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सूचीपत्र

तुम कहते हो कि जो लोग परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, उन्हें परमेश्वर के अंतिम दिनों के न्याय के कार्य को स्वीकार करना चाहिए और उसके बाद ही उनके भ्रष्ट स्वभाव शुद्ध हो सकते हैं और स्वयं वे परमेश्वर द्वारा बचाए जा सकते हैं। परन्तु हम, परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार, नम्रता और धैर्य का अभ्यास करते हैं, हमारे दुश्मनों से प्रेम करते हैं, हमारे क्रूसों को उठाते हैं, संसार की चीजों को त्याग देते हैं, और हम परमेश्वर के लिए काम करते हैं और प्रचार करते हैं, इत्यादि। तो क्या ये सभी हमारे बदलाव नहीं हैं? हमने हमेशा इस तरह से चाह की है, तो क्या हम भी शुद्धि तथा स्वर्गारोहण को प्राप्त नहीं कर सकते और स्वर्ग के राज्य में प्रवेश नहीं कर सकते?

उत्तर:

हम अपने शत्रुओं से प्रेम कर सकते हैं, क्रूस उठा सकते हैं, अपनी देह पर विजय प्राप्‍त कर सकते हैं, और प्रभु के सुसमाचार का प्रसार कर सकते हैं। ये प्रभु में हमारे विश्‍वास के कारण उत्‍पन्‍न होने वाले सकारात्‍मक आचार हैं, और इस प्रकार आचरण करने में समर्थ होने से यह प्रकट होता है कि प्रभु में हमारी आस्था सच्‍ची है। ये अच्‍छे आचरण दूसरों को सही और ऐसे प्रतीत हो सकते हैं मानो वे परमेश्‍वर के वचनों के अनुरूप हैं, परंतु इसका अर्थ यह नहीं है कि हम परमेश्‍वर के वचनों पर अमल कर रहे और स्‍वर्गिक पिता की इच्‍छा का पालन कर रहे हैं, न ही इसका तात्‍पर्य यह है कि हम अपना पापी स्‍वभाव छोड़ कर शुद्ध हो गए हैं। दूसरों के अच्‍छे आचरण को देखते समय हम उनके बाह्य प्रदर्शन मात्र को ही नहीं देख सकते, बल्कि हमें उनके इरादों और अंतिम उद्देश्‍यों को भी देखना चाहिए। यदि किसी का इरादा परमेश्‍वर की आज्ञा का पालन करना, उनसे प्रेम करना और उन्‍हें संतुष्‍ट करना है, तो इस प्रकार का अच्‍छा आचरण सत्‍य को अमल में लाना और स्‍वर्गिक पिता की इच्‍छा का पालन करना हुआ। वहीं दूसरी ओर, यदि किसी का अच्‍छा आचरण मात्र आशीष पाने, प्रतिष्‍ठा प्राप्‍त करने और पुरस्‍कार पाने के लिए है, और यह परमेश्‍वर के प्रति प्रेमपूर्ण हृदय के कारण नहीं है, तो इस प्रकार का "अच्‍छा व्‍यवहार" स्‍वर्गिक पिता की इच्‍छा पर अमल करना नहीं बल्कि फरीसियों के पाखंड के समान हुआ। अगर मात्र अच्‍छे व्‍यवहार का प्रदर्शन करने का मतलब यह हुआ कि हम स्‍वर्गिक पिता की इच्‍छा का पालन कर रहे हैं और शुद्ध हो गए हैं, तो फ़िर क्‍यों हम बहुधा पाप करते और परमेश्‍वर का विरोध करते हैं? क्‍यों हम दिन में पापमय जीवन जीते और रात में पश्‍चाताप करते हैं? इससे यह साफ़ पता चलता है कि केवल अच्‍छे व्‍यवहार के प्रदर्शन का तात्‍पर्य यह नहीं होता कि हम सत्‍य पर अमल कर रहे और परमेश्‍वर के वचन की वास्‍तविकता को जी रहे हैं, न ही इसका अर्थ यह है कि हम परमेश्‍वर को जानते हैं या उनके प्रति श्रद्धापूर्ण हृदय रखते