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बाइबल के प्रासंगिक पद:

"और उसके वचन को मन में स्थिर नहीं रखते, क्योंकि जिसे उसने भेजा तुम उसका विश्‍वास नहीं करते। तुम पवित्रशास्त्र में ढूँढ़ते हो, क्योंकि समझते हो कि उसमें अनन्त जीवन तुम्हें मिलता है; और यह वही है जो मेरी गवाही देता है; फिर भी तुम जीवन पाने के लिये मेरे पास आना नहीं चाहते" (यूहन्ना 5:38-40)।

"मुझे तुम से और भी बहुत सी बातें कहनी हैं, परन्तु अभी तुम उन्हें सह नहीं सकते। परन्तु जब वह अर्थात् सत्य का आत्मा आएगा, तो तुम्हें सब सत्य का मार्ग बताएगा, क्योंकि वह अपनी ओर से न कहेगा परन्तु जो कुछ सुनेगा वही कहेगा, और आनेवाली बातें तुम्हें बताएगा" (यूहन्ना 16:12-13)।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

यदि तुम व्यवस्था के युग के कार्य को देखने की इच्छा करते हो, और यह देखना चाहते हो कि इज़राइली किस प्रकार यहोवा के मार्ग का अनुसरण करते थे, तो तुम्हें पुराना विधान अवश्य पढ़ना चाहिए; यदि तुम अनुग्रह के युग के कार्य को समझना चाहते हो, तो तुम्हें नया विधान अवश्य पढ़ना चाहिए। किन्तु तुम अंतिम दिनों के कार्य को किस प्रकार देखते हो? तुम्हें आज के परमेश्वर की अगुआई को स्वीकार अवश्य करनी चाहिए, और आज के कार्य में प्रवेश करना चाहिए, क्योंकि यह नया कार्य है, और किसी ने भी पूर्व में इसे बाइबल में दर्ज नहीं किया है। आज, परमेश्वर देहधारी हो चुका है और उसने चीन में अन्य चयनित लोगों को छाँट लिया है। परमेश्वर इन लोगों में कार्य ता है, वह पृथ्वी पर अपने काम को निरन्तर जारी रखता है, और अनुग्रह के युग के कार्य को जारी रखता है। आज का कार्य एक मार्ग है जिस पर मनुष्य कभी नहीं चला, और एक तरीका है जिसे किसी ने कभी नहीं देखा है। यह वह कार्य है जिसे पहले कभी नहीं किया गया है—यह पृथ्वी पर परमेश्वर का नवीनतम कार्य है। इस प्रकार, ऐसा कार्य जो पहले कभी नहीं किया गया हो वह इतिहास नहीं है, क्योंकि अभी तो अभी है, और इसे अभी अतीत बनना है। लोग नहीं जानते हैं कि परमेश्वर ने पृथ्वी पर और इस्राएल के बाहर बड़ा, नया काम किया है, कि यह पहले ही इस्राएल के दायरे के बाहर, और भविष्यवक्ताओं के पूर्वकथनों के परे चला गया है, कि यह भविष्यवाणियों के बाहर नया और बेहतरीन, और इस्राएल के परे नवीनतम कार्य है, और ऐसा कार्य है जिसे लोग न तो समझ सकते हैं और न ही जिसकी कल्पना कर सकते हैं। बाइबल ऐसे कार्य के सुस्पष्ट अभिलेखों को कैसे समाविष्ट कर सकती है? कौन आज के कार्य के प्रत्येक अंश को, बिना किसी चूक के, पहले से ही दर्ज कर सका होगा? कौन इस अति पराक्रमी, अति बुद्धिमत्तापूर्ण कार्य को इस पुरानी घिसीपिटी पुस्तक में दर्ज कर सकता है जो परम्परा का अनादर करता है? आज का कार्य इतिहास नहीं है, और वैसे तो, यदि तुम आज के नए पथ पर चलने की इच्छा करते हो, तो तुम्हें बाइबल से दूर अवश्य जाना चाहिए, तुम्हें बाइबल की भविष्यवाणियों या इतिहास की पुस्तकों के परे अवश्य जाना चाहिए। केवल तभी तुम इस नए मार्ग पर उचित तरीके से चल पाओगे, और केवल तभी तुम एक नए राज्य और नए कार्य में प्रवेश कर पाओगे। तुम्हें यह अवश्य समझना चाहिए कि क्यों, आज, तुम से बाइबल न पढ़ने को कहा जा रहा है, क्यों एक अन्य कार्य है जो बाइबल से अलग है, क्यों परमेश्वर बाइबल में किसी नवीनतम तथा अधिक विस्तृत अभ्यासों की ओर नहीं देखता है, क्यों इसके बजाए बाइबल के बाहर अधिक पराक्रमी कार्य हैं। यही वह सब है जो तुम लोगों को समझना चाहिए।

