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परमेश्वर की आवाज़ सुनें और प्रभु यीशु की वापसी का स्वागत करें!

सत्य को खोजने वाले सभी लोगों का हम से सम्पर्क करने का स्वागत करते हैं

धार्मिक विश्वास की निंदा करने के लिए सामन्ती अन्धविश्वास के प्रयोग में सीसीपी के इरादे

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वांग ज़ुईबिन (एक मत-आरोपण शिक्षक): अब, हम पैंलोंग म्युनिसिपल कानूनी शिक्षा केंद्र के डायरेक्टर, हे हॉन्गचांग को यहाँ आमंत्रित करते हैं, बोलने के लिए।

ही होंगचैंग (मत-आरोपण केन्द्र का निदेशक): मेरे छात्रो, शुभ दिन। लगता है आजकल लोग परमेश्वर पर विश्वास करने लगे हैं जोकि नास्तिकता के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती है इससे, हमारी पार्टी और समाज, दोनों के लिए, संकट खड़ा हो गया है। ईसाइयों की शिक्षा और सुधार हमारी सरकार के लिए, एक बहुत बड़ी प्राथमिकता बन गए हैं। इसलिए, सरकार ने इस पर काफी संसाधन लगाये हैं, ताकि चीन में, सब जगह, "विचार-शिक्षा सुधार पाठ्यक्रम", स्थापित किये जा सकें। विश्वविद्यालयों के प्रोफेसरों, व्याख्याताओं और पादरियों को ख़ास तौर से आप ईसाइयों को शिक्षा देने के लिए, और नास्तिकता शिक्षा लागू करने के लिए काम पर लगाया गया है, ताकि आप लोग मार्क्सवाद-लेनिनवाद को, समझ पायें और विज्ञान का अध्ययन कर सकें, जिससे आपके आस्तिक विचारों, और नज़रिये को, ख़त्म किया जा सके, ज़िंदगी के बारे में आपके नज़रिये और आपके उसूलों में सुधार करके, आपको ऐसे नास्तिकों में तब्दील कर दिया जाए, जो कम्युनिस्ट पार्टी में विश्वास करते हों, जो कम्युनिस्ट पार्टी के साथ चलते हों, और कम्युनिस्ट नेतृत्व के तहत समाज के परिवार में मिल-जुल कर रह सकें। सिर्फ इसी से आपका भविष्य अच्छा बन पायेगा। आपको पार्टी और सरकार का शुक्रिया अदा करना चाहिए। आपको हमारे देश की शिक्षा को स्वीकार कर, जितना जल्दी हो सके, समाज में वापस आने की कोशिश करनी चाहिये। मैं अब घोषणा करता हूँ, ईसाइयों के लिए पैंलोंग नगर में, विचार शिक्षा सुधार पाठ्यक्रम आधिकारिक रूप से, शुरू, हो गया है!

वांग ज़ुईबिन: अब हम आमंत्रित करते हैं प्रॉविंस एकेडेमी ऑफ़ सोशल साइंसेज़ के, प्रोफ़ेसर स्वन यौन्गली को! कि हमें सिखाएं।

सुन योंगली (सामाजिक विज्ञान अकादमी का प्राध्यापक): प्यारे दोस्तो, प्लीज़ हर वक्त, चौकन्ने न रहें। कक्षा में, मैं आपका शिक्षक हूँ, लेकिन मैं आपका दोस्त भी हूँ। आपको, मेरी समझायी हर बात पर गंभीरता से गौर करना चाहिए। अगर आपके मन में कोई सवाल हो, तो बेझिझक पूछें। मैं मार्क्सवाद-लेनिनवाद नास्तिकता के, उपयोग से आपके सवालों, संदेहों पर आपकी मदद करूंगा। और अब हम, औपचारिक रूप से शुरू करेंगे।

