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ईसाई कैसे सीसीपी के नास्तिक मत-परिवर्तन पर पलटवार करते हैं

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युआन हुआ (कानूनी शिक्षा विद्यालय का अध्यक्ष): शियाओ चियांग, आप चिंता ना करें, हम यहाँ आपसे पूछताछ करने नहीं आए। हम सिर्फ आपसे बात करना चाहते हैं। आपको जो भी परेशानी हुई है, वो सब मुझे बताएं। मैं आपकी मदद करने की पूरी कोशिश करूंगा।

शिक्षक चेन (कानूनी शिक्षा विद्यालय का शिक्षक): हाँ, अगर आप कुछ कहना चाहती हैं तो साफ़-साफ़ बता दीजिये। हमारे प्रेसिडेंट युआन एक दयालु व्यक्ति हैं।

जियांग शिनयी (एक ईसाई): मेरे पास कहने के लिए कुछ भी नहीं है। आप नास्तिक हैं जो परमेश्वर पर विश्वास करनेवालों की भाषा नहीं समझ सकते। हमारे बीच कोई बातचीत हो भी सकती है या नहीं, इस बारे में मुझे संदेह है।

अध्यक्ष युआन: शियाओ चियांग, आप ऐसा नहीं कह सकतीं। आप एक पत्रकार हैं और मैं एक स्कूल का प्रेसिडेंट हूँ। हम दोनों ही समझदार लोग हैं। कुछ मामलों में हम अभी भी बात कर सकते हैं। दिल से कहूँ तो, मुझे आपके लिए सहानुभूति है। आप एक उच्च शिक्षित महिला हैं जो पत्रकारिता जैसे सम्मानित पेशे में रही हैं। यह कितनी बड़ी बात है! पत्रकारों को बेताज बादशाह माना जाता है जो काफ़ी असर डाल सकते हैं। आपकी कलम किसी को भी नेता या किसी उद्योग को मशहूर बना सकती है। यह किसी को रातों-रात शोहरत दे सकती है। हर स्तर के नेता पत्रकारों को पसंद करते हैं। मैं सच कह रहा हूँ ना? एक पत्रकार हर स्तर के नेताओं के साथ अक्सर संपर्क में रहता है और उसके पास करियर में आगे बढ़ने के काफी मौके होते हैं। इसे ही हम "कूटनीतिक नज़रिया" कहते है। अगर कोई पत्रकार कम्युनिस्ट पार्टी के साथ हाथ मिला ले, तो उसकी प्रगति की कोई सीमा नहीं है। वह हमारे मुकाबले बेहतर स्थिति में होता है। शियाओ चियांग, आप एक समझदार और होशियार महिला हैं। मुझे समझ नहीं आ रहा कि आप इतना अच्छा पेशा छोड़कर परमेश्वर में विश्वास करना कैसे चुन सकती हैं? इस वक्‍त ज़रा अपने आपको देखिए, एक सम्मानित पत्रकार बनने के बजाय, परमेश्वर में विश्वास करने की वजह से आज आप एक कैदी हैं। क्या ये अपमानजनक नहीं है? परमेश्वर पर विश्वास करने की वजह से गिरफ्तार होकर खुद का भविष्य बर्बाद कर लेना, क्या एक बचकानी हरकत नहीं है? आपको क्‍या लगता है? आज, मैं यहाँ आपकी मदद करने के लिए आया हूँ। आपको बस परमेश्वर में अपने विश्वास के बारे में साफगोई से बता कर, पश्चाताप के एक पत्र पर दस्‍तखत करना है और इस बात की गारंटी देनी है कि आप फिर से परमेश्वर पर विश्वास नहीं करेंगी, ऐसा करने पर हम आपको तुरंत घर जाने देंगे। आप आज़ाद हो जायेंगी। साथ ही, मैं, आपके विभाग में बात करने की ज़िम्मेदारी भी लेता हूँ, ताकि आपका एक रिपोर्टर का रुतबा आपको वापस मिले और आप एक उज्जवल भविष्य की ओर उन्नति करती रहें। इस बारे में आपके क्या विचार हैं?

