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सूचीपत्र

प्रभु यीशु के छुटकारे के कार्य का एक पहलू हमारे पापों को क्षमा और निरस्त करना था, जबकि दूसरा पहलू हमें शांति, आनन्द और भरपूर अनुग्रह प्रदान करना था। इससे हम यह देख पाते हैं कि परमेश्वर एक दयालु और प्रेमी परमेश्वर है। परन्तु तुम यह गवाही देते हो कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर अंतिम दिनों में न्याय का कार्य करता है, कि वह सत्य को अभिव्यक्त करता है और मनुष्य को न्याय और ताड़ना देता है, मनुष्य को काटता-छाँटता और उससे निपटता है, मनुष्य को उजागर करता है और सभी प्रकार के बुरे लोगों, बुरी आत्माओं और मसीह-विरोधियों को हटा देता है, जिससे लोगों को यह देखने का अवसर मिलता है कि परमेश्वर का धर्मी स्वभाव किसी भी अपराध को सहन नहीं करता है। प्रभु यीशु के कार्य में प्रकट होने वाला स्वभाव सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कार्य में प्रकट होने वाले स्वभाव से बिलकुल अलग क्यों है? हमें परमेश्वर के स्वभाव को यथार्थतः किस प्रकार समझना चाहिए?

उत्तर:

जब से प्रभु यीशु ने अनुग्रह के युग में छुटकारे का कार्य किया है, हमने देखा है कि वे सहिष्‍णुता और धैर्य से परिपूर्ण, प्रेम और दयालुता से परिपूर्ण हैं। जब तक हम प्रभु यीशु में विश्‍वास करते रहेंगे, हमारे पाप क्षमा हो जाएँगे और हम परमेश्‍वर के अनुग्रह का आनंद ले पाएँगे। परिणामस्‍वरूप, हमने यह निर्णय निकाला कि परमेश्‍वर एक प्रेमपूर्ण और दयावान परमेश्‍वर हैं, कि वे सदैव मनुष्‍य के प्रति क्षमावान हैं और उसे उसके हर पाप से विमुक्त करते हैं, और जैसे एक माँ अपने बच्‍चों की अत्‍यंत परवाह करती हुई, कभी उन पर नाराज़ न होते हुए मातृवत् व्‍यवहार करती है, परमेश्‍वर हमारे साथ सदैव, ठीक वैसा ही व्‍यवहार करते हैं। इसीलिए कई लोग, जब अंत के दिनों में सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर को सत्‍य व्‍यक्‍त करते हुए और बिना कोई दया दिखाए, मनुष्‍य की भ्रष्‍टता को साफ़ तौर पर उजागर करने वाली एकदम कटु भाषा में उसका न्‍याय करते हुए देखते हैं, तो वे पशोपेश में पड़ जाते हैं; और जब परमेश्‍वर दुष्‍ट लोगों, मसीह-विरोधियों और फरीसियों की निंदा करते और उन्‍हें श्राप देते हैं तो ऐसे लोग इसे समझ नहीं पाते। वे यह महसूस करते हैं कि परमेश्‍वर को मनुष्‍य का न्‍याय करने के लिए ऐसे कटु शब्‍दों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। यह तथ्‍य कि हम इस प्रकार का मत रख सकते हैं, पूरी तरह से परमेश्‍वर के अंतिर्निहित स्‍वभाव के ज्ञानाभाव का परिणाम है। किसी भी युग में परमेश्‍वर जो भी स्‍वभाव प्रकट करते हैं, वह सदैव मनुष्‍य जाति को बचाने की उनकी आवश्‍यकता पर आधारित रहता है, और व‍ह भ्रष्‍ट मानवजाति की आवश्‍यकताओं द्वारा भी निर्धारित होता है। यह सब कुछ मनुष्‍य जाति को छुटकारा दिलाने और बचाने के प्रयोजन से ही है। यदि हम सत्‍य के इस पहलू को समझना और परमेश्‍वर के स्‍वभाव का सच्‍चा ज्ञान प्राप्‍त करना चाहते हैं, तो आइए सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के वचनों के कुछ अंश पढ़ते हैं।

सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "जो कार्य यीशु ने किया वह उस युग में मनुष्य की आवश्यकताओं के अनुसार था। उसका कार्य मानवजाति को छुटकारा दिलाना, उन्हें उनके पापों के लिए क्षमा करना था, और इसलिए उसका स्वभाव पूरी तरह से विनम्रता, धैर्य, प्रेम, धर्मपरायणता, सहनशीलता, दया और करुणामय-प्यार से भरा था। उसने मानवजाति को प्रचुरता से धन्य किया और वह उनके लिए ढेर सारा अनुग्रह लाया, और वे सभी चीज़ें जिनका वे संभवतः आनन्द ले सकते थे, उसने उन्हें उनके आनंद के लिए दी: शांति और प्रसन्नता, अपनी सहनशीलता और प्रेम, अपनी दया और अपना करुणामय-प्यार। उन दिनों, वह सब जिनसे मनुष्य का सामना होता था, वह थीं उसके आनन्द की ढेर सारी चीज़ें: उनके हृदय शांत और आश्वस्त थे, उनकी आत्माओं को सान्त्वना थी, और उन्हें उद्धारकर्ता यीशु द्वारा जीवित रखा गया था। वे इन चीज़ों को प्राप्त कर सके, यह उस युग का एक परिणाम था जिसमें वे रहते थे" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "छुटकारे के युग में कार्य के पीछे की सच्ची कहानी")।

"अतीत में, उद्धार का उसका साधन परम प्रेम और करुणा दिखाना रहा था, इतनी कि उसने संपूर्ण मानवजाति के बदले में अपना सर्वस्व शैतान को दे दिया। आज अतीत के जैसा कुछ नहीं है: आज, तुम लोगों का उद्धार, स्वभाव के अनुसार प्रत्येक के वर्गीकरण के दौरान, अंतिम दिनों के समय में होता है; तुम लोगों के उद्धार का साधन प्रेम या करुणा नहीं है, बल्कि ताड़ना और न्याय है ताकि मनुष्य को अधिक अच्छी तरह बचाया जा सके" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "तुम लोगों को हैसियत के आशीषों को अलग रखना चाहिए और मनुष्य के उद्धार के लिए परमेश्वर की इच्छा को समझना चाहिए")।

"युग का समापन करने के अपने अंतिम कार्य में, परमेश्वर का स्वभाव ताड़ना और न्याय का है, जिसमें, सार्वजनिक रूप से सभी लोगों का न्याय करने, और उन लोगों को सिद्ध बनाने के लिए, जो एक ईमानदार हृदय से उसे प्यार करते हैं, वह सब कुछ प्रकट करता है जो अधार्मिक है। केवल इस तरह का एक स्वभाव ही युग का समापन कर सकता है। अंत के दिन पहले ही आ चुके हैं। सृष्टि की सभी चीज़ों को उनके प्रकार के अनुसार वर्गीकृत किया जाएगा, और उनकी प्रकृति के आधार पर विभिन्न श्रेणियों में विभाजित किया जाएगा। यही वह क्षण है जब परमेश्वर लोगों के परिणाम और उनकी मंज़िल को प्रकट करता है। यदि लोग ताड़ना और न्याय से नहीं गुज़रते