आप सब परमेश्वर में विश्वास करते हैं; और मैं मार्क्स और लेनिन में मैंने, तरह-तरह की धार्मिक आस्थाओं पर शोध किया है। अपने कई सालों के शोधकार्य के जरिये, मैंने एक समस्या देखी है। सभी धर्म किसी न किसी, परमेश्वर में विश्वास करते हैं। लेकिन परमेश्वर के तमाम विश्वासियों में से किसी ने भी, परमेश्वर को नहीं देखा है। उनकी आस्था सिर्फ भावनाओं की बुनियाद पर टिकी है। इसलिए, मैं धार्मिक आस्था के बारे में, इस नतीजे पर पहुंचा हूँ: धर्म विशुद्ध रूप से, काल्पनिक और अंधविश्वास है जिसका विज्ञान में, कोई आधार नहीं है। आज के समाज में विज्ञान बहुत विकसित है। गलतियाँ न करें इसके लिए हर चीज़ को, विज्ञान पर आधारित होना चाहिए। कम्युनिस्ट पार्टी इसमें विश्वास करती है। हम परमेश्वर में विश्वास नहीं करते। दी इंटरनेशनेल में लिखा है: "कभी भी दुनिया का उद्धार करनेवाला कोई नहीं हुआ, न देवता, न सम्राट, जिन पर भरोसा किया जा सके। मानवजाति को खुश रहने के लिए, खुद अपने भरोसे रहना होगा!" दी इंटरनेशनेल में साफतौर से लिखा है, "कभी भी दुनिया का उद्धार करनेवाला कोई नहीं हुआ।" हमारे पूर्वज परमेश्वर में जिस वजह से विश्वास करते थे, वह मुख्य रूप से यह है कि उस वक्त वे सूर्य, चंद्रमा और तारे जैसे अजूबों से रूबरू थे, जिनकी कोई वैज्ञानिक व्याख्या नहीं थी। इसलिए उनके दिलो-दिमाग में, अति-प्राकृतिक शक्तियों को लेकर डर और अचरज पैदा हो गया। इस तरह से धर्म की शुरुआती धारणाएं बनीं। यही नहीं, जब इंसान कुदरती तबाहियों और बीमारियों जैसी मुश्किलें हल नहीं कर पाये, तब उन्होंने परमेश्वर को आदर देकर आध्यात्मिक सहूलियत खोजी। यह है धर्म का उद्भव। हम देख सकते हैं कि यह तार्किक या वैज्ञानिक नहीं था। आजकल हम ज़्यादा विकसित हैं विज्ञान ने बड़ी तरक्की की है। उड़ान और अंतरिक्ष उद्योग, बायोटेक्नॉलॉजी, जेनेटिक इंजिनियरिंग, और चिकित्सा जैसे क्षेत्रों में, मानवजाति ने बहुत तरक्की की है। पहले हम नहीं समझते थे और हमारे पास समस्याएँ हल करने के तरीके नहीं थे। लेकिन अब हम हर चीज़ को विज्ञान के जरिये समझा सकते हैं, और हल के लिए हम विज्ञान पर भरोसा करते हैं। विज्ञान और टेक्नॉलॉजी के इस युग में, परमेश्वर में विश्वास करना, क्या यह अज्ञानी होना, नहीं है? क्या आपको नहीं लगता आप पीछे छूट जाएंगे? हम सिर्फ विज्ञान में विश्वास कर सकते हैं, बस। क्या आप मानेंगे?

चांग मींगदाओ (एक ईसाई): प्रोफ़ेसर, मैं अपने नज़रिये पर चर्चा करना चाहता हूँ, करूं?

सुन योंगली: बहुत अच्छा, बहुत अच्छा। आप जो भी कहना चाहें, साझा कर सकते हैं। चांग मींगदाओ, प्लीज़ बोलिये।