शिक्षक चेन: शियाओ चियांग, हमारे प्रेसिडेंट युआन प्रांतीय सरकार के नेताओं के पसंदीदा व्यक्ति हैं। ये आपकी खुशकिस्मती है कि प्रेसिडेंट युआन आपकी मदद करने के लिए तैयार हैं। आपको इस मौके का फायदा उठाना चाहिए।

जियांग शिनयी: प्रेसिडेंट युआन, आप सरकारी अधिकारी हैं, और मैं एक पार्टी के अख़बार की रिपोर्टर रह चुकी हूँ। हम दोनों के पास जीवन के कुछ अनुभव हैं। इस अँधेरे और बुरे समय में, रोशनी कहाँ है? न्याय कहाँ है? कोई व्यक्ति सार्थक जीवन कैसे जी सकता है? मैं अक्सर इन सवालों के बारे में सोचती हूँ। मैं सीधे तौर पर ये सोचती थी कि एक रिपोर्टर होने के नाते, कुछ व्‍यावहारिक बातें करके और कुछ सामाजिक समस्‍याओं पर ध्‍यान आकर्षित करके, मैं लोगों के लिए काम कर सकती हूँ और उनके लिए आवाज़ उठा सकती हूँ। लेकिन इस पेशे में आने के बाद, मैं साफ तौर पर देख सकती हूँ कि एक ऐसे देश में जहाँ सीसीपी सत्ता में है, समाचार मीडिया, ख़ासकर पार्टी की मीडिया, सिर्फ़ पार्टी की ज़बान बोलती है, इसका लोगों के लिए आवाज़ उठाने और उनके लिए कुछ करने से कोई सरोकार नहीं है। रिपोर्टर सिर्फ़ अपने विवेक के खिलाफ़ जाकर झूठ का जाल रच सकते हैं, कम्युनिस्ट पार्टी का गुणगान कर सकते हैं, और जनता को धोखा दे सकते हैं। अगर कोई रिपोर्टर पार्टी के खिलाफ़ जाने की हिम्मत करके लोगों के बारे में सच्ची बात करता है और असली हालातों की रिपोर्ट करता है, तो उस पर पाबंदी लगा दी जाती है। अच्छी-से-अच्छी स्थिति में भी उसकी नौकरी जाना और जेल जाना तय रहता है और बुरी-से-बुरी स्थिति में उसकी जान भी जा सकती है। पत्रकारिता के क्षेत्र में यह एक खुला रहस्य है। विवेकपूर्ण रिपोर्टर गुस्से में हैं, लेकिन वे सच बोलने की हिम्मत नहीं रखते। इस कड़वी सच्चाई ने मुझे बहुत पीड़ित किया और उलझन में डाला है। जैसी कि कहावत है, "अच्छे लोगों के साथ अच्छा होता है और बुरे के साथ बुरा।" जो लोग झूठ बोलने में सीसीपी का अनुसरण करते हैं और बुरे काम करते हैं उनको दैवीय प्रकोप का सामना करना होगा। जब से मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन पढ़े है, मैंने पाया है कि, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन ही सत्य हैं। मैं जानती हूँ कि अंत के दिनों में परमेश्वर का देहधारण मानव जाति का शुद्धिकरण और उद्धार करने के लिए है, ताकि मानव जाति को पापों से मुक्त किया जा सके। मानव जाति को बचाने के लिए यह एक अच्छा मौका है। अगर मनुष्य सत्य को स्वीकार नहीं करता, बल्कि सांसारिक पापों में उलझा रहता है, तो उसका अंत आपदाओं में नष्ट होने के अलावा और कुछ नहीं हो सकता। जब मैं एक रिपोर्टर थी, तब मैं आजीविका के साथ-साथ नाम और रुतबा पाने के लिए विवेकहीन तरीके से लोगों को फंसाती और उन्‍हें धोखा देती थी। मेरे अपने विवेक ने मुझे दोषी ठहराया। मेरा मन काफ़ी परेशान और अशांत था। अगर मैं कम्युनिस्ट पार्टी का अनुसरण करती रहती, तो मेरे भविष्य में निश्चित रूप से नरक का दंड ही लिखा था। इसलिए मैंने परमेश्वर के कार्य को स्वीकार करने का फ़ैसला किया और इस काम को छोड़ दिया। मैंने परमेश्वर पर विश्वास करने का विकल्प चुना और जीवन में सही मार्ग को अपनाया। प्रेसिडेंट युआन, अगर आप परमेश्वर के अस्तित्व के बारे में नहीं जानते, परमेश्वर में विश्वास के अर्थ को नहीं समझते, तो आप सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन पढ़ सकते हैं, तब आप परमेश्वर और सत्य के अस्तित्व को पहचान पाएंगे। आप जान सकेंगे कि मनुष्य कहाँ से आया है, और कहाँ जा रहा है। आप जान सकेंगे कि परमेश्वर से प्रशंसा पाने के लिए कैसे जीते हैं और एक अच्छी मंजि़ल तक कैसे पहुँचते हैं।

