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सूचीपत्र

धार्मिक दुनिया में अधिकांश लोग मानते हैं कि क्रूस पर प्रभु यीशु का यह कहना कि "पूरा हुआ" (यूहन्ना 19:30) सबूत है कि परमेश्वर का उद्धार का कार्य पहले ही पूरी तरह से समाप्त हो चुका है। और फिर भी तुम यह गवाही देते हो कि परमेश्वर सत्य को व्यक्त करने के लिए और लोगों को पूरी तरह से बचाने के लिए परमेश्वर के घर से शुरू होने वाले न्याय के कार्य को करने के लिए देह में लौटा है। तो मनुष्य को बचाने के लिए परमेश्वर के कार्य को वास्तव में कैसे समझना चाहिए? हम सत्य के इस पहलू पर स्पष्ट नहीं हैं, इसलिए कृपया हमारे लिए इस पर सहभागिता करो।

उत्तर:

जब प्रभु यीशु ने सूली पर कहा था "पूरा हुआ" (यूहन्ना 19:30), तब वास्तव में वे किस बारे में ऐसा कह रहे थे? क्या उनका मतलब था कि छुटकारे का कार्य पूरा हो गया है, या वे कहना चाहते थे कि परमेश्वर का मानवजाति को पूरी तरह से बचाने का कार्य पूरा हो चुका है? क्या उस ज़माने के लोग वाकई जान सकते थे? कहा जा सकता है कि कोई नहीं जानता था। प्रभु यीशु ने बस दो शब्द कहे: "पूरा हुआ।" उन्होंने ये नहीं कहा कि परमेश्वर का मानवजाति को बचाने का कार्य पूरा हो गया है। मनुष्य कभी भी सही मायनों में समझ नहीं पाएगा कि प्रभु यीशु ने जब ये कहा कि "पूरा हुआ", तो वे किस बारे में ऐसा कह रहे थे। कोई भी अपने खुद के विचारों के अनुसार प्रभु के वचनों की व्याख्या करने की हिम्मत भला क्यों करेगा? मनमाने ढंग से इस वाक्यांश "पूरा हुआ" की व्याख्या करने की हिम्मत क्यों करें? ये प्रभु यीशु के वचनों पर अपने खुद के इंसानी विचारों को अटकलबाजी से थोपने के सिवाय कुछ नहीं है। इस पर गौर करें, अगर प्रभु यीशु का वचन "पूरा हुआ" इस बात का संकेत देता है कि परमेश्वर का समस्त मानवजाति को बचाने का कार्य अच्छी तरह से पूरा हो गया है, तो फिर प्रभु ने ये भविष्यवाणी क्यों की, "मुझे तुम से और भी बहुत सी बातें कहनी हैं, परन्तु अभी तुम उन्हें सह नहीं सकते। परन्तु जब वह अर्थात् सत्य का आत्मा आएगा, तो तुम्हें सब सत्य का मार्ग बताएगा, क्योंकि वह अपनी ओर से न कहेगा परन्तु जो कुछ सुनेगा वही कहेगा, और आनेवाली बातें तुम्हें बताएगा" (यूहन्ना 16:12-13)। आप इसे कैसे समझते हैं? इसके अलावा, यूहन्ना के सुसमाचार, अध्याय 12, पद 47-48, प्रभु यीशु ने कहा था, "यदि कोई मेरी बातें सुनकर न माने, तो मैं उसे दोषी नहीं ठहराता; क्योंकि मैं जगत को दोषी ठहराने के लिये नहीं, परन्तु जगत का उद्धार करने के लिये आया हूँ। जो मुझे तुच्छ जानता है और मेरी बातें ग्रहण नहीं करता है उसको दोषी ठहरानेवाला तो एक है: अर्थात् जो वचन मैं ने कहा है, वही पिछले दिन में उसे दोषी ठहराएगा।" प्रभु यीशु के वचन हमें साफ़ तौर पर बताते हैं कि प्रभु सत्य को व्यक्त करने और न्याय का कार्य करने के लिए लौटेंगे। बाइबल में भी एक भविष्यवाणी की गयी है: "क्योंकि वह समय आ पहुँचा है कि पहले परमेश्वर के लोगों का न्याय किया जाए" (1 पतरस 4:17)। पादरी और एल्डर की बातों के अनुसार, अगर प्रभु यीशु को सूली पर चढ़ाने के साथ ही मानवजाति को बचाने का सारा कार्य पूरा हो गया, तो फिर प्रभु यीशु की इस भविष्यवाणी, "परन्तु जब वह अर्थात् सत्य का आत्मा आएगा, तो तुम्हें सब सत्य का मार्ग बताएगा" के वचन कैसे सच होंगे? क्या प्रभु यीशु की यह भविष्यवाणी कि वे सत्य को व्यक्त करने और न्याय का कार्य करने के लिए वापस आयेंगे, गलत नहीं हो जाएगी? इसलिए, पादरी और एल्डर की बातें साफ़ तौर पर प्रभु यीशु के वचनों के अनुरूप नहीं हैं, और ये परमेश्वर के कार्य की वास्तविकता