चांग मींगदाओ: प्रोफ़ेसर, आप कहते हैं कि हमारी आस्था लोगों के विज्ञान को न समझने के कारण है, और अतिप्राकृतिक शक्तियों का सामना करने के डर और अचरज से पैदा होती है और यह अंधविश्वास है। यह सही नहीं है और निराधार है। धर्म और अंधविश्वास, जिसकी आप बात करते हैं दोनों अलग-अलग हैं। आप कम्युनिस्ट, धार्मिक आस्था को सिर्फ अंधविश्वास कह कर उसकी निंदा करते हैं और उस पर बंदिश लगाते हैं। मेरे ख्याल से यह बेतुका है। दुनिया के मुख्य धर्मों में, यहूदी धर्म, कैथोलिक धर्म और ईसाई धर्म, ये सभी परमेश्वर और प्रभु यीशु में विश्वास करते हैं। सिर्फ यही है असली धार्मिक आस्था। तीन हज़ार साल पहले, व्यवस्था के युग में, परमेश्वर के कार्य ने यहूदी धर्म को जन्म दिया। इस्राएली लोगों ने परमेश्वर की वाणी को सुना, और उनका नाम जाना। उन्होंने हमेशा यहोवा परमेश्वर से प्रार्थना की, और यहोवा द्वारा घोषित आदेशों का पालन किया। उन सबने यहोवा परमेश्वर की आराधना की। हम इसकी जांच कर सकते हैं कि यहूदी धर्म व्यवस्था के युग में परमेश्वर के कार्य की वजह से शुरू हुआ। जब अनुग्रह का युग आया, तब परमेश्वर प्रभु यीशु के रूप में देहधारी हुए, और कार्य शुरू किया। सूली पर चढ़ा देने पर, उन्होंने मानवजाति के लिए प्रायश्चित किया। बहुत-से लोगों ने उनमें आस्था प्रकट की और तब प्रभु यीशु की कलीसिया बनी। सैकड़ों साल बाद, ईसाई धर्म, कैथोलिक धर्म, और पूर्वी रूढ़िवादी कलीसिया का विकास हुआ। ये संसार के सबसे बड़े धर्म हैं। ये सभी प्रभु यीशु के छुटकारे के कार्य से पैदा हुए। अंत के दिनों के सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने सत्य व्यक्त किया है और न्याय किया है, और बहुत-से लोगों पर विजय पायी और उन्हें बचाया है। जो लोग सच्चा विश्वास करते हैं, उन्होंने उनकी वाणी को सुना है, और वे परमेश्वर के सिंहासन के समक्ष आये हैं। इस प्रकार सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया का आगमन हुआ। इन सच्चाइयों से साबित होता है कि धार्मिक आस्था पूरी तरह से परमेश्वर के प्रकट होने और कार्य से पैदा हुई। अनगिनत ईसाइयों के जीवन अनुभवों द्वारा परमेश्वर के प्रकटन और कार्य की जांच होती है। कोई भी ताकत, परमेश्वर की कलीसिया, या परमेश्वर के चुने हुए लोगों को, गिरा नहीं सकती या उन्हें रोक नहीं सकती। यह एक तथ्य है। इतिहास की शुरुआत से ही, परमेश्वर इंसानों को रास्ता दिखाने, छुटकारा दिलाने और उन्हें बचाने का कार्य करते रहे हैं। परमेश्वर का प्रकटन और कार्य आगे बढ़ने के लिए हम सबकी अगुवाई करता है। कोई भी इन सच्चाइयों को नकार नहीं सकता। प्रोफ़ेसर, धार्मिक आस्था पर शोध करना आपकी विशेषज्ञता है। आपको ये बातें समझनी चाहिए। आप ये कहकर कि धार्मिक आस्था अज्ञानता से पैदा हुई है, ऐतिहासिक तथ्यों से छेड़छाड़ क्यों कर रहे हैं? क्या ऐसा कहना बेतुका नहीं है?

शू श्यांगक्वांग (एक ईसाई): प्रोफ़ेसर स्वन, आपने इतने सालों तक धार्मिक आस्था का अध्ययन किया है। लेकिन ऐसा नहीं लगता कि कोई सकारात्मक नतीजा निकला है। आप तो अंधविश्वास और धर्म में भी फर्क नहीं कर पा रहे हैं। इससे पता चलता है कि आप धर्म को नहीं समझते। इन दिनों, ज़्यादा-से-ज़्यादा लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं। दुनिया की एक-तिहाई आबादी से भी ज़्यादा लोग विश्वास करते हैं। दुनिया के महानतम वैज्ञानिक ईसाई रहे हैं, जैसे कि न्यूटन, गैलीलियो, और कोपरनिकस। क्या आप इन लोगों को अंधविश्वासी कहेंगे? वे विज्ञान में विश्वास नहीं करते थे? विज्ञान भौतिक संसार के अनुसंधान के नतीजे पैदा करता है, लेकिन उसमें आध्यात्मिक क्षेत्र की खोजबीन करने की ताकत नहीं है। परमेश्वर में हमारी आस्था विज्ञान की बुनियाद पर नहीं है। बल्कि हमारी आस्था परमेश्वर के वचनों और कार्य की बुनियाद पर है। पवित्र बाइबल परमेश्वर के कार्य की गवाही है, और परमेश्वर के कार्य के मानवजाति के अनुभव का ऐतिहासिक दस्तावेज है। बाइबल में नबियों ने हज़ारों साल पहले भविष्यवाणी कर दी थी कि अंत के दिनों में क्या होगा। ये भविष्यवाणियाँ सच साबित हो रही हैं, जो हमें दर्शाता है कि परमेश्वर का प्रकटन और कार्य वास्तविक है, और परमेश्वर ही मानवजाति और पूरे ब्रह्मांड पर शासन करते हैं। इसे नकारा नहीं जा सकता।