अध्यक्ष युआन: शियाओ चियांग, आप परमेश्वर पर कुछ सालों से ही विश्वास कर रही हैं। आप अभी भी एक नौसिखिया ही हैं। मैं अपनी ज़्यादातर ज़िंदगी गुजार चुका हूँ और दशकों तक धर्मों का अध्ययन किया है। मैं आपको ज़िम्मेदारी से बता सकता हूँ, इस दुनिया में कोई परमेश्वर नहीं है, और ना ही कोई उद्धारक है। परमेश्वर पर विश्वास करने का पूरा मामला ही बहुत उलझा हुआ है। यह पूरी तरह से अव्यावहारिक है। हम दोनों ही समझदार व्यक्ति हैं; हमें मामलों को तथ्यों और विज्ञान के आईने में देखना चाहिए। हमें भौतिकवाद और डार्विनवाद जैसे वैज्ञानिक सिद्धांतों पर विश्वास करना चाहिए। क्या आप इसे नहीं मानती? आपको परमेश्वर पर विश्वास करने की क्‍या ज़रूरत है? हम कम्युनिस्ट सिर्फ नास्तिकता और विकास के सिद्धांतों पर विश्वास करते हैं। आपको पता होना चाहिए कि डार्विन का विकास का सिद्धांत मानव जाति के इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण वैज्ञानिक सिद्धांतों में से एक है। विकास के सिद्धांत के अनुसार, हम निश्चित रूप से कह सकते हैं कि सब कुछ प्रकृति के कार्य से बना है। मनुष्य प्रकृति के जैविक विकास की प्रक्रिया की सांयोगिक उत्‍पत्ति है। मनुष्य का विकास वानरों से हुआ है। इसके लिए पर्याप्त सैद्धांतिक आधार है। इससे पता चलता है कि मनुष्य को परमेश्वर ने नहीं बनाया था। बाइबल में लिखे हुए वचन मिथक और दंतकथाएं हैं, जिन्हें गंभीरता से नहीं लिया जा सकता। शियाओ चियांग, मैं आपको भौतिकवाद और डार्विनवाद के बारे में और ज़्यादा जानने की सलाह देता हूँ। ये बहुत ही व्यावहारिक सिद्धांत हैं जो दुविधाओं को दूर कर सकते हैं। मुझे लगता है कि जब आप इसे साफ तौर पर देखेंगी, तब आप धार्मिक विश्वासों को ठीक तरह से समझ पाएंगी और भ्रामक आस्था से बाहर आ जाएँगी। सिर्फ़ सीसीपी का अनुसरण करके ही आपका भविष्य अच्छा होगा।