से मेल नहीं खाती हैं। हम सबको यह जान लेना चाहिए कि प्रभु यीशु ने जो किया वो मानवजाति के छुटकारे का कार्य था। हमें बस प्रभु यीशु को स्वीकार कर लेना चाहिए, उनके समक्ष पापों को स्वीकार करके पश्चाताप करना चाहिए, और तब हमारे पाप माफ़ कर दिये जायेंगे। तब हम प्रभु से प्रार्थना करने के काबिल हो जाएंगे, और प्रभु के दिये अनुग्रह का आनंद ले पायेंगे। पाप चाहे जो भी हो, व्यवस्था आगे हमें पीड़ित नहीं करेगी। यही प्रभु यीशु के उद्धार के कार्य का परिणाम है। हम अक्सर जिस वाक्यांश "विश्वास के ज़रिए छुटकारे" का उपयोग करते हैं, यही उसका सही अर्थ है। प्रभु यीशु के कार्य से प्राप्त परिणाम से यह बात और अधिक स्पष्ट रूप से साबित हो जाती है कि प्रभु यीशु का कार्य केवल उद्धार का कार्य ही था। किसी भी तरह से यह अंत के दिनों में लोगों का न्याय, शुद्धिकरण और पूर्ण करने का कार्य नहीं था। हालांकि प्रभु यीशु में हमारा विश्वास हमारे पापों को क्षमा दिलाता है, और हम आगे जाहिर तौर पर कोई पाप नहीं करते, और काफी अच्छा बर्ताव करते हैं, फिर भी हम खुद को पाप से पूरी तरह से अलग करके शुद्ध नहीं हो पाये हैं, और पूरी तरह बचाये नहीं गये हैं; है न? क्या हम अभी भी अक्सर झूठ नहीं बोलते हैं और पाप नहीं करते हैं? क्या हम अभी भी लालच नहीं करते हैं और बुरे ख्याल संजोये नहीं रहते हैं? क्या हम अभी भी लोगों से ईर्ष्या नहीं करते हैं, और दूसरों से नफ़रत नहीं करते हैं? क्या हमारे दिलों में अभी भी अहंकार और तिकड़मबाजी नहीं है? क्या हम अभी भी सांसारिक प्रवृत्तियों की नक़ल नहीं करते हैं, धन-दौलत से चिपके नहीं रहते हैं, और प्रतिष्ठा की चाह नहीं रखते हैं? कुछ लोग, जब चीन की कम्युनिस्ट सरकार द्वारा पकड़े या सताये जाते हैं, तो वे परमेश्वर को भी दोष देते हैं। और-तो-और वे पछतावे का बयान भी देते हैं, जिसमें वे परमेश्वर को नकारते हैं और उनको धोखा देते हैं। ख़ास तौर से अंत के दिनों में सर्वशक्तिमान परमेश्वर द्वारा सत्य की अभिव्यक्ति और न्याय के कार्य के बारे में, लोग अपनी खुद की धारणाओं और भ्रांतियों के आधार पर परमेश्वर के कार्य पर अपनी राय बनाते हैं और उसकी निंदा करते हैं। क्या ये सच नहीं है? इसलिए प्रभु में हमारे विश्वास के चलते हम सिर्फ पापों के लिए माफी पाते हैं। लेकिन हमारे भीतर शैतान की प्रवृत्ति और उसका स्वभाव बना रहता है। यही हमारे पापों और परमेश्वर के विरोध का स्रोत है। अगर हमारी आंतरिक पापी प्रकृति का समाधान नहीं हुआ, तो हम परमेश्वर का विरोध करेंगे, उनको धोखा देंगे, और परमेश्वर को अपना शत्रु मानेंगे। क्या आप कहेंगे कि ऐसा व्यक्ति स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने लायक होगा? अब तो यह साफ़ हो गया होगा कि "पूरा हुआ," कहने के पीछे प्रभु यीशु का मतलब सिर्फ़ यह था कि परमेश्वर का छुटकारे का कार्य पूरा हो गया है। निश्चित रूप से वे यह नहीं कह रहे थे कि मानवजाति को बचाने का सारा कार्य पूरा हो गया है। अंत के दिनों के देहधारी सर्वशक्तिमान परमेश्वर संपूर्ण सत्य व्यक्त करने, और परमेश्वर के लोगों से शुरू करके न्याय का कार्य करने आये। यह आगमन लोगों को पूरी तरह से शुद्ध करने और उनको पूरी तरह से बचाने के लिए था, लोगों के भीतर घर कर गयी पाप की बुनियादी समस्या को सुलझाने के लिए था, ताकि लोग पापों से मुक्त हो सकें, शुद्धता प्राप्त कर सकें, पूर्ण उद्धार प्राप्त कर सकें और परमेश्वर के राज्य में प्रवेश कर सकें। आइए, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों के कुछ और अंश पढ़ें, ताकि हम सब इस बात को और अधिक साफ़ तौर पर समझ सकें।

सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "तुम लोगों जैसा पापी, जिसे परमेश्वर के द्वारा अभी-अभी छुड़ाया गया है, और जो परिवर्तित नहीं किया गया है, या सिद्ध नहीं बनाया गया है, क्या तुम परमेश्वर के हृदय के अनुसार हो सकते हो? तुम्हारे लिए, तुम जो कि अभी भी पुराने अहम् वाले हो, यह सत्य है कि तुम्हें यीशु के द्वारा बचाया गया था, और कि परमेश्वर द्वारा उद्धार की वजह से तुम्हें एक पापी के रूप में नहीं गिना जाता है, परन्तु इससे यह साबित नहीं होता है कि तुम पापपूर्ण नहीं हो, और अशुद्ध नहीं हो। यदि तुम्हें बदला नहीं गया तो तुम संत जैसे कैसे हो सकते हो? भीतर से, तुम अशुद्धता से घिरे हुए हो, स्वार्थी और कुटिल हो, मगर तब भी तुम यीशु के साथ आरोहण चाहते हो—तुम्हें बहुत भाग्यशाली होना चाहिए! तुम परमेश्वर पर अपने विश्वास में एक कदम चूक गए हो: तुम्हें मात्र छुटकारा दिया गया है, परन्तु परिवर्तित नहीं किया गया है। तुम्हें परमेश्वर के हृदय के अनुसार होने के लिए, परमेश्वर को व्यक्तिगत रूप से तुम्हें परिवर्तित करने और शुद्ध करने के कार्य को करना होगा; यदि तुम्हें सिर्फ छुटकारा दिया जाता है, तो तुम पवित्रता को प्राप्त करने में असमर्थ होगे। इस तरह से तुम परमेश्वर के अच्छे आशीषों को साझा करने के लिए अयोग्य होगे, क्योंकि तुमने मनुष्य का प्रबंधन करने के परमेश्वर के कार्य के एक कदम का सुअवसर खो दिया है, जो कि परिवर्तित करने और सिद्ध बनाने का मुख्य कदम है। और इसलिए तुम, एक पापी जिसे अभी-अभी छुटकारा दिया गया है, परमेश्वर की विरासत को सीधे तौर पर उत्तराधिकार के रूप में पाने में असमर्थ हो" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "उपाधियों और पहचान के सम्बन्ध में")।