हैं, उन्‍हें प्रेम करने और उनकी आज्ञा का पालन की योग्‍यता रखना तो दूर की बात रही। जैसा कि सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के वचन कहते हैं: "जो परिवर्तन व्यवहार से अधिक किसी बात में नहीं होते, वे देर तक नहीं टिकते हैं। अगर लोगों के जीवन-स्वभाव में कोई बदलाव नहीं होता है, तो देर-सबेर उनका दुष्ट पक्ष स्वयं को दिखाएगा। क्योंकि उनके व्यवहार में परिवर्तन का स्रोत उत्साह है, जो पवित्र आत्मा द्वारा उस समय किये गए कुछ कार्य के साथ मिलकर, उनके लिए उत्साही बनना या कुछ समय के लिए अच्छा बनना बहुत आसान होता है। जैसा कि अविश्वासी लोग कहते हैं, 'एक अच्छा कर्म करना आसान है, मुश्किल तो यह है कि जीवन भर अच्छे कर्म किए जाएँ।' लोग आजीवन अच्छे कर्म करने में असमर्थ हैं। उनका व्यवहार जीवन द्वारा निर्देशित होता है; जैसा भी उनका जीवन है, उनका व्यवहार भी वैसा ही होता है, और केवल वही जो स्वाभाविक रूप से प्रकट होता है जीवन का और व्यक्ति के स्वभाव का प्रतिनिधित्व करता है। जो चीजें नकली हैं, वे टिक नहीं सकतीं। ...अच्छी तरह से व्यवहार करना परमेश्वर के प्रति आज्ञा-पालन करने के समान नहीं है, और यह मसीह के अनुरूप होने के बराबर तो और भी नहीं है। व्यवहार में परिवर्तन सिद्धांत पर आधारित होते हैं, और उत्साह से पैदा होते हैं—वे परमेश्वर के सच्चे ज्ञान पर या सत्य पर आधारित नहीं होते हैं, वे पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन में आश्रित तो और भी कम होते हैं। यद्यपि ऐसे मौके होते हैं जब लोग जो भी करते हैं उसमें से कुछ पवित्र आत्मा द्वारा निर्देशित होता है, यह जीवन की अभिव्यक्ति नहीं है, और यह बात परमेश्वर को जानने के समान तो और भी नहीं है; चाहे किसी व्यक्ति का व्यवहार कितना भी अच्छा हो, वह इसे साबित नहीं करता कि वे परमेश्वर के प्रति आज्ञा-पालन करते हैं, या वे सत्य का अभ्यास करते हैं" ("मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "बाहरी परिवर्तन और स्वभाव में परिवर्तन के बीच अंतर")। सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के वचन हमें अच्‍छे आचरण का सार और मूल स्‍पष्‍ट रूप से समझाते हैं। मनुष्‍य का अच्‍छा आचरण उत्‍साह से आता है और यह अनेक सत्‍य समझने के उपरांत होने वाले अभ्‍यास के सिद्धांतबोध या परमेश्‍वर की इच्‍छा को समझ जाने के कारण उनसे प्रेम करने और उन्हें संतुष्‍ट करने की इच्‍छा से नहीं वरन मतों और नियमों पर आधारित व्‍यवहार है। अच्‍छा व्‍यवहार मनुष्‍य की धारणाओं और कल्‍पनाओं से उपजता है, और ये मनुष्‍य की अपनी राय और उसके भ्रष्‍ट स्‍वभाव से आते हैं। इसलिए मनुष्‍य चाहे जो करे, जितनी भी पीड़ा भोगे या कोई भी मूल्‍य चुकाए, वह सत्‍य पर अमल नहीं कर रहा है। यह परमेश्‍वर के प्रति समर्पित होना नहीं हुआ और ऐसा करना पवित्र आत्‍मा के कार्य से उत्‍पन्‍न नहीं होता। जब हम अच्‍छा व्‍यवहार प्रदर्शित करते हैं और कुछ नियमों का पालन करते हुए, बहुत