जियांग शिनयी: सीसीपी एक नास्तिक पार्टी है। यह स्वाभाविक रूप से भौतिकवाद और डार्विनवाद पर विश्वास करती है। लेकिन इसका परिणाम क्या है? अधिकांश लोगों ने भौतिकवाद और डार्विनवाद को त्याग दिया है, नकार दिया है। ज्‍़यादा-से-ज्‍़यादा लोग परमेश्वर को स्वीकार कर रहे हैं और परमेश्वर की ओर लौट रहे हैं। ज्‍़यादा-से-ज्‍़यादा लोग परमेश्वर के वचन को सत्य मानते हैं। अब दुनिया अंत के दिनों तक पहुँच चुकी है। परमेश्वर का कार्य अब अंतिम चरण में है। परमेश्वर अपने सभी कर्मों को दिखाएंगे, ताकि अंत के दिनों में लोग यह देख सकें कि स्वर्ग और पृथ्वी पर सारी चीजें परमेश्वर ने बनाई थी, और सभी चीजों पर परमेश्वर का शासन है। जैसा कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं: "इस विशाल ब्रह्मांड में ऐसे कितने प्राणी हैं जो सृष्टि के नियम का बार-बार पालन करते हुए, एक ही निरंतर नियम पर चल रहे हैं और प्रजनन कार्य में लगे हैं। जो लोग मर जाते हैं वे जीवितों की कहानियों को अपने साथ ले जाते हैं और जो जीवित हैं वे मरे हुओं के वही त्रासदीपूर्ण इतिहास को दोहराते रहते हैं। मानवजाति बेबसी में स्वयं से पूछती हैः हम क्यों जीवित हैं? और हमें करना क्यों पडता है? यह संसार किसके आदेश पर चलता है? मानवजाति को किसने रचा है? क्या वास्तव में मानवजाति प्रकृति के द्वारा ही रची गई है? क्या मानवजाति वास्तव में स्वयं के भाग्य के नियंत्रण में है?…हज़ारों सालों से मानवजाति ने बार-बार ये प्रश्न किए हैं। दुर्भाग्य से, मानवजाति जितना अधिक इन प्रश्नों के जूनून से घिरती गई, विज्ञान के लिए उसके भीतर उतनी ही अधिक प्यास उत्पन्न होती गई है। देह के लिए विज्ञान संक्षिप्त संतुष्टि और क्षणिक आनन्द प्रदान करता है, परन्तु मानवजाति को तनहाई, अकेलेपन और उसकी आत्मा में छुपे आतंक और गहरी लाचारी को दूर करने के लिए काफी नहीं। मानवजाति ऐसे विज्ञान के ज्ञान का उपयोग महज इसलिए करती है कि नग्न आंखों से देख सके और दिमाग उसके हृदय को चेतनाशून्य कर सके। फिर भी ऐसा वैज्ञानिक ज्ञान मानवजाति को रहस्यों का पता लगाने से रोक नहीं सकता है। मनुष्य नहीं जानता कि ब्रह्मांड की सत्ता किसके पास है, मानवजाति की उत्पत्ति और भविष्य तो वह बिल्कुल नहीं जानता। मानवजाति सिर्फ मजबूरन इन नियमों के अधीन रहती है। न तो इससे कोई बच सकता है और न ही कोई इसे बदल सकता है, क्योंकि इन सबके मध्य और स्वर्ग में केवल एक ही शाश्वत सत्ता है जो सभी पर अपनी सम्प्रभुता रखती है। और ये वह है जिसे कभी भी मनुष्य ने देखा नहीं है, जिसे मानवजाति ने कभी जाना नहीं है, जिसके अस्तित्व में मनुष्य ने कभी भी विश्वास नहीं किया, फिर भी वही एक है जिसने मानवजाति के पूर्वजों को श्वास दी और मानवजाति को जीवन प्रदान किया। वही मानवजाति के अस्तित्व के लिए आपूर्ति और पोषण प्रदान करता है, और आज तक मानवजाति को मार्गदर्शन प्रदान करता आया है। इसके अलावा, उसी और सिर्फ़ उसी पर मानवजाति अपने अस्तित्व के लिए निर्भर करती है। इस ब्रह्माण्ड में उसी की सत्ता है और हर प्राणी पर उसी का शासन है। वह चारों मौसमों पर उसी का अधिकार है और वही वायु, शीत, बर्फ और बरसात संचालित करता है। वही मानवजाति को धूप प्रदान करता है और रात्रि लेकर आता है। उसी ने स्वर्ग और पृथ्वी की नींव डाली, मनुष्य को पहाड़, झील और नदियां तथा उसमें जीवित प्राणी उपलब्ध कराए। उसके कार्य सभी जगह हैं, उसकी सामर्थ्य सभी जगह है, उसका ज्ञान चारों ओर है, और उसका अधिकार भी सभी जगह है। प्रत्येक नियम और व्यवस्था उसी के कार्य का मूर्त रूप है, और उनमें से प्रत्येक उसकी बुद्धि और अधिकार प्रगट करता है। कौन है जो उसके प्रभुत्व से बच सकता है? कौन है जो उसकी रूपरेखा से मुक्त रह सकता है? प्रत्येक चीज़ उसकी निगाह में है और सभी कुछ उसकी अधीनता में है। उसके कार्य और शक्ति मनुष्य के पास सिवाय यह मानने के और कोई विकल्प नहीं छोड़ते कि वास्तव में उसका अस्तित्व है और हर चीज़ पर उसी का अधिकार है" (वचन देह में प्रकट होता है)।