"तुझे जानना होगा कि मैं किस प्रकार के लोगों की इच्छा करता हूँ; ऐसे लोग जो अशुद्ध हैं उन्हें राज्य में प्रवेश करने की अनुमति नहीं है, ऐसे लोग जो अशुद्ध हैं उन्हें पवित्र भूमि को गंदा करने की अनुमति नहीं है। भले ही तूने अधिक कार्य किया हो, और कई सालों तक कार्य किया हो, फिर भी अन्त में तू दुखदाई रूप से मैला है—यह स्वर्ग की व्यवस्था के लिए असहनीय है कि तू मेरे राज्य में प्रवेश करने की कामना करता है! संसार की स्थापना से लेकर आज तक, मैंने कभी भी उन लोगों को अपने राज्य में आसान प्रवेश नहीं दिया है जो अनुग्रह पाने के लिए मेरी खुशामद करते हैं। यह स्वर्गीय नियम है, और इसे कोई तोड़ नहीं सकता है!" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "सफलता या असफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है")।

"यद्यपि यीशु ने मनुष्यों के बीच अधिक कार्य किया है, उसने केवल समस्त मानवजाति के छुटकारे के कार्य को पूरा किया और वह मनुष्य की पाप-बलि बना, और मनुष्य को उसके भ्रष्ट स्वभाव से छुटकारा नहीं दिलाया। शैतान के प्रभाव से मनुष्य को पूरी तरह बचाने के लिये यीशु को न केवल पाप-बलि के रूप में मनुष्यों के पापों को लेना आवश्यक था, बल्कि मनुष्य को उसके स्वभाव, जिसे शैतान द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया था, से पूरी तरह मुक्त करने के लिए परमेश्वर को और भी बड़े कार्य करने की आवश्यकता थी। और इसलिए, मनुष्य को उसके पापों के लिए क्षमा कर दिए जाने के बाद, एक नये युग में मनुष्य की अगुवाई करने के लिए परमेश्वर वापस देह में लौटा, और उसने ताड़ना एवं न्याय के कार्य को आरंभ किया, और इस कार्य ने मनुष्य को एक उच्चतर क्षेत्र में पहुँचा दिया। वे सब जो परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन समर्पण करेंगे उच्चतर सत्य का आनंद लेंगे और अधिक बड़ी आशीषें प्राप्त करेंगे। वे वास्तव में ज्योति में निवास करेंगे, और सत्य, मार्ग और जीवन को प्राप्त करेंगे" ("वचन देह में प्रकट होता है" के लिए प्रस्तावना)।

"मनुष्य को छुटकारा दिये जाने से पहले, शैतान के बहुत से ज़हर उसमें पहले से ही गाड़ दिए गए थे। हज़ारों वर्षों तक शैतान द्वारा भ्रष्ट किये जाने के बाद, मनुष्य के भीतर पहले ही ऐसा स्वभाव है जो परमेश्वर का विरोध करता है। इसलिए, जब मनुष्य को छुटकारा दिया गया है, तो यह छुटकारे से बढ़कर और कुछ नहीं है, जहाँ मनुष्य को एक ऊँची कीमत पर खरीदा गया है, परन्तु भीतर का विषैला स्वभाव नहीं हटाया गया है। मनुष्य जो इतना अशुद्ध है उसे परमेश्वर की सेवा करने के योग्य होने से पहले एक परिवर्तन से होकर अवश्य गुज़रना चाहिए। न्याय और ताड़ना के इस कार्य के माध्यम से, मनुष्य अपने भीतर के गन्दे और भ्रष्ट सार को पूरी तरह से जान जाएगा, और वह पूरी तरह से बदलने और स्वच्छ होने में समर्थ हो जाएगा। केवल इसी तरीके से मनुष्य परमेश्वर के सिंहासन के सामने वापस लौटने के योग्य हो सकता है। वह सब कार्य जिसे आज किया गया है वह इसलिए है ताकि मनुष्य को स्वच्छ और परिवर्तित किया जा सके; न्याय और ताड़ना के वचन के द्वारा और साथ ही शुद्धिकरण के माध्यम से, मनुष्य अपनी भ्रष्टता को दूर फेंक सकता है और उसे शुद्ध किया जा सकता है। इस चरण के कार्य को उद्धार का कार्य मानने के बजाए, यह कहना कहीं अधिक उचित होगा कि यह शुद्ध करने का कार्य है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "देहधारण का रहस्य (4)")।