सुन योंगली: आपका दावा है कि परमेश्वर ने हर चीज़ की रचना की और सब पर शासन करते हैं। मुझे तो यह, नज़र नहीं आता। विज्ञान ने इसकी जांच नहीं की है, मैं इस पर यकीन नहीं करूंगा। मैं सिर्फ ये मानता हूँ कि हर चीज़ कुदरत ने रची है और उसका क्रमिक विकास हुआ है। जैसी कि कहावत है, "वचन कुछ और नहीं हवा हैं; देखकर ही यकीन होता है।" जो चीज़ देखी नहीं जा सकती, उसका अस्तित्व नहीं हो सकता। आइए, परमेश्वर के विश्वासियों पर गौर करें। भले ही तमाम लोग विश्वास कर लें, मगर परमेश्वर को किसने देखा है? परमेश्वर किसके सामने प्रकट हुए हैं? परमेश्वर को किसी ने नहीं देखा। इससे साफ़ ज़ाहिर है कि परमेश्वर का अस्तित्व नहीं है। अगर वाकई परमेश्वर का अस्तित्व है, तो इतने सारे उपकरणों से वैज्ञानिक अब तक उन्हें देख क्यों नहीं पाये हैं? क्या आप इसे समझा सकते हैं? अगर नहीं, तो परमेश्वर में आपकी आस्था, सिर्फ इंसानी कल्पना पर आधारित है। यह इस कहावत की तरह है, "अगर आप, विश्वास करें, तो है और न करें, तो नहीं है।" मेरे ख्याल से, सभी आस्थाएं ऐसी ही हैं।

हैन डॉन्गमे (एक ईसाई): प्रो…प्रोफ़ेसर, आपका दावा है, कि अगर लोग परमेश्वर को नहीं देख सकते, तो उनका अस्तित्व नहीं है। लेकिन जब आप नकली पैसे जला कर कब्रिस्तानों में बंदगी करते हैं, तब क्या आपको मरे हुए इंसान की आत्मा नज़र आती है? भविष्य जानने के लिए बुरी आत्माओं के पीछे भागकर, क्या आप मृत आत्माओं की दुनिया देख सकते हैं? अगर नहीं, तो फिर आप नकली पैसे क्यों जलाते हैं, बंदगी करते हैं, और ज्योतिषियों को खोजते-फिरते हैं? आप बार-बार कहते हैं, कि परमेश्वर का अस्तित्व नहीं है, और एक बड़े पैमाने पर नास्तिकता का उपदेश देते हैं, लेकिन निजी ज़िंदगी में, आप नकली परमेश्वरों में विश्वास करते हैं, और बुरी आत्माओं की आराधना करते हैं। क्या आप अपनी इन हरकतों से झूठ फैलाकर अपने लोगों को धोखा नहीं दे रहे हैं? आप साफ़ देखते हैं कि सच्चे परमेश्वर के वचन और कार्य सत्य हैं, और वे मानवजाति को प्रकाश और उद्धार देते हैं। फिर भी आप जिद पर अड़कर नास्तिकता के नाम पर, सच्चे परमेश्वर में आस्था को नकारते और उसका विरोध करते हैं, और धार्मिक आस्था को दबा, कर ईसाइयों पर अत्याचार करते हैं। आखिरकार, क्या यह एक समस्या नहीं है? प्रोफ़ेसर स्वन, क्या आप हमें ये समझा सकते हैं? परमेश्वर आत्मा हैं; हालांकि हम उनके आध्यात्मिक शरीर को नहीं देख सकते, परंतु हम परमेश्वर को अपने वचन बोलते हुए सुन सकते हैं, और उनके कार्य को देख सकते हैं। इन तथ्यों का खंडन नहीं किया जा सकता। हज़ारों सालों से, परमेश्वर बोलते आ रहे हैं, वो इंसानो को राह दिखा रहे हैं, और उन्हें बचाते आ रहे हैं, और सब इंसानों के भाग्य पर शासन करते आये हैं। परमेश्वर ने बहुत-से कार्य भी प्रकट किये हैं। इंसानी अनुभवों और इन चीज़ों के व्यवहारिक ज्ञान ने, कई कहावतों को जन्म दिया है, जैसे कि "स्वर्ग की इच्छा पर भरोसा करें," "ईश्वर की इच्छा के आगे, मनुष्य दुर्बल है," "इंसान बीज बो सके है, पर फसल ईश्वर भरोसे है," "ईश्वर हमेशा राह दिखाये," "ईश्वर की योजना के आगे हमारी एक न चले," "इंसान का भविष्य सितारों में लिखा होता है," वगैरह। इस सबसे यह साबित होता है, कि एक शासक है, जो हमारी पूरी दुनिया को सजाता, और उसका प्रबंध करता है, मानवजाति की अगुवाई करते हुए, उसे आशीर्वाद, और पोषण देता है। बार-बार, सुनी जानेवाली ऐसी कहावतें भी हैं, "ऊपरवाला देख रहा है," "जैसे लोग काम करें, वैसे ऊपरवाला देखे," और "जैसा काम करोगे वैसा ही फल मिलेगा।" इस सबसे साबित होता है, कि परमेश्वर,सृजन के प्रभु हैं, और परमेश्वर ने हमेशा से सभी चीज़ों पर शासन किया है। परमेश्वर सब पर, निगरानी रखते हैं। परमेश्वर लोगों के कारनामों के मुताबिक़ उन्हें सज़ा देते हैं, और उनकी किस्मत का फैसला करते हैं। प्रोफ़ेसर स्वन, आपको इतना अनुभव है। आप इन सच्चाइयों को स्वीकार क्यों नहीं करते?