शियाओ ही (कानूनी शिक्षा विद्यालय का शिक्षण सहायक): चियांग चिन्यी, आप यहाँ भी सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन की गवाही दे रही हैं। क्या आप इसे भी हमारे सामने सुसमाचार के प्रचार का मौका समझती हैं? क्या आप नहीं देख पा रही हैं कि ये कैसी जगह है।

जियांग शिनयी: अभी-अभी, प्रेसिडेंट युआन ने कहा कि वे यहाँ मुझसे पूछताछ करने नहीं आए हैं। वे यहाँ मुझसे अपने दिल की बातें करने आए हैं। इसी वजह से मैंने आपसे परमेश्वर के वचन कहे हैं क्योंकि मैं अपने मन की कुछ बातें करना चाहती थी। मैंने आपको दोस्त समझा और मन की बात कह दी। क्या आप इससे नाख़ुश हैं?

शियाओ ही: आप …

अध्यक्ष युआन: शियाओ ज़ियांग, मैं बहुत खुश हूँ कि आप हमें दोस्त समझती हैं। कृपया आगे कहें।

जियांग शिनयी: दुनिया की रचना के बाद, परमेश्वर ने तीन चरणों में कार्य किया है। परमेश्वर ने अपने कार्य के हर चरण में कई सत्यों को प्रकट किया हैं। सम्पूर्ण बाइबल व्यवस्था के युग और अनुग्रह के युग में परमेश्वर के कार्यों का एक दस्‍तावेज़ है। फिर सर्वशक्तिमान परमेश्वर आए और अंत के दिनों में न्याय का कार्य किया, मानव जाति के शुद्धिकरण और उद्धार के लिए सारे सत्यों को व्यक्त किया, जिनमें से ज़्यादातर सत्य वचन देह में प्रकट होता है पुस्तक में दर्ज़ हैं। हालांकि, हम परमेश्वर का आध्यात्मिक शरीर नहीं देख सकते, मगर जब परमेश्वर कार्य करने के लिए प्रकट होते हैं, तब हम हर युग में परमेश्वर द्वारा बोले गए सभी वचनों को देख सकते हैं। यह बाइबल के इन वचनों को पूरा करता है: "आदि में वचन था, और वचन परमेश्वर के साथ था, और वचन परमेश्वर था" (यूहन्‍ना 1:1)। शैतान द्वारा मानव जाति को भ्रष्ट किये जाने के बाद से, परमेश्वर मानव जाति को बचाने के लिए वचन बोल रहे और कार्य कर रहे हैं। व्यवस्था के युग में परमेश्वर ने इसराइल में कार्य किया और पृथ्वी पर मानव जाति के जीवन का मार्गदर्शन करने के लिए व्यवस्था और आज्ञाओं का प्रचार किया। अनुग्रह के युग में, परमेश्वर ने प्रभु यीशु के रूप में देहधारण किया और यहूदिया में छुटकारे का कार्य किया। अंत के दिनों में, सर्वशक्तिमान परमेश्वर देह रूप में प्रकट हुए हैं और चीन में अपना कार्य कर रहे हैं बाइबल मे दर्ज़ परमेश्वर के वचन और वचन देह में प्रकट होता है पुस्तक में लिखे अंत के दिनों में व्‍यक्‍त किये गए परमेश्वर के वचन वे तथ्य हैं जो मनुष्य का मार्गदर्शन करने और उसे बचाने के लिए परमेश्वर दुनिया में कहते हैं और करते हैं। अगर परमेश्वर की आत्मा नहीं होती तो, ऐसे शक्तिशाली और अधिकार पूर्ण वचन कौन कह सकता है? मनुष्य परमेश्वर की आत्मा को देख नहीं सकता, लेकिन वह परमेश्वर की आत्मा द्वारा व्यक्त किए गए वचन को सुन सकता है। यह इस बात को साबित करने के लिए काफ़ी है कि परमेश्वर मानव जाति का मार्गदर्शन करने और उसे बचाने के लिए वचन बोल रहे और कार्य रहे हैं। परमेश्वर के वचन के अनुसार, मनुष्य केवल परमेश्वर पर ही भरोसा कर सकता है। जब वह दिल से परमेश्वर से प्रार्थना करता है, तब वह पवित्र आत्मा के कार्य और परमेश्वर के अस्तित्व को महसूस कर सकता है। आपने न तो परमेश्वर पर विश्वास किया है, न बाइबल और परमेश्वर के वचन को पढ़ा है, और ना ही परमेश्वर से प्रार्थना की है, इसलिए आप परमेश्वर के अस्तित्व को महसूस नहीं कर सकते। अंत के दिनों में, लोगों से बात करने और उनके बीच रहकर कार्य करने के लिए, परमेश्वर ने मनुष्य के पुत्र के रूप में देहधारण किया है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर द्वारा व्यक्त किए गए सभी वचन अधिकार और सामर्थ्य के साथ सत्य हैं जिन्हें और कोई नहीं कह सकता। यह इस बात को साबित करता है कि वे परमात्मा हैं जो वचन बोलते हैं, और यह परमेश्वर की आत्मा है जो देह रूप में आकर अपना कार्य कर रही है। वचन देह में प्रकट होता है पुस्तक में व्‍यक्‍त सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद मैं साफ तौर पर यह महसूस कर सकती हूं कि ये वचन परमेश्वर के मुख से निकले हैं। वे परमेश्वर ही थे जो मानव जाति से बात कर रहे थे। इसलिए मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर को स्वीकार किया। एक दशक से अधिक समय तक परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने के बाद, मैंने परमेश्वर के वचन के अधिकार और सामर्थ्य को महसूस किया है, और पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता का अनुभव किया है। मैंने परमेश्वर के अद्भुत कार्यों को देखा है। मेरे दिल में, परमेश्वर का अधिकार, सामर्थ्‍य, सर्वशक्तिमत्‍ता और प्रभुत्व, सब कुछ बहुत वास्‍तविक हैं! ऐसा कहा जा सकता है कि वे सभी लोग जिनके पास दिल और आत्मा है, परमेश्वर द्वारा रचित सभी चीजों और परमेश्वर द्वारा व्यक्त किए गए सभी सत्यों के माध्यम से, परमेश्वर के सच्चे अस्तित्व और सभी चीजों पर परमेश्वर के प्रभुत्व के तथ्यों को देख सकते हैं। प्रभु यीशु ने कहा था, "आकाश और पृथ्‍वी टल जाएँगे, परन्‍तु मेरी बातें कभी न टलेंगी" (मत्‍ती 24:35)। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं: "स्वर्ग और पृथ्वी शायद ख़त्म हो जाएँ लेकिन जो मैं कहता हूँ उसका एक भी शब्द या अक्षर कभी ख़त्म नहीं होगा" (वचन देह में प्रकट होता है)। इस तथ्‍य की वज़ह से कि परमेश्वर की हर भविष्यवाणी और हर वचन पूरा और सत्य हो रहा है, यह देखा जा सकता है कि केवल परमेश्वर के वचन ही सत्य हैं। संपूर्ण मानव जाति को परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्‍ता और प्रभुत्व को देखना चाहिए।

