सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया का ऐप

परमेश्वर की आवाज़ सुनें और प्रभु यीशु की वापसी का स्वागत करें!

सत्य को खोजने वाले सभी लोगों का हम से सम्पर्क करने का स्वागत करते हैं

सूचीपत्र

अपने कर्तव्य को करने और सेवा करने में क्या अंतर है?

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

मनुष्य के कर्तव्य और क्या वह धन्य या श्रापित है के बीच कोई सह सम्बंध-नहीं है। कर्तव्य वह है जो मनुष्य को पूरा करना चाहिए; यह उसका आवश्यक कर्तव्य है और प्रतिफल, परिस्थितियों या कारणों पर निर्भर नहीं होना चाहिए। केवल तभी कहा जा सकता है कि वह कर्तव्य कर रहा है। ऐसा मनुष्य जिसे धन्य किया जाता है वह न्याय के बाद सिद्ध बनाए जाने पर भलाई का आनन्द लेता है। ऐसा मनुष्य जिसे श्रापित किया जाता है तब दण्ड प्राप्त करता है जब ताड़ना और न्याय के बाद उसका स्वभाव अपरिवर्तित रहता है, अर्थात्, उसे सिद्ध नहीं बनाया गया है। एक सृजन किए गए प्राणी के रूप में, मनुष्य को, इस बात की परवाह किए बिना कि क्या उसे धन्य या श्रापित किया जाएगा, अपना कर्तव्य पूरा करना चाहिए, वह करना चाहिए जो उसे करना चाहिए, और वह करना चाहिए जो वह करने के योग्य है। यही किसी ऐसे मनुष्य के लिए सबसे आधारभूत शर्त है, जो परमेश्वर की तलाश करता है। तुम्हें केवल धन्य होने के लिए अपने कर्तव्य को नहीं करना चाहिए, और श्रापित होने के भय से अपना कृत्य करने से इनकार नहीं करना चाहिए। मैं तुम लोगों को एक बात बता दूँ: करने में समर्थ है यदि मनुष्य अपना कार्य, तो इसका अर्थ है कि वह उसे करता है जो उसे करना चाहिए। यदि मनुष्य अपना कर्तव्य करने में असमर्थ है, तो यह मनुष्य की विद्रोहशीलता को दर्शाता है। यह सदैव उसके कर्तव्य को करने की प्रक्रिया के माध्यम से है कि मनुष्य धीरे-धीरे बदलता है, और यह इसी प्रक्रिया के माध्यम से है कि वह अपनी वफादारी प्रदर्शित करता है। वैसे तो, तुम जितना अधिक अपना कार्य करने में समर्थ होगे, तुम उतने ही अधिक सत्य प्राप्त करोगे, और तुम्हारी अभिव्यक्ति भी उतनी ही अधिक वास्तविक हो जाएगी। जो लोग अपने कर्तव्य को बिना रुचि के करते हैं और सत्य की तलाश नहीं करते हैं वे अन्त में हटा दिए जाएँगे, क्योंकि ऐसे लोग सत्य के अभ्यास में अपने कर्तव्य को नहीं करते हैं, और अपने कर्तव्य को पूरा करने में सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं। ऐसे लोग वे हैं जो अपरिवर्तित रहते हैं और श्रापित किए जाएँगे। उनकी न केवल अभिव्यक्तियाँ अशुद्ध हैं, बल्कि वे जो व्यक्त करते हैं वह भी कुछ नहीं बल्कि दुष्टता ही होती है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "देहधारी परमेश्वर की सेवकाई और मनुष्य के कर्तव्य के बीच अंतर" से उद्धृत