चांग मींगदाओ: प्रोफेसर, आपका कहना है कि चूंकि परमेश्वर दिखाई नहीं देते, इसलिए उनका अस्तित्व नहीं है। यह सही नहीं है। क्या आपने परमेश्वर के कार्य की खोज की है? क्या आपने पवित्र बाइबल और वचन देह में प्रकट होता है को पढ़ा है? बाइबल में कहा गया है, "आदि में वचन था, और वचन परमेश्वर के साथ था, और वचन परमेश्वर था" (यूहन्ना 1:1)। हालांकि, इंसानों ने परमेश्वर के आत्मा को नहीं देखा है, वे परमेश्वर की वाणी को सुन सकते हैं, परमेश्वर द्वारा व्यक्त वचनों को देख सकते हैं, और परमेश्वर के कार्यों को अनुभव कर सकते हैं। हज़ारों सालों में, परमेश्वर ने, तीन चरणों में कार्य किया है। इस्राएइल में, उन्होंने व्यवस्था के युग का कार्य किया था, और इस्राएलियों के सामने, अपनी व्यवस्थाओं, और आदेशों की घोषणा की थी। अनुग्रह के युग में, देहधारी परमेश्वर ने, छुटकारे का कार्य किया। आस्था के जरिये बहुत-से लोगों के पाप माफ़ कर दिये गये। उन्होंने परमेश्वर की मौजूदगी में, ज़िंदगी बितायी, और उनकी शांति और खुशी का आनंद लिया। राज्य के युग में, परमेश्वर ने, फिर से देहधारण किया है, सत्य बोलने, और न्याय का कार्य करने शुद्ध करने और बचाने के लिए। परमेश्वर ने बहुत-से काम किये हैं। लोगों को ये काम नज़र क्यों नहीं आते? लोग अभी भी ये दावा कैसे कर सकते हैं, कि परमेश्वर का अस्तित्व नहीं है? परमेश्वर में विश्वास के लिए, हम सिर्फ आँखों के भरोसे नहीं रहते। हमारी आस्था मुख्य रूप से परमेश्वर के कार्य पर आधारित होती है। देहधारी परमेश्वर ने बहुत-से वचन कहे हैं। परमेश्वर के वचन, लोगों के कथनों से अलग होते हैं। कोई इंसान ऐसे वचन नहीं कह सकता। परमेश्वर के वचनों में, अधिकार और सामर्थ्य होता है। वे हर दिन पूरे होते हैं। परमेश्वर के कार्य का प्रत्येक चरण बहुतों को बचाता है, और उन्हें परमेश्वर के समक्ष लाता है, ताकि वे उनके अस्तित्व को समझ सकें, और उनके स्वभाव को जान सकें। इन्हीं कारणों से ज़्यादा-से-ज़्यादा लोग परमेश्वर की शरण में आते हैं। आप इस वास्तविकता को कैसे नहीं समझ पाते? प्रोफ़ेसर स्वन अगर मंज़ूर हो तो मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कुछ वचन साझा करूंगा। जब आप ये वचन सुनेंगे, तब आप परमेश्वर द्वारा हर चीज़ के सृजन और उस पर शासन के बारे में बेहतर ढंग से समझ सकेंगे।