हैं, तो उनकी अवज्ञा और अधार्मिकता को प्रकट करने का कोई तरीका नहीं होगा। केवल ताड़ना और न्याय के माध्यम से ही सभी सृजनों का अंत प्रकट हो सकता है। मनुष्य केवल तभी अपने वास्तविक रंगों को दिखाता है जब उसे ताड़ना दी जाती है और उसका न्याय किया जाता है। दुष्ट को दुष्ट के साथ, भले को भले के साथ रखा जाएगा, और समस्त मानव जाति को उनके प्रकार के अनुसार वर्गीकृत किया जाएगा। ताड़ना और न्याय के माध्यम से, सभी सृजनों का अंत प्रकट किया जाएगा, ताकि दुष्ट को दंडित किया जा सके और अच्छे को पुरस्कृत किया जा सके, और सभी लोग परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन हो जाएँगे। यह समस्त कार्य धार्मिक ताड़ना और न्याय के माध्यम से अवश्य प्राप्त किया जाना चाहिए। क्योंकि मनुष्य की भ्रष्टता अपने चरम पर पहुँच गई है और उसकी अवज्ञा अत्यंत गंभीर हो गई है, इसलिए केवल परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव ही, जो मुख्यत: ताड़ना और न्याय से संयुक्त है और जो अंत के दिनों में प्रकट होता है, मनुष्य को रूपान्तरित और पूर्ण बना सकता है। केवल यह स्वभाव ही दुष्टता को उजागर कर सकता है और इस तरह सभी अधार्मिकों को गंभीर रूप से दण्डित कर सकता है। इसलिए, इस तरह का स्वभाव युग के महत्व से सम्पन्न होता है, और उसके स्वभाव का प्रकटन और प्रदर्शन प्रत्येक नए युग के कार्य के वास्ते अभिव्यक्त किया जाता है। ऐसा नहीं है कि परमेश्वर अपने स्वभाव को मनमाने ढंग से और महत्व के बिना प्रकट करता है। माना कि, जब अंत के दिनों के दौरान मनुष्य का परिणाम प्रकट करने में, मनुष्य को धार्मिक न्याय के अधीन नहीं करके, बल्कि इसके बजाय उसके प्रति सहिष्णुता, धैर्य और क्षमा दर्शाते हुए, और चाहे मनुष्य का पाप कितना ही गंभीर क्यों न हो उसे माफ़ करते हुए, रत्ती भर भी धार्मिक न्याय के बिना, परमेश्वर अभी भी मनुष्य पर अनन्त करुणा और प्रेम प्रदान करता और उसके प्रति प्रेममय रहना जारी रखता: तब परमेश्वर के समस्त प्रबंधन का कभी भी कब अंत किया जाता? इस तरह का कोई स्वभाव कब मानव जाति की उचित मंज़िल में अगुआई करने में सक्षम होगा? उदाहरण के लिए, ऐसे न्यायाधीश को लें जो हमेशा प्रेममय है, ऐसा न्यायाधीश जिसका उदार चेहरा और सौम्य हृदय हो। वह लोगों को उनके द्वारा किए गए अपराधों के बावजूद प्यार करता हो, और चाहे कोई भी हो वह उसके प्रति प्रेममय और सहिष्णु रहता हो। ऐसी स्थिति में, वह कब न्यायोचित निर्णय तक पहुँचने में समर्थ होगा? अंत के दिनों के दौरान, केवल धार्मिक न्याय ही मनुष्य का उसके प्रकार के अनुसार वर्गीकरण कर सकता है और मनुष्य को एक नए राज्य में ला सकता है। इस तरह, परमेश्वर के न्याय और ताड़ना के धार्मिक स्वभाव के माध्यम से समस्त युग का अंत किया जाता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)")।

सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के इन वचनों को पढ़ने के बाद, हम उस स्‍वभाव के विषय में क्‍या जान सकते हैं जिसे अनुग्रह के युग में परमेश्‍वर ने प्रकट किया? राज्‍य के युग में परमेश्‍वर क्‍या स्‍वभाव प्रकट करते हैं? क्‍या अनुग्रह के युग और राज्‍य के युग में प्रकट परमेश्‍वर के स्‍वभाव समान हैं? परमेश्‍वर ने अनुग्रह के युग में छुटकारे का कार्य किया, उसी दौरान उन्‍होंने अपनी दयालुता, प्रेम, सहिष्‍णुता, धैर्य, क्षमा और पाप-मुक्ति को प्रकट किया। इस तरह से मानवजाति परमेश्‍वर के सम्‍मुख आने, प्रार्थना करने, अपने पापों को स्‍वीकार करने और परमेश्‍वर से विनती करने के काबिल हो पाई। परमेश्‍वर से पाप-मुक्ति प्राप्‍त करने के बाद, वे परमेश्‍वर का अनुग्रह और आशीष प्राप्‍त कर सके। व्‍यवस्‍था के युग के उत्‍तर काल में, यह ज्ञान होने के बावजूद कि पाप क्‍या होता है और यहोवा परमेश्‍वर के नियम मनुष्‍य जाति के किसी भी अपराध को सहन नहीं करेंगे, मानवजाति ने अक्‍सर इन नियमों के विपरीत जाकर परमेश्‍वर का अपमान किया। मनुष्‍यजाति से जो अपेक्षा नियमों और आज्ञाओं की थी, उसके अनुसार तो व्‍यवस्‍था के अंतर्गत उन्‍हें मौत के घाट उतार देना चाहिए था। इसी कारण अनुग्रह के युग में परमेश्‍वर ने देहधारण किया और उन्‍हें मानवजाति के लिये सूली पर चढ़ा दिया गया; उन्‍होंने व्‍यक्तिगत रूप से मानवता के पापों का बोझा उठाकर मनुष्‍य को उसके पापों के लिए क्षमा कर उन्‍हें मुक्‍त किया। प्रभु यीशु ने अपने अनुयायियों के साथ उसी तरह का व्यवहार किया जैसे माता-पिता अपने पुत्र-पुत्रियों के साथ करते हैं, अर्थात उन्होंने अपने अनुयायियों की बहुत परवाह की और अगर किसी ने उनमें विश्‍वास किया या उनका अनुसरण किया, तो उसका त्याग नहीं किया। प्रभु यीशु ने अपनी दया, प्रेम, क्षमा और पाप-मुक्ति को इसलिये प्रकट किया ताकि हम देख सकें कि हमारे लिए सच्‍चे परमेश्‍वर का प्रेम कैसा होता है, परमेश्‍वर का हृदय कितना करुणामय और कृपालु है, वे किस प्रकार हमारी कमज़़ोरियों का ध्‍यान रखते हैं। उनके प्रेम ने हमारे हृदय को दोषनिवृत्‍त कर दिया। यही कारण है कि हम परमेश्‍वर को स्‍वीकार करने, उनके सामने आकर अपने पापों का प्रायश्चित करने और परमेश्‍वर के द्वारा छुटकारा पाने को तैयार हुए। क्‍या हम सभी ने परमेश्‍वर की इस दया और प्रेम का अनुभव नहीं किया है? अब जब अंत के दिन आ गए हैं, तो मानवजाति को पहले से ही परमेश्‍वर के अस्तित्‍व का पता है और उसने परमेश्‍वर के अनुग्रह का बहुत आनंद उठाया है। सभी इस बात पर निश्चित हो सकते हैं कि परमेश्‍वर मानवजाति को छुटकारा प्रदान कर रहे और बचा रहे हैं। इस समय लोग कुछ सत्‍यों को स्‍वीकार कर पाते हैं—परमेश्‍वर द्वारा अब उनके न्‍याय का कार्य करने का समय आ गया है ताकि मनुष्‍य का पूरी तरह शुद्धिकरण कर उसे बचाया जा सके। क्‍योंकि अंत के दिनों की मानवजाति शैतान की भ्रष्‍टता से बेहद विकृत हो गई है, लोग अविश्‍वसनीय रूप से अहंकारी, छली, स्‍वार्थी, घृणित, और भयंकर रूप से दुष्‍ट और लालची हो गये हैं। वे प्रसिद्धि, हैसियत और दौलत के लिए कुछ भी करने से नहीं चूकेंगे। वे अपनी अंतरात्‍मा और विवेक पूरी तरह खो चुके हैं, उनमें लेशमात्र भी मानवता नहीं बची है। और भले ही वे प्रभु में विश्‍वास करते हैं और अपने पापों के लिए क्षमा पा चुके हैं, लेकिन उनकी पापी प्रकृति और शैतानी स्‍वभाव अभी भी शेष हैं। इसीलिए पूरी मानवजाति पाप में जीते रहने से स्‍वयं को मुक्‍त नहीं कर सकती। मनुष्‍यता को पाप की दुष्‍टता से पूरी तरह से बचाने के लिए, भ्रष्‍ट मानव जाति की आवश्‍यकता के अनुरूप अंत के दिनों में मनुष्‍य के पुत्र के रूप में परमेश्‍वर देहधारी बने हैं; उन्‍होंने मानव जाति का शुद्धिकरण करने और उसे बचाने के लिए सभी सत्‍यों को व्‍यक्‍त किया है। परमेश्‍वर ने न्‍याय और ताड़ना के कार्य का एक चरण क्रियान्वित किया है, और जब वे मनुष्‍य का न्‍याय करने के लिए सत्‍य प्रचालित करेंगे, तो उनके वचन थोड़े कटु होंगे और ठीक एक तीक्ष्‍ण दुधारी तलवार की तरह बहुत गहरी चोट करेंगे, और इस तरह उनका धार्मिक, प्रतापी और प्रकोपी स्‍वभाव पूरी तरह प्रकट हो जाएगा। निश्चित रूप से परमेश्‍वर के न्‍याय और ताड़ना के कारण ही हम यह देख पा रहे हैं कि उनकी धार्मिकता और पवित्रता मानव जाति के अपराधों को बर्दाश्‍त नहीं करेगी, और तभी हम निस्‍सहाय होकर दंडवत करेंगे और हमें छुपने के लिए कोई जगह नहीं रहेगी। तब हमें एहसास होता है कि हम बुरी तरह भ्रष्‍ट हो चुके हैं और हमारे अंदर पूरी तरह से शैतानी स्‍वभाव भरा हुआ है, हम में परमेश्‍वर के प्रति कोई सम्‍मान और आदर नहीं है, हम केवल उनसे विद्रोह कर सकते और उनके विरुद्ध जा सकते हैं, कि हम उनकी उपस्थिति में रहने योग्‍य नहीं हैं। केवल इसी के माध्‍यम से हम सच्‍चा पश्‍चाताप करते हैं और यह जान पाते हैं कि एक सच्‍चा मनुष्‍य कैसा होता है, और किसी को अपना जीवन अर्थपूर्ण ढंग से किस तरह जीना चाहिए। परमेश्‍वर के न्‍याय और ताड़ना को अनुभव करने के बाद, हम कई सत्‍यों को जान पाते हैं, परमेश्‍वर के प्रति सम्‍मान और समर्पण का हृदय विकसित कर पाते हैं, सत्‍य की खोज करने का महत्‍व, परमेश्‍वर को जानने और प्रेम करने का परम महत्‍व जान सकते हैं; क्‍या यह सच्‍चा पश्‍चाताप नहीं है? क्‍या यह सच्‍चा परिवर्तन नहीं है? परमेश्‍वर के न्‍याय और ताड़ना के बिना, इतनी गहराई से भ्रष्‍ट मनुष्‍य के पास शुद्ध होकर उद्धार प्राप्‍त करने का और कोई मार्ग नहीं रह जाएगा।

तो अब हम यह देखते हैं कि परमेश्‍वर द्वारा मनुष्‍य को बचाने और पूर्ण करने के परिणाम केवल उनके न्‍याय और ताड़ना से ही प्राप्‍त हो सकते हैं। ये तथ्‍य हैं। यदि घटनायें हमारी कल्‍पनाओं के अनुसार घटित होतीं तो, अंत के दिनों में परमेश्‍वर ने भी प्रभु यीशु के समान ही प्रेमपूर्ण और दयापूर्ण स्‍वभाव प्रकट किया होता—क्‍या उससे मानवजाति के शुद्धिकरण और उसे बचाने का परिणाम प्राप्‍त हो सकता था? यदि परमेश्‍वर ने अंत के दिनों में अपना न्‍याय का कार्य नहीं किया होता तो हम कभी भी परमेश्‍वर का अं‍तर्निहित स्‍वभाव नहीं समझ पाते जो मुख्‍यत: उनकी धार्मिकता पर आधारित है। तब हम सत्‍य ग्रहण नहीं कर पाते, शुद्धिकरण और उद्धार की प्राप्ति नहीं कर पाते या पूर्ण नहीं हो पाते। इसके साथ-साथ सत्‍य का अनुसरण नहीं करने वाले ऐसे अविश्‍वासियों को या सत्‍य से घृणा और परमेश्‍वर से शत्रुता रखने वाले ऐसे मसीह-विराधियों को उजागर करने और हटा देने का कोई मार्ग नहीं होता। केवल परमेश्‍वर का धार्मिक न्‍याय ही मनुष्‍य को पूरी तरह उजागर कर हर व्‍यक्ति को उसके प्रकार के आधार पर वर्गीकृत कर सकता है। केवल इसी से मनुष्‍यजाति को बचाने का परमेश्‍वर का कार्य पूरी तरह सम्‍पन्‍न हो सकता है। सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के वचन पढ़ कर हम यह जान सकते हैं कि हर युग में परमेश्‍वर जो स्‍वभाव व्‍यक्‍त करते हैं, वह उनके मानवजाति को बचाने की आवश्‍यकता के आधार पर निर्धारित होता है। अत: हम परमेश्‍वर के स्‍वभाव को और उनकी सम्‍पूर्णता को किसी भी युग में उनके प्रकट किए गए स्‍वभाव के मान से सीमांकित नहीं कर सकते। क्‍योंकि फरीसियों ने परमेश्‍वर का नाम सीमांकित कर दिया था और वे लोग सख्‍ती से नियमों के एक समुच्‍चय का पालन करते थे जिस कारण उन्‍होंने प्रभु यीशु का विरोध और उनकी निंदा की, जिसकी वजह से वे परमेश्‍वर द्वारा दण्डित और श्रापित हुए। हमें परमेश्‍वर के तीन चरणों के कार्य को समझ कर उनके स्‍वभाव को जानना चाहिए। ऐसा करने का यही एकमात्र सटीक तरीका है, और यह परमेश्‍वर की इच्‍छा के अनुरूप है। यदि हम मात्र अनुग्रह के युग में प्रभु यीशु के प्रकट किए गए स्‍वभाव के द्वारा यह निष्‍कर्ष निकालते कि परमेश्‍वर प्रेमपूर्ण और दयालु हैं, तो यह परमेश्‍वर का सच्‍चा ज्ञान किस प्रकार होता? यह परमेश्‍वर को जानने का बड़ा मूर्खतापूर्ण और अज्ञानी मार्ग होता। सभी फरीसी बाइबल को समझते थे, फिर वे परमेश्‍वर को क्‍यों नहीं जानते थे? इसकी वजह यह थी कि उन्‍होंने परमेश्वर की व्याख्या उनके कार्य के मात्र एक चरण के आधार पर की, अतएव जब प्रभु यीशु अपना कार्य करने के लिए आए तो उन्‍होंने उन्‍हें सूली पर चढ़ा दिया। यह दर्शाता है कि यदि हम परमेश्‍वर को नहीं जानते हैं तो उन्‍हें सीमांकित करना और उनका विरोध करना कितना आसान हो सकता है।

— पटकथा प्रश्नों के उत्तर से उद्धृत

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