लोग चाहे जो भी प्रतिभा, योग्यता, या कौशल धारण करते हों, वे केवलअपने कर्तव्य का पालन करने और चीज़ों को करने में ही अपनी ताक़त का उपयोग करते हैं। वे चाहे जो कुछ भी करें, वे अपनी कल्पनाओं, अवधारणाओं या अपने सहज ज्ञान पर भरोसा करते हैं। वे कभी भी परमेश्वर की इच्छा की तलाश नहीं करते हैं, और उनके मन में कोई धारणा या आवश्यकता नहीं होती है, वे कहते हैं, "मैं अपना कर्तव्य निभा रहा हूँ। मुझे सत्य को व्यवहार में अवश्य लाना चाहिए।" उनकी सोच का एकमात्र शुरुआती बिंदु कार्य को अच्छी तरह से करना और कार्य को पूरा करना होता है। तो क्या यह कोई ऐसा व्यक्ति है जो पूरी तरह से अपनी योग्यता, प्रतिभा, क्षमता और कौशल के अनुसार जीता है? उस तरह के लोगों के विश्वास में, वे केवल अपनी ताक़त का उपयोग करने, अपने स्वयं के श्रम को बेचने, अपने स्वयं के कौशल को बेचने के बारे में सोचते हैं। विशेष रूप से जब परमेश्वर का घर उन्हें सामान्य कार्य करने के लिए देता है तब ज्यादातर लोग इस दृष्टिकोण से चीज़ों को करते हैं। वे बस खुद का बल लगाते हैं। कभी इसका अर्थ होता है अपने मुँह का उपयोग करना, कभी अपने हाथों का और शारीरिक शक्ति का उपयोग करना, कभी यह अपनी आँखों का उपयोग करना होता है, और कभी इसका अर्थ दौड़-भाग करना होता है। ऐसा क्यों कहा जाता है कि उन चीज़ों के अनुसार जीना अपनी ताक़त का उपयोग करना है, न कि सत्य को अभ्यास में लाना? किसी को परमेश्वर के घर द्वारा कोई कार्य दिया जाता है, और वह केवल यह सोचता है कि इस कार्य को कैसे यथाशीघ्र पूरा किया जाए ताकि वह कलीसिया के अगुवाओं को विवरण दे सके और उनकी प्रशंसा प्राप्त कर सके। ऐसे लोग एक कदम-दर-कदम योजना बना सकते हैं। वे बहुत ईमानदार प्रतीत होते हैं, लेकिन वे दिखावे के वास्ते कार्य को पूरा करने से ज्यादा किसी अन्य चीज़ पर ध्यान केंद्रित नहीं करते हैं, या जब वे ऐसा कर रहे होते हैं, तो वे स्वयं के लिए अपने मानक निर्धारित करते हैं: इसे कैसे करें ताकि वे खुश और संतुष्ट महसूस करें, पूर्णता के उस स्तर को प्राप्त करना जिसके लिए वे प्रयास करते हैं। भले ही वे किसी भी योजना या मानक को निर्धारित करते हों, यदि इसका सत्य से कोई संबंध नहीं है, यदि वे सत्य की तलाश करने या इस बात को समझने और इसकी पुष्टि करने के बाद कि परमेश्वर उनसे क्या माँग करता है, कार्रवाई नहीं करते हैं, बल्कि इसके विपरीत, वे, उलझन में, आँखें मूँदकर कार्य करते हैं, तो यह केवल स्वयं का बल लगाना है। वे अपनी इच्छाओं के अनुसार, अपने दिमाग या योग्यता के अनुसार, या अपनी क्षमताओं और कौशलों के अनुसार कार्य कर रहे हैं। और इस तरह से उनके कार्य करने का परिणाम क्या होता है? हो सकता है कि कार्य पूरा हो गया हो, किसी ने कोई दोष नहीं निकाला हो, और हो सकता है कि तू इससे बहुत खुश हो। लेकिन ऐसा करने के दौरान, सबसे पहले तो: तूने परमेश्वर के इरादे को नहीं समझा; और उसके बाद: तूने इसे अपने पूरे हृदय से, अपने पूरे मन से, और अपनी पूरी ताक़त के साथ नहीं किया—तूने इसमें अपना पूरा हृदय नहीं लगाया। यदि तूने सत्य के सिद्धांतों की तलाश की होती, यदि तूने परमेश्वर की इच्छा की तलाश की होती, तो तू इसे पूरा करने में 90% प्रभावी होता, तू सत्य की वास्तविकता में प्रवेश करने में भी समर्थ होता, और तू ठीक से समझ गया होता कि तू जो कर रहा था वह परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप है। लेकिन यदि तू लापरवाह और बेतरतीब होता, तो भले ही कार्य पूरा हो गया हो, तब भी अपने हृदय में तू इस बारे में स्पष्ट नहीं होता कि तूने इसे कितनी अच्छी तरह से किया है। तेरे पास कोई मानदण्ड नहीं होगा, तुझे पता नहीं लगेगा कि यह परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप है या नहीं, या यह सत्य के अनुरूप है या नहीं। इसलिए, जब भी इस तरह की स्थिति में कर्तव्यों का पालन किया जाता है, तो इसका चार शब्दों में उल्लेख किया जा सकता है—स्वयं का बल लगाना। ...