पवित्र और आध्‍यात्मिक प्रतीत होते हैं, तो भी अपने कट्टर शैतानी स्‍वभाव, अनसुलझी पापी प्रकृति और परमेश्‍वर की सच्‍ची समझ के अभाव के कारण पाप करने और परमेश्‍वर का विरोध करने की हमारी प्रवृत्ति बनी रहती है। हमने अच्‍छा आचरण करने वाले कई लोग देखे हैं, जो परमेश्‍वर में विश्‍वास करने के पश्‍चात अभी भी बहुधा पाप करते और अपने पापों को स्वीकार करते हैं। यह एक अखंडनीय तथ्‍य है। पाप करते हुए या परमेश्‍वर का विरोध करते हुए अच्‍छा आचरण करना इस बात का पर्याप्‍त प्रमाण है कि वे स्‍वर्गिक पिता की इच्‍छा का पालन नहीं कर रहे, और वे परमेश्‍वर की प्रशंसा नहीं पा सकते। यहूदी फरीसी कानून के पाबंद और ऊपरी तौर पर त्रुटिहीन व्‍यवहार करने वाले लोग थे। तब भी, जब प्रभु यीशु अपना कार्य करने के लिए आए, तो क्‍यों उन्‍होंने विक्षिप्‍तों की तरह उनका विरोध किया, उनकी निंदा की, उनके विरुद्ध षड्यंत्र किये और फिर प्रभु यीशु को सूली पर चढ़ा दिया? यह दिखाता है कि परमेश्‍वर का विरोध करने की प्रवृत्ति उनमें सहज ही थी। चाहे प्रत्‍यक्ष तौर पर वे कितना ही भला व्‍यवहार क्‍यों न कर रहे थे, इसका अर्थ यह नहीं हुआ कि उन्‍होंने परमेश्‍वर को समझा, उनका आज्ञापालन किया या वे उनके अनुरूप काम किया; परमेश्‍वर की इच्‍छा का पालन करना और शुद्ध होना तो दूर की बात रही। अगर हम अपनी पापी प्रकृति का समाधान करना और शुद्ध होना चाहते हैं, तो हमें अंत के दिनों के परमेश्‍वर के न्‍याय और ताड़ना के कार्य का अनुभव करना चाहिए, उसमें निहित प्रचुर सत्‍यों को समझना चाहिए और परमेश्‍वर का सच्‍चा ज्ञान प्राप्‍त करना चाहिए, ताकि हमें परमेश्‍वर की सच्‍ची आज्ञाकारिता और भय प्राप्‍त हो सके। अन्‍यथा हमारे भीतर गहराई से पैठा हुआ शैतान का भ्रष्‍ट स्‍वभाव कभी भी शुद्ध या परिवर्तित नहीं हो पाएगा, और हम न तो कभी परमेश्‍वर के हृदयानुकूल बन पाएँगे और न ही कभी उनके राज्‍य में प्रवेश कर पाएँगे।

प्रभु यीशु ने अभी-अभी छुटकारे का कार्य किया है। इसलिये, पूरी कोशिश करने और बाइबल पढ़ने के बावजूद भी, अनुग्रह के युग में हम अपने पापों से मुक्त नहीं हो पाए, इसके अतिरिक्त हम शुद्धता हासिल नहीं कर पाए। इंसान को बचाने के लिये, अपनी प्रबंधन योजना के चरणों के मुताबिक, परमेश्वर ने उस न्याय के कार्य को पूर्वनियत किया था जो इंसानों को शुद्ध करने, रूपांतरित करने, पाप से बाहर निकलने और शुद्धता पाने उनकी मदद करने के लिए परमेश्वर के भवन से शुरू होता है। यह बिल्कुल वैसा है जैसा कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं: "यद्यपि यीशु ने मनुष्यों के बीच अधिक कार्य किया है, उसने केवल समस्त मानवजाति के छुटकारे के कार्य को पूरा किया और वह मनुष्य की पाप-बलि बना, और मनुष्य को उसके भ्रष्ट स्वभाव से छुटकारा नहीं दिलाया। शैतान के प्रभाव से मनुष्य को पूरी तरह बचाने के लिये यीशु को न केवल पाप-बलि के रूप में मनुष्यों के पापों को लेना आवश्यक था, बल्कि मनुष्य को