अध्यक्ष युआन: शियाओ चियांग, आपने जो कुछ भी कहा, वह बेशक बहुत अच्छा और उचित है। लेकिन मैंने न तो परमेश्वर को देखा है, और न ही ये देखा है कि परमेश्वर कैसे कार्य करते हैं और कैसे दुनिया पर प्रभुत्व रखते हैं। मेरे लिए परमेश्वर को समझना और स्वीकार करना मुश्किल है। इतने सालों तक धार्मिक विश्वासों का अध्ययन करने के बाद, मुझे लगता है कि धार्मिक विश्वास सिर्फ़ एक आध्यात्मिक सहारा है और मानव जाति की आध्यात्मिक शून्यता को भरने का एक साधन मात्र है। जिन्‍होंने भी परमेश्वर पर विश्वास रखा, क्या वे अंत में मर नहीं गये? किसी ने भी नहीं देखा कि कौन सा व्यक्ति स्वर्ग गया और कौन सा नरक। मैं सभी धार्मिक मान्यताओं को बहुत ही अस्पष्ट और अवास्तविक समझाता हूँ। वैज्ञानिक विकास और मनुष्य की प्रगति के साथ, हो सकता है कि धार्मिक विश्वासों को छोड़ और हटा दिया जाएगा। हमें अभी भी विज्ञान पर विश्वास करने की ज़रूरत है। केवल विज्ञान ही ऐसा सत्य और वास्तविकता है, जिससे कोई भी इन्कार नहीं कर सकता। हालांकि, विज्ञान ने परमेश्वर के अस्तित्व से इन्कार नहीं किया है, लेकिन यह परमेश्वर के अस्तित्व की गवाही भी नहीं देता है। अगर विज्ञान वास्तव में यह तय कर सकता है कि परमेश्वर का अस्तित्व है और यह गवाही देता है कि परमेश्वर सभी चीजों पर प्रभुत्व रखते हैं, तब हम भी परमेश्वर पर विश्वास करेंगे। हम कम्युनिस्ट सिर्फ विज्ञान पर विश्वास करते हैं। केवल विज्ञान पर विश्वास करके और विज्ञान का विकास करके ही मनुष्य समाज की प्रगति जारी रहेगी। विज्ञान मनुष्य समाज की कई वास्तविक समस्याओं को हल कर सकता है। परमेश्वर पर भरोसा करके लोगों को क्या मिल रहा है? थोड़ी देर की आध्यात्मिक शांति के अलावा, इसका और क्या फायदा है? यह किसी भी व्यावहारिक समस्या को हल नहीं कर सकता। इसलिए, परमेश्वर पर विश्वास करने से विज्ञान पर विश्वास करना ज़्यादा वास्तविक है, कई गुना अधिक व्यावहारिक। हमें विज्ञान पर विश्वास करना होगा।