परमेश्वर में आस्था रखने वाले हर व्यक्ति को परमेश्वर की इच्छा को समझना चाहिये। अपने कर्तव्य को सही ढंग से निभाने वाले लोग ही परमेश्वर को संतुष्ट कर सकते हैं, परमेश्वर उन्हें जो काम सौंपता है, उसे पूरा करने से ही उनके कर्तव्यों का निर्वहन अपेक्षित मानक के बराबर होगा। परमेश्वर के आदेश की पूर्णता के मानक हैं। प्रभु यीशु ने कहा: "तू प्रभु अपने परमेश्‍वर से अपने सारे मन से, और अपने सारे प्राण से, और अपनी सारी बुद्धि से, और अपनी सारी शक्‍ति से प्रेम रखना।" परमेश्वर से प्रेम करना उसका एक पहलू है जिसकी परमेश्वर लोगों से अपेक्षा करते है। वास्तव में, जब परमेश्वर लोगों को एक आदेश देता है, जब वे अपने विश्वास से अपना कर्तव्य निभाते हैं, तो जिस मानक की वह उनसे अपेक्षा करता है वह है: अपने पूर्ण हृदय से, अपने पूर्ण प्राण से, अपने पूरे दिमाग से, और अपनी पूरी ताक़त के साथ। यदि तू मौज़ूद तो है, लेकिन तेरा हृदय मौज़ूद नहीं है, यदि तू कार्यों के बारे में अपने दिमाग से सोचता है और उन्हें स्मृति में रख देता है, लेकिन तू अपना हृदय उन में नहीं लगाता है, और यदि तू अपनी क्षमताओं का उपयोग करके चीज़ों को पूरा करता है, तो क्या यह परमेश्वर के आदेश को पूरा करना है? तो अपने कर्तव्य को सही तरीके से करने और परमेश्वर ने तुझे जो कुछ भी सौंपा है, उसे पूरा करने के लिए और अपने कर्तव्य को निष्ठापूर्वक निभाने के लिए किस तरह का मानक प्राप्त करना ही चाहिए? यह अपने कर्तव्य को पूरे हृदय से, अपने पूरे प्राण से, अपने पूरे मन से, अपनी पूरी ताक़त से करना है। अगर आपके अंदर परमेश्वर से प्रेम करने वाला दिल नहीं है, तो फिर अपने कर्तव्य को सही ढंग से निभाने की कोशिश करने से बात नहीं बनेगी। अगर परमेश्वर के लिये आपका प्रेम मज़बूत और अधिक सच्चा होता चला जाता है, तो स्वाभाविक रूप से आप पूरे दिल से, पूरी आत्मा से, पूरे मन से, और पूरी शक्ति से अपने कर्तव्य का निर्वाह कर पायेंगे।

— "मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "बस लोग किसके अनुसार जी रहे हैं" से उद्धृत

