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सूचीपत्र

मानव जाति को बचाने और शुद्ध करने के लिए परमेश्‍वर अंत के दिनों का अपना न्याय कार्य कैसे करते हैं?

उत्तर: हर कोई जो वर्तमान में सच्‍चे मार्ग की खोज और जाँच करता है, यह समझना चाहता है कि सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर अंत के दिनों का अपना न्याय कार्य कैसे करते हैं। सत्‍य के इस पहलू के संबंध में सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर ने बहुत सारे वचनों को व्यक्त किया है। आइये हम सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के वचन के कुछ अंश पढ़ते हैं:

"इस समय जब परमेश्वर देहधारी हुआ है, तो उसका कार्य, प्राथमिक रूप में ताड़ना और न्याय के द्वारा, अपने स्वभाव को व्यक्त करना है। इसे नींव के रूप में उपयोग करके वह मनुष्य तक अधिक सत्य को पहुँचाता है, अभ्यास करने के और अधिक मार्ग दिखाता है, और इस प्रकार मनुष्य को जीतने और मनुष्य को उसके भ्रष्ट स्वभाव से बचाने के अपने उद्देश्य को प्राप्त करता है। राज्य के युग में परमेश्वर के कार्य के पीछे यही निहित है" ("वचन देह में प्रकट होता है" के लिए प्रस्तावना से)।

"अंत के दिनों में, मसीह मनुष्य को सिखाने के लिए विभिन्न प्रकार की सच्चाइयों का उपयोग करता है, मनुष्य के सार को उजागर करता है, और उसके वचनों और कर्मों का विश्लेषण करता है। इन वचनों में विभिन्न सच्चाइयों का समावेश है, जैसे कि मनुष्य का कर्तव्य, मनुष्य को किस प्रकार परमेश्वर का आज्ञापालन करना चाहिए, हर व्यक्ति जो परमेश्वर के कार्य को मनुष्य को किस प्रकार परमेश्वर के प्रति निष्ठावान होना चाहिए, मनुष्य को किस प्रकार सामान्य मानवता से, और साथ ही परमेश्वर की बुद्धि और उसके स्वभाव इत्यादि को जीना चाहिए। ये सभी वचन मनुष्य के सार और उसके भ्रष्ट स्वभाव पर निर्देशित हैं। खासतौर पर, वे वचन जो यह उजागर करते हैं कि मनुष्य किस प्रकार से परमेश्वर का तिरस्कार करता है इस संबंध में बोले गए हैं कि किस प्रकार से मनुष्य शैतान का मूर्त रूप और परमेश्वर के विरूद्ध दुश्मन की शक्ति है। अपने न्याय का कार्य करने में, परमेश्वर केवल कुछ वचनों से ही मनुष्य की प्रकृति को स्पष्ट नहीं करता है; वह लम्बे समय तक इसे उजागर करता है, इससे निपटता है, और इसकी काट-छाँट करता है। उजागर करने की इन विधियों, निपटने, और काट-छाँट को साधारण वचनों से नहीं, बल्कि सत्य से प्रतिस्थापित किया जा सकता है, जिसे मनुष्य बिल्कुल भी धारण नहीं करता है। केवल इस तरीके की विधियाँ ही न्याय समझी जाती हैं; केवल इसी तरह के न्याय के माध्यम से ही मनुष्य को वश में किया जा सकता है और परमेश्वर के प्रति समर्पण में पूरी तरह से आश्वस्त किया जा सकता है, और इसके अलावा मनुष्य परमेश्वर का सच्चा ज्ञान प्राप्त कर सकता है। न्याय का कार्य जिस चीज़ को उत्पन्न करता है वह है परमेश्वर के असली चेहरे और उसकी स्वयं की विद्रोहशीलता के सत्य के बारे में मनुष्य में समझ। न्याय का कार्य मनुष्य को परमेश्वर की इच्छा की, परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य की, और उन रहस्यों की अधिक समझ प्राप्त करने देता है जो उसके लिए अबोधगम्य हैं। यह मनुष्य को उसके भ्रष्ट सार तथा उसकी भ्रष्टता के मूल को पहचानने और जानने, साथ ही मनुष्य की कुरूपता को खोजने देता है। ये सभी प्रभाव न्याय के कार्य के द्वारा निष्पादित होते हैं, क्योंकि इस कार्य का सार वास्तव में उन सभी के लिए परमेश्वर के सत्य, मार्ग और जीवन का मार्ग प्रशस्त करने का कार्य है जिनका उस पर विश्वास है। यह कार्य परमेश्वर के द्वारा किया गया न्याय का कार्य है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "मसीह न्याय का कार्य सत्य के साथ करता है" से)।