जियांग शिनयी: प्रेसिडेंट युआन, नास्तिकता सबसे अधिक विज्ञान की वकालत करती है, यहाँ तक कि विज्ञान को सत्य और धर्म समझने लगती है। अगर विज्ञान सत्य होता तो, इतने सारे वैज्ञानिक सिद्धांत कुछ समय तक अस्तित्व में रहने के बाद क्यों झूठे ठहराए गए या गलत साबित हुए? इससे पता चलता है कि विज्ञान पूरा सत्य नहीं है। क्या विज्ञान मनुष्य समाज की सबसे ज़्यादा वास्तविक समस्याओं को हल कर सकता है? क्या विज्ञान मनुष्य के भ्रष्टाचार को दूर कर सकता है? क्या विज्ञान दुनिया के अँधेरे और बुराई को मिटा सकता है? क्या विज्ञान लोगों को परमेश्वर की पहचान करा सकता है? क्या विज्ञान मानव जाति को खुशियाँ और शांति दे सकता है? अब जब विज्ञान चरम सीमा तक विकसित हो चुका है, तो इसके नतीजे क्या हैं? विज्ञान ने मानव जाति को ख़ुशी और शांति नहीं दी है। बल्कि, इसने युद्ध और विपत्तियाँ पैदा उत्पन्न की है जो मानव जाति के विनाश का ख़तरा पैदा करती हैं। पर्यावरण को नष्ट कर दिया गया है। प्राकृतिक और जैविक खाद्य-पदार्थ गायब हो गए हैं। क्या यह सच नही हैं? विज्ञान के विकास के बाद, ज़्यादा से ज़्यादा लोग विज्ञान पर विश्वास करने लगे, परमेश्वर से इन्कार और उनका विरोध करने लगे, जिस वजह से मानव जाति की तबाही बढती गई। जैसा कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं: "जब सबसे पहले मनुष्य को सामाजिक विज्ञान मिला, तब से मनुष्य का मन विज्ञान और ज्ञान में व्यस्त था। फिर विज्ञान और ज्ञान मानवजाति के शासन के लिए उपकरण बन गए, और अब मनुष्य के पास परमेश्वर की आराधना करने के लिए पर्याप्त अवसर नहीं था, और परमेश्वर की आराधना के लिए अब और अनुकूल परिस्थितियाँ नहीं थी। मनुष्यों के हृदय में परमेश्वर की स्थिति और भी नीचे हो गई थी। मनुष्य के हृदय का संसार, जिसमें परमेश्वर के लिये जगह न हो, अंधकारमय, और आशारहित है। …विज्ञान, ज्ञान, स्वतंत्रता, लोकतंत्र, फुरसत, आराम ये सब मात्र अस्थायी चैन हैं। यहाँ तक कि इन बातों के साथ भी, मनुष्य अपरिहार्य रूप से पाप करेगा और समाज के अन्याय पर विलाप करेगा। ये वस्तुएँ मनुष्य की लालसा और अन्वेषण की इच्छा को शांत नहीं कर सकती हैं। क्योंकि मनुष्य को परमेश्वर के द्वारा बनाया गया है और मनुष्यों के बेहूदे बलिदान और अन्वेषण केवल और भी अधिक कष्ट की ओर लेकर जा सकते हैं। मनुष्य एक निरंतर भय की स्थिति में रहेगा, और नहीं जान सकेगा कि मानवजाति के भविष्य का किस प्रकार से सामना किया जाए, या आगे आने वाले मार्ग पर कैसे चला जाए। मनुष्य यहाँ तक कि विज्ञान और ज्ञान के भय से भी डरने लगेगा, और स्वयं के भीतर के खालीपन से और भी अधिक डरने लगेगा। …यदि किसी देश या राष्ट्र के लोग परमेश्वर द्वारा उद्धार और उसकी देखभाल प्राप्त करने में अक्षम हैं, तो इस प्रकार का देश या राष्ट्र विनाश के मार्ग पर, अंधकार की ओर, चला जाएगा, और परमेश्वर के द्वारा जड़ से मिटा दिया जाएगा" (वचन देह में प्रकट होता है)।