उसके स्वभाव, जिसे शैतान द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया था, से पूरी तरह मुक्त करने के लिए परमेश्वर को और भी बड़े कार्य करने की आवश्यकता थी। और इसलिए, मनुष्य को उसके पापों के लिए क्षमा कर दिए जाने के बाद, एक नये युग में मनुष्य की अगुवाई करने के लिए परमेश्वर वापस देह में लौटा, और उसने ताड़ना एवं न्याय के कार्य को आरंभ किया, और इस कार्य ने मनुष्य को एक उच्चतर क्षेत्र में पहुँचा दिया। वे सब जो परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन समर्पण करेंगे उच्चतर सत्य का आनंद लेंगे और अधिक बड़ी आशीषें प्राप्त करेंगे। वे वास्तव में ज्योति में निवास करेंगे, और सत्य, मार्ग और जीवन को प्राप्त करेंगे" ("वचन देह में प्रकट होता है" के लिए प्रस्तावना)। "पापबलि के माध्यम से, मनुष्य के पापों को क्षमा किया गया है, क्योंकि सलीब पर चढ़ने का कार्य पहले से ही पूरा हो चुका है और परमेश्वर ने शैतान को जीत लिया है। परन्तु मनुष्य का भ्रष्ट स्वभाव अभी भी उसके भीतर बना हुआ है और मनुष्य अभी भी पाप कर सकता है और परमेश्वर का प्रतिरोध कर सकता है; परमेश्वर ने मानवजाति को प्राप्त नहीं किया है। इसीलिए कार्य के इस चरण में परमेश्वर मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव को प्रकट करने के लिए वचन का उपयोग करता है और मनुष्य से सही मार्ग के अनुसार अभ्यास करवाता है। यह चरण पिछले चरण की अपेक्षा अधिक अर्थपूर्ण और साथ ही अधिक लाभदायक भी है, क्योंकि अब वचन ही है जो सीधे तौर पर मनुष्य के जीवन की आपूर्ति करता है और मनुष्य के स्वभाव को पूरी तरह से नया बनाए जाने में सक्षम बनाता है; यह कार्य का ऐसा चरण है जो अधिक विस्तृत है। इसलिए, अंत के दिनों में देहधारण ने परमेश्वर के देहधारण के महत्व को पूरा किया है और मनुष्य के उद्धार के लिए परमेश्वर की प्रबंधन योजना का पूर्णतः समापन किया है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "देहधारण का रहस्य (4)")। परमेश्वर के वचनों से हम समझ सकते हैं कि प्रभु यीशु के छुटकारे के कार्य ने, अंत के दिनों में परमेश्वर के उद्धार-कार्य की नींव डाली और अंत के दिनों में, न्याय का कार्य परमेश्वर के उद्धार-कार्य का मूल और केंद्र-बिंदु है। ये इंसान के उद्धार की कुंजी, सबसे अहम हिस्सा है। अनुग्रह के युग में परमेश्वर के कार्य के अनुभव के ज़रिये, हमारे पापों को क्षमा कर दिया जाता है, लेकिन हमें उनसे मुक्त नहीं किया जा सकता और न ही हम शुद्धता पा सकते हैं। केवल अंत के दिनों में परमेश्वर के न्याय का कार्य ही हम में ज़रूरी सत्‍य का कार्य कर सकता है, जिसके ज़रिये हम परमेश्वर को जान सकते हैं और अपना स्वभाव बदल सकते हैं उनकी आराधना कर सकते हैं, उनके दिल तक पहुँच सकते हैं। और इस तरह से इंसान को बचाने के लिये, परमेश्वर अपनी प्रबंधन योजना को पूरा करते हैं।

— "राज्य के सुसमाचार पर विशिष्ट प्रश्न और उत्तर संकलन" से उद्धृत