कुछ लोगों के लिए, भले ही वे अपने कर्तव्यों का पालन करते समय वे किसी भी समस्या का सामना क्यों न करें, वे सत्य की तलाश नहीं करते हैं और हमेशा अपनी अवधारणाओं, कल्पनाओं और इच्छाओं के अनुसार कार्य करते हैं। वे हमेशा अपनी स्वार्थी इच्छाओं को पूरा करते हैं और उनका भ्रष्ट स्वभाव हमेशा उनके कार्यों पर हावी रहता है। भले ही वे खुद को सौंपे गए कर्तव्य को पूरा कर दें, फिर भी वे किसी सत्य को प्राप्त नहीं करते हैं। तो यह व्यक्ति अपने कर्तव्य को करने में किस पर निर्भर कर रहा है? ऐसे व्यक्ति सत्य पर निर्भर नहीं हो रहे हैं और वे परमेश्वर पर भरोसा नहीं कर रहे हैं। जिस थोड़े से सत्य को वे समझते हैं, उसने उनके हृदयों में प्रभुत्व नहीं बनाया है। वे इस कर्तव्य को पूरा करने के लिए अपनी स्वयं की योग्यताओं और क्षमताओं पर, उस ज्ञान पर जो उन्होंने प्राप्त किया है और अपनी प्रतिभा पर, और साथ ही अपनी स्वयं की इच्छाशक्ति पर या नेक इरादों पर भरोसा कर रहे हैं। यद्यपि कभी-कभी तू अपने कर्तव्य को निभाने में अपनी स्वाभाविकता, कल्पनाओं, अवधारणाओं, ज्ञान और शिक्षा पर भरोसा करे, तेरे द्वारा की जाने वाली चीज़ों में सिद्धांत का कोई मुद्दा पैदा नहीं होता है। सतह पर ऐसा लगता है जैसे कि तूने गलत मार्ग नहीं अपनाया है, लेकिन एक ऐसी चीज़ है जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है: अपने कर्तव्य को करने की पूरी प्रक्रिया के दौरान, यदि तेरी अवधारणाएँ, कल्पनाएँ और व्यक्तिगत इच्छाएँ कभी नहीं बदलती हैं और कभी भी सत्य के साथ प्रतिस्थापित नहीं की जाती हैं, यदि तेरे कार्य और कर्म कभी भी सत्य के सिद्धांतों के अनुसार नहीं होते हैं, तो अंतिम परिणाम क्या होगा? तू एक सेवा करने वाला बन जाएगा, और ठीक यही बाइबल में दर्ज है: "उस दिन बहुत से लोग मुझ से कहेंगे, 'हे प्रभु, हे प्रभु, क्या हम ने तेरे नाम से भविष्यद्वाणी नहीं की, और तेरे नाम से दुष्‍टात्माओं को नहीं निकाला, और तेरे नाम से बहुत से आश्‍चर्यकर्म नहीं किए?' तब मैं उनसे खुलकर कह दूँगा, मैं ने तुम को कभी नहीं जाना। हे कुकर्म करनेवालो, मेरे पास से चले जाओ।"

— "मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "अपने कर्तव्यों में परमेश्वर के वचनों का अनुभव कैसे करें" से उद्धृत