"बाइबल के विषय में (1)" से

मैं मनुष्य के मध्य में बहुत कार्य कर चुका हूं, और इस दौरान जो वचन मैंने व्यक्त किये हैं, वे बहुत हो चुके हैं। ये वचन मनुष्य के उद्धार के लिए ही हैं, और इसलिए व्यक्त किये गए थे ताकि मनुष्य मेरे अनुसार, मुझ से मेल खाने वाला बन सके। फिर भी, पृथ्वी पर मैंने ऐसे बहुत थोड़े ही लोग पाये हैं जो मुझ से मेल खाते हैं, और इसलिए मैं कहता हूं कि मनुष्य मेरे वचनों को बहुमूल्य नहीं समझता, क्योंकि मनुष्य मेरे अनुकूल नहीं है। इस तरह, मैं जो कार्य करता हूं वह सिर्फ़ इसलिए नहीं है कि मनुष्य मेरी आराधना कर सके; पर उस से अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि, यह इसलिए किया जाता है ताकि मनुष्य मेरे अनुकूल बन सके। वे लोग, जो भ्रष्ट हो चुके हैं, सब शैतान के फंदे में जीवन जी रहे हैं, वे शरीर में जीवन जीते हैं, स्वार्थी अभिलाषाओं में जीवन जीते हैं, और उनके मध्य में एक भी नहीं है जो मेरे अनुकूल हो। कई ऐसे हैं जो कहते हैं कि वे मेरी अनुकूलता में हैं, परन्तु वे सब अस्पष्ट मूर्तियों की आराधना करते हैं। हालाँकि वे मेरे नाम को पवित्र रूप में स्वीकार तो करते हैं, पर वे उस रास्ते पर चलते हैं जो मेरे विपरीत जाता है, और उनके वचन घमण्ड और आत्मविश्वास से भरे हुए हैं, क्योंकि, जड़ से तो, वे सब मेरे विरोध ही में हैं, और मेरे अनुकूल नहीं हैं। प्रत्येक दिन वे बाइबल में मेरे बारे में संकेतों की खोज करते हैं, और यूं ही "उपयुक्त" अंशों को ढूँढते हैं जिन्हें वे निरंतर पढ़ते रहते हैं, और जिन्हें वे "पवित्र शास्त्र" के रूप में बयान करते हैं। वे नहीं जानते कि मेरे अनुकूल कैसे बनें, नहीं जानते कि मेरे साथ शत्रुता में होने का क्या अर्थ होता है, और "पवित्र शास्त्र" को नाममात्र के लिए, अंधेपन के साथ ही पढ़ते रहते हैं। वे बाइबल के भीतर ही, एक ऐसे अज्ञात परमेश्वर को संकुचित कर देते हैं, जिसे उन्होंने स्वंय भी कभी नहीं देखा है, और देखने में अक्षम हैं, और इस पर अपने खाली समय के दौरान ही विचार करते हैं। उनके लिये मेरे अस्तित्व का दायरा मात्र बाइबल तक ही सीमित है। उनके लिए, मैं बस बाइबल के सामान ही हूँ; बाइबल के बिना मैं भी नहीं हूँ, और मेरे बिना बाइबल भी नहीं है। वे मेरे अस्तित्व या क्रियाओं पर कोई भी ध्यान नहीं देते, परन्तु इसके बजाय, पवित्रशास्त्र के हर एक वचन पर बहुत अधिक और विशेष ध्यान देते हैं, और