यदि हम केवल प्रभु यीशु के अनुग्रह के युग के छुटकारे के कार्य को स्वीकार करें, लेकिन सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अंत के दिनों के न्याय और ताड़ना के कार्य को स्वीकार न करें, तो फिर हम अपने पापों से मुक्त नहीं हो पाएंगे, स्वर्ग के पिता की इच्छा को पूरा नहीं कर पाएंगे और परमेश्वर के राज्य में प्रवेश नहीं कर पाएंगे। इसमें कोई शक नहीं है! क्योंकि अनुग्रह के युग में प्रभु यीशु ने अपना छुटकारे का कार्य किया था। उस समय लोगों के स्तर को देखते हुए, प्रभु यीशु ने उन्हें केवल पश्चाताप का मार्ग दिया, और लोगों से बस कुछ प्राथमिक सच्चाइयों को समझने और पथ पर चलने के लिये कहा। मिसाल के तौर पर: उन्होंने लोगों से कहा कि वो अपने पापों को स्वीकार करें, पश्चाताप करें और क्रूस धारण करें। उन्होंने लोगों को दीनता, संयम, प्रेम, उपवास और बपतिस्मा वगैरह सिखाया। इन्हीं कुछ सीमित सच्चाइयों को उस ज़माने के लोग समझ और हासिल कर सकते थे। प्रभु यीशु ने उनके सामने कभी भी ऐसी सच्चाई नहीं कही, जिनका संबंध जीवन स्वभाव को बदलने, बचाए जाने, निर्मल होने और पूर्ण होने से था, क्योंकि उस ज़माने में लोगों का स्तर ऐसा नहीं था कि वो उन सच्चाइयों को धारण कर पाते। इंसान को तब तक इंतज़ार करना चाहिये जब तक प्रभु यीशु अंत के दिनों में अपना कार्य करने के लिये लौटकर नहीं आते। वो दूषित इंसान को बचाने और उसे पूर्ण बनाने के लिये वो सारी सच्चाइयां प्रदान करेंगे, जो इंसान को बचाने और दूषित इंसान की ज़रूरतों के लिये परमेश्वर की प्रबंधन योजना के अनुसार हैं। जैसा कि प्रभु यीशु ने कहा था, "मुझे तुम से और भी बहुत सी बातें कहनी हैं, परन्तु अभी तुम उन्हें सह नहीं सकते। परन्तु जब वह अर्थात् सत्य का आत्मा आएगा, तो तुम्हें सब सत्य का मार्ग बताएगा, क्योंकि वह अपनी ओर से न कहेगा परन्तु जो कुछ सुनेगा वही कहेगा, और आनेवाली बातें तुम्हें बताएगा" (यूहन्ना 16:12-13)। प्रभु यीशु के वचन बहुत स्पष्ट हैं। अनुग्रह के युग में, प्रभु यीशु ने दूषित लोगों को उन्हें बचाए जाने के लिये आवश्यक सत्य कभी नहीं बताए। अभी भी बहुत-सी गहरे और ऊंचे सत्य हैं, यानी प्रभु यीशु ने ऐसे बहुत-से सत्य इंसान को नहीं बताए जिनसे इंसान अपने शैतानी स्वभाव से मुक्त हो सकता है और शुद्धता हासिल कर सकता है, और ऐसे सत्य परमेश्वर को जानने के लिये इंसान को जिनका पालन करना ज़रूरी है। इसलिये, सर्वशक्तिमान परमेश्वर अंत के दिनों में वो सारे सत्य व्यक्त कर देते हैं, जो इंसान को बचाने के लिये ज़रूरी हैं। जो लोग अंत के दिनों में सर्वशक्तिमान परमेश्वर के उद्धार को स्वीकार करते हैं, वे उनके न्याय, ताड़ना और निर्मलता के लिये इन सत्य का प्रयोग करते हैं। अंत में इन लोगों को पूर्ण बना दिया जाएगा और परमेश्वर के राज्य में ले जाया जाएगा। और इस तरह से इंसान को बचाने की परमेश्वर की प्रबंधन योजना पूरी हो जाएगी। अगर हम केवल प्रभु यीशु के छुटकारे के कार्य को स्वीकार करते हैं, लेकिन सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अंत के दिनों के न्याय के कार्य को स्वीकार नहीं करते, तो हम कभी भी न तो सत्य को पा सकेंगे और न ही अपने स्वभाव को बदल पाएंगे। हम कभी भी परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने वाले नहीं बन पाएंगे और परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करने योग्य नहीं बन पाएंगे।