पतरस को व्यवहार एवं शुद्धिकरण के माध्यम से सिद्ध किया गया था। उसने कहा था, "मुझे हर समय परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट करना होगा। वह सब जो मैं करता हूँ उसमें मैं केवल परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट करने का प्रयास करता हूँ, और चाहे मुझे ताड़ना मिले, या मेरा न्याय किया जाए, मैं फिर भी ऐसा करके प्रसन्न हूँ।" पतरस ने अपना सब कुछ परमेश्वर को दे दिया एवं उसका काम, उसके वचन, और सम्पूर्ण जीवन परमेश्वर के प्रेम के खातिर थे। वह ऐसा व्यक्ति था जो पवित्रता की खोज करता था और जितना अधिक उसने अनुभव किया, उसके हृदय की गहराई के भीतर परमेश्वर के लिए उसका प्रेम उतना ही बड़ा होता गया। जबकि पौलुस ने सिर्फ बाहरी कार्य किया था और यद्यपि उसने भी कड़ी मेहनत की थी, फिर भी उसका परिश्रम, उसके कार्य को उचित रीति से करने के लिए और ऐसा करते हुए एक पुरस्कार पाने के लिए था। अगर वह जानता कि उसे कोई पुरस्कार नहीं मिलेगा, तो उसने अपने काम को छोड़ दिया होता। जिस चीज़ की पतरस परवाह करता था वह उसके हृदय के भीतर का सच्चा प्रेम था, और उस चीज़ की परवाह करता था जो व्यावहारिक था और जिसे हासिल किया जा सकता था। उसने इस बात की परवाह नहीं की कि उसे पुरस्कार मिलेगा या नहीं, किन्तु इसकी परवाह की कि उसके स्वभाव को बदला जा सकता है या नहीं। पौलुस ने हमेशा और कड़ी मेहनत करने के विषय में परवाह की थी, उसने बाहरी कार्य एवं समर्पण, और उन सिद्धान्तों के विषय में परवाह की थी जिन्हें साधारण लोगों के द्वारा अनुभव नहीं किया गया था। वह अपने भीतर की गहराई में बदलावों और परमेश्वर को सच्चाई से प्रेम करने की परवाह नहीं करता था। पतरस के अनुभव परमेश्वर के सच्चे प्रेम एवं सच्चे ज्ञान को हासिल करने के लिए थे। उसके अनुभव परमेश्वर से एक करीबी सम्बन्ध को पाने के लिए थे, और एक व्यावहारिक जीवन को जीने के लिए थे। पौलुस का कार्य यीशु के द्वारा सौंपे गए कार्य के कारण था, और उन चीज़ों को प्राप्त करने के लिए था जिनकी वह लालसा करता था, फिर भी ये चीज़ें उसके स्वयं के एवं परमेश्वर के विषय में उसके ज्ञान से सम्बन्धित नहीं थीं। उसका कार्य मात्र ताड़ना एवं न्याय से बचने के लिए था। जिस चीज़ की पतरस खोज करता था वह शुद्ध प्रेम था, और जिस चीज़ की पौलुस खोज करता था वह धार्मिकता का मुकुट था। पतरस ने पवित्र आत्मा के कार्य के कई वर्षों का अनुभव किया था, और उसके पास मसीह का एक व्यावहारिक ज्ञान, साथ ही साथ स्वयं का गंभीर ज्ञान भी था। और इस प्रकार, परमेश्वर के प्रति उसका प्रेम शुद्ध था। कई वर्षों के शुद्धिकरण ने यीशु एवं जीवन के विषय में उसके ज्ञान को उन्नत किया था, और उसका प्रेम शर्तरहित प्रेम था, और यह स्वतः ही उमड़ने वाला प्रेम था और वह बदले में कुछ नहीं मांगता था, न ही उसने किसी लाभ की आशा की थी। पौलुस ने कई वर्षों तक काम किया, फिर भी उसने मसीह के महान ज्ञान को धारण नहीं किया, और स्वयं के विषय में उसका ज्ञान भी दयनीय रूप से थोड़ा ही था। उसके पास मसीह के लिए कोई प्रेम ही नहीं था, और उसका कार्य और वह पथक्रम जिस पर वह चलता था, वह अंतिम कीर्ति पाने के लिए था। जिस चीज़ की वह खोज करता था वह अति उत्तम मुकुट था, विशुद्ध प्रेम नहीं। वह सक्रिय रूप से नहीं, परन्तु निष्क्रिय रूप से खोज करता था; वह अपने कर्तव्य को नहीं निभा रहा था, परन्तु पवित्र आत्मा के कार्य द्वारा कब्ज़ा किए जाने के पश्चात् उसे अपने अनुसरण में बाध्य होना पड़ा। और इस प्रकार, उसका अनुसरण यह साबित नहीं करता है कि वह परमेश्वर का एक योग्य प्राणी था; वह पतरस था जो परमेश्वर का एक योग्य प्राणी था जिसने अपने कर्तव्य को निभाया था।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "सफलता या असफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है" से उद्धृत

पौलुस का कार्य कलीसियाओं के प्रयोजन, एवं कलीसियाओं की सहायता से सम्बन्धित था। जो कुछ पतरस ने अनुभव किया था वे उसके जीवन स्वभाव में हुए परिवर्तन थे; उसने परमेश्वर के लिए प्रेम का अनुभव किया था। अब जबकि तू उनके सार के अन्तर को जानता है, तो तू देख सकता है कि कौन, अन्ततः, सचमुच में परमेश्वर पर विश्वास करता था, और कौन वाकई में परमेश्वर पर विश्वास नहीं करता था। उनमें से एक सच्चाई से परमेश्वर से प्रेम करता था, और दूसरा सच्चाई से परमेश्वर से प्रेम नहीं करता था; एक अपने स्वभाव में परिवर्तनों से होकर गुज़रा था, और दूसरा नहीं; एक ने विनम्रतापूर्वक सेवा की थी, और लोगों का उस पर आसानी से ध्यान नहीं जाता था; और दूसरे की लोगों ने अत्यंत प्रशंसा की थी, और वह बड़े शख्सियत का था; एक पवित्रता की खोज करता था, और दूसरा नहीं, और वैसे तो वह अशुद्ध नहीं था, फिर भी वह शुद्ध प्रेम को धारण किए हुए नहीं था; एक सच्ची मानवता को धारण किए हुए था, और दूसरा नहीं; एक परमेश्वर के एक प्राणी के एहसास को धारण किए हुए था, और दूसरा नहीं। पतरस एवं पौलुस के सार में भिन्नताएं इस प्रकार की हैं। वह पथ जिस पर पतरस चला था वह सफलता का पथ था, जो सामान्य मानवता की पुनः प्राप्ति एवं परमेश्वर के प्राणी के कर्तव्य को हासिल करने का भी पथ है। पतरस उन सभी का प्रतिनिधित्व करता है जो सफल हैं। वह पथ जिस पर पौलुस चला, वह असफलता का पथ है और पौलुस उन सभी लोगों का प्रतिनिधित्व करता है जो ऊपरी तौर पर स्वयं को समर्पित एवं खर्च करते हैं, और विशुद्ध रूप से परमेश्वर से प्रेम नहीं करते हैं। पौलुस उन सभी लोगों का प्रतिनिधित्व करता है जो सत्य धारण नहीं करते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "सफलता या असफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है" से उद्धृत