उनमें से कई एक तो यहाँ तक मानते हैं कि मुझे मेरी चाहत के अनुसार, ऐसा कुछ भी नहीं करना चाहिए जब तक वह पवित्रशास्त्र के द्वारा पहले से बताया गया न हो। वे पवित्रशास्त्र को बहुत अधिक महत्त्व देते हैं। यह कहा जा सकता है कि वे वचनों और उक्तियों को बहुत अधिक महत्वपूर्ण तरीकों से देखते हैं, इस हद कि हर एक वचन जो मैं बोलता हूं उसकी तुलना बाइबल की आयतों के साथ करते हैं, और उसका उपयोग मुझे दोषी ठहराने के लिए करते हैं। वे जिसकी खोज कर रहे हैं वह मेरे अनुकूल होने का रास्ता या ढंग नहीं है, या सत्य के अनुकूल होने का रास्ता नहीं है, बल्कि बाइबल के वचनों की अनुकूलता में होने का रास्ता है, और वे विश्वास करते हैं कि कोई भी बात जो बाइबल के अनुसार नहीं है, बिना किसी अपवाद के, मेरा कार्य नहीं है। क्या ऐसे लोग फरीसियों के कर्तव्यनिष्ठ वंशज नहीं हैं? यहूदी फरीसी यीशु को दोषी ठहराने के लिए मूसा की व्यवस्था का उपयोग करते थे। उन्होंने उस समय के यीशु के अनुकूल होने की खोज नहीं की, बल्कि नियम का अक्षरशः पालन कर्मठतापूर्वक किया, इस हद तक किया कि अंततः उन्होंने निर्दोष यीशु को, पुराने नियम की व्यवस्था का पालन न करने और मसीहा न होने का आरोप लगाते हुए, क्रूस पर चढ़ा दिया। उनका सारतत्व क्या था? क्या यह ऐसा नहीं था कि उन्होंने सत्य के अनुकूल होने के मार्ग की खोज नहीं की? उनमें पवित्रशास्त्र के हर एक वचन का जुनून सवार हो गया था, जबकि मेरी इच्छा और मेरे कार्य के चरणों और कार्य की विधियों पर कोई भी ध्यान नहीं दिया। ये वे लोग नहीं थे जो सत्य को खोज रहे थे, बल्कि ये वे लोग थे जो कठोरता से पवित्रशास्त्र के वचनों का पालन करते थे; ये वे लोग नहीं थे जो सत्य की खोज करते थे, बल्कि ये वे लोग थे जो बाइबल में विश्वास करते थे। दरअसल वे बाइबल के रक्षक थे। बाइबल के हितों की सुरक्षा करने, और बाइबल की मर्यादा को बनाये रखने, और बाइबल की प्रतिष्ठा को बचाने के लिए, वे यहाँ तक गिर गए कि उन्होंने दयालु यीशु को भी क्रूस पर चढ़ा दिया। यह उन्होंने सिर्फ़ बाइबल की रक्षा करने के लिए, और लोगों के हृदय में बाइबल के हर एक वचन के स्तर को बनाये रखने के लिए ही किया। इस प्रकार उन्होंने यीशु को, जिसने पवित्रशास्त्र के सिद्धान्त का पालन नहीं किया, मृत्यु दंड देने के लिये अपने भविष्य और पापबलि को त्यागना बेहतर समझा। क्या वे पवित्रशास्त्र के हर एक वचन के नौकर नहीं थे?