"इस युग के दौरान परमेश्वर द्वारा किया गया कार्य मुख्य रूप से मनुष्य के जीवन के लिए वचनों का प्रावधान करना, मनुष्य की प्रकृति के सार और भ्रष्ट स्वभाव को प्रकट करना था, धार्मिक अवधारणाओं, सामन्ती सोच, पुरानी सोच, साथ ही मनुष्य के ज्ञान और संस्कृति को समाप्त करना था। यह सब कुछ परमेश्वर के वचनों के माध्यम से अवश्य सामने लाया जाना और साफ किया जाना चाहिए। अंत के दिनों में, मनुष्य को पूर्ण करने के लिए परमेश्वर वचनों का उपयोग करता है, न कि चिह्नों और चमत्कारों का। वह मनुष्य को उजागर करने, मनुष्य का न्याय करने, मनुष्य को ताड़ित करने और मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए वचनों का उपयोग करता है, ताकि परमेश्वर के वचनों में, मनुष्य परमेश्वर की बुद्धि और सुन्दरता को देख ले, और परमेश्वर के स्वभाव को समझ जाए, ताकि परमेश्वर के वचनों के माध्यम से, मनुष्य परमेश्वर के कार्यों को निहार ले" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "आज परमेश्वर के कार्य को जानना" से)।

"परमेश्वर के पास मनुष्य को सिद्ध बनाने के अनेक साधन हैं। मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव से निपटने के लिए वह समस्त प्रकार के वातावरण प्रयोग करता है, और मनुष्य को नग्न करने के लिए विभिन्न चीजों का प्रयोग करता है, एक और वह मनुष्य के साथ निपटता है और दूसरी ओर मनुष्य को नग्न करता है, और एक अन्य बात में वह मनुष्य के हृदय के गहन रहस्यों को खोदकर और ज़ाहिर करते हुए, और मनुष्य को उसकी अनेक अवस्थाएँ दिखा करके उसका स्वभाव दर्शाते हुए मनुष्य को प्रकट करता है। परमेश्वर अनेक विधियों—प्रकाशन, व्यवहार करने, शुद्धिकरण, और ताड़ना—के द्वारा मनुष्य को सिद्ध बनाता है, जिससे मनुष्य जान सके कि परमेश्वर व्यावहारिक है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "मात्र वे लोग जो अभ्यास करने पर केन्द्रित रहते हैं, उन्हें ही सिद्ध बनाया जा सकता है" से)।