संदर्भ के लिए धर्मोपदेश और संगति के उद्धरण:

वे सभी जिन्होंने परमेश्वर पर विश्वास के उचित मार्ग में प्रवेश नहीं किया है, जिनके जीवन-स्वभाव ने किसी भी परिवर्तन का अनुभव नहीं किया है और जिन्हें सत्य के बारे में तनिक भी समझ नहीं है, जब तक वे अपने उत्साह पर, आशीष प्राप्त करने की अपनी प्रेरणा पर भरोसा करते हैं और कुछ प्रयास करने की इच्छा रखते हैं, तब तक वे सेवा कर सकते हैं। जब कोई सत्य के बारे में कुछ समझ रखता है, परमेश्वर पर सच्चा विश्वास रखता है, परमेश्वर के बारे में ज़रा भी संदेह नहीं करता है, परमेश्वर के कार्य की समझ रखता है, यह जानता है कि परमेश्वर के कार्य का उद्देश्य लोगों को बचाना और पूर्ण करना है और यह देख सकता है कि मनुष्य के लिए परमेश्वर का प्रेम सचमुच महान है, जब व्यक्ति ने एक ऐसा हृदय विकसित कर लिया है जो परमेश्वर से प्रेम करता है, और एक ऐसा हृदय जो उस प्रेम को लौटाता है जो परमेश्वर हमें देता है, जिन कर्तव्यों को इस तरह का व्यक्ति पूरा किया करता है, उन्हें अच्छे कर्म कहा जा सकता है। ऐसा व्यक्ति जिन कर्तव्यों को पूरा करता है, उन्हें केवल सेवा करने के रूप में जानने के बजाय, आधिकारिक रूप से परमेश्वर की रचनाओं में से एक के द्वारा पूर्ण किये गए कर्तव्यों के रूप में समझा जा सकता है। कर्तव्यों को पूरा करने का अर्थ है कि परमेश्वर के प्रेम को लौटाने के साधन के रूप में तुम अपने कर्तव्यों को ठीक से पूरा करने के लिए तैयार हो। कर्तव्यों को पूरा करने और सेवा करने में यही अंतर है। यहाँ इरादा एक जैसा नहीं है। हृदय के अंदर की अवस्था और हालत समान नहीं हैं। सेवा करने का अर्थ आशीष प्राप्त करने की अपनी प्रेरणा से और उत्साही तरीके से कोई कर्तव्य पूरा करना है। सत्य की स्पष्ट समझ की नींव पर ही अपने कर्तव्य को सच्चाई से पूरा किया जाता है। परमेश्वर के प्रेम को जानने और परमेश्वर को इस प्रेम को लौटाने की चाह की बुनियाद पर ही अपने कर्तव्यों को पूरा करने की इच्छा जागृत होती है। यह इस समझ पर आधारित है कि परमेश्वर की किसी रचना द्वारा अपने कर्तव्यों को पूरा किया जाना स्वर्ग की व्यवस्था है। अपने कर्तव्य को सही मायनों में और ठीक से पूरा करने का यही अर्थ है।

— जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति (II) में "अच्छे कर्मों को तैयार करने के पीछे का महत्वपूर्ण अर्थ" से उद्धृत

वे सभी लोग जो जीवन की खोज करने और परमेश्वर की प्रजा होने पर ध्यान केंद्रित करते हैं, अपने कर्तव्य को करना एक ऐसी जिम्मेदारी के रूप में ले पाते हैं जिससे जी नहीं चुराया जा सकता है; वे परमेश्वर के प्रेम को लौटाने के लिए ऐसा करते हैं।, वे अपने कर्तव्यों को करने में इनाम पर बखेड़ा नहीं करते, और उनकी कोई माँग नहीं होती हैं। वे जो कुछ भी करते हैं उनके अपने कर्तव्य को करना कहा जा सकता है। जिन लोगों को सेवा करने वाले कहा जाता है उनकी श्रेणी परमेश्वर को खुश करने के लिए बहुत थोड़े से प्रयास करती है, ताकि उनको आशीष प्राप्त हो सके। उनका विश्वास दूषित होता है। उनके पास कोई विवेक या तर्क नहीं होता है, वे सत्य और जीवन की तलाश तो और भी कम करते हैं। चूँकि वे देख सकते हैं कि अपनी प्रकृति में वे कितने भयानक हैं और इसलिए संभवतः वे परमेश्वर की प्रजा नहीं बन सकते हैं, इसलिए वे परमेश्वर की प्रजा बनने की अपनी खोज को छोड़ देते हैं, और हमेशा एक नकारात्मकता की स्थिति के भीतर रहते हैं। इसलिए वे जो कुछ भी करते हैं, वह सेवा करना मात्र होता है क्योंकि वे परमेश्वर की इच्छा के बारे में अपनी विकृत धारणा से बँधे रहते हैं। किसी व्यक्ति द्वारा लिया गया मार्ग यह निर्धारित करता है कि वह जो भी वह करता है, क्या वह कर्तव्य करना है या सेवा करना है। यदि वह सत्य की तलाश करता है और जीवन पर ध्यान केन्द्रित करता है, परमेश्वर के प्रेम को लौटाने और परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए अपने पूरे कर्तव्य को अच्छी तरह से निभाता है, और परमेश्वर की प्रजा में से एक होने के लिए कड़ी मेहनत करता है, अगर इस तरह का दर्शन उसका सहारा है, तो वह जो कुछ भी करता है वह निश्चित रूप से अपने कर्तव्य को करना है। जिन सभी लोगों में सच्चाई का अभाव होता है, जो निराश होते हैं और नकारात्मकता की स्थिति में रहते हैं, परमेश्वर को प्रसन्न करने और उसकी आँखों में धूल झोंकने के लिए ज़रा-सा प्रयास ही करते हैं, इस तरह के व्यक्ति वे हैं जो मात्र सेवा करते हैं। यह स्पष्ट है कि सभी सेवा करने वाले वास्तव में बिना किसी विवेक या तर्क के लोग हैं, और वे ऐसे लोग हैं जो सत्य की खोज नहीं करते हैं, और उनमें जीवन नहीं होता है। इससे यह स्पष्ट है कि जिन लोगों के पास संकल्प नहीं है, जो सत्य की तलाश नहीं करते हैं, और जो जीवन पर ध्यान केन्द्रित नहीं करते हैं, वे शायद सेवा करने वाला होने के लिए योग्य भी नहीं हैं। वे भयानक प्रकृति के होते हैं; वे सत्य को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होते हैं और परमेश्वर पर विश्वास नहीं करते हैं। वे परमेश्वर के वचनों पर भी संदेह करते हैं। यह निश्चित रूप से उनके स्वयं के साथ धोखाधड़ी है। यदि कोई वास्तव में एक सेवा करने वाला है, तो उसे तब भी अच्छी तरह से सेवा करने की, न कि लापरवाह और असावधान होने की आवश्यकता है। केवल यही उसे एक ऐसा सेवा करने वाला होने के योग्य बना सकता है जो बना रहता है; जो उसे बहुत भाग्यशाली बनाएगा। वास्तव में एक सेवा करने वाला बनना कोई साधारण बात नहीं है।

— ऊपर से संगति में से उद्धृत

सम्बंधित मीडिया