और आज के लोगों के विषय में क्या कहें? मसीह सत्य को बताने के लिए आया है, फिर भी वे निश्चय ही स्वर्ग में प्रवेश प्राप्त करने और अनुग्रह को पाने के लिए उसे मनुष्य के मध्य में से बाहर निकाल देंगे। वे निश्चय ही बाइबल के हितों की सुरक्षा करने के लिए सत्य के आगमन को भी नकार देंगे, और निश्चय ही वापस देह में आये हुए मसीह को बाइबल के अस्तित्व को अनंतकाल तक सुनिश्चित करने के लिए फिर से सूली पर चढ़ा देंगे। कैसे मनुष्य मेरे उद्धार को ग्रहण कर सकता है, जब उसका हृदय इतना अधिक द्वेष से भरा है, और मेरे प्रति उसका स्वभाव ही इतना विरोध से भरा है? मैं मनुष्य के मध्य में रहता हूं, फिर भी मनुष्य मेरे अस्तित्व के बारे नहीं जानता है। जब मैं अपना प्रकाश लोगों पर फैलाता हूं, फिर भी मेरे वह अस्तित्व के बारे में अज्ञानी ही बना रहता है। जब मैं लोगों पर क्रोधित होता हूँ, तो वह मेरे अस्तित्व को और अधिक प्रबलता से नकारता है। मनुष्य शब्दों, बाइबल के साथ अनुकूलता की खोज करता है, फिर भी सत्य के अनुकूल होने के रास्ते को खोजने के लिए एक भी व्यक्ति मेरे पास नहीं आता है। मनुष्य मुझे स्वर्ग में खोजता है, और स्वर्ग में मेरे अस्तित्व के लिए विशेष समर्पण करता है, फिर भी कोई मेरी परवाह नहीं करता क्योंकि मैं जो देह में उन्हीं के बीच रहता हूं, बहुत मामूली हूँ। जो लोग सिर्फ़ बाइबल के शब्दों के और एक अज्ञात परमेश्वर के अनुकूल होने में ही अपना सर्वस्व समझते हैं, वे मेरे लिए एक घृणित हैं। क्योंकि वे मृत शब्दों की आराधना करते हैं, और एक ऐसे परमेश्वर की आराधना करते हैं जो उन्हें अवर्णनीय खज़ाना देने में सक्षम है। जिस की वे आराधना करते हैं वो एक ऐसा परमेश्वर है जो अपने आपको मनुष्य की दया पर छोड़ देता है, और जिसका अस्तित्व है ही नहीं। तो फिर, ऐसे लोग मुझ से क्या लाभ प्राप्त कर सकते हैं? मनुष्य वचनों के लिए बहुत ही नीचा है। जो मेरे विरोध में हैं, जो मेरे सामने असीमित मांगें रखते हैं, जिन में सत्य के लिए प्रेम ही नहीं है, जो मेरे प्रति बलवा करते हैं—वह मेरे अनुकूल कैसे हो सकते हैं?