जियांग शिनयी: जब मनुष्य विज्ञान का समर्थन करता है और उस पर विश्वास करता है, तब वह स्वाभाविक रूप से सत्य से इन्कार करेगा और परमेश्वर से इन्कार करेगा। इसका परिणाम क्या होगा? जब मनुष्य विज्ञान में विश्वास करने लगता है, तब वह स्वाभाविक रूप से परमेश्वर के कार्य और उद्धार को स्वीकार करने से मना करेगा, और वह परमेश्वर का विरोध भी कर सकता है। जब मनुष्य परमेश्वर को छोड़ देता है, तब उसके दिल में परमेश्वर के लिए कोई जगह नहीं रहती, इसलिए मनुष्य को परमेश्वर का आशीर्वाद मिलना बंद हो जाता है। अब जबकि मनुष्य विज्ञान की वकालत करता है, बुराई का समर्थन करता है, और दुनिया के रीति-रिवाज़ों का पालन करता है, तो उसका परिणाम यह है कि मनुष्य और परमेश्वर के बीच की दूरी बढ़ती जाती है। पूरी दुनिया में अँधेरा और बुराई दिन-ब-दिन बढती जा रही है और परमेश्वर का विरोध भी बढ़ता ही जा रहा है। मनुष्यों के बीच लगातार बढ़ रहे संघर्ष और युद्धों ने मानव जाति के लिए तरह-तरह की विपत्तियाँ पैदा की हैं। प्रेसिडेंट युआन, क्या आप कह रहे हैं कि विज्ञान मानव जाति को बुराई और पापों से बचा सकता है? क्या विज्ञान अंत के दिनों में मनुष्य को तबाही से बचा सकता है? क्या विज्ञान मनुष्य को एक अच्छी मंज़िल तक पहुँचा सकता है? ये मानव जाति के परिणाम और मंजि़ल से जुड़े कई अहम मुद्दे हैं जिन्हें विज्ञान हल नहीं कर सकता। यह इस बात को साबित करने के लिए काफी है कि विज्ञान सत्य नहीं है; वह मनुष्य को बचा नहीं सकता। अंत के दिनों में, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के द्वारा की गई सत्य की अभिव्यक्ति मानव जाति के उद्धार के लिए है। अगर मानव जाति सर्वशक्तिमान परमेश्वर का न्याय और शुद्धिकरण प्राप्त कर सकती है, तो वह तबाही के बीच परमेश्वर की सुरक्षा भी प्राप्त कर सकती है और परमेश्वर का राज्य आने तक बची रह सकती है। यह परमेश्वर का वादा है। मनुष्य परमेश्वर के वचन पर विश्वास कर उसे स्वीकार कर सकता हो या नहीं, फिर भी वह तबाही के अंत के बाद परमेश्वर के वचनों को पूरा होते हुए देख सकता है। लेकिन तब अफ़सोस करने के लिए बहुत देर हो चुकी होगी।

"वार्तालाप" फ़िल्म की स्क्रिप्ट से लिया गया अंश