परमेश्‍वर अंत के दिनों में जब भ्रष्ट मानव जाति का न्याय करने और उसे शुद्ध करने के लिए कार्य करते है, तो वे परमेश्‍वर की अवज्ञा और विरोध करने वाली मनुष्य की शैतानी प्रकृति का न्याय करने और उसे उजागर करने के लिए और परमेश्‍वर का पवित्र, धर्मी और किसी भी अपमान को सहन न करने वाला स्‍वभाव मनुष्‍य को दिखाने के लिए सत्य के कई पहलुओं का उपयोग करते हैं। परमेश्‍वर के वचन के न्याय के माध्यम से, मनुष्य शैतान द्वारा अपने अंदर गहराई तक फैलाए गए भ्रष्टाचार के सत्‍य को साफ़ तरीके से देख सकता है, और वास्तव में परमेश्‍वर के पवित्र सार और अपराध को सहन नहीं करने वाले उनके धर्मी स्वभाव को जान कर, परमेश्‍वर के प्रति श्रद्धा का भाव रखने लगता है। इस प्रकार वह पाप के बंधन और नियंत्रण से बचकर और शुद्धता प्राप्त कर परमेश्‍वर का उद्धार प्राप्त करता है। जब हम सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के वचन पढ़ते हैं, तो हम महसूस कर सकते हैं कि परमेश्‍वर आमने-सामने हमारा न्याय कर हमें उजागर कर रहे हैं, और यह महसूस कर सकते हैं कि परमेश्‍वर के वचन, दो-धारी तलवार की तरह, हमारी अवज्ञाकारी और परमेश्‍वर-विरोधी शैतानी प्रकृति का न्याय कर उसे उजागर करते हैं। हम इस सत्‍य को साफ़ तरीके से देखते हैं कि हम शैतान द्वारा इस कदर गहराई से भ्रष्ट किए गए हैं, कि हमारी प्रकृति अहंकारी, धोखेबाज, स्वार्थी और नीच है। हालांकि हम परमेश्‍वर में विश्वास करते हैं, हम परमेश्‍वर को महिमामंडित नहीं होने देते, और हमारे पास परमेश्‍वर से डरने वाला हृदय नहीं है। हम अक्सर झूठ बोलते हैं, परमेश्‍वर को और अन्य लोगों को धोखा देते हैं। हम परमेश्‍वर में विश्वास करते हैं लेकिन मनुष्य की पूजा और उसका अनुसरण करते हैं। प्रतिष्‍ठा प्राप्‍त करने पर, हम दिखावा करने लगते हैं और स्‍वयं को बढ़ा-चढ़ा कर बताते हैं, ताकि लोग हमारी बात सुनें और हमारी आज्ञा मानें। यहाँ तक कि हम परमेश्‍वर से अलग होकर उनका मुकाबला करते हुए, स्वतंत्र राज्‍य की स्थापना भी कर सकते हैं। जब हम प्राकृतिक या मानव निर्मित आपदाओं का सामना करते हैं, हम परमेश्‍वर के बारे में शिकायत करते हैं और परमेश्‍वर का विरोध भी करते हैं। जब परमेश्‍वर का नया कार्य हमारे विचारों से मेल नहीं खाता है, हम भी अतीत के यहूदी फरीसियों की तरह व्‍यवहार करते हुए परमेश्‍वर के बारे में निष्कर्ष निकालते हैं और अपनी पसंद के मुताबिक़ उनका आकलन करते हैं। अगर हम परमेश्‍वर के लिए थोड़ा सा खर्च या कुछ कार्य करते हैं या थोड़ा सा दु:ख उठाते हैं, तो हम अपने आपको बहुत महत्वपूर्ण बताकर और अपनी वरिष्‍ठता दिखाकर, परमेश्‍वर से अनुग्रह और आशीष की मांग करते हैं। जब तक हमारी इच्छाएं पूरी नहीं होती हैं, तब हम नकारात्मक और सुस्‍त होकर कार्य करते हैं या अपना कार्य छोड़ देते हैं, आदि। हम देख सकते हैं कि शैतान द्वारा हमारा भ्रष्टाचार बहुत गहराई तक फ़ैल गया है! हम मनुष्यों की छवि के अनुरूप बिल्‍कुल भी नहीं जीते हैं! हम मूल रूप से शैतान का स्वरूप हैं! शैतान के द्वारा हमारे भ्रष्टाचार के सत्‍य का सामना करते हुए, हम सब बहुत शर्मिंदगी और पश्चाताप से भरे हैं, और हम इसकी सराहना करते हैं कि परमेश्‍वर की पवित्रता को दूषित नहीं किया जा सकता और उनके धर्मी स्वभाव को ठेस नहीं पहुँचाया जा सकता है। अपने बुरे तौर-तरीकों का पछतावा करते हुए, अपनी शैतानी प्रकृति का तिरस्कार करते हुए, और परमेश्‍वर से पश्चाताप करते हुए, हम परमेश्‍वर के सामने गिर पड़ने से स्‍वयं को रोक नहीं सकते। हम परमेश्‍वर के न्याय और ताड़ना को स्वीकार करने, सृजित प्राणियों के रूप में हमारा कर्तव्य करने, और परमेश्‍वर के आयोजन एवं व्‍यवस्‍था के अनुसार अपना कर्तव्य पूरा करने के लिए तैयार हैं। यह अपने चुने हुए लोगों पर परमेश्‍वर के वचन के न्याय का परिणाम है!