"अंत के दिनों का कार्य, सभी को उनके स्वभाव के आधार पर पृथक करना, परमेश्वर की प्रबंधन योजना का समापन करना है, क्योंकि समय निकट है और परमेश्वर का दिन आ गया है। परमेश्वर उन सभी को, जिन्होंने उसके राज्य में प्रवेश कर लिया है अर्थात्, वे सभी लोग जो अंत तक उसके वफादार रहे हैं, स्वयं परमेश्वर के युग में ले जाता है। हालाँकि, जब तक स्वयं परमेश्वर का युग नहीं आ जाता है तब तक परमेश्वर जो कार्य करेगा वह मनुष्य के कर्मों को देखना या मनुष्य जीवन के बारे में पूछताछ करना नहीं, बल्कि उनके विद्रोह का न्याय करना है, क्योंकि परमेश्वर उन सभी को शुद्ध करेगा जो उसके सिंहासन के सामने आते हैं। वे सभी जिन्होंने आज के दिन तक परमेश्वर के पदचिन्हों का अनुसरण किया है वे लोग हैं जो परमेश्वर के सिंहासन के सामने आ गए हैं, इसलिए, ऐसा हर एक व्यक्ति जो परमेश्वर के कार्य को इसके अंतिम चरण में स्वीकार करता है, वह परमेश्वर द्वारा शुद्ध किए जाने लायक है। दूसरे शब्दों में, हर कोई जो परमेश्वर के कार्य को इसके अंतिम चरण में स्वीकार करता है वही परमेश्वर के न्याय का पात्र है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "मसीह न्याय का कार्य सत्य के साथ करता है")।

"अंत के दिन पहले ही आ चुके हैं। सृष्टि की सभी चीज़ों को उनके प्रकार के अनुसार वर्गीकृत किया जाएगा, और उनकी प्रकृति के आधार पर विभिन्न श्रेणियों में विभाजित किया जाएगा। यही वह क्षण है जब परमेश्वर लोगों के परिणाम और उनकी मंज़िल को प्रकट करता है। यदि लोग ताड़ना और न्याय से नहीं गुज़रते हैं, तो उनकी अवज्ञा और अधार्मिकता को प्रकट करने का कोई तरीका नहीं होगा। केवल ताड़ना और न्याय के माध्यम से ही सभी सृजनों का अंत प्रकट हो सकता है। मनुष्य केवल तभी अपने वास्तविक रंगों को दिखाता है जब उसे ताड़ना दी जाती है और उसका न्याय किया जाता है। दुष्ट को दुष्ट के साथ, भले को भले के साथ रखा जाएगा, और समस्त मानव जाति को उनके प्रकार के अनुसार वर्गीकृत किया जाएगा। ताड़ना और न्याय के माध्यम से, सभी सृजनों का अंत प्रकट किया जाएगा, ताकि दुष्ट को दंडित किया जा सके और अच्छे को पुरस्कृत किया जा सके, और सभी लोग परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन हो जाएँगे। यह समस्त कार्य धार्मिक ताड़ना और न्याय के माध्यम से अवश्य प्राप्त किया जाना चाहिए। क्योंकि मनुष्य की भ्रष्टता अपने चरम पर पहुँच गई है और उसकी अवज्ञा अत्यंत गंभीर हो गई है, इसलिए केवल परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव ही, जो मुख्यत: ताड़ना और न्याय से संयुक्त है और जो अंत के दिनों में प्रकट होता है, मनुष्य को रूपान्तरित और पूर्ण बना सकता है। केवल यह स्वभाव ही दुष्टता को उजागर कर सकता है और इस तरह सभी अधार्मिकों को गंभीर रूप से दण्डित कर सकता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)")।

"परमेश्वर की ताड़ना और न्याय का सार मानवजाति को शुद्ध करना है, और यह अंतिम विश्राम के दिन के लिए है। अन्यथा, संपूर्ण मानवजाति अपने स्वयं के स्वभाव का अनुसरण करने या विश्राम में प्रवेश करने में समर्थ नहीं होगी। यह कार्य ही मानवजाति के लिए विश्राम में प्रवेश करने का एकमात्र मार्ग है। केवल परमेश्वर द्वारा शुद्ध करने का कार्य ही मानवजाति को उसकी अधार्मिकता से शुद्ध करेगा, और केवल उसका ताड़ना और न्याय का कार्य ही मानव जाति की अवज्ञा की बातों को प्रकाश में लाएगा, फलस्वरूप, जिन्हें बचाया नहीं जा सकता है उनमें से जिन्हें बचाया जा सकता है उन्हें, और जो नहीं बचेंगे उनमें से जो बचेंगे उन्हें अलग करेगा। जब उसका कार्य समाप्त हो जाएगा, तो जो शेष बचेंगे वे शुद्ध किए जाएँगे, और जब वे मानवजाति के उच्चतर राज्य में प्रवेश करेंगे तो एक अद्भुत द्वितीय मानव जीवन का पृथ्वी पर आनंद उठाएँगे; दूसरे शब्दों में, वे मानवजाति के विश्राम में प्रवेश करेंगे और परमेश्वर के साथ-साथ रहेंगे। जो नहीं बच सकते हैं उनके ताड़ना और न्याय से गुजरने के बाद, उनके मूल स्वरूप पूर्णतः प्रकट हो जाएँगे; उसके बाद वे सबके सब नष्ट कर दिए जाएँगे और, शैतान के समान, उन्हें पृथ्वी पर जीवित रहने की अनुमति नहीं होगी। भविष्य की मानवजाति में इस प्रकार के कोई भी लोग शामिल नहीं होंगे; ये लोग अंतिम विश्राम के देश में प्रवेश करने के योग्य नहीं है, न ही ये लोग उस विश्राम के दिन में प्रवेश करने के योग्य हैं जिसे परमेश्वर और मनुष्य दोनों साझा करेंगे, क्योंकि वे दण्ड के लक्ष्य हैं और दुष्ट हैं, और वे धार्मिक लोग नहीं हैं। ...बुरे को दण्ड और अच्छे को पुरस्कार देने का उसका परम कार्य समस्त मानवजाति को सर्वथा शुद्ध करने के लिए है, ताकि वह पूर्णतः शुद्ध मानवजाति को अनंत विश्राम में ले जाए। उसके कार्य का यह चरण सबसे अधिक महत्वपूर्ण कार्य है। यह उसके समस्त प्रबंधन कार्य का अंतिम चरण है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे")।

सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने अंत के दिनों में परमेश्वर के न्याय के कार्य के महत्व और उसके नतीजों के बारे में बहुत साफ़ तौर पर बताया है। इससे हम सुनिश्चित हो सकते हैं कि अंत के दिनों में परमेश्वर का न्याय का कार्य ही वह कार्य है, जो मानवजाति का पूरी तरह से शुद्धिकरण और बचाव करता है। प्रभु यीशु ने छुटकारे का जो कार्य किया, वह अंत के दिनों में परमेश्वर के न्याय कार्य का रास्ता बनाता है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर, प्रभु यीशु के छुटकारे के कार्य की बुनियाद पर न्याय और शुद्धिकरण का कार्य करते हैं, और मानवजाति को पूरी तरह से पाप से बचा कर परमेश्वर के राज्य में लाते हैं। क्या परमेश्वर का ऐसा करना बहुत व्यावहारिक नहीं है? अगर हम सिर्फ प्रभु यीशु के छुटकारे के कार्य को स्वीकार कर लें और परमेश्वर के अंत के दिनों के न्याय और शुद्धिकरण के कार्य को अस्वीकार कर दें, तो हम परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करने की काबिलियत कैसे पायेंगे? लगता है कि परमेश्वर में विश्वास के लिए हमें उनके कार्य की समझ होना ज़रूरी है। ये हमेशा से बेहद अहम रहा है! फिर भी बहुतेरे धार्मिक लोग सिर्फ आस्था के ज़रिए उद्धार में विश्वास रखते हैं। उनका मानना है कि प्रभु में विश्वास से पापों की माफी मिल जाती है, और सारी दिक्कतें खत्म हो जाती हैं, वे ऐसा मानते हैं कि दयावान और प्रेमपूर्ण प्रभु इंसान के हर पाप को माफ़ कर देते हैं। अपने आगमन पर वे उन सभी को स्वर्ग के राज्य में आरोहित कर देंगे। इसलिए वे सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अंत के दिनों के न्याय के कार्य को स्वीकार करने से मना कर देते हैं। ये कैसी समस्या है? क्या ऐसा इंसान परमेश्वर के कार्य को समझ पाता है? क्या वे लोग परमेश्वर के धर्मी स्वभाव को समझ पाते हैं? क्या आपको लगता है कि परमेश्वर ऐसे किसी शैतानी किस्म के इंसान को अपने राज्य में प्रवेश करने की इजाज़त देंगे, जो उनके खिलाफ विद्रोह और उनका विरोध करता है? वे नहीं देंगे! ऐसे इंसान को अगर परमेश्वर के राज्य में प्रवेश मिल जाए तो क्या नतीजा होगा? आइए, एक उदाहरण पर गौर करें। अगर यहोवा परमेश्वर में विश्वास करनेवाले इस्राएलियों को परमेश्वर के राज्य में लाया गया होता, तो आपको क्या लगता है, क्या होगा? वे देहधारी परमेश्वर, प्रभु यीशु को भी स्वीकार नहीं कर पाये थे, और उन लोगों ने प्रभु यीशु की निंदा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी, और प्रभु यीशु को सूली पर चढ़ा दिया। ये शैतानी किस्म के लोग जो परमेश्वर का यों पागलों की तरह विरोध करते हैं, अगर वे परमेश्वर के राज्य में प्रवेश कर लें, तो क्या वे परमेश्वर का विरोध करते रहेंगे? क्या वे विद्रोह करेंगे? क्या वे प्रभु की शक्ति छीनने की कोशिश करेंगे? प्रभु यीशु उपदेश देने के लिए उपासना गृह में क्यों नहीं गये? इसलिए कि यहूदी धर्म के मुख्य पादरी, धर्मगुरु और फरीसी बहुत दुष्ट थे। वे कुछ भी कर सकते थे। हम सभी जानते हैं कि जब उन लोगों ने प्रभु यीशु को पकड़ लिया, तो उन लोगों ने उन्हें मारा-पीटा, उन पर ताने कसे, और उन पर थूका। यहाँ तक कि उन्हें सूली पर चढ़ाने के लिए रोमन सरकार को सौंप दिया। प्रभु यीशु को पहले से मालूम था कि वे एक सांप की तरह हैं, इसलिए वे उपदेश देने के लिए उपासना गृह में नहीं गये। अंत के दिनों में, प्रभु यीशु वापस आ गये हैं। वे उपदेश देने के लिए कलीसियाओं में क्यों नहीं जाते? इसलिए कि कलीसियाओं के सभी अगुवा बड़े दुष्ट हैं। अगर देहधारी सर्वशक्तिमान परमेश्वर कलीसियाओं में जाते हैं, तो वे पुलिस को ज़रूर बुलायेंगे। वे पक्के तौर पर सर्वशक्तिमान परमेश्वर को सीसीपी सरकार के हवाले कर देंगे। क्या ये सच नहीं है? क्या हम सर्वशक्तिमान परमेश्वर की खुले आम गवाही देने के लिए कलीसियाओं में जाने की हिम्मत करते हैं? अगर आप उनके सामने सर्वशक्तिमान परमेश्वर की गवाही देंगे, तो वे ज़रूर आपको पकड़ कर बेइज्जत करेंगे और पब्लिक सिक्योरिटी (जन सुरक्षा) ब्यूरो के हवाले कर देंगे। यही वजह है कि आजकल की कलीसियाएं उस ज़माने के यहूदी धर्म के उपासना गृहों जैसी ही हैं। वे सब ऐसी जगहें हैं जहां परमेश्वर को खदेड़ा जाता है, उनका विरोध किया जाता है और उनकी निंदा की जाती है। क्या यही तरीका है? यह दर्शाता है कि मानवजाति किस हद तक भ्रष्ट हो सकती है। लोग सत्य से उकता चुके हैं और उससे नफ़रत करते हैं। लोग परमेश्वर के आगमन को नामंजूर करते हैं, वे सब शैतानी किस्म के लोग हो गये हैं और परमेश्वर का विरोध करते हैं। अगर अंत के दिनों में परमेश्वर ने सत्य को व्यक्त करने, लोगों का न्याय करने और उनको शुद्ध करने के लिए देहधारण न किया होता, तो परमेश्वर मानवजाति द्वारा उनके विरोध की वजह से लोगों को तबाह कर देते।