हुआ वीगुओ (मत-आरोपण केन्द्र के सुरक्षा विभाग का प्रमुख): चांग मींगदाओ, क्या आप यहाँ सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों को फैलाने की सोच रहे हैं? आप देख रहे हैं यह कौन-सी जगह है? मेरी आपसे गुजारिश है कि शिक्षक के व्याख्यान को ध्यान से सुनें, और शिक्षा और सुधार को, स्वीकार करें। इस एहसान की तारीफ़ करें।

सुन योंगली: जाने दें, फ़िक्र न करें। कैप्टन हमारे छात्र को अपनी बात पूरी कर लेने दें। चांग मींगदाओ आप बोलिए, हम लोग सुनेंगे। ऐसा है कि मैं सीखना चाहता हूँ कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने क्या वचन कहे हैं।

चांग मींगदाओ: सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं: "इस विशाल ब्रह्मांड में ऐसे कितने प्राणी हैं जो सृष्टि के नियम का बार-बार पालन करते हुए, एक ही निरंतर नियम पर चल रहे हैं और प्रजनन कार्य में लगे हैं। जो लोग मर जाते हैं वे जीवितों की कहानियों को अपने साथ ले जाते हैं और जो जीवित हैं वे मरे हुओं के वही त्रासदीपूर्ण इतिहास को दोहराते रहते हैं। मानवजाति बेबसी में स्वयं से पूछती हैः हम क्यों जीवित हैं? और हमें करना क्यों पडता है? यह संसार किसके आदेश पर चलता है? मानवजाति को किसने रचा है? क्या वास्तव में मानवजाति प्रकृति के द्वारा ही रची गई है? क्या मानवजाति वास्तव में स्वयं के भाग्य के नियंत्रण में है? …मनुष्य नहीं जानता कि ब्रह्मांड की सत्ता किसके पास है, मानवजाति की उत्पत्ति और भविष्य तो वह बिल्कुल नहीं जानता। मानवजाति सिर्फ मजबूरन इन नियमों के अधीन रहती है। न तो इससे कोई बच सकता है और न ही कोई इसे बदल सकता है, क्योंकि इन सबके मध्य और स्वर्ग में केवल एक ही शाश्वत सत्ता है जो सभी पर अपनी सम्प्रभुता रखती है। और ये वह है जिसे कभी भी मनुष्य ने देखा नहीं है, जिसे मानवजाति ने कभी जाना नहीं है, जिसके अस्तित्व में मनुष्य ने कभी भी विश्वास नहीं किया, फिर भी वही एक है जिसने मानवजाति के पूर्वजों को श्वास दी और मानवजाति को जीवन प्रदान किया। वही मानवजाति के अस्तित्व के लिए आपूर्ति और पोषण प्रदान करता है, और आज तक मानवजाति को मार्गदर्शन प्रदान करता आया है। इसके अलावा, उसी और सिर्फ़ उसी पर मानवजाति अपने अस्तित्व के लिए निर्भर करती है। इस ब्रह्माण्ड में उसी की सत्ता है और हर प्राणी पर उसी का शासन है। वह चारों मौसमों पर उसी का अधिकार है और वही वायु, शीत, बर्फ और बरसात संचालित करता है। वही मानवजाति को धूप प्रदान करता है और रात्रि लेकर आता है। उसी ने स्वर्ग और पृथ्वी की नींव डाली, मनुष्य को पहाड़, झील और नदियां तथा उसमें जीवित प्राणी उपलब्ध कराए। उसके कार्य सभी जगह हैं, उसकी सामर्थ्य सभी जगह है, उसका ज्ञान चारों ओर है, और उसका अधिकार भी सभी जगह है। प्रत्येक नियम और व्यवस्था उसी के कार्य का मूर्त रूप है, और उनमें से प्रत्येक उसकी बुद्धि और अधिकार प्रगट करता है। कौन है जो उसके प्रभुत्व से बच सकता है? कौन है जो उसकी रूपरेखा से मुक्त रह सकता है? प्रत्येक चीज़ उसकी निगाह में है और सभी कुछ उसकी अधीनता में है उसके कार्य और शक्ति मनुष्य के पास सिवाय यह मानने के और कोई विकल्प नहीं छोड़ते कि वास्तव में उसका अस्तित्व है और हर चीज़ पर उसी का अधिकार है" (वचन देह में प्रकट होता है)।