अंत के दिनों के लोगों को शैतान ने बुरी तरह से दूषित कर दिया है; हम में शैतान का ज़हर भरा है। हमारा नज़रिया, जीने के सिद्धांत, जीवन के प्रति दृष्टिकोण वगैरह, सब सत्य के विरुद्ध और परमेश्वर से बैर रखने वाले हैं। हम सभी बुराई को पूजते हैं और परमेश्वर के दुश्मन बन गए हैं। अगर सभी मनुष्य पूरी तरह से दूषित शैतानी स्वभाव के हैं, और वचनों के ज़रिये सर्वशक्तिमान परमेश्वर के न्याय, ताड़ना, ताप और निर्मलता की अनुभूति नहीं करते है, तो वो शैतान से विद्रोह करके उनके प्रभाव से खुद को आज़ाद कैसे करेंगे? वो परमेश्वर का आदर कैसे कर सकते हैं, बुराई से कैसे दूर रह सकते हैं और परमेश्वर की इच्छा को कैसे पूरा कर सकते हैं? हमने देखा है कि बहुत से लोग प्रभु यीशु में बरसों से भरोसा करते आ रहे हैं, लेकिन बावजूद इसके कि वो लोग पूरी गर्मजोशी से यीशु की गवाही देते हैं वो उद्धारक है और बरसों से मेहनत भी कर रहे हैं, लेकिन वो परमेश्वर के धर्मी स्वभाव को नहीं जान पाए और न ही उन्हें पूज पाए, जिस कारण वो अभी भी परमेश्वर के कार्य को जाँचते हैं, निंदा करते हैं, नकारते हैं और जब सर्वशक्तिमान परमेश्वर अंत के दिनों में अपना कार्य करते हैं तो वे परमेश्वर के लौटने को नामंज़ूर कर देते हैं। वे तो अंत के दिनों में मसीह के लौटने पर उन्हें फिर से सूली पर चढ़ा देते हैं। इससे ये पता चलता है कि अगर हम सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अंत के दिनों के न्याय और ताड़ना के कार्य को स्वीकार नहीं करते हैं तो, हमारे के पापों और शैतानी प्रकृति को कभी भी सुधारा नहीं जा सकेगा। परमेश्वर के प्रति हमारा विरोध हमें बर्बाद कर देगा। इस सच्चाई को कोई नहीं झुठला सकता! हम विश्वासियों में से जो लोग ईमानदारी से अंत के दिनों में परमेश्वर के न्याय और ताड़ना को स्वीकार करेंगे, केवल वे ही लोग जीवन की तरह सत्य को पाएंगे, स्वर्ग के पिता की इच्छा को पूरा करने वाले बनेंगे, परमेश्वर को जानने वाले बनेंगे और परमेश्वर के साथ उनका तालमेल होगा। वही परमेश्वर की प्रतिज्ञा को साझा करने के काबिल होंगे और उनके राज्य में ले जाए जाएंगे।

— "राज्य के सुसमाचार पर विशिष्ट प्रश्न और उत्तर संकलन" से उद्धृत