— "राज्य के सुसमाचार पर विशिष्ट प्रश्न और उत्तर संकलन" से उद्धृत

अब ऐसे कुछ लोग हैं जो बताते हैं कि क्रूस पर प्रभु यीशु ने जो आख़िरी बात कही थी, वह थी "पूरा हुआ" (यूहन्ना 19:30)। और तब वे कहते हैं: "जब प्रभु यीशु ने पापबलि बनकर सेवा की थी, तो उसने परमेश्वर के उद्धार का कार्य पूरा कर दिया था। हम अपने पापों को क्षमा करा चुके हैं क्योंकि हम प्रभु यीशु में विश्वास करते हैं। हमें केवल विश्वास के द्वारा उचित ठहरा दिया गया है और हम स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने में सक्षम होंगे। हमें सिर्फ प्रभु द्वारा हमारे स्वर्गारोहण की प्रतीक्षा करनी है।" या वे कहते हैं: "सब कुछ तैयार है, हमें सिर्फ स्वर्गारोहण की आवश्यकता है।" क्या इसे सत्यापित किया जा सकता है? नहीं, यह नहीं हो सकता। हम केवल इसे सत्यापित कर सकते हैं कि हमारे पापों को माफ़ किया गया है। हम इसे कैसे सत्यापित कर सकते हैं? चाहे तुम कैसा भी पाप करो, तुम्हें केवल प्रार्थना करने और अपने पाप को स्वीकार करने की ज़रूरत होती है और तुम आनंद और शांति महसूस करोगे, और तुम्हारी आत्मा पाप के बंधन से मुक्त हो जाएगी। जब कोई पाप नहीं होता है, तो व्यक्ति छुटकारे को महसूस करता है! तो क्या हम यह कह सकते हैं कि पापबलि पूरी तरह से वास्तविक है और यह कुछ ऐसी बात है जिसकी, प्रभु यीशु में विश्वास करने वाले सभी लोग अपने अनुभवों के माध्यम से, पुष्टि कर सकते हैं। लेकिन यह कहना किसी भी तरह से पक्का नहीं है कि "प्रभु यीशु में विश्वास करने से परमेश्वर का उद्धार हासिल हो जाएगा और पाप से सम्पूर्ण अलगाव हो जाएगा। यदि तुम प्रभु यीशु में विश्वास करते हो, तो तुम परमेश्वर के द्वारा सराहे जाओगे और स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करोगे।" प्रभु यीशु ने यह नहीं कहा, और इसके लिए कोई सबूत भी नहीं है। कोई सबूत क्यों नहीं है? मनुष्य के पापों को माफ़ कर दिया गया है, लेकिन क्या उसके शैतानी स्वभाव, उसकी पापी प्रकृति को माफ़ किया जा सकता है? नहीं। क्या प्रभु यीशु ने कभी भी यह कहा था "तुम्हारे पाप जब एक बार क्षमा हो जाते हैं, तो तुम स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकते हो"? क्या प्रभु यीशु ने कभी यह कहा था: "तुम्हें बस मुझ पर विश्वास करना होगा और स्वर्ग के राज्य में तुम्हारे लिए एक स्थान होगा"? परमेश्वर ने ऐसा कभी नहीं कहा। बाइबल में प्रभु यीशु ने क्या कहा? "जो मुझ से, 'हे प्रभु! हे प्रभु!' कहता है, उनमें से हर एक स्वर्ग के राज्य में प्रवेश न करेगा, परन्तु वही जो मेरे स्वर्गीय पिता की इच्छा पर चलता है" (मत्ती 7:21)। तो "वही जो मेरे स्वर्गीय पिता की इच्छा पर चलता है" किसको संदर्भित करता है? इसका मतलब है कि तुम्हें परमेश्वर की इच्छा को पूरा करना है, परमेश्वर के मार्ग का अनुसरण करना है, सत्य के मार्ग अर्थात परमेश्वर के वचन को व्यवहार में लाना है। एक व्यक्ति को वह करना चाहिए जिसकी परमेश्वर उससे अपेक्षा करता है और उसे परमेश्वर के निर्देशों का सख्ती से पालन करना चाहिए, और केवल तब ही वह स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकेगा। परन्तु अनुग्रह के युग में कितने लोग परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा कर पाने में सक्षम थे? एक भी नहीं। इस प्रकार, हम यह कह सकते हैं कि अनुग्रह के युग का कार्य छुटकारे के कार्य का एक चरण है। बाइबल में यह भविष्यवाणी की गई है कि जब प्रभु लौट कर आएगा, तो वह न्याय और ताड़ना के कार्य के एक चरण को पूरा करेगा ताकि परमेश्वर के सामने आने वाले सभी लोगों को शुद्ध किया जा सके। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर अंत के दिनों में युग को समाप्त करने से पहले, शुद्धिकरण के कार्य के एक चरण को पूरा करने जा रहा है। और वे सभी बातें, जिनकी प्रभु यीशु ने भविष्यवाणी की थी, जैसे कि गेहूं को जंगली दानों के पौधों से अलग करना, भेड़ों को बकरियों से, बुद्धिमान कुंवारियों को मूर्ख कुंवारियों से, और अच्छे सेवकों को बुरे नौकरों से अलग करना—ये सब सच हो जाएँगी। प्रभु यीशु की भविष्यवाणी के मुताबिक़, अंत दिनों के दौरान, परमेश्वर लोगों का न्याय करने, लोगों को शुद्ध करने, हर किसी को उसकी श्रेणी के अनुसार अलग करने का कार्य करेगा, जैसा कि बाइबल में स्पष्ट रूप से भविष्यवाणी की गयी है। उदाहरण के तौर पर: "क्योंकि वह समय आ पहुँचा है कि पहले परमेश्‍वर के लोगों का न्याय किया जाए" (1 पतरस 4:17), "जिनकी रक्षा परमेश्‍वर की सामर्थ्य से विश्‍वास के द्वारा उस उद्धार के लिये, जो आनेवाले समय में प्रगट होनेवाली है, की जाती है" (1 पतरस 1:5), "देख, मैं चोर के समान आता हूँ" (प्रकाशितवाक्य 16:15), "यदि तू जागृत न रहेगा तो मैं चोर के समान आ जाऊँगा" (प्रकाशितवाक्य 3:3), "जो जय पाए उसे मैं अपने परमेश्‍वर के मन्दिर में एक खंभा बनाऊँगा, और वह फिर कभी बाहर न निकलेगा; और मैं अपने परमेश्‍वर का नाम और अपने परमेश्‍वर के नगर अर्थात् नये यरूशलेम का नाम, जो मेरे परमेश्‍वर के पास से स्वर्ग पर से उतरनेवाला है, और अपना नया नाम उस पर लिखूँगा" (प्रकाशितवाक्य 3:12)। ये सभी भविष्यवाणियाँ हमारे प्रभु की वापसी के दौरान किये जाने वाले कार्य का उल्लेख करती हैं। इससे साबित होता है कि व्यवस्था के युग से लेकर युग को समाप्त करने के लिए प्रभु की वापसी के समय तक, कार्य के तीन चरण हैं। यह सच है, और इसे प्रकाशितवाक्य में, बाइबल की भविष्यवाणियों में देखा जा सकता है। अनुग्रह के युग का कार्य छुटकारे का कार्य था—यह निश्चित रूप से मानवजाति की पापपूर्ण प्रकृति को ख़त्म करने के लिए शुद्धिकरण का कार्य नहीं था। प्रभु यीशु में विश्वास करने वाला एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं है, जिसकी पापी प्रकृति पूरी तरह से समाप्त हो गई हो, एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं है जिसने माफ़ी मिलने के बाद फिर से पाप न किया हो, कोई भी ऐसा नहीं जिसने अपने स्वभाव में पूर्ण परिवर्तन को हासिल किया हो, एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं जो कि वास्तव में परमेश्वर को जानता हो। ये सभी तथ्य हैं। अनुग्रह के युग के दौरान मानवजाति ने 2,000 वर्षों तक परमेश्वर में विश्वास किया, लेकिन पांच मौलिक समस्याओं का समाधान नहीं हो पाया: सबसे पहला, मानवजाति की पाप करने के प्रति शैतानी प्रकृति का समाधान नहीं हुआ; दूसरा, मानवजाति के शैतानी स्वभाव को प्रकट करने का मामला अनसुलझा रहा; तीसरा, प्रत्येक व्यक्ति के जीवन स्वभाव के परिवर्तन के मामले का समाधान नहीं हुआ; चौथा, मानवजाति परमेश्वर को कैसे जाने और कैसे परमेश्वर की आज्ञा का पालन करे, इसे पूरी तरह से समझा नहीं जा सका; पांचवां, मानवजाति कैसे शुद्धि प्राप्त करे, इस प्रश्न को भी पूरी तरह से हल नहीं किया गया। ये पांच मौलिक समस्याएं अनसुलझी रह गई, और इससे यह साबित होता है कि अनुग्रह के युग में परमेश्वर का कार्य छुटकारे के कार्य का एक चरण था—यह मानवजाति के उद्धार के कार्य का अंतिम चरण नहीं था। अनुग्रह के युग का कार्य, अंत के दिनों के उद्धार के कार्य के लिए मार्ग बनाना और उसकी नींव तैयार करना था।