"तुम्हें मसीह की अनुकूलता में होने के तरीके की खोज करनी चाहिए" से

यदि तुम केवल अतीत को पकड़े रहने की कोशिश करोगे, केवल ठहरी हुई चीज़ों को पकड़ने की कोशिश में लगे रहोगे, और यथास्थिति को बदलने और इतिहास को तिलांजलि देने की कोशिश नहीं करोगे, तो क्या तुम हमेशा परमेश्वर के विरोध में नहीं रहोगे? परमेश्वर के कार्य के चरण बहुत ही विशाल और सामर्थी हैं, जैसे कि हिलोरे मारती हुई लहरें और गरजता हुआ तूफान - फिर भी तुम बैठकर निष्क्रियता से विनाश का इंतजार करते हो, अपनी ही मूर्खता से चिपके रहते हो और कुछ भी नहीं करते। इस प्रकार से, तुम्हें मेमने का अनुसरण करने वाले के रूप में कैसे देखा जा सकता है? और तुम इस बात को कैसे न्यायोचित ठहरा सकते हो कि तुम उस परमेश्वर पर निर्भर रहोगे जो हमेशा नया है और कभी पुराना नहीं होता? तुम्हारी पीली पड़ चुकी किताब के वचन तुम्हें नए युग में कैसे ले जा सकते हैं? वे कैसे तुम्हें परमेश्वर के चरणबद्ध तरीके से चलने वाले कार्यों तक लेकर जायेंगे? वे तुम्हें कैसे स्वर्ग लेकर जायेंगे? तुम्हारे हाथों में जो संदेश हैं वे तुम्हें केवल अस्थायी सांत्वना ही दे सकते हैं, वह सत्य नहीं दे सकते जो जीवन देने में सक्षम है। जो शास्त्र तुम पढ़ते हो वे तुम्हारी जिव्हा को आनंदित तो कर सकते हैं लेकिन ये वे विवेकपूर्ण वचन नहीं हैं जो तुम्हें मानव जीवन का बोध करा सकें। ये वह मार्ग तो दिखा ही नहीं सकते जो तुम्हें पूर्णता की ओर ले जायें। क्या यह भिन्नता तुम्हारे विचार-मंथन का कारण नहीं है? क्या यह तुम्हें अपने भीतर समाहित रहस्यों को समझने के लिए अनुमति नहीं देता है? क्या तुम अपने आप को परमेश्वर से मिलने के लिए स्वर्ग में ले जाने के योग्य हो? परमेश्वर के आये बिना, क्या तुम अपने आप को परमेश्वर के साथ पारिवारिक आनन्द मनाने के लिए स्वर्ग में ले जा सकते हो क्या तुम अभी भी स्वप्न देख रहे हो? मैं तुम्हें सुझाव देता हूं, कि तुम स्वप्न देखना बंद कर दो, और उनकी ओर देखो जो अभी कार्य कर रहे हैं, इन अंतिम दिनों में कौन मनुष्यों को बचाने के लिए कार्य कर रहा है। यदि तुम ऐसा नहीं करते हो, तो तुम कभी भी सत्य को नहीं प्राप्त कर सकते, और कभी भी जीवन प्राप्त नहीं कर सकते हो।

"केवल अंतिम दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनन्त जीवन का मार्ग दे सकता है" से

चूँकि यहाँ एक उच्चतर मार्ग है, तो उस निम्न एवं पुराने मार्ग का अध्ययन क्यों करते हो? चूँकि यहाँ अधिक नवीन कथन हैं, और अधिक नया कार्य है, तो पुराने ऐतिहासिक अभिलेखों के मध्य जीवन क्यों बिताते हो? नए कथन तुम्हारा भरण-पोषण कर सकते हैं, जिससे यह साबित होता है कि यह नया कार्य है; पुराने लिखित दस्तावेज़ तुम्हें तृप्त नहीं कर सकते हैं, या तुम्हारी वर्तमान आवश्यकताओं को संतुष्ट नहीं कर सकते हैं, जिससे यह साबित होता है कि वे इतिहास हैं, और यहाँ के और वर्तमान के कार्य नहीं हैं। उच्चतम मार्ग ही नवीनतम कार्य है, और नए कार्य के साथ, इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता है कि अतीत का मार्ग कितना ऊँचा था, यह अभी भी लोगों के चिंतनों का इतिहास है, और इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता है कि सन्दर्भ के रूप में इसका कितना महत्व है, यह अभी भी एक पुराना मार्ग है। यद्यपि इसे "पवित्र पुस्तक" में दर्ज किया गया है, फिर भी पुराना मार्ग इतिहास है; यद्यपि "पवित्र पुस्तक" में इसका कोई अभिलेख नहीं है, फिर भी नया मार्ग यहाँ का और अभी का है। यह मार्ग तुम्हें बचा सकता है, और यह मार्ग तुम्हें परिवर्तित कर सकता है, क्योंकि यह पवित्र आत्मा का कार्य है।

"बाइबल के विषय में (1)" से

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