क्या यह पवित्रता जिसके बारे में धर्म के लोग बोलते हैं, और वह पवित्रता जिसकी परमेश्वर माँग करता है, एक ही हैं? वे एक नहीं हैं, इसलिए जिस पवित्रता की बात मनुष्य करता है, वह वास्तविक पवित्रता नहीं है। अगर यीशु पर विश्वास करने में तुम सचमुच पवित्र हो, तो क्या अब भी परमेश्वर को अंत के दिनों का कार्य करने की आवश्यकता है? तुमने कई सालों तक यीशु पर विश्वास नहीं किया है, लेकिन अब तुम कहते हो कि तुम बदल गए हो; तो तुम सभी पादरियों पर नज़र डालो जो यीशु पर विश्वास करते हैं, और उन ईसाइयों पर जिन्होंने आजीवन परमेश्वर पर विश्वास किया है, क्या वे पवित्र हैं? उनमें से कौन पवित्र है? उनमें से कौन यह कहने की हिम्मत रखता है कि अपने समूचे जीवन में परमेश्वर पर विश्वास करने के बाद, वह पवित्र है, और उसे पूरी तरह से बचाया गया है? तुमको इस तरह का एक भी व्यक्ति नहीं मिलेगा। इन लोगों ने अपने पूरे जीवन भर परमेश्वर पर विश्वास किया है और फिर भी वे यह नहीं कह सकते कि वे पवित्र हैं। क्या यह कहने का कोई अर्थ है कि थोड़े समय के लिए ही परमेश्वर पर विश्वास करने से तुम पवित्रता प्राप्त कर चुके हो? अगर कोई बेटा या बेटी यह कहे कि "समाज में कई साल रहकर मैंने समाज को अच्छी तरह देख और जान लिया है," तो क्या यह भोलापन नहीं होगा? तुम अपने माता-पिता से और जो तुम से बड़े हैं, उनसे पूछ सकते हो, कि क्या उन्होंने समाज को पूरी तरह देखा और जाना है? अगर उनमें से किसी ने भी समाज को पूरी तरह नहीं जाना है, तो क्या तुम इसे पूरा जान सकते हो? इसलिए, मनुष्य सच्चाई को नहीं समझता है, और नहीं जानता कि वास्तविक पवित्रता क्या है। उसका मानना है कि वह इने-गिने मामलों में अच्छे तरीके से व्यवहार करता है, वह परमेश्वर पर विश्वास करता है और लड़ाई-झगड़े में नहीं पड़ता, वह चीज़ों को नहीं चुराता, वह लोगों को बुरा-भला नहीं कहता, वह शराब नहीं पीता है, और इसलिए वह पवित्र है। यह पवित्रता को नहीं दर्शाता है। वास्तविक पवित्रता का मतलब क्या है? इसमें भी एक सत्य शामिल है। सच्ची पवित्रता का अर्थ शैतान के विषों से मुक्त होना है। मनुष्यों के दिल में शैतान का तर्क, शैतान का दर्शन, शैतान की सभी प्रकार की भ्रांतियाँ, मनुष्य के जीवन के लिए शैतान के नियम, जीवन के प्रति और जीवन के मूल्यों के प्रति शैतानी दृष्टिकोण, क्या ये शैतान के विष नहीं हैं? मनुष्य के पाप करने और परमेश्वर के ख़िलाफ़ उसके प्रतिरोध को क्या नियंत्रित करता है? यह मनुष्य के भीतर मौजूद शैतान के विष ही हैं जो मनुष्य को पाप करने के लिए उत्तेजित करते हैं, और दूसरों को आँकने, गलत समझने, और अवज्ञा करने के लिए उकसाते हैं। मनुष्य के पाप का स्रोत मनुष्य के भीतर बसी शैतान की प्रकृति है। परमेश्वर की दृष्टि में शैतान से संबंधित सभी चीज़ें गन्दी और बुरी हैं, इसलिए मनुष्य जिसके भीतर शैतान के सभी प्रकार के जहर हैं, एक गंदा और पतित व्यक्ति बन गया है। शैतान के ये जहर मनुष्य के अंदर जड़ें जमा चुके हैं, फल-फूल पैदा कर चुके हैं, और मनुष्य अब एक भ्रष्ट इंसान, एक गंदा इंसान और एक बुरा इंसान बन गया है। इसलिए, यह एक तथ्य है कि इंसान परमेश्वर का विरोध करता है और परमेश्वर का एक शत्रु है। इस तथ्य के मुताबिक, हम किस समस्या को देखते हैं जिसका हल मनुष्य को करना चाहिए