— ऊपर से संगति से उद्धृत

बचाये जाने का वास्तव में क्या मतलब है? धर्म के लोग मानते हैं कि चूँकि क्रूस पर "पूरा हुआ" (यूहन्ना 19:30) प्रभु यीशु के अंतिम शब्द थे, जब तक तुम प्रभु यीशु में विश्वास करते हो और तुम्हारे पाप माफ किये जाते हैं, तो इसका मतलब है कि तुम बचा लिए गए हो। धर्म के लोग परमेश्वर के कथन को ग़लत ढंग से समझते हैं क्योंकि वे परमेश्वर के कार्य को नहीं जानते हैं। प्रभु यीशु ने जब कहा था "पूरा हुआ", तो वह किस बात की ओर इशारा कर रहा था? वह परमेश्वर के छुटकारे के कार्य के पूरा होने की बात कर रहा था, और निश्चित रूप से परमेश्वर की प्रबंधन योजना के पूरा होने का जिक्र नहीं कर रहा था। इसलिए, यह एक तथ्य है कि परमेश्वर ने जो कहा है, उसे ग़लत समझना और उसके कार्य के बारे में राय बना लेना उन लोगों के लिए बिल्कुल आसान है, जो परमेश्वर के कार्य को जानते ही नहीं हैं। तो आखिर उद्धार क्या है? क्या पाप की माफ़ी सच्चा उद्धार है? नहीं, यह केवल अंत के दिनों में परमेश्वर के कार्य के लिए एक आधार तैयार करता है, और एक नींव स्थापित करता है। मनुष्यों को बचाने का परमेश्वर का कार्य वास्तव में अंत के दिनों का कार्य है। अनुग्रह के युग में पाप के चढ़ावे की बुनियाद पर अंत दिनों का कार्य स्थापित किया गया है। केवल पाप के चढ़ावे के कारण ही मनुष्य के पापों को क्षमा किया गया है और इंसान अपने कार्य को प्राप्त करने के लिए परमेश्वर के सामने आने के योग्य बना है। केवल अंत के दिनों के न्याय और ताड़ना, परीक्षणों और शुद्धिकरण के कारण ही वास्तव में मनुष्य को शैतान के प्रभाव से और उसकी शैतानी प्रकृति के नियंत्रण से मुक्त किया जा सकता है। शैतान के द्वारा भष्ट किये गए मानव स्वभाव को बदलने में, शैतान के प्रभाव से मनुष्य को बचाने में, और मनुष्य को परमेश्वर की ओर पूरी तरह से मोड़ने के लक्ष्य तक पहुँचाने में केवल अंत के दिनों का कार्य ही सक्षम है। इसलिए, यदि परमेश्वर पर विश्वास करने में मनुष्य अंत के दिनों के परमेश्वर के कार्य का अनुभव नहीं करता है, तो वह वास्तव में उद्धार तक नहीं पहुँच सकता है। ...

परमेश्वर पवित्र और धर्मी है। मनुष्य के पापों को माफ़ कर दिए जाने के बाद भी, मनुष्य को पाप की जड़ से अर्थात् उसकी शैतानिक प्रकृति से छुटकारा नहीं दिया गया है। यदि मनुष्य हमेशा की तरह परमेश्वर का विरोध करता है और परमेश्वर को धोखा दिए जाता है, तो क्या यह परमेश्वर के स्वभाव के विरुद्ध अपराध नहीं है? यदि परमेश्वर अपने राज्य में एक ऐसे इंसान को उठा लेता है जो अभी भी विरोध करने और उसे धोखा देने में सक्षम है, तो यह क्या दर्शाएगा? क्या यह इसे इंगित नहीं करेगा कि परमेश्वर ने खुद को धोखा दिया है? यह भ्रष्ट इंसान अभी भी परमेश्वर का विरोध कर सकता है और एक बार फिर मसीह को क्रूस पर कीलों से जड़ने में सक्षम है। यदि एक ऐसा इंसान वो इंसान है जिसे बचा लिया गया है, तो परमेश्वर की पवित्रता और धार्मिकता को समझाने का कोई तरीका नहीं है, इसका कोई अर्थ ही नहीं है। परमेश्वर का राज्य कैसे एक ऐसे इंसान के अस्तित्व को मंज़ूर कर सकता है जो परमेश्वर का विरोध करता हो? यह असंभव है क्योंकि परमेश्वर का स्वभाव मनुष्य के अपराध को बर्दाश्त नहीं करता है। इसलिए, यदि तुम कहते हो: "एक ऐसा व्यक्ति जिसे पाप का चढ़ावा मिला है, वह बचा लिया गया है, और वह परमेश्वर के राज्य में प्रवेश कर सकता है," तो इन शब्दों से कोई बात नहीं बनेगी।

— ऊपर से संगति से उद्धृत

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