उन सब को सुरक्षित रखना चाहिए, और पढ़ने के लिए कलीसियाओं के भाइयों एवं बहनों को भेजा जाना चाहिए। उन्हें मानवीय इच्छा के द्वारा चुना या अलग नहीं छोड़ा जाना चाहिए; ऐसा करना गलत है। यह कहना कि पौलुस एवं यूहन्ना के अनुभव उनके व्यक्तिगत अवलोकन के साथ घुल-मिल गए थे इसका यह मतलब नहीं है कि उनके अनुभव एवं ज्ञान शैतान से आये थे, परन्तु बात केवल यह है कि उनके पास ऐसी चीज़ें थीं जो उनके व्यक्तिगत अनुभवों एवं अवलोकन से आई थीं। उनका ज्ञान उस समय के वास्तविक अनुभवों की पृष्ठभूमि के अनुसार था, और कौन आत्म विश्वास के साथ कह सकता था कि यह सब पवित्र आत्मा ही से आया था। यदि चारों सुसमाचार पवित्र आत्मा से आये थे, तो ऐसा क्यों था कि मत्ती, मरकुस, लूका और यूहन्ना प्रत्येक ने यीशु के कार्य के बारे कुछ अलग कहा था? यदि आप लोग यह नहीं मानते हैं, तो फिर आप बाईबिल के लेखों में देखिये कि किस प्रकार पतरस ने यीशु का तीन बार इन्कार किया था: वे सब भिन्न हैं, और उनमें से प्रत्येक के पास उनकी अपनी विशेषताएं हैं।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "पद नामों एवं पहचान के सम्बन्ध में" से

आज, मैं इस रीति से बाइबल की चीरफाड़ कर रहा हूँ और इसका अर्थ यह नहीं है कि मैं इस से नफरत करता हूँ, या सन्दर्भ के लिए इसके मूल्य को नकारता हूँ। अंधकार में रखे जाने से तुम्हें रोकने के लिए मैं तुम्हारे लिए बाइबल के अंतर्निहित मूल्यों और इसकी उत्पत्ति की व्याख्या कर रहा हूँ। क्योंकि बाइबल के बारे में लोगों के अनेक दृष्टिकोण हैं, और उनमें से अधिकांश ग़लत हैं; इस तरह से बाइबल पढ़ना न केवल उन्हें उन चीज़ों को प्राप्त करने से रोकता है जो उन्हें प्राप्त करनी चाहिए, बल्कि, अधिक महत्वपूर्ण यह है, कि यह उस कार्य में भी बाधा डालता है जिसे करने का मैं इरादा करता हूँ। यह भविष्य के कार्य के लिए एक बहुत ही जबर्दस्त उपद्रव है, और केवल कमियाँ प्रदान करता है, लाभ नहीं। इस प्रकार, जो मैं तुम्हें शिक्षा दे रहा हूँ वह केवल बाइबल के मुख्य तत्व और उसके भीतर की कहानी है। मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि तुम बाइबल मत पढ़ो, या तुम आस-पास जाकर यह घोषणा करो कि यह पूर्णतः मूल्य विहीन है, बल्कि यह कि तुम्हारे पास बाइबल का सही ज्ञान और दृष्टिकोण हो। बहुत अधिक एक तरफा न बनो! यद्यपि बाइबल इतिहास की एक पुस्तक है जो मनुष्यों के द्वारा लिखी गई थी, फिर भी यह बहुत से सिद्धांतों को जिनके द्वारा प्राचीन संतों और नबीयों ने परमेश्वर की सेवा की, और साथ ही परमेश्वर की सेवा में हाल ही के प्रेरितों के अनुभवों को भी प्रलेखित करती—इन लोगों के द्वारा इन सभी चीज़ों को वास्तव में देखा और जाना गया था, और सच्चे मार्ग का अनुसरण करने में वे इस युग के लोगों के लिए एक सन्दर्भ के रूप में कार्य कर सकते हैं।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "बाइबल के विषय में (4)" से

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