ताकि उसमें असली पवित्रता आ सके? उसे शैतान के विषों का समाधान करने की जरूरत है, उसे जीवन के बारे में शैतान के दृष्टिकोण और जीवन के मूल्यों का, शैतान के तर्क का, शैतान के नियमों का, शैतान की सभी प्रकार की भ्रांतियों का समाधान करना होगा। यदि इन चीजों को मनुष्यों के दिलों से पूरी तरह से हटा दिया जाता है, तो यह सचमुच शुद्ध किया जाना है। अगर इन बातों को मनुष्यों के दिलों से निकाला नहीं जाता है, तो मनुष्य अब भी परमेश्वर का विरोध करने, परमेश्वर को आँकने, परमेश्वर का शत्रु बनने और परमेश्वर को धोखा देने में सक्षम रहेगा। इसलिए, इंसान को केवल तभी एक सचमुच पवित्र इंसान माना जा सकता है, जब शैतान की चीज़ों से छुटकारा मिल जाता है, और उन्हें हटा दिया जाता है। अच्छा, तो क्या यीशु पर विश्वास करके शैतान के जहर का समाधान करना संभव है? क्या यीशु में विश्वास जीवन के प्रति और जीवन के मूल्यों के प्रति मनुष्य के दृष्टिकोण को बदल सकता है? क्या यह सही मायनों में परमेश्वर का आज्ञापालन करने और परमेश्वर का विरोध न करने में मनुष्य की अगुआई कर सकता है? क्या यह परमेश्वर को सचमुच जानने और परमेश्वर की आराधना करने में मनुष्य का नेतृत्व कर सकता है? यीशु में विश्वास करके तुम केवल अपने पापों को क्षमा करा चुके हो; मनुष्य की भ्रष्टता के वास्तविक समाधान पर पहुँचने और पवित्र बनने के लिए, मनुष्य को अंत के दिनों में परमेश्वर के न्याय और ताड़ना के कार्य की ज़रूरत होती है। अंत के दिनों के कार्य के बिना, भ्रष्ट मानव जाति शुद्धि प्राप्त नहीं कर सकती है। शुद्धि सिर्फ पाप की माफी के माध्यम से प्राप्त नहीं होती है, बल्कि सच्ची शुद्धि न्याय और ताड़ना द्वारा मनुष्य को उसके भ्रष्ट स्वभाव से मुक्त करने के माध्यम से प्राप्त की जाती है। जब मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव का समाधान हो जाता है, तो वह अब परमेश्वर का विरोध नहीं करता, वह परमेश्वर का अनुसरण करने में सक्षम हो जाता है, वह अपने दिल में परमेश्वर से प्रेम कर सकता है, और वह सच्चाई से प्रेम करने में सक्षम होता है; केवल इसी प्रकार के मनुष्य पवित्र इंसान हैं। पवित्रता किसे कहा जाता है, कुछ लोग यह समझने में विफल रहते हैं, वे मानते हैं कि पवित्र होने का मतलब चोरी नहीं करना, लूट-पाट नहीं करना, तोड़-फोड़ नहीं करना है, और पवित्रता का अर्थ है दूसरों को नहीं मारना और दूसरों को बुरा-भला नहीं कहना। क्या ये सही है? यह लक्ष्य से, या उद्देश्य से बहुत दूर है और वे समस्या को केवल उसके बाहरी स्वरूप से देख रहे हैं। क्योंकि धर्म के लोगों के पास सच्चाई नहीं होती है, वे सभी इसी दिशा में सोचते हैं। वे चीजों के प्रति बहुत एकपक्षीय दृष्टिकोण रखते हैं, वे स्रोत को नहीं देखते हैं, वे सार को नहीं देखते हैं; इसलिए, इसमें कोई आश्चर्यजनक नहीं है कि ये लोग इस तरह से सोच सकते थे।

— ऊपर से संगति से उद्धृत

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