डॉन्ग वे। (एक ईसाई): प्रोफ़ेसर स्वन, मैं भी सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों को साझा करना चाहूंगी। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं: "जब से मनुष्य अस्तित्व में आया, परमेश्वर अपने कार्य में लगा हुआ है, इस ब्रह्माण्ड का प्रबंधन करता और सभी बातों के परिवर्तन एवं संचालन में निर्देश देता है। सभी बातों की तरह, परमेश्वर से मनुष्य चुपचाप और अनजाने में मिठास, बारिश और ओस का पोषण प्राप्त करता है। सभी बातों के समान, मनुष्य अनजाने में परमेश्वर के हाथ की योजनाओं की अधीनता में रहता है। मनुष्य का हृदय और आत्मा परमेश्वर के हाथ में है और मनुष्य का सम्पूर्ण जीवन परमेश्वर की आंखों के सामने है। चाहे तुम इस बात पर विश्वास करो या न करो, सभी चीजों में, चाहे वे जीवित हों या मृत, बदलाव, परिवर्तन, नवीनीकरण और विलोपन परमेश्वर की इच्छा से होता है। इस प्रकार से परमेश्वर सभी बातों पर शासन करता है" (वचन देह में प्रकट होता है)।

ली चुन्यी (एक ईसाई): सर्वशक्तिमान परमेश्वर यह भी कहते हैं: "हालाँकि मानवता यह नहीं मानती है कि परमेश्वर अस्तित्व में है, इस सत्य को स्वीकार नहीं करती है कि सृष्टिकर्ता ने हर एक चीज़ को बनाया है और हर एक चीज़ पर प्रभुता करता है, और इसके अतिरिक्त सृष्टिकर्ता के अधिकार के अस्तित्व को नहीं पहचानती है, फिर भी मानव वैज्ञानिक, खगोलशास्त्री, और भौतिक विज्ञानी और भी अधिक खोज कर रहे हैं कि इस विश्व में सभी चीज़ों का अस्तित्व, और वे सिद्धान्त और नमूने जो उनकी गतिविधियों का आदेश देते हैं, उन सभी पर एक विशाल और अदृश्य अंधकारमय ऊर्जा के द्वारा शासन और नियंत्रित किया जाता है। यह सत्य मनुष्य को बाध्य करता है कि वह इस बात का सामना करे और स्वीकार करे कि इन गतिविधियों के नमूनों के मध्य एक सामर्थी परमेश्वर है, जो हर एक चीज़ का आयोजन करता है। उसका सामर्थ्य असाधारण है, और हालाँकि कोई उसके असली चेहरे को नहीं देख सकता है, फिर भी वह प्रत्येक क्षण हर एक चीज़ पर शासन और नियन्त्रण करता है। कोई भी व्यक्ति या ताकत उसकी संप्रभुता से परे नहीं जा सकती है। इस सत्य का सामना करते हुए, मनुष्य को यह पहचानना चाहिए कि वे नियम जो सभी चीज़ों के अस्तित्व पर शासन करते हैं उन्हें मनुष्यों के द्वारा नियन्त्रित नहीं किया जा सकता है, किसी के द्वारा बदला नहीं जा सकता है; और उसी समय मनुष्य को मानना चाहिए कि मानव इन नियमों को पूरी तरह से समझ नहीं सकते हैं। और वे प्राकृतिक रूप से घटित नहीं होते हैं, बल्कि एक प्रभु और मालिक के द्वारा नियन्त्रित किए जाते हैं" (वचन देह में प्रकट होता है)।

"साम्यवाद का झूठ" फ़िल्म की स्क्रिप्ट से लिया गया अंश

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