हम सब परमेश्‍वर के न्याय और ताड़ना का अनुभव करने के बाद यह जानते हैं कि परमेश्‍वर न सिर्फ हमारा न्याय करने और हमें उजागर करने के लिए अपने वचन का उपयोग करते है, बल्कि वे हमारा परीक्षण करने और हमें उजागर करने के लिए, कड़ाई से हमारी काट-छाँट करने, हमसे निपटने और हमें अनुशासित करने के लिए, हमारी वास्तविक स्थितियों को लक्षित कर, विभिन्न परिवेशों, लोगों और चीजों की व्यवस्था करते हैं। वास्तव में परमेश्‍वर के न्याय और ताड़ना, व्यवहार और कांट-छांट के अनुभव के माध्यम से, हम देखते हैं कि हमारी प्रकृति बहुत अभिमानी, बहुत हठी है। अगर हमें इस प्रकार न्याय और ताड़ना नहीं मिलती है, तो हमारा स्वभाव परिवर्तित नहीं हो पाएगा। उदाहरण के लिए, कभी-कभी हम अपने कर्तव्य को पूरा करते हुए सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं। हमारी अभिमानी प्रकृति के माध्यम से, हम अपनी मनमर्ज़ी करते हैं, खुद को ऊंचा दिखाते हैं, और लोगों को प्रभावित करने के लिए अपना रुतबा बढाते हैं, अपनी आत्माओं को अंदर से अंधकारमय और परमेश्‍वर की उपस्थिति का बोध करने में असमर्थ बना देते हैं, और हमारे दिलों को ठेस लगाकर परिष्कृत करते हैं। इस समय, परमेश्‍वर का वचन हमें अंदर से धिक्‍कारेगा। कभी-कभी परमेश्‍वर हमसे निपटने और हमारी काँट-छाँट करने के लिए लोगों और चीजों की व्यवस्था करेंगे, ताकि हम चिंतन करने और स्‍वयं को जानने के लिए परमेश्‍वर के समक्ष वापस आ सकें, और अचेतन रूप से लोगों को नियंत्रित करने और उन पर अधिकार जमाने की हमारी अभिमानी महत्वाकांक्षाओं को पहचान पाएं। जब हम देखते हैं कि हमारा स्वभाव शैतानी फ़रिश्ते की तरह हैं, तो हमारे हृदय भय से काँप उठते हैं। हमें लगता है कि परमेश्‍वर के स्वभाव को ठेस नहीं पंहुचाई जा सकती, और हम प्रार्थना करने और पश्चाताप करने के लिए परमेश्‍वर के समक्ष गिर जाते हैं। इस समय, परमेश्‍वर के वचन हमें शान्ति देंगे, हमें प्रोत्साहित करेंगे, और हमें परमेश्‍वर द्वारा मानव जाति के उद्धार की समस्‍त पीड़ा और प्रयास को समझायेंगे, ताकि हम निष्क्रिय और कमजोर ना बनें, सत्‍य का अनुसरण करने के लिए विश्‍वास रखें, और स्वभाव के परिवर्तन की खोज कर सकें। कई बार परमेश्‍वर के वास्तविक व्यवहार और कांट-छांट, अनुशासन और ताड़ना का अनुभव करने के बाद, हमारे अभिमानी स्वभाव में परिवर्तन होता है, हम अपने कर्तव्य को पूरा करने में अधिक विनम्र बन जाते हैं और पहले की तरह अक्‍खड़ नहीं रहते, और हम खुद आगे बढ़कर अपने भ्रष्टाचार को पहचानने के लिए पहल कर सकते हैं, चैतन्‍य रूप से परमेश्‍वर की महिमा करते हुए, परमेश्‍वर की गवाही देते हुए, महसूस कर सकते हैं कि इस तरह से जीवन जीना हमारे दिल को सुकून देता और सुखद लगता है। परमेश्‍वर का उद्धार कार्य सचमुच बहुत व्यावहारिक है! परमेश्‍वर के ऐसे न्याय और ताड़ना के वास्‍तविक अनुभव के माध्यम से ही हमें अब परमेश्‍वर के धर्मी स्वभाव का असली ज्ञान हुआ है, और हम जानते हैं कि परमेश्‍वर किस तरह के व्यक्ति से प्रेम करते हैं और किस प्रकार के व्यक्ति को तुच्छ मानते हैं, वे किस प्रकार के व्यक्ति को बचायेंगे और किस तरह के व्यक्ति को खत्म करेंगे, वे किस प्रकार के व्यक्ति को आशीष देंगे और किस तरह के व्यक्ति को शाप देंगे, और यह भी जान पाए हैं कि परमेश्‍वर वास्तव में हर चीज़ का निरीक्षण करते हैं और सभी पर प्रभुत्‍व रखते हैं। परमेश्‍वर दृढ़ता से हमारा मार्गदर्शन करते हुए और हमें बचाते हुए, ठीक हमारे समीप हैं, जिससे हम यह मूल्यांकन कर पाते हैं कि परमेश्‍वर द्वारा व्‍यक्‍त सत्‍य, हम भ्रष्‍ट मानव जाति के प्रति उनका न्याय और ताड़ना है। यह निरीक्षण है, यह शुद्धि है। अपने दिलों में परमेश्‍वर के भय और हमारे भ्रष्ट स्वभाव में परिवर्तन के साथ, जब हम चीज़ों को जानते हैं, सत्य का अभ्यास करते हैं और परमेश्‍वर का आज्ञापालन करते हैं तो हम सत्य की खोज कर सकते हैं, और धीरे-धीरे एक सच्‍चे मनुष्‍य की तरह रह सकते हैं। आज तक जो परिवर्तन हम प्राप्त करने में सफल हुए हैं, पूरी तरह से अंत के दिनों में परमेश्‍वर के न्याय कार्य के अनुभव का परिणाम है। यह हमारे लिए परमेश्‍वर का विशाल प्रेम और उद्धार है।

"विजय गान" फ़िल्म की स्क्रिप्